*🌸 श्री भक्तमाल – श्री पूर्णसिंह जी 🌸💐👏🏻* श्री पूर्णसिंह जी परम सदाचारी , वीर एवं महान भगवद्भक्त थे । श्री कृष्ण प्रभु इनके इष्टदेव थे । ये आमेर नरेश श्री पृथ्वीराज जी के पुत्र थे । उनकी माता का नाम पदारथ देवी था । कविहृदय, परम भागवत श्री पूर्णसिंह जी नित्य नूतन सुंदर सुंदर पद रचकर अपने श्री ठाकुर जी को सुनाते । श्री ठाकुर जी को भी इनके पदों को सुनने मे बडा सुख मिलता । यदि कभी किसी कार्यविशेष की व्यस्तता में श्री पूर्णसिंह जी पद नही सुना पाते तो श्री ठाकुर जी स्वप्न मे इनसे पद सुनाने का अनुरोध करते । ऐसे दीवाने हो गए थे ठाकुर जी इनके पदों के । एक दो बार इस प्रक्रार का प्रसंग प्राप्त होनेपर इन्होंने दृढ नियम बना लिया की अब मै हर दिन भगवान को पद सुनाऊँगा । बहुत समय तक नियम अक्षुष्ण रूप से चलता रहा । परंतु एक बार किसी राज्यकार्यवश इन्हें पद सुनाने का ध्यान नही रहा । जब कार्य से फुरसत मिली तो श्री ठाकुर जी का दर्शन करने मंदिर मे गये । परंतु वहाँ इन्हे श्री ठाकुर जी का श्री विग्रह ही नही दिखायी पड़ा । पुजारी से पूछा – श्री ठाकुर जी की प्रतिमा कहाँ गयी ? पुजारी जी ने कहा – प्रतिमा तो सिंहासन पर ही विराजमान है । श्री पूर्णसिंह जी की समझ मे नहीं आ रहा था कि आखिर मुझे क्यो नहीं दर्शन हो रहा है ? बहुत विचार करने के बाद याद आयी कि मैंने श्री ठाकुर जी को आज पद नही सुनाया । फिर तत्काल पद सुनाने लगे तो श्री ठाकुर जी भी मन्द मन्द मुसकराते हुए इन्हे दर्शन देने लगे । भक्ति मार्ग पर यदि भक्त कोई नित्य नियम निश्चित कर लें तो समय समय पर उसके नियम की परीक्षा होती है । श्री भगवान भी भक्त के नित्य नियम की प्रतीक्षा करते रहते है अतः संसार के कार्यो से पहले नियम को प्रधानता देनी चाहिए यह शिक्षा इस चरित्र से प्राप्त होती है । Jay Shri Krishna 🙏🏻💫

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*ज्ञानयोग* ९३५. प्रश्न- काम, क्रोध आदि तो अंतः करण में रहते हैं। जीवनमुक्त पुरुष में भी अंत:करण के विकार रह सकते हैं क्या? उत्तर- जीवन्मुक्त भगवत्प्राप्त पुरुष के अंतः करण में काम-क्रोधादि विकार या दोष नहीं रहते, क्योंकि परमात्मा की प्राप्ति से पूर्व ही अंतःकरण की शुद्धि हो जाती है। ९३६. प्रश्न- काम, क्रोध, लोभ आदि मन-बुद्धि के स्वभाव है या विकार? उत्तर- काम, क्रोध, लोभ आदि तुम्हारे स्वभाव नहीं विकार है। विकारों का नाश प्रयत्नसाध्य है। जिस घड़ी तुम अपने स्वरूप को सम्हालोगे और अपने नित्य संगी परमसुहृद् परमात्मा के बल पर इन्हें ललकारोगे उसी घड़ी ये सभी तुम्हारे गुलाम हो जायेंगे और जी छुड़ाकर भागने का अवसर ढूँढ़ेंगे। पुस्तक *क्या, क्यों और कैसे?* गीतावाटिका प्रकाशन लेखक- भाईजी श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार

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. "व्रज के भक्त-23" ब्रह्मचारी श्रीगिरिधारीशरण देवजी (वृन्दावन) जयपुर राज्य के सवाई माधोपुर के निकट लसोड़ा ग्राम है। वहाँ महोवतरामजी नाम के एक सनाढ्य ब्राह्मण रहते थे। उनके तीन पुत्र थे, नन्दराम, गणेशराम और अमरनाथ। महोवतराम व्यापारी थे सामान इधर-से-उधर लाने-लेजाने के लिए बहुत से बैल रखते थे। उनके स्वर्गवास के बाद उनके तीनों पुत्र उनका कार-बार सम्हालने लगे। एक दिन गणेशराम बैलों को जङ्गल चराने ले गये। बैलों में एक अग्रणी था, जिसे धौंसा का बैल कहते थे। उसी के पीछे-पीछे दूसरे बैल चला करते थे। दैवयोग से उस दिन एक सिंह उसके ऊपर झपट पड़ा और उसे मार डाला। सायंकाल गणेशराम ने घर लौटकर धोंसा के बैल के मारे जाने की बात कही, तो सबको बड़ा दुःख हुआ। प्रायः जहाँ सिंहों का प्रकोप होता है, वहाँ के निवासी सिंह का मुकाबला कर लिया करते हैं। यहाँ तक कि वहाँ की स्त्रियाँ भी कभी-कभी सिंह को मार लेती हैं। गणेशराम की भाभी भी बड़े वीर स्वभाव की थी। उसने उनसे कहा- 'तुम्हारे रहते सिंह बैल को मार गया ! डूब मरने की बात है तुम्हारे लिए। गणेशराम को यह बात चुभ गयी। उसने सोचा-भाभी ठीक कहती है। बैल मारा गया मेरी कायरता के कारण ही अच्छा है। मेरे लिए डूब मरना ही अच्छा है। वह उसी समय गया लसोड़ा से एक मील दूर, जहाँ पर्वतों के बीच झोझा की झील है और उसमें कूद पड़ा। भगवत्कृपा से वह मरा नहीं। गाँव वालों ने उसे निकाल लिया। फिर भी वह घर नहीं गया। दैवयोग से झील में उसे एक शालिग्राम की मूर्ति प्राप्त हुई। उसे उसने भगवान् का दिव्य सन्देश समझा, जिससे