🔴 🌀 🌀🔴 . ईश्वर को व्यक्ति भय से या भक्ति से भजता है और दोनों ही तरीके से भगवान को पाया जा सकता है क्योंकि हम भय से भी भगवान का भजन कीर्तन करेंगे तो भय भी भयभीत जीव को ईश्वर के प्रति प्रेम मे जोड देता है . जैसे--कहीं कहीं पर वर्णन मिलता है(भयभीत बिना होई ना प्रीति ) पर भयभीत और भक्ति मे अन्तर है----- . 1 भय से भजन करेंगे हम तो हमको चलकर स्वयं भगवान के पास जाना पडेगा और 2 भक्ति से भजन करेंगे तो स्वयं भगवान को चलकर हमारे पास आना पडेगा प्रमाण--- . गोस्वामी तुलसीदास जी जी राम चरित मानस विभीषण, सुग्रीव, विश्वामित्र आदि ने भयभीत होकर भजन किया सो स्वयं चलकर राम जी के पास गये थे राम जी इनके पास नही आये थे ये लोग गये थे . और अहिल्या, माता-सीताजी,केंवट, कोलभील, निषादराज, मुनिगण और माता सबरी ने भक्ति से भजन किया सो रामजी के पास इनको जाना नही पडा अपितु मेरे राम जी स्वयं चलकर इनके पास आये थे जैसे---- . 1सबरी देखी राम गृह आये 2 धनुष यज्ञ सुनि रघुकुल नाथा हरषि चले मुनिवर के साथ . __________________________ . . हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ________________________ . * स्नेह वन्दन* 🚩🙏🏻 *जय राम जी की*🙏🏻🚩

+30 प्रतिक्रिया 4 कॉमेंट्स • 1 शेयर

पुरुषार्थ चतुष्टय प्रदायक निगमकल्पतरु:- निगमकल्पतरु पुरुषार्थ चतुष्टय का साधन है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों ही दे सकता है। हाथों-हाथ भगवान को पकड़ा सकता है निगमकल्पवृक्ष। मन्त्र-ब्रह्मणात्मक अनादि अपौरुषेय वेद ही निगमकल्पतरु हैं। उस निगमकल्पतरु से धर्म,अर्थ, काम और मोक्ष चारों ही पुरुषार्थों की प्राप्ति होती है। इसी निगमकल्पतरु का गलित फल है श्रीमद्भागवत। गलित अर्थात परिपक्व। परिपक्व फल होने पर भी अमलात्मा महामुनीन्द्र भगवान शुकदेव जी के मुखारविन्द से प्रादुर्भूत है। इसलिए कहा गया है- ‘निगमकल्पतरोर्गलिंत फलं शुकमुखादमृतद्रवसंयुतम्।’ _ महाराज श्री करपात्री जी

