संक्षिप्त भविष्य पुराण 〰️〰️🌼🌼🌼〰️〰️ ॐ श्री परमात्मने नमः श्री गणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ★ब्राह्म पर्व★ (पिचासीवँ दिन) जयन्ती-सप्तमी का विधान और फल... 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ गतांक से आगे... ब्रह्माजी बोले-त्रिलोचन! माघ मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि जयन्ती सप्तमी कही जाती है, यह पुण्यदायिनी, पापविनाशिनी तथा कल्याणकारिणी है। इस तिथि पर जिस विधि से उपासना करनी चाहिये, उसे आप सुनें । पण्डितों ने इस व्रत में चार पारणाओं का उल्लेख किया है। पञ्चमी तिथि में एकभुक्त, षष्ठी में नक्तव्रत और सप्तमी में उपवास करके अष्टमी में पारणा करनी चाहिये। माघ, फाल्गुन तथा चैत्र मास में जब जयन्ती-सप्तमी का व्रत किया जाय तब भगवान् सूर्य को बकुल के सुन्दर पुष्प चढ़ाने चाहिये तथा कुंकुम का विलेपन करना चाहिये, मोदकों का नैवेद्य और घृत का धूप देना चाहिये। पञ्चगव्य-प्राशन करके पवित्रीकरण करना चाहिये। ब्राह्मणों को मोदक यथाशक्ति खिलाना चाहिये तथा शालि नामक चावल का भात भी देना चाहिये। इस प्रकार जो मनुष्य लोकपूज्य भगवान् भास्कर की पूजा करता है, वह इस व्रत की सभी पारणाओं में अश्वमेध एवं राजसूय यज्ञ का फल प्राप्त करता है। द्वितीय पारणा में सूर्यभगवान् की पूजा करके राजसूय-यज्ञ का फल प्राप्त होता है। वैशाख, ज्येष्ठ और आषाढ़ मास में सूर्यदेव की पूजा करने के लिये शतदल कमल तथा श्वेत चन्दन और गुग्गुल के धूप का विधान कहा गया है। इसमें गुड़ के बने हुए अपूप का नैवेद्य अर्पित करना चाहिये और गोमय का प्राशन करना चाहिये। ब्राह्मणों को गुड़ से बने हए अपूपों का भोजन कराना अच्छा माना गया है। यह पारणा पाप नाशिका है। तृतीय पारणा की विधि इस प्रकार है-श्रावण, भाद्रपद और आश्विन मास में रक्त चन्दन, मालती के पष्प और विजय नामक धूप का पूजन में प्रयोग करना चाहिये। घृत में बनाये गये अपूपों का नैवेद्य निवेदित करना चाहिये। ब्राह्मणों को भोजन भी उसी घृत के अपूपों से कराने का विधान है। शरीर को परम पवित्र करने वाले कुशोदक का पान करना चाहिये। यह तृतीय पारणा पापों का नाश करने वाली कही गयी है। अब चौथी पारणा बता रहा हूँ, इसे सुनें- कार्तिक, मार्गशीर्ष तथा पौष मास में सूर्यपूजन की पारणा करने से अनन्त पुण्यफल प्राप्त होते हैं। इस पारणा में कनेर के लाल पुष्प, रक्त चन्दन देने चाहिये। अमृत' नाम का धूप, पायस का श्रेष्ठ नैवेद्य निवेदित करना चाहिये। श्वेत गाय के मढेका प्राशन करने का विधान है। चारों पारणाओं में क्रमश: 'चित्रभानुः प्रीयताम्', 'भानुः प्रीयताम्', 'आदित्यः प्रीयताम्' तथा 'भास्करः प्रीयताम्'– ऐसा उच्चारण करना चाहिये। इस विधि से जो मनुष्य विभावसु भगवान् सूर्यनारायण की पूजा करता है, वह परम पद को प्राप्त होता है। इस प्रकार सप्तमी-व्रत करने पर व्रतकर्ता को सभी अभीष्ट कामनाओं की प्राप्ति हो जाती है। पुत्रार्थी पुत्र तथा धनार्थी धन प्राप्त करता है और रोगी मनुष्य रोगों से मुक्त हो जाता है तथा अन्त में वह नितान्त कल्याण प्राप्त करता है। इस प्रकार जो मनुष्य इस सप्तमी-व्रत का आचरण करता है, वह सर्वत्र विजयी होता है तथा सभी पापों से मुक्त होकर वह