🌷 *तर्पण और श्राद्ध शंका समाधान* 🌷 🌅एक बार करंधम महाकाल का दर्शन करने गए कालभीति ने जब करंधम को देखा तब उनको शिव का वचन स्मरण हो आया उन्होंने उनका स्वागत सत्कार किया बाद इसके करंधम ने कालभीति से पूंछा "भगवान मेरे मन में एक बड़ा संशय है कि "यहां जो पितरो को जल दिया जाता है वह तो जल में ही मिल जाता है फिर वह पितरो को कैसे प्राप्त होता है ??यही बात श्राद्ध के संबंध में भी है ??पिंड आदि जब यही पड़े राह जाते है तब हम कैसे मान ले पितर लोग उन पिंडादी का उपयोग कैसे करते है ??साथ ही यह कहने का साहस भी नही होता कि वे पदार्थ पितरो को किसी प्रकार मिलते ही नही !क्यों कि स्वप्न में देखा जाता है पितर मनुष्य से श्राद्ध आदि की याचना करते हैं !देवताओं के चमत्कार भी प्रत्यक्ष देखे जाते है अतः मेरा मन इस विषय में मोह ग्रस्त हो रहा है !! महाकाल ने कहाः ***राजन !देवता और पितरों की योनि ही इस प्रकार की है कि दूर से कही हुई बात दूर से किया हुआ पूजन सत्कार दूर से की हुई अर्चा स्तुति तथा भूत भविष्य और वर्तमान की सारी बातों को वे जान लेते है !!और वही पहुंच जाते हैं !!उनका शरीर केवल 9 तत्त्वों (पांच तन्मात्रा चार अन्तःकरण ) का बना होता है !दसवां जीव होता है !इसलिए उन्हें स्थूल उपभोगों की आवश्यकता नही होती !! करंधम ने कहा "यह बात तो तब मानी जाए जब पितर लोग यहां भूलोक में हो ,परंतु जिन मृतक पितरों के लिए यहां श्राद्ध किया जाता है वे तो अपने कर्मानुसार स्वर्ग या नर्क में चले जाते है !दूसरी बात जो शास्त्रों में यह कहा गया है कि पितर लोग प्रसन्न होकर मनुष्यों को आयु प्रज्ञा धन विधा राज्य स्वर्ग या मोक्ष प्रदान करते है यह भी संभव नही है,क्यों कि जब वह खुद कर्मबन्धन में पड़कर नरक में है तब दुसरो के लिए कुछ कैसे करेंगे ???? महाकाल ने कहा ठीक है किंतु देवता असुर यक्ष आदि के तीन अमूर्त तथा चारो वर्णों के चार मूर्त ये सात प्रकार के पितर माने गए हैं !ये नित्य पितर है ये कर्मो के अधीन नही है ये सब कुछ देने में समर्थ है !इन नित्य पितरो के अत्यंत प्रबल 21 गण है !वे तृप्त होकर श्राद्धकर्ता के पितरो को वे चाहे कहीं भी हों तृप्त करते है !! करंधम ने कहा महाराज !यह बात तो समझ में आ गई किन्तु फिर भी एक संदेह है भुत्प्रेतादि के लिए जैसे एकत्रित बलि दी जाती है वैसे ही एकत्र देवता के लिए क्यों नही दी जाती ???? देवता पितर अग्नि इनको अलग अलग नाम लेकर देने में बड़ा झंझट है !तथा विस्तार से कष्ट भी होता है ! महाकाल ने कहा सभी के विभिन्न नियम हैं घर के दरवाजे पर बैठने बाले कुत्ते को जिस प्रकार खाने को दिया जाता है क्या उसी प्रकार एक विशिष्ठ सम्मानित व्यक्ति को भी दिया जाए ??? और क्या वह उसी प्रकार दिए जाने पर स्वीकार करेगा ?? अतः जिस प्रकार भूतादि को दिया जाता है उसी प्रकार देवताओं को देने पर वे उसे स्वीकार नही करेंगे!! विना श्रद्धा के दिया हुआ चाहे कितना भी पवित्र तथा बहुमूल्य क्यों न हो वे उसे कदापि नही लेते !! श्रद्धा पूर्वक पवित्र पदार्थ भी देवता बिना मंत्र के स्वीकार नही करते !! करंधम ने कहा मैं अब यह जानना चाहता हूं कि जो दान दिया जाता है वह कुश तिल और अक्षत के साथ क्यों दिया जाता है !??? महाकाल ने कहा पहिले भूमि पर जो दान दिए जाते थे उन्हें असुर लोग बीच में घुसकर ले लेते थे देवता और पितर मुंह देखते ही राह जाते थे !