. "व्रज के भक्त-31" श्रीहरेकृष्णदास बाबाजी (राधाकुण्ड) भजनानुरागी व्यक्ति को किस प्रकार समय का सदुपयोग करना चाहिये, इसका उज्ज्वल दृष्टान्त श्रीहरेकृष्णदास बाबा के जीवन में देखने को मिलता है। उन्होंने किसी एक स्थान में रहकर भजन नहीं किया। पर वे जहाँ भी रहे वहाँ इस प्रकार रहे कि देह सम्बन्धी कार्यो में कम-से-कम समय लगे और भजन में अधिक-से-अधिक। वे शेषरात्रि में उठते। माला रख और करुआ हाथ में ले भागते-भागते जाते शौच और स्नानादि करने। लौटकर आते भागते-भागते और झटपट तिलकादि कर भजन में बैठ जाते। मध्याह्न में भजन से उठते। स्नानादि कर एक टूटे-फूटे शीशे की सहायता से तिलक करते, तुलसी तले गिरिराज को दो पत्ते तुलसी के चढ़ाकर मधुकरी का झोला हाथ में ले मधुकरी को जाते। शीघ्र मधुकरी से लौटकर हस्तलिखित चाटु-पुष्पाञ्जलि के भाषानुवाद के कुछ पृष्ठ पढ़ और मधुकरी ग्रहण कर भजन में बैठ जाते। सन्ध्या समय फिर शौच-स्नादि कर भजन में बैठते। रात्रि में सोते या जागते कोई नहीं जानता। पर वे रात्रि में भोजन बिलकुल न करते। वृद्धावस्था में वे राधाकुण्ड के नूतन घेरे में रहकर भजन करने लगे थे। उनका तीव्र अनुराग देख एक बार श्रीकामिनीकुमार घोष ने उनसे प्रार्थना करते हुए कहा- 'मैं बाल्य-काल से ही निद्रातुर हूँ। भजन-साधन नहीं कर पाता। आप मेरे ऊपर कुछ कृपा करें।' उन्होंने कहा-'जब नव-दम्पति का मिलन होता है, तब क्या उन्हें निद्रा आती है ? प्राण में अनुराग जागने से निद्रा का अपने-आप लोप हो जाता है। तुम्हारे सिद्ध देह के किस अंग में कौन-सा अलंकार है, इसका ध्यान किया करो।' कामिनीबाबू ने पूछा-'क्या मैं कभी-कभी आपके दर्शन करने आ सकता हूँ?' उन्होंने उत्तर दिया-'आना, पर बहुत देर तक मत बैठना।' इसके कुछ ही दिन बाद शरदपूर्णिमा की रात्रि में वैष्णवगण कीर्तन के साथ कुण्ड-परिक्रमा कर रहे थे। उस समय उन्होंने उनकी कुटिया के निकट उन्हें पुकारा। उन्होंने कुछ उत्तर दिया या नहीं कीर्तन की ध्वनि में न जाना जा सका। कीर्तन से लौटकर वैष्णवों ने ठाकुर को खीर का भोग लगाया जब उन्हें प्रसाद देने गये तो देखा कि उन्होंने आसन पर बैठे-बैठे ही देह त्याग दिया है। वे जान गये कि उन्होंने उस शरद-पूर्णिमा की रात्रि में रास में प्रवेश पा लिया। ----------:::×:::---------- लेखक: बी. एल कपूर पुस्तक: व्रज के भक्त (द्वितीय खण्ड) "जय जय श्री राधे" *******************************************

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. "व्रज के भक्त-30" श्रीगौरगोविन्ददास बाबाजी (पूँछरी, गिरिराज) पूत के पैर पालने में पहचान लिये जाते हैं। गुरुदासजी भी महापुरुष के रूप में पहचान लिये गये पालने में ही। मेदनीपुर जिले के अन्तर्गत पिछलदा के निकट द्वारिबेड़ा ग्राम में श्रीहरिप्रसाद बेरा के घर संवत् १८७९ में उनका जन्म हुआ। बंग देश की प्रथानुसार अन्नप्राशन के पूर्व जब उनके सम्मुख एक इलिया में सोना, चाँदी, गीता, भागवतादि सहुत-से मांगलिक द्रव्य उपस्थित किये गये, तो वे श्रीमद्भागवत को ही अपने अंक में भर लेने को चंचल हो उठे। बाल्यावस्था में ही उनके शान्त सौभ्य स्वभाव और भगवत्- विषयों में असधारण रुचि देख लोगों ने समझ लिया कि दे कोई साधारण बालक नहीं हैं। दस-ग्यारह वर्ष की अवस्था में उन्होंने मुग्ध बोध व्याकरण पढ़ ली और ग्राम के अशिक्षित लोगों को श्रीमद्भागवत और चैतन्य-चरितामृत आदि पढ़कर सुनाने लगे। ज्यों-ज्यों उम्र बढ़ती गयी, भगवत्-विषय में उनकी जिज्ञासा और आर्ति का विकास होता गया। भाग्य से उनके घर के निकट एक पर्णकुटी में श्रीमधुमूदनदास बाबाजी, एक परम विरक्त और भजनानन्दी महात्मा रहते थे। उनका सत्संग उन्हें सुलभ था। उन्होंने उन्हें सुपात्र जान महामन्त्र का उपदेश किया। उपदेश करते हुए कहा- 'यह श्रीमन्महाप्रभु द्वारा प्रचारित सोलह नाम बत्तीस अक्षरयुक्त श्रीकृष्ण-नाम महामन्त्र है। यदि तुम श्रीकृष्ण की कृपा लाभ करना चाहते हो, तो इसका जप करो। कलिकाल में इसके सिवा जीव की गति का और कोई उपाय नहीं है- हरेर्नाम, हरेर्नाम, हरेर्नामेव केवलम्। कलौ नास्तैव, नास्तैव, नास्तैव गतिरन्यवा॥ श्रीमन्महाप्रभु ने कहा है- 'कलिकाले नामरूपे कृष्ण अवतार। नाम हैते हय सर्व जगत निस्तार॥ (चे० च० १/१०) -कलिकाल में श्रीकृष्ण नामरूप में अवतार लेकर सारे जगत् का निस्तार करते हैं। "सभी वस्तुओं का नाम उनसे भिन्न होता है। पर कृष्ण का नाम कृष्ण से भिन्न नहीं है। श्रीकृष्ण अखण्ड, अद्वय तत्व हैं। इसलिए श्रीकृष्ण का जो नाम है, वही श्रीकृष्ण हैं। प्राकृत शब्द की तरह प्रतीत होने पर भी श्रीकृष्ण नाम सच्चिदानन्दरूप है "श्रीकृष्ण की तरह ही कृष्ण-नाम अनन्त शक्ति और अनन्त करुणा सम्पन्न है। कृष्ण-नाम कृपाकर साधक को भजन के योग्य बनाता है। धीरे-धीरे उसके हृदय की मालिनता दूर कर उसे अपने रूप और लीला को धारण करने योग्य बनाता है। कृष्ण-नाम साधन भी है, साध्य भी। साधन रूप में वह तब तक सक्रिय रहता है, जब तक साधक के हृदय में कृष्ण-प्रेम उदय नहीं