*॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥* "श्रीमद्भागवतमहापुराण" स्कन्ध 09; अध्याय 19,श्रलोक..(01-29) ---------------------------------------- *ययाति का गृहत्याग* ---------------------------------------- श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! राजा ययाति इस प्रकार स्त्री के वश में होकर विषयों का उपभोग करते रहे। एक दिन जब अपने अधःपतन पर दृष्टि गयी, तब उन्हें बड़ा वैराग्य हुआ और उन्होंने अपनी प्रियपत्नी देवयानी से इस गाथा का गान किया- ‘भृगुनन्दिनी! तुम यह गाथा सुनो। पृथ्वी में मेरे ही समान विषयीं का यह इतिहास है। ऐसे ही ग्रामवासी विषयी पुरुषों के सम्बन्ध में वनवासी जितेन्द्रिय पुरुष दुःख के साथ विचार किया करते हैं कि इनका कल्याण कैसे होगा? एक था बकरा। वह वन में अकेला ही अपने को प्रिय लगने वाली वस्तुएँ ढूँढ़ता हुआ घूम रहा था। उसने देखा कि अपने कर्मवश एक बकरी कूएँ में गिर पड़ी है। वह बकरा बड़ा कामी था। वह सोचने लगा कि इस बकरी को किस प्रकार कूएँ से निकाला जाये। उसने अपने सींग से कूएँ के पास की धरती खोद डाली और रास्ता तैयार कर लिया। जब वह सुन्दरी बकरी कूएँ से निकली तो उसने उस बकरे से ही प्रेम करना चाहा। वह दाढ़ी-मूँछमण्डित बकरा हृष्ट-पुष्ट, जवान, बकरियों को सुख देने वाला, विहार कुशल और बहुत प्यारा था। जब दूसरी बकरियों ने देखा कि कूएँ में गिरी हुई बकरी ने उसे अपना प्रेमपात्र चुन लिया है, तब उन्होंने भी उसी को अपना पति बना लिया। वे तो पहले से ही पति की तलाश में थीं। उस बकरे के सिर पर कामरूप पिशाच सवार था। वह अकेला ही बहुत-सी बकरियों के साथ विहार करने लगा और अपनी सब सुध-बुध खो बैठा। जब उसकी कूएँ से निकाली हुई प्रियतमा बकरी ने देखा कि मेरा पति तो अपनी दूसरी प्रियतमा बकरी से विहार कर रहा है तो उसे बकरे की यह करतूत सहन न हुई। उसने देखा कि यह तो बड़ा कामी है, इसके प्रेम का कोई भरोसा नहीं है और यह मित्र के रूप में शत्रु का काम कर रहा है। अतः वह बकरी उस इन्द्रियलोलुप बकरे को छोड़कर बड़े दुःख से अपने पालने वाले के पास चली गयी। वह दीनकामी बकरा उसे मनाने के लिये ‘में-में’ करता हुआ उसके पीछे-पीछे चला। परन्तु उसे मार्ग में मना न सका। उस बकरी का स्वामी एक ब्राह्मण था। उसने क्रोध में आकर बकरे के लटकते हुए अण्डकोष को काट दिया। परन्तु फिर उस बकरी का ही भला करने के लिये फिर से उसे जोड़ भी दिया। उसे इस प्रकार के बहुत-से उपाय मालूम थे। प्रिये! इस प्रकार अण्डकोष जुड़ जाने पर वह बकरा फिर कूएँ से निकली हुई बकरी के साथ बहुत दिनों तक विषय भोग करता रहा, परन्तु आज तक उसे सन्तोष न हुआ। सुन्दरी! मेरी भी यही दशा है। तुम्हारे प्रेमपाश में बँधकर मैं भी अत्यन्त दीन हो गया। तुम्हारी माया से मोहित होकर मैं अपने-आपको भी भूल गया हूँ। ‘प्रिये! पृथ्वी में जितने भी धान्य (चावल, जौ आदि), सुवर्ण, पशु और स्त्रियाँ हैं-वे सब-के-सब मिलकर भी उस पुरुष के मन को सन्तुष्ट नहीं कर सकते जो कामनाओं के प्रहार से जर्जर हो रहा है। विषयों के भोगने से भोगवासना कभी शान्त नहीं हो सकती। बल्कि जैसे घी की आहुति डालने पर आग और भड़क उठती है, वैसे ही भोग वासनाएँ भी भोगों से प्रबल हो जाती हैं। जब मनुष्य किसी भी प्राणी और किसी भी वस्तु के साथ राग-द्वेष का भाव नहीं रखता, तब वह समदर्शी हो जाता है तथा उसके लिये सभी दिशाएँ सुखमयी बन जाती हैं। विषयों की तृष्णा ही दुःखों का उद्गम स्थान है। मन्द बुद्धि लोग बड़ी कठिनाई से उसका त्याग कर सकते हैं। शरीर बूढ़ा हो जाता है, पर तृष्णा नित्य नवीन ही होती जाती है। अतः जो अपना कल्याण चाहता है, उसे शीघ्र-से-शीघ्र इस तृष्णा (भोग-वासना) का त्याग कर देना चाहिये। और तो क्या-अपनी मां, बहिन और कन्या के साथ भी अकेले एक आसन पर सटकर नहीं बैठना चाहिये। इन्द्रियाँ इतनी बलवान् हैं कि वे बड़े-बड़े विद्वानों को भी विचलित कर देती हैं। विषयों का बार-बार सेवन करते-करते एक हजार वर्ष पूरे हो गये, फिर भी क्षण-प्रति-क्षण उन भोगों की लालसा बढ़ती ही जा रही है। इसलिये मैं अब भोगों की वासना-तृष्णा का परित्याग करके अपना अन्तःकरण परमात्मा के प्रति समर्पित कर दूँगा और शीत-उष्ण, सुख-दुःख आदि के भावों से ऊपर उठकर अहंकार से मुक्त हो हरिनों के साथ वन में विचरूँगा। लोक-परलोक दोनों के ही भोग असत् हैं, ऐसा समझकर न तो उनका चिन्तन करना चाहिये और न भोग ही। समझना चाहिये कि उनके चिन्तन से ही जन्म-मृत्युरूप संसार की प्रप्ति होती है और उनके भोग से तो आत्मनाश ही हो जाता है। वास्तव में इनके रहस्य को जानकर इनसे अलग रहने वाला ही आत्मज्ञानी है’। परीक्षित! ययाति ने अपनी पत्नी से इस प्रकार कहकर पूरु की जवानी उसे लौटा दी और उससे अपना बुढ़ापा ले लिया। यह इसलिये कि अब उनके चित्त में विषयों की वासना नहीं रह गयी थी। इसके बाद उन्होंने दक्षिण-पूर्व दिशा में द्रुह्यु, दक्षिण में यदु, पश्चिम में तुवर्सु और उत्तर में अनु को राज्य दे दिया। सारे भूमण्डल की समस्त सम्पत्तियों के योग्यतम पात्र पूरु को अपने राज्य पर अभिषिक्त करके तथा बड़े भाइयों को उसके अधीन बनाकर वे वन में चले गये। यद्यपि राजा ययाति ने बहुत वर्षों तक इन्द्रियों से विषयों का सुख भोगा था-परन्तु जैसे पाँख निकल आने पर पक्षी अपना घोंसला छोड़ देता है, वैसे ही उन्होंने एक क्षण में ही सब कुछ छोड़ दिया। वन में जाकर राजा ययाति ने समस्त आसक्तियों से छुट्टी पा ली। आत्म-साक्षात्कार के द्वारा उनका त्रिगुणमय लिंग शरीर नष्ट हो गया। उन्होंने माया-मल से रहित परब्रह्म परमात्मा वासुदेव में मिलकर वह भागवती गति प्राप्त की, जो बड़े-बड़े भगवान के प्रेमी संतों को प्राप्त होती है। जब देवयानी ने वह गाथा सुनी, तो उसने समझा कि ये मुझे निवृत्ति मार्ग के