आखिर पितरों ने ब्रह्माजी से शिकायत की ! ब्रह्माजी ने कहा कि पितरो को दिए गए पदार्थों के साथ तिल कुश जल अक्षत और यव(जौ) देवताओं को दिया जाए उसके साथ अक्षत जौ जल कुश का प्रयोग हो ऐसा करने पर असुर इन्हें नही ले सकेंगे !! इसलिए ये प्रथा है। 🍁💦🙏Զเधे👣Զเधे🙏🏻💦🍁 *☘🌷!! हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे !!💖* *☘💞हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे !!🌹💐* ÷सदैव जपिए एवँ प्रसन्न रहिए÷

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🔔 श्रील सच्चिदानंद भक्ति विनोद ठाकुर जी के आविर्भाव दिवस पर विशेष.... श्रीरूप मंजरी की अनुगत कमल मंजरी ही श्रीभक्तिविनोद ठाकुर जी के रूप में अवतरित हुई है। श्रील नरोत्तम ठाकुर जी आदि कई अन्य वैष्णावों के अप्रकट हो जाने के बाद गौड़ीय जगत में अंधकार छा गया था । श्रीचैतन्य महाप्रभु जी के विशुद्ध प्रेमधर्म के तात्पर्य को समझने में असमर्थ होने के कारण बहुत से अपसम्प्रदायों का जन्म हो गया था । बंगाल के शिक्षित , प्रतिष्ठित व्यक्ति इन सम्प्रदायों के घृणित आचरण देखकर श्रीमन् महाप्रभु जी के प्रेम धर्म को अनपढ़, नीच जाति और चरित्रहीन व्यक्तियों का धर्म समझकर उसके प्रति श्रद्धा खो बैठे थे। जीवों की इस दुरावस्था को देखकर श्रीमन् महाप्रभु जी का हृदय दया से भर गया और उन्होंने जीवों के मंगल के लिए अपने निजजन श्रील भक्ति विनोद ठाकुर जी को इस जगत में भेजा । पृथ्वी ते यत आछे देश - ग्राम । सर्वत्र संचार हई वेक मोर नाम ।। ..........ठाकुर श्रीभक्ति विनोद जी ने श्रीमन् महाप्रभु जी की इस वाणी की सार्थक किया । मानव जाति का सर्वोत्तम पारमार्थिक कल्याण करने में श्रीभक्ति विनोद ठाकुर जा का अवदान अतुलनीय है। आज उनकी इस तिथि पर उनके चरणों में दंडवत् प्रणाम करते हुए उनकी कृपा प्रार्थना करते हैं।

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*एक बार भगवान विष्णुजी शेषनाग पर बैठे-बैठे बोर हो गये और उन्होनें धरती पर घूमने का विचार मन में किया , वैेसे भी कई साल बीत गये थे धरती पर आये और वह अपनी यात्रा की तैयारी में लग गये - स्वामी को तैयार होता देख कर लक्ष्मी मां ने पूछा !* *आज सुबह सुबह कहा जाने की तैयारी हो रही है ? विष्णु जी ने कहा : हे लक्ष्मी मैं धरती लोक पर घूमने जा रहा हूं तो कुछ सोच कर लक्ष्मी मां ने कहा ! हे देव क्या मैं भी आप के साथ चल सकती हूं ?