उसकी जीवन की दिशा बदल गयी। वह शालिग्राम को ले वृन्दावन चला गया। उस समय उसकी आयु लगभग १७-१८ वर्ष की थी। उसका जन्म वि० सं० १८५५ माघ शु० ५ को हुआ था। वृन्दावन जाकर उसने वंशीवट के महात्मा श्रीबलदेवदासजीसे दीक्षा ली। उन्होंने नाम रखा श्रीगिरिधारीशरण। ब्रह्मचारी गिरिधारीशरणजी ने तब गुरुदेव से पूछा- 'मुझे कहाँ रहकर किस प्रकार भजन करना चाहिए ?' गुरुदेव ने आज्ञा की-'तुम्हें जहाँ शालिग्राम मिले थे, वहीं जाकर गोपाल-मन्त्र का जप करो।' गिरिधारीशरणजी झोझा की झील पर जाकर गोपाल-मन्त्र का जप करने लगे। १२ वर्ष तक लगातार निष्ठापूर्वक जप करने के पश्चात् उन्हें मन्त्र-सिद्धि हुई। मन्त्र-सिद्धि के फलस्वरूप ब्रह्मचारीजी को वाक्-सिद्धि हो गयी। उन्होंने जिसे जो आशीर्वाद दिया वह फलीभूत हुआ। बहुत-से राजा-महाराजा उनके शिष्य हुए और बहुत-से देवालयों का उनके द्वारा निर्माण हुआ। मन्त्र-सिद्धि के पश्चात् ब्रह्मचारीजी वृन्दावन चले गये और वंशीवट पर एकान्त भजन करने लगे। उस समय उनकी ख्याति चारों ओर फैल चुकी थी और राजा-महाराजा तथा सेठ-साहूकार उनके दर्शन करने आने लगे थे। एक बार ईशरदा (जयपुर) के राजा रघुवीरसिंहजी उनके दर्शन करने आये। उनके कोई सन्तान न थी। उन्होंने उन्हें आशीर्वाद दिया, जिसके परिणाम स्वरूप उनकी रानी जोधीजी के दो पुत्र हुए-सरदारसिंह और कायमसिंह। कायमासिंह जब १७-१८ वर्ष के हुए जोधीरानी उन्हें लेकर वृन्दावन आयीं और ब्रह्मचारीजी से उन्हें वैष्णवी दीक्षा दिलवायी। कायमसिंहजी की उन दिनों ईशराद से खट-पट चल रही थी। इसलिए रानी चिन्तित थीं। ब्रह्मचारीजी ने कहा-चिन्ता न करो। ईशरदा क्या, इसे जयपुर की राजगद्दी मिलेगी।' हुआ भी यही। वि० सं० १९३७ आश्विन कृ० नवमी को कायमसिंह जयपुर के राजा हो गये। ब्रह्मचारीजी ने उनका नाम रखा था माधवसिंह। उसी नाम से वे प्रसिद्ध हुए। संवत् १९१४ के गद रमें ग्वालियर के राजा राव जियाजीराव का राज्य उनसे हस्तान्तरित हो गया था। उन्होंने भी ब्रह्मचारीजी की शरण ली। उनके आशीर्वाद से उन्हें अपना राज्य फिर मिल गया। उन्होंने ब्रह्मचारीजी के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए छोटीकुञ्ज का निर्माण किया और उसमें उनके भजन करने के लिए एक गुफा बनवायी। उनके भी कोई सन्तान नहीं थी। ब्रह्मचारीजी के आशीर्वाद से राजकुमार माधवराव का जन्म हुआ। तब उन्होने १२०० रु० वार्षिक आमदनी की जागीर का पट्टा उनके नाम लिख दिया। ब्रह्मचारीजी एक बार छटीकरा की ओर जंगल में जा बैठे। वहाँ भी उनके प्रताप से गोपालगढ़ नाम से एक सुन्दर मन्दिर का निर्माण हो गया और श्रीगिरिधर गोपाल की सेवा-पूजा होने लगी। उनकी प्रेरणा से माधवसिंहजी ने बरसाने में गिरिशिखर पर और वृन्दावन में मथुरा रोड पर दो विशाल मन्दिरों का निर्माण किया। राजपुर में दाऊजी के मन्दिर सहित कई और मन्दिरों का निर्माण भी उन्हीं की प्रेरणा से हुआ। जयपुर और ग्वालियर के अतिरिक्त ओल, कासगंज, कांकेर हाथरस आदि कई स्थानों के राजा और नेपाल के राणा जंगबहादुर भी उनके शिष्य हुए। पञ्चमजार्ज के शुभागमन पर दिल्ली दरबार में उन्हें आमन्त्रित किया गया। ब्रह्मचारीजी पढ़े-लिखे एक अक्षर भी नहीं थे उन्हें जो सफलता मिली और जो उनकी प्रसिद्धि हुई वह केवल गोपाल-मन्त्र की सिद्धि प्राप्तकर लेने के कारण ही। वे श्रीहरिव्यासदेवाचार्यजी के द्वादश शिष्यों में अन्यतम श्रीलाफर-गोपालदेवाचार्यजी की परम्परा में उनकी १३ वीं पीठिका में हुए। वि० संम्वत् १९४६ फाल्गुन शुक्ल १५ को उन्होंने अपनी ऐहिक लीला समाप्त की। ----------:::×:::---------- लेखक: बी. एल कपूर पुस्तक: व्रज के भक्त (द्वितीय खण्ड) "जय जय श्री राधे" *******************************************

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. "व्रज के भक्त-18" श्रीहंसदासबाबाजी एवं श्रीगोपालीबाई (विलासगढ़, बरसाना) वृन्दावन में धोबी गली में दतियाकुञ्ज की एक कुटी में श्रीगोपाल-दास बाबा रहा करते। बड़े ही विरक्त और प्रभावशाली महात्मा थे वे। श्रीमद्भागवत, रामायण और भक्तमाल आदि की बड़ी सुन्दर कथा कहते। उनकी वाणी में तेज था। उसके प्रभाव से न जाने कितने लोगों के जीवन में चमत्कारी परिवर्तन हुआ, कितने प्रेतों तक का उद्धार हुआ। वृन्दावन के किसी-न-किसी स्थान में उनकी कथा नित्य हुआ करती। किसी संभ्रान्त परिवार की आभूषणों से लदी एक २०-२२ वर्षीया युवती भी उनकी कथा सुनने जाने लगी। गोपालदास बाबा अन्धे हो चुके थे। कथा के समय कोई ग्रन्थ पढ़ता था, वे व्याख्या करते थे। एक दिन कथा समाप्त होने के पश्चात् उन्होंने पूछा- 'यह किसके घर की बाई थी, जिसके नूपरों की ध्वनि कान में आ रही थी ?' किसी ने उत्तर दिया- 'वह हंसराज की पत्नी थी।' दूसरे दिन कथा कहते समय किसी प्रसंग में उन्होंने कहा- गहना बेचो साधु जिमाओ, यह तन दुःखको भांडो। जनम-जनम गधैया होगी, राम भजो री रांडो॥ यह सुन स्त्रियाँ हँस पड़ीं। किसी-किसी ने कहा- 'बाबा बूढ़ो हय गयो, तऊ गाली देबे।' पर अन्तरयामी बाबा ने जिस असाधारण संस्कार संयुक्ता महिला के अन्तरभाव को उद्दीप्त करने के उद्देश्य से यह बात कही थी, उसके मर्मस्थल को वह स्पर्श कर गयी। वह घर जाकर हंसराज से बोली- 'मैं जिन महात्मा की कथा सुनने जाती हूँ उनसे दीक्षा लूँगी। गहने बेचकर साधु-सेवा करूँगी। विरक्त हो इस नश्वर देह को निरन्तर भजन में नियुक्त कर जीवन सार्थक करूँगी। आप भी ऐसा ही करें।' हंसराजजी ने कहा- 'गोपालदास बाबा सब प्रकार से गुरु बनाने योग्य हैं। हम दोनों उनसे दीक्षा लेंगे। पर भजन गृहस्थ में रहकर ही करेंगे। तुम्हारी छोटी अवस्था है। विरक्त होकर अकेले रहना तुम्हारे लिए ठीक नहीं।' पर पत्नी न मानी। उसका संकल्प दृढ़ था। वह नित्य विरक्त-वेश ग्रहण करने के लिए हंसराजजी के पीछे पड़ी रहती और बिहारीजी से प्रार्थना करती- 'प्रभु, या तो मुझे दुनियाँ से उठा लो, या मेरे पति का मन फेर दो।' हंसराजजी बड़े धर्म-संकट में पड़ गये। भक्ति-भाव तो उनका भी कुछ कम न था। लखनऊ के निकट काकोरी में एक धर्मनिष्ठ अस्थाना कायस्थ परिवार में सन् १८५९ में उनका जन्म हुआ था। जन्म से ही उनमें भगवद्भक्ति के प्रबल संस्कार थे। युवावस्था में वृन्दावन में रहकर भजन करने के उद्देश्य से वे सपत्नीक वृन्दावन चले आये थे। जीविका उपार्जन के लिए लालाबाबू के मन्दिर में नौकरी कर ली थी। यह स्थिति उन्हें भजन के लिए सर्वथा अनुकूल जान पड़ती थी। एक दिन वे मन्दिर की ओर से नन्दगाँव और बरसाने के बीच संकेत में किसी ग्वारिये के घर मन्दिर की जमीन का लगान वसूल करने के उद्देश्य से कुड़की लेकर गये। उसका सारा सामान कुड़क कर लिया। उसके साथ उसकी लड़की का जेबर भी कुड़क कर लिया। घर के वाल-बच्चे और स्त्रियाँ सब रोने लगे। ग्वारिये की लड़की रोती हुई हंसराजजी के पास आकर बोली - 'पिताजी, मैं तो बाप से मिलने मैके आयी थी। अब घर जाकर क्या मुँह दिखाऊँगी ?' यह दृश्य हंसराजजी से न देखा गया। बिहारीजी की कृपा से उन्हें एक नयी प्रेरणा मिली। उनका मन संसार से फिर गया। उन्होंने कुड़क किया हुआ सारा सामान ग्वारिये को लौटा दिया। उसी दिन मन्दिर जाकर इस्तीफा दे दिया। चार्ज देते-देते रात के ११ बज गये। घर पर पत्नी चिन्ता में बैठी बिहारीजी से प्रार्थना कर रही थी। वह क्या जानती थी कि बिहारीजी ने उसकी प्रार्थना सुन ली है और उसके शुभ संकल्प के अनुकूल व्यवस्था करने के उद्देश्य से एक लीला रची है, जिसके कारण ही आज उसके पति को घर लौटने में देर हो रही है ? घर लौटकर हंसराजजी ने पत्नी से कहा - 'मैं नौकरी से इस्तीफा दे आया हूँ। कल हम दोनों संसार से भी इस्तीफा देकर वैराग्य-वेश धारण करेंगे।' पत्नी की खुशी का ठिकाना न रहा। वह 'जै बिहारीजीकी !' कह कर आनन्दाश्रु विसर्जन करने लगी। दूसरे दिन पति-पत्नी ने गोपालदास बाबाजी के पास जाकर अपनी इच्छा प्रकट की। बाबा ने कहा- 'अभी तुम लोगों की उमर थोड़ी है। अच्छा होगा कि तुम घर पर रहकर हो भजन करो।' पर जब देखा कि दोनों में-से कोई इससे सहमत नहीं है और दोनों का निश्चय दृढ़ है, तब उन्होंने दोनों को विरक्त-वेश दे दिया। पति का नाम रखा 'हंसदास', पत्नी का 'गोपालीबाई'। हंसदास को बरसाने में साँकरी खोर के पास विलासगढ़ में रहकर भजन करने की आज्ञा दी और गोपालीबाई को गोवर्धन में हाथी दरवाजे के निकट एक कोठरी में रहकर भजन करने की। गोपालीबाई ने अपने सब गहने बेचकर साधु-सेवा कर दी। स्वयं गोवर्धन जाकर मधुकरी वृत्ति से जीवन निर्वाह करते हुए भजन करने लगीं। हंसदासजी के पिता ने जब सुना कि उनके पुत्र और पुत्र-वधू दोनों ने विरक्त-वेश धारण कर लिया है, तो वे भागे-भागे वृन्दावन आये। वे स्वयं भी भक्ति-भाव सम्पन्न तो थे ही, गोपालदास बाबाजी के दर्शन कर उनके रंग में रंगे बिना न रह सके। गोपालदासजी से विरक्त वेश ले उनकी आज्ञा से संकेत में भजन करने लगे। उनका नाम हुआ श्रीराधिकादास। गोपालीबाई के पिता लखनऊ में मैजिस्ट्रेट थे। जब उन्हें पता चला कि उनकी लड़की, जमाई और समधी तक को किसी साधु ने