🌷 *विश्वामित्र द्वारा भगवान को कथारस पान* 🌷 🕉जय श्री हरिहर। 🌅पुरातन काल में दैत्यराज दानवीर *राजा बलि* की राजधानी रही कन्नौज नगरी का परम सौभाग्य था जब श्री हरि ने वामन रूप रखकर यही राजा बलि से दान में 3 पग भूमि में उसका सर्वस्वहरन कर लिया था बाल्मिक रामायण में बाल काण्ड 32 वे सर्ग से कन्नौज का विवरण मिलता मिलता है- श्री विश्वामित्र जी जनकपुरी के रास्ते में भगवान् राम को कथा सुनाते हुए बताते है कि पूर्व काल में ब्रम्हा जी के पुत्र *महातेजस्वी कुश नाम* के राजा हुए-उनके 4 पुत्रो में से कुशनाभ ने महोदय नाम के नगर का निर्माण किया --- *महोदय* -कन्नौज का सबसे पुराना नाम है- कननौज के राजा कुशनाभ के घ्रताची अप्सरा से 100 कन्या हुई- यह बहुत सुन्दर थी - वायु देवता की अवहेलना के कारण वे कुपित हो गए जिससे सभी कन्याऐ कुब्जा हो गयी -दुसरे शब्दों में जंगल घूमते समय कोई विशैली वस्तु सेवन से वातरोग हो जाने से सभी कुब्जा हो गयी -तब कन्नौज का नाम कान्यकुब्ज पडा जिसका अप्रभंश कन्नौज है- उस समय चूली नाम के मुनि बहुत बडा अनुष्ठान कर रहे थे -उनके द्वारा गन्धर्व कुमारी सोमदा से मानसिक संकल्प से ब्रम्ह्दत्त नामक मानस पुत्र हुआ-महातेजस्वी ब्रम्ह्दत्त जो कन्नौज के पास काम्पिल्य (अब जिला फरुखाबाद ) के राजा हुए - ब्रम्हदुत्त से कन्नौज के राजा कुशनाभ ने अपनी सभी 100 पुत्रियो का विवाह कर दिया - तेजस्वी ब्रम्ह्दत्त के स्पर्श करते ही सभी कन्याये रोगमुक्त हो गयी--कुशनाभ के पुत्र गाधि और गाधि के पुत्र मैं महर्षि विश्वामित्र हूँ-- महाराजा गाधि ने अपनी एक मात्र कन्या का विवाह महर्षि ऋचीक से किया -- गाधि पुत्री ने अपने पति ऋषि ऋचीक से अपने तथा अपनी माँ के लिए तेजस्वी पुत्रो की कामना की इसलिए ऋषि ऋचीक ने मन्त्रो से सिद्ध कर दो चरु बनाये -- पहला अपनी पत्नी के लिये जो ब्रम्ह तेज ( जींस ) से युक्त था तथा दूसरा अपनी सासू माँ के लिए जो क्षत्री ( जींस ) दे युक्त था --कौतूहलवश माँ और बेटी नेअपने चरुओं को बदल कर सेवन कर लिया -- इसके असर से कन्नौज के राजा गाधि के यहां विश्वामित्र का जन्म हुआ जिन्होंने अंततः कन्नौज का राज्य त्याग कर विकट तपस्या करके ब्राम्हणत्व प्राप्त किया और ब्रम्हर्षि बने -- ऋषि ऋचीक की पत्नी इस बात से ही डर गई कि उसके यहां क्षत्री गुणों वाला क्रूर कर्म करने वाली सन्तान होगी - उसकी प्रार्थना पर ऋचीक ने पुत्र की बजाय पौत्र इन गुणों युक्त होने की बात कही -- ऋचीक के पुत्र महर्षि जमदग्नि हुए और जमदग्नि के पुत्र क्षत्री गुणों वाले श्री परशुराम जी हुए । 🌹 *जय सियाराम* ☘ 🌹 *जय हनुमानजी* ☘ 🚩🚩 *जय श्री राम* 🚩🚩 🚩🚩 *जय श्री राम* 🚩🚩 🚩🚩 *जय श्री राम* 🚩🚩

