✅ प्रभु की कृपा ✅ ▶️ एक वैष्णव रीति है कि आपस में जब मिलते हैं तो एक दूसरे को कहते हैं कि ▶️ आप पर प्रभु की बहुत कृपा है । आप धन्य हैं । आप परम वैष्णव हैं हम पर भी कृपा कीजिये । ▶️ ऐसे में सदा ही विनम्रता पूर्वक अपने गुरुदेव । अन्य संत वैष्णवजन को मन ही मन एवम् उनके उत्तर में स्मरण करना चाहिए । ▶️ और यही कहना चाहिए कि ये सब उनकी करुणा है की इस अधम को अपनाया । व बड़े दयालु हैं । कृपालु हैं । उनका ही ह जो कुछ हैं ▶️ अहम् तो आना ही नही है । अपितु अहसान फरामोशी भी नहीं । नहीं तो प्रभु । गुरु सोचते हैं कि इतनी कृपा की मेने फिर भी ये ।नहीं है । नही है । करता रहता । ▶️ कोई हमे सम्मान दे । हम तुरंत गुरु । कृष्ण । संत । वैष्णव का गुण गान करने लग जाएँ । ▶️ और सदा ये स्वीकार करें कि ▶️ हाँ हाँ । कृपा थोड़ी है । थोड़ी की ज़रूरत है । 🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚 🐚 ॥ जय निताई ॥ LBW - Lives Born Works at vrindavan

+23 प्रतिक्रिया 5 कॉमेंट्स • 1 शेयर

. "कुछ तो लोग कहेंगे" एक साधु किसी नदी के पनघट पर गया और पानी पीकर पत्थर पर सिर रखकर सो गया। पनघट पर पनिहारिन आती-जाती रहती हैं तो तीन-चार पनिहारिनें पानी के लिए आईं तो एक पनिहारिन ने कहा- "आहा ! साधु हो गया, फिर भी तकिए का मोह नहीं गया। पत्थर का ही सही, लेकिन लगा तो रखा है।" पनिहारिन की बात साधु ने सुन ली, उसने तुरन्त पत्थर फेंक दिया। दूसरी बोली, "साधु हुआ, लेकिन खीज नहीं गई, अभी रोष नहीं गया, तकिया फेंक दिया।" तब साधु सोचने लगा, अब वह क्या करे ? तब तीसरी पनिहारिन बोली, "बाबा ! यह तो पनघट है, यहाँ तो हमारी जैसी पनिहारिनें आती ही रहेंगी, बोलती ही रहेंगी, उनके कहने पर तुम बार-बार परिवर्तन करोगे तो साधना कब करोगे ?" तभी एक चौथी पनिहारिन ने बहुत ही सुन्दर और एक बड़ी अद्भुत बात कह दी- "साधु, क्षमा करना, लेकिन हमको लगता है, तूमने सब कुछ छोड़ा लेकिन अपना चित्त नहीं छोड़ा है, अभी तक वहीं का वहीं बने हुए हैं। दुनिया पाखण्डी कहे तो कहे, तुम जैसे भी हो, हरिनाम लेते रहो।" सच तो यही है, दुनिया का तो काम ही है कहना। आप ऊपर देखकर चलोगे तो कहेंगे, "अभिमानी हो गए।" नीचे देखकर चलोगे तो कहेंगे, "बस किसी के सामने देखते ही नहीं।" आँखें बन्द कर दोगे तो कहेंगे कि, "ध्यान का नाटक कर रहा है।" चारों ओर देखोगे तो कहेंगे कि, "निगाह का ठिकाना नहीं। निगाह घूमती ही रहती हैं।" और परेशान होकर आँख फोड़ लोगे तो यही दुनिया कहेगी कि, "किया हुआ भोगना ही पड़ता है।" ईश्वर को राजी करना आसान है, लेकिन संसार को राजी करना असंभव है। दुनिया क्या कहेगी, उस पर ध्यान दोगे तो आप अपना ध्यान नहीं लगा पाओगे। क्योंकि लोगों का काम है कहना। ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" ********************************************

