कोरा ज्ञान और कोरा वैराग्य जय श्रीराधे श्री चैतन्य चरितामृत में साफ-साफ लिखा है कि कोरा ज्ञान और कोरा वैराग्य कभी भी भक्ति का अंग नहीं है । अर्थात भक्ति नहीं है । कोरे ज्ञान से अर्थ है केवल ज्ञान कर लेना और उस पर आचरण ना करना जैसे सब जीवों में एक ही परमात्मा निवास करता है । यह बात समझ तो लेना लेकिन भाई से मुकदमा चल रहा है पिता से विचार नहीं मिलते हैं पत्नी से खटपट है बच्चा बात नहीं मानता है पड़ोसी से बोलचाल नहीं है तो यह कोरा ज्ञान है । यदि सब में परमात्मा है यह ज्ञान हो गया तो किसी से भी कोई गड़बड़ी नहीं होगी । सभी में परमात्मा का दर्शन होगा और परमात्मा का दर्शन होने पर अपने सेवक स्वरूप का ज्ञान होगा और हम सबके प्रति भगवत भाव रखेंगे । यदि ऐसा नहीं है तो यह कोरा ज्ञान है और यह भक्ति नहीं है । इसी प्रकार कोरा वैराग्य । हम लाल पीले कपड़े नहीं पहनते हैं केवल हमारे पास दो बहीरवास और दो वस्त्र हैं हम 20 साल से अन नहीं खाते हैं केवल दूध पीते हैं हम अपनी कुटिया में ही रहते हैं हम कहीं आते जाते नहीं हैं हम दिन में केवल दो ही लोगों से मिलते हैं हम अधिक लोगों से नहीं मिलते हैं हमारे पास कोई भी धन नहीं है हमारे पास कोई भी संग्रह नहीं है यह कोरा वैराग्य है । यह वैराग्य शास्त्र में मर्कट वैराग्य कहा गया है । मर्कट माने बंदर । बंदर के पास भी कोई झोपड़ी नहीं है । कोई धन आदि नहीं है कोई मिल जुल नहीं है । लेकिन बंदर का वैराग्य बंदर जैसा ही है । यह सब वह चीजें हैं जो हम नहीं करते हैं, लेकिन यदि हम भक्ति नहीं करते हैं तो इन सब चीजों के नहीं करने का भी लाभ होगा कुछ भी लेकिन वह भक्ति नहीं है । इन सब चीजों का विरोध नहीं है, उपेक्षा नहीं है लेकिन मुख्य बात यह है कि यह भक्ति नहीं है भक्ति है भगवान की सेवा, भगवान का चिंतन भगवान का भजन और भक्ति करते-करते जो ज्ञान मिलता जाए उस ज्ञान से उसको आचरण में लाते जाएं तो यह भक्ति सहित ज्ञान हो गया । भक्ति से यदि संसार और माया छूटती जाए तो यह भक्ति पूर्ण ज्ञान हो गया तो कोरा ज्ञान भक्ति नहीं है । कुछ और हो सकता है उसकी उपेक्षा भी नहीं है लेकिन भक्ति नहीं है । जय श्री राधे जय निताई समस्त वैष्णव जन को राधा दासी का प्रणाम

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लेना देना जिस प्रकार संसार में व्यवहार और लेन-देन चलता है वैसे ही ठाकुर के साथ भी लेना-देना चलता है । हम लोग ठाकुर से सदा मांगते ही रहते हैं आशा ही करते रहते हैं वह भी लौकिक नाशवान भौतिक सदा ना रहने वाली चीजों की । इतने पर भी भगवान हमें देते ही हैं । सबसे बड़ी चीजें है भगवान ने जो हमें दी हुई हैं मनुष्य शरीर पृथ्वी जल वायु अग्नि सूर्य आदि आदि उसके बदले में हम उनका शुक्रगुजार करते हुए भी उनको थोड़ी सी भी अपनी वृत्ति मन और समय भी नहीं देते हैं । मन देना बहुत बड़ी बात है क्योंकि मन चंचल है धन हम दे क्या सकते हैं और धन ठाकुर को चाहिए भी नहीं केवल और केवल कुछ समय देना है । कुछ समय केवल समय । हम आशाएं तो यह रखते हैं कि ठाकुर हमारा सर्वविध कल्याण करें लेकिन 24 में से मुश्किल से एक घंटा भी नहीं देते हैं । यह कुछ कुछ वैसे ही है जैसे ₹50000 से एक आलीशान कोठी खरीदने की कल्पना करना यद्यपि ठाकुर के साथ यह उदाहरण शत-प्रतिशत उचित नहीं है । वह बहुत दयालु है अकारण ही दया करता है लेकिन वह ठगा भी जाना पसंद नहीं करता है अतः हम प्रयास करें कि हम एक उचित समय अवश्य ही ठाकुर के लिए दें । जप करें कीर्तन करें सेवा करें ग्रंथ पढ़ें साधुओं के साथ में सत्संग करें चर्चा करें । हम आत्म निरीक्षण करें केवल एक घंटा समय देकर अपने पूरे जीवन को उनके जिम्मे करना कितना उचित है । जय श्री राधे जय निताई समस्त वैष्णव जन को राधादासी का प्रणाम🙏🙏

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(((((( वृषभानु नंदिनी राधारानी )))))) . एक बार की बात है -एक संत थे . . उनसे एक ब्रज वासी के प्रति अपराध हो गया वे बहुत पछताने लगे , . उन्होंने शरीर त्याग देने का फैसला कर मधुकरी (भिक्षा) को जाना बंद कर दिया... . मधुकरी बिना भूखे प्यासे तीन दिन हो गए... . जब चोथे दिन को भी बाबा मधुकरी को नहीं गए तो उस दिन शाम को एक बालिका आयी.... . बाबा के पेड के नीचे बैठे थे , . बाबा ने पूछा उससे.... . क्यों री, क्यों आई है तू शाम के समय जंगल में अकेली, . तेरे पिता जी से बोलूँगा मै, तुझे डर नहीं लगता..... . बालिका बोली --- " बाबा में एक गोप - बालिका हूँ, मेरी माँ ने मुझ से कहा की -- . एक हठीले बाबा है कई दिनों से रोटी नहीं खाई है , जा उन्हें तू दे आ... बाबा ब्रज वासियों से कुछ लेकर नहीं खा रहे है... . क्यों आप इतना बुरा मान गए की रोटी नहीं खा रहे... . लो खा लो ,आपको मेरी सौगंध.... . " बाबा बोले --- " लाली तुने सौगंध खिलाई , तो रोटी तो में अब खाऊँगा ,ला..... " . वे बोले -- " तेरे बाबा का नाम बता , में बात करूँगा उनसे..... की तेरी छोरी देर - सबेर अकेले जंगल में आई थी....... . " बालिका बोली --- " मेरे बाबा का नाम भान है " !!!! . और वो भाग के अपने घर चली गयी जंगल के रास्ते... . दूसरे दिन बाबा निकट के एक गाँव में जाकर पूछते है . " यहाँ भान कहा रहता है , उसका खेत कहा है........ " . सबने कहा ---- " यहाँ कोई भान नहीं रहता........ . " बाबा समझ गए की कल उनके पास स्वयं " वृषभानु नंदिनी राधारानी "आई थी....... . उन्हें कई दिन भूखा देख उनका वात्सल्य उनके प्रति उमड़ पड़ा और उन्हें रोटी देने स्वयं आना पड़ा........ . यह जान कर उनका हृदय भर आया और बार - बार धिकारने लगे की " अपनी जिद्द के कारण राधारानी को कष्ट करना पड़ा............. ." . उन्होंने ऐसा हठ फिर कभी ना करने का संकल्प किया जिससे राधारानी को उनके लिए कष्ट करना पड़े............ *******************************