लिये प्रोत्साहित कर रहे हैं। क्योंकि स्त्री-पुरुष में परस्पर प्रेम के कारण विरह होने पर विकलता होती है, यह सोचकर ही इन्होंने यह बात हँसी-हँसी में कही है। स्वजन-सम्बन्धियों का-जो ईश्वर के अधीन है-एक स्थान पर इकठ्ठा हो जाना वैसा ही है, जैसा प्याऊ पर पथिकों का। यह सब भगवान की माया का खेल और स्वप्न के सरीखा ही है। ऐसा समझकर देवयानी ने सब पदार्थों की आसक्ति त्याग दी और अपने मन को भगवान श्रीकृष्ण में तन्मय करके बन्धन के हेतु लिंग शरीर का परित्याग कर दिया-वह भगवान को प्राप्त हो गयी। उसने भगवान को नमस्कार करके कहा- ‘समस्त जगत् के रचयिता, सर्वान्तर्यामी, सबके आश्रयस्वरूप सर्वशक्तिमान् भगवान वासुदेव को नमस्कार है। जो परमशान्त और अनन्त तत्त्व हैं, उसे मैं नमस्कार करती हूँ’। क्रमशः अगला पोस्ट :- “स्कन्ध 09; अध्याय 20 ;श्रलोक 01 से 39 तक” ---------------------------------------- "गीताप्रेस ; गोरखपुर द्वारा प्रकाशित पुस्तक *'श्रीमद्भागवतमहापुराण'* पु० कोड..(1535) से"

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. "सच्चा पारस" गौड़ देश में एक ब्राह्मण निर्धनता के कारण बहुत दु:खी था। जहाँ कहीं भी वह सहायता माँगने जाता, सब जगह उसे तिरस्कार मिलता। वह ब्राह्मण शास्त्रों को जानने वाला व स्वाभिमानी था। उसने संकल्प किया कि जिस थोड़े से धन व स्वर्ण के कारण धनी लोग उसका तिरस्कार करते हैं, वह उस स्वर्ण को मूल्यहीन कर देगा। वह अपने तप से पारस प्राप्त करेगा और सोने की ढेरियाँ लगा देगा। लेकिन उसने सोचा कि ‘पारस मिलेगा कहाँ ? ढूँढ़ने से तो वह मिलने से रहा। कौन देगा उसे पारस ? देवता तो स्वयं लक्ष्मी के दास हैं, वे उसे क्या पारस देगें ?’ ब्राह्मण ने भगवान औघड़दानी शिव की शरण में जाने का निश्चय किया, ‘जो विश्व को विभूति देकर स्वयं भस्मांगराग लगाते हैं; वे कपाली ही कृपा करें तो पारस प्राप्त हो सकता है।’ ब्राह्मण ने निरन्तर भगवान शिव का रुद्रार्चन, पंचाक्षर-मन्त्र का जप और कठिन व्रत करना शुरु कर दिया। आखिर भगवान आशुतोष कब तक संतुष्ट नहीं होते ! ब्राह्मण की बारह वर्ष की तपस्या सफल हुई। भगवान शिव ने स्वप्न में दर्शन देकर कहा, ‘तुम वृन्दावन में श्रीसनातन गोस्वामी के पास जाओ। उनके पास पारस है और वे तुम्हें दे देंगे।’ ‘श्रीसनातन गोस्वामी के पास पारस है, और वे उस महान रत्न को मुझे दे देंगे। भगवान शंकर ने कहा है तो वे अवश्य दे देंगें’- ऐसा सोचते हुए ब्राह्मण वृन्दावन की ओर चला जा रहा था। खुशी के मारे यात्रा की थकान व नींद उससे कोसों दूर चली गयी थी। वृन्दावन पहुँचने पर उसने लोगों से श्रीसनातन गोस्वामी का पता पूछा। लोगों ने वृक्ष के नीचे बैठे अत्यन्त कृशकाय (दुर्बल), कौपीनधारी, गुदड़ी रखने वाले वृद्ध को श्रीसनातन गोस्वामी बतलाया। (चैतन्य महाप्रभुजी के शिष्य सनातन गोस्वामी वृन्दावन में वृक्ष के