*गोपी प्रेम की साधना* पिछला.. प्रश्न १०९२. प्रश्न- क्या गोपीभाव में साधक प्रियतम सुख लेना नहीं चाहता? इसका ही अगला प्रश्न १०९३. प्रश्न- पर ऐसी साधना में मन में भगवान् के लिए मिलनोत्कण्ठा उत्पन्न हो तो क्या करें? उतर- मन चलता है तो कोई बुरी बात नहीं है। भोगोंकी तथा अहं के मोक्ष की इच्छा न रहकर केवल श्यामडसुंदर के मधुर मिलनकी इच्छा से मन भरा रहे, यह भी परम सौभाग्य है। ऐसी इच्छा भी गोपी-भाव का ही स्वरूप है, यद्यपि कुछ नीचा है। १०९४. प्रश्न- क्या प्रेमकी साधना में तप, त्याग भी करना पड़ता है? उत्तर- प्रेमके राज्य में तप, त्यागकी बड़ी महिमा है। तप,त्याग प्रेम का परम विभूषण है। अतएव शरीर की दृष्टि से तप, त्याग करना पड़े तो उसे सानन्द स्वीकार करना चाहिए। पुस्तक *क्या, क्यों और कैसे?* गीतावाटिका प्रकाशन लेखक- भाईजी श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार

+32 प्रतिक्रिया 2 कॉमेंट्स • 1 शेयर

. "मोहे ब्रज बिसरत नाही" आज कृष्ण कदम के वृक्ष के नीचे खड़े हैं। यह वृन्दावन की उन अनोखी शामों में से एक है, जब शीतल, मंद सुगंधित पवन चारों ओर बह रही है। कृष्ण ने मुरली बजाने के लिए उसे अपने होंठो पर रखकर हौले से उसमे फूँका, लेकिन उनकी बंसी आज कोई धुन नहीं निकाल रही। कृष्ण ने सामने खड़े गौओं के साथ अपने ग्वाल-बाल सखाओं को देखा, और उनका नाम लेकर पुकारा, लेकिन किसी ने उन्हें नहीं सुना। कृष्ण बहुत चकित थे। आज हर कोई उन्हें अनदेखा क्यूँ कर रहा है ? एकाएक उन्होंने भोली राधे को अपनी ओर आते देखा। कृष्ण के चेहरे पर अनायास ही मुस्कान छा गयी। “राधे तो मुझसे ज़रूर बात करेगी" लेकिन ये क्या राधे ने भी उन पर ध्यान नहीं दिया और उनके सामने से बिना बात किये ही गुजर गयीं। कृष्ण बहुत ही मायूस होकर खिसियाते हुए राधे का हाथ पकड़ने की कोशिश करते हैं, “राधे !” कृष्ण की चीख सुनकर माँ देवकी नींद से जाग जाती हैं, और कृष्णा के पलंग के पास जाकर, उनके माथे पर हाथ रखकर पूछती हैं, “क्या कोई स्वप्न देख रहे थे लल्ला ? और ये राधे कौन है ?” कृष्ण आँख खोलते हैं, और खुद को मथुरा के सूनसान महल में पाते हैं। वे माता देवकी की गोद से चिपट कर फूट-फूट कर रोने लगते हैं। मैया ! मोहे ब्रज बिसरत नाहीं, ब्रज बिसरत नाहीं॥ हंस सुता को सुंदर कलरव और कुंजन की छाँही। यह मथुरा कंचन की नगरी मणि मुख ताजहि माहीं॥ जबहि सुरत आबहि बा सुख की जिय उमगत सुध माहीं। मैया ! मोहे बृज बिसरत नाहीं, ब्रज बिसरत नाहीं॥ ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" ******************************************** /