+20 प्रतिक्रिया 4 कॉमेंट्स • 18 शेयर

📀📀जय श्री सीताराम जी 📀📀 🏵️🏵️🌸🌸🌼🌼🌸🌸🏵️🏵️ परम पूज्य ब्रह्मलीन श्री राजेश्वरानंद महाराज जी की वाणी सिय राम प्रेम पियूष पूरन होत जनम न भरत को। मुनि मन अगम जम नियम सम दम विषम व्रत आचरत को। दुःख दाह दारिद दम्भ दूषन सुजस विष अपहरत को। कलिकाल तुलसी से सठनि हठि राम सनमुख करत को।। श्री सीताराम जी के प्रेमामृत से परिपूर्ण श्री भरत जी का जन्म यदि इस धरा पर न हुआ होता। मुनि मन अगम, जो मुनियों के मन के लिए भी अगम हैं, ऐसे यम, नियम, सम और दम विषम व्रतों का आचरण कौन करता? दुःख,दाह और दरिद्रता, दम्भ जैसे दोषों का अपहरण अपने सुयश के बहाने कौन करता? और श्री तुलसीदास जी अपनी व्यक्तिगत बात कहते हैं कि इस कलिकाल में तुलसीदास जैसे शठ को श्री राम जी की शरण में कौन भेजता? यदि श्री भरत जी का अवतार न हुआ होता। भगवान से जोड़ देना, यह गुरुदेव का ही कार्य है। गुरु कृपा के बिना व्यक्ति भगवान से नहीं जुड़ पाता। यह सत्य है कि भगवान की कृपा के बिना गुरुदेव नहीं मिलते, पर यह भी सत्य है कि गुरुदेव की कृपा के बिना भगवान नहीं मिलते। राम मिलावनहार, परम गुरु राम मिलावनहार। श्री तुलसीदास जी श्री भरत जी को गुरुदेव के रूप में देख रहे हैं। कलिकाल तुलसी से सठनि हठि राम सनमुख करत को? और इसीलिए अयोध्या काण्ड का जब आरम्भ हुआ, तब श्री तुलसीदास जी किसके मंगलाचरण से शुरुआत करते हैं? श्री गुरु चरण सरोज रज निज मन मुकुर सुधारि। वरनौं रघुवर विमल यश जो दायक फल चारि।।। अयोध्या काण्ड के आरम्भ में ही यह दोहा है। क्यों? लीला तो भगवान की गा रहे हैं, तो यह गुरुदेव की वन्दना से आरम्भ क्यों किया? कहा -- यह अयोध्या काण्ड मुख्य रूप से श्री भरत जी की महिमा से भरा है और श्री तुलसीदास जी का श्री भरत जी के प्रति गुरुभाव है, स्पष्ट भी कर दिया -- कलिकाल तुलसी से सठनि हठि राम सनमुख करत को? इसलिए श्री गुरु चरन सरोज रज। भरत जी के कारण ही श्री तुलसीदास जी को श्री राम जी मिले, ऐसा वे स्वयं स्वीकार करते हैं और वैसे भी देखा जाय तो इस अयोध्या काण्ड में गुरुओं की ही महिमा है। भगवान श्री भरद्वाज जी से कहते हैं -- नाथ कहिय हम केहि मग जाहीं। हम किस मार्ग पर जायँ? भगवान भी भरद्वाज मुनि से मार्ग पूछ्ते हैं, क्योंकि भरद्वाज जी गुरुदेव हैं। तो गुरुदेव की पहचान क्या है? तापस सम दम दयानिधाना। परमारथ पथ परम सुजाना।। भरद्वाज जी परमार्थ पथ के सुजान पथिक हैं। इसलिए परमार्थ पथ पर चलने के लिए तो गुरुदेव से ही मार्ग पूछा जाता है। तो पथ तो पूछा भरद्वाज जी से। अच्छा गुरुजनों से ही मार्ग क्यों पूछना चाहिए? इसलिए, क्योंकि मार्ग चलने वाले ही कितने हैं। जितने मिलते हैं, सब बताने वाले ही मिलते हैं। भरद्वाज जी ने सोचा कि राम जी को मार्ग बताने वाले कुछ लोगों को बुलावें, तो -- साथ लागि मुनि सिष्य बुलाये। सुनि मन मुदित पचासक आये।। पचास लोग आ गये। किसलिए? मार्ग बताने के लिए, और मार्ग चलने वाले कितने हैं? कहा -- चार। श्री राम जी, जानकी माता, लक्ष्मण जी और निषादराज गुह्य। चार चलने वाले हैं और पचास बताने वाले हैं। यह तो उस युग की बात है। कम से कम चार चलने वाले फिर भी थे। अब राम जी के युग की यह बात है, तो आज की चर्चा ही करना उचित नहीं है। (क्रमशः) (स्वामी श्री राजेश्वरानंद जी महाराज)

