*श्रीहरिनाम चिन्तामणि* भाग 24 *अध्याय15* *भजन प्रणाली* श्रीगदाधर पंडित जी, श्रीगौरांग महाप्रभु जी व श्रीमती जान्हवा देवी के प्राणस्वरूप श्रीनित्यानन्द प्रभु जी की जय हो, श्रीसीतापति श्रीअद्वैताचार्य जी तथा श्रीवास आदि सभी गौर भक्तों की जय हो! जय हो ! जय हो!अन्य सभी पथों का परित्याग करके जो हरिनाम का जप या संकीर्तन करता है ऐसे भक्त की जय हो ! जय हो! श्रीमन महाप्रभु जी बोले हे हरिदास! आपने इस पृथ्वी पर भक्ति के बल से दिव्य ज्ञान को प्राप्त किया है । चारों वेद आपकी जिव्हा पर नित्य नृत्य करते हैं तथा मैं आपकी कथा में सारे सुसिद्धान्तों को अनुभव करता हूँ। *नाम रस की जिज्ञासा* महाप्रभु जी बोले हे हरिदास! अब मुझे यह बताइए कि हरिनाम रस कितनी प्रकार के हैं और अधिकार के अनुसार साधकों को किस प्रकार प्राप्त होंगे । हरिनाम के प्रेम में विभोर होकर नामाचार्य श्रीहरिदास ठाकुर जी निवेदन करते हुए श्रीमहाप्रभु जी से कहते हैं कि हे गौरहरि ! आपकी प्रेरणा के बल से ही मैं इसका वर्णन करूंगा। शुद्ध तत्व तथा पर तत्व के रूप में जो वस्तु सिद्ध है , वो रस के नाम से वेदों में प्रसिद्ध है। वह रस अखंड है , परब्रह्म तत्व है । यह चरम वस्तु असीम आनन्द का समुद्र है। शक्ति तथा शक्तिमान रूप से यह परमतत्व विद्यमान है। शक्ति तथा शक्तिमान रूप से इसमें कोई भेद नहीं है। केवल दर्शन में भेद दिखाई देता है। शक्तिमान अदृश्य से है जबकि शक्ति इसे प्रकाशित करती है। तीनों प्रकार की शक्ति (चित्त, जीव तथा माया शक्ति) ही विश्व को प्रकाशित करती है। *चित्त शक्ति के द्वारा वस्तु का प्रकाश* चित्त शक्ति के रूप में वस्तु का रूप, वस्तु का नाम, वस्तु का धाम, वस्तु की क्रिया तथा वस्तु का स्वरूप आदि प्रकाशित होते हैं। श्रीकृष्ण ही वह परम वस्तु हैं तथा उनका वर्ण श्याम है।गोलोक, मथुरा, वृन्दावन आदि श्रीकृष्ण के धाम हैं जहां वह अपनी लीला प्रकट करते हैं। श्रीकृष्ण के नाम , रूप, लीला, धाम इत्यादि जो भी हैं सबके सब अखण्ड तथा अद्वय ज्ञान के अंतर्गत हैं।श्रीकृष्ण में जितनी भी विचित्रता है ये सब परा शक्ति के द्वारा ही की गई है। श्रीकृष्ण धर्मी हैं जबकि श्रीकृष्ण की परा शक्ति ही उनका नित्य धर्म है। धर्म तथा धर्मी में कोई भेद नहीं है। दोनो ही अखण्ड तथा अद्वय हैं। ये दोनों अभेद होते हुए भी विचित्र विशेषता के द्वारा इनमें भेद दिखाई पड़ता है। इस प्रकार की विशेषता केवल चिद जगत में दिखाई पड़ती है। *माया शक्ति का स्वरूप* जो छाया शक्ति श्रीकृष्ण की इच्छा से सारे विश्व का सृजन करती है , उस शक्ति को माया शक्ति के नाम स जाना जाता है। *जीव शक्ति* भेदाभेदमयी जीव शक्ति अर्थात भगवान श्रीकृष्ण की तटस्था शक्ति श्रीकृष्ण की सेवा के उद्देश्य से जीवों को प्रकाशित करती है। *दो प्रकार की दशा वाले जीव* जीव दो प्रकार के हैं - नित्य बद्ध तथा नित्य मुक्त। नित्य मुक्त जीवों का नित्य ही श्रीकृष्ण सेवा में अधिकार होता है जबकि नित्य बद्ध जीव माया के द्वारा संसार में फंस जाते हैं।