+31 प्रतिक्रिया 8 कॉमेंट्स • 0 शेयर

जय श्री राधे... #कृष्ण_भक्त_मीर_माधव... काफी समय पहले की बात हैं, मुल्तान(पंजाब) का रहने वाला एक ब्राह्मण उत्तर भारत में आकर बस गया। जिस घर में वह रहता था, उसकी ऊपरी मंजिल में कोई मुग़ल-दरबारी रहता था। प्रातः नित्य ऐसा संयोग बन जाता कि, जिस समय ब्राह्मण नीचे गीतगोविन्द के पद गाया करता। उसी समय मुग़ल ऊपर से उतरकर दरबार को जाया करता था। ब्राह्मण के मधुर स्वर तथा गीतगोविन्द की ललित आभा से आकृष्ट होकर वह सीढ़ियों में ही कुछ देर रुककर सुना करता था। जब ब्राह्मण को इस बात का पता चला तो उसने उस मुग़ल से पूछा की- "सरकार ! आप इन पदों को सुनते हैं पर कुछ समझ में भी आता है ? मुग़ल, समझ में तो एक लफ्ज(अक्षर) भी नही आता, पर न जाने क्यों उन्हें सुनकर मेरा दिल गिरफ्त(कैद) हो जाता है। तबियत होती है की खड़े खड़े इन्हें ही सुनता रहूं । आखिर किस किताब में से आप इन्हें गाया करते है ? ब्राह्मण! "गीतगोविन्द" के पद है ये, यदि आप पढ़ना चाहे तो मैं आपको पढ़ा दूंगा। इस प्रस्ताब को मुग़ल ने स्वीकार कर लिया और कुछ ही दिन में उन्हें सीखकर स्वयं उन्हें गाने लग गया। एक दिन ब्राह्मण ने उन्हें कहा, आप गाते तो है लेकिन हर किसी जगह इन पदों को नही गाना चाहिये। आप इन अद्भुत अष्टापदियो के रहस्य को नही जानते क्योकि जहाँ कहीं ये गाये जाते है। भगवान श्रीकृष्ण वहाँ स्वयं उपस्थित रहते है। इसलिए आप एक काम करिये। जब कभी भी आप इन्हें गाये तो श्याम सुन्दर के लिए एक अलग आसान बिछा दिया करे। मुग़ल ने कहा- वह तो बहुत मुश्किल है, बात ये है की हम लोग दूसरे के नौकर है, और अक्सर ऐसा होता है की दरबार से वक्त वेवक्त बुलावा आ जाता है, और हमको जाना पड़ता है। ब्राह्मण - तो ऐसा करिये जब आपका सरकारी काम ख़त्म हो जाया करे, तब आप इन्हें एकांत में गाया करिये। मुग़ल- यह भी नही हो सकता आदत जो पड़ गयी है और रही घर बैठकर गाने की बात सो कभी तो ऐसा होता है। दो दो-तीन तीन दिन और रात भी हमे घोड़े की पीठ पर बैठकर गुजारनी पड़ती है। ब्राह्मण- अच्छा तो