) रास लीला .. भगवानपि ता रात्री: शरदोत्फुल्लामल्लिका . वीक्ष्य रन्तुं मश्रच्क्रे योगमायामुपाश्रित: .. शरद ऋतु थी इसलिए बेला, चमेली, रजनी, जुही, मल्लिका, आदि सुगन्धित पुष्प खिलकर मँहक रहे थे. प्रकृति के कण-कण में उनकी मँहक समायी हुई थी, पंकज अर्थात कमल सूर्य उदय होने पर खिलते है पर आज बिना सूर्ये के रात में ही खिल रहे है. भगवान के संकल्प करते ही चन्द्रदेव ने पूर्व दिशा के मुखमंडल पर अपने शीतल किरणों रूपी करकमलों से लालिमा की रोली-केसर मल दी.उस दिन चन्द्रदेव का मण्डल अखंड था. उनकी कोमल किरणों से सारा वन अनुराग के रंग में रँग गया था. वन के कोने-कोने में उन्होंने अपनी चाँदनी के द्वारा अमृत का समुद्र उड़ेल दिया था. श्रीकृष्ण ने अपनी वासुरी पर व्रज सुंदरियों के मन को हरण करने वाली काम के बीज मन्त्र “क्लीं” का सप्तम स्वर छेड़ दिया. अचालक प्रकृति में परिवर्तन हो गया, जड़ जितने भी थे मानो सब चेतन हो गये और चेतन सप्तम स्वर सुनते ही जड़ हो गये. ध्वनि पाताल-नभ में पूर गयी. तीनो लोको में खलबली-सी मच गयी. बाँसुरी भी एक-एक गोपी का नाम ले-लेकर बुला रही है ललिते, विशाखे, वृषभानुजे श्यामसुन्दर ने पहले से ही गोपियों के मन अपने वश में कर रखा था अब तो उनके मन की सारी वस्तुएँ भय, संकोच, धैर्य, मर्यादा, आदि वृतियाँ भी छीन ली वंशी ध्वनि सुनते ही उनकी विचित्र गति हो गयी. वे बड़े वेग से दौडी पड़ी. किसी चीज का ख्याल ही नहीं है क्योकि आज प्रीतम ने आवाहन किया है आज युगों की साधना फलीभूत हुई है .ना कुल का ख्याल है ना तन का संभाल है ना काल का विचार है वे वर्वश होकर चली. !! जय जय श्री राधे !!

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स्वोत्संगे न्यस्य बालं निजमिममिति दुश्चेष्टमुच्चैरमेध्य- क्रीडं सोढवाअपराधान सकरुणमति संमृज्य वीतं रजोभि:। आत्मेश प्रेमदिव्यं स्तनभरममलं पाययित्वा सु मात: श्रीमदवृन्दाटवि ! त्वं सहज निरवधि स्नेहपुरेअभिरक्ष ।। हे श्रीवृन्दावनाटवि ! आप स्वभाव से निरन्तर अगाध स्नेहशीला हो, मैं दुराचारी एवं अपवित्र विषयों में संलग्न हूं, किन्तु आप मुझे अपना बालक जानकर अपनी गोदी में लेकर मेरे समस्त अपराधों को सहन कीजिये, माता जैसे अपने बालक की धूलि झाड़ देती है, उसी प्रकार आप मेरी मलीनता को दूर करते हुए मेरे शरीर का अच्छी प्रकार से मार्ज्जन कर दीजिये । हे जननि ! आप अपने प्रियतम ( श्रीराधाकृष्ण) के शुद्ध दिव्य प्रेमामृतरूप स्तन को मुझे भरपेट पान कराकर मेरी हर प्रकार से रक्षा कीजिये । श्री वृन्दावनमहिमामृत

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एक समय श्री यमुनाजी के तट पर श्रीराधा-माधव विहार कर रहे है.वृंदा देवी कर्ण-भूषण के योग्य (कान में पहनने योग्य)दो कमल श्रीमाधव को लाकर देती है. श्रीकृष्ण सहर्ष उनको लेकर श्रीराधा के कानो में पहनाने लगते है, इतने में ही देखते है कि कमल में एक भ्रमर (भौरा)बैठा है. भ्रमर उड़ा,उसने कमल को तो छोड़ दिया और श्रीराधा के मुख को कमल समझकर उसकी ओर चला, श्री राधा ने श्री हस्त के द्वारा उसको हटाना चाहा, भ्रमर राधारानी जी के श्री करतल को एक कमल समझकर उसकी ओर उड़ा, ढीठ भ्रमर जा नहीं रहा है. इससे डरकर श्री राधा अपनी ओढनी का आँचल फटकारने लगी. मधुमंगल ने जब ये देखा तो तुरंत छड़ी मारकर भ्रमर को बहुत दूर हटा दिया और लौटकर कहा - "मधुसूदन (भ्रमर) चला गया". इतना सुनते ही 'मधुसूदन' शब्द से भगवान श्रीकृष्ण समझकर श्रीराधा जी हाय! हाय! मधुसूदन कहाँ चले गए' पुकारकर रोने लगी!"