#खुद_को_कैसे_चेक_करे एक छोटा बच्चा एक बड़ी दुकान पर लगे टेलीफोन बूथ पर जाता हैं और मालिक से छुट्टे पैसे लेकर एक नंबर डायल करता हैं। दुकान का मालिक उस लड़के को ध्यान से देखते हुए उसकी बातचीत पर ध्यान देता हैं - लड़का - मैडम क्या आप मुझे अपने बगीचे की साफ़ सफाई का काम देंगी? औरत - (दूसरी तरफ से) नहीं, मैंने एक दुसरे लड़के को अपने बगीचे का काम देखने के लिए रख लिया हैं। लड़का - मैडम मैं आपके बगीचे का काम उस लड़के से आधे वेतन में करने को तैयार हूँ! औरत - मगर जो लड़का मेरे बगीचे का काम कर रहा हैं उससे मैं पूरी तरह संतुष्ट हूँ। लड़का - ( और ज्यादा विनती करते हुए) मैडम मैं आपके घर की सफाई भी फ्री में कर दिया करूँगा!! औरत - माफ़ करना मुझे फिर भी जरुरत नहीं हैं। धन्यवाद। लड़के के चेहरे पर एक मुस्कान उभरी और उसने फोन का रिसीवर रख दिया। दुकान का मालिक जो छोटे लड़के की बात बहुत ध्यान से सुन रहा था वह लड़के के पास आया और बोला- " बेटा मैं तुम्हारी लगन और व्यवहार से बहुत खुश हूँ, मैं तुम्हे अपने स्टोर में नौकरी दे सकता हूँ"। लड़का - नहीं सर मुझे जॉब की जरुरत नहीं हैं आपका धन्यवाद। दुकानमालिक- (आश्चर्य से) अरे अभी तो तुम उस औरत से जॉब के लिए इतनी विनती कर रहे थे !! लड़का - नहीं सर, मैं अपना काम ठीक से कर रहा हूँ की नहीं बस मैं ये चेक कर रहा था, मैं जिससे बात कर रहा था, उन्ही के यहाँ पर जॉब करता हूँ l भावार्थ :-ऐसे ही हमे भी रोजाना रात्रि मे सोने के वक्त चेक करना चाहिए की दिनभर मे क्या किये कितना भगवान को याद किये, कहि आपकी वजह से किसी को कोई दुख तो नही हुआ ! अगर अन्जाने मे हुआ भी तो उसी समय कमी को सुधारे और आगे से न हो क्योंकि गल्ती एक बार होती है बारबार नही ! "This is called Self Appraisal" ..

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एक गरीब आदमी था। वो हर रोज अपने गुरु के आश्रम जाकर वहां साफ-सफाई करता और फिर अपने काम पर चला जाता था। अक्सर वो अपने गुरु से कहता कि आप मुझे आशीर्वाद दीजिए तो मेरे पास ढेर सारा धन-दौलत आ जाए। एक दिन गुरु ने पूछ ही लिया कि क्या तुम आश्रम में इसीलिए काम करने आते हो। उसने पूरी ईमानदारी से कहा कि हां, मेरा उद्देश्य तो यही है कि मेरे पास ढेर सारा धन आ जाए, इसीलिए तो आपके दरशन करने आता हूं। पटरी पर सामान लगाकर बेचता हूं। पता नहीं, मेरे सुख के दिन कब आएंगे। गुरु ने कहा कि तुम चिंता मत करो। *जब तुम्हारे सामने अवसर आएगा तब ऊपर वाला तुम्हें आवाज थोड़ी लगाएगा। बस, चुपचाप तुम्हारे सामने अवसर खोलता जाएगा।