जिनमें भी बहिर्मुखी तथा अंतर्मुखी दो प्रकार के विभाग हैं। जो अंतर्मुखी जीव हैं , वह साधु सँग के द्वारा श्रीकृष्ण नाम को प्राप्त करते हैं और श्रीकृष्ण नाम के प्रभाव से श्रीकृष्ण के धाम को जाते हैं। *रस और रस का स्वरूप* भगवान श्रीहरि ही अखण्ड रस के भंडार हैं और उस रस रूपी फूल की कली हरिनाम थोड़ी सी प्रस्फुटित हुई कली का रूप अति मनोहर होता है । गोलोक वृन्दावन में भी यही रूप श्यामसुंदर के रूप में विद्यमान है। प्रभु के 64 गुण उस कली की सुंगन्ध हैं , वे गुण ही भगवान के नाम के तत्व को पूरे जगत में प्रकाशित करते हैं। श्रीकृष्ण की लीला पूरी तरह से खिले हुए फूल के समान है । यह भगवत लीला प्रकृति से परे है , नित्य है तथा आठों पहर चलती है। *भक्ति का स्वरूप* जीवों पर हरिनाम की कृपा होने से यह कृपा संचित शक्ति और आह्लादिनी शक्ति के समावेश से भक्ति के रूप में जीव के हृदय में प्रवेश करती है। *भक्ति क्रिया* वही सर्वेश्वरी शक्ति अर्थात भक्ति जीवों के हृदय में आविर्भूत होकर श्रीकृष्ण नाम के रसों की सारी सामग्री को प्रकाशित करती है। जीव भक्ति के प्रभाव से अपने चिन्मय स्वरूप को प्राप्त करता है और फिर उसी शक्ति के द्वारा ही उसमें रस प्रकाशित होता है। *रस के विभाव आलम्बन* रस के विभिन्न आलम्बन के विषय तो परमधन स्वरूप श्रीकृष्ण हैं एवम आश्रय उनके भक्त हैं । जब भक्त सदा ही हरिनाम लेता है तब हरिनाम की कृपा से वह भगवान के रूप, लीला , गुण आदि का आस्वादन करता है।क्रमशः जय निताई जय गौर

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💖💫 हरिनाम_संकीर्तन_सदैव_मंगलकारी 💫💖🙌 नाम संकीर्तन से बढ़कर कोई और दूसरी सेवा नहीं है, नाम संकीर्तन सब प्रकार से मंगल करने वाला होता है। यदि हम किसी अत्यावश्यक कार्य से बाहर जा रहे हैं और मार्ग में कहीं नाम संकीर्तन हो रहा हो तो हमें कुछ समय रूक उसमें शामिल होना चाहिए, अब प्रश्न यह कि यदि हम वहां रूक गये तो हमारे कार्य का क्या होगा, कुछ अमंगल हो गया तो...नही यह चिंता मन से तत्काल ही निकाल देनी चाहिए क्योंकि श्री ठाकुरजी का नाम सभी प्रकार अमंगल को हरने वाला है। "मंगल करण अमंगलहारी" इस विषय में एक दृष्टांत हैं... श्री चैतन्य महाप्रभु नित्य रात्रि में श्रीवास पंडित जी के यहां नाम संकीर्तन कराते थे, बहुत से वैष्णव उसमें सम्मलित होते थे, श्रीवास पंडित जी का पुत्र कीर्तन में झांझ बजाया करता था और खुब प्रेम से नाम संकीर्तन करता था। एक सांयकाल के समय किसी भंयकर रोग के कारण उनके पुत्र की मृत्यु हो जाती है, यह देख श्रीवास पंडित जी की पत्नी की आंखों से आंसू बहने लगते हैं तो श्रीवास पंडित कहते हैं.. सावधान..!! बिल्कुल नहीं रोना, एक थोड़ी सी चित्कार भी नहीं करना। उनकी पत्नी कहती हैं मेरा पुत्र मर गया और आप ऐसा कह रहे हैं। श्रीवास पंडित कहते हैं यदि तुम्हारा पुत्र था तो मेरा भी तो कुछ लगता है। किन्तु यदि तुम रोई तो आस पास मे सबको खबर हो जायेगी कि हमारे घर में शौक हुआ है और यदि सब यहां एकत्रित हो गए तो रात्रि में महाप्रभु जी को कीर्तन कराने कही अन्यत्र जाना पड़ेगा उनको असुविधा होगी, तुम इस बालक को ले जाकर भीतर कक्ष में लेटा दो सुबह देखेंगे कि क्या करना है, उनकी पत्नी वैसा ही करती है। रात्रि में महाप्रभु जी पधारे, कीर्तन प्रारंभ हुआ, "हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे" तभी महाप्रभु जी पंडित जी से पुछते है, अरे! श्रीवास तेरा बालक किधर है आज दिखाई नही देता वह, श्रीवास पंडित जी झुठ नही कह सकते थे और यदि सत्य कह दिया तो महाप्रभु जी को पीङा होगी इसलिए वह केवल इतना ही बोले..