+45 प्रतिक्रिया 8 कॉमेंट्स • 6 शेयर

(1)--भूत प्रेतन ते ना डरे,,कर ना सके कोई तंग-- रहे शरण जो हरिवंश की,, रहे राधावल्लभ नित संग--- भूत प्रेत ग्रह नक्षत्र उस साधक को कभी तंग नही कर सकते जो सदा हरिवंश की शरण मे रहते है( ह-हरि, र-राधा,व-वृंदावन,स-सहचरियां) (2) मन मे रहे उदासीनता,,,चटपटी रहे उर समाए-- कब मिलो मेरे राधावल्लभ,,,चैन कबहूं ना आए-- जो साधक प्रियालाल की प्राप्ति मे तीव्र उत्सुक रहते है उनके ह्रदय मे एक चटपटी सी बनी रहती है,,उस चटपटी के कारण मन मे उदासीनता रहती है,,उनको प्रियालाल का दर्शन किये बिना चैन नही आता (3)--हरिवंश हरिवंश रटत ही,,सब काम बनी जाए--- प्रियालाल की नित सेवा मे,,नित्य विहार सुख पाए-- हरिवंश नाम के रटन से सब कार्य बन जाते है,, हरिवंश नाम की ही महिमा है की हरिवंश नाम जापक प्रियालाल की सेवा सुख मे नित्य विहार मे प्रवेश कर जाता है-- श्री हरिवंश

+35 प्रतिक्रिया 4 कॉमेंट्स • 1 शेयर

. "ईश्वर को पाने की राह" एक महात्मा के पास दूर-दूर से लोग अपनी समस्याओं का समाधान पाने आते थे। एक बार एक व्यक्ति उनके पास आया और बोला,'महाराज, मैं लंबे समय से ईश्वर की भक्ति कर रहा हूँ, फिर भी मुझे ईश्वर के दर्शन नहीं होते। कृपया मुझे उनके दर्शन कराइए।' महात्मा बोले, 'तुम्हें इस संसार में कौन सी चीजें सबसे अधिक प्रिय है ?' व्यक्ति बोला, 'महाराज, मुझे इस संसार में सबसे अधिक प्रिय अपना परिवार है और उसके बाद धन-दौलत।' महात्मा ने पूछा, 'क्या इस समय भी तुम्हारे पास कोई प्रिय वस्तु है ?' व्यक्ति बोला, 'मेरे पास एक सोने का सिक्का ही प्रिय वस्तु है।' महात्मा ने एक कागज पर कुछ लिखकर दिया और उससे पढ़ने को कहा। कागज देखकर व्यक्ति बोला, 'महाराज, इस पर तो ईश्वर लिखा है।' महात्मा ने कहा, 'अब अपना सोने का सिक्का इस कागज के ऊपर लिखे ईश्वर पर रख दो।' व्यक्ति ने ऐसा ही किया। फिर महात्मा बोले, 'अब तुम्हें क्या दिखाई दे रहा है ?' वह बोला, 'इस समय तो मुझे इस कागज पर केवल सोने का सिक्का रखा दिखाई दे रहा है।' महात्मा ने कहा,'ईश्वर का भी यही हाल है। वह हमारे अंदर ही है, लेकिन मोह-माया के कारण हम उसके दर्शन नहीं कर पाते। जब हम उसे देखने की कोशिश करते हैं तो मोह-माया आगे आ जाती है। धन-संपत्ति, घर-परिवार के सामने ईश्वर को देखने का समय ही नहीं होता। यदि समय होता भी है तो उस समय जब विपदा होती है। ऐसे में ईश्वर के दर्शन कैसे होंगे ?' महात्मा की बातें सुनकर व्यक्ति समझ गया कि अगर ईश्वर को पाना है तो इस मोह-माया से निकलना ही होगा। ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" ********************************************