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ब्रज के भक्त - भक्त चरित्र - ५ ('ब्रज के भक्त' पुस्तक से साभार) श्रीश्रीकृष्णदास बाबा जी (रनवारी) उस दिन जब यह आश्चर्यजनक घटना घटी, सिद्ध श्रीजगन्नाथदास बाबा और उनके शिष्य श्रीबिहारीदास बाबा रनवारी में श्रीकृष्णदास बाबा के निकट ही एक कुटिया में ठहरे हुए थे। शेष रात्रि में श्रीजगन्नाथदास बाबा ने बिहारीदास बाबा को पुकारते हुए कहा- 'बिहारी ! देख तो श्रीकृष्णदास बाबा की कुटिया में क्या हो रहा है?' बिहारीदास भागकर गये, तो देखा कुटिया का दरवाजा भीतर से बन्द है। दरवाजे की झिरी में से झाँका, तो देखा कि कृष्णदास बाबा सिद्धासन की मुद्रा में बैठे हुए हैं, उनका शरीर दग्ध हो रहा है और मुख से हरिनाम का उच्चारण हो रहा है। वे दौड़कर गये और जैसे ही गुरुदेव से कहा - 'श्रीकृष्णदास बाबा का शरीर दग्ध हो रहा है' वे चीख पड़े-'अहो! विरहानल! विरहानल!!' उसी समय पड़ोसी व्रजवासी दौड़ पड़े। श्रीकृष्णदास बाबा की कुटिया का दरवाजा तोड़ा। भीतर जाकर देखा कि अग्नि धधक कर जलते हुए बाबा के कण्ठ तक आ गयी है, फिर भी उनके मुख से नाम का स्पष्ट रूप से उच्चारण हो रहा है। व्रजवासी कातर भाव से उनकी ओर देखते रह गये। तब उन्होंने मशाल की तरह जलते हुए अपने दोनों हाथों को उठाकर आशीर्वाद देते हुए कहा- 'तुम्हारे गाँव में कभी किसी प्रकार का संकट न आयेगा। सर्वत्र दुर्भिक्ष और महामारी होने पर भी तुम्हारा गाँव सुरक्षित रहेगा।" जगन्नाथदास बाबा ने देखा कि अग्नि बाबा के कण्ठ तक आ गयी है। तब उन्होंने रुई की तीन बत्तियाँ बनाकर बाबा के माथे पर रख दी। बत्तियाँ जलने ली और उनके साथ ही उनका सारा शरीर भस्मीभूत हो गया। श्री श्रीकृष्णदास बाबा का पूर्व नाम श्री कृष्ण प्रसाद चट्टोपाध्याय था। जन्मस्थान था बंगदेश के जशोहर जिले के अन्तर्गत महम्मदपुर ग्राम। पिता का नाम था श्रीगोकुलेशचन्द्र चट्टोपाध्याय। जब उनके विवाह का प्रस्ताव हुआ, तभी वे एक दिन शेष रात्रि में घर से निकल पड़े और पैदल ही चलकर वृन्दावन पहुँच गये। वृन्दावन में श्रीश्रीमदनमोहन की सेवा में कुछ दिन रहकर रनवारी चले गये। रनवारी उस समय भीषण जंगल था। वहाँ एक छोटी कुटिया बनाकर उसमें भजन करने लगे। संध्या समय मधुकरी माँग लाते। अपने प्रयोजन अनुसार रखकर बाकी गायों को खिला देते। मधुकरी इतनी मिलती कि रास्ते भर गायों को खिलाते आते, क्योंकि प्रत्येक व्रजवासी मधुकरी के लिए आग्रह करता और वे उसकी उपेक्षा न कर पाते। बाल्यकाल में ही गृह त्यागकर व्रज चले जाने के कारण श्रीकृष्णदास बाबा और किसी तीर्थ के दर्शन नहीं कर पाये थे। प्रायः पचास वर्ष बाद उनके हृदय में वासना जागी एक बार चारों धाम के दर्शन कर लेने की। राधारानी ने स्वप्न में दर्शन देकर कहा-'तुमने वृन्दावन में मेरी शरण ली है। तुम्हें और कहीं जाने की आवश्यकता नहीं। यहीं रहकर भजन करो। तुम्हें सर्वसिद्धि लाभ होगी।' उन्होंने प्रियाजी के स्वप्नादेश को अपने मन-बुद्धि की कल्पना जान उसकी अवहेलना की और तीर्थयात्रा को निकल पड़े। भ्रमण करते-करते द्वारका पहुँचे। चारों सम्प्रदाय के वैष्णव द्वारका जाकर तप्त मुद्रा धारण किया