यदिह सहसा ममत्या क्षीद्वने वनजेक्षण: कमलनयन श्रीकृष्ण इस वन में मुझको त्यागकर क्यों चले गए?यो कहकर वे आर्तनाद करने लगी.कृष्ण पास ही बैठे थे क्योकि वे ही तो फूल लाकर पहना रहे थे.जब कृष्ण ने अपनी प्रियतमा के इस मधुरतम प्रेम वैचित्तय जनित विरह को देखा तो सब को चुप हो जाने के लिए कहा और स्वयं मधुर हास्य करने लगे. ये प्रेम वैचित्तय है जहाँ श्याम सुदंर पास में ही है फिर भी श्यामा जू विरह में डूबी हुई है,मिलन और विरह का अद्भुत और विलक्षण द्रश्य है, —

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"गोपी को देवी दर्शन" एक गोपी एक वृक्ष के नीचे ध्यान लगा बैठ जाती है। कान्हा को सदा ही शरारतें सूझती रहती हैँ। कान्हा कभी उस गोपी को कंकर मारकर छेड़ते हैं, कभी उसकी चोटी खींच लेते हैं, तो कभी अलग-अलग पक्षियों और जानवरों की आवाज़ निकाल उसका ध्यान भंग करते हैं। गोपी खीझ कर कान्हा से कहती है- "मोहन ! तुम मेरी ध्यान साधना में भंग क्यों डालते हो, मुझे देवी के दर्शन करने हैँ। मुझे उनसे कुछ वर मांगना है।" गोपी के मन में कान्हा के लिए इतना प्रेम है कि कान्हा से ही छिपा लेती है। कान्हा उस भोली गोपी को अपनी बातों में उलझा लेते हैं- "अरी मूर्ख ! ऐसे ध्यान करने से ईश्वर नहीं मिलते। उनको प्रसन्न करने के लिए उनको बहुत कुछ खिलाना पड़ता है। तू कल सुबह बहुत सारे मिष्ठान ले मन्दिर में आना फिर मैं तुम्हें देवी दर्शन की विधि बताऊँगा। देवी प्रसन्न हो गई तो तुम्हें वर देंगी और तुम्हारी मनोकामना पूर्ण होगी।" अगले दिन प्रातः गोपी बहुत से मिष्ठान ले मन्दिर में पहुँच जाती है। देवी की प्रतिमा के समक्ष सब रख धूप दीप कर बैठ जाती है। कान्हा अपने सखाओं संग वहाँ पहुँच जाते हैं। गोपी कान्हा को देख बहुत प्रसन्न होती है। कान्हा बरसाना की ओर इशारा करके बोलते हैं- "उन देवी का स्थान जगत में सबसे ऊपर है। उनके दर्शन तो बड़े बड़े ऋषि मुनियों को दुर्लभ हैं। वो देवी तेरी मनोकामना पूर्ण करेंगी, परन्तु तुम्हें पहले मुझे प्रसन्न करना होगा तभी मैं तुमको देवी के दर्शन करवाऊँगा।" गोपी बोली- "कान्हा तुमको कैसे प्रसन्न करूँ।" मोहन बोले- "ये जो सब स्वादिष्ट मिष्ठान तू लाई है ये सब मुझे और मेरे सखाओं को खिला दे।" "नहीं कान्हा ये तो सब देवी पूजन हेतु है।" गोपी बोली। "चल छोड़ फिर तुझे देवी दर्शन नहीं हो सकता। अपनी कामना भूल जा तू।" मोहन ने कहा। गोपी ये भी चाहती है कि उसके प्रियतम कान्हा ये सब मिष्ठान पा लें परन्तु मन में अभी देवी दर्शन की लालसा भी है। गोपी की स्थिति विचित्र हो रही है। कान्हा कहते हैं- "गोपी ! देख मेरे पास शक्ति है मैं किसी भी देवी देवता को अपनी इच्छा अनुसार बुला सकता हूँ।" कान्हा तुम मुझे मूर्ख बना रहे हो, अपने माखन से सने हुए मुख को साफ करने की शक्ति तो तुम में नहीं है। मैं ही मूर्ख रही जो