भगवान विष्णु ने दो पल सोचा , फ़िर कहा एक शर्त पर , तुम मेरे साथ चल सकती हो तुम धरती पर पहुच कर उत्तर दिशा की ओर बिलकुल मत देखना , इसके साथ ही माता लक्ष्मी ने हां कह के अपनी मनवाली और सुबह-सुबह मां लक्ष्मी ओर भगवान विष्णु धरती पर पहुच गये । अभी सुर्य देवता निकल रहे थे , रात बरसात हो कर हटी थी, चारों ओर हरियाली ही हरियाली थी , उस समय चारों ओर बहुत शान्ति थी और धरती बहुत ही सुन्दर दिख रही थी । मां लक्ष्मी मन्त्रमुग्ध हो कर धरती को देख रही थीं और भुल गईं कि पति को क्या वचन दे कर आई है ? और चारों ओर देखती हुयी कब उत्तर दिशा की ओर देखने लगी पता ही नहीं चला ।* *उत्तर दिशा मै मां लक्ष्मी को एक बहुत ही सुन्दर बगीचा नजर आया और उस तरफ़ से भीनी -भीनी खुशबु आ रही थी और बहुत ही सुन्दर सुन्दर फ़ुल खिले थे । यह एक फ़ूलों का खेत था । मां लक्ष्मी बिना सोचे-समझे उस खेत में गईं ओर एक सुंदर सा फ़ुल तोड़ लाई , लेकिन यह क्या जब मां लक्ष्मी भगवान विष्णु के पास वापिस आई तो भगवान विष्णु की आंखों में आंसु थे और भगवान विष्णु ने मां लक्ष्मी को कहा कि कभी भी किसी से बिना पूछे उस का कुछ भी नही लेना चाहिये और साथ ही अपना वचन भी याद दिलाया ।* *मां लक्ष्मी को अपनी भूल का पता चला तो उन्होंने भगवान विष्णु से इस भूल की माफ़ी मांगी तो भगवान विष्णु ने कहा कि तुमने जो भूल की है उसकी सजा तो तुम्हें जरुर मिलेगी ? जिस माली के खेत से तुमने बिना पुछे फ़ूल तोड़ा है - यह एक प्रकार की चोरी है । इसलिये अब तुम तीन साल तक माली के घर नौकर बन कर रहॊ , उस के बाद मै तुम्हें बैकुण्ठ में वपिस बुलाऊंगा, मां लक्ष्मी ने चुपचाप सर झुका कर हां कर दी ।* *और मां लक्ष्मी एक गरीब औरत का रुप धारण करके उस खेत के मालिक के घर गई , घर क्या एक झोपड़ा था और मालिक का नाम माधव था । माधब की बीबी, दो बेटे ओर तीन बेटियां थी , सभी उस छोटे से खेत में काम करके किसी तरह से गुजारा करते थे ।* *मां लक्ष्मी एक साधारण और गरीब औरत बन कर जब माधव के झोपड़े पर गई तो माधव ने पुछा - बहिन तुम कौन हो और इस समय तुम्हे क्या चाहिये ? तब मां लक्ष्मी ने कहा ,मैं एक गरीब औरत हूं , मेरी देखभाल करने वाला कोई नहीं - मैने कई दिनों से खाना भी नहीं खाया , मुझे कोई भी काम दे दॊ , साथ में मैं तुम्हारे घर का काम भी कर दिया करुंगी । बस मुझे अपने घर के एक कोने में आसरा दे दो ? माधाव बहुत ही अच्छे दिल का मालिक था, उसे दया आ गई लेकिन उसने कहा, बहिन मैं तो बहुत ही गरीब हूं , मेरी कमाई से मेरे घर का खर्च मुश्किल से चलता है लेकिन अगर मेरी तीन की जगह चार बेटियां होती तो भी मैंने गुजारा करना था । अगर तुम मेरी बेटी बन कर जैसा रुखा-सूखा हम खाते हैं उसमें खुश रह सकती हो तो बेटी अन्दर आ जाओ ।* *माधव ने मां लक्ष्मी को अपने झोपडे में शरण दे दी और मां लक्ष्मी तीन साल उस माधव के घर पर नोकरानी बन कर रही ; जिस दिन मां लक्ष्मी माधव के घर आई थी उसके दूसरे दिन ही माधव को इतनी आमदनी हुयी फ़ुलों से कि शाम को एक गाय खरीद ली , फ़िर धीरे-धीरे माधव ने काफ़ी जमीन खरीद ली और सबने अच्छे-अच्छे कपड़े भी बनवा लिये और फ़िर एक बड़ा पक्का घर भी बनवा लिया । बेटियों और बीबी ने गहने भी बनबा लिये ।