फिर ऐसा किया जा सकता हैं कि घोड़े की जीन के आगे एक बिछौना श्यामसुंदर के विराजने के लिए बिछा लिया करे। यह भावना मन में रख ले की आपके पद सुनने के लिए श्यामसुंदर वहाँ आकर बैठे हुए है। मुग़ल ने स्वीकार कर यहीं नियम बना लिया और घर पर न रहने की हालात में घोड़े पर चलता हुआ ही गीतगोविन्द के पद गुनगुनाया करता। एक दिन अपने अफसर के हुकुम से उसे जैसा खड़ा था, उसी हालात में घोड़े पर सवार होकर कहीं जाना पड़ा। वह घोड़े की जीन के आगे बिछाने के लिए बिछौना भी साथ नही ले जा सका। रास्ते में चलते चलते वह आदत के अनुसार पदों का गायन करने लगा। गायन करते करते अचानक उसे लगा की घोड़े के पीछे पीछे घुंघरुओं( नूपुर ) की झनकार आ रही है। पहले तो वह समझा की वहम हुआ है, लेकिन जब उस झंकार में लय का आभास हुआ तो घोडा रोक लिया और उतर कर देखने लगा। तत्क्षण श्यामसुंदर ने प्रकट होकर पूछा - 'सरदार' ! आप घोड़े से क्यों उतर पड़े? और आपने इतना सुन्दर गायन बीच में ही क्यों बंद कर दिया ? मुग़ल तो हक्का -बक्का होकर सामने खड़ा देखता ही रह गया। भगवान की रूपमाधुरी को देखकर वह इतना विहल हो गया की मुँह से आवाज ही नही निकलती थी। आखिर बोला - आप संसार के मालिक होकर भी मुझ मुग़ल के घोड़े के पीछे पीछे क्यों भाग रहे थे ? भगवान् ने मुस्कुराते हुए कहा - भाग नही रहा। मैं तो आपके पीछे पीछे नाचता हुआ आ रहा हूं। क्या तुम जानते नही हो की जिन पदों को तुम गा रहे थे वो कोई साधारण काव्य नही है। तुम आज मेरे लिए घोड़े पे गद्दी बिछाना भूल गए तो क्या मैं भी नाचना भूल जाऊ क्या ? मुग़ल को अब मालूम हुआ की मुझसे अब कितना भारी अपराध बन गया है। यह सब इसलिए हुआ की वह पराधीन था। दूसरे दिन प्रातः ही उसने नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और वैराग्य लेकर श्यामसुंदर के भजन में लग गया। सही है एक बार उन ठाकुर जी की रूप माधुरी को देख लेने के बाद संसार में ओर क्या शेष रह जाता है। यहीं मुग़ल भक्त बाद में प्रभु कृपा से "मीर माधव" नाम से विख्यात हुए। जय श्री राधे... जय श्री हरिदास...

