*श्री स्वामी रामसुखदास जी महाराज* 🌷संतवाणी🌷 यह खयाल करनेकी बात है कि मनुष्य-शरीर मिल गया । अब भाई अपनेको नरकोंमें नहीं जाना है । चौरासी लाख योनियोंमें नहीं जाना है । नीची योनियोंमें क्यों जायें ? चोरी करनेसे, हत्या करनेसे, व्यभिचार करनेसे, हिंसा करनेसे, अभक्ष्य-भक्षण करनेसे, निषिद्ध कार्य करनेसे मनुष्य नरकोंमें जा सकता है । कितना सुन्दर अवसर भगवान्‌ने दिया है कि जिसे देवता भी प्राप्त नहीं कर सकते, ऐसा ऊँचा स्थान प्राप्त किया जा सकता है‒इसी जीवनमें । प्राणोंके रहते-रहते बड़ा भारी लाभ लिया जा सकता है । बहुत शान्ति, बड़ी प्रसन्नता, बहुत आनन्द‒इसमें प्राप्त हो जाता है । ऐसी प्राप्तिका अवसर है मानव-शरीरमें । इसलिये इसकी महिमा है । इसको प्राप्त करके भी जो नीचा काम करते हैं, वे बहुत बड़ी भूल करते हैं ।

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॥ सन्तवाणी ॥– श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज भगवान्‌ आज ही मिल सकते है आजकी शुभ तिथि– आश्विन शुक्ल चतुर्थी, वि.सं. २०७६ बुधवार महात्मा गाँधी-जयन्ती भगवान्‌आज ही मिल सकते है परमात्मप्राप्ति बहुत सुगम है । इतना सुगम दूसरा कोई काम नहीं है । परन्तु केवल परमात्माकी ही चाहना रहे, साथमें दूसरी कोई चाहना न रहे । कारण कि परमात्माके समान दूसरा कोई है ही नहीं । जैसे परमात्मा अनन्य हैं, ऐसे ही उनकी चाहना भी अनन्य होनी चाहिये । सांसारिक भोगोंके प्राप्त होनेमें तीन बातें होनी जरुरी हैं—इच्छा, उद्योग और प्रारब्ध । पहले तो सांसारिक वस्तुको प्राप्त करनेकी इच्छा होनी चाहिये, फिर उसकी प्राप्तिके लिये कर्म करना चाहिये । कर्म करनेपर भी उसकी प्राप्ति तब होगी, जब उसके मिलनेका प्रारब्ध होगा । अगर प्रारब्ध नहीं होगा तो इच्छा रखते हुए और उद्योग करते हुए भी वस्तु नहीं मिलेगी । इसलिये उद्योग तो करते हैं नफेके लिये, पर लग जाता है घाटा ! परन्तु परमात्माकी प्राप्ति इच्छामात्रसे होती है । इसमें उद्योग और प्रारब्धकी जरूंरत नहीं है । परमात्माके मार्गमें घाटा कभी होता ही नहीं, नफा-ही-नफा होता है । एक परमात्माके सिवाय कोई भी चीज इच्छामात्रसे नहीं मिलती । कारण यह है कि मनुष्यशरीर परमात्माकी प्राप्तिके लिये ही मिला है । अपनी प्राप्तिका उद्देश्य रखकर ही भगवान्‌ने हमारेको मनुष्यशरीर दिया है । दूसरी बात, परमात्मा सब जगह हैं । सुईकी तीखी नोक टिक जाय, इतनी जगह भी भगवान्‌से खाली नहीं है । अतः उनकी प्राप्तिमें उद्योग और प्रारब्धका काम नहीं है । कर्मोंसे वह चीज मिलती है, जो नाशवान् होती है । अविनाशी परमात्मा कर्मोंसे नहीं मिलते । उनकी प्राप्ति उत्कट इच्छामात्रसे होती है । पुरुष हो या स्त्री हो, साधु हो या गृहस्थ हो, पढ़ा-लिखा हो या अपढ़ हो, बालक हो या जवान हो, कैसा ही क्यों न हो, वह इच्छामात्रसे परमात्माको प्राप्त कर सकता है । परमात्माके सिवाय न जीनेकी चाहना हो, न मरनेकी चाहना हो, न भोगोंकी चाहना हो, न संग्रहकी चाहना हो । वस्तुओंकी चाहना न होनेसे वस्तुओंका अभाव नहीं हो जायगा । जो हमारे प्रारब्धमें लिखा है, वह हमारेको मिलेगा ही । जो चीज हमारे भाग्यमें लिखी है, उसको दूसरा नहीं ले सकता—‘यदस्मदीयं न ही तत्परेषाम्’ । हमारेको आनेवाला बुखार दूसरेको कैसे आयेगा ? ऐसे ही हमारे प्रारब्धमें धन लिखा है तो जरुर आयेगा । परन्तु परमात्माकी प्राप्तिमें प्रारब्ध नहीं है । भगवान्‌से अपनापन आजकी शुभ तिथि– आश्विन शुक्ल तृतीया, वि.सं. २०७६ मंगलवार भगवान्‌से अपनापन आपकी कन्या अपनी अहंता बदल देती है, अपनेको दूसरे घरकी बहू मान लेती है । क्या आपमें उस कन्या-जितनी सामर्थ्य भी नहीं है ? जिस कन्याका आपने पालन-पोषण किया, बड़ी धूमधामसे विवाह किया, उस कन्याके बदलनेपर (दूसरे घरको अपना माननेपर) भी आप नाराज नहीं होते । ऐसे ही आप अपनेको भगवान्‌का और भगवान्‌को अपना मान लें तो कोई नाराज नहीं होगा; क्योंकि यह सच्‍ची बात है । मीराबाईने कहा—‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरों न कोई ।’ गिरधर गोपालके सिवाय मेरा कोई नहीं है और मैं किसीकी नहीं हूँ । आप नौकरी करो तो आपकी योग्यताके अनुसार आपको तनख्वाह मिलेगी । परन्तु आप घरमें माँके पास जाओ तो क्या माँ आपकी योग्यताके अनुसार रोटी देगी । आप काम करो तो भी रोटी देगी और काम न करो तो भी रोटी देगी । इस तरह भजन करनेसे ही भगवान्‌से सम्बन्ध होगा, भजन न करनेसे सम्बन्ध नहीं होगा—यह बात नहीं है । यदि आप भगवान्‌से अपनापन कर लेंगे कि हे नाथ ! मैं तो आपका ही बालक हूँ, तो भगवान्‌ सोचेंगे कि यह जैसा भी है, अपना ही बालक है ! अतः भगवान्‌ को आपका पालन करना ही पड़ेगा । इसलिये ‘मैं तो आपका ही हूँ और आप ही मेरे हैं’—यह बड़ा सीधा रास्ता है । भगवान्‌ कहते हैं कि यह जीव है तो मेरा ही अंश, पर प्रकृतिमें स्थित शरीर, इन्द्रियों, मन, बुद्धिको खींचता है, उनको अपना मानता है (गीता १५/७) ! अरे किस धंधेमें लग गया ! है कहाँका और कहाँ लग गया ! संसारकी सेवा करो । अपने तन, मन, धन, बुद्धि, योग्यता, अधिकार आदिसे दूसरोंको सुख पहुँचाओ, पर उनको अपना मत मानो । यह अपनापन टिकेगा नहीं । केवल सेवा करनेके लिये ही वे अपने हैं । संसारकी जिन चीजोंमें अपनापन कर लेते हैं, वे ही हमें पराधीन बनाती हैं । वहम होता है कि इतना परिवार मेरा, इतना धन मेरा, पर वास्तवमें ये तेरे नहीं हैं, तू इनका हो गया, इनके पराधीन हो गया ! न तो ये हमारे साथ रहेंगे और न हम इनके साथ रहेंगे । इसलिये बड़े उत्साह और तत्परतासे इनकी सेवा करो तो दुनिया भी राजी हो जाय और भगवान्‌ भी राजी हो जायँ ! आप भी सदा आनन्दमें, मौजमें रहें ! जब सेवा करनेवाला नहीं मिलता, तब सेवा चाहनेवाला दुःखी रहता है । परन्तु सेवा करनेवाला सदा सुखी रहता है, आनन्दमें रहता है । नारायण ! नारायण !! नारायण !!! ‒ ‘भगवान्‌से अपनापन’ पुस्तकसे ॥ सन्तवाणी ॥–श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज.