नीचे रहते थे, भीख माँगकर रूखी-सूखी खाते, फटी लंगोटी पहनते और गुदड़ी व करवा साथ में रखते थे। आठ प्रहर में केवल चार घड़ी सोते और शेष समय श्रीकृष्णनाम का कीर्तन करते थे। एक समय वे विद्या, पद, ऐश्वर्य और मान में लिप्त थे, बंगाल के कर्ता-धर्ता थे, किन्तु श्रीकृष्णकृपा से श्रीकृष्णप्रेम की मादकता से ऐसे दीन बन गये कि परम वैरागी बनकर वृन्दावन से ही गोलोक पधार गए।) ब्राह्मण ने मन में कहा, ‘यह कंगाल सनातन गोस्वामी है, ऐसे व्यक्ति के पास पारस होने की आशा कैसे की जा सकती है ; लेकिन इतनी दूर आया हूँ तो पूछ ही लेता हूँ, पूछने में क्या जाता है ?’ ब्राह्मण ने जब श्रीसनातन गोस्वामी से पारस के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा- ‘इस समय तो मेरे पास नहीं है, मैं उसका क्या करता ? श्रीसनातन गोस्वामी ने बताया कि एक दिन मैं यमुनास्नान को जा रहा था तो रास्ते में पारस पत्थर पैर से टकरा गया। मैंने उसे वहीं यमुनाजी की रेत में गाड़ दिया जिससे किसी दिन यमुनास्नान से लौटते समय वह मुझे छू न जाए ; क्योंकि उसे छूकर तो पुन: स्नान करना पड़ता है। तुम्हें चाहिए तो तुम उसे वहाँ से निकाल लो।’ (कंचन, कामिनी (सोना, स्त्री आदि) भगवान की विस्मृति कराने वाले हैं इसलिए सच्चे संत पारस के छू जाने भर को अपवित्र मानते हैं) श्रीसनातन गोस्वामी ने जहाँ पारस गड़ा हुआ था, उस स्थान का पता ब्राह्मण को बतला दिया। रेत हटाने पर ब्राह्मण को पारस मिल गया। पारस की परीक्षा करने के लिए ब्राह्मण लोहे का एक टुकड़ा अपने साथ लाया था। जैसे ही ब्राह्मण ने लोहे को पारस से स्पर्श किया वह स्वर्ण हो गया। पारस सही मिला है, इससे अत्यन्त प्रसन्न होकर ब्राह्मण अपने गाँव की ओर लौट दिया। तभी ब्राह्मण के मन में एक प्रश्न कौंधा, ‘उस संत के पास तो यह पारस था फिर भी उसने इसे अपने पास नहीं रखा ; बल्कि यह कहा कि अगर यह छू भी जाए तो उन्हें स्नान करना पड़ता है। अवश्य ही उनके पास पारस से भी अधिक कोई मूल्यवान वस्तु है। ब्राह्मण लौटकर श्रीसनातन गोस्वामी के पास आया और बोला, ‘अवश्य ही आपके पास पारस से भी अधिक मूल्यवान वस्तु है जिसके कारण आपने उसे त्याग दिया।’ ब्राह्मण को देखकर हँसते हुए श्रीसनातन गोस्वामी ने कहा, ‘पारस से बढ़कर श्रीकृष्णनाम रूपी कल्पवृक्ष मेरे पास है।’ पारस से तो केवल सोना ही मिलता है किन्तु श्रीकृष्णनाम सब कुछ देने वाला कल्पवृक्ष है, उससे आप जो चाहेंगे, वह प्राप्त होगा। ऐसा कोई कार्य नहीं जो भगवान के नाम के आश्रय लेने पर न हो। मुक्ति चाहोगे, मुक्ति मिलेगी ; परमानन्द चाहोगे, परमानन्द मिलेगा; व्रजरस चाहोगे व्रजरस मिलेगा। श्रीकृष्ण का एक नाम सब पापों का नाश करता है, भक्ति का उदय करता है, भवसागर से पार करता है और अंत में श्रीकृष्ण की प्राप्ति करा देता है। एक ‘कृष्ण’ नाम से इतना धन मिलता है। यह सुनकर ब्राह्मण ने सनातन गोस्वामीजी से विनती की, ‘मुझे आप वही श्रीकृष्णनाम रूपी पारस प्रदान करने की कृपा करें।’ श्रीसनातन गोस्वामी ने कहा—‘उसकी प्राप्ति से पहले आपको इस पारस को यमुना में फेंकना पड़ेगा।’ ब्राह्मण ने ‘यह गया पारस’ कहते हुए पूरी शक्ति से पारस को यमुना में दूर फेंक दिया। भगवान शिव की दीर्घकालीन तपस्या व संत के दर्शन से ब्राह्मण के मन व चित्त निर्मल हो गए थे। उसका धन का मोह समाप्त हो गया और वह भगवान की कृपा का पात्र बन गया। श्रीसनातन गोस्वामी ने उसे ‘श्रीकृष्णनाम’ की दीक्षा दी, वह ‘श्रीकृष्णनाम’ जिसकी कृपा के एक कण से करोड़ों पारस बन जाते हैं। नाम रूपी पारस से तो सारा शरीर ही कंचन का हो जाता है। ‘जो मेरे नामों का गान करके मेरे समीप प्रेम से रो उठते हैं, उनका मैं खरीदा हुआ गुलाम हूँ; यह जनार्दन दूसरे किसी के हाथ नहीं बिका है।’ जिसने एक बार श्रीकृष्णनाम का स्वाद ले लिया उसे फिर अन्य सारे स्वाद रसहीन लगने लगते हैं। भवसागर से डूबते हुए प्राणी के लिए वह नौका है। मोक्ष चाहने वाले के लिए वह सच्चा मित्र है, मनुष्य को परमात्मा से मिलाने वाला सच्चा गुरु है, अंत:करण की मलिन वासनाओं के नाश के लिए दिव्य औषधि है। यह मनुष्य को ‘शुक’ से ‘शुकदेव’ बना देता है। "हुआ ना श्रीकृष्णनाम सच्चा पारस" ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" ********************************************

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🌹 राधा नाम से संत की आँखे ठीक हो गई🌺 एक संत थे वृन्दावन में रहा करते थे, श्रीमद्भागवत में बड़ी निष्ठा उनकी थी, उनका प्रतिदिन का नियम था कि वे रोज एक अध्याय का पाठ किया करते थे, और राधा रानी जी को अर्पण करते थे ,ऐसे करते करते उन्हे 55 वर्ष बीत गए,पर उन्होंने एक दिन भी ऐसा नही गया जब राधारानी जी को भागवत का अध्याय न सुनाया हो. एक रोज वे जब पाठ करने बैठे तो उन्हें अक्षर दिखायी ही नहीं दे रहे थे और थोड़ी देर बाद तो वे बिलकुल भी नहीं पढ़ सके अब तो वे रोने लगे और कहने लगे - हे प्रभु ! में इतने दिनों से पाठ कर रहा हूँ फिर आपने आज ऐसा क्यों किया अब मै कैसे राधारानी जी को पाठ सुनाऊंगा. रोते-रोते उन्हें सारा दिन बीत गया. कुछ खाया पिया भी नहीं क्योकि पाठ करने का नियम था और जब तक नियम पूरा नहीं करते, खाते पीते भी नहीं थे, आज नियम नहीं हुआ तो खाया पिया भी नहीं. तभी एक छोटा-सा बालक आया और बोला - बाबा! आप क्यों रो रहे हो? क्या आपकी आँखे नहीं है इसलिए रो रहे हो ? बाबा बोले- नहीं लाला! आँखों के लिए क्यों रोऊंगा मेरा नियम पूरा नहीं हुआ इसलिए रो रहा हूँ. बालक बोला - बाबा! मै आपकी आँखे ठीक कर सकता हूँ आप ये पट्टी अपनी आँखों पर बाँध लीजिए, बाबा ने सोचा लगता है वृंदावन के किसी वैध का लाला है कोई इलाज जानता होगा, बाबा ने आँखों पर पट्टी बांध ली और सो गए, जब सुबह उठे और पट्टी हटाई तो सबकुछ साफ दिखायी दे रहा था. बाबा बड़े प्रसन्न हुए और सोचने लगे देखूं तो उस बालक ने पट्टी में क्या औषधि रखी थी और जैसे ही बाबा ने पट्टी को खोला तो पट्टी में राधा रानी जी का नाम लिखा था इतना देखते ही बाबा फूट फूट कर रोने लगे और कहने लगे - वाह! किशोरी जी आपके नाम की कैसी अनंत महिमा है. 🙏🏻🙏🏻💐💐राधे राधे 💐💐🙏🏻🙏🏻