बाबाजी बना दिया है, तो वे क्रोध से आग-बबूला हो गये। वृन्दावन जाकर उन्होंने गोपालदास बाबाजी को बहुत-सी खरी-खोटी सुनायी और जेल भेजने की धमकी दी। बाबा निर्विकार भाव से चुपचाप सुनते रहे। जब वे कुछ शान्त हुए तब हँसकर बोले- 'मैजिस्ट्रेट साहब, मुझे आप जेल अवश्य भेज दें। मेरे लिए तो संसार भी जेल ही है। बल्कि इस जेल से वह जेल अच्छी है; क्योंकि यहाँ माँगकर खानी पड़ती है, वहाँ बिन माँगे मिल जाती है। पर आपका मेरे ऊपर क्रोध उचित नहीं। आपका काम है लोगों को जेल भेजने का, मेरा काम है जेल से उन्हें छुड़ाने का। संसार रूपी जेल में हम सब अनादिकाल से बन्दी हैं और तरह-तरह की यातनाएँ भोग रहे हैं। जिस दिन आप यह भली प्रकार जान लेंगे आपका भी दृष्टिकोण बदल जायगा और आप भी संसाररूपी जेल में अपने को बन्दी मान अपनी लड़़की और जमाई की तरह उससे छुटकारा पाने को सचेष्ट हो जायेंगे। 'संसार-बन्धन का कारण मोह है। मोह के कारण ही मनुष्य पिता-पुत्र, बहु-बेटी और जमाई आदि से अपना नित्य जैसा सम्बन्ध मान लेता है। फिर सहसा उनसे विच्छेद होने पर दुःखी होता हैं, क्रोध करता है। आपकी बेटी और जमाई का मोह अब जाता रहा है। पर आपका मोह बना हुआ है। इसलिए उन्हें आपसे सम्बन्ध तोड़ने में दु:ख नहीं हुआ, आपको हो रहा है। सांसारिक सम्बन्ध रेलगाड़ी के एक ही डिब्बे में बैठे यात्रियों के बीच सम्बन्ध के समान क्षणिक है। जब जिसकी यात्रा समाप्त होती है वह रेलगाड़ी से उतर पड़ता है। डिब्बे में बैठे दूसरे यात्रियों का इस पर आपत्ति करने का कोई अधिकार या औचित्य नहीं होता। जिन्हें आप अपनी बेटी और जमाई मानते हैं, उनकी रेलयात्रा समाप्त हो चुकी है। वे अपने गन्तव्य स्थान के निकट पहुँच चुकने के कारण गाड़ी से उतर पड़े हैं। यथार्थ बात यह है। इसलिए आपके क्रोध करने का कोई कारण नहीं है। 'सांसारिक सभी जीव रेलगाड़ी में बैठे उन उन्मादग्रस्त यात्रियों के समान हैं, जो बिना टिकट गाड़ी पर बैठ लेते हैं और जिन्हें पता नहीं होता वे कहाँ जा रहे हैं। कालरूप टी. टी. आकर उन्हें जहाँ इच्छा होती है धक्का देकर उतार देता है, या जेल भेजने के लिए सिपाहियों के सुपुर्द कर देता है। प्रभु की कृपा से या महत् संग से जिनका उन्माद जाता रहता है, वे गाड़ी से उतर पड़ते हैं और टी. टी.के धक्कों से बचे रहते हैं। फिर उन्हें जहाँ जाना चाहिये उस ओर चल देते हैं। मैं भगवान् से प्रार्थना करता हूँ कि वे आपका भी मोह दूरकर आपको उस पथका पथिक बनायें जिस पर चलकर आप वास्तविक सुख-शान्ति लाभ कर सकते हैं।' मैजिस्ट्रेट साहब ने बाबा को मुलजिम जानकर उनके प्रति अपशब्द कहे थे। उन्होंने पहले भी बहुत-से मुलजिमों पर डाँट-डपट की थी। पर किसी ने इतनी निर्भीकता से अपनी सफाई पेश नहीं की थी। किसी ने सफाई पेश करते हुए उलटे उन्हें अपराधी रूप में कारागार में पड़े रहकर अन्नतकाल से सजा भोगते रहने का अहसास नहीं कराया था। बाबा की बाणी उनके हृदयाकाश में बिजली की तरह कौंध गयी। उनका मोहान्धकार छँट गया। संसार एक कारागार है, यह उन्हें स्पष्ट दीख गया। बाबा के प्रति द्वेष का भाव अलक्षित रूप से कुछ-कुछ श्रद्धा में परिणत हो गया। उन्होंने कुछ दिन और वृन्दावन में रहकर उनका सत्संग करने का निश्चय किया। कई दिन लगातार बाबा की कथा सुनने और उनका संग करने के पश्चात् उनके हृदय में भी ऐसा परिवर्तन हुआ कि एक दिन वे उनके चरणों में गिरकर अपने नयन-जल से उन्हें अभिषितक्त करते हुए बोले-'बाबा, मैंने आपके चरणों में बड़ा अपराध किया है। मुझे क्षमा करें और मेरे ऊपर भी ऐसी कृपा करें, जिससे भव-बन्धन से मेरी मुक्ति हो और राधा-कृष्ण के चरणकमलों की प्राप्ति हो।' बाबा ने उन पर भी कृपा करने में देर न की। वे भी बाबा से दीक्षा ग्रहण कर भजन में जुट गये। व्रज में यह सारी घटना एक परिवार के सभी सदस्यों के वैराग्य, तितिक्षा भौर भजनाग्रह की अभूतपूर्व मिसाल बनकर रह गयी। गोपालीबाई गोवर्धन में कठोर वैराग्य धारण कर भजन करने लगीं। महावाणी की वे बड़ी रसिक थीं नित्य प्रेम से महावाणी का पाठ करतीं और गोपाल-मन्त्र का जप करतीं। जप करते-करते उन्हें गोपाल मन्त्र सिद्ध हुआ, और श्यामा-श्याम के दर्शन हुए। एक दिन किसी कामी पुरुष की उनपर दृष्टि पड़ी। अवसर देखकर उसने उनकी कुटी में प्रवेश करना चाहा सोचा कि इस समय यहाँ और कोई है नहीं जो बाधा दे। पर वह मूर्ख क्या यह जानता था कि भक्तवत्सल प्रभु स्वयं किसी-न-किसी रुप में उनके निकट अपने भक्तों की रक्षा के लिए सदा रहते हैं ? वह