+42 प्रतिक्रिया 6 कॉमेंट्स • 12 शेयर

कदम्ब टेर से सटी हुई पश्चिम में श्री रूप गोस्वामी की भजनकुटी स्थित है. श्री रूपगोस्वामी कृष्ण की मधुर लीलाओं की स्मृति के लिए प्राय: इस निर्जन स्थली में भजन करते थे. वे यहाँ पर अपने प्रिय ग्रन्थों की रचना भी करते थे. उन्हें जब कभी-कभी महाभावमयी राधिका के विप्रलम्भ भावों की स्फूर्ति होती, तो हठात इनके मुख से विप्रलम्भ भावमय श्लोक निकल आते थे. उस समय यहाँ के कदम्ब वृक्षों के सारे पत्ते उस विरहाग्नि में सूखकर नीचे गिर जाते तथा पुन: इनके हृदय में युगल मिलन की स्फूर्ति होते ही इनके पदों को सुनकर कदम्ब वृक्षों में नई-नई कोपलें निकल आती थीं. एक समय श्री सनातन गोस्वामी श्री रूप गोस्वामी से मिलने के लिए यहाँ आये. उन दोनों में कृष्ण की रसमयी कथाएँ होने लगीं. दोनों कृष्ण कथा में इतने आविष्ट हो गये कि उन्हें समय का ध्यान नहीं रहा. दोपहर के पश्चात आवेश कुछ कम होने पर श्रीरूप गोस्वामी ने सोचा प्रसाद ग्रहण करने का समय हो गया है, किन्तु मेरे पास कुछ भी नहीं है, जो श्री सनातन गोस्वामी को खिला सकूँ. इसलिए कुछ चिन्तित हो गये. इतने में ही साधारण वेश में एक सुन्दर-सी बालिका वहाँ उपस्थित हुई और रूप गोस्वामी को कहने लगी- बाबा! मेरी मैया ने चावल, दूध और चीनी मेरे हाथों से भेजी है, तुम शीघ्र खीर बनाकर खा लेना. यह कहकर वह चली गई. किन्तु थोड़ी देर में वह पुन: लौट आई. बाबा! तुम्हें बातचीत करने से ही अवसर नहीं.अत: मैं स्वयं ही पाक कर देती हूँ. ऐसा कहकर उसने झट से आस-पास से सूखे कण्डे लाकर अपनी फूँक से ही आग पैदाकर थोड़ी ही देर में अत्यन्त मधुर एवं सुगन्धित खीर प्रस्तुत कर दी और बोलीं- बाबा! ठाकुरजी का भोग लगाकर जल्दी से पा लो. मेरी मैया डाँटेगी. मैं जा रही हूँ. ऐसा कहकर वह चली गई. श्रीरूप गोस्वामी ने श्रीकृष्ण को समर्पित कर खीर सनातन गोस्वामी के आगे धर दी. दोनों भाईयों ने जब खीर खाई तो उन्हें राधा-कृष्ण की स्फूर्ति हो आई. वे हा राधे! हा राधे! कहकर विलाप करने लगे. सनातन गोस्वामी ने कहा- मैंने ऐसी मधुर खीर जीवन में कभी नहीं खायी. रूप, क्या भोजन के लिए तुमने मन-ही-मन अभिलाषा की थी? वह किशोरी और कोई नहीं महाभावमयी कृष्ण प्रिया राधिकाजी ही थीं. भविष्य में तुम उन्हें इस प्रकार कष्ट मत देना. अपनी त्रुटि समझकर श्रीरूप गोस्वामी बड़ा ही खेद करने लगे. जब उन्हें कुछ झपकी आई तो सपने में श्रीराधिका जी ने उन्हें दर्शन देकर अपने मधुर वचनों से उन्हें सांत्वना दी.

