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_श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम् ।_ _अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ।।_ _इति पुंसार्पिता विष्णौ भक्तिश्र्चेन्नवक्षणा ।_ _क्रियते भगवत्यद्धा तन्मन्येऽधीतमुत्तमम्।।_ “हमें श्री विष्णु के दिव्य नाम, रूप, गुण, आभूषण एवं सेवा सामग्री तथा लीलाओं के बारे में सुनना, कीर्तन करना, स्मरण करना, उनके चरणों की सेवा करना, शोडशोपचार पूजा करना, वंदना करना, उनके सेवक बनना, उनको अपना मित्र मानना और उनको सर्वस्व समर्पण करना (अर्थात काया, वाचा, मनसा उनकी सेवा में लिन रहना) – यह नव विधान शुद्ध भक्ति कहलाते हैंI जिस व्यक्ति ने अपने जीवन को श्री कृष्ण की भक्ति में इन नव विधानों द्वारा समर्पित किया हो उसको सबसे विद्वत्त समझना चाहिए क्योंकि उसने सम्पूर्ण ज्ञान अर्जित कर लिया है।”

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