+16 प्रतिक्रिया 2 कॉमेंट्स • 7 शेयर

जय श्री राधे हमारा टारगेट क्या सृष्टि में विविधता है और विविधता सृष्टि का प्रथम महत्वपूर्ण गुण है । दो पत्ता भी एक सा नहीं है दो मनुष्यों की शक्ल भी एक सी नहीं है । इसी विविधता के कारण कुछ मनुष्य सदाचार परोपकार स्वधर्म पालन में लगे हुए हैं और उनका टारगेट संभवत यश है । कुछ मनुष्य धनोपार्जन में लगे हुए हैं येन केन प्रकारेण धनोपार्जन करना उनका टारगेट धन है। कुछ मनुष्य येन-केन-प्रकारेण अपनी कामनाओं की पूर्ति में लगे हुए हैं यह कामना यह वासना यह इच्छा वह इच्छा । कुछ लोग ऐसे हैं जो इस जीवन के दुखों से परेशान हो गए हैं वह इस संसार में बार-बार आने जाने से मोक्ष चाहते हैं । इन सब के अतिरिक्त हम आप जैसे कुछ लोग हैं जो भक्ति में लगे हुए हैं भजन में लगे हुए हैं कृष्ण चरण सेवा चाहते हैं भगवान की कृपा चाहते हैं भगवान की कृपा से भगवान की चरणों की परमानेंट सेवा चाहते हैं । अब बात यह है कि जो जो चाहते हैं उस में लगे हुए हैं हम लोग यदि भजन भक्ति चाहते हैं तो हम यह समझ लें कि हमारे जीवन का जो मुख्य उद्देश्य है भजन । भक्ति । हमारा जीवन, कम से कम हमारा जीवन भजन भक्ति के लिए मिला है । और यदि भजन भक्ति के लिए जीवन मिला है तो सबसे अधिक प्राथमिकता हम भजन भक्ति को दें अधिक समय भजन भक्ति को दें और संसार में जो दायित्व हमारे ऊपर हैं उन्हें अनासक्त होते हुए निभाते रहे और संतुलन रखें । जो विभिन्न विषयों में संतुलन रखकर साधते हुए चलता है वही साधु है । फिर भी जैसे किसी का टारगेट धन है किसी का टारगेट यश है किसी का टारगेट कामना है किसी का टारगेट मोक्ष है । हमारा टारगेट भजन है, भक्ति है । यह सदा स्मरण रहे तो हमारे प्रयास भी इस ओर अधिक से अधिक होने लगेंगे । जय श्री राधे जय निताई समस्त वैष्णव जन को दासाभास का प्रणाम