होता। कृष्ण-प्रेम के उदय होने पर कृष्ण-नाम ही श्रीकृष्ण और उनकी लीला के रूप में साधक के हृदय में स्फुरित होता है। "पर इस बात का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिये कि अपराध और अभिमान-शून्य हृदय में ही हरिनाम अपने प्रभाव का विस्तार करता है। जिस प्रकार वर्षा का जल ऊँचे स्थानों को छोड़ता हुआ नीचे की ओर ढलता है और सब से नीचे के स्थान में जाकर संचित होता है, उसी प्रकार नाम की कृपा अभिमानी व्यक्तियों को छोड़कर निरभिमानी व्यक्तियों की ओर ही ढलती है और जो सब प्रकार से अभिमान-शून्य होते है, उन्ही के हृदय में स्थायी रूप से जाकर टिकती है। अभिमान-शून्यता आर्ति को जन्म देती है और आर्ति भगवान और उनकी कृपा को आकर्षित करती है। दैन्य जितना वृद्धि को प्राप्त होता है, उतना ही अपराध क्षीण होता है, उतना ही भक्ति देवी प्रसन्न हो कृपा करनेको विवश होती हैं।" मधुसूदनदास बाबा का यह उपदेश गुरुदास के हृदय में घर कर गया। उनका जीवन नाममय हो गया। वे एकान्त में बैठकर हर समय नाम-जप करते या गाँव के बच्चों को एकत्रकर कीर्तन करते। कीर्तन करते-करते बेसुध हो जाते। उनके माता-पिता उनकी इस प्रकार की अवस्था देख चिन्ता में डूब गये। उन्होंने बहुत चेष्टा की उन्हें समझा-बुझाकर कुछ संसार की ओर उनका मन मोड़ने की। पर उनके सारे प्रयत्न निष्फल हुए। तब उन्होंने श्रीमधुसूदनदास बाबाजी से परामर्श कर गुरुदास को उनके साथ तीर्थयात्रा को भेज दिया। दोनों ने गौरमण्डल के तीर्थो की यात्रा की। यात्रा के बीच उन्होंने अम्बिका कालना में महाप्रभु के परिकर श्रीगौरी पण्डित के निताइ-गौर के श्रीविग्रह के दर्शन किये। गुरुदास ने इस अवसर का लाभ उठाकर गौरी पंडित के वंशज श्रीपाद अखिलचन्द्र ठाकचर गोस्वामी से मन्त्र-दीक्षा ली। एक वर्ष तक तीर्थ-भ्रमण करने के पश्चात् गुरुदास घर लौटे। उनकी मानसिक स्थिति में परिवर्तन हुआ अवश्य। पर वैसा नहीं जैसा उनके माता-पिता ने आशा की थी। वरंच उसके बिल्कुल विपरीत। तीर्थ-यात्रा में उन्हें बाबा गौरकिशोरदासजी जैसे सिद्ध महात्माओं का संग करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। परिणाम-स्वरूप संसार से उन्हें और अधिक विरक्ति हो गयी थी। उन्होंने उन्हें रूप-सनातन के समान सब कुछ त्यागकर वृन्दावन में भजन करने का उपदेश दिया था। सम्वत् १९५४ में उनकी माँ का देहान्त हो गया। शरीर त्यागने के पूर्व उन्होंने गुरुदास को निकट बुलाकर कहा - बेटा, 'विवाह करना।' माँ के इन शब्दों से उन्हें मर्मान्तक कष्ट हुआ। वे बड़े धर्मसंकट में पड़ गये। माँ के अन्तिम आदेश का पालन करें या गौरकिशोरदास बाबा के आदेशानुसार रूप सनातन के पथ का अनुसरण करें ? उसी वर्ष माँ के देहावसान के कुछ दिन बाद उनके शिक्षा-गुरु श्रीमधुसूदनदास बाबाजी शेष जीवन वृन्दावन में व्यतीत करने के उद्देश्य से सदा के लिए द्वारिबेड़ा छोड़कर वृन्दावन चले गये। इससे उन्हें और अधिक कष्ट हुआ। द्वारिबेड़ा में उनके पारमार्थिक जीवन का जो एकमात्र अवलम्ब था, वह भी जाता रहा। अब उनके लिए वहाँ गुरुदेव और वृन्दावन की याद में रोने और 'हा, गुरुदेव ! हा, वृन्दावन !' कहकर पछाड़ खाने और मूर्च्छित हो जाने के सिवा और क्या रहा ? हरिप्रसादजी ने सोचा कि पुत्र को स्वस्थ करने का एक मात्र उपाय है विवाह। उन्होंने दो-चार दिन के भीतर ही एक लड़की के घरवालों से बातचीत कर विवाह कर दिया। गुरुदास के लिए विवाह की रात से बड़ी संकट की घड़ी और क्या हो सकती थी ? उन्हें भयंकर वेदना हो रही थी। उन्होंने अपने भविष्य के जो स्वप्न देखे थे, वे अब बिखरकर धूल में मिलते से जान पड़ रहे थे। उन्हें लग रहा था कि वे जीवन के ऐसे चौराहे पर आ खड़े हुए हैं, जहाँ सोचने-विचारने का अब समय बिलकुल नहीं है। उन्हें तुरन्त फैसला करना है कि उन्हें माया की लोभनीय पुष्पवाटिका की ओर पदार्पण करना है, या त्याग और वैराग्य के कण्टकाकीर्ण पथ का अवलम्बन करना है। उन्हें निर्णय करने में देर न लगी वे उसी रात संसार त्याग करने का निश्चय कर घर से निकल पड़े। लुक-छिपकर धान के खेतों में-से होकर दौड़ते-भागते द्वारिबेड़ा से बाहर हुए। कई दिन तक लगातार चलते-चलते नवद्वीप के निकट पहुँचे। हारे-थके, भूखे-प्यासे उन्होंने वहाँ एक महात्मा के आश्रम में आश्रय लिया। महात्मा ने स्नेहपूर्वक उनसे कई दिन वहाँ रह जाने का आग्रह किया। गुरुदासजी वहाँ रुक गये। महात्मा के साथ इष्ट-गोष्ठी में उन्हें बड़ा सुख मिला। उनके शुद्ध अन्तःकरण और शुद्ध, सरल, स्निग्ध स्वभाव को देख महात्मा का भी वात्सल्य उमड़ पड़ा। उन्होंने कहा -'वत्स मैं अब बूढ़ा हो गया हूँ। अधिक दिन नहीं रहूँगा। मेरी बड़ी इच्छा है कि तुम मुझसे वेश लेकर इस आश्रम के महन्त हो जाओ।' गुरुदासने सोचा-'यह कैसा संकट फिर आ गया ! किसी प्रकार एक बन्धन से निकलकर आया, दूसरा सामने आया।' उन्होंने विनयपूर्वक कहा - 'बाबा, क्षमा करें। मेरा मनोभृङ्ग पहले ही श्रीगौरकिशोरदास बाबाजी महाराज के पादपद्म में बिक चुका है।' महात्मा यह सुन आग-बबूला हो गये। उन्होंने