* युवक चला गया। समय ने पलटा खाया, वो अधिक धन कमाने लगा। इतना व्यस्त हो गया कि आश्रम में जाना ही छूट गया। कई वर्षों बाद वह एक दिन सुबह ही आश्रम पहुंचा और साफ-सफाई करने लगा। गुरु ने बड़े ही आश्चर्य से पूछा--क्या बात है, इतने बरसों बाद आए हो, सुना है बहुत बड़े सेठ बन गए हो। वो व्यक्ति बोला--बहुत धन कमाया। अच्छे घरों में बच्चों की शादियां की, पैसे की कोई कमी नहीं है पर दिल में चैन नहीं है। ऐसा लगता था रोज सेवा करने आता रहूं पर आ ना सका। गुरुजी, आपने मुझे सब कुछ दिया पर जिंदगी का चैन नहीं दिया। गुरु ने कहा कि तुमने वह मांगा ही कब था? जो तुमने मांगा वो तो तुम्हें मिल गया ना। फिर आज यहां क्या करने आए हो ? उसकी आंखों में आंसू भर आए, गुरु के चरणों में गिर पड़ा और बोला -- *अब कुछ मांगने के लिए सेवा नहीं करूंगा। बस दिल को शान्ति मिल जाए।* गुरु ने कहा--पहले तय कर लो कि अब कुछ मागने के लिए आश्रम की सेवा नहीं करोगे, बस मन की शांति के लिए ही आओगे। गुरु ने समझाया कि चाहे मांगने से कुछ भी मिल जाए पर दिल का चैन कभी नहीं मिलता इसलिए सेवा के बदले कुछ मांगना नहीं है। वो व्यक्ति बड़ा ही उदास होकर गुरु को देखता रहा और बोला-- *मुझे कुछ नहीं चाहिए। आप बस, मुझे सेवा करने दीजिए।* मन की शांति सबसे अनमोल है।। ***** *जब जब मैं बुरे हालातों से घबराता हूँ..!* *तब बाबा जी कि आवाज़ आती है "रुक मैं आता हूँ"..!!*

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हर मनवंतर काल में रहे हैंअलग-अलग सप्तर्षि,!!!!जानिए कौन किस काल का….. आकाश में 7 तारों का एक मंडल नजर आता है। उन्हें सप्तर्षियों का मंडल कहा जाता है। इसके अतिरिक्त सप्तर्षि से उन 7 तारों का बोध होता है, जो ध्रुव तारे की परिक्रमा करते हैं। उक्त मंडल के तारों के नाम भारत के महान 7 संतों के आधार पर ही रखे गए हैं। वेदों में उक्त मंडल की स्थिति, गति, दूरी और विस्तार की विस्तृत चर्चा मिलती है। ऋषियों की संख्या सात ही क्यों? ।। सप्त ब्रह्मर्षि, देवर्षि, महर्षि, परमर्षय:। कण्डर्षिश्च, श्रुतर्षिश्च, राजर्षिश्च क्रमावश:।। अर्थात : 1. ब्रह्मर्षि, 2. देवर्षि, 3. महर्षि, 4. परमर्षि, 5. काण्डर्षि, 6. श्रुतर्षि और 7. राजर्षि- ये 7 प्रकार के ऋषि होते हैं इसलिए इन्हें सप्तर्षि कहते हैं। भारतीय ऋषियों और मुनियों ने ही इस धरती पर धर्म, समाज, नगर, ज्ञान, विज्ञान, खगोल, ज्योतिष, वास्तु, योग आदि ज्ञान का प्रचार-प्रसार किया था। दुनिया के सभी धर्म और विज्ञान के हर क्षेत्र को भारतीय ऋषियों का ऋणी होना चाहिए। उनके योगदान को याद किया जाना चाहिए। उन्होंने मानव मात्र के लिए ही नहीं, बल्कि पशु-पक्षी, समुद्र, नदी, पहाड़ और वृक्षों सभी के बारे में सोचा और