* *माधव हमेशा सोचता था कि मुझे यह सब इस महिला के आने के बाद मिला है , इस बेटी के रुप में मेरी किस्मत आ गई है और अब ३ साल बीत गये थे लेकिन मां लक्ष्मी अब भी घर में और खेत पर काम करती थीं । एक दिन माधव जब अपने खेतों से काम खत्म करके घर आया तो उसने अपने घर के सामने द्वार पर एक देवी स्वरुप गहनों से लदी औरत को देखा , ध्यान से देखकर पहचान गया । अरे यह तो मेरी मुहबोली चौथी बेटी यानि वही औरत है और पहचान गया कि यह तो मां लक्ष्मी हैं । अब तक माधव का पुरा परिवार बाहर आ गया था और सब हैरान हो कर मां लक्ष्मी को देख रहै थे । माधव बोला - है मां ! हमें माफ़ कर दें -हमने आपसे अंजाने में ही घर और खेत में काम करवाया । हे मां ! यह कैसा अपराध हो गया ?* *अब मां लक्ष्मी मुस्कुराई और बोलीं - हे माधव तुम बहुत ही अच्छे ओर दयालु व्यक्ति हो , तुमने मुझे रखा , इसके बदले मैं तुम्हें वरदान देती हूं कि तुम्हारे पास कभी भी खुशियों की और धन की कमी नहीं रहेगी , तुम्हें सारे सुख मिलेंगे जिसके तुम हकदार हो और फ़िर मां अपने स्वामी के द्वारा भेजे रथ में बैठ कर बैकुण्ठ चली गईं ।* *कथा का मर्म* *जो लोग दयालु और साफ़ दिल के होते हैं वही मां लक्ष्मी निवास करती हैं , हमें सभी मानवों की मदद करनी चाहिये और गरीब से गरीब को भी तुच्छ नहीं समझना चाहिये...

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केशवी 9- 10 साल की एक बहुत ही सरल स्वभाव वाली लड़की थी। उसके पिताजी जुलाहा थे उसकी मां लोगों के घरों में काम करती थी। केशवी का एक 2 साल का भाई भी था। केशवी के पिता और माता जो भी कमाई करते उससे घर का गुजारा जैसे तैसे हो जाता था ।केशवी को पढ़ने के लिए नदी पार करके दूसरे गांव के स्कूल में रोज जाना पढ़ता था ।केशवी की मां उसको रोज चार रोटी बनाकर स्कूल के लिए दे देती थी। क्योंकि केशवी सुबह जाती और शाम को वापस आती थी क्योंकि उसका स्कूल नदी पार होने से दूर पड़ता था। एक दिन ठाकुर जी ने सोचा कि चलो धरती पर चल कर देखा जाए कि कितनी लोगों में दया रह गई है तो ठाकुर जी ने एक बूढ़े भिखारी का रूप धारण करके सड़क के किनारे बैठ गए। केशवी भी हर रोज वहां से स्कूल के लिए जाती थी बूढ़े भिखारी बने ठाकुर जी हर आने-जाने वाले से कह रहे थे बाबा कुछ खाने को दे दो मैं बहुत दिनों से भूखा हूं। लेकिन लोग जो थे बूढ़े भिखारी को नफरत की दृष्टि से देख कर अपना मुंह उधर कर देते। लेकिन जब केशवी बूढ़े भिखारी के पास से गुजरी तो उसने जब बूढ़े भिखारी की आवाज सुनी तो वह जल्दी-जल्दी उनके पास कई और बोली बाबा क्या भूख लगी है ?तो बाबा ने हां में गर्दन हिला दी। केशवी ने अपने स्कूल में ले जाने वाले झोले में से चार रोटी निकाली और उसमें से एक रोटी बाबा को दे दी ।और साथ में रोटी के ऊपर जो मां ने अचार दिया था वह रख दिया ।