तत्काल शाप दिया-'जाओ, तुम्हारा इस जन्म में भजन-साधन नहीं होगा।' गुरुदास दुःखित हो वहाँ से चल दिये। नवद्वीप जाकर उन्हें पता चला कि गौरकिशोरदास बाबाजी किसी को वेश नहीं देते। तब उन्होंने नवहीप के 'बड़े अखाड़े' के महन्तजी से वेश लिया। वेश का नाम हुआ श्रीगौरगोविन्ददास। वेश लेकर वे महन्तजी के साथ श्रीगौरकिशोरदास बाबाजी के पास उपदेश के लिए गये। उन्होंने उपदेश देते हुए कहा -श्रीरूप सनातन के वेश की रक्षा करना। अर्थ को काल समझना। किसी स्त्री से सम्भाषण न करना। महाप्रभु ने छोटे हरिदास को अपनी ही सेवा के लिए एक वृद्धा स्त्री से अन्न माँग लाने के कारण जो दण्ड दिया था, उसे स्मरण रखना। व्रजधाम में किसी महाभागवत के आनुगत्य में रहकर भजन करना। व्यावहारिक प्रीति के बन्धन में न फँसना। व्रजवासियों के घर मधुकरी माँगकर जीवन निर्वाह करना।' गुरु-शिष्य दोनों उनके चरणों की वन्दना कर बड़े अखाड़े लौट गये। पर गौरगोविन्ददास को शान्ति नहीं। उनका हृदय शाप देने वाले महात्मा के चरणों में हुए अपराध के कारण अनुताप से दग्ध हो रहा था। गुरुदेव के आदेश से वे उनके पास गये और बहुत अनुनय-विनय कर क्षमा प्रार्थना की। पर महात्मा का क्रोध अभी भी शान्त नहीं हुआ था। उन्होंने डाँट-फटकार कर उनसे अपने पास से चले जाने को कहा। वे फिर रोते-धोते गुरुदेव के पास पहुँचे। गुरुदेव ने कहा -'तुमने महात्मा के प्रति अपने कर्तव्य का पालन किया। अब यदि वे प्रसन्न नहीं होते तो क्या करोगे ? नाम का आश्रय लो। नाम की शक्ति से अवश्य तुम्हें महात्मा के शाप से मुक्ति मिलेगी।' गौरगोविन्ददास बाबा नाम-जप करने लगे। कुछ ही दिन बाद महात्मा में अनायास परिवर्तन हुआ। उनका हृदय अनुतापानल से दग्ध होने लगा। उन्हें भासने लगा कि उन्होंने एक निरपराध बालक को शाप देकर अन्याय किया है। वे भागे आये बड़े अखाड़े और गौरगोविन्ददास से बोले- 'मैंने तुम्हारी प्रार्थना अनसुनी की, उसी दिन से मुझे असहनीय यन्त्रणा हो रही है। मैंने तुम्हारे साथ अन्याय किया है। अब यदि तुम क्षमा नहीं करते, तो मेरी गति नहीं।' गौरगोविन्ददास रोते हुए उनके चरणों में गिर पड़े। उन्होंने उठाकर उन्हें आलिंगन किया और उनके सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया। दोनों महात्माओं के हृदय में नाम की कृपा से शान्ति का संचार हुआ। गौरगोविन्ददास बाबा गुरुदेव की अनुमति ले सम्वत् १९५७, अग्रहायण मास में सुमधुर वृन्दावन धाम की ओर चल पड़े। फाल्गुन के शेष भाग में वे वृन्दावन पहुँचे। कुछ दिन व्रज में भ्रमण करते हुए श्रीकृष्ण की लीला-स्थलियों का दर्शन किया। वे दिन में नाम-जप करते हुए भ्रमण करते। रात में किसी वृक्ष के नीचे विश्राम कर लेते। व्रजवासियों की मधुकरी से पेट भर लेते। तदनन्तर वे वृन्दावन में श्रीश्यामसुन्दरजी के मन्दिर की समाज बाड़ी में रहकर भजन करने लगे। वे कालीदह के सिद्ध श्रीजगदीशदास बाबाजी महाराज का संग करते। नित्य सन्ध्या समय उन्हें चैतन्य-भागवत का पाठ सुनाते। बाको समय अपनी कुटिया में बैठकर हरिनाम करते। किसी वैष्णव ने उन्हें सलाह दी सिद्ध कृष्णदास बाबा की 'गुटिका' का अभ्यास करने की। उन्होंने अभ्यास आरम्भ किया। पर उसके कारण वे नाम-जप की संख्या पूरी न कर पाते। संख्या पूरी न कर सकने के कारण दे चिन्तामें पड़ गये। उन्होने श्रीजगदीशदास बाबा से पूछा, क्या करना चाहिये। उन्होंने कहा-'पहले नाम-संख्या पूरी करो। उसके पश्चात् यदि समय मिले तो गुटिका का अभ्यास करो। पर उनकी नाम-जप की संख्या इतनी थी कि सारा समय उसी में निकल जाता। उस अभ्यास के लिए समय न मिल पाता। थोड़े दिनों में उनके भजन की ख्याति चारों ओर फैलने लगी और दर्शनारथियों की भीड़ उनकी कुटिया पर लगने लगी। इसलिए वे गोवर्धन से चार मील पूर्व 'अरिं' नाम के स्थान में जाकर रहने लगे। वे नित्य अरिं से गोवर्धन जाते और गिरिराज की परिक्रमा कर लौट आते। इस प्रकार उन्हें नित्य २० मील चलना पड़ता। कुछ दिन बाद वे अरिं के पूर्वोत्तर किल्लोल-कुण्ड के पास एक भग्न कुटी में रहने लगे। उनका भजन और गिरिराज की परिक्रमा पूर्ववत् चलते रहे। उनके भजन के प्रताप से दिव्य शक्तियों का उनमें विकास होने लगा। एक दिन एक व्रजवासी के करुण क्रन्दन से द्रवित हो उन्होंने उसे सांत्वना देने को उसके अतीत और भविष्य की बहुत-सी बातें कह डालीं। उस दिन से उनके दैन्य में ह्लास होने लगा और भजन में वाधा पड़ने लगी जिससे उन्हें बहुत चिन्ता हुई। उस समय पूँछरी में राघव पण्डित की गुफा में श्रीरामकृष्णदास पण्डित बाबा भजन करते थे। उनके पास जाकर उन्होंने अपनी चिन्ता व्यक्त की। उनकी कृपा और उपदेश से उनका सर्वज्ञता का भाव शान्त हुआ और भजन में प्रगति होने लगी। पण्डित बाबा ने उन्हें आगे के लिए सचेत करते हुए कहा-'नाम कल्पतरु है। इससे साधक को सभी कुछ प्राप्त हो सकता है। यदि साधक नाम-जप करते हुए श्रीकृष्ण की शक्तियों का चिन्तन करता है, तो उसमें उनकी शक्तियों का आविर्भाव होता है। यदि वह उनके प्रियता-धर्म का चिन्तन करता है, तो उसमें प्रियता