+70 प्रतिक्रिया 10 कॉमेंट्स • 17 शेयर

. "नागा बाबा (कदम खण्ड़ी)" वृन्दावन में एक महात्मा जी का निवास था लोग उन्हें नागा बाबा के नाम से जानते थे जो युगल स्वरुप की उपासना किया करते थे। एक बार वे महात्मा जी संध्या वन्दन के उपरान्त कुंजवन की राह पर जा रहे थे, मार्ग में महात्मा जी जब एक वटवृक्ष के नीचे होकर निकले तो उनकी जटा उस वट-वृक्ष की जटाओं में उलझ गईं, बहुत प्रयास किया सुलझाने का परन्तु जब जटा नहीं सुलझी तो महात्माजी आसन जमा कर बैठ गए, कि जिसने जटा उलझाई है वो सुलझाने आएगा तो ठीक है नही तो मैं ऐसे ही बैठा रहूँगा और बैठे-बैठे ही प्राण त्याग दूँगा। तीन दिन बीत गए महात्मा जी को बैठे हुए। एक सांवला सलोना ग्वालिया आया जो पाँच-सात वर्ष का रहा होगा। वो बालक ब्रजभाषा में बड़े दुलार से बोला- "बाबा ! तुम्हारी तो जटा उलझ गईं, अरे मैं सुलझा दऊँ का" और जैसे ही वो बालक जटा सुलझाने आगे बढ़ा महात्मा जी ने डाँट कर कहा "हाथ मत लगाना पीछे हटो कौन हो तुम ?" ग्वालिया बोला "अरे हमारो जे ही गाम है महाराज ! गैया चरा रह्यो तो मैंने देखि महात्माजी की जटा उलझ गईं हैं, तो मैंने सोची ऐसो करूँ मैं जाए के सुलझा दऊँ।" महात्माजी बोले, न न न दूर हट जा। ग्वालिया- चौं ! काह भयो ? महात्माजी बोले, "जिसने जटा उलझाई हैं वो आएगा तो ठीक नहीं तो इधर ही बस गोविन्दाय नमो नमः" ग्वालिया, "अरे महाराज तो जाने उलझाई है वाको नाम बताए देयो वाहे बुला लाऊँगो।" महात्माजी बोले, "न जिसने उलझाई है वो अपने आप आ जायेगा। तू जा नाम नहीं बताते हम।" कुछ देर तक वो बालक महात्मा जी को समझाता रहा परन्तु जब महात्मा जी नहीं माने तो उसी क्षण ग्वालिया के भेष को छुपा कर ग्वालिया में से साक्षात् मुरली बजाते हुए मुस्कुराते हुए भगवान बाँकेबिहारी प्रकट हो गए। सांवरिया सरकार बोले "महात्मन मैंने जटा उलझाई हैं ? लो आ गया मैं।" जैसे ही सांवरिया जी जटा सुलझाने आगे बढे। महात्मा जी ने कहा- "हाथ मत लगाना, पीछे हटो, पहले बताओ तुम कौन से कृष्ण हो ?" महात्मा जी के वचन सुनकर सांवरिया जी सोच में पड़ गए, अरे कृष्ण भी दस-पाँच होते हैं क्या ? महात्मा जी फिर बोले "बताओ भी तुम कौन से कृष्ण हो ?" सांवरिया जी, "कौन से कृष्ण हो मतलब ?" महात्माजी बोले, "देखो कृष्ण भी कई प्रकार के होते हैं, एक होते हैं देवकीनंदन कृष्ण, एक होते हैं यशोदानंदन कृष्ण, एक होते हैं द्वारकाधीश कृष्ण, एक होते हैं नित्य-निकुँजबिहारी कृष्ण। सांवरिया जी, "आपको कौन-सा चाहिए ?" महात्माजी, "मैं तो नित्य-निकुँजबिहारी कृष्ण का परमोपासक हूँ।" सांवरिया जी बोले, "वही तो मैं हूँ। अब सुलझा दूँ ?" जैसे ही जटा सुलझाने सांवरिया सरकार आगे बढे तो महात्माजी बोल उठे, "हाथ मत लगाना, पीछे हटो, बड़े आये नित्य-निकुँजबिहारी कृष्ण, अरे नित्य-निकुँजबिहारी कृष्ण तो किशोरी जी के बिना मेरी स्वामिनी श्री राधारानी के बिना एक पल भी नहीं रहते। तुम अकेले सौंटा से खड़े हो।" महात्मा जी के इतना कहते ही सांवरिया जी के कंधे पर श्रीजी का मुख दिखाई दिया, आकाश में बिजली सी चमकी और साक्षात् वृषभानु नंदिनी, वृन्दावनेश्वरी, रासेश्वरी श्री हरिदासेश्वरी स्वामिनी श्री राधिका जी अपने प्रीतम को गल-बहियाँ दिए महात्मा जी के समक्ष प्रकट हो गईं और बोलीं, "बाबा ! मैं अलग हूँ क्या अरे मैं ही तो ये कृष्ण हूँ और ये कृष्ण ही तो राधा हैं, हम दोनों अलग थोड़े न है हम दोनों एक हैं।" अब तो युगल स्वरुप का दर्शन पाकर महात्मा जी आनंदविभोर हो उठे। उनकी आँखों से अश्रुधारा बहने लगी, और जैसे ही किशोरी राधा-कृष्ण जटा सुलझाने आगे बढे़ महात्मा जी चरणों में गिर पड़े और बोले, "अब जटा क्या सुलझाते हो युगल जी अब तो जीवन ही सुलझा दो मुझे नित्य-लीला में प्रवेश देकर इस संसार से मुक्त करो दो।" महात्मा जी ने ऐसी प्रार्थना करी और प्रणाम करते-करते उनका शरीर शांत हो गया स्वामिनी जी ने उनको नित्य लीला में स्थान प्रदान किया। बरसाने से आठ किलोमीटर दूर वह स्थान 'कदम खण्ड़ी' गाँव में स्थित है, जहाँ नागा बाबा की समाधि है। ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" ********************************************

