🌼☀️🌼☀️🌼☀️🌼 🌼अपने भीतर के🔥प्रकाश को देखो🌼 एक गुरूजी लंबे समय से अचेतावस्था में थे। एक दिन अचानक उन्हें होश आया तो उन्होंने अपने प्रिय शिष्य को अपने नजदीक बैठे हुए पाया। 🌼🌼 उन्होंने प्रेमपूर्वक कहा - "तुम इतने समय तक मेरे बिस्तर के नजदीक ही बैठे रहे और मुझे अकेला नहीं छोड़ा?" 🌼🌼 शिष्य ने रुंधे हुए गले से कहा - "गुरूदेव मैं ऐसा कर ही नहीं सकता कि आपको अकेला छोड़ दूं।" 🌼🌼 गुरूजी - "ऐसा क्यों?" 🌼🌼 "क्योंकि आप ही मेरे जीवन के प्रकाशपुंज हैं।" 🌼🌼 गुरूजी ने उदास से स्वर में कहा - "क्या मैंने तुम्हें इतना चकाचौंध कर दिया है कि तुम अपने भीतर के प्रकाश को नहीं देख पा रहे हो?" 🌼जय राधा कान्हा🌼राधा सखी👸 🌼☀️🌼☀️🌼☀️🌼

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🌿🌸 अति महत्वपूर्ण बातें 🌸🌿 🌸1. घर में सेवा पूजा करने वाले जन भगवान के एक से अधिक स्वरूप की सेवा पूजा कर सकते हैं । 🌸2. घर में दो शिवलिंग की पूजा ना करें तथा पूजा स्थान पर तीन गणेश जी नहीं रखें। 🌸3. शालिग्राम जी की बटिया जितनी छोटी हो उतनी ज्यादा फलदायक है। 🌸4. कुशा पवित्री के अभाव में स्वर्ण की अंगूठी धारण करके भी देव कार्य सम्पन्न किया जा सकता है। 🌸5. मंगल कार्यो में कुमकुम का तिलक प्रशस्त माना जाता हैं। 🌸6. पूजा में टूटे हुए अक्षत के टूकड़े नहीं चढ़ाना चाहिए। 🌸7. पानी, दूध, दही, घी आदि में अंगुली नही डालना चाहिए। इन्हें लोटा, चम्मच आदि से लेना चाहिए क्योंकि नख स्पर्श से वस्तु अपवित्र हो जाती है अतः यह वस्तुएँ देव पूजा के योग्य नहीं रहती हैं। 🌸8. तांबे के बरतन में दूध, दही या पंचामृत आदि नहीं डालना चाहिए क्योंकि वह मदिरा समान हो जाते हैं। 🌸9. आचमन तीन बार करने का विधान हैं। इससे त्रिदेव ब्रह्मा-विष्णु-महेश प्रसन्न होते हैं। 🌸10. दाहिने कान का स्पर्श करने पर भी आचमन के तुल्य माना जाता है। 🌸11. कुशा के अग्रभाग से दवताओं पर जल नहीं छिड़के। 🌸12. देवताओं को अंगूठे से नहीं मले। 🌸13. चकले पर से चंदन कभी नहीं लगावें। उसे छोटी कटोरी या बांयी हथेली पर रखकर लगावें। 🌸15. पुष्पों को बाल्टी, लोटा, जल में डालकर फिर निकालकर नहीं चढ़ाना चाहिए। 🌸16. श्री भगवान के चरणों की चार बार, नाभि की दो बार, मुख की एक बार या तीन बार आरती उतारकर समस्त अंगों की सात बार आरती उतारें। 🌸17. श्री भगवान की आरती समयानुसार जो घंटा, नगारा, झांझर, थाली, घड़ावल, शंख इत्यादि बजते हैं उनकी ध्वनि से आसपास के वायुमण्डल के कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। नाद ब्रह्मा होता हैं। नाद के समय एक स्वर से जो प्रतिध्वनि होती हैं उसमे असीम शक्ति होती हैं। 🌸18. लोहे के पात्र से श्री भगवान को नैवेद्य अपर्ण नहीं करें। 🌸19. हवन में अग्नि प्रज्वलित होने पर ही आहुति दें। 🌸20. समिधा अंगुठे से अधिक मोटी नहीं होनी चाहिए तथा दस अंगुल लम्बी होनी चाहिए। 🌸21. छाल रहित या कीड़े लगी हुई समिधा यज्ञ-कार्य में वर्जित हैं। 