जैसे ही कुटी के दरवाजे के पास पहुँचा, उसने देखा कि एक सिंह दहाड़ता हुआ उसकी ओर अग्रसर हो रहा है। उसकी दहाड़ सुनते ही वह मूर्छित हो गिर पड़ा। इस घटना के पश्चात् गोपालीबाई के रहने की व्यस्था बाबा हंसदासजी के शिष्य श्रीलाड़लीदासजी के मकान की एक कोठरी में कर दी गयी। शेष समय तक वे उसमें भजन करती रहीं। बाबा हंसदासजी बरसाने में मधुकरी वृत्ति से रहकर भजन करते। कभी-कभी गुरुदेव के पास वृन्दावन जाते। गुरुदेव से उन्होंने भक्तमाल और भागवत का अध्ययन किया। उनकी बड़ी इच्छा थी भागवत कण्ठ कर लेने की। पर यह कोई सहज काम तो था नहीं। इसके लिए वे श्रीजी से प्रार्थना करने लगे। एक बार एक भोली-भाली अपरिचित बालिका ने उनसे कहा-'बाबा, मुख खोल।' उन्होंने मन्त्र-मुग्धवत् मुख खोल दिया। बालिका ने जिह्वा पर कुछ लिख दिया। लिखते ही उन्हें विचित्र प्रकार का प्रेमावेश हुआ, जिसमें रोदन करते-करते आँख लग गयी। स्वप्न में श्रीजी ने कहा - 'जा तेरी जिह्वा पर मैंने लिख दिया। तुझे भागवत कण्ठ हो जायगी। तभी से उन्हें भागवत् कण्ठ हो गयी। पण्डित रामकृष्णदास बाबा से उन्होंने व्याकरण पढ़ी। फिर गुरुजी की आज्ञा से भागवत और भक्तमाल की कथा कहना प्रारम्भ किया। उनकी कथा बड़ी रसमयी होती। भागवत सप्ताह की कथा भी वे कहा करते। पर सप्ताह की कथा जहाँ भी कहते, वहाँ उसके आयोजकों से तय कर लेते कि जितने लोग नियमपूर्वक कथा सुनेंगे उन सबकी कथा की समाप्ति पर भरपेट प्रसाद द्वारा सेवा करनी होगी। कथा में जो भी भेंट आती उसे वे साधुओं में बाँट देते। स्वयं परमहंस वृत्ति से रहते। पैसा स्पर्श भी न करते। गुरुदेव का चलाया श्रीनिम्बार्काचार्य का उत्सव वे बड़ी धूम-धाम से मनाते। दिग्विजयी श्रीकेशवकश्मीरी का उत्सव उन्होंने स्वयं चलाया। इन उत्सवों को मनाने वे बरसाने से वृन्दावन खाली हाथ आते। पर उनके आते ही सब सामग्री और कार्यकर्ता अपने आप जुट जाते। उत्सव के पश्चात् वे जैसे खाली हाथ आते वैसे खाली हाथ चले जाते। हंसदास बाबा निम्बार्क-सम्प्रदाय के अन्तरभुक्त होते हुए भी सभी सम्प्रदायों के महात्माओं का संग करते। गौड़ीय सम्प्रदाय के पण्डित रामकृष्णदास बाबा, श्रीगौरांगदास बाबा और श्रीअवधदास बाबा, निम्बार्क सम्प्रदाय के श्रीमाधवदास बाबा और श्रीदुलारेप्रसादजी, हरिदासी सम्प्रदाय के भक्तभाली श्रीजगन्नाथदासजी और शुक सम्प्रदाय के रसिक-सन्त श्रीसरसमाधुरी शरणजी से उनका निकट का सम्बन्ध था। जैसे वे सभी सम्प्रदाय के महात्माओं का संग करते, वैसे ही उनके पास संग के लिए सभी सम्प्रदायों के लोग आया करते। श्रीसरसमाधुरी शरणजी उनके उत्सवों में जयपुर से पधारा करते। वे सभी के प्रति प्रेम का व्यवहार करते। सब यही समझते कि बाबा जितना उनसे प्रेम करते हैं, उतना शायद किसी और से नहीं करते। जो भी उनके पास आता उससे पहले कहते - 'भूख लगी होगी। कुछ खा लो।' यदि वह मना करता तो आग्रह करते और कुछ-न-कुछ खिला देने की चेष्टा करते। जैसा वे मनुष्यों से प्रेम करते वैसा ही पशु-पक्षियों से भी। विलासगढ़ में एक विशाल सर्प रहा करता। बाबा जब मध्याह्र के पश्चात् विलासगढ़ की गुफा से बाहर निकलकर शिला पर विराजते, तो वह सर्प भी निकल आता और उनके सानिध्य का सुख लेता, कभी-कभी उनके चरण भी चाट लेता। उनके युवा शिष्य श्रीवंशीदासजी को उसे देख भय लगता। उन्होंने एक दिन उसकी बॉबी पर शिला रख दी। दूसरे दिन सर्प के न दीखने पर बाबा ने कहा- 'आज नागराज नहीं आये।' किसी ने कहा- 'बंशीदास ने उनकी बॉबी पर शिला रख दी है।' रुष्ट होकर बाबा बोले--'बंशी से कहो ऐसा न किया करे। नागराज के घर में हम रहते हैं, हमारे घर में वे नहीं।' बाबा मानसी सेवा में सिद्ध थे। कई बार देखा गया कि जब वे अपनी गुफा में बैठे भजन करते होते, उस समय श्रीजी के मन्दिर में जो भोग लगता उसे जान लेते। एक बार उन्होंने श्रीजी के लिए पोशाक बनवायी। उसे लेकर मन्दिर जाने लगे। साँकरी खोर पार करते ही एक आठ वर्षीया सुन्दर बालिका आते दीखी। उनके निकट आकर लोभ भरी दृष्टि से पोशाक को देखते हुए बोली- 'बाबा, याय कहाँ लैं जाय रह्यो है ? मोय दै दे' और इतना कह पोशाक बाबा के हाथ से लेकर चल दी। बाबा देखते रह गये। पर उसके स्पर्श मात्र से उनके अंग-प्रत्यंग में एक दिव्य आनन्द की लहर दौड़ गयी। भाव-विभोर अवस्था में डगमगाते- डगमगाते जब वे मन्दिर पहुँचे, तो श्रीजी को वही पोशाक पहने देख चकित रह गये। मन ही मन कहने लगे- 'धन्य है लाड़ली ! तुम्हें इतना भी सबर न हुआ। आधे रास्ते से ही पोशाक