तुम्हारी बातों में आ गयी। अब तुम भाग जाओ यहाँ से और मुझे देवी दर्शन करने दो। गोपी ने खीज कर कहा। कान्हा ललचाई दृष्टि से मिष्ठान की और देखते हैं। गोपी खीझ कर उनको मारने को दौड़ती है। कान्हा उसको पकड़ लेते हैं और उसकी आँखें बन्द कर देते हैं। गोपी को श्री राधा के दिव्य स्वरूप् का दर्शन होता है। गोपी उनको अपनी मनोकामना बताती हैं और श्री जू मन्द-मन्द मुस्कुराती हैं। वो उनका तेज सहन नहीं कर पाती और मूर्छित हो जाती हैं। कान्हा और उनकी शरारती मित्र मण्डली के शोर से चेतना लौटने पर एक बार तो गोपी बहुत प्रसन्न होती है। उसको देवी दर्शन की स्मृति रहती है। परन्तु अपने खाली बर्तन और सब मिठाई खत्म देख वो अत्यंत क्रोधित हो जाती है और उन सबको मारने को दौड़ती है। भोली गोपी क्या जानती है कि जिसे वो प्रेम भी करती है और जिसकी ऊधम से भी खीझ जाती है, वही पूर्ण परमेश्वर हैं जो उसकी मनोकामना को पूर्ण करने हेतु उसे कैसे भी ठग लेते हैं।

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गरुड़ पंचमी Appearance day of Garuda हरतालिका तीज के दो दिन बाद गरुड़ पंचमी आती है। इस दिन भगवान के सर्वोच्च भक्त तथा वाहन का इस सृष्टि में प्राकट्य दिवस होता है। इनके पिता स्वयं कश्यप मुनि हैं और माता विनता। इन्हें पक्षिराज, वैनीतेय, सुपर्णा, विनतासूत, कश्यपेय और नागांतक के नाम से भी जाना जाता है। वैष्णव भक्तों के लिए गरुड़ जी अत्यंत आदरणीय हैं इसके कुछ कारण इस प्रकार हैं। भगवान के आशीर्वाद से गरुड़ जी की स्थापना हर विष्णु मंदिर में आवश्यक होती है। भगवद गीता के दसवें अध्याय के ३०वें श्लोक में भगवान अर्जुन से कहते हैं कि पक्षियों में मैं गरुड़ के समान हूँ। श्रीमद् भगवतम के छटे स्कंध के आठवें अध्याय के २९वें श्लोक में गरुड़ जी को सर्वपूज्य, साक्षात वेद के समान तथा भक्तों के रक्षक बताया गया है। जिस घंटी को बजा कर हम भोग अर्पण करते हैं उसके ऊपर गरुड़ जी का वास ज़रूरी होता है। श्रीमुख के साथ साथ उनके पंखो में से भी वेद वाणी प्रकट होती है। इस दिन हम वैष्णव अपने वरिष्ठ भक्त गरुड़ जी से विशेष प्रार्थना करते हैं की हमारे हृदय में कृष्ण भक्ति बनी रहे और हमें भगवत सेवा की प्राप्ति होती रहे जिससे हम कृष्ण प्रेममय हो सकें। ॐ श्री गरूड़ाय नम:

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(((( दाढ़ी मूंछ वाली चंचल गोपी )))) . 9 साल के छोटे बाल रूप में जब श्री कृष्ण ने महा रास का उद्घोष किया तो वृन्दावन में ही नहीं पूरे ब्रह्माण्ड के तपस्वी प्राणियों में भयंकर हल चल मच गयी की काश हमें भी इस महा रास में शामिल होने का मौका मिल जाय !! . दूर-दूर से गोपियाँ जो की पूर्व जन्म में एक से बढ़कर एक ऋषि, मुनि, तपस्वी, योगी, भक्त थीं, महा रास में शामिल होने के लिए आतुरता से दौड़ी आयीं !! . महारास में शामिल होने वालों की योग्यता को परखने की जिम्मेदारी थी श्री ललिता सखी की, जो स्वयं श्री राधा जी की प्राण प्रिय सखी थीं और उन्ही की स्वरूपा भी थीं !! . हमेशा एकान्त में रहकर कठोर तपस्या करने वाले भगवान् शिव को जब पता चला की श्री कृष्ण महा रास शुरू करने जा रहें हैं.. . तो वो भी अत्यन्त