+50 प्रतिक्रिया 14 कॉमेंट्स • 5 शेयर

. "राजा शिवि" पुरुवंशी नरेश शिवि उशीनगर देश के राजा थे। वे बड़े दयालु-परोपकारी शरण में आने वालों की रक्षा करने वाले एक धर्मात्मा राजा थे। इसके यहाँ से कोई पीड़ित, निराश नहीं लौटता था। इनकी सम्पत्ति परोपकार के लिए थी। इनकी भगवान से एकमात्र कामना थी कि मैं दुःख से पीड़ित प्राणियों की पीड़ा का सदा निवारण करता रहूँ। स्वर्ग में इन्द्र को राजा शिवि के धर्म-कर्म से इन्द्रासन छिनने का भय हुआ। उन्होंने राजा की परीक्षा लेने, और हो सके तो इन्हें धर्म मार्ग से हटाने के लिए अपने साथ अग्निदेव को लेकर उशीनगर को प्रस्थान किया। इन्द्र ने बाज का रूप धारण किया, अग्नि ने कबूतर का रूप बनाया। बाज ने कबूतर की पीछा किया। बाज के भय से डरता-कांपता कबूतर उड़ता हुआ आकर राजा शिवि की गोद में गिर पड़ा और इनके वस्त्रों में छिप गया। राजा उसे प्रेम से पुचकारने लगे। इतने में पीछा करता हुआ बाज वहाँ आ पहुँचा। बाज ने कहा-‘राजन ! मैं भूखा हूँ, यह कबूतर मेरा आहार है। इसे मुझे दे दीजिए और मुझ भूखे की प्राणरक्षा कीजिए।’ राजा ने का- ‘यह कबूतर मेरी शरण में आया है। शरण में आये हुए की रक्षा करना हमारा कर्तव्य है। मैंने इसे अभयदान दिया है। मैं इसे किसी प्रकार तुमको नहीं सौंप सकता हूँ।’ बाज ने कहा- ‘महाराज ! जहाँ शरणागत की रक्षा करना आपका धर्म है, वहीं किसी का आहार छीनना भी तो आपके लिए अधर्म है। यहाँ आपका धर्म है कि मुझ भूखे को आहार दें, अन्यथा मेरी हत्या का पाप आपको लगेगा। मर जाने के बाद मेरे बच्चे भी भूखे मरेंगे, उनकी हत्या का पाप भी आपको लगेगा। अतः आप इतना अधिक पाप न करें और मेरा आहार सौंप कर अपने धर्म का पालन करें।’ राजा ने कहा-‘मैं शरणागत को तुम्हें कदापि नहीं दे सकता। आहार के लिए इसके स्थान पर मैं अपना मांस तुम्हें देता हूँ। तुम भरपेट खा लो।’ बाज बोला-‘मैं मांसाहारी हूँ। कबूतर का मांस या अन्य मांस मेरे लिए समान है। आप चाहें तो कबूतर के बराबर अपना मांस मुझे दे सकते हैं। मुझे अधिक की आवश्यकता भी नहीं है।’ राजा को बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने कहा-‘यह आपने बड़ी कृृपा की। आज इस नश्वर शरीर से अविनाशी धर्म की रक्षा हो रही है।’ राजधानी में कोलाहल मच गया। आज राजा एक कबूतर की प्राणरक्षा के लिए अपने शरीर का मांस काटकर तराजू पर तोलने जा रहे हैं। यह देखने के लिए नगर की सारी प्रजा एकत्रित हो गयी। तराजू मंगाया गया। एक पलड़े में कबूतर को बैठाया गया और दूसरे पलड़े पर राजा ने अपने शरीर का मांस काट कर रखा। मांस कम पड़ा तो और काटना पड़ा। वह भी कम पड़ गया। इस प्रकार राजा अपने शरीर का मांस काट कर रखते गये और तराजू का पलड़ा हमेशा कबूतर की तरफ झुका रहा वह जैसे राजा का मांस पाकर अधिकाधिक और भारी होता जा रहा था। सारी प्रजा सांस रोक, भीगे आँसुओं के साथ यह दृृश्य देख रही थी। राजा को मुखमण्डल में तो तनिक भी शिकन नहीं थी। अन्त में राजा स्वयं तराजू के पलड़े पर बैठ गये। उसी समय आकाश से पुष्पवृष्ठि होने लगी। अन्तरिक्ष में प्रकाश व्याप्त हो गया। दोनो पक्षी अदृश्य हो गये। उनके स्थान पर इन्द्र और अग्नि सामने खड़े थे। सभी उन्हें आश्चर्यचकित हो देखने लगे। इन्द्र ने कहा-‘महाराज ! आपकी परीक्षा के लिए मैंने बाज का और अग्निदेव ने कबूतर का रूप धारण किया था। आप तो सच्चे धर्मात्मा निकले। आप जैसे परोपकारी जगत की रक्षा के लिए ही जन्म लेते हैं।’ राजा शिवि तराजू से नीचे उतरे। उनका शरीर सामान्य हो चुका था। दोनो देवता अन्तर्धान हो गये। "जय जय श्री राधे" ********************************************