🌸22. पंखे आदि से कभी हवन की अग्नि प्रज्वलित नहीं करें। 🌸23. मेरूहीन माला या मेरू का लंघन करके माला नहीं जपनी चाहिए। 🌸24. माला, रूद्राक्ष, तुलसी एवं चंदन की उत्तम मानी गई हैं। 🌸25. माला को अनामिका (तीसरी अंगुली) पर रखकर मध्यमा (दूसरी अंगुली) से चलाना चाहिए। 🌸26.जप करते समय सिर पर हाथ या वस्त्र नहीं रखें। 🌸27. तिलक कराते समय सिर पर हाथ या वस्त्र रखना चाहिए। 🌸28. माला का पूजन करके ही जप करना चाहिए। 🌸29. ब्राह्मण को या द्विजाती को स्नान करके तिलक अवश्य लगाना चाहिए। 🌸30. जप करते हुए जल में स्थित व्यक्ति, दौड़ते हुए, शमशान से लौटते हुए व्यक्ति को नमस्कार करना वर्जित हैं। 🌸31. बिना नमस्कार किए आशीर्वाद देना वर्जित हैं। 🌸32. एक हाथ से प्रणाम नही करना चाहिए। 🌸33. सोए हुए व्यक्ति का चरण स्पर्श नहीं करना चाहिए। 🌸34. बड़ों को प्रणाम करते समय उनके दाहिने पैर पर दाहिने हाथ से और उनके बांये पैर को बांये हाथ से छूकर प्रणाम करें। 🌸35. जप करते समय जीभ या होंठ को नहीं हिलाना चाहिए। इसे उपांशु जप कहते हैं। इसका फल सौगुणा फलदायक होता हैं। 🌸36. जप करते समय दाहिने हाथ को कपड़े या गौमुखी से ढककर रखना चाहिए। 🌸37. जप के बाद आसन के नीचे की भूमि को स्पर्श कर नेत्रों से लगाना चाहिए। 🌸38. संक्रान्ति, द्वादशी, अमावस्या, पूर्णिमा, रविवार और सन्ध्या के समय तुलसी तोड़ना निषिद्ध हैं। 🌸39. दीपक से दीपक को नही जलाना चाहिए। 🌸40. यज्ञ, श्राद्ध आदि में काले तिल का प्रयोग करना चाहिए, सफेद तिल का नहीं। 🌸41. शनिवार को पीपल पर जल चढ़ाना चाहिए। पीपल की सात परिक्रमा करनी चाहिए। परिक्रमा करना श्रेष्ठ है, किन्तु रविवार को परिक्रमा नहीं करनी चाहिए। 🌸42. कूमड़ा-मतीरा-नारियल आदि को स्त्रियां नहीं तोड़े या चाकू आदि से नहीं काटें। यह उत्तम नही माना गया हैं। 🌸43. भोजन प्रसाद को लाघंना नहीं चाहिए। 🌸44. देव प्रतिमा देखकर अवश्य प्रणाम करें। 🌸45. किसी को भी कोई वस्तु या दान-दक्षिणा दाहिने हाथ से देना चाहिए। 🌸46. एकादशी, अमावस्या, कृृष्ण चतुर्दशी, पूर्णिमा व्रत तथा श्राद्ध के दिन क्षौर-कर्म (दाढ़ी) नहीं बनाना चाहिए । 🌸47. बिना यज्ञोपवित या शिखा बंधन के जो भी कार्य, कर्म किया जाता है, वह निष्फल हो जाता हैं। 🌸48. यदि शिखा नहीं हो तो स्थान को स्पर्श कर लेना चाहिए। 🌸49. शिवजी की जलहारी उत्तराभिमुख रखें । 🌸50. शंकर जी को बिल्वपत्र, विष्णु जी को तुलसी, गणेश जी को दूर्वा, लक्ष्मी जी को कमल प्रिय हैं। 🌸51. शंकर जी को शिवरात्रि के सिवाय कुंुकुम नहीं चढ़ती। 🌸52. शिवजी को कुंद, विष्णु जी को धतूरा, देवी जी को आक तथा मदार और सूर्य भगवानको तगर के फूल नहीं चढ़ावे। 🌸53 .अक्षत देवताओं को तीन बार तथा पितरों को एक बार धोकर चढ़ावंे। 🌸54. नये बिल्व पत्र नहीं मिले तो चढ़ाये हुए बिल्व पत्र धोकर फिर चढ़ाए जा सकते हैं। 🌸55. विष्णु भगवान को चांवल, गणेश जी को तुलसी, दुर्गा जी और सूर्य नारायण को बिल्व पत्र नहीं चढ़ावें। 