+24 प्रतिक्रिया 4 कॉमेंट्स • 8 शेयर

*ॐ श्री परमात्मने नमः* *यदि मरणासन्न व्यक्ति बेहोश हो जाय तो भी उसको भगवन्नाम सुनाना चाहिये । प्राण होशमें जाते हैं, बेहोशीमें नहीं । जिस चिन्तनमें वह बेहोश होगा, उसी चिन्तनमें होश आयेगा ।* × × × × *अहंताको बदलनेसे सब बदल जाता है । हम अहंताको न बदलकर क्रियाओंको बदलते हैं, यह गलती होती है । यदि हम अपनी अहंताको बदल दें तो भाव और क्रियाएँ भी बदल जायेंगी । मैं साधक हूँ‒ऐसी अहंता होनेपर साधन स्वतः होगा और साधन-विरुद्ध क्रिया भी नहीं होगी । यक्षसे प्रश्‍नोत्तर करनेपर युधिष्ठिरने कहा कि मैं धर्मात्मा हूँ फिर धर्मसे विरुद्ध काम कैसे करूँ ?* × × × × *समस्त मनुष्य भगवान्‌के स्वरूप हैं और उनकी क्रियाएँ भगवान्‌की लीला हैं ! अन्नकूटके प्रसादमें रसगुल्ला भी होता है और करेला भी होता है । स्वादमें फर्क है, पर प्रसादमें क्या फर्क है ? स्वाद लेना तो प्रसादका तिरस्कार है ! अगर स्वाद मुख्य है तो प्रसाद मुख्य नहीं है । अगर प्रसाद मुख्य है तो स्वाद मुख्य नहीं है । इसी तरह भगवान्‌की लीलाकी दृष्टिसे क्या अच्छा, क्या बुरा ? क्या बड़ा, क्या छोटा ? भगवान् चाहे मृत्युरूपसे आ जायँ क्या फर्क पड़ा ? संसारकी रचना भी भगवान्‌की लीला है और संहार भी भगवान्‌की लीला है ।* ☼ ☼ ☼ ☼ *श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज

+29 प्रतिक्रिया 4 कॉमेंट्स • 3 शेयर