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संत नरसी महेता.... भक्त नरसी जी भगवान श्यामसुंदर के अनन्य भक्त थे, वे सत्संग करते हुए ठाकुर जी को केदारा राग सुनाया करते थे... जिसे सुनकर ठाकुर जी के गले की माला अपने आप नरसी जी के गले में आ जाया करती थी. एक बार भक्त नरसी जी के घर संतों की मंडली आई तो नरसी जी एक सेठ से राशन उधार लेने गये, पर सेठ ने राशन के बदले कुछ गिरवी रखने को कहा... नरसी जी ने अपना केदारा राग का भजन गिरवी रख दिया और वायदा किया कि उधार चुकाने तक इस राग को नही गाऊंगा और सेठ से राशन लाकर संतो को भोजन करवाया. उधर राजा को नरसी जी से जलने वाले पंडितो ने भड़काया कि नरसी जी सब ढोंग करते है. भजन गाते हुए माला को कच्ची डोर से बांधते है जिससे माला अपने आप गिरती है. राजा ने परीक्षा लेने के लिए नरसी जी को उनके भक्त समाज सहित महल में भजन सत्संग करने के लिए बुलाया और कहा कि हम भी ठाकुर जी की कृपा के दर्शन करना चाहते है. नरसी जी संतो के साथ राजा के महल में आये और सत्संग शुरू कर दिया. राजा ने अभिमान में आकर रेशम की मजबूत डोर मंगाई और उसमें हार पिरोकर ठाकुर जी को पहनाया. नरसी जी ने कीर्तन आरंभ किया.. आनंद बरसने लगा.. नरसी जी ने बहुत से भावपूर्ण भजन गाये पर माला नही गिरी.. नरसी जी के विरोधी बहुत प्रसन्न हुए कि अब राजा नरसी जी को दंड देगा. क्यूंकि ठाकुर जी की माला केदारा राग सुनने से ही गिरती थी और नरसी जी केदारा राग को गिरवी रखे हुए थे.. अब नरसी जी ठाकुर जी को उलाहना देते हुए गाने लगे.. कि ठाकुर जी आप माला पहने रखो, भक्तो की लाज जाती है तो जाये, माला संभाले रखो आप अब ठाकुर जी नरसी जी का रूप बनाकर सेठ के घर गये और दरवाजा खटखटाया. सेठ जी सो रहे थे पत्नी ने कहा कि नरसी जी भजन छुड़वाने आये है.. सेठ ने सोते सोते ही कहा कि पैसे ले लो और रसीद बनाकर भजन सहित दे दो.. उधर नरसी जी भाव से कीर्तन कर ऱहे थे.. पर सब संत हैरान थे कि आज नरसी जी केदारा राग क्यूं नही गा रहे.. पर नरसी जी के मन की तो भगवान ही जानते थे.. भगवान ने एक भक्त का रूप बनाया और नरसी जी के पास जाकर उनकी गोद में भजन और रसीद डाल दी.. बस फिर क्या था नरसी जी जान गये कि ये ठाकुर जी की लीला है.. उन्होने उसी समय भाव से केदारा राग का वो भजन गाना शुरू किया.. सब समाज आनंद से भर गया और इस बार ठाकुर जी सिहांसन से उठे.. नुपुरों की झन्न झन्न ध्वनि करते हुए स्वयं जाकर नरसी जी के गले में हार पहनाया.. और अपने भक्त का मान बढ़ाया.. राजा और नरसी जी के विरोधी पंडित नरसी जी की भक्ति से प्रभावित हुए और नरसी जी के संग से वो भी भक्त बन गये. हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरें हरे राम हरें राम राम राम हरे हरे