का संचार होता है. और जिस परिमाण में उसमें प्रियता का संचार होता है, उसी परिमाण में वह उनके लीला-माधुर्य का आस्वादन करता है। प्रियत्व के अनुभव बिना केवल श्रीकृष्ण की हृदय मे स्फूर्ति से उनके माधुर्य का अनुभव नहीं होता। उससे सर्वज्ञता आदि लक्षणों का विकास होने लगता है, जो भजन में बाधक हैं। तब से गौरगोविन्ददास बाबा पण्डित बाबा की इष्ट-गोष्ठी में नित्य सम्मिलित होने लगे। एक दिन जेठ के महीने में नृसिंहजी के मन्दिर के प्रांगण में इष्ट-गोष्ठी हो रही थी। एकाएक आकाश मेघों से छा गया। प्रबल आँधी के साथ घनघोर वृष्टि होने लगी। गौरगोविन्ददास बाबा ने कहा -'अच्छा होता यदि वृष्टि थोड़ी देर बाद होती, जब हम लोग अपनी-अपनी कुटियापर पहुँच जाते !' यह सुन पण्डित बाबा उत्तेजित हो बोले- 'अभी तक कामना की निवृत्ति नहीं हुई। अपने सुख-सुविधा की कामना रखने से कहीं भजन होता है ? अपने इहकाल और परकाल की समस्त सुख-सुविधाओं की कामना का परित्याग कर एकमात्र श्रीकृष्ण के सुख की कामना करने से ही भजन में सिद्धि होती है।' कुछ दिन बाद गौरगोविन्ददास बाबा पण्डित बाबा के आदेश से पूछरी में अप्सराकुण्ड के निकट एक कुटी में रहकर भजन करने लगे। उस निर्जन स्थान में उनके और उनके सेवक श्रीलाड़िलीदास बाबा के सिवा और कोई न था। केवल बेल के वृक्ष के रूप में एक महात्मा, उनकी कुटिया के बाहर भजन करते थे। वे उनसे अपने मन की कुछ कह-सुन लिया करते थे। उनमें जब प्रथम बार फल आये, तो एक दिन अपने स्वरूप में प्रकट होकर वे बाबा से बोले-तुमने मुझे सींचकर बड़ा किया है। तूुमसे मेरी एक प्रार्थना है। मेरे फल पक जायें तो इन्हें वृन्दावन के सब देवालयों में और वृन्दावन के महात्माओं को उनकी कुटियों में ठाकुर-सेवा के लिए दे आना।' बाबा ने वैसा ही किया। एक बार उस वृक्ष पर किसी ने अपनी धोती सूखने को डाल दी। उसी दिन उन्होंने बाबा से स्वप्न में कहा- 'मेरे ऊपर किसी को कपड़े न सुखाने दिया करो। मेरे भजन में विघ्न पड़ता है।' बाबा के भजन में कमश: वृद्धि होती गयी। उनकी नाम-संख्या बढ़कर ८ लाख तक हो गयी। उनके पास संयोगवश रात दो बजे भी कोई पहुँच जाता, तो उन्हें नाम-जप करते पाता। यदि वह कहता- 'बाबा, आप क्या रात में भी विश्राम नहीं करते ?' तो वे उत्तर देते- 'नहीं, नहीं, मैं अभी-अभी ही तो उठा हूँ।' एक बार उन्हें एक विषधर सर्प ने काट लिया। पर उनके चित्त में उससे किसी प्रकार का विक्षेप न हुआ। वे निर्विघ्न नाम-जप करते रहें। नामरूपी संजीवनीबूटी ने उन पर उसके विष का कुछ भी असर न होने दिया। अन्त में बाबा का सोना-जगना एक-सा हो गया। रात-रातभर जागकर जप करना और नृत्य के साथ भावपूर्ण मुद्रा में रोदन करते हुए नाम-कीर्तन करना उनका साधारण कृत्य हो गया। आदि पुराण में श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा है- 'गीत्वा च मम नामानि नर्त्येन्मम सन्निधौ। इदं ब्रवीमि ते सत्यं क्रीतोऽहं तेन चार्जुन॥ गीत्वा च मम नामानि रुदन्ति मम सन्निधौ। तेषामहं परिक्रीतो नान्यक्रीतो जनार्दनः॥ -'हे अर्जुन मेरा नाम गा-गाकर जो मेरे सामने नृत्य करते हैं, मैं सच कहता हूँ, मैं उनके हाथ बिक जाता हूँ। जो मेरे नाम का गानकर मेरे सामने रोदन करते हैं, मैं सभी प्रकार से उन के द्वारा क्रीत, उनके वशीभूत हो जाता हूँ; और किसी के भी द्वारा मैं क्रीत नहीं होता।' गौरगोविन्दास बाबा का तो उनका नाम गान करने और उनकी याद में रोने-धोने के सिवा और कोई काम ही न था। इसलिए श्रीकृष्ण का उनके हाथ बिक जाना और उनके वशीभूत हो जाना स्वाभाविक था। वे कितना उनके हाथ बिक गये थे, इसका एक घटना से अनुमान लगाया जा सकता है। एक दिन बाबा वृष्टि हो जाने के कारण मधुकरी कर रात में देर से लौटे। भूख जोर की लगी थी। मधुकरी आरोगने के पूर्व ठाकुर को भोग लगाना भूल गये। एक ग्रास खाकर निगल रहे थे, उसी समय याद आया कि भोग नहीं लगाया। उन्होंने तुरन्त कंठ पकड़ लिया। फिर भी ग्रास नीचे उतर गया। उन्हें अपने ऊपर बड़ा क्रोध आया। भूख-प्यास का न जाने क्या हो गया। मधुकरी के टूक सामने बैसे-के-बैसे ही पड़े रहे। तब कुटिया के भीतर से ठाकुर के मधुर कण्ठ की ध्वनि सुनायी दी। उन्होंने कहा - 'नित्य व्रजवासियों की जूठी खिलाता है। आज अपनी जूठी खिलाने में संकोच क्यों करता है ? अब भोग लगा दे न !' ठाकुर की आवाज सुन बाबा के रोंगटे खड़े हो गये। अश्रु-कम्पादि सात्विक भावों से उनका शरीर परिपूर्ण हो गया। उन्होंने सकुचाते-सकुचाते अपनी जूठी मधुकरी का ठाकुर को भोग लगाया। तब स्वयं उसे ग्रहण किया। उस मधुकरी में उन्हें जो स्वाद मिला, वह पहले कभी किसी स्वादिष्ट भोजन में नहीं मिला था। जाहिर है कि उस दिन ठाकुर ने मधुकरी बड़े प्रेम से आरोगी थी। उससे उन्हें जो तृप्ति हुई थी, वह बाबा द्वारा सम्मापत मधुकरी से पहले कभी नहीं हुई थी। कैसा अनोखा है व्रज का यह ठाकुर ! अपने भोले भक्तों के सामने उसकी ठकुराई न जाने कहाँ चली जाती है। ठकुराई छोड़़ उनसे घुल-मिल जाने को वह कितना व्याकुल हो उठता है ! उनकी जूठी खाकर और उन्हें अपनी जूठी खिलाकर, उनकी सेवा ग्रहणकर और उनकी सेवा स्वयंकर वह कितना तृप्त होता है, कितना अपने को धन्य मानता है ! हाय ! कितना कृतध्न और आत्मघाती है वह जीव, जो ऐसे ठाकुर को नहीं भजता, जिसके कोटि-कोटि प्राण उस पर न्यौछावर होने को मचल नहीं उठते ! सम्वत् २०१६ माघ वदी प्रतिपदा को बाबा ने नित्य-लीला में प्रवेश किया। अप्सराकुण्ड के निकट उनकी और उनके सेवक श्रीलाड़िलीदास बाबा की समाधि है। ----------:::×:::---------- लेखक: बी. एल कपूर पुस्तक: व्रज के भक्त (द्वितीय खण्ड) "जय जय श्री राधे" *******************************************

