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सभी भक्तों को "श्रीमद्भगवद्गीता प्रतिदिन" पेज कि ओर से 🕯☄🌺🌻🌸दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं 🕯🌟☄🌺🌻🌸 । दीपावली के शुभ अवसर पर कृपया "श्रीमद्भगवद्गीता प्रतिदिन"🙏 पेज को 👍 फौलो👍 करें और रोज सुबह ⛅🕖 और दोपहर 🌅🕒को हमारे साथ भगवत गीता का एक श्लोक पढ़ें और अपने जीवन में ज्ञान का प्रकाश लायें 🙏🕉🕉🕉🕉। हरि बोल। 🕉🕉🕉🕉🙏 👇आज का श्लोक👇 *कृपया प्रश्नों के उत्तर कमेंट्स में दें* आज का श्लोक : श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप -- ६.२८ अध्याय ६ : ध्यानयोग . . युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः | सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्र्नुते || २८ || . . युञ्जन्– योगाभ्यास में प्रवृत्त होना; एवम्– इस प्रकार; सदा– सदैव; आत्मानम्– स्व, आत्मा को; योगी– योगी जो परमात्मा के सम्पर्क में रहता है; विगत– मुक्त; कल्मषः– सारे भौतिक दूषण से; सुखेन– दिव्यसुख से; ब्रह्म-संस्पर्शम् – ब्रह्म के सान्निध्य में रहकर; अत्यन्तम्– सर्वोच्च; सुखम्– सुख को; अश्नुते– प्राप्त करता है | . . इस प्रकार योगाभ्यास में निरन्तर लगा रहकर आत्मसंयमी योगी समस्त भौतिक कल्मष से मुक्त हो जाता है और भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में परमसुख प्राप्त करता है | . . तात्पर्य : आत्म-साक्षात्कार का अर्थ है – भगवान् के सम्बन्ध में अपनी स्वाभाविक स्थिति को जानना | जीव (आत्मा) भगवान का अंश है और उसकी स्थिति भगवान् की दिव्यसेवा करते रहना है | ब्रह्म के साथ यह दिव्य सान्निध्य ही ब्रह्म-संस्पर्श कहलाता है | . प्रश्न १ : ब्रह्म-संस्पर्श किसे कहते हैं ?

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