🌸56. पत्र-पुष्प-फल का मुख नीचे करके नहीं चढ़ावें, जैसे उत्पन्न होते हों वैसे ही चढ़ावें। 🌸57. किंतु बिल्वपत्र उलटा करके डंडी तोड़कर शंकर पर चढ़ावें। 🌸58. पान की डंडी का अग्रभाग तोड़कर चढ़ावें। 🌸59. सड़ा हुआ पान या पुष्प नहीं चढ़ावे। 🌸60. गणेश को तुलसी भाद्र शुक्ल चतुर्थी को चढ़ती हैं। 🌸61. पांच रात्रि तक कमल का फूल बासी नहीं होता है। 🌸62. दस रात्रि तक तुलसी पत्र बासी नहीं होते हैं। 🌸63. सभी धार्मिक कार्यो में पत्नी को दाहिने भाग में बिठाकर धार्मिक क्रियाएं सम्पन्न करनी चाहिए। 🌸64. पूजन करनेवाला ललाट पर तिलक लगाकर ही पूजा करें। 🌸65. पूर्वाभिमुख बैठकर अपने बांयी ओर घंटा, धूप तथा दाहिनी ओर शंख, जलपात्र एवं पूजन सामग्

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*जै श्री कृष्ण+* *अपेक्षा ही दुःख का कारण !* किसी दिन एक मटका और गुलदस्ता साथ में खरीदा हों और घर में लाते ही ५० रूपये का मटका अगर फूट जाएं तो हमें इस बात का दुःख होता हैं। क्योंकि मटका इतनी जल्दी फूट जायेगा ऐसी हमें कल्पना भी नहीं थीं। परंतु गुलदस्ते के फूल जो २०० रूपये के हैं, वो शाम तक मुर्झा जाएं, तो भी हम दुःखी नहीं होते। क्योंकि ऐसा होने वाला ही हैं, यह हमें पता ही था। मटके की इतनी जल्दी फूटने की हमें अपेक्षा ही नहीं थीं, तो फूटने पर दुःख का कारण बना। परंतु​ फूलों से अपेक्षा नहीं थीं, इसलिए​ वे दुःख का कारण नहीं बनें। इसका मतलब साफ़ हैं कि जिसके लिए जितनी अपेक्षा ज़्यादा, उसकी तरफ़ से उतना दुःख ज़्यादा और जिसके लिए जितनी अपेक्षा कम, उसके लिए उतना ही दुःख भी कम। *होशपूर्वक विचार पे विचार*

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#एक_यशोदा_कलियुग_की🌿🌹🌿 . बात केवल ढाई सौ वर्ष पुरानी है। मधुपुर नामक गांव में एक ब्राह्मण-दम्पत्ति नारायणकान्त और रत्नेश्वरी रहते थे। . वे वास्तविक अर्थ में ब्राह्मण थे, सादा, सुखी और संतोषी जीवन। . नारायणकान्त अध्यापन का कार्य करते और रत्नेश्वरी अपने आंगन में लगे कपास के पौधों से रुई कातकर गांव भर के यजमानों के लिए जनेऊ बनाती रहती और मन-ही-मन बुदबुदाती रहती... मेरो मन रामहि राम रटै रे। राम नाम जप लीजै मनुआं कोटिक पाप कटै रे।। . पूर्ण संतोषी जीवन होने पर भी संतान न होने से ब्राह्मणी का हृदय हाहाकार करता रहता। . अंत में भगवान् वैद्यनाथ की शरण लेने पर उन्हें विलक्षण गुणों से सम्पन्न एक कन्या पैदा हुई, नाम रखा लीलावती। . दुर्लभ हैं वे लोग जो अपनी संतान के लिए भगवद्भक्ति रूपी सम्पत्ति छोड़ते हैं . नारायणकान्त और रत्नेश्वरी का अपनी पुत्री से प्रेम भगवान् की भक्ति से लबालब भरा था। इसी कारण लीलावती की जीवनधारा भी सहज ही भक्ति की ओर मुड़ती गयी। . नारायणकान्त जब पूजा में बैठे होते तो वह बालिका चुपचाप उनके शालग्राम को निहारा करती। लीलावती को सबसे मीठी और प्यारी लगती मां के द्वारा ब्राह्ममुहुर्त में गायी गई नाम-धुन... राधाकृष्ण जय