+37 प्रतिक्रिया 11 कॉमेंट्स • 6 शेयर

कोरा ज्ञान और कोरा वैराग्य जय श्रीराधे श्री चैतन्य चरितामृत में साफ-साफ लिखा है कि कोरा ज्ञान और कोरा वैराग्य कभी भी भक्ति का अंग नहीं है । अर्थात भक्ति नहीं है । कोरे ज्ञान से अर्थ है केवल ज्ञान कर लेना और उस पर आचरण ना करना जैसे सब जीवों में एक ही परमात्मा निवास करता है । यह बात समझ तो लेना लेकिन भाई से मुकदमा चल रहा है पिता से विचार नहीं मिलते हैं पत्नी से खटपट है बच्चा बात नहीं मानता है पड़ोसी से बोलचाल नहीं है तो यह कोरा ज्ञान है । यदि सब में परमात्मा है यह ज्ञान हो गया तो किसी से भी कोई गड़बड़ी नहीं होगी । सभी में परमात्मा का दर्शन होगा और परमात्मा का दर्शन होने पर अपने सेवक स्वरूप का ज्ञान होगा और हम सबके प्रति भगवत भाव रखेंगे । यदि ऐसा नहीं है तो यह कोरा ज्ञान है और यह भक्ति नहीं है । इसी प्रकार कोरा वैराग्य । हम लाल पीले कपड़े नहीं पहनते हैं केवल हमारे पास दो बहीरवास और दो वस्त्र हैं हम 20 साल से अन नहीं खाते हैं केवल दूध पीते हैं हम अपनी कुटिया में ही रहते हैं हम कहीं आते जाते नहीं हैं हम दिन में केवल दो ही लोगों से मिलते हैं हम अधिक लोगों से नहीं मिलते हैं हमारे पास कोई भी धन नहीं है हमारे पास कोई भी संग्रह नहीं है यह कोरा वैराग्य है । यह वैराग्य शास्त्र में मर्कट वैराग्य कहा गया है । मर्कट माने बंदर । बंदर के पास भी कोई झोपड़ी नहीं है । कोई धन आदि नहीं है कोई मिल जुल नहीं है । लेकिन बंदर का वैराग्य बंदर जैसा ही है । यह सब वह चीजें हैं जो हम नहीं करते हैं, लेकिन यदि हम भक्ति नहीं करते हैं तो इन सब चीजों के नहीं करने का भी लाभ होगा कुछ भी लेकिन वह भक्ति नहीं है । इन सब चीजों का विरोध नहीं है, उपेक्षा नहीं है लेकिन मुख्य बात यह है कि यह भक्ति नहीं है भक्ति है भगवान की सेवा, भगवान का चिंतन भगवान का भजन और भक्ति करते-करते जो ज्ञान मिलता जाए उस ज्ञान से उसको आचरण में लाते जाएं तो यह भक्ति सहित ज्ञान हो गया । भक्ति से यदि संसार और माया छूटती जाए तो यह भक्ति पूर्ण ज्ञान हो गया तो कोरा ज्ञान भक्ति नहीं है । कुछ और हो सकता है उसकी उपेक्षा भी नहीं है लेकिन भक्ति नहीं है । जय श्री राधे जय निताई समस्त वैष्णव जन को राधा दासी का प्रणाम

