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🚩🌿🌹जय श्री राम🌹🌿🚩 ⛺🌷💐ॐ श्री हनुमन्ते नमः💐🌷⛺ 🚩🍑🎡ॐ श्री शनीदेवाय नमः🎡🍑🚩 🏵🌲🌸शुभ शनिवार🌸🌲🏵 🌞💠🌻सुप्रभात🌻💠🌞 🎆🎆🎆🎆🎆🎆🎆🎆🎆🎆🎆🎆🎆🎆🎆 👏आप सभी पर श्री राम भक्त हनुमान जी और 🍑 🌞सूर्यपुत्र श्री शनिदेव महराज की कृपा दृष्टि 💠 🏵सदा बनी रहे और शनिवार का दिन आपका🎭 🎭 शांतिमय शुभ खूबसूरत और मंगलमय हो🙏 🎍🎍🎍🎍🎍🎍🎍🎍🎍🎍🎍🎍🎍🎍🎍 🚩🌞🌹शनि कवच🌹🌞🚩 🚩 शनि ग्रह की पीड़ा से बचने के लिए अनेकानेक मंत्र जाप, पाठ आदि शास्त्रों में दिए गए हैं. शनि ग्रह के मंत्र भी कई प्रकार हैं और कवच का उल्लेख भी मिलता है. युद्ध क्षेत्र में जाने से पूर्व सिपाही अपने शरीर पर एक लोहे का कवच धारण करता था ताकि दुश्मनों के वार से उसे खरोंच तक ना आने पाए और कवच के भीतर सिपाही सुरक्षित रहता था. इसी प्रकार शनि कवच का पाठ है जिसे करने पर व्यक्ति कवच से सुरक्षित रहता है और किसी प्रकार की हानि उसे शनि की दशा/अन्तर्दशा में नहीं होती है. कवच का अर्थ ही है ढाल अथवा रक्षा.जो व्यक्ति शनि कवच का पाठ नियम से करता है उसे शनि महाराज डराते नहीं है. शनि की दशा हो, अन्तर्दशा हो, शनि की ढैय्या हो अथवा शनि की साढ़ेसाती ही क्यों ना हो, कवच का पाठ करने पर कष्ट, व्याधियाँ, विपत्ति, आपत्ति, पराजय, अपमान, आरोप-प्रत्यारोप तथा हर प्रकार के शारीरिक, मानसिक तथा आर्थिक कष्टों से दूर रहता है. जो व्यक्ति इस कवच का पाठ निरंतर करता है उसे अकाल मृत्यु तथा हत्या का भय भी नहीं रहता है क्योंकि ढाल की तरह व्यक्ति की सुरक्षा होती है और ना ही ऎसे व्यक्ति को लकवे आदि का डर ही होता है, यदि किसी कारणवश आघातित हो भी जाए तब भी विगलांग नहीं होता है. चिकित्सा के बाद व्यक्ति फिर से चलना-फिरना आरंभ कर देता है. 🎨🎨🎨🎨🎨🎨🎨🎨🎨🎨🎨🎨🎨🎨🎨 विनियोग : अस्य श्रीशनैश्चर कवच स्तोत्रमंत्रस्य कश्यप ऋषि:, अनुष्टुप् छन्द: शनैश्चरो देवता, श्रीं शक्ति: शूं कीलकम्, शनैश्चर प्रीत्यर्थे पाठे विनियोग: ।   नीलाम्बरो नीलवपु: किरीटी गृध्रस्थितत्रासकरो धनुष्मान् । चतुर्भुज: सूर्यसुत: प्रसन्न: सदा मम स्याद्वरद: प्रशान्त:।।1।। श्रृणुध्वमृषय: सर्वे शनिपीडाहरं महत् । कवचं शनिराजस्य सौरेरिदमनुत्तमम् ।।2।। कवचं देवतावासं वज्रपंजरसंज्ञकम् । शनैश्चरप्रीतिकरं सर्वसौभाग्यदायकम् ।।3।। ऊँ श्रीशनैश्चर: पातु भालं मे सूर्यनंदन: । नेत्रे छायात्मज: पातु कर्णो यमानुज: ।।4।। नासां वैवस्वत: पातु मुखं मे भास्कर: सदा । स्निग्धकण्ठश्च मे कण्ठ भुजौ पातु महाभुज: ।।5।। स्कन्धौ पातु शनिश्चैव करौ पातु शुभप्रद: । वक्ष: पातु यमभ्राता कुक्षिं पात्वसितस्थता ।।6।। नाभिं गृहपति: पातु मन्द: पातु कटिं तथा । ऊरू ममाSन्तक: पातु यमो जानुयुगं तथा ।।7।। पदौ मन्दगति: पातु सर्वांग पातु पिप्पल: । अंगोपांगानि सर्वाणि रक्षेन् मे सूर्यनन्दन: ।।8।। इत्येतत् कवचं दिव्यं पठेत् सूर्यसुतस्य य: । न तस्य जायते पीडा प्रीतो भवन्ति सूर्यज: ।।9।। व्ययजन्मद्वितीयस्थो मृत्युस्थानगतोSपि वा । कलत्रस्थो गतोवाSपि सुप्रीतस्तु सदा शनि: ।।10।। अष्टमस्थे सूर्यसुते व्यये जन्मद्वितीयगे । कवचं पठते नित्यं न पीडा जायते क्वचित् ।।11।। इत्येतत् कवचं दिव्यं सौरेर्यन्निर्मितं पुरा। जन्मलग्नस्थितान्दोषान् सर्वान्नाशयते प्रभु: ।।12।। 🎋🎋🎋🎋🎋🎋🎋🎋🎋🎋🎋🎋🎋🎋🎋 🌹🌹🌹 इस कवच को “ब्रह्माण पुराण” से लिया गया है, जिन व्यक्तियों पर शनि की ग्रह दशा का प्रभाव बना हुआ है उन्हें इसका पाठ अवश्य करना चाहिए. जो व्यक्ति इस कवच का पाठ कर शनिदेव को प्रसन्न करता है उसके सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं. जन्म कुंडली में शनि ग्रह के कारण अगर कोई दोष भी है तो वह इस कवच के नियम से किए पाठ से दूर हो जाते हैं. 🚩🌿🌹जय श्री राम🌹🌿🚩 🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷 🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲

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