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🙌🏼 आज श्रीमन्महाप्रभु के श्रीवृन्दावन आगमन उत्सव और कार्तिक पूर्णिमा की कोटि-कोटि बधाई !! श्री अमिय निमाई मन्दिर से नगर शोभा यात्रा !! शुभ कार्तिक पूर्णिमा के दिन श्रीमन्महाप्रभु ने श्री धाम वृन्दावन में पदार्पण किया । श्री कृष्ण की रास स्थलियों के दर्शन कर प्रभु प्रेमानन्द में मूर्छित हो गिर पड़े । मूर्छा भंग होने पर दिन भर वहाँ नृत्य कीर्तन करते रहे । उनके नर्तन ,कीर्तन से वृन्दावन मुखरित हो उठा । जिस वृन्दावन के दर्शन की साध न जाने कब से प्रभु अपने ह्रदय में संजोयें हुए थे , जिसके लिए न जाने कितने आँसू बहा चुके थे ... उसी वृन्दावन के तरू लताओं के बीच आज अपने को पाकर वे फूले नहीं समा रहे । वे प्रत्येक वृक्ष को आलिगंन कर वैसे ही सुख का उपभोग कर रहे है , जैसा अपने किसी अति प्रिय जन के आलिगंन से होता है । तरू लता भी इतने दिनों के उपरान्त अपने काले कन्हाई को गौर कन्हाई के रूप में पाकर उनके ऊपर प्रेम पूर्वक पुष्प वृष्टि कर रहे हैं । ऐसे में हमारे प्राण गौराराय को विरहणी प्रियाजी का भावावेश होता है ... और वे उन्मादित हो तृषित नेत्रों से अपने श्यामसुन्दर का प्रत्येक स्थान पर अन्वेषण करने लगते है । जय आमादेर आमादेर आमादेर प्राण गौराराय । कृष्ण विरहणि उन्मादिनी प्राण गौराराय !! श्याम पगिलनी उन्मादिनी प्राण गौराराय !! 🙌🏼 श्रीराधारमण दासी परिकर 🙌🏼

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🌷 हरे कृष्णा 🌷 🌷कृष्णभावनामृत 🌷 कृष्णभावनामृतभक्ति-पद तक ऊपर उठने के लिए हमें पांच बातों का ध्यान रखना चाहिए : 1. भक्तों की संगति करना, 2. भगवान कृष्ण की सेवा में लगना, 3. श्रीमद् भागवत का पाठ करना, 4. भगवान के पवित्र नाम का कीर्तन करना तथा 5. वृन्दावन या मथुरा में निवास करना | यदि कोई इन पांच बातों में से किसी एक में थोडा भी अग्रसर होता है तो उस बुद्धिमान व्यक्ति का कृष्ण के प्रति सुप्त प्रेम क्रमशः जागृत हो जाता है नियमित भक्ति करते रहने से हृदय कोमल हो जाता है , धीरे धीरे सारी भौतिक इच्छाओं से विरक्ति हो जाती है, तब वह कृष्ण के प्रीति अनुरुक्त हो जाता है | जब यह अनुरुक्ति प्रगाढ़ हो जाती है तब यही भगवत्प्रेम कहलाती है हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे।