+32 प्रतिक्रिया 17 कॉमेंट्स • 7 शेयर

संत जनाबाई विठ्ठल को कभी अपनी माता, कभी पिता, कभी पुत्र तो कभी सखा मानती थीं अर्थात् मन की स्थिति कैसी भी हो, प्रत्येक प्रसंग में वह विठ्ठल के स्मरण में रहती थीं । . घर में कुल सदस्य संख्या १५ थी । वे दासी होने के कारण प्रायः घर के सभी काम उन्हीं को करने पडते थे, उदाहरण तया कपडे धोना, पात्र (बरतन) स्वच्छता, नदी से पानी लाना, चक्की पीसना, धान कूटना, झाडू लगाना, घर, आंगन की लिपा-पोती करना, रंगोली सजाना, नगर से बाहर जाकर कंडे, लकडियां ढूंढ कर लाना ऐसे बहुत सारे काम उन्हें करने पडते थे; . परंतु विठ्ठल प्रायः उनके सभी कामों में उनकी सहायता करते थे । इतना ही नहीं विठ्ठल जनाबाई जी के केशों को माखन लगाकर उन्हें नहलाते, केश संवार कर कभी जूडा तो कभी चोटी बना कर उनका शृंगार भी करते हैं। . साथ ही विठ्ठल प्रतिदिन रात में उनसे बातें करने आते थे और दोनो वार्तालाप में तन्मय हो जाते; परंतु एक दिन बात करते करते विठ्ठल जी को निद्रा आ गई; परंतु समय पर जागृत ना होने से जनाबाई ने उन्हें जगाया । . विलंब होने के कारण हडबडी में विठ्ठल अपना उपरणा तथा आभूषण वहीं भूल कर जनाबाई की चादर ओढ कर दौडे-दौडे मंदिर में जाकर खडे हो गए। . इतने में पूजा करने वाले ब्राह्मण आए और उन्होंने देखा कि भगवान विठ्ठल के अंग पर आभूषण तथा उपरणा न होकर एक फटी हुई चादर है । ब्राह्मणों को लगा कि चोरी हुई है । . राजा को वार्ता पहुंचायी गई । पूछ-ताछ करने पर ज्ञात हुआ कि वह फटी हुई चादर जनाबाई की है । लोग उनको चोर सम्बोधित कर पीटने लगे । जनाबाई विठ्ठल की दुहाई देने लगीं; परंतु विठ्ठल के न आने पर जनाबाई को बडा क्रोध आया । . राजा ने जनाबाई को सूली पर चढाने का आदेश दिया । राजाज्ञा के अनुसार चंद्रभागा नदी तट पर सूली की सब सिद्धता हो गयी । . उन्हें अंतिम इच्छा पूछी तो, जनाबाई ने विठ्ठल के दर्शन की आस बतायी । उन्हें दर्शन के लिए मंदिर ले जाया गया । . वहां विठ्ठल रुआंसा मुख लेकर खडे हैं यह देख कर उनका वात्सल्य भाव जागृत हुआ और उन्होंने बडी वत्सलता से कहा ‘‘विठ्ठला ! तुम्हें मेरे कारण बडे श्रम उठाने पडे, मुझ से बहुत अपराध हुए, मुझे क्षमा कर दो, कहते कहते उनके नेत्र भर आएं और विठ्ठल के गले से लिपट कर अपने पल्लू से विठ्ठल का मुख पोछते हुए जनाबाई उस को ही सांत्वना देने लगी कि ‘मेरे जीवनाधार तुम दुःखी ना हो ।’ . वहां से सब लोग चंद्रभागा नदी तट पर आए । जनाबाई ने नदी में स्नान किया । भक्त पुंडलीक के मंदिर में जाकर दर्शन किए और वे सूल के सामने खडी होते ही, उस सूल का रूपांतर एकाएक चंपक के फूलों से हरे-भरे वृक्ष में हुआ, सब लोग आश्चर्य से देखने लगे, तभी वृक्ष का भी पानी हो गया । . सभी लोगों ने जनाबाई का जय जयकार किया । उन्हें जब ब्रह्मज्ञान प्राप्त हुआ तो सर्वत्र विठ्ठल ही दिखाई देने लगा । . अपनी इसी अवस्था का वह वर्णन इस प्रकार करती हैं कि अन्न रूप तथा जल रूप ब्रह्म का सेवन करती हूं, शय्या रूप ब्रह्म पर निद्रा लेती हूं । जीवन रूपी ब्रह्म से व्यवहार करती हूं, इस व्यवहार में मैं सबसे ब्रह्म लेती हूं और केवल ब्रह्म ही देती हूं । यहां-वहां चहुं ओर ब्रह्म देखती हूं, पूरे संसार में ब्रह्म नहीं ऐसा कुछ भी नहीं । अब तो मैं सबाह्य अंतरी ब्रह्म ही हो गयी । . उन्होंने अपने उदाहरण से समस्त संसार को दिखा दिया कि ईश्वर प्राप्ति के लिए कर्मकांड, धन-संपत्ति की, घर-संसार का त्याग करने की अथवा किसी भी आडंबर की आवश्यकता ना होकर केवल भगवान के प्रति शुद्ध भाव होना ही आवश्यक है । . इस महान संत कवयित्री जनाबाई ने श्री क्षेत्र पंढरपुर के महाद्वार में आषाढ कृष्ण त्रयोदशी संवत १२७२ को समाधि ली तथा विठ्ठल भगवान में विलीन हो गई।

+26 प्रतिक्रिया 16 कॉमेंट्स • 24 शेयर