करते हैं। पर यह रागानुगी वैष्णवों की परम्परा नहीं है, यद्यपि 'हरिभक्ति-विलास' में इसकी व्यवस्था दी हुई है। बाबा कृष्णदास ने ब्रज के सदाचार की उपेक्षाकर हरिभक्ति-विलास के मतानुसार तप्त-मुद्रा धारण कर ली। परन्तु बाद में उनके चित्त में विक्षेप आया, तीर्थ-भ्रमण में अरुचि हो गयी और वे व्रज में लौट गये। जिस दिन बाबा लौटे, उसी दिन रात्रि में फिर राधारानी ने स्वप्न में कहा तुम द्वारका में तप्त-मुद्रा धारणकर सत्यभामा के गणों में शामिल हो गये हो। व्रजधाम के उपयुक्त अब नहीं रहे। द्वारका चले जाओ।' इस बार उन्हें ऐसा नहीं लगा कि स्वप्न कल्पित था। किंकर्तव्यविमूढ़ हो वे गोवर्धन के सिद्ध श्रीकृष्णदास बाबा के पास गए। उन्हें देखते ही गाढ़ आलिंगन पूर्वक बाबा ने पूछा- 'आप इतने दिन कहाँ थे? 'मैं द्वारका गया था। यह देखिये तप्त-मुद्रा लगवा आया हूँ' - उन्होंने उत्तर दिया। 'ओहो! तब आज से आपको स्पर्श करने की मेरी योग्यता नहीं रही। कहाँ आप महाराज-राजेश्वरी की सेविका! कहाँ मैं ग्वालिनी की दासी!!' दीर्घ नि:श्वास के साथ कई कदम पीछे हटते हुए सिद्ध बाबा ने कहा। व्रज में उस समय और भी कई सिद्ध महात्मा विराजमान थे। उनसे भी कृष्णदास बाबा ने जाकर पूछा कि उन्हें क्या करना चाहिये। उन्होंने उत्तर दिया- 'प्रियाजी के आदेशानुरूप ही आपको चलना है। उनके आदेश के ऊपर उपदेश देने की हमारी क्षमता कहाँ?' हताश हो वे रनवारी लौट गये। अन्न-जल त्यागकर कुटिया में जा पड़े। अनुताप और प्रियाजी के विरह की अग्नि से उनका हृदय दग्ध होने लगा। इस अवस्था में पड़े-पड़े तीन माह बीत गये। तब भीतर की अग्नि बाहर फूट पड़ी। तीन दिन में अग्नि चरणों से लेकर कण्ठ तक फैल गयी। चौथे दिन श्री जगन्नाथ दास बाबा के सहयोग से उनका सारा शरीर भस्म हो गया। भस्म-राशि शीतल हो जाने के कई दिन बाद उनके गुरुभाई श्री प्रेमदास बाबाजी महाराज आये। भस्म के निकट जाकर दण्डवत्कर बोले 'दादा! आपने मेरे हाथ की लकड़ी तो ली नहीं, यह मैं लकड़ी दे रहा हूँ।' भस्म राशि से स्पर्श होते ही लकड़ी जलने लगी और भस्म होकर उसमें मिल गयी। इस घटना को घटे लगभग सवा सौ वर्ष हुए हैं, पर आज भी रनवारी के व्रजवासी पौषी अमावस्या को चन्दा कर श्री श्रीकृष्णदास बाबा की तिरोभाव-तिथि के उपलक्ष में एक विराट उत्सव करते हैं, जिसमें चौरासी कोस व्रज के वैष्णवों को भोजन कराते हैं। बाबा ने यहाँ के व्रजवासियों को फाल्गुन शुक्ला एकादशी तिथि का पालनकर रात्रि में जागरण करने का आदेश दिया था। आज भी यहाँ के व्रजवासी, स्त्री-पुरुष, बड़े-बूढ़े, यहाँ तक कि बालक-बालिकाएँ भी इस तिथि का विशेष रूप से पालन करते हैं और इस उपलक्ष में भगवल्लीला, कीर्तन आदि करते हैं। आज भी वे बाबा के आशीर्वाद से दुर्भिक्ष और महामारी आदि के प्रकोप से सुरक्षित हैं। उनका विश्वास है कि सिद्ध बाबा की समाधि के आगे जो कोई कुछ प्रार्थना करता है, उसकी पूर्ति होती है। 🙏जै जै श्री राधे🙏

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