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*कार्तिक में दीपदान का फल और विधि* मित्रो आज से कार्तिक मास आरंभ हो गया है,कार्तिकमास में दीपदान का बहुत महत्व है। आज हम आपको कार्तिक मास में दीपदान की विधि बतायेंगे!!!!!!!!! कार्तिक मास में प्रतिदिन प्रात:काल स्नान करके कोमल तुलसीदलों से भगवान विष्णु या दामोदर कृष्ण की पूजा करके रात्रि में आकाशदीप देते (प्रज्ज्वलित करते) हैं । इसके लिए एक लम्बे बांस में लालटेन रखकर उसमें ‘आकाशदीप’ जलाते हैं, अथवा भगवान के मन्दिर के मुंडेर पर एक मास तक दीपदान किया जाता है । दीप प्रज्ज्वलित करते समय इस मन्त्र का उच्चारण किया जाता है— दामोदराय विश्वाय विश्वरूपधराय च । नमस्कृत्वा प्रदास्यामि व्योमदीपं हरिप्रियम् ।। अर्थात्—मैं सबमें स्थित और विश्वरूपधारी भगवान दामोदर को नमस्कार करके यह आकाशदीप देता हूँ, जो भगवान को अत्यन्त प्रिय है ।’ महालक्ष्मी सहित भगवान विष्णु की प्रसन्नता के लिए शरद पूर्णिमा से पूरे मास आकाशदीप प्रज्जवलित करना चाहिए इससे मनुष्य यम की यातना से मुक्त हो जाता है और अपने परिवार के साथ सभी प्रकार के भोगों को भोग करके अंत में विष्णुलोक को प्राप्त होता है । भगवान दामोदर (विष्णु) की प्रसन्नता के लिए रात्रि के समय मन्दिरों, गलियों, तुलसी के बिरवों, पीपल के पेड़ के नीचे, बिल्ववृक्ष के नीचे, नदियों के किनारे, सड़क पर और सोने के स्थान आदि पर दीपक जलाया जाता है इससे सब प्रकार का वैभव व लक्ष्मी की प्राप्ति होती है । जो मनुष्य कीटों और कांटों से भरे ऊबड़खाबड़ रास्तों पर दीपदान करता है, वह नरक में नहीं पड़ता है । कार्तिक मास में पितरों के लिए दीपदान नम: पितृभ्य: प्रेतेभ्यो नमो धर्माय विष्णवे । नमो यमाय रुद्राय कान्तारपतये नम: ।। अर्थात्—पितरों को नमस्कार है, प्रेतों को नमस्कार है, धर्मस्वरूप विष्णु को नमस्कार है, यमराज को नमस्कार है तथा कठिन पथ में रक्षा करने वाले भगवान रुद्र को नमस्कार है ।’ इस मन्त्र से जो मनुष्य पितरों के लिए आकाश दीप दान करता है, उसके पितर उत्तम गति को प्राप्त होते हैं । कार्तिक मास में दीपदान की महिमा!!!!!!!! —त्रेतायुग में हरिद्वार में देवशर्मा नामक एक विद्वान ब्राह्मण थे जो सूर्य की आराधना करके सूर्य के समान तेजस्वी हो गए । उनकी गुणवती नामक एक पुत्री थी । कार्तिक के महीने में वह प्रात:काल स्नान करती थी, दीपदान और तुलसी की सेवा तथा भगवान विष्णु के मन्दिर में झाड़ू दिया करती थी । प्रतिवर्ष कार्तिक-व्रत का पालन करने से मृत्यु के बाद वह वैकुण्ठ लोक गयी । गुणवती ने सभी कर्मों को परमपति भगवान विष्णु को समर्पित किया था, इसलिए अगले जन्म में वह सत्यभामा हुईं । उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण को पति के रूप में प्राप्त किया, भगवान से उनका कभी वियोग नहीं हुआ और उनके घर में स्थिर लक्ष्मी का वास हुआ । —कार्तिक मास में दीपदान से जन्म-जन्मान्तर के पाप नष्ट हो जाते हैं । —जो मनुष्य कार्तिक मास में दीपदान करने में असमर्थ हों, वे दूसरों के बुझे हुए दीप जलाकर अथवा हवा आदि से दूसरों के द्वारा जलाए गए दीपों की रक्षा कर वही पुण्य प्राप्त कर सकते हैं । तीन दिवसीय दीपोत्सव मनाने का कारण? कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी से अमावस्या—इन तीन दिनों तक दीपोत्सव मनाया जाता है । वामनावतार में भगवान विष्णु ने सारी पृथ्वी तीन पग में नाप ली । राजा बलि के दान से प्रसन्न होकर भगवान वामन ने बलि से वर मांगने को कहा । तब राजा बलि ने प्रार्थना की कि कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी से लेकर अमावस्या—इन तीन दिनों तक प्रतिवर्ष पृथ्वी पर मेरा राज्य रहे । उस समय जो मनुष्य यमराज के लिए दीपदान करे तो उसे कभी यम की यातना न सहनी पड़े साथ ही इन तीन दिनों तक दीपावली मनाने वाले का घर लक्ष्मीजी कभी न छोड़ें । भगवान ने वर देते हुए कहा—‘जो मनुष्य इन तीन दिनों में दीपोत्सव करेगा, उसे छोड़कर मेरी प्रिया लक्ष्मी कहीं नहीं जाएंगी ।’ कार्तिक मास में तीन दिवसीय दीपोत्सव में दीपदान की विधि????? कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी,धनतेरस!!!!!!! कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी धनतेरस को सायंकाल मिट्टी के दीपक में नई रूई की बत्ती बनाकर तिल से तेल से भर दें और खील से पूज कर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके अपने द्वार पर दीप और नैवेद्य दान करें, इससे यमराज प्रसन्न होते हैं और अकालमृत्यु और अपमृत्यु का नाश होता है । दीप दान का मन्त्र है— मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालेन च मया सह । त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यज: प्रीयतामिति ।। अर्थात्—त्रयोदशी को दीपदान करने से मृत्यु, पाश, दण्ड, काल और लक्ष्मी के साथ यम प्रसन्न हों । नरक चतुर्दशी!!!!!!!! इस दिन तेल में लक्ष्मी व जल में गंगा निवास करती हैं । अत: माना जाता है कि प्रात:काल स्नान करने से मनुष्य यमलोक का मुंह नहीं देखता । इस दिन प्रदोष के समय तिल के तेल से भरे हुए चौदह दीपकों की पूजा करके उन्हें जला लें और ‘यममार्गान्धकार निवारणार्थे चतुर्दश दीपानां दानं करिष्ये’ अर्थात् ‘यममार्ग के अंधकार को दूर करने के लिए मैं ये चौदह दीपक दान करता हूँ’—यह संकल्प करके ये दीपक ब्रह्मा, विष्णु, महेश के मन्दिर, बाग-बगीचों, तालाब के किनारे, गली, घुड़शाला और सूनी जगहों आदि पर रख दें । इस दीपदान से यमराज प्रसन्न होते हैं । इस दिन चार बत्तियों के दीपक को जलाकर पूर्व की ओर मुख करके दान करने से मनुष्य की सद्गति होती है, नरक नहीं मिलता है । दीपकों की पंक्ति लगा देने को ‘दीपावली’ और जगह-जगह दीपकों को गोलाकार आकृति में सजा देने को ‘दीपमालिका’ कहते हैं । दीपावली सजा कर इस तरह प्रार्थना करें— ‘दीपक की ज्योति में विराजमान महालक्ष्मी ! तुम ज्योतिर्मयी हो । सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि, सोना, और तारा आदि सभी ज्योतियों की ज्योति हो; तुम्हें नमस्कार है । आप मेरे लिए वरदायिनी हों ।’ कार्तिके मास्यमावास्या तस्यां दीपप्रदीपनम् । शालायां ब्राह्मण: कुर्यान् स गच्छेत् परमं पदम् ।। अर्थात्—कार्तिक की अमावस्या को दीपावली और दीपमालिका सजाने से लक्ष्मीजी प्रसन्न होकर उसके घर में स्थायी रूप से निवास करती हैं और वह मृत्युपर्यन्त परम पद प्राप्त करता है । इस दिन लक्ष्मी-पूजन करते समय एक थाली में तेरह या छब्बीस तेल के दीपकों के बीच में चौमुखा दीपक रखकर दीपमालिका का पूजन करें फिर उन्हें प्रज्ज्वलित करके घर में विभिन्न स्थानों पर रख दिया जाता है । चौमुखा दीपक रात भर जलाना चाहिए । इसके अतिरिक्त चौराहे पर, श्मशाम में, गोशाला में, नदी किनारे, वृक्षों की जड़ों में, चबूतरों पर और प्रत्येक घर में दीपक जलाकर रखना चाहिए । देवप्रबोधनी एकादशी!!!!! इस दिन भगवान विष्णु के आगे कपूर का दीपक जलाने से मनुष्य के कुल में जन्मे सभी व्यक्ति विष्णुभक्त होते हैं और मोक्ष प्राप्त करते हैं । कार्तिक पूर्णिमा की संध्या को मत्स्यावतार हुआ था । इस दिन सायंकाल में यह मन्त्र बोलते हुए दीपदान करें— ‘कीटा: पतंगा मशकाश्च वृक्षे जले स्थले ये विचरन्ति जीवा: । दृष्ट्वा प्रदीपं न हि जन्मभागिनस्ते मुक्तरूपा हि भवन्ति तत्र ।। यह कहकर दीपदान करने से मनुष्य का पुनर्जन्म नहीं होता है। सांवरिया प्रेम सुधा रस।

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. "व्रज के भक्त-26" श्रीगौरांगदास बाबाजी (मदनमोहनठौर, वृन्दावन) उस दिन श्रीगौरांगदास बाबाजी को नींद बिलकुल नहीं आयी। सारी रात चारपाई पर छटपट करते बीती। सबेरा होने पर उन्होंने पास के वैष्णवों से कहा-'भाई, देखो तो, मेरी खाट में लगता है खटमल हो गये हैं। रातभर सोने नहीं दिया। एक वैष्णव ने बिछौना उलटा तो देखा कि खटमल तो नहीं, उसके नीचे कुछ रुपये रखे हैं। उसने रुपये निकालकर बाबा को दिखाये। रुपये देख बाबा ऐसे चौंके जैसे साँप-बिच्छु को देखकर कोई चौके और बोले- 'देखो, तभी तो मैं कहता था, मेरे बिछौने के नीचे कुछ है, जिसने मुझे सोने नहीं दिया। रुपये, और वह भी उस विषयी राजा के जो कल आया था ! ये क्या मुझे सोने देते ? साँप-बिच्छू का जहर तो उनके काटने से चढ़ता है। इनका जहर बिना काटे ही चढ़ जाता है। तुरन्त ले जाओ इन्हें। मदनमोहन को कुछ भोग लगाकर वैष्णवों को बाँट दो।' बाबा बड़े विरक्त थे। रुपया-पैसा स्पर्श नहीं करते थे। एक राजा साहब, जो उनके दर्शन करने आये थे यह जानते थे। इसलिए वे उनसे छिपाकर बिछौने के नीचे कुछ रुपये रख गये थे, जिससे वे उन्हें स्पर्श किये बिना किसी के माध्यम से अपने उपयोग में ले आयें। बाबा मदनमोहन ठौर में सनातन गोस्वामी की समाधि के निकट रहते थे। वे इतने वृद्ध हो गये थे कि समाधि के निकट सीढ़ियाँ चढ़ने या उतरने में उन्हें आधा घण्टा लग जाता था, फिर भी वे नित्य मधुकरी को जाते थे और श्रीप्रबोधानन्द सरस्वतीपाद की समाधि पर उन्हें भोग लगाकर स्वयं प्रसादी ग्रहण करते थे। शरीर त्यागने के कुछ देर पूर्व उन्होंने मदनमोहन के कामदार को बुलाकर कहा-'मेरी कुटिया में जो भी हो अभी ले जाओ।' कामदार ने कहा- 'बाबा, आपकी कुटिया में ऐसा कुछ नहीं है, जो किसी के काम आये।' यह सुन बाबा निश्चिन्त हुए। थोड़ी देर में वहाँ के सनातनदास बाबा से बोले--'सनातन ! देखते नहीं महाप्रभु आये