छीनकर धारण कर ली !' भला लाड़ली को सबर कहाँ ? वे तो प्रेमी के उपहार को उसके देने के संकल्प के साथ ही लेने को उतावली हो पड़़ती हैं। यही तो है उन प्रेममयी के भक्तवत्सल स्वरूप की विवशता, जिस पर उनका कोई नियन्त्रण नहीं। हंसदासजी का शुक सम्प्रदाय के रसिक सन्त श्रीसरसमाधुरी शरणजी से बड़ा स्नेह था। वे उनके स्नेहपूर्ण आग्रह पर अकसर जयपुर और अलवर के निकट शुक सम्प्रदाय के आचार्य श्रीश्यामचरणदासजी महाराज के जन्म-स्थान डहरा में जाकर श्रीमद्भागवत की कथा कहा करते। सरसमाधुरीजी के धाम पधारने के पश्चात् एक बार जब हंसदास बाबा लगभग ७८ वर्ष के थे, उन्हें श्रीसरसमाधुरी शरणजी के पुत्र श्रीरसिकमाधुरी शरणजी (श्रीराधेश्याभ शरणजी) श्रीशुकदेवजी के जन्मोत्सव पर कथा कहने के लिए जयपुर ले जा रहे थे। अछनेरा में उन्हें इतना तेज बुखार आया कि वे बेहोश हो गये। राधेश्यामजी चिन्ता करने लगे - कहीं इनका शरीर व्रज के बाहर छूट गया तो क्या होगा ? उस समय बेहोशी की अवस्था में ही वे एकाएक बोल पड़े- 'राधे, तू सोच रह्यो है बाबा को शरीर छूट गयो तो काऊको कहा मुख दिखरावैगो। चिन्ता मत करे। मैं मरूँगो नाँय। शुकदेवजी को कथा सुनाय के आऊँगो।' ऐसा ही हुआ। उन्होंने जयपुर में कथा कही, ऐसी भावपूर्ण कथा जिसे लोग आज तक याद करते हैं। वहाँ से स्वस्थावस्था में लौटे। कुछ दिन बाद सन १९३७ में वृन्दावन में पार्थिव शरीर छोड़ निकुञ्ज पधारे। उन्होंने कई ग्रन्थों की रचना की, जो इस प्रकार हैं - (१) सिद्धान्त-रत्नाञ्जली (टीका), (२) चतुःसम्प्रदाय-सिद्धान्त, (३) कृष्ण-सिद्धान्तसार, (४) राधारहस्य प्रकाशिका, (५) गोदना-लीला (पद्म), (६) निम्बार्क-प्रभा (निम्बार्की सन्तों का सक्षिप्त जीवन-चरित्र)। हंसदासजी के प्रधान शिष्य श्रीबालगोविन्ददासजी भी उन्ही के समान एक प्रचुर भक्ति-भावसम्पन्न और परम विरक्त सन्त थे। उन्होंने वृन्दावन में निम्बार्क कोट की स्थापना की और वहाँ उन सभी उत्सवों के निरन्तर मनाये जाने का प्रबन्ध कर, जिन्हें उनके गुरुदेव मनाया करते थे, जन-कल्याण के लिए उनकी पुण्य-स्मृति सदा जगाये रखने की व्यवस्था की। ----------:::×:::---------- लेखक: बी. एल कपूर पुस्तक: व्रज के भक्त (द्वितीय खण्ड) "जय जय श्री राधे" *******************************************

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गोपी गीत ' श्रीमदभागवत महापुराण के दसवें स्कंध के रासपंचाध्यायी का ३१ वां अध्याय है। इसमें १९ श्लोक हैं । रास लीला के समय गोपियों को मान हो जाता है । भगवान् उनका मान भंग करने के लिए अंतर्धान हो जाते हैं । उन्हें न पाकर गोपियाँ व्याकुल हो जाती हैं । वे आर्त्त स्वर में श्रीकृष्ण को पुकारती हैं, यही विरहगान गोपी गीत है । इसमें प्रेम के अश्रु,मिलन की प्यास, दर्शन की उत्कंठा और स्मृतियों का रूदन है । भगवद प्रेम सम्बन्ध में गोपियों का प्रेम सबसे निर्मल,सर्वोच्च और अतुलनीय माना गया है। गोप्य ऊचुः (गोपियाँ विरहावेश में गाने लगीं) जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः श्रयत इन्दिरा शश्वदत्र हि । दयित दृश्यतां दिक्षु तावका स्त्वयि धृतासवस्त्वां विचिन्वते ॥1॥ (हे प्यारे ! तुम्हारे जन्म के कारण वैकुण्ठ आदि लोकों से भी व्रज की महिमा बढ गयी है। तभी तो सौन्दर्य और मृदुलता की देवी लक्ष्मीजी अपना निवास स्थान वैकुण्ठ छोड़कर यहाँ नित्य निरंतर निवास करने लगी है , इसकी सेवा करने लगी है। परन्तु हे प्रियतम ! देखो तुम्हारी गोपियाँ जिन्होंने तुम्हारे चरणों में ही अपने प्राण समर्पित कर रखे हैं , वन वन भटककर तुम्हें ढूंढ़ रही हैं।।) शरदुदाशये साधुजातसत्सरसिजोदरश्रीमुषा दृशा । सुरतनाथ तेऽशुल्कदासिका वरद निघ्नतो नेह किं वधः ॥2॥ (हे हमारे प्रेम पूर्ण ह्रदय के स्वामी ! हम तुम्हारी बिना मोल की दासी हैं। तुम शरदऋतु के सुन्दर जलाशय में से चाँदनी की छटा के सौन्दर्य को चुराने वाले नेत्रों से हमें घायल कर चुके हो । हे हमारे मनोरथ पूर्ण करने वाले प्राणेश्वर ! क्या नेत्रों से मारना वध नहीं है? अस्त्रों से ह्त्या करना ही वध है।।) विषजलाप्ययाद्व्यालराक्षसाद्वर्षमारुताद्वैद्युतानलात् । वृषमयात्मजाद्विश्वतोभया दृषभ ते वयं रक्षिता मुहुः ॥3॥ (हे पुरुष शिरोमणि ! यमुनाजी के विषैले जल से होने वाली मृत्यु , अजगर के रूप में खाने वाली मृत्यु अघासुर , इन्द्र की वर्षा , आंधी , बिजली, दावानल , वृषभासुर और व्योमासुर आदि से एवम भिन्न भिन्न अवसरों पर सब प्रकार के भयों से तुमने बार- बार हम लोगों की रक्षा की है।) न खलु गोपिकानन्दनो भवानखिलदेहिनामन्तरात्मदृक् । विखनसार्थितो विश्वगुप्तये सख उदेयिवान्सात्वतां कुले ॥