सभी के सुरक्षित जीवन के लिए कार्य किया। आओ, संक्षिप्त में जानते हैं कि किस काल में कौन से ऋषि थे। भारत में ऋषियों और गुरु-शिष्य की लंबी परंपरा रही है। ब्रह्मा के पुत्र भी ऋषि थे तो भगवान शिव के शिष्यगण भी ऋषि ही थे। प्रथम मनु स्वायंभुव मनु से लेकर बौद्धकाल तक ऋषि परंपरा के बारे में जानकारी मिलती है। हिन्दू पुराणों ने काल को मन्वंतरों में विभाजित कर प्रत्येक मन्वंतर में हुए ऋषियों के ज्ञान और उनके योगदान को परिभाषित किया है। प्रत्येक मन्वंतर में प्रमुख रूप से 7 प्रमुख ऋषि हुए हैं। विष्णु पुराण के अनुसार इनकी नामावली इस प्रकार है- 1. प्रथम स्वायंभुव मन्वंतर में- मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वशिष्ठ। 2. द्वितीय स्वारोचिष मन्वंतर में- ऊर्ज्ज, स्तम्भ, वात, प्राण, पृषभ, निरय और परीवान। 3. तृतीय उत्तम मन्वंतर में- महर्षि वशिष्ठ के सातों पुत्र। 4. चतुर्थ तामस मन्वंतर में- ज्योतिर्धामा, पृथु, काव्य, चैत्र, अग्नि, वनक और पीवर। 5. पंचम रैवत मन्वंतर में- हिरण्यरोमा, वेदश्री, ऊर्ध्वबाहु, वेदबाहु, सुधामा, पर्जन्य और महामुनि। 6. षष्ठ चाक्षुष मन्वंतर में- सुमेधा, विरजा, हविष्मान, उतम, मधु, अतिनामा और सहिष्णु। 7. वर्तमान सप्तम वैवस्वत मन्वंतर में- कश्यप, अत्रि, वशिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और भारद्वाज। भविष्य में – 1. अष्टम सावर्णिक मन्वंतर में- गालव, दीप्तिमान, परशुराम, अश्वत्थामा, कृप, ऋष्यश्रृंग और व्यास। 2. नवम दक्षसावर्णि मन्वंतर में- मेधातिथि, वसु, सत्य, ज्योतिष्मान, द्युतिमान, सबन और भव्य। 3. दशम ब्रह्मसावर्णि मन्वंतर में- तपोमूर्ति, हविष्मान, सुकृत, सत्य, नाभाग, अप्रतिमौजा और सत्यकेतु। 4. एकादश धर्मसावर्णि मन्वंतर में- वपुष्मान्, घृणि, आरुणि, नि:स्वर, हविष्मान्, अनघ और अग्नितेजा। 5. द्वादश रुद्रसावर्णि मन्वंतर में- तपोद्युति, तपस्वी, सुतपा, तपोमूर्ति, तपोनिधि, तपोरति और तपोधृति। 6. त्रयोदश देवसावर्णि मन्वंतर में- धृतिमान, अव्यय, तत्वदर्शी, निरुत्सुक, निर्मोह, सुतपा और निष्प्रकम्प। 7. चतुर्दश इन्द्रसावर्णि मन्वंतर में- अग्नीध्र, अग्नि, बाहु, शुचि, युक्त, मागध, शुक्र और अजित। *इन ऋषियों में से कुछ कल्पान्त-चिरजीवी, मुक्तात्मा और दिव्यदेहधारी हैं। ‘शतपथ ब्राह्मण’ के अनुसार 1. गौतम, 2. भारद्वाज, 3. विश्वामित्र, 4. जमदग्नि, 5. वसिष्ठ, 6. कश्यप और 7. अत्रि। ‘महाभारत’ के अनुसार 1. मरीचि, 2 . अत्रि, 3. अंगिरा, 4. पुलह, 5. क्रतु, 6. पुलस्त्य और 7. वसिष्ठ सप्तर्षि माने गए हैं। * महाभारत में राजधर्म और धर्म के प्राचीन आचार्यों के नाम इस प्रकार