अभी वह थोड़ी आगे ही गई थी तभी उसने देखा की चौपाल पर बहुत सारे पक्षी इधर उधर भूख से व्याकुल बैठे हुए हैं। उनको कोई भी दाना नहीं डाल रहा था। केशवी को उन पर बहुत दया आई उसने अपने झोले में से एक रोटी निकाल ली और उसके छोटे छोटे टुकड़े करके पक्षियों को डाल दिया ।अब उसको नदी पार करके नाव में बैठकर अपने स्कूल में जाना था। तभी उसने नदी में देखा की बहुत सारी मछलियां भूख से व्याकुल बार बार पानी के ऊपर आ रही हैं। केशवी को अब मछलियों के ऊपर भी बहुत दया आई तो उसने फिर अपनी झोली में से एक रोटी निकालकर छोटे-छोटे टुकड़े करके उन मछलियों को डाल दी। अब उसके पास केवल एक ही रोटी बची थी ।उसने बिना किसी चिंता से एक रोटी से ही सारा दिन का गुजारा किया ।अगले दिन फिर केशवी की मां ने उसके लिए चार रोटी बनाई फिर ऐसे ही उसने एक रोटी बूढ़े भिखारी को दे दी ,एक रोटी पक्षियों को डाल दी अभी नदी का किनारा दूर था तभी केशवी को लगा कि जैसे उसके पीछे पीछे कोई आ रहा है लेकिन जब उसने पीछे मुड़कर देखा तो कोई नहीं था ।अब केशवी नाव तक पहुंच गई थी। नाव में बैठकर उसने एक रोटी मछलियों को डाली ।नाव में बैठे बैठे भी उसको लगा कि उसके पास जैसे कोई बैठा हुआ है। लेकिन था कोई नहीं। अब केशवी स्कूल पहुंच चुकी थी। स्कूल से फिर वह वापस आई। अगले दिन भी उसने ऐसा ही किया एक रोटी भिखारी को एक रोटी पक्षियों को और एक रोटी मछलियों को डालकर एक रोटी खुद खा ली ।उसको अभी ऐसे लगता था कि जैसे उसके पीछे पीछे कोई चल रहा है अब उसको किसी के साथ साथ चलने की आहट भी सुनाई देती थी और साथ में किसी के सांस लेने की भी आवाज सुनाई देती थी। लेकिन केशवी जब इधर-उधर देखती तो उसको कोई दिखाई नहीं देता था। फिर केशवी ने देखा कि अब उसको एक आकृति सी बनी हुई उसके साथ साथ चलती दिखाई दे रही थी ।धीरे-धीरे उसको आकृति अब साफ दिखाई देने लगी थी। उसने देखा कि उसकी उम्र का एक बहुत ही सुंदर बालक उसके साथ साथ चल रहा है ।केशवी उसको देखकर हैरान हो गई और कहने लगी तुम कौन हो। तो उस बालक ने कहा अगर तुम केशवी हो तो मेरा नाम केशव है ! तुम बहुत ही दयावान हो ।मैं तुम्हें हर रोज यहां बूढ़े भिखारी पक्षियों और मछलियों की सेवा करते देखता हूं ।और जो इतने दयावान होते हैं मैं केवल उसी को दिखाई देता हूं। केशवी उसकी बातें सुनकर हैरान हो गई कि ऐसा भी कभी हो सकता है। तो केशवी ने कहा तो मैं तुमको क्या कह कर पुकारू ।तो केशव ने कहा कि तुम मुझे अपना सखा ही समझ लो। आज से हम दोनों सखा है। तुम केशवी मैं केशव । केशवी अपने सखा को पाकर बहुत प्रसन्न हुई ।अब हर रोज केशवी और केशव इकट्ठे आते जाते थे ।जब तक केशवी स्कूल में रहती तो केशव उसका बाहर इंतजार करता ।एक दिन बहुत ही गर्मी थी केशवी ने देखा कि केशव तो इतनी तपती दोपहर में नंगे पांव धरती पर चल रहा है तो केशवी व्याकुल हो उठी और उसने केशव को जल्दी जल्दी एक वृक्ष के नीचे बिठाया और अपने झोले में से एक छोटा सा कपड़ा निकाल कर केशव के पांव को साफ करने लगी और कहने लगी तुम कैसे सखा हो तुम मुझे बता नहीं सकते कि तुम्हारे पैरों में डालने के लिए चप्पल नहीं हैं और तुम इतनी गर्मी में धरती पर नंगे पांव चल रहे हो ।