+55 प्रतिक्रिया 7 कॉमेंट्स • 5 शेयर

लेना देना जिस प्रकार संसार में व्यवहार और लेन-देन चलता है वैसे ही ठाकुर के साथ भी लेना-देना चलता है । हम लोग ठाकुर से सदा मांगते ही रहते हैं आशा ही करते रहते हैं वह भी लौकिक नाशवान भौतिक सदा ना रहने वाली चीजों की । इतने पर भी भगवान हमें देते ही हैं । सबसे बड़ी चीजें है भगवान ने जो हमें दी हुई हैं मनुष्य शरीर पृथ्वी जल वायु अग्नि सूर्य आदि आदि उसके बदले में हम उनका शुक्रगुजार करते हुए भी उनको थोड़ी सी भी अपनी वृत्ति मन और समय भी नहीं देते हैं । मन देना बहुत बड़ी बात है क्योंकि मन चंचल है धन हम दे क्या सकते हैं और धन ठाकुर को चाहिए भी नहीं केवल और केवल कुछ समय देना है । कुछ समय केवल समय । हम आशाएं तो यह रखते हैं कि ठाकुर हमारा सर्वविध कल्याण करें लेकिन 24 में से मुश्किल से एक घंटा भी नहीं देते हैं । यह कुछ कुछ वैसे ही है जैसे ₹50000 से एक आलीशान कोठी खरीदने की कल्पना करना यद्यपि ठाकुर के साथ यह उदाहरण शत-प्रतिशत उचित नहीं है । वह बहुत दयालु है अकारण ही दया करता है लेकिन वह ठगा भी जाना पसंद नहीं करता है अतः हम प्रयास करें कि हम एक उचित समय अवश्य ही ठाकुर के लिए दें । जप करें कीर्तन करें सेवा करें ग्रंथ पढ़ें साधुओं के साथ में सत्संग करें चर्चा करें । हम आत्म निरीक्षण करें केवल एक घंटा समय देकर अपने पूरे जीवन को उनके जिम्मे करना कितना उचित है । जय श्री राधे जय निताई समस्त वैष्णव जन को राधादासी का प्रणाम🙏🙏

+18 प्रतिक्रिया 7 कॉमेंट्स • 2 शेयर

(((((( वृषभानु नंदिनी राधारानी )))))) . एक बार की बात है -एक संत थे . . उनसे एक ब्रज वासी के प्रति अपराध हो गया वे बहुत पछताने लगे , . उन्होंने शरीर त्याग देने का फैसला कर मधुकरी (भिक्षा) को जाना बंद कर दिया... . मधुकरी बिना भूखे प्यासे तीन दिन हो गए... . जब चोथे दिन को भी बाबा मधुकरी को नहीं गए तो उस दिन शाम को एक बालिका आयी.... . बाबा के पेड के नीचे बैठे थे , . बाबा ने पूछा उससे.... . क्यों री, क्यों आई है तू शाम के समय जंगल में अकेली, . तेरे पिता जी से बोलूँगा मै, तुझे डर नहीं लगता..... . बालिका बोली --- " बाबा में एक गोप - बालिका हूँ, मेरी माँ ने मुझ से कहा की -- . एक हठीले बाबा है कई दिनों से रोटी नहीं खाई है , जा उन्हें तू दे आ... बाबा ब्रज वासियों से कुछ लेकर नहीं खा रहे है... . क्यों आप इतना बुरा मान गए की रोटी नहीं खा रहे... . लो खा लो ,आपको मेरी सौगंध.... . " बाबा बोले --- " लाली तुने सौगंध खिलाई , तो रोटी तो में अब खाऊँगा ,ला..... " . वे बोले -- " तेरे बाबा का नाम बता , में बात करूँगा उनसे..... की तेरी छोरी देर - सबेर अकेले जंगल में आई थी....... . " बालिका बोली --- " मेरे बाबा का नाम भान है " !!!! . और वो भाग के अपने घर चली गयी जंगल के रास्ते... . दूसरे दिन बाबा निकट के एक गाँव में जाकर पूछते है . " यहाँ भान कहा रहता है , उसका खेत कहा है........ " . सबने कहा ---- " यहाँ कोई भान नहीं रहता........ . " बाबा समझ गए की कल उनके पास स्वयं " वृषभानु नंदिनी राधारानी "आई थी....... . उन्हें कई दिन भूखा देख उनका वात्सल्य उनके प्रति उमड़ पड़ा और उन्हें रोटी देने स्वयं आना पड़ा........ . यह जान कर उनका हृदय भर आया और बार - बार धिकारने लगे की " अपनी जिद्द के कारण राधारानी को कष्ट करना पड़ा............. ." . उन्होंने ऐसा हठ फिर कभी ना करने का संकल्प किया जिससे राधारानी को उनके लिए कष्ट करना पड़े............ *******************************

+38 प्रतिक्रिया 13 कॉमेंट्स • 11 शेयर