हैं- बृहस्पति, विशालाक्ष (शिव), शुक्र, सहस्राक्ष, महेन्द्र, प्राचेतस मनु, भरद्वाज और गौरशिरस मुनि। * कौटिल्य के अर्थशास्त्र में इनकी सूची इस प्रकार है- मनु, बृहस्पति, उशनस (शुक्र), भरद्वाज, विशालाक्ष (शिव), पराशर, पिशुन, कौणपदंत, वातव्याधि और बहुदंती पुत्र। * वैवस्वत मन्वंतर में वशिष्ठ ऋषि हुए। उस मन्वंतर में उन्हें ब्रह्मर्षि की उपाधि मिली। वशिष्ठजी ने गृहस्थाश्रम की पालना करते हुए ब्रह्माजी के मार्गदर्शन में उन्होंने सृष्टि वर्धन, रक्षा, यज्ञ आदि से संसार को दिशाबोध दिया। #कृष्णप्रिया

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🌻📿🌻📿🌻📿🌻 📿च्यवन ऋषि📿 भृगु मुनि के पुत्र च्यवन महान तपस्वी थे। एक बार वे तप करने बैठे तो तप करते-करते उन्हें हजारों वर्ष व्यतीत हो गये। यहाँ तक कि उनके शरीर में दीमक-मिट्टी चढ़ गई और लता-पत्तों ने उनके शरीर को ढँक लिया। उन्हीं दिनों राजा शर्याति अपनी चार हजार रानियों और एकमात्र रूपवती पुत्री सुकन्या के साथ इस वन में आये। सुकन्या अपनी सहेलियों के साथ घूमते हुये दीमक-मिट्टी एवं लता-पत्तों से ढँके हुये तप करते च्यवन के पास पहुँच गई। उसने देखा कि दीमक-मिट्टी के टीले में दो गोल-गोल छिद्र दिखाई पड़ रहे हैं जो कि वास्तव में च्यवन ऋषि की आँखें थीं। सुकन्या ने कौतूहलवश उन छिद्रों में काँटे गड़ा दिये। काँटों के गड़ते ही उन छिद्रों से रुधिर बहने लगा। जिसे देखकर सुकन्या भयभीत हो चुपचाप वहाँ से चली गई। 🌻🌻 आँखों में काँटे गड़ जाने के कारण च्यवन ऋषि अन्धे हो गये। अपने अन्धे हो जाने पर उन्हें बड़ा क्रोध आया और उन्होंने तत्काल शर्याति की सेना का मल-मूत्र रुक जाने का शाप दे दिया। राजा शर्याति ने इस घटना से अत्यन्त क्षुब्ध होकर पूछा कि क्या किसी ने च्यवन ऋषि को किसी प्रकार का कष्ट दिया है? उनके इस प्रकार पूछने पर सुकन्या ने सारी बातें अपने पिता को बता दी। राजा शर्याति ने तत्काल च्यवन ऋषि के पास पहुँच कर क्षमायाचना की। च्यवन ऋषि बोले कि राजन्! तुम्हारी कन्या ने भयंकर अपराध किया है। यदि तुम मेरे शाप से मुक्त होना चाहते हो तो तुम्हें अपनी कन्या का विवाह मेरे साथ करना होगा। इस प्रकार सुकन्या का विवाह च्यवन ऋषि से हो गया। 🌻🌻 सुकन्या अत्यन्त पतिव्रता थी। अन्धे च्यवन ऋषि की सेवा करते हुये अनेक वर्ष व्यतीत हो गये। हठात् एक दिन च्यवन ऋषि के आश्रम में दोनों अश्‍वनीकुमार आ पहुँचे। सुकन्या ने उनका यथोचित आदर-सत्कार एवं पूजन किया। अश्‍वनीकुमार बोले, "कल्याणी! हम देवताओं के वैद्य हैं। तुम्हारी सेवा से प्रसन्न होकर हम तुम्हारे पति की आँखों में पुनः दीप्ति प्रदान कर उन्हें यौवन भी प्रदान कर रहे