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. *सेवा* *श्री गुरु राम दास जी महाराज* के समय जब अमृतसर में श्री हरिमंदिर साहब जी की सेवा चल रही थी। उस वक्त बहुत संगत सेवा कर रही थी। उस संगत में उस समय का राजा भी सेवा के लिए आता था। गुरु साहिब उस राजा को देख कर मंद मंद मुस्कुराते रहते थे। ऐसा लगातार तीन-चार दिन होता रहा। फिर एक दिन राजा गुरू साहिब के पास चला गया। और उसने गुरु साहिब से पूछा : *हे सच्चे पातशाह ! आप हर रोज मुझे देख कर मुस्कुराते है क्यों भला...... ?* तब गुरु साहिबान ने बङे प्यार से राजा की तरफ देखा और उन्हें एक छोटी सी बात सुनाई। " राजन ! बहुत समय पहले की बात है, एक दिन संगत इसी तरह सेवा कर रही थी। पर उस सेवा में कुछ दिहाडी़ दार मजदूर भी थे। जो संगत निष्काम भावना से सेवा करती थी। उन सारी संगतों को गुरू साहिब, शाम को दर्शन देते थे। एक दिन उस दिहाङीदार मजदूर ने सोचा कि क्यों ना मैं भी बिना दिहाड़ी के सेवा करूं। निष्काम सेवा करुं। उसने यह बात अपने परिवार से की थी, परिवार ने कहा कोई बात नहीं, आप सेवा में जाओ। आज की दिहाड़ी नहीं लेना। भूखे रह लेंगे, लेकिन एक दिन की सेवा को जरूर देंगे। वह मजदूर दिन में जो मजदूरी करके कमाता था। उसी से घर चलता था। यह बात सुना कर गुरु साहिब चुप कर गए। यह सुन कर राजा सोच में पड़ गया। और हाथ जोड़कर गुरु साहिबान से प्रार्थना की : हे सच्चे पातशाह ! लेकिन आप मुझे देख कर मुस्कुराते हैं, इसका क्या राज है.....? *गुरु साहिबान ने फिर मुस्कुराते हुए, उसको जवाब दिया : हे राजन! पिछले जन्म में वो मजदूर तुम थे। यह सुनकर राजा अचेत सा हो गया। कि उस एक दिन की सेवा का मुझे यह फल मिला कि, इस जन्म में मुझे राजा का जन्म मिला।* *सेवा का फल, एक ना एक दिन जरूर मिलता है। सेवा कभी व्यर्थ नहीं जाती। चाहे ज्यादा की गई हो चाहे थोङी। जो सेवा हम हृदय से निष्काम भाव से करते हैं। वह हमारे लेखे मै लिखी जाती है।और उसका फल हमें जरूर मिलता है। निष्काम की गई सेवा का फल कभी व्यर्थ नहीं जाता। इसलिए हमें भी निष्काम भावना से सेवा करनी चाहिए। ताकि वह सेवा मालिक के दरवार मै प्रवान हो सके।* *पतित उधारण सतिगुरु मेरा* *मोहि तिस का भरवासा,* *बखस लए सभि सचै साहिब* *सुण नानक की अरदासा ।* 🙏

