. "कर्मो का फल" एक बार की कथा है, देवऋषि नारद और ऋषि अन्गरा कहीं जा रहे थे। रास्ते में उनकी नजर एक मिठाई की दुकान पर पड़ी। दुकान के नजदीक ही झूठी पतलों का ढेर लगा हुआ था। उस झूठन को खाने के लिए जैसे ही एक कुत्ता आता है, बैसे ही उस दुकान का मालिक उसको जोर से डन्डा मारता है। डन्डे की मार खा कर कुत्ता चीखता हुआ वहाँ से चला जाता है। ये दृश्य देख कर, देवऋषि को हंसी आ गयी। ऋषि अन्गरा ने उन से हंसी का कारण पूछा, नारद बोले: हे ऋषिवर ! यह दुकान पहले एक कन्जूस व्यक्ति की थी। अपनी जिंदगी में उसने बहुत सारा पैसा इकट्ठा किया। और इस जन्म में वो कुत्ता बन कर पैदा हुआ और यह दुकान मालिक उसी का पुत्र है, देखें ! जिस के लिए उस ने बेशुमार धन इकट्ठा किया। आज उसी के हाथों से, उसे जूठा भोजन भी नहीं मिल सका। कर्मफल के इस खेल को देखकर मुझे हंसी आ गई। मनुष्य को अपने शुभ और अशुभ करमों का फल जरूर मिलता है। बेशक इस लिए उसे जन्मों-जन्मों की यात्रा क्यों न करनी पड़े। ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" ********************************************

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गुरु प्राप्ति - ------------- मधुर कवि तिरुक्कोलूर नामक स्थान में एक सामवेदी ब्राह्मण के यहां उत्पन्न हुए थे। वे वेद के अच्छे ज्ञाता थे। लेकिन उन्होंने सोचा कि भगवान की भक्ति के बिना वेद के ज्ञान का कोई मूल्य नहीं। उन्हें भगवान की प्राप्ति की तीव्र अभिलाषा थी। एक दिन वे गंगा तट पर घूम रहे थे कि दक्षिण की ओर उन्हें प्रकाश दिखाई दिया। यह प्रकाश उन्हें तीन दिनों तक दिखा। इस प्रकाश से प्रभावित होकर वे खिंचे-खिंचे उसी ओर चलते गए। पूछने पर पता चला कि आगे एक योगी रहते हैं। वे वहां गए। प्राचीन मंदिर के समीप इमली के कोटर में समाधिस्थ योगी के उन्हें दर्शन हुए। उन्होंने उनके उपदेश के लिए प्रतीक्षा की, पर योगी की समाधि नहीं खुली। आवाज दी, ताली बजाई, पर कोई उत्तर नहीं मिला। मंदिर की दीवार पर पत्थर मारा, पर महात्मा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। मधुर कवि ने साहस किया और कोटर के समीप जाकर बोले, 'महाराज! मैं आपसे एक प्रश्न पूछना चाहता था। यदि सूक्ष्म चेतन शक्ति जड़ प्रकृति के अंदर ही आविर्भूत हो जाय तो वह क्या खाएगा और कहां विश्राम करेगा? योगी ने उत्तर दिया। 'वह उसी को खाएगा और वहीं पर विश्राम करेगा।' मधुर कवि ने अपने कवि को पहचान लिया, जिनकी वे इतने दिनों से खोज रहे थे। वे इस शरीर के अंदर परमात्मा के रुप में विद्यमान थे।