हैं। तुम अपने पति को हमारे साथ सरोवर तक जाने के लिये कहो।" च्यवन ऋषि को साथ लेकर दोनों अश्‍वनीकुमारों ने सरोवर में डुबकी लगाई। डुबकी लगाकर निकलते ही च्यवन ऋषि की आँखें ठीक हो गईं और वे अश्‍वनी कुमार जैसे ही युवक बन गये। उनका रूप-रंग, आकृति आदि बिल्कुल अश्‍वनीकुमारों जैसा हो गया। उन्होंने सुकन्या से कहा कि देवि! तुम हममें से अपने पति को पहचान कर उसे अपने आश्रम ले जाओ। इस पर सुकन्या ने अपनी तेज बुद्धि और पातिव्रत धर्म से अपने पति को पहचान कर उनका हाथ पकड़ लिया। सुकन्या की तेज बुद्धि और पातिव्रत धर्म से अश्‍वनीकुमार अत्यन्त प्रसन्न हुये और उन दोनों को आशीर्वाद देकर वहाँ से चले गये। 🌻🌻 जब राजा शर्याति को च्यवन ऋषि की आँखें ठीक होने नये यौवन प्राप्त करने का समाचार मिला तो वे अत्यन्त प्रसन्न हुये और उन्होंने च्यवन ऋषि से मिलकर उनसे यज्ञ कराने की बात की। च्यवन ऋषि ने उन्हें यज्ञ की दीक्षा दी। उस यज्ञ में जब अश्‍वनीकुमारों को भाग दिया जाने लगा तब देवराज इन्द्र ने आपत्ति की कि अश्‍वनीकुमार देवताओं के चिकित्सक हैं, इसलिये उन्हें यज्ञ का भाग लेने की पात्रता नहीं है। किन्तु च्यवन ऋषि इन्द्र की बातों को अनसुना कर अश्‍वनीकुमारों को सोमरस देने लगे। इससे क्रोधित होकर इन्द्र ने उन पर वज्र का प्रहार किया लेकिन ऋषि ने अपने तपोबल से वज्र को बीच में ही रोककर एक भयानक राक्षस उत्पन्न कर दिया। वह राक्षस इन्द्र को निगलने के लिये दौड़ पड़ा। इन्द्र ने भयभीत होकर अश्‍वनीकुमारों को यज्ञ का भाग देना स्वीकार कर लिया और च्यवन ऋषि ने उस राक्षस को भस्म करके इन्द्र को उसके कष्ट से मुक्ति दिला दी। 📿जय च्वन ऋषि की📿राधा सखी👸 🌻📿🌻📿🌻📿🌻

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Radhe Radhe *🔴"राधा जी के प्यारे ~ कान्हा जी हमारे"🔴* *वृन्दावन* का एक भक्त ठाकुर जी को बहुत प्रेम करता था, भाव विभोर हो कर नित्य प्रतिदिन उनका श्रृंगार करता था। आनंदमय हो कर कभी रोता तो कभी नाचता। एक दिन श्रृंगार करते हुए जैसे ही मुकट लगाने लगा, तभी मुकट ठाकुर गिरा देते। एक बार दो बार कितनी बार लगाया पर छलिया तो आज लीला करने में लगे थे। अब भक्त को गुस्सा आ गया, वो ठाकुर से कहने लगा तोह को तेरे बाबा की कसम मुकट लगाई ले पर ठाकुर तो ठाकुर है, वो किसी की कसम माने ही नही। जब नही लगाया तो भक्त बोला तो को तेरी मइया की कसम। ठाकुर जी माने नही। अब भक्त का गुस्सा और बढ़ गया। उसने सबकी कसम दे दी। तोहे मेरी कसम.. तोरी गायिओ की कसम.. तोरे सखाँ की कसम.. तोरी गोपियों की कसम.. तोरे ग्वालों की कसम.. सबकी कसम दे दी, पर ठाकुर तो टस से मस ना हुए। अब भक्त बहुत