आज से तुम मेरी यह चप्पल धारण करो। उसने जल्दी-जल्दी अपने पैर से चप्पल उतारकर केशव के पांव में डाल दी ।और खुद नंगे पैर चलने लगी केशव केशवी की ऐसी भावना को देखकर भावविभोर हो उठे । अगले दिन केशवी के स्कूल में वार्षिक समारोह था और साथ में केशवी की प्रधानाचार्य का जन्मदिन था। तो सब बच्चों ने यह निर्णय किया था कि वह अपने प्रधानाचार्य के लिए कुछ ना कुछ उपहार लाएंगे और स्कूल के वार्षिक समारोह के लिए भी कुछ ना कुछ लाएंगे और केशवी ने वार्षिक समारोह में एक बहुत ही सुंदर नृत्य तैयार किया था। अगले दिन जब केशवी स्कूल के लिए तैयार हुई तो उससे चला ही नहीं जा रहा था क्योंकि तपती दोपहर में धरती पर नंगे पांव चलने से उसके पांव में छाले पड़ गए थे ।अब केशवी से चला नहीं जा रहा था और उसको चिंता सताए जा रही थी कि वह स्कूल में कैसे पहुंचेगी। कैसे नृत्य करेगी। और आज तो उसके मां-बाप के पास उसको देने के लिए कोई उपहार भी नहीं था कि वह अपने प्रधानाचार्य को दे सके। केशवी बहुत उदास थी उसकी आंखों में आंसू बहने लगे ।तभी बाहर से उसको किसी के दरवाजा खटखटाने की आवाज सुनाई दी। केशवी धीरे धीरे कर के दरवाजे को खोलने गई तो उसने देखा कि दरवाजे पर केशव खड़ा है तो उसने केशवी को कहा कि आज स्कूल नहीं जाओगी ।तो केशवी ने उसको बताया कि उसके पांव में छाले पड़े हैं और साथ में मेरी प्रधानाचार्य का आज जन्मदिन है। उसके पास कुछ भी नहीं उन को देने के लिए ।केशव ने कहा तुम चलो तो सही मैं सब इंतजाम कर दूंगा ।और केशवी का हाथ पकड़कर चलने लगा ।केशवी बहुत धीरे धीरे चल रही थी तभी रास्ते में वही बुढा भिखारी केशवी को कहने लगा कि बेटा तेरे पांव में क्या हुआ है तो केशवी ने कहा बाबा मेरे पांव में गर्मी के कारण तपती धरती पर चलने से छाले पड़ गए हैं ।तो बाबा ने जल्दी से उसको अपने पास बुलाया और कहा अरे बेटा मेरे पास बहुत अच्छी मरहम है आओ मैं तुम्हारे पांव पर लगा दूं ।और उन्होंने केशवी के छालो पर मलहम लगा दी ।अब केशवी को मलहम लगाने से कुछ राहत मिली ।अब वह धीरे धीरे चल सकती थी। लेकिन उसने केशव को बोला की वार्षिक समारोह में ले जाने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं है। तो केशव ने कहा चिंता मत करो तभी वह एक वृक्ष के नीचे बैठ गए और उसने देखा अचानक से बहुत से पक्षी उस वृक्ष पर आकर जोर जोर से वृक्ष की डाली को हिला रहे हैं और बहुत सारे वृक्ष के फल वृक्ष से उतर कर नीचे गिर रहे थे तो केशवी ने जल्दी-जल्दी फल इकट्ठा करके अपनी झोली में डाल लिए तो केशव ने कहा कि यह फल तू वार्षिक समारोह में दे देना। अब केशवी और केशव दोनों नाव में बैठकर स्कूल जा रहे थे तभी केशवी को याद आया आज तो प्रधानाचार्य का जन्मदिवस है तो मैं उनको उपहार में क्या दूंगी। तभी जल में रहने वाली