4॥ (हे परम सखा ! तुम केवल यशोदा के ही पुत्र नहीं हो; समस्त शरीरधारियों के ह्रदय में रहने वाले उनके साक्षी हो,अन्तर्यामी हो । ! ब्रह्मा जी की प्रार्थना से विश्व की रक्षा करने के लिए तुम यदुवंश में अवतीर्ण हुए हो।।) विरचिताभयं वृष्णिधुर्य ते चरणमीयुषां संसृतेर्भयात् । करसरोरुहं कान्त कामदं शिरसि धेहि नः श्रीकरग्रहम् ॥5॥ (हे यदुवंश शिरोमणि ! तुम अपने प्रेमियों की अभिलाषा पूर्ण करने वालों में सबसे आगे हो । जो लोग जन्म-मृत्यु रूप संसार के चक्कर से डरकर तुम्हारे चरणों की शरण ग्रहण करते हैं, उन्हें तुम्हारे कर कमल अपनी छत्र छाया में लेकर अभय कर देते हैं । हे हमारे प्रियतम ! सबकी लालसा-अभिलाषाओ को पूर्ण करने वाला वही करकमल, जिससे तुमने लक्ष्मीजी का हाथ पकड़ा है, हमारे सिर पर रख दो।।) व्रजजनार्तिहन्वीर योषितां निजजनस्मयध्वंसनस्मित । भज सखे भवत्किंकरीः स्म नो जलरुहाननं चारु दर्शय ॥6॥ (हे वीर शिरोमणि श्यामसुंदर ! तुम सभी व्रजवासियों का दुःख दूर करने वाले हो । तुम्हारी मंद मंद मुस्कान की एक एक झलक ही तुम्हारे प्रेमी जनों के सारे मान-मद को चूर-चूर कर देने के लिए पर्याप्त हैं । हे हमारे प्यारे सखा ! हमसे रूठो मत, प्रेम करो । हम तो तुम्हारी दासी हैं, तुम्हारे चरणों पर न्योछावर हैं । हम अबलाओं को अपना वह परमसुन्दर सांवला मुखकमल दिखलाओ।।) प्रणतदेहिनांपापकर्शनं तृणचरानुगं श्रीनिकेतनम् । फणिफणार्पितं ते पदांबुजं कृणु कुचेषु नः कृन्धि हृच्छयम् ॥7॥ (तुम्हारे चरणकमल शरणागत प्राणियों के सारे पापों को नष्ट कर देते हैं। वे समस्त सौन्दर्य, माधुर्यकी खान है और स्वयं लक्ष्मी जी उनकी सेवा करती रहती हैं । तुम उन्हीं चरणों से हमारे बछड़ों के पीछे-पीछे चलते हो और हमारे लिए उन्हें सांप के फणों तक पर रखने में भी तुमने संकोच नहीं किया । हमारा ह्रदय तुम्हारी विरह व्यथा की आग से जल रहा है तुम्हारी मिलन की आकांक्षा हमें सता रही है । तुम अपने वे ही चरण हमारे वक्ष स्थल पर रखकर हमारे ह्रदय की ज्वाला शांत कर दो।।) गिरा वल्गुवाक्यया बुधमनोज्ञया पुष्करेक्षण । वीर मुह्यतीरधरसीधुनाऽऽप्याययस्व नः ॥8॥ (हे कमल नयन ! तुम्हारी वाणी कितनी मधुर है । तुम्हारा एक एक शब्द हमारे लिए अमृत से बढकर मधुर है । बड़े बड़े विद्वान उसमे रम जाते हैं । उसपर अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं । तुम्हारी उसी वाणी का रसास्वादन करके तुम्हारी आज्ञाकारिणी दासी गोपियाँ मोहित हो रही हैं । हे दानवीर ! अब तुम अपना दिव्य अमृत से भी मधुर अधर-रस पिलाकर हमें जीवन-दान दो, छका दो।।) तव कथामृतं तप्तजीवनं कविभिरीडितं कल्मषापहम् । श्रवणमङ्गलं श्रीमदाततं भुवि गृणन्ति ते भूरिदा जनाः ॥9॥ (हे प्रभो ! तुम्हारी लीला कथा भी अमृत स्वरूप है । विरह से सताए हुये लोगों के लिए तो वह सर्वस्व जीवन ही है। बड़े बड़े ज्ञानी महात्माओं - भक्तकवियों ने उसका गान किया है, वह सारे पाप - ताप तो मिटाती ही है, साथ ही श्रवण मात्र से परम मंगल - परम कल्याण का दान भी करती है । वह परम सुन्दर, परम मधुर और बहुत विस्तृत भी है । जो तुम्हारी उस लीलाकथा का गान करते हैं, वास्तव में भू-लोक में वे ही सबसे बड़े दाता हैं।।) प्रहसितं प्रिय प्रेमवीक्षणं विहरणं च ते ध्यानमङ्गलम् । रहसि संविदो या हृदिस्पृशः कुहक नो मनः क्षोभयन्ति हि ॥10॥ (हे प्यारे ! एक दिन वह था , जब तुम्हारे प्रेम भरी हंसी और चितवन तथा तुम्हारी तरह तरह की क्रीडाओं का ध्यान करके हम आनंद में मग्न हो जाया करती थी । उनका ध्यान भी परम मंगलदायक है , उसके बाद तुम मिले । तुमने एकांत में ह्रदय-स्पर्शी ठिठोलियाँ की, प्रेम की बातें कहीं । हे छलिया ! अब वे सब बातें याद आकर हमारे मन को क्षुब्ध कर देती हैं।।) चलसि यद्व्रजाच्चारयन्पशून् नलिनसुन्दरं नाथ ते पदम् । शिलतृणाङ्कुरैः सीदतीति नः कलिलतां मनः कान्त गच्छति ॥11॥ (हे हमारे प्यारे स्वामी ! हे प्रियतम ! तुम्हारे चरण, कमल से भी सुकोमल और सुन्दर हैं । जब तुम गौओं को चराने के लिये व्रज से निकलते हो तब यह सोचकर कि तुम्हारे वे युगल चरण कंकड़, तिनके, कुश एंव कांटे चुभ जाने से कष्ट पाते होंगे; हमारा मन बेचैन होजाता है । हमें बड़ा दुःख होता है।।) दिनपरिक्षये नीलकुन्तलैर्वनरुहाननं बिभ्रदावृतम् । घनरजस्वलं दर्शयन्मुहुर्मनसि नः स्मरं वीर यच्छसि ॥