परेशान हो गया और दुखी भी। फिर खीज गया और गुस्से में बोला- ऐ गोपियन के रसिया.. ऐ छलिया, गोपियन के दीवाने, तो को तोरी राधा की कसम है, अब तो मुकुट लगाले। बस फिर क्या था.. ठाकुर जी ने झट से मुकट धारण कर लिया। अब भक्त भी चिढ़ गया। अपनी कसम दी, गोप-गोपियों की, माँ, बाबा, ग्वालन की दी। किसी की नही सुनी लेकिन राधा की दी तो मान गये। अगले दिन फिर जब भक्त श्रंगार करने लगा तो इस बार ठाकुर ने बाँसुरी गिरा दी। भक्त हल्के से मुस्करायाऔर बोला- इस बार तोह को अपनी नही मेरी राधा की कसम। तो भी ठाकुर ने झट से बांसुरी लगा ली। : अब भक्त आनंद में आकर कर झर-झर रोने लगा। भक्त कहता है- मै समझ गया मेरे ठाकुर, तो को राधा भाव समान निश्चल निर्मल प्रेम ही पसंद है। समर्पण पसंद है। इसलिये राधा से प्रेम करत है। अपने भाव को राधा भाव समान निर्मल बना कर रखे अपने प्रेम को पूर्ण-समर्पण रखे सरलता में ही प्रभु है। : हे मेरी राधे जू, सारी रौनक देख ली ज़माने की मगर, जो सुकून तेरे चरणों में है, वो कहीं नहीं !!" *"जय जय श्री राधे....!!"*🌸💐👏🏼 *"जय श्री कृष्ण जी.....!!"*🌸💐👏🏼

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#इंटरनेट_युक्त_स्मार्टफोन_के_विषय_मे...(भाग 3) ---------------------------------------------------------- हमारे प्रभु सर्व अन्तर्यामी है तुम्हे देख रहे है यदि ईमानदारी से भजन करोगे ! तो तुम्हारे हृदय में शीतलता होगी... ये जो जलन है, जरूरी है! जरूरी है! बिना जलन हुए बिना तपे आपका मन निर्मल नही होगा।आप थोड़ा सा जलिये,यह मन आपको जला रहा है तो आपको नही जला रहा, वह खुद जल रहा है, क्योकि उसने अपराध किये है। उसको थोड़ा पवित्र होने दीजिए आप समझते है मन की जलन मिटाने के लिये मुझे वह चेष्टा करनी चाहिये जिससे मन शांत हो जाए... नही ! मन की मलिनता तभी मिटेगी जब ये जलेगा, मलिनता मिटे बिना आपको पूर्ण आनंद की अनुभूति नही हो सकती। वृति लगे न लगे जीभ से नाम जपते रहो, पाप आचरण से बचते रहो, जो सन्त महात्मा जन आदेश करते है... वो कभी न देखो। बिल्कुल सच्ची मानिए हम कई बार मोबाइल वाली बात कहते है,बार बार कहते है सावधान रहिये ये आप ही अपने दुश्मन है, यदि आप साधक है और ऐसी कुछ बाते है तो हटा दीजिये बिल्कुल इन यंत्रो से... भैया ! हमारी साधना अंतर्मुखता की है, माना सत्संग सुना रहा है मोबाइल, और ऐसे रखा हुआ है.. थोड़ी देर सुन लीजिये, बंद कर दीजिये, समाज मे सुन लीजिये ईमानदारी में रहिये। अगर वो हर समय आप ठाकुर जी की तरह छाती से लगाया रखोगे तो रात्रि के 9 बजे से लेकर के सुबह 3 बजे तक साधक को पवित्र रहना बहुत कठिन बात है। 9बजे तक तो खान पान मिलना जुलना..