विशुद्धात्मा सूर्यलोक को प्राप्त करता है। क्रमश... शेष अगले अंक में 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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शनिदेव की न्याय प्रियता के आगे भगवान शिव को भी झुकना पड़ा 〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰 पौराणिक कथा के अनुसार एक समय शनि देव भगवान शंकर के धाम हिमालय पहुंचे। उन्होंने अपने गुरुदेव भगवान शंकर को प्रणाम कर उनसे आग्रह किया," हे प्रभु! मैं कल आपकी राशि में आने वाला हूं अर्थात मेरी वक्र दृष्टि आप पर पड़ने वाली है। शनिदेव की बात सुनकर भगवान शंकर हतप्रभ रह गए और बोले, "हे शनिदेव! आप कितने समय तक अपनी वक्र दृष्टि मुझ पर रखेंगे।" शनिदेव बोले, "हे नाथ! कल सवा प्रहर के लिए आप पर मेरी वक्र दृष्टि रहेगी। शनिदेव की बात सुनकर भगवन शंकर चिंतित हो गए और शनि की वक्र दृष्टि से बचने के लिए उपाय सोचने लगे।" शनि से बचने हेतु शिव ने धारा हाथी का रूप शनि की दृष्टि से बचने हेतु अगले दिन भगवन शंकर मृत्यु लोक आए। भगवान शंकर ने शनिदेव और उनकी वक्र दृष्टि से बचने के लिए एक हाथी का रूप धारण कर लिया। भगवान शंकर को हाथी के रूप में सवा प्रहर तक का समय व्यतीत करना पड़ा तथा शाम होने पर भगवान शंकर ने सोचा की अब दिन बीत चुका है और शनिदेव की दृष्टि का भी उन पर कोई असर नहीं होगा। इसके उपरांत भगवान शंकर पुनः कैलाश पर्वत लौट आए। भगवान शंकर प्रसन्न मुद्रा में जैसे ही कैलाश पर्वत पर पहुंचे उन्होंने शनिदेव को उनका इंतजार करते पाया। भगवान शंकर को देख कर शनिदेव ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया। भगवान शंकर मुस्कराकर शनिदेव से बोले,"आपकी दृष्टि का मुझ पर कोई असर नहीं हुआ।" यह सुनकर शनि देव मुस्कराए और बोले," मेरी दृष्टि से न तो देव बच सकते हैं और न ही दानव यहां तक की आप भी मेरी दृष्टि से बच नहीं पाए।" यह सुनकर भगवान शंकर आश्चर्यचकित रह गए। शनिदेव ने कहा, मेरी ही दृष्टि के कारण आपको सवा प्रहार के लिए देव योनी को छोड़कर पशु योनी में जाना पड़ा इस प्रकार मेरी वक्र दृष्टि आप पर पड़ गई और आप इसके पात्र बन गए। शनि देव की न्याय प्रियता देखकर भगवान शंकर प्रसन्न हो गए और शनिदेव को हृदय से लगा लिया। 〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰

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मृत्यु के बाद क्यों जल्दी होती है लाश को जलाने की जाने 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 जब भी हमारे परिचित या किसी अपने की मृत्यु होती है तो इसका गहरी पीड़ा होती है .. लेकिन फिर भी मत्यु के साथ ही उसके अंतिम संस्कार की तैयारियों में लग जाते हैं। कल तक जिसे जीवित रूप में हम अपना मानते थे आज वही सिर्फ एक लाश बनकर रह जाता है और ऐसे में घर वालों से लेकर गांव और मोहल्ले वालों की यही कोशिश रहती है कि जल्द से जल्द व्यक्ति की चिता जलाई जाए। ऐसे में क्या आपके मन में ये प्रश्न आया है कि आखिर सभी को मृत व्यक्ति की लाश जलाने की इतनी जल्दी क्यों रहती है।