भगवन् होगा " इतने में ही किसी वैष्णव का उस मृत बालक के कक्ष में जाना होता है वह तुरंत महाप्रभु जी को कहता है "महाप्रभु! पंडित जी का पुत्र कीर्तन मे कहां से आयेगा। उसकी तो संध्या को ही मृत्यु हो गई है। श्री चैतन्य महाप्रभु कहते हैं " ये हो ही नही सकता जिसके घर में नित्य प्रभु के नाम का ऐसा मंगलकीर्तन होता है वहाँ ऐसा अमंगल हो ही नहीं सकता। श्री महाप्रभु जी गंभीर वाणी में पुकारते हैं, अरे! ओ श्रीवास पंडित के बालक कहां है तू, इधर आ, आज कीर्तन में झांझ कौन बजायेगा... इधर महाप्रभु जी का बोलना हुआ उधर वह बालक कक्ष भीतर से दौड़ा दौङा बाहर आया और कीर्तन में झांझ बजाने लगा श्री वास पंडित जी और उनकी पत्नी के नेत्रों से आंसू बहने लगते हैं वे महाप्रभु जी को बारंबार प्रणाम करते हैं। इसलिए भाई, नाम संकीर्तन से बढ़कर कोई पूंजी नही और इसके समान किसी भी समस्या की कोई कुंजी नहीं हैं। भज गोविन्दं भज गोविन्दम गोविन्दं भज मूढ़मते "अरे बोधिक मूर्खो, केवल श्री गोविन्द का भजन करो, केवल श्री गोविन्द का भजन करो, केवल श्री गोविन्द का भजन करो। तुम्हारा व्याकरण का ज्ञान और शब्द चातूरी मृत्यु के वक्त तुम्हारी रक्षा नही कर पायेगी।। सदैव जपते रहिये...जपने का सामर्थ्य नहीं तो हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णाकृष्णा हरे हरे 🙏🌹श्री राधे राधे बोलना तो पड़ेगा जी🌹🙏

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मैं पैदल घर आ रहा था । रास्ते में एक बिजली के खंभे पर एक कागज लगा हुआ था । पास जाकर देखा, लिखा था: कृपया पढ़ें "इस रास्ते पर मैंने कल एक 50 का नोट गंवा दिया है । मुझे ठीक से दिखाई नहीं देता । जिसे भी मिले कृपया इस पते पर दे सकते हैं ।" ... यह पढ़कर पता नहीं क्यों उस पते पर जाने की इच्छा हुई । पता याद रखा । यह उस गली के आखिरी में एक घऱ था । वहाँ जाकर आवाज लगाया तो एक वृद्धा लाठी के सहारे धीरे-धीरे बाहर आई । मुझे मालूम हुआ कि वह अकेली रहती है । उसे ठीक से दिखाई नहीं देता । "माँ जी", मैंने कहा - "आपका खोया हुआ 50 मुझे मिला है उसे देने आया हूँ ।" यह सुन वह वृद्धा रोने लगी । "बेटा, अभी तक करीब 50-60 व्यक्ति मुझे 50-50 दे चुके हैं । मै पढ़ी-लिखी नहीं हूँ, । ठीक से दिखाई नहीं देता । पता नहीं कौन मेरी इस हालत को देख मेरी मदद करने के उद्देश्य से लिख गया है ।" बहुत ही कहने पर माँ जी ने पैसे तो रख लिए । पर एक विनती की - ' बेटा, वह मैंने नहीं लिखा है । किसी ने मुझ पर तरस खाकर लिखा होगा । जाते-जाते उसे फाड़कर फेंक देना बेटा ।'मैनें हाँ कहकर टाल तो दिया पर मेरी अंतरात्मा ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि उन 50-60 लोगों से भी "माँ" ने यही कहा होगा । किसी ने भी नहीं फाड़ा ।जिंदगी मे हम कितने सही और कितने गलत है, ये सिर्फ दो ही शक्स जानते है.. परमात्मा और अपनी अंतरआत्मा..!! मेरा हृदय उस व्यक्ति के प्रति कृतज्ञता से भर गया । जिसने इस वृद्धा की सेवा का उपाय ढूँढा । सहायता के तो बहुत से मार्ग हैं , पर इस तरह की सेवा मेरे हृदय को छू गई । और मैंने भी उस कागज को फाड़ा नहीं ।मदद के तरीके कई हैं सिर्फ कर्म करने की तीव्र इच्छा मन मॆ होनी चाहिए 🌿🌿🌿🌿 *कुछ नेकियाँ* *और* *कुछ अच्छाइयां..* *अपने जीवन में ऐसी भी करनी चाहिए,* *जिनका ईश्वर के सिवाय..* *कोई और गवाह् ना हो...!!