12॥ (हे हमारे वीर प्रियतम ! दिन ढलने पर जब तुम वन से घर लौटते हो तो हम देखतीं हैं की तुम्हारे मुख कमल पर नीली नीली अलकें लटक रही हैं और गौओं के खुर से उड़ उड़कर घनी धुल पड़ी हुई है । तुम अपना वह मनोहारी सौन्दर्य हमें दिखा दिखाकर हमारे ह्रदय में मिलन की आकांक्षा उत्पन्न करते हो।।) प्रणतकामदं पद्मजार्चितं धरणिमण्डनं ध्येयमापदि । चरणपङ्कजं शंतमं च ते रमण नः स्तनेष्वर्पयाधिहन् ॥13॥ (हे प्रियतम ! एकमात्र तुम्हीं हमारे सारे दुखों को मिटाने वाले हो । तुम्हारे चरण कमल शरणागत भक्तों की समस्त अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाले है । स्वयं लक्ष्मी जी उनकी सेवा करती हैं । और पृथ्वी के तो वे भूषण ही हैं । आपत्ति के समय एकमात्र उन्हीं का चिंतन करना उचित है जिससे सारी आपत्तियां कट जाती हैं । हे कुंजबिहारी ! तुम अपने उन परम कल्याण स्वरूप चरण हमारे वक्षस्थल पर रखकर हमारे ह्रदय की व्यथा शांत कर दो।।) सुरतवर्धनं शोकनाशनं स्वरितवेणुना सुष्ठु चुम्बितम् । इतररागविस्मारणं नृणां वितर वीर नस्तेऽधरामृतम् ॥14॥ (हे वीर शिरोमणि ! तुम्हारा अधरामृत मिलन के सुख को को बढ़ाने वाला है । वह विरहजन्य समस्त शोक संताप को नष्ट कर देता है । यह गाने वाली बांसुरी भलीभांति उसे चूमती रहती है । जिन्होंने उसे एक बार पी लिया, उन लोगों को फिर अन्य सारी आसक्तियों का स्मरण भी नहीं होता । अपना वही अधरामृत हमें पिलाओ।।) अटति यद्भवानह्नि काननं त्रुटिर्युगायते त्वामपश्यताम् । कुटिलकुन्तलं श्रीमुखं च ते जड उदीक्षतां पक्ष्मकृद्दृशाम् ॥15॥ (हे प्यारे ! दिन के समय जब तुम वन में विहार करने के लिए चले जाते हो, तब तुम्हें देखे बिना हमारे लिए एक एक क्षण युग के समान हो जाता है और जब तुम संध्या के समय लौटते हो तथा घुंघराली अलकों से युक्त तुम्हारा परम सुन्दर मुखारविंद हम देखती हैं, उस समय पलकों का गिरना भी हमारे लिए अत्यंत कष्टकारी हो जाता है और ऐसा जान पड़ता है की इन पलकों को बनाने वाला विधाता मूर्ख है।।) पतिसुतान्वयभ्रातृबान्धवानतिविलङ्घ्य तेऽन्त्यच्युतागताः । गतिविदस्तवोद्गीतमोहिताः कितव योषितः कस्त्यजेन्निशि ॥16॥ (हे हमारे प्यारे श्याम सुन्दर ! हम अपने पति-पुत्र, भाई -बन्धु, और कुल परिवार का त्यागकर, उनकी इच्छा और आज्ञाओं का उल्लंघन करके तुम्हारे पास आयी हैं । हम तुम्हारी हर चाल को जानती हैं, हर संकेत समझती हैं और तुम्हारे मधुर गान से मोहित होकर यहाँ आयी हैं । हे कपटी ! इस प्रकार रात्रि के समय आयी हुई युवतियों को तुम्हारे सिवा और कौन छोड़ सकता है।।) रहसि संविदं हृच्छयोदयं प्रहसिताननं प्रेमवीक्षणम् । बृहदुरः श्रियो वीक्ष्य धाम ते मुहुरतिस्पृहा मुह्यते मनः ॥17॥ (हे प्यारे ! एकांत में तुम मिलन की इच्छा और प्रेम-भाव जगाने वाली बातें किया करते थे । ठिठोली करके हमें छेड़ते थे । तुम प्रेम भरी चितवन से हमारी ओर देखकर मुस्कुरा देते थे और हम तुम्हारा वह विशाल वक्ष:स्थल देखती थीं जिस पर लक्ष्मी जी नित्य निरंतर निवास करती हैं । हे प्रिये ! तबसे अब तक निरंतर हमारी लालसा बढ़ती ही जा रही है और हमारा मन तुम्हारे प्रति अत्यंत आसक्त होता जा रहा है।।) व्रजवनौकसां व्यक्तिरङ्ग ते वृजिनहन्त्र्यलं विश्वमङ्गलम् । त्यज मनाक् च नस्त्वत्स्पृहात्मनां स्वजनहृद्रुजां यन्निषूदनम् ॥18॥ (हे प्यारे ! तुम्हारी यह अभिव्यक्ति व्रज-वनवासियों के सम्पूर्ण दुःख ताप को नष्ट करने वाली और विश्व का पूर्ण मंगल करने के लिए है । हमारा ह्रदय तुम्हारे प्रति लालसा से भर रहा है । कुछ थोड़ी सी ऐसी औषधि प्रदान करो, जो तुम्हारे निज जनो के ह्रदय रोग को सर्वथा निर्मूल कर दे।।) यत्ते सुजातचरणाम्बुरुहं स्तनेष भीताः शनैः प्रिय दधीमहि कर्कशेषु । तेनाटवीमटसि तद्व्यथते न किंस्वित् कूर्पादिभिर्भ्रमति धीर्भवदायुषां नः ॥19॥ (हे श्रीकृष्ण ! तुम्हारे चरण, कमल से भी कोमल हैं । उन्हें हम अपने कठोर स्तनों पर भी डरते डरते रखती हैं कि कहीं उन्हें चोट न लग जाय । उन्हीं चरणों से तुम रात्रि के समय घोर जंगल में छिपे-छिपे भटक रहे हो । क्या कंकड़, पत्थर, काँटे आदि की चोट लगने से उनमे पीड़ा नहीं होती ? हमें तो इसकी कल्पना मात्र से ही चक्कर आ रहा है । हम अचेत होती जा रही हैं । हे प्यारे श्यामसुन्दर ! हे प्राणनाथ ! हमारा जीवन तुम्हारे लिए है, हम तुम्हारे लिए जी रही हैं, हम सिर्फ तुम्हारी हैं।।)

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