हैं ! आसन दो, आसन ! उसी क्षण कुटिया को सबने देखा एक दिव्य प्रकाश से आलोकित होते और प्रकाश के विलीन होने के साथ बाबा की जीवन-यात्रा को समाप्त होते। ----------:::×:::---------- "व्रज के भक्त-27" श्रीकृष्णप्रसाददास बाबाजी (पूछरी, काम्यवन) श्रीकृष्णप्रसाददास बाबाजी ने वृन्दावन की मदनमोहन ठौर के श्रीनित्यानन्ददास बाबाजी से वेश-दीक्षा लेने के पश्चात् उनसे कहा, 'कृपाकर उपदेश करें, अब मुझे क्या करना है ?' नित्यानन्ददास बाबा ने कहा -'तू तो है नितान्त मूर्ख। शास्त्र पाट, ग्रन्थालोचना, रस-विचारादि तो तेरे बस का है नहीं। यदि कुछ महत्-सेवाकर सके तो ठीक है। बता कर सकेगा ?' गुरु-वाक्य सुन कृष्णप्रसाद ने विनयपूर्वक कहा - 'प्रभु ! कृपाकर आदेश करें। कहाँ, किसकी सेवाकर कृतार्थ हो सकूँगा ?' सिद्ध बाबा ने कहा-'तू राधारमण मन्दिर के सेवाइत श्रीगल्लुजी महाराज की सेवाकर। उनकी सेवा करने से तुझे अभीष्ट फल की प्राप्ति होगी। गल्लूजी महाराज आचार्य श्रीराधाचरण गोस्वामीजी महाराज के पिता थे। वे बड़े भजनशील और उदारचेता थे। कृष्णप्रसाद उनके चरणों में जा गिरे। उसी दिन से केवल उनकी नहीं, उनके परिवार के बालक- बालिका, दास-दासी और पशु-पक्षी आदि तक की सेवा में जुट गये। उन्हें उनकी सेवा से इतना भी अवकाश न मिलता कि वे आध घण्टा बैठकर आह्निक-भजनादि कर सकते। वे खड़े-खड़े केवल दस बार नाम-स्मरण कर लिया करते। उनकी गोद में सब समय कोई बालक-बालिका होती, जिसका मल-मूत्र तक स्वयं परिष्कार करते। बीस वर्ष तक इस प्रकार बड़ी निष्ठा और भक्ति से उन्होंने गुरु-आज्ञा का पालन किया। गल्लूजी महाराज के लीला में प्रवेश करने पर वे भी मुक्त पक्षी की भाँति घर से बाहर हो लिये। गोस्वामीगण के विशेष अनुरोध से दो-तीन वर्ष राधारमणजी के मन्दिर के सामने रास-चबूतरे के सन्निकट गोपालजी के मन्दिर में रहे और मधुकरी द्वारा जीवन निर्वाह करते रहे। इसके पश्चात् वे गोवर्धन में गोविन्दकुण्ड के निकट पूछरी में रहकर भजन करने लगे। अन्त में उन्होंने काम्यवन में आसन जमाया और जीवन के शेष क्षण तक वहीं भजन किया। इसमें सन्देह नहीं कि गुरु-आज्ञा के पालन और महत् पुरुष की सेवा के फलस्वरूप उन्हें अभीष्ट-प्राप्ति हुई। अभीष्ट-सिद्धि का सबसे बड़ा लक्षण है, देन्य। कृष्णप्रसाद बाबा का दैन्य अतुलनीय था। वे मार्ग में चलते समय अपने बाँये कन्धे पर ८-१० किलो की गूदड़ी रखते थे, जिसका एक सिरा उनके पीछे झाडू देता चलता था। उदेश्य था कि उनके चरण चिह्न पृथ्वी पर न रहें, और कोई उनकी चरण-धूलि न ले सके। उनकी चरण-धूलि लेने को लोग लालायित रहते थे, क्योंकि वे उन्हें एक महत् के रूप में जानने लगे थे। चरण-धूलि तो दूर, उन्हें पहले दण्डवत् करना भी किसी के लिए सम्भव न था। वैष्णव मात्र को देखते ही वे स्वयं उसे साष्टांग दण्डवत् करते हुए पृथ्वी पर पड़ जाते थे और तब तक पड़े रहते थे, जब तक वह आँख से ओझल नहीं हो जाता था, या उन्हें अपने हाथ से उठा नहीं देता था। ----------:::×:::---------- लेखक: बी. एल कपूर पुस्तक: व्रज के भक्त (द्वितीय खण्ड) "जय जय श्री राधे" *******************************************

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आज के विचार ( साधू सेवा आवश्यक क्यों ...) सन्त न होते जगत में तो जल जाता संसार .... ( श्रीकबीर दास ) जनकपुर में इन दिनों भक्तमाल की कथा कह रहा हूँ .........बड़ा ही अद्भुत और प्रेमपूर्ण ग्रन्थ है भक्तमाल । भक्तमाल में साधू सेवा पर ज्यादा प्रकाश क्यों डाला गया है ? ये प्रश्न यहाँ के एक साधक का था । हाँ ..........पक्षियों को नित दाना डालो ............आज एक आयेंगें तो कल दो आयेंगें .......ऐसे धीरे धीरे करके कुछ ही दिन में आप पाओगे की आपका आँगन पक्षियों से भर जाएगा .....। पर याद रहे ........इसका अद्भुत फल तो उस समय मिलेगा .....कि एक दिन आकाश में उड़ते हुये कोई हँस आएगा .........और आपके यहाँ दाना चुगेगा ......तब तुम धन्य हो जाओगे । मैने सहजता में ये बात कही थी । पर लॉजिक क्या है इस साधू सेवा का ? साधू की सेवा ? ये साधक नया नया था...इसलिये लॉजिक बताना आवश्यक था इसे । *************************************************** इस कलियुग में ....घोर कलियुग में .......क्या सच्चे साधू हैं ? ये प्रश्न साधक का तो नही था .....पर प्रश्न तो था । और उत्तर देना ही चाहिये .....क्यों की प्रश्न युवा पीढ़ी का है । मुझे तो नही लगता ........कि कोई सच्चा साधू भी है आज के इस समय में ......उसनें कई नाम गिनाये भी ......जो साधू भेष में असाधु थे । एक प्रश्न ये भी था ......इस प्रश्न का उल्लेख करना भी ठीक रहेगा । पर ये प्रश्न उच्चकोटि के साधक का था ......जो अच्छी स्थिति को पा चुके थे ............। साधना करते हुए ............हमारा शरीर छूट गया ......साधना पूर्ण नही हुयी थी ..........कुछ दिन और अगर हमारा शरीर रहता .....तो साधना पूरी हो जाती ......पर हमारे शरीर नें हमारा साथ छोड़ दिया । अब दूसरा शरीर हमें मिला .............