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🎪🎨🎪🎨🎪🎨🎪 🏵कार्तिक मास में राम लक्ष्मण जी की कथा🏵 भगवान श्री राम लक्ष्मण और सीता जी पिता दशरथ जी की आज्ञा से वनवास जाने लगे | रास्ते में सभी तीर्थ गंगा , यमुना, गोमती नदियों में पितृ तर्पण कर वन में कंद मूल, फल फूल खाते हुए वन में अपना समय व्यतीत करने लगे | कार्तिक का महिना आया एकम के दिन लक्ष्मण जी ने राम जी की आज्ञा से फल फूल लाकर माँ सीता को दिए तब माँ सीता ने चार पतल परोसी तब लक्ष्मण ने पूछा भाभी माँ हम तीन हैं फिर चार में क्यों परोसा तब माँ सीता बोली एक पतल गों माता की हैं | 🏵🏵 राम जी, लक्ष्मण जी, गोंमाता को पतल परोस दी तब राम जी ने पूछा सीता जी आप ने खाना शुरू क्यों नहीं किया | तब सीता माँ बोली मेरे तो राम कथा सुनने का नियम हैं राम कथा सुनने के बाद ही में फल ग्रहण करूंगी | तब रामजी बोले मुझे कथा सुनादो लक्ष्मण जी बोले मुझे सुनादो तब माँ सीता बोली ओरत की बात ओरत सुने आप मेरे पति हो, आप मेरे देवर हो आपसे कैसे कहूँ | तब लक्ष्मणजी ने सोचा इस जंगल में कौन ओरत मिलेगी तब लक्ष्मण जी ने अपनी माया से एक नगरी का निर्माण किया उस नगरी में सब सुख सुविधाओ से युक्त थी उस नगरी में सब चीजे सोने की थी इसलिये नगरी का नाम सोन नगरी रखा | 🏵🏵 सभी नगर निवासियों को घमंड हो गया उस नगरी में कोई गरीब नहीं था | जब सीता जी कुंवे पर पानी लेने गई और पनिहारिनो से राम राम किया तो कोई नहीं बोली थोड़ी देर में एक छोटी कन्या आई सीता जी उससे राम राम बोली और कहा की बाई राम कथा सुनेगी क्या तब वह बोली मेरे तो घर पर काम हैं सीता जी ने कहा मेरे पति राम और देवर लक्ष्मण भूखे हैं, तब लडकी बोली मेरी माँ मेरा इंतजार कर रही हैं | वह लडकी वहां से जानी लगी तब माँ सीता के क्रोध से सारी नगरी साधारण सी हो गई जब लडकी घर गई तो माँ बोली बाई ये क्या हुआ | तब लडकी बोली मेरे को तो पता नहीं हैं | 🏵🏵 वहां पर एक साध्वी बैठी थी मुझे राम कथा सुनने के लिए बोली पर में तो कथा नहीं सुनी |यदि उसने कुछ किया हो तो पता नहीं | तब उसकी माँ ने उसको वापस जाकर कथा सुनने को कहा, लडकी ने वापस जाकर कथा सुनने से मना कर दिया तब उसकी बहु बोली आपकी आज्ञा हो तो में कहानी सुन कर आती हूँ | जब बहु कुंवे पर गई तो पानी भरे और खाली करे तब सीताजी ने कहा आपके घर पर कुछ काम नहीं हैं क्या ? तब वह बोली माताजी में तो सारा काम करके आई हूँ | तब माँ सीता बोली तू मुझे माँ कहकर बुलाई यदि तुझे समय हो तो मेरी राम कहानी सुन लेगी तब वह बोली माताजी कहानी सुनाओ मैं प्रेम से कहानी सुनूंगी | 🏵🏵 चन्दन चौकी मोतिया हार | राम कथा म्हारे हिवडे रो आधार || राम कथा सुनाऊ राम ने