अगर आप इसके विषय में नही जानते हैं तो चलिए आज आपको बताते हैं कि आखिर किसी मौत के बाद लोगों को क्यों जल्दी रहती है उसकी लाश जलाने की, इसके साथ ही जानते हैं अंतिम संस्कार के महत्व को.. सनातन धर्म में मनुष्य के लिए जन्म से लेकर मृत्यु तक सोलह संस्कार बताए गए हैं.. जिसमें आ‌‌ख‌िरी संस्कार है मृत्यु के बाद होने वाला अंतिम संस्कार है। शास्‍त्रों में अंत‌िम संस्कार को बहुत महत्व द‌िया गया है माना जाता है क्योंक‌ि इसी के जरिए मृत व्यक्त‌ि की आत्मा को परलोक में उत्तम स्थान और मिलता है। गरुड़ पुराण में मृत्यु और अंतिम संस्कार के विषय में बहुत सारी बाते वर्णित हैं,गरूण पुराण की माने तो अगर किसी मृत व्यक्त‌ि का अंत‌िम संस्कार नहीं होता है तो उसकी आत्मा को मुक्ति नही मिलती और मृत्‍यु के बाद वो प्रेत बनकर भटकती रहती है और कष्ट भोगती है। गरूण पुराण में अंतिम संस्कार के महत्व बताते हुए ये कहा गया है कि अंतिम संस्कार करने से इसका लाभ मृत्यु व्यक्ति के साथ उसको परिजनों को भी मिलता है। गरुड़ पुराण की माने तो अंतिम संस्कार का इतना महत्व है कि अगर कोई व्यक्ति दुष्ट भी हो तो, उसका सही ढंग से अंतिम संस्कार कर देने पर उसकी दुर्गति नहीं होती है बल्कि उसकी आत्मा को मुक्ति और शान्ति मिल जाती है। अंतिम संस्कार के महत्व के साथ गरुड़ पुराण में ये बात कही गई है की जब तक गांव या मोहल्ले के किसी भी घर कोई लाश पड़ी रहती है तब तक पूरे गांव-मोहल्ले में कोई शुभ कार्य नही हो सकता.. ना ही किसी घर में पूजा होती है और ना ही चूल्हा जलता है!.. इसके अलावा उस दौरान स्नान-ध्यान जैसा कोई शुभ काम नही किया जा सकता है। गरूण पुराण की इसी मान्यता के चलते किसी की मृत्यु होते ही लोग शीघ्र ही उसका अंतिम संस्कार करने की कोशिश करते हैं। साथ ही अगर किसी कारण वश अंतिम संस्कार में देरी होती है तो फिर लाश की विशेष रखवाली करते हैं ताकि कोई जीव-जन्तु उसे छू ना ले छुले क्योंकि इससे उसकी दुर्गति होती है। अंतिम संस्कार के दौरान पिंड दान का भी विशेष महत्व है.. चिता जलाने से पहले घर में और रास्ते में पिंड दान करने से व्यक्ति के गृह देवता, वास्तु देवता, के साथ पिशाच प्रसन्न हो जाते हैं और इस तरह लाश अग्नि में समर्पित करने योग्य होती है। इन सारे कर्मकाण्डों के बाद अंतिम शैया पर रखते वक्त लाश के हाथ और पैर बाँध दिए जाते है, इसके बारे में मान्यता है की ऐसा करने से बुरी ताकतें और नकारात्मक शक्तियां लाश पर अपना प्रभाव नही डाल पाती हैं। इसके साथ चिता जलाने में चन्दन और तुलसी की लकड़ियों का प्रयोग करने का विधान है, इसे काफी शुभ माना जाता है और ये जीवात्मा को दुर्गति से बचाता है। इस तरह पूरे विधि विधान से गरूण पुराण में अंतिम संस्कार की करने की रीति बताई गयी है जबकि आज के आधुनिक समय ये पुराने रीति-रिवाज और कायदे लोग भूलते जा रहे हैं लेकिन ऐसा नही होना चाहिए और मृत व्यक्ति के साथ साथ उसके अपनो के लिए भी अंतिम संस्कार का महत्व समझते हुए इसे पूरी विधि विधान से सम्पादित करना चाहिए। 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸

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आप बिना पैसे के भी अमीर बन सकते हैं.... 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ आप आश्चर्य करेंगे कि क्या बिना पैसे के भी कोई धनवान हो सकता है? लेकिन सत्य समझिए इस संसार में ऐसे अनेक मनुष्य हैं जिनकी जेब में एक पैसा नहीं है या जिनकी जेब ही नहीं है, फिर भी वे धनवान हैं और इतने बड़े धनवान कि उनकी समता दूसरा कोई नहीं कर सकता। जिसका शरीर स्वस्थ है, हृदय उदार है और मन पवित्र है, यथार्थ में बड़ा धनवान है। स्वस्थ शरीर चाँदी से कीमती है, उदार हृदय सोने से मूल्यवान है और पवित्र मन की कीमत रत्नों से अधिक है। लार्ड कालिंगवुड कहते थे-‘दूसरों को धन के ऊपर मरने दो मैं तो बिना पैसे का अमीर हूँ। क्योंकि मैं जो कमाता हूँ नेकी से कमाता हूँ।’ सिसरो ने कहा है-मेरे पास थोड़े से ईमानदारी के साथ कमाये हुए पैसे हैं, परन्तु वे मुझे करोड़पतियों से अधिक आनन्द देते हैं। दधीचि, वशिष्ठ, व्यास, बाल्मीकि, तुलसीदास, सूरदास, रामदास आदि बिना पैसे के अमीर थे, वे जानते थे कि मनुष्य के लिए आवश्यक भोजन मुख द्वारा ही अन्दर नहीं होता और न जीवन को आनन्दमय बनाने वाली सब वस्तुएं पैसे से खरीदी जा सकती हैं? ईश्वर ने जीवन रूपी पुस्तक के प्रत्येक पृष्ठ पर अमूल्य रहस्यों को अंकित कर रखा है, यदि हम चाहें, तो उनको पहचान कर जीवन को प्रकाश पूर्ण बना सकते हैं। एक विशाल हृदय और उच्च आत्मा वाला मनुष्य झोंपड़ी में भी रत्नों की गरमाहट पैदा करेगा। जो सदाचारी है और परोपकार में प्रवृत्त है, वह इस लोक में भी धनी और परलोक में भी। भले ही उसके पास व्यय का अभाव हो। यदि आप विनयशील, प्रेमी, स्वार्थ और पवित्र हैं, तो विश्वास कीजिए कि आप अनन्त धन के स्वामी हैं। जिसके पास पैसा नहीं, वह गरीब कहा जायगा, परन्तु जिसके पास केवल पैसा है, वह उससे भी अधिक कंगाल है। क्या आप सद्बुद्धि और सद्गुण को धन नहीं मानते? अष्टावक्र आठ जगह से टेड़े थे और गरीब थे, पर जब जनक की सभा में जाकर अपने गुणों का परिचय दिया तो राजा उनका शिष्य हो गया। द्रोणाचार्य जब धृतराष्ट्र के राज दरबार में पहुँचे, तो उनके शरीर पर कपड़े भी न थे, पर उनके गुणों ने उन्हें राजकुमारों के गुरु का सम्मान पूर्ण पद दिलाया। महात्मा डायोजेनिस के पास जाकर सिकन्दर ने निवेदन किया-‘महात्मन् वाषिंक आपके लिए क्या वस्तु उपस्थित करूं? उन्होंने उत्तर दिया-“मेरी धूप मत रोक, और एक तरफ खड़ा हो जा। वह चीज मुझसे मत छीन, जो तुम मुझे नहीं दे सकते। इस पर सिकन्दर ने कहा-‘यदि मैं सिकन्दर न होता तो डायोजनिज ही होना पसन्द करता।’ गुरु गोविन्द सिंह, वीर हकीकतराय, छत्रपति शिवाजी, राणा प्रताप आदि ने धन के लिए अपना जीवन उत्सर्ग नहीं किया था। माननीय गोखले से एक बार एक सम्पन्न व्यक्ति ने पूछा कि आप इतना बड़ा राजनीतिज्ञ होते हुए भी गरीब, निर्बल जीवन क्यों व्यतीत करते हैं? उन्होंने उत्तर दिया - “मेरे लिए यही बहुत है। पैसा जोड़कर जीवन जैसी महत्वपूर्ण वस्तु का आधा भाग नष्ट करने में मुझे कुछ भी बुद्धिमत्ता प्रतीत नहीं होती।” फ्रेंकलिन से एक बार उनका एक धनी मित्र यह पूछने गया कि - मैं अपना धन कहाँ रखूँ? उन्होंने उत्तर दिया कि-तुम अपनी थैलियों को अपने सिर के अन्दर उलट लो, अर्थात् उनके बदले ज्ञानवृद्धि कर लो तो कोई भी उस धन को चुरा न सकेगा। 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