और जहाँ पहुँचे अपने कमरे में..एकांत में..तब जितनी साधना दिन में तुम किये हो उतनी बढ़कर साधना मन करवाएगा तुमसे तुमको अपनी अधीनता में लाएगा उस समय कोई बलवान साधक एकांत में पवित्र रह सकता है। यह उसी धारा से चले हुए हम है इसीलिये बता रहे है, यह कोई किसी की सुनी बात नही,जीवन की बात है। ऐसे सब ठीक ... जहा एकांत बैठा जहाँ लाइट ऑफ हुई तहा मन ऑन हुआ, वो ऑन हुआ तहा अपना शुरू किया। साधक वही जो उसको ऑन ही न होने दे। बिल्कुल जब बेहोश हो गया तो हो गया नही तो चढ़ा बैठा रहे हर समय। अंतर्मुखता साधना है बहिर्मुखता नही,यह यंत्रो में जो हर समय हम लगे रहते है इसीलिये हमे आनंद की अनुभूति.... जीवन भर यंत्र में लगे रहो आपको आनंद की अनुभूति नही होगी आनंद की अनुभूति होती है अंतर् में लगने से, अंतर्मुखता से... सब साधन बहिर्मुखता का जो हम त्याग करने के लिय कर रहे है, हम बहिर्मुख में ही फँसे रहे, हर समय घुन्न घुन्न कान में बोल रहा है जरूरी है वो विषयी पुरुषों के लिये बोल रहा है की भाई राधे कृष्णा राधे कृष्णा... वो लगा है.. बोले 24 घण्टे भजन हो रहा है तो उसको भगवतानंद की अनुभूति होगी क्या? भगवतानंद की अनुभूति तुम्हे होनी है थोड़ी देर बाद ठीक है कि जहाँ मन नही लग पा रहा तो सुनाई... इसके बाद बंद करो ! मनीराम से बुलवाओ ! बोलो राधे कृष्णा राधे कृष्णा राधे.. वो अंदर से सुनो, अंतर्मुख होइए तब आपको भगवतानंद की अनुभूति होगी। हर समय अगर मोबाइलो में फँसे रहे हर समय यंत्रो में फंसे रहे... थोड़ा तो सुलझिये..थोड़ा तो सुलझिये अंतर्मुखता होना साधना है बहिर्मुख.... ठीक है बाहर सब कुछ हो रहा है पर हर समय बहिर्मुख नही... थोड़ी देर के लिये ठीक फिर उसके बाद अंतर्मुख आइए अगर अंतर्मुख का अभ्यास नही है तो आपको अनुभूति कहाँ होगी?? आत्मस्वरूप का अनुभव कैसे होगा सहचरी भाव मे? कैसे आप जानोगे? कितने गन्दे हो ? बैठो एकांत में... बाहर साधक शून्य बनिये फिर देखिए आप, फिर आपको पता चलेगा आप हो क्या? ऐसे तो हमें सब महात्मा कहते है आप ईमानदारी से बैठके देखिये एकांत में बंद कीजिये दरवाजा ! कोई बाहर अंतर्मुख होने के लिये बाहर बाधा है उनको छोड़िए यंत्र आदि से नही, आप बैठिए और नाम जप कीजिये असलियत आपको उस समय समझ मे आएगी जो मन दिखायेगा। ऐसा लगता है खोलो दरवाजा और बाहर कोई तो मिले, कोई तो बात करे यह मन इतना बदमाश है। इसलिय सावधानी पूर्वक बार बार प्रार्थना है कलियुग की यह बहुत सूक्ष्म चाल है की जो हमे परमार्थ से भ्रष्ट करने के लिये इतना बड़ा सहयोग दे दिया माया का.... बहुत बड़ा सहयोग..बहुत ही...