खुश होकर, तुरन्त अपनी तपस्या छोड़, पहुंचे श्री वृन्दावन धाम और बड़े आराम से सभी गोपियों के साथ रास - स्थल में प्रवेश करने लगे ! . पर द्वार पर ही उन्हें श्री ललिता सखी ने रोक दिया और बोली कि - हे महा प्रभु, रास में सम्मिलित होने के लिए स्त्रीत्व जरूरी है ! तो भोलेनाथ ने तुरन्त कहा की ठीक है तो हमें स्त्री बना दो !! . तब ललिता सखी ने भोले नाथ का गोपी वेश में श्रृंगार किया और उनके कान में श्री राधा कृष्ण के युगल मन्त्र की दीक्षा दी !! . चूँकि भोलेनाथ के सिर की जटा और दाढ़ी मूंछ बड़ी-बड़ी थी, इसलिए ललिता सखी ने उनके सिर पर बड़ा-सा घूँघट डाल दिया, जिससे किसी को उनकी दाढ़ी मूंछ दिखायी न दे !! . महादेव के अति बलिष्ठ और बेहद लम्बी चौड़ी शरीर की वजह से वो सब गोपियों से एकदम अलग और विचित्र गोपी लग रहे थे जिसकी वजह से हर गोपी उनको बड़े आश्चर्य से देख रही थी !! . महादेव को लगा की कहीं श्री कृष्ण उन्हें पहचान ना लें, इसलिए वो सारी गोपियों की भीड़ में सबसे पीछे जा कर खड़े हो गए !! . अब श्री कृष्ण भी ठहरे मजाकिया स्वाभाव के और उन्हें पता तो चल ही चुका था की स्वयं भोले भण्डारी यहाँ पधार चुके हैं, तब उन्होंने विनोद लेने के लिए कहा कि, महा रास सबसे पीछे से शुरू की जायेगी !! . इतना सुनते ही भोलेनाथ घबराये और घूँघट में ही दौड़ते-दौड़ते सबसे आगे आकर खड़े हो गए पर जैसे ही वो आगे आये. वैसे ही श्री कृष्ण ने कहा कि अब महारास सबसे आगे से शुरू होगा ! . तब महादेव फिर दौड़ कर पीछे पहुचें तो श्री कृष्ण ने फिर कहा : रास पीछे से शुरू होगा, तब महादेव फिर दौड़ कर आगे आये ! . इस तरह कुछ देर तक चलता रहा और बाकी की सारी करोड़ो गोपियाँ खाली आश्चर्य से खड़े होकर श्री कृष्ण और श्री महादेव के बीच की इस लीला देख रही थी और ये सोच रही थी की ... . ये कौन-सी गोपी है, जो डील-डौल से तो भारी भरकम है पर बार-बार गजब शर्मा कर कभी आगे भाग रही है तो कभी पीछे और जैसे लग रहा है श्री कृष्ण भी इसको जानबूझकर हैरान करने के लिए बार-बार आगे पीछे का नाम ले रहें हों !! . कुछ देर बाद श्री कृष्ण ने कहा कि महा रास सबसे पहले इस चंचल गोपी से शुरू होगा, जो स्थिर बैठ ही नहीं रही है और यह कहकर श्री कृष्ण ने भोलेनाथ का घूंघट हटा दिया और आनन्द से उद्घोष किया... . आओ गोपेश्वर महादेव ! आपका स्वागत है इस महारास में..!! . और उसके बाद जो महा-उत्सव हुआ कि ऋषि महर्षि भी हाथ जोड़कर कहते हैं, नेति नेति ! अर्थात इस महा रास के महा सुख को शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता है !! . तब से भगवान् शिव गोपेश्वर रूप में ही साक्षात् निवास करते हैं, वृन्दावन के गोपेश्वर महादेव मन्दिर में जहाँ उनका रोज शाम को गोपी रूप में श्रृंगार किया जाता है नित्य रास के लिए !! . श्री गोपेश्वर महादेव का दर्शन और इनकी इस कथा का चिन्तन करने से श्री कृष्ण की भक्ति में प्रगाढ़ता आती है और... . इस कलियुग में भक्ति ही वो सबसे आसान तरीका है जो इस लोक के साथ परलोक में भी सुख प्रदान करती हैं !! ~~~~~~~~~~~~~~~~~ ((((((( जय जय श्री राधे ))))))) ~~~~~~~~~~~~~~~~~

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