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. "स्वस्तिक का महत्व" किसी भी शुभ कार्य को आरंभ करने से पहले हिन्दू धर्म में स्वास्तिक का चिन्ह बनाकर उसकी पूजा करने का महत्व है। मान्यता है कि ऐसा करने से कार्य सफल होता है। स्वास्तिक के चिन्ह को मंगल प्रतीक भी माना जाता है। स्वास्तिक शब्द को ‘सु’ और ‘अस्ति’ का मिश्रण योग माना जाता है। यहाँ ‘सु’ का अर्थ है शुभ और ‘अस्ति’ से तात्पर्य है होना। अर्थात स्वास्तिक का मौलिक अर्थ है ‘शुभ हो’, ‘कल्याण हो’। विवाह, मुंडन, संतान के जन्म और पूजा पाठ के विशेष अवसरों पर स्वस्तिक का चिन्ह बनता है। यही कारण है कि किसी भी शुभ कार्य के दौरान स्वास्तिक को पूजना अति आवश्यक माना गया है। लेकिन असल में स्वस्तिक का यह चिन्ह क्या दर्शाता है, इसके पीछे ढेरों तथ्य हैं। स्वास्तिक में चार प्रकार की रेखाएं होती हैं, जिनका आकार एक समान होता है। मान्यता है कि यह रेखाएं चार दिशाओं - पूर्व, पश्चिम, उत्तर एवं दक्षिण की ओर इशारा करती हैं। लेकिन हिन्दू मान्यताओं के अनुसार यह रेखाएं चार वेदों - ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद और सामवेद का प्रतीक हैं। कुछ यह भी मानते हैं कि यह चार रेखाएं सृष्टि के रचनाकार भगवान ब्रह्मा के चार सिरों को दर्शाती हैं। इसके अलावा इन चार रेखाओं की चार पुरुषार्थ, चार आश्रम, चार लोक और चार देवों यानी कि भगवान ब्रह्मा, विष्णु, महेश (भगवान शिव) और गणेश से तुलना की गई है। स्वास्तिक की चार रेखाओं को जोड़ने के बाद मध्य में बने बिंदु को भी विभिन्न मान्यताओं द्वारा परिभाषित किया जाता है। मान्यता है कि यदि स्वास्तिक की चार रेखाओं को भगवान ब्रह्मा के चार सिरों के समान माना गया है, तो फलस्वरूप मध्य में मौजूद बिंदु भगवान विष्णु की नाभि है, जिसमें से भगवान ब्रह्मा प्रकट होते हैं। इसके अलावा यह मध्य भाग संसार के एक धुर से शुरू होने की ओर भी इशारा करता है। स्वास्तिक की चार रेखाएं एक घड़ी की दिशा में चलती हैं, जो संसार के सही दिशा में चलने का प्रतीक है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार यदि स्वास्तिक के आसपास एक गोलाकार रेखा खींच दी जाए, तो यह सूर्य भगवान का चिन्ह माना जाता है। वह सूर्य देव जो समस्त संसार को अपनी ऊर्जा से रोशनी प्रदान करते हैं।हिन्दू धर्म के अलावा स्वास्तिक का और भी कई धर्मों में महत्व है। बौद्ध धर्म में स्वास्तिक को अच्छे भाग्य का प्रतीक माना गया है। यह भगवान बुद्ध के पग चिन्हों को दिखाता है, इसलिए इसे इतना पवित्र माना जाता है। यही नहीं, स्वास्तिक भगवान बुद्ध के हृदय, हथेली और पैरों में भी अंकित है। बैसे तो हिन्दू धर्म में ही स्वास्तिक के प्रयोग को सबसे उच्च माना गया है लेकिन हिन्दू धर्म से भी ऊपर यदि स्वास्तिक ने कहीं मान्यता हासिल की है तो वह है जैन धर्म। हिन्दू धर्म से कहीं ज्यादा महत्व स्वास्तिक का जैन धर्म में है। जैन धर्म में यह सातवं जिन का प्रतीक है, जिसे सब तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ के नाम से भी जानते हैं। श्वेताम्बर जैनी स्वास्तिक को अष्ट मंगल का मुख्य प्रतीक मानते हैं। केवल लाल रंग से ही स्वास्तिक क्यों बनाया जाता है? भारतीय संस्कृति में लाल रंग का सर्वाधिक महत्व है और मांगलिक कार्यों में इसका प्रयोग सिन्दूर, रोली या कुमकुम के रूप में किया जाता है। लाल रंग शौर्य एवं विजय का प्रतीक है। लाल रंग प्रेम, रोमांच व साहस को भी दर्शाता है। धार्मिक महत्व के अलावा वैज्ञानिक दृष्टि से भी लाल रंग को सही माना जाता है। लाल रंग व्यक्ति के शारीरिक व मानसिक स्तर को शीघ्र प्रभावित करता है। यह रंग शक्तिशाली व मौलिक है। हमारे सौर मण्डल में मौजूद ग्रहों में से एक मंगल ग्रह का रंग भी लाल है। यह एक ऐसा ग्रह है जिसे साहस, पराक्रम, बल व शक्ति के लिए जाना जाता है। यह कुछ कारण हैं जो स्वास्तिक बनाते समय केवल लाल रंग के उपयोग की ही सलाह देते हैं। वैज्ञानिकों ने तूफान, बरसात, जमीन के अंदर पानी, तेल के कुएँ आदि की जानकारी के लिए कई यंत्रों का निर्माण किया। इन यंत्रों से प्राप्त जानकारियाँ पूर्णतः सत्य एवं पूर्णतः असत्य नहीं होतीं। जर्मन और फ्रांस ने यंत्रों का आविष्कार किया है, जो हमें ऊर्जाओं की जानकारी देता है। उस यंत्र का नाम बोविस है। इस यंत्र से स्वस्तिक की ऊर्जाओं का अध्ययन किया जा रहा है। वैज्ञानिकों ने उसकी जानकारी विश्व को देने का प्रयास किया है। विधिवत पूर्ण आकार सहित बनाए गए एक स्वस्तिक में करीब 1 लाख बोविस ऊर्जाएँ रहती हैं। जानकारियाँ बड़ी अद्भुत एवं आश्चर्यजनक है। स्वस्तिक का महत्व सभी धर्मों में बताया गया है। इसे विभिन्न देशों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। चार हजार साल पहले सिंधु घाटी की सभ्यताओं में भी स्वस्तिक के निशान मिलते हैं। बौद्ध धर्म में स्वस्तिक का आकार गौतम बुद्ध के हृदय स्थल पर दिखाया गया है। मध्य एशिया देशों में स्वस्तिक का निशान मांगलिक एवं सौभाग्य सूचक माना जाता है। शरीर की बाहरी शुद्धि करके शुद्ध वस्त्रों को धारण करके ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए (जिस दिन स्वस्तिक बनाएँ) पवित्र भावनाओं से नौ अंगुल का स्वस्तिक 90 डिग्री के एंगल में सभी भुजाओं को बराबर रखते हुए बनाएँ। केसर से, कुमकुम से, सिन्दूर और तेल के मिश्रण से अनामिका अंगुली से ब्रह्म मुहूर्त में विधिवत बनाने पर उस घर के वातावरण में कुछ समय के लिए अच्छा परिवर्तन महसूस किया जा सकता है।भवन या फ्लैट के मुख्य द्वार पर एवं हर रूम के द्वार पर अंकित करने से सकारात्मक ऊर्जाओं का आगमन होता है भवन या फ्लैट के मुख्य द्वार पर एवं हर रूम के द्वार पर अंकित करने से सकारात्मक ऊर्जाओं का आगमन होता है। ---------------::×::-------------- "जय जय श्री राधे" *******************************************

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