अब हम कैसे हृदय से बताये कुछ लोग बचाव पक्ष में कहते है कि भाई इससे सत्संग सुनते है इससे रासलीला देखते है इससे नामकीर्तन सुनते है.. प्रणाम है चलो ठीक है ऐसा है तो एक मोबाइल रखो और 10 साधक मिलके उसे ऑन करो.. जहाँ मानलो दूर है ...अकेले आप अपने कमरे में लेकर इंटरनेट वाला मोबाइल,स्क्रीन वाला मोबाइल...तो भगवान ही बचावे मुश्किल ही समझो की वह पवित्र आचरण कर पाएगा मुश्किल बात है । क्योकि मन बहुत बलवान है बड़े बड़े महात्माओं पर शासन कर लेता है कोई बिरला ही ऐसा है जो भगवत् तत्व को प्राप्त हो चुका है उसकी बात अलग है।नही तो बहुत विचित्र है बहुत विचित्र है बस इसके आगे शब्द नही है.. यह बहुत विचित्र है सावधान! https://youtu.be/Tg4dhjzujFQ ( इंटरनेट युक्त मोबाइल के विषय मे 46.00 से सुनें) #पूज्य_गुरुदेव_श्री_प्रेमानन्द_गोविंद_शरण_जी_के_सत्संग_से.....

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#महाभागवती_जनाबाई श्रीनामदेव जी की भक्ति का कौन वर्णन कर सकता है जबकि उनकी दासी जनाबाई की ही भक्ति अकथनीय है। श्रीनामदेव जी के सत्संग में जनाबाई के ऊपर ऐसा प्रेमरंग चढ़ा की वह निरन्तर नामजप करती हुई विभोर ही रहा करती थी और स्वयं भगवान श्रीपंढ़रीनाथजी उस महा-भागवती के साथ बैठकर चक्की चलाते थे, साथ- साथ कपड़े धोते थे। श्रीजनाबाई की भक्ति की प्रशंसा सुनकर परम्- भागवत श्रीकबीरदास जी काशी से पैदल चलकर पंढरपुर गये। श्रीजनाबाई का पता लगाये तो पता चला कि वह कण्डे (उपले) लेने गई है। जब पता लगाते-लगाते वहाँ पहुँचे तो श्रीकबीरदास जी ने देखा कि जनाबाई एक दूसरी औरत से झगड़ रही है। झगड़ा किसी और बात का नही, कण्डो का ही झगड़ा था। जना उस स्त्री से कहती थी कि तुमने मेरे कण्डे चुराये है। वह कहती थी कि नही, ये तो मेरे ही कण्डे है। श्रीकबीरदासजी के समझ मे नही आ रहा था कि यह कैसी भक्त है, जो तुच्छ कण्डो के लिये इतना बखेड़ा किये है। पुनः क्या पहचान है कि उसने इनके कण्डे चुराये है, टोकरी में रखे हुए सभी कण्डे एक से लगते थे। अंत मे श्रीकबीरदासजी ने पूछ ही लिया कि बाईजी! आपके कण्डो की कुछ पहचान भी है? श्रीजनाबाई ने कहा- पहचान क्यो नही है। मेरे कण्डो से 'विट्ठल' नाम की ध्वनि निकल रही होगी। यह सुनकर श्रीकबीरदासजी दंग रह गये और सचमुच एक कंडा कान से लगाकर सुने तो उससे आवाज निकल रही थी- 'जै विट्ठल जै विट्ठल विट्ठल'। और जो स्त्री के कण्डे थे, उनसे कोई ध्वनि नही निकल रही थी, वह तो कण्डे ही थे। श्रीकबीरदासजी नतमस्तक हो गए जनाबाई के सामने। धन्य है जनाबाई जिनके स्पर्श से जड़ भी चैतन्य के भाँति भगवन्नाम की रट लगा रहे है। ।।राधे राधे।।

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