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साधक और साधना ७९६. प्रश्न-साधक के जीवन में सौभाग्य-दुर्भाग्य का अवसर कब होता है? उत्तर- जगत् जब किसी साधक को जागतिक सम्मान से वंचित करता है, तभी उसके यथार्थ सौभाग्य का उदय होता है और जब जगत् उसका उच्च आसन पर वरण करता है, तब उसका दुर्भाग्य प्रकट होता है। ७९७. प्रश्न- जब साध्य उत्तम है, कर्ता का भाव शुद्ध है और उसकी नीयत अच्छी है तब फिर यदि साधन निकृष्ट भी हो तो क्या हानि है? उत्तर- फल वही होता है, जिसका बीज होता है। जब साधन निकृष्ट है, तब साध्य श्रेष्ठ कहां से आएगा? बुरे का अच्छा फल होगा यह तो अज्ञानविमोहित आसुरी भाववालों की मान्यता है। वस्तुतः साधन के स्वरूप पर ही साध्य का स्वरूप निर्भर करता है। पुस्तक *क्या, क्यों और कैसे?* गीतावाटिका प्रकाशन लेखक- भाईजी श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार

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*🌷।।गुरु भगवान से रिश्ता हो।।🌷* एक बार ऐसा हुआ कि एक पंडित जी थे। पंडित जी ने एक दुकानदार के पास पाँच सौ रुपये रख दिये, उन्होंने सोचा कि जब बच्ची की शादी होगी, तो पैसा ले लेंगे,थोड़े दिनों के बाद जब बच्ची सयानी हो गयी, तो पंडित जी उस दुकानदार के पास गये। उसने नकार दिया कि आपने कब हमें पैसा दिया था। उसने पंडित जी से कहा कि क्या हमने कुछ लिखकर दिया है, पंडित जी इस हरकत से परेशान हो गये और चिन्ता में डूब गये। थोड़े दिन के बाद उन्हें याद आया कि क्यों न राजा से इस बारे में शिकायत कर दें ताकि वे कुछ फैसला कर दें एवं मेरा पैसा कन्या के विवाह के लिए मिल जाये। वे राजा के पास पहुँचे तथा अपनी फरियाद सुनाई। राजा ने कहा-कल हमारी सवारी निकलेगी, तुम उस लालाजी की दुकान के पास खड़े रहना। राजा की सवारी निकली। सभी लोगों ने फूलमालाएँ पहनायीं, किसी ने आरती उतारी। पंडित जी लालाजी की दुकान के पास खड़े थे। राजा ने कहा-गुरुजी आप यहाँ कैसे, आप तो हमारे गुरु हैं? आइये इस बग्घी में बैठ जाइये, लालाजी यह सब देख रहे थे, उन्होंने आरती उतारी, सवारी आगे बढ़ गयी। थोड़ी दूर चलने के बाद राजा ने पंडित जी को उतार दिया और कहा कि पंडित जी हमने आपका काम कर दिया। अब आगे आपका भाग्य। उधर लालाजी यह सब देखकर हैरान थे कि पंडित जी की तो राजा से अच्छी साँठ-गाँठ है। कहीं वे हमारा कबाड़ा न करा दें। लालाजी ने अपने मुनीम को पंडित जी को ढूँढ़कर लाने को कहा-पंडित जी एक पेड़ के नीचे बैठकर कुछ विचार कर रहे थे,मुनीम जी आदर के साथ उन्हें अपने साथ ले गये। लालाजी ने प्रणाम किया और बोले-पंडित जी हमने काफी श्रम किया तथा पुराने खाते को देखा, तो पाया कि हमारे खाते में आपका पाँच सौ रुपये जमा है। पंडित जी दस साल में ब्याज के बारह हजार रुपये हो गये, पंडित जी आपकी बेटी हमारी बेटी है। अत: एक हजार रुपये आप हमारी तरफ से ले जाइये तथा उसे लड़की की शादी में लगा देना, इस प्रकार लालाजी ने पंडित जी को तेरह हजार रुपये देकर प्रेम के साथ विदा किया,जब.... मात्र एक राजा के साथ सम्बंध होने भर से विपदा दूर जो जाती है तो हम सब भी अगर इस दुनिया के राजा, *कृपालु भगवान* .से अगर अपना सम्बन्ध जोड़ लें...............तो आपकी कोई समस्या, कठिनाई या फिर आपके साथ अन्याय का .....कोई प्रश्न ही नहीं उत्पन्न होता।। *🙏।।राधे राधे।।🙏*

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