कुंजबिहारी। मुरलीधर गोवर्धनधारी।। श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। हे नाथ नारायण वासुदेव।। . प्रतिदिन सुनने से लीलावती को भी यह नाम-धुन याद हो गयी और वह अपनी तोतली बोली में इसे गाती रहती। . संध्या समय जब मां तुलसीमहारानी को दीप दिखाने जातीं तो वह घुटनों के बल तुलसी चौबारे में पहुंच जाती और मां का आंचल पकड़कर खड़ी हो जाती और स्वयं चौबारे में दीप रखती। . लीलावती जब थोड़ी सयानी हो गयी तो नित्य भगवान् के लिए फूल चुनकर माला बनाती और जब नारायणकान्त विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ कर रहे होते तो उसे ध्यान से सुनती और दोहराती... . श्रीद: श्रीश: श्रीनिवास: श्रीनिधि: श्रीविभावन:। श्रीधर: श्रीकर: श्रेय: श्रीमांल्लोकत्रयाश्रय :।। . सांसारिक विषय-भोग रूपी काजल की कोठरी से कोई बिरला ही बेदाग निकलता है . समय पाकर लीलावती का विवाह एक सम्पन्न परिवार में हो गया। पति राजपुरोहित, घर में लक्ष्मी का विलास, पुत्र-पुत्री, दास-दासियां। . कंचन-कामिनी, भोग-विलास के प्रलोभनों को जीतना बहुत कठिन है। लीलावती भी इस विषवल्लरी में अटक गयी। . देर तक सोना, घर का कोई काम नहीं करना, इन्द्रियों का नियमन नहीं, मुख में भगवान् का नाम नहीं, ऐसा विलासपूर्ण दलदल का जीवन मानो भोजन में मक्खी निगल रहे हों। . लीलावती पुराने संस्कारों को भूलकर दुनिया के राग-रंग में बेसुध बही जा रही थी । प्रभु जिसे अपनाते हैं उसके सारे बन्धनों और सम्बन्धों को छिन्न-भिन्न करने के लिए ठोकर देते हैं.. . जगत के प्रलोभन की मदिरा पीकर जीव जब मदमस्त और बेसुध हो जाता है तो दु:खों की प्यारभरी मार से प्रभु उसे होश में लाते हैं। . एकाएक लीलावती के गांव में हैजा फैला और उसके पुत्र व पुत्री हैजे की चपेट में आ गए, उनके प्राण अब-तब थे। . उस जमाने में हैजा असाध्य बीमारी थी। कोई दवा काम नहीं कर रही थी और लीलावती अपने बीमार बच्चों की शय्या के सिरहाने बैठी आंसू बहाते हुए एक-एक क्षण गिन रही थी और अपने जीवन को कोसती हुई धाड़ मार कर रोती जा रही थी। . चारों ओर से असहाय लीलावती को बचपन का प्रभु-प्रेम स्मरण हो आया और वह पुकार उठी... . श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। हे नाथ नारायण वासुदेव।। . सच्ची प्रार्थना में प्रभु का स्पर्श मिलता ही है। उसके बच्चे धीरे-धीरे स्वस्थ होने लगे। भगवान् का वचन है कि जिसे वे एक बार अपना लेते है, उसे एक क्षण के लिए भी छोड़ते नहीं। . दूसरे दिन का प्रभात लीलावती के जीवन का नया प्रभात था। सुबह-सुबह एक अलमस्त फकीर की तंबूरे पर गाते हुए उसने आवाज सुनी.. . राम कहत चलु, राम कहत चलु, राम कहत चलु भाई रे। नाहिं तो भव बेगारी में परके, छूटत अति कठनाई रे।। . इसे सुनते ही लीलावती की मन की आंखें उसी तरह खुल गयीं जैसे बादलों को हटाकर सूर्य झांकने लगा हो और जन्म-जन्मान्तर का संचित अंधकार भाग गया हो। . पिता के विष्णुसहस्त्रनाम और माता की नारायण