पर हमारा मार्ग दर्शन करनें वाला उस समय हमें कौन मिलेगा ? अभी ही कलियुग आगया है ..........अच्छे साधू मिलनें कठिन हो गए हैं ......पर हमारा जब दूसरा जन्म होगा ......तब तो हो सकता है ......कोई भी न हो ......उस घोर कलिकाल में हमारी साधना को कौन आगे बढ़ानें की प्रेरणा देगा ........आप इसके बारे में हमें कुछ बताइये । ये प्रश्न था एक वयोवृद्ध का....जो इस समय दिल्ली में निवास करते हैं....और यदा कदा मुझ से वृन्दावन में भी आकर मिलते रहते हैं । ****************************************************** एक बात याद रखिये .................... आग लगी आकाश में झर झर गिरे अंगार सन्त न होते जगत में तो जल जाता संसार । ये दोहा सन्त श्री कबीर दास जी महाराज का है .....और शत प्रतिशत सत्य है .........। आपको क्या लगता है ..........नकारात्मकता से भरे लोगों से ये जगत चल रहा है ? राग द्वेष से भरे हुए लोगों के कारण ये संसार चल रहा है ? अरे ! विशुद्ध सकारात्मकता और प्रेमपूर्ण हृदय वाले लोग अगर न हों .......तो आपको लगता है ये संसार रह पाता ? विचार कीजिये........मैने उन्हें इंटरनेट के माध्यम से समझाया था। हाँ .......मै मानता हूँ ............कि संख्या कम होगी ..........इस समय ऐसे प्रेमपूर्ण हृदय वाले साधुओं की ..........पर आप ये नही कह सकते कि...... हैं ही नहीं ........अगर नही होते ना .......तो याद रखिये ये जगत खतम हो जाता .............निस्वार्थ प्रेम वाले मानव अगर नही रहेंगें इस जगत में ......तो ये जगत रहेगा ही नही । मैने कहा .....अब आप सोच रहे होंगें.....हमें क्यों नही मिलते ऐसे लोग ? तो प्रभु ! मै तो इतना ही कहूँगा कि आपनें खोजा ही नही होगा । मै कहता हूँ .............आज के समय में मैने ऐसे ऐसे महात्माओं के दर्शन किये हैं ...........जिनके सामनें ईश्वर साकार होकर बातें करता है .....आप विश्वास करेंगें ? मैने ऐसे ऐसे सन्तों के दर्शन किये हैं ...........जो रामकृष्ण परमहंस की तरह सिद्ध हैं.....और उनके हाथों से ईश्वर भोग को स्वीकार करते हैं । खोजनें पर ही वस्तु मिलती है .......ये बात आप मानते हैं या नही ? मैने उनसे पूछा । उन्होंने मेरी बात स्वीकार की .........। ******************************************************* ईश्वर की व्यवस्था अधूरी नही है ........पूर्ण है । आपको पता है ........चाहे कितना भी घोर कलियुग आजाये .......पर हर गाँव में ...............एक ऐसी चेतना रहती ही है ......जो उस परमसत्ता से संचालित होती है ................और उस चेतना का यही कार्य है कि ....जो अच्छे अच्छे सकारात्मक प्रेमपूर्ण हृदय वाले हैं .....उनको इस कलियुग के ताप से बचाना......और उन्हें सही दिशा देना । ऐसी चेतना हर गाँव में होती ही है ..........उस दिव्य चेतना को हम लोग साधू कहते हैं .......या सन्त कहते हैं । इनका कार्य होता है ...............जो सच्चे हृदय के लोग हैं .....उनकी देख रेख करना ............उनके हृदय में और सकारात्मक भाव को भरना .......और सबके प्रति अच्छी सोच को विकसित करके ..........उस परमसत्ता की ओर उन्हें बढ़ाना । ऐसे लोग इसी कार्य के लिए आस्तित्व द्वारा निर्धारित होते हैं । इनका और कोई कार्य होता नही है .................... ऐसे लोग फिर शरीर छोड़ दें तो ? कोई बात नही ......आस्तित्व दूसरों को भेज देता है ..........उसके पास कमी तो है नही ऐसे सन्तों और साधुओं की ...........मैने कहा । अब बताइये .............ऐसे साधुओं की सेवा अगर आपके द्वारा होती है .....तो ये अच्छा है या बुरा है ? ऐसे निस्वार्थ जन की सेवा आपके द्वारा होती है .....तो आस्तित्व आप पर प्रसन्न होगा .....या नाराज होगा .....? विचार कीजिये । आपको नही लगता .............ऐसे साधुओं की सेवा करना ही आपका परम धर्म है .....! नही नही .....आप जिनका नाम लेकर मुझे कह रहे हैं ...........कि आजकल के ये साधू ............तो मित्र ! मै उन्हें साधू मान ही नही रहा । साधू तो न अपनी ऊर्जा आश्रम बनानें में व्यय करेगा ......न हॉस्पिटल खोलनें में ........न कोई और सामाजिक कार्यों में उलझेगा .....। उसका काम तो बस इतना ही होगा .......सकारात्मकता ऊर्जा को इस जगत के आबोहवा में फैलाना ..........निस्वार्थ प्रेम द्वारा सबको शान्ति की राह बताना ..........। अब ऐसे व्यक्ति की सेवा आपको अगर मिल जाए ......( वैसे तो मिलनी मुश्किल है ....क्यों की ऐसे लोग सेवा लेते भी तो नही हैं ) तो आप धन्य हैं .......आपका धन या तन से की गयी सेवा आपको वो दे सकती है ......जिसके बारे में आपनें सोचा भी नही होगा । अब आप कहेंगें कि मै साधू सेवा क्यों करूँ ? मेरी बात समझ तो गए ना आप ? मैने उनसे पूछा । हाँ ...यही है सच्ची सेवा.....जो समाज में निस्वार्थ प्रेम को फैला रहा है ...उसकी सेवा .......। उन्होंने मेरी बात स्वीकार की.........साधू की सेवा करनी ही चाहिये । आप क्या कहोगे ? साधकों ! Harisharan

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