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दुर्भाग्य से बचने के लिए गुरुवार को कौन से काम करने या नहीं करने चाहिए..|| क्या आप जानते हैं कि कुछ काम ऐसे हैं जो हमें भूलकर भी गुरुवार के दिन नहीं करने चाहिए। हमने बुजुर्गों से भी सुना हैं कि ये काम करने से हमारे जीवन में नाकारात्मक प्रभाव पड़ता है। जिससे हमें भारी नुक्सान भी हो सकता है। गुरुवार के दिन कौन से कार्य ना करें..... गुरुवार के दिन नाखून ना काटे। गुरुवार के दिन बाल न कटवाए। इस दिन स्त्रियों को बाल नही धोने चाहिए। इस दिन हमें कपड़े नही धोने चाहिए। इस दिन हमें ना तो घर में खिचड़ी बनानी चाहिए और ना ही खानी चाहिए। हमें कभी भी पिता, गुरु तथा साधु संत का अपमान नहीं करना चाहिए। क्योंकि ये सभी बृहस्पति का प्रतिनिधि करते हैं। गुरुवार के दिन कौन से कार्य करें सूर्य उदय होने से पहले स्नान कर के भगवान विष्णु के समक्ष गाय के शुद्ध देसी घी का दीपक जलाएं। भगवान शिव पर पीले रंग के लड्डू अर्पित करें| केसर या हल्दी का तिलक मस्तक पर लगाएं। संभव हो तो व्रत रखें। पीली चीजों का दान करें। केले के पेड़ का पूजन करें, प्रसाद में पीले रंग के पकवान अथवा फल अर्पित करें। केले का दान करें।

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*🌸 श्री भक्तमाल – श्री पादपद्माचार्य जी 🌸💐👏🏻* श्री सम्प्रदाय के एक महान् गुरुभक्त संत हुए है श्री गंगा धराचार्य जी , जिनकी गुरु भक्ति के कारण इनका नाम गुरुदेव ने श्री पादपद्माचार्य रख दिया था । श्री गंगा जी के तट पर इनके सम्प्रदाय का आश्रम बना हुआ था और अनेक पर्ण कुटियां बनी हुई थी । वही पर एक मंदिर था और संतो के आसन लगाने की व्यवस्था भी थी । स्थान पर नित्य संत सेवा , ठाकुर सेवा और गौ सेवा चलती थी । एक दिन श्री गंगाधराचार्य जी के गुरुदेव को कही यात्रा पर जाना था । कुछ शिष्यो को छोड़ कर अन्य सभी शिष्य कहने लगे – गुरुजी ! हमे भी यात्रा पर जाने की इच्छा है । कुछ शिष्य कहने लगे – गुरुजी ! आप हमें कभी अपने साथ यात्रा पर नही ले गए , हमे भी साथ चलना है । श्री गंगाधराचार्य जी गुरुदेव के अधीन थे । वे कुछ बोले नही , शांति से एक जगह पर खड़े थे । अब गुरुजी ने देखा कि सभी शिष्य यात्रा पर चलना चाहते तो है परंतु आश्रम में भगवान् ,गौ और संत सेवा करेगा कौन और अन्य व्यवस्था देखेगा कौन ? गुरुदेव ने श्री गंगाधराचार्य जी को अपने पास बुलाया और कहा – मै कुछ समय के लिए यात्रा पर जा रहा हूं । आश्रम की संत ,गौ और भगवत् सेवा का भार अब तुमपर है । श्रद्धा पूर्वक आज्ञा का पालन करो , हमे तुमपर पूर्ण विश्वास है । श्री गंगाधराचार्य जी ने प्रणाम किया और कहा – जो आज्ञा गुरुदेव । गुरुदेव जब जाने लगे तब श्री गंगाधराचार्य जी के मुख पर कुछ उदासी उन्हे दिखाई पड़ी । गुरुदेव ने कहा – बेटा ! तुम्हारे मुख मंडल पर प्रसन्नता नही दिखाई पड़ती , क्या तुम हमारी आज्ञा से प्रसन्न नही हो ? श्री गंगाधराचार्य जी ने कहा – गुरुदेव भगवान् आपकी आज्ञा शिरोधार्य है परंतु जब मै आपकी शरण मे आया था तब मैंने यह प्रतिज्ञा की थी कि मै नित्य ही आपका चरणामृत ग्रहण और आपका दर्शन किये बिन कोई अन्न- जल ग्रहण नही करूँगा । गुरुदेव ने कहा – कोई बात नही , श्री गंगा जी को आज से मेरा ही स्वरूप जानकर इनका जल ग्रहण करो और दर्शन करो । गुरु भी पतित को पावन बनाते है और गंगा जी भी पतित को पावन