नाम-धुन के संस्कार मन में जाग उठे और वह भगवान् की सच्ची चेरी बन गई। . लीलावती ने भगवान् बालकृष्ण की सोने की मूर्ति बनवाकर उसकी प्राण-प्रतिष्ठा कराई और नित्य उनका षोडशोपचार पूजन करने लगी। . परिवार की सेवा तो वह पहले की तरह करती पर सब कर्मों के केन्द्र अब भगवान् हो गए। . अब नित्य विष्णुसहस्त्रनाम के पाठ के साथ जिह्वा पर अखण्ड नाम-स्मरण का चस्का लग गया। . बालकृष्ण की वह मूर्ति ही उसकी प्राणाधार थी। उसके हृदय के आंगन में बालकृष्ण निरन्तर किलकारी मारते रहते। . कभी वे चन्द्रखिलौने के लिए हठ करते तो कभी ‘भूखा हूँ’ कहकर स्तनपान की जिद करते। . मन-ही-मन अपने बालकृष्ण की चुम्बियां लेती, कभी उलझी लटें सुलझाती और उसमें मोरपंख व गुंजामाला सजाती। . कभी उनके लाल-लाल तलवों की रज को हृदय से लगाती। . अंदर ही अंदर वह बालकृष्ण की सेवा व लाड़-प्यार में इतना उलझी रहती कि सांसारिक कार्यों से वह धीरे-धीरे विमुख होती चली गयी। . संसार से उसे वैराग्य हो गया था। उसकी प्रगाढ़ साधना से परिवार में भी भक्ति की सुगंध फैल गयी। . देवोत्थान एकादशी की रात्रि को घर में बालकृष्ण की झांकी सजाकर महोत्सव मनाया गया। परिवार के सभी लोगों ने आधी रात तक जागरण किया फिर चरणामृत लेकर सब सो गए। . मगर, लीलावती की आंखों में नींद नहीं थी। . उसके हृदय में आज कुछ अजीब तरह की लहरें उठ रही थीं मानो कन्हैया ने उसके आंचल को कसके पकड़ रखा हो और कह रहा हो कि ‘मैं भूखा हूँ मां, मुझे दूध पिला’। . उसने ठान लिया कि आज कन्हैया को स्तनपान कराऊंगी ही। . जैसे-जैसे उसके हृदय में संकल्प की लहरें उठ रही थीं, वैसे-वैसे उसकी तरसती और बरसती आंखों ने देखा कि बालकृष्ण की सुवर्ण-प्रतिमा साक्षात् बालकृष्ण बन गयी और यशोदा का लाल किलकारियां मारने लगा। . लीलावती का आंचल दूध की धार से भीग गया। . तभी मचलते हुए बालकृष्ण दौड़कर लीलावती के आंचल में प्रवेश कर जाते हैं और मां से चिपटकर दुग्धपान करने लगते हैं। . कलियुग की यशोदा मां और उसके बालकृष्ण दोनों ही लाड़ लड़ाते हुए एक-दूसरे की इच्छा पूरी करने लगे। . लीलावती को दुर्लभ रत्न मिल गया। अब उसकी कोई इच्छा शेष नहीं रह गयी। . दूसरे दिन प्रात:काल जब घरवालों ने पूजाघर का द्वार खोला तो देखा कि लीलावती बालकृष्ण की मूर्ति को गोद में चिपटाए बेहोश पड़ी है.. . सदा सदा के लिए बेहोश.. किन्तु वह बेहोशी इस संसार के होश और होशियारी से कहीं ज्यादा मूल्यवान है जिसमें उसने सदा-सदा के लिए अपने बालकृष्ण को पा लिया.. . और बालकृष्ण ने भी उसका दुग्धपान कर उसे दूसरी यशोदा मां का दर्जा दे दिया। . ‘मां’ जब मुझको कहा कृष्ण ने, तुच्छ हो गए देव सभी। इतना आदर, इतनी महिमा, इतनी श्रद्धा कहां कभी ? उमड़ा स्नेह-सिन्धु अन्तर में, डूब गयी आसक्ति अपार। देह, गेह, अपमान, क्लेश, छि: ! विजयी मेरा शाश्वत प्यार।। ((((((( जय जय श्री राधे ~~~~~~~~~~~~~~~~~

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