मनाऊं | राम कहे तो प्रदेश में जाऊ || 🏵🏵 सीताजी ने कहा हे बाई ! तूने मेरी मृत्युलोक में मदद करी भगवान तेरी स्वर्ग लोक में रक्षा करेंगे | सीताजी ने राम कथा सुनाई बाई ने कथा सुनी ➖➖➖➖ आवो राम बैठो राम | जल भर झारी लाई राम | 🏵🏵 केला री दातुन लाई राम | ठंडा जलभर लाई राम सम्पाडो पधरावो राम | झगल्या टोपी ल्याई राम | कड़ा किलंगी लाई राम | स्वर्ण सिंहासन लाई राम | तापर आप बिराजो राम | झालर टिकारा लाई राम | शंख ध्वनी गरणाऊ राम | 🏵🏵 हिवडे हीरा सोंवे राम | निरखता मन मोहे राम | चरण शरण में आई राम | शरण आपरी ले ल्यो राम | माखन मिस्री ल्याई राम | माखन मिश्री आरोगो राम | दूध भर कटोरी लाई राम | मेवा चिरंजी परोसू राम | 🏵🏵 खाती मीठी चाखां राम | चरखो फरखो आरोगो राम | रुच रुच भोग लगाओ राम | जो भावे सो लेल्यो राम | जल भर झारी ल्याई राम | अबै आचमन करल्यो राम | रे स्याम गमछो ल्याई राम | हाथ मुंह पौछ्ल्यो राम | 🏵🏵 पुष्पा सु सेज बिछाऊ राम | अंतरिया छिड़काऊं राम | हिंगलू डोल्या द्लाऊं राम | सीताजी चरण दबावे राम | सुखभर सेज पोढो राम | हाजर पंखा ढोलू राम | थामें राम, महामे राम | रोम रोम में राम ही राम | 🏵🏵 घट घट माय बिराजो राम | मुख में तुलसी बोलो राम | खाली मिजाज काई काम | जब बोलो जब राम ही राम | बोलो पंछी राम राम, पुरण होवे मंगल काम | 🏵🏵 राम कथा पूर्ण हुई तो सीता जी ने कहा ! हे बाई तूने मेरी राम कथा सुनी, मेरी सहायता की राम जी लक्ष्मण को जिमाया हैं भगवान तेरी भी रक्षा करेंगे | तुझे स्वर्ग का सुख मिलेगा | सीता माता ने उपहार स्वरूप अपने गले का हार दे दिया | जब वह घर गई तो उसके मटका सब सोने के हो गये | सासु जी ने कहा ये सब तू कहा से लाइ में माँ सीता से राम कथा सुनी ये इसी का फल हैं | सासुजी ने कहा प्रतिदिन राम कथा सुन आना | 🏵🏵 बाई को रामकथा सुनते बहुत दिन हो गये तब उसने माँ सीता से पूछा इसका उद्यापन विधि बतलाओ | तब सीता जी ने कहा सात लड्डू लाना, एक नारियल लाना उसके सात भाग करना, एक भाग मन्दिर में चढ़ाना जिससे मन्दिर बनवाने जितना फल होता हैं | एक भाग सरोवर के किनारे गाड देना जिससे सरोवर खुदवाने जितना फल होता हैं | एक भाग भगवद्गीता पर चढ़ाना जिससे भगवद्गीता पाठ करवाने जितना फल होगा | एक भाग तुलसी माता पर चढ़ाना जिससे तुलसी विवाह जितना फल होगा | एक भाग कंवारी कन्या को देवे जिससे कन्या विवाह जितना फल होगा | एक भाग सूरज भगवान को चढाना जिससे तैतीस करौड देवी देवता को भोग लगाने जितना फल होगा | अब उसने विधि पूर्वक उद्यापन कर दिया | माता सीता के पास आई माता मेने तो विधिपूर्वक उद्यापन कर दिया | अब सात दिन बाद वैकुण्ठ से विमान आएगा | 🏵🏵 सात दिन पुरे हुए विमान आया