बनाती है । श्री गंगाधराचार्य जी ने कहा – जो आज्ञा गुरुदेव और चरणों मे प्रणाम किया । अपनी अनुपस्थिति मे अपने समान गंगा जी को मानने का उपदेश देकर चले गये । गंगाधराचार्य नित्य गुरूवत् गंगा जी की उपासना करने लगे । नित्य आश्रम में गौ , संत , ठाकुर सेवा उचित प्रकार से करते थे । अतिथियों का सत्कार और प्रसाद बनाना , स्वच्छता आदि सब कार्य अकेले ही करते थे । प्रातः काल श्री गंगा जी का दर्शन करते और गंगा जल गुरुदेव का चरणामृत समझकर ग्रहण करते थे । आरती करते और दण्डवत् प्रणाम निवेदन करते । अन्य कोई शिष्य श्रद्धा पूर्वक स्नान करते थे परंतु पादपद्म जी हृदय से ही श्री गंगा जी की वन्दना पूजा करते थे । गंगा जी को गुरुदेव का स्वरूप समझते थे और गुरुदेव के शरीर पर चरण कैसे पधरावें ? इससे तो पाप लगेगा यह सोचकर कभी भी गंगाजी मे स्नान नही करते थे । इनके हृदय के भाव को न जानकर दूसरे लोग आलोचना करते थे । अन्य शिष्य गंगाधराचार्य जी की बहुत प्रकार से निंदा करते हुए कहते थे – गुरुजी बाहर क्या चले गए , इसने तो गंगा स्नान करना बंद कर दिया । जाकर कुँए पर स्नान करता है । कुछ दिनो के पश्चात् श्री गुरुदेव जी लौटकर आये और अपना आसान आश्रम में रखा । अभी गुरुजी को आये कुछ ही देर हुई थी कि गंगाधराचार्य जी की निंदा करने के लिए कुछ शिष्य पहुंच गए । कुछ शिष्य जो आश्रम में ही रुके थे ,उन्होंने गुरुजी से कहा – गुरुजी ! गंगाधराचार्य जी ने आपके यात्रा पर जाने के बाद गंगा स्नान करना त्याग दिया , पड़ा प्रमादी है यह तो । श्री गुरुदेव कुछ नही बोले और श्री गंगाधराचार्य जी भी मौन खड़े रहे । गुरुदेव अच्छी तरह से गंगाधराचार्य जी की गुरुनिष्ठा के विषय मे जानते थे परंतु उन्हें उनकी गुरुभक्ति संसार मे प्रकट करनी था । अगले दिन प्रातः काल इनकी गुरूवाक्य और गुरु निष्ठा का परिचय प्रकट करने का निश्चय गुरुदेव ने किया । गुरुदेव ने अपने अन्य शिष्यों सहित गंगाधराचार्य जी को स्नानार्थ श्री गंगा जी की ओर चलने को कहा । गुरुदेव गंगाधराचार्य जी से बोले – बेटा ! हम स्नान करने जा रहे है , तुम मेरे कमंडल अचला और लंगोटी लेकर पीछे पीछे चलो । गुरुदेव गंगा जी में स्नान करने उतरे और थोड़ी देर बाद श्री गंगा धराचार्य जी से कहा – हमारा अचला लंगोटी और कमंडल यहां हमारे पास लेकर आओ । अब गंगा धराचार्य जी धर्म संकट में पड़ गए । वे सोचने लगे – श्री गंगा जी हमारे गुरुदेव का स्वरूप है , गंगा जी मे चरण रखना गुरु का अपमान होगा और यहां प्रत्यक्ष गुरुदेव आज्ञा दे रहे है । अब तो श्री गंगा जी और गुरुदेव ही हमारे धर्म की रक्षा करेगी । इस गुरुनिष्ठ शिष्य की मर्यादा और गुरु भक्ति की रक्षा करने हेतु श्री गंगा जी ने वहां अनेक विशाल कमलपुष्प उत्पन्न कर दिए । गुरुदेव ने उन कमलपुष्पो पर पैर रखते हुए चलकर शीघ्र अचला ,लंगोटी और कमंडल लेकर आने को कहा । उन्हीपर पैर रखते हुए ये गुरुदेव के समीप दौडकर गये । श्री गंगाधराचार्य जी का जो प्रभाव गुप्त था, वह उस दिन प्रकट हो गया, इस दिव्य चमत्कार को देखकर सभो के मन मे गंगा जी और पादपद्म जी मे अपार श्रद्धा हो गयी । गुरुजी ने कहा – बेटा धन्य है तुम्हारी गुरुभक्ति जिसके प्रताप से गंगा जी ने यह कमलपुष्प उत्पन्न कर दिए । संसार मे आज के पश्चात तुम्हारा नाम पादपद्माचार्य के नाम से प्रसिद्ध होगा । उसी दिन से गंगाधराचार्य जी का का नाम पादपद्माचार्य पड गया । Jay Shri Krishna 🙏🏻💫

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*प्याज़ खाना क्यों मना!?!* (कृपया पोस्ट पूरी पढ़ें; ये जानकारी अन्य कहीं कहीं मिलेगी) शाकाहार होने तथा चिकित्सीय गुण होने के बावजूद साधकों हेतु प्याज-लहसुन वर्जित क्यों है, इसपर विस्तृत शोध के कुछ बिंदु आपके समक्ष रख रहा हूं!.... *1)मलूक पीठाधीश्वर संत श्री राजेन्द्र दास जी बताते हैं कि एक बार प्याज़-लहसुन खाने का प्रभाव देह में 27 दिनों तक रहता है,और उस दौरान व्यक्ति यदि मर जाये तो नरकगामी होता है!ऐसा शास्त्रों में लिखा है!* *2) प्याज़ का सेवन करने से 55 मर्म-स्थानों में चर्बी जमा हो जाती है, जिसके फलस्वरूप शरीर की सूक्ष्म संवेदनाएं नष्ट हो जाती हैं!* 3) भगवान के भोग में, नवरात्रि आदि व्रत-उपवास में ,तीर्थ यात्रा में ,श्राद्ध के भोजन में और विशेष पर्वों पर प्याज़-लहसुन युक्त भोजन बनाना निषिद्ध है, जिससे समझ में आ जाना चाहिए कि प्याज-लहसुन दूषित वस्तुएं हैं! 4)कुछ देर प्याज़ को बगल में दबाकर बैठने से बुखार चढ़ जाता है! प्याज काटते समय ही आंखों में आंसू आ जाते हैं, जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि शरीर के भीतर जाकर यह कितनी अधिक हलचल उत्पन्न करता होगा!?! *5) हवाई-जहाज चलाने वाले 👉पायलटों को जहाज चलाने के 72 घंटे पूर्व तक प्याज़ का सेवन ना करने का परामर्श दिया जाता है, क्योंकि प्याज़ खाने से तुरंत प्रतिक्रिया देने की क्षमता(Reflexive ability) प्रभावित होती है!* 6) शास्त्रों में प्याज़ को "पलांडू" कहा गया है! *याज्ञवल्क्य संहिता के अनुसार प्याज एवं गोमांस दोनों के ही खाने का प्रायश्चित है--- चंद्रायण व्रत! (इसीलिए श्री जटिया बाबा प्याज़ को गो मांस तुल्य बताते थे!)* *7) ब्रह्मा जी जब सृष्टि कर रहे थे, तो दो राक्षस उसमें बाधा उत्पन्न कर रहे थे! उनके शरीर क्रमशः मल और मूत्र के बने हुए थे! ब्रह्मा जी ने उन्हें मारा तो उनके शरीर की बोटियां पृथ्वी पर जहां-जहां गिरीं, वहां प्याज़ और लहसुन के पेड़ उग आए! लैबोरेट्री में टेस्ट करने पर भी प्याज़ और लहसुन में क्रमशः गंधक और यूरिया प्रचुर मात्रा में मिलता है, जो क्रमशः मल मूत्र में पाया जाता है!