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जन्म कुंडली के दशम (पिता व कर्म) भाव मे गुरु का संभावित फल 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ (पिता व कर्म भाव)👉 गुरु यहां नैसर्गिक रूप से केन्द्राधिपति दोष से दूषित है परन्तु यदि गुरु की सेवा की जाये अथवा आवश्यकता होने पर रत्न धारण किया जाये तो जातक अवश्य ही धनवान, राज्य में सम्मान प्राप्त करने वाला, अच्छे चरित्र का तथा अपने साथ पिता के नाम को भी यश देता है। ऐसा जातक स्वयं के पुरुषार्थ से ही सभी प्रकार की सुविधायें प्राप्त करता है। उसके पास उच्च स्तर के वाहन तथा सभी प्रकार की सुविधायें होती हैं। यहां पर कुछ ज्ञानियों के मत अलग हैं। यहां तक तो सबका मत एक ही है कि जातक अत्यधिक सुविधा सम्पन्न तथा धनी होता यहां तकता। परंतु यह सब उसको अपने पिता से प्राप्त होता है यहा का गुरु जातक को सत्कार्य ये युक्त पुण्यात्मा धार्मिक स्वभाव का, प्रत्येक क्षेत्र में लाभ प्राप्त करने के साथ जातक अपने माता-पिता का भक्त होता है। शत्रु भी उससे भय खाते हैं लेकिन उसमें एक कमी यह होती है कि वह प्रत्येक क्षेत्र में अपने विचार रखता है अर्थात् स्वतंत्र विचारों वाला होता है। ऐसा व्यक्ति अहिंसा प्रिय, अति महत्त्वाकांक्षी तथा अपने रहन-सहन को सदैव उच्च स्तरीय रखता है। मैंने अपने अनुभव में देखा है कि उपरोक्त सभी बातें गुरु के शुभ प्रभाव में होने पर होती हैं। यदि गुरु किसी पाप प्रभाव में हो तो जातक को अपने भाइयों तक से आर्थिक मदद लेनी पड़ती है। जातक का गुरु किसी भी स्थिति में हो, लेकिन वह अपनी माता को देवी समान पूजता है। मैंने अपने शोध में एक बात और देखी है कि गुरु यदि कर्क, मिथुन, तुला, कुंभ अथवा वृश्चिक राशि में हो तो बचपन से ही जातक के कन्धों पर जिम्मेदारी आ जाती है अर्थात् कम आयु में ही उसके पिता का देहान्त हो जाता है। मैंने यह योग 85 प्रतिशत घटित होते देखा है। अगर पिता की पत्रिका के आधार पर वह जीवित रहे तो फिर उसका अपने पुत्र से विवाद रखता है। इस पर भी यदि किसी अन्य शुभ योग से उनमें विवाद न हो तो दोनों यदि एक साथ कोई कार्य करें तो उसमें वह असफल रहते हैं। उनके किसी कार्य से उन्हें राजदण्ड अथवा बदनामी भी मिल सकती है। अलग-अलग होते ही वह सफल होने लगते हैं। यहां पर गुरु यदि पुरुष राशि (मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु व कुभ) में हो तो जातक के संतान कम होती है। स्त्री राशि (वृषभ, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर व मीन) में गुरु के प्रभाव से संतान अधिक हो सकती है। ऐसे जातक यदि सरकारी ठेके जिनमें उच्च अधिकारी की मदद की आवश्यकता होती है अथवा शिक्षा के क्षेत्र, स्वतंत्र व्यवसाय के साथ आयात-निर्यात में भी सफल हो सकते हैं। मैंने अपने शोध में इस भाव के गुरु में भी देखा है कि हमें यदि गुरु से उपरोक्त लाभ प्राप्त करने हैं तो अवश्य ही गुरु रत्न धारण करना होगा अथवा गुरु की पूजा-अर्चना करनी होगी अन्यथा हानि के अतिरिक्त कुछ भी प्राप्त नहीं होगा। क्रमशः.... अगले लेख में हम गुरु के एकादश (आय भाव) मे होने पर मिलने वाले प्रभावों के विषय मे चर्चा करेंगे। पं देवशर्मा 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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