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🌷 *बृजभक्त श्री गौरदास जी* 🌷 🕉श्री परमात्मने नमः। 🌅नंदग्राम के पावन सरोवर के तीर पर श्री सनातन गोस्वामीपाद की भजन-कुटी में श्री गौरदास जी भजन करते थे। वे सिद्ध पुरुष थे। नित्य प्रेम सरोवर के निकट गाजीपुर से फूल चुन लाते, और माला पिरोकर श्रीलाल जी को धारण कराते। फूल-सेवा द्वारा ही उन्होंने श्री कृष्ण-कृपा लाभ की थी। कृपा-लाभ करने से चार-पांच वर्ष पूर्व ही से वे फूल-सेवा करते आ रहे थे। आज उन्हें अभिमान हो आया -' इतने दिनों से फूल-सेवा करता आ रहा हूँ, फिर भी लाल जी कृपा नही करते। उनका ह्रदय कठोर हैं किन्तु वृषभानु नन्दिनी के मन प्राण करुणा द्वारा ही गठित हैं। इतने दिन उनकी सेवा की होती, तो वे अवश्य ही कृपा करती। अब मैं यहाँ न रहूँगा...आज ही बरसाना जी चला जाऊँगा। संध्या के समय कथा आदि पीठ पर लाद कर चल पड़े, बरसाना जी की ओर। जब नंदगाँव से एक मील दूर एक मैदान से होकर चल रहे थे... बहुत से ग्वाल-बाल गोचरण करा गाँव को लौट रहे थे, एक साँवरे रंग के सुंदर बालक ने उनसे पूछा-'गौरदास ! तू कहाँ जाय ? तब गौरदास ने उत्तर दिया-' लाला ! हम बरसाने को जाय हैं, और उन के नैन डबडबा आये। बालक ने रुक कर कुछ व्याकुलता से उन की ओर निहारते हुए कहा -' मत जाओ।' वे बोले - ' न लाला ! मैं छः वर्ष यहाँ रहा, मुझे कुछ न मिला। अब और यहाँ रूककर क्या करूँगा.. ?? बालक ने दोनों हाथ फैलाकर रास्ता रोकते हुए कहा -' मान जाओ, मत जाओ।' उन्होंने झुँझलाकर बोले -' ऐ छोरा ! काहे उद्धम करे हैं। रास्ता छोड़ दे मेरा। मोहे जान दे। तब बालक ने उच्च स्वर में कहा-' बाबा ! तू जायेगा, तो मेरी फूल-सेवा कौन करेगा ...?? गौरदास ने आश्चर्य से पलट कर पूछा-' कौन हैं रे तू ?? तो न वहाँ बालक, न कोई सखा और न ही कोई गैया। गौरदास के प्राण रो दिये ।हा कृष्ण ! हा कृष्ण ! कह रोते-चीखते भूमि पर लोटने लगे। चेतना खो बैठे। और फिर चेतना आने पर...हा कृष्ण ! हाय रे छलिया ! कृपा भी की, तो छल से। यदि कुछ देर दर्शन दे देते, तो तुम्हारी कृपा का भण्डार कम हो जाता क्या ?? पर नही दीनवत्सल ! तुम्हारा नही ,यह मेरा ही दोष हैं। इस नराधम में यह योग्यता ही कहाँ, जो तुम्हे पहचान पाता ? वह प्रेम और भक्ति ही कहाँ ? जिसके कारण तुम रुकने को बाध्य होते। उधर पुजारी जी को आदेश हुआ -' देखो, गौरदास मेरी फूल-सेवा न छोड़े। मैं किसी और की फूल-सेवा स्वीकार नही करूँगा। ☘🌹कैसे मान लूँ की तू पल पल में शामिल नहीं. कैसे मान लूँ की तू हर चीज़ में हाज़िर नहीं. कैसे मान लूँ की तुझे मेरी परवाह नहीं. कैसे मान लूँ की तू दूर है पास नहीं. देर मैने ही लगाईं पहचानने में मेरे ईश्वर. वरना तूने जो दिया उसका तो कोई हिसाब ही नहीं. जैसे जैसे मैं सर को झुकाता चला गया वैसे वैसे तू मुझे उठाता चला गया....🌹☘ 💖¸.•*""*•.¸ *जय श्री राधे ¸.•*""*•.¸ 💖 💚 *श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव* 🌸💐👏🏼💖*

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