* *8) एक अन्य कथा के अनुसार,भगवान विष्णु के मोहिनी अवतार द्वारा राहूकेतू का सिर काटे जाने पर उसके कटे सिर से अमृत की कुछ बूंदे ज़मीन पर गिर गईं थीं,जिनसे प्याज़ और लहसुन उपजे! चूंकि यह दोनों सब्जियां अमृत की बूंदों से उपजी हैं, इसलिए यह रोगों और रोगाणुओं को नष्ट करने में अमृत समान होती हैं,पर क्योंकि यह राक्षस के मुख से होकर गिरी हैं, इसलिए इनमें तेज गंध है और ये अपवित्र हैं, जिन्हें कभी भी भगवान के भोग में इस्तमाल नहीं किया जाता! कहा जाता है कि जो भी प्याज और लहसुन खाता है उनका शरीर राक्षसों के शरीर की भांति मजबूत हो जाता है, लेकिन साथ ही उनकी बुद्धि और सोच-विचार राक्षसों की तरह दूषित भी हो जाते हैं!* *9)इनके राजसिक तामसिक गुणों के कारण आयुर्वेद में भी प्याज़-लहसुन खाने की मनाही है! 👉प्राचीन मिस्र के पुरोहित प्याज़-लहसुन नहीं खाते थे! चीन में रहने वाले बौद्ध धर्म के अनुयायी भी प्याज़-लहसुन खाना पसंद नहीं करते!* *वैष्णव और जैन पूरी तरह से प्याज और लहसुन का परहेज करते हैं ।* इतने प्रमाण होते हुए भी केवल जीभ के स्वार्थ हेतु प्याज़-लहसुन खाते रहेंगे,तो जड़ बुद्धि कहलाएंगे! इसलिए इनका तुरंत परित्याग करने में ही भलाई है! घरवाले नहीं मानते,तो उन्हें उपरोक्त बातें समझाएँ । 🙏जय श्री राधे 🙏

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डरना और सावधानी दो बातें हैं एक तो है डर और एक है सावधान रहना । डर यदि मन में घुस जाए तो व्यक्ति जिस कारण से डर रहा है उस कार्य में प्रवृत्त नहीं हो सकता जैसे आज भी बहुत से लोग हैं जिनको स्कूटर चलाने से कार चलाने से डर लगता है वे आज तक स्कूटर न चला पाए न कार चला पाए । लेकिन सावधानी दूसरी चीज है । हर बात में हर विषय में भजन में चाहे कार चलाने में जो डरा नहीं और सावधान रहा वह एक्सपर्ट बन गया ऐसे ही भजन करते में हमसे भूले ना हो हमसे अपराध ना हो इस बात की हमें सावधानी रखती हैं और एक बात और बता दूं गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में वो तिफ्ल क्या गिरे जो घुटनों के बल चले जो अभी घुटनों के बल चल रहा है वह क्या गिरेगा और यदि चलेगा तो गिरेगा ही । हम भजन करेंगे तो अपराध होंगे ही । कोई रोक नहीं सकता । लेकिन हम सावधान रहें और हम प्रयास करें अभी यदि 10 अपराध हो रहे हैं तो वह 12 ना हो 8 हों, 7 हों,6 हो और एक समय आए कि हम निरपराध हो जाए यदि भय डर भय दिमाग में भर गया तो भय का ही चिंतन होता है । यह सिद्धांत है अपराध ना हो जाए, अपराध ना हो जाए यदि यही सोचते रहेंगे तो अपराध अधिक होगा और हमारे दिमाग में अपराध का चिंतन बना रहेगा भगवान का चिंतन गौण हो जाएगा । हमें भजन करना है । हमें सेवा करनी है हमें परिक्रमा करनी है हमें विग्रह को भोग बनाना है हम सावधान रहे अपराध ना हो बस अपराध अपराध ही सोचते रहेंगे तो मेरी गारंटी है आप आत्म निरीक्षण करके देख लीजिएगा दिन भर आप अपराध ही सोचते रहते हैं । कृष्ण की स्मृति नहीं आ पाती है एक श्लोक भी है कि विधि और निषेध यही है कि हर समय कृष्ण की स्मृति रहे और कृष्ण कभी ना भूले । इसी में आ गए सारे अपराध और सारी विधि इसलिए हम सावधान ही रहे भयभीत ना रहे भयभीत रहने से बात बिगड़ जाएगी समस्त वैष्णव जन को राधा दासी का सादर प्रणाम🙏🙏

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