मछलियों ने केशवी को उदास देखा तो वह नदी के अंदर गई और वहां से बहुत सारे मोती मुंह में ला -ला कर नाव में फेंकने लगी और साथ-साथ में थोड़ा सा जल भी फेंक देती जैसे उनको पता था कि केशव के रूप में साक्षात ठाकुर जी नाव में विराजमान है और उस जल से वह ठाकुर जी का चरण अभिषेक कर रही थी। बहुत सारे मोती अब केशवी के पास इकट्ठे हो गए तो केशव ने जल्दी-जल्दी अपने पितांबर के कोने में से एक धागा निकाल कर उन मोतियों को धागे में पिरो कर एक बहुत सुंदर माला बनाकर के केशवी को दे दी और कहा यह तुम अपने प्रधानाचार्य को दे देना। केशवी प्रसन्न होकर अब केशव का बहुत ही धन्यवाद कर रही थी। स्कूल में जाते ही केशवी ने अपने झोले में से वह सारे फल अपनी अध्यापिका को दिए और माला जाकर प्रधानाचार्य को दी। मलहम लगाने से केशवी के पांव बिल्कुल ठीक थे जब केशवी का नृत्य करने का समय आया तो दूसरे कई स्कूलों के अध्यापक स्कूल में वार्षिक समारोह में आए हुए थे केशवी ने इतना सुंदर नृत्य किया कि सब लोग खूब सारी तालियां बजाने लगे ।और उसको स्कूल की प्रधानाचार्य ने इनाम के रूप में ₹500 इनाम में दिए। केशवी इनाम को पाकर बहुत खुश हुई ।जब केशव और केशवी घर वापस आ रहे तो केशव ने पूछा कि तुम इन पैसों का क्या करोगी तो केशवी ने कहा कि मैं सबसे पहले वह बूढ़े भिखारी के लिए एक बहुत सुंदर धोती कुर्ता लूंगी और चौपाल में बैठे हुए पशु पक्षियों के लिए बहुत सारा दाना लूंगी क्योंकि एक रोटी से उन सब का पेट नहीं भरता होगा और मछलियों के लिए भी बहुत सारा खाना लेकर आऊंगी क्योंकि एक रोटी से उनका भी पेट नहीं भरता होगा। केशव केशवी की इस दयालुता को देखकर बहुत प्रसन्न हुए ।जिसके आगे सारी दुनिया नतमस्तक होती हैं आज वह केशवी के आगे नतमस्तक हो गए थे ।और कहने लगे तुमसे ज्यादा दयालु बच्चा मैंने कहीं नहीं देखा। जिसने जल थल और आकाश तीनों लोको पर उपकार किया है जैसे कि आकाश में उड़ने वाले पक्षियों को तूने दाना डाला, धरती पर बूढ़े भिखारी को रोटी दी, जल में रहने वाले मछलियों को तूने अपनी रोटी दी इससे बड़ी दयालुता ओर क्या होगी कि तुम खुद भूखी रही और उनका पेट भरा। अब केशवी अपने घर जा चुकी थी और ठाकुर जी की कृपा से आज उसके घर अन्न और धन की कोई कमी न थी ।क्योंकि ठाकुर जी तो धरती पर आए ही थे देखने की धरती पर कितनी दया बची है और केशवी से ज्यादा दयावान धरती पर ओर कोई नहीं था क्योंकि केशवी बिना किसी स्वार्थ के लोगों पर उपकार कर रही थी ।और बिना स्वार्थ के किसी पर उपकार करना भी एक तरह की भक्ति ही है और हमें भी ऐसी ही भक्ति करनी चाहिए ना की दिखावे की .. कि लोगों को दिखाएं कि हमने इतना चढ़ावा चढ़ाया है इतना दान किया है इतने लंगर लगाए हैं। ऐसे लोगों पर भगवान कृपा नहीं करते बल्कि केशवी जैसे लोगों पर खूब कृपा करते हैं। जो निस्वार्थ भावना से लोगों पर उपकार करते हैं ।ठाकुर जी को ऐसी भक्ति बहुत प्रिय है उनकी कृपा दृष्टि हमेशा ऐसे ही भक्तों पर रहती है !!

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*संत की वाणी* • किसी नगर में एक बूढ़ा चोर रहता था। सोलह वर्षीय उसका एक लड़का भी था। चोर जब ज्यादा बूढ़ा हो गया तो अपने बेटे को चोरी की विद्या सिखाने लगा। कुछ ही दिनों में वह लड़का चोरी विद्या में प्रवीण हो गया! दोनों बाप बेटा आराम से जीवन व्यतीत करने लगे! • एक दिन चोर ने अपने बेटे से कहा-- ”देखो बेटा, साधु-संतों की बात कभी नहीं सुननी चाहिए। अगर कहीं कोई महात्मा उपदेश देता हो तो अपने कानों में उंगली डालकर वहां से भाग जाना, समझे! • ”हां बापू, समझ गया!“ एक दिन लड़के ने सोचा, क्यों न आज राजा के घर पर ही हाथ साफ कर दूं। ऐसा सोचकर उधर ही चल पड़ा। थोड़ी दूर जाने के बाद उसने देखा कि रास्ते में बगल में कुछ लोग एकत्र होकर खड़े हैं। उसने एक आते हुए व्यक्ति से पूछा,-- ”उस स्थान पर इतने लोग क्यों एकत्र हुए हैं?“ • उस आदमी ने उत्तर दिया-- ”वहां एक महात्मा उपदेश दे रहे हैं!“ • यह सुनकर उसका माथा ठनका। ‘इसका उपदेश नहीं सुनूंगा ऐसा सोचकर अपने कानों में उंगली डालकर वह वहां से भाग निकला! • जैसे ही वह भीड़ के निकट पहुंचा एक पत्थर से ठोकर लगी और वह गिर गया। उस समय महात्मा जी कह रहे थे, ”कभी झूठ नहीं बोलना चाहिए। जिसका नमक खाएं उसका कभी बुरा नहीं सोचना चाहिए। ऐसा करने वाले को भगवान सदा सुखी बनाए रखते हैं!“ • ये दो बातें उसके कान में पड़ीं। वह झटपट उठा और कान बंद कर राजा के महल की ओर चल दिया। वहां पहुंचकर जैसे ही अंदर जाना चाहा कि उसे वहां बैठे पहरेदार ने टोका,-- ”अरे कहां जाते हो? तुम कौन हो?“ • उसे महात्मा का उपदेश याद आया, ‘झूठ नहीं बोलना चाहिए।’ चोर ने सोचा, आज सच ही बोल कर देखें। उसने उत्तर दिया-- ”मैं चोर हूं, चोरी करने जा रहा हूं!“ • ”अच्छा जाओ।“ उसने सोचा राजमहल का नौकर होगा! मजाक कर रहा है। चोर सच बोलकर राजमहल में प्रवेश कर गया। एक कमरे में घुसा। वहां ढेर सारा पैसा तथा जेवर देख उसका मन खुशी से भर गया! • एक थैले में सब धन भर लिया और दूसरे कमरे में घुसा! वहां रसोई घर था। अनेक प्रकार का भोजन वहां रखा था। वह खाना खाने लगा! • खाना खाने के बाद वह थैला उठाकर चलने लगा कि तभी फिर महात्मा का उपदेश याद आया, ‘जिसका नमक खाओ, उसका बुरा मत सोचो।’ उसने अपने मन में कहा, ‘खाना खाया उसमें नमक भी था। इसका बुरा नहीं सोचना चाहिए।’ इतना सोचकर, थैला वहीं रख वह वापस चल पड़ा! • पहरेदार ने फिर पूछा-- ”क्या हुआ, चोरी क्यों नहीं की?“ • देखिए जिसका नमक खाया है, उसका बुरा नहीं सोचना चाहिए। मैंने राजा का नमक खाया है, इसलिए चोरी का माल नहीं लाया। वहीं रसोई घर में छोड़ आया!“ इतना कहकर वह वहां से चल पड़ा! • उधर रसोइए ने शोर मचाया-- ”पकड़ो, पकड़ों चोर भागा जा रहा है!“ पहरेदार ने चोर को पकड़कर दरबार में उपस्थित किया! • राजा के पूछने पर उसने बताया कि एक महात्मा के द्धारा दिए गए उपदेश के मुताबिक मैंने पहरेदार के पूछने पर अपने को चोर बताया क्योंकि मैं चोरी करने आया था! • आपका धन चुराया लेकिन आपका खाना भी खाया, जिसमें नमक मिला था। इसीलिए आपके प्रति बुरा व्यवहार नहीं किया और धन छोड़कर भागा। • उसके उत्तर पर राजा बहुत खुश हुआ और उसे अपने दरबार में नौकरी दे दी! • वह दो-चार दिन घर नहीं गया तो उसके बाप को चिंता हुई कि बेटा पकड़ लिया गया- लेकिन चार दिन के बाद लड़का आया तो बाप अचंभित रह गया अपने बेटे को अच्छे वस्त्रों में देखकर! • लड़का बोला-- ”बापू जी, आप तो कहते थे कि किसी साधु संत की बात मत सुनो! लेकिन मैंने एक महात्मा के दो शब्द सुने और उसी के मुताबिक काम किया तो देखिए सच्चाई का फल! • *सच्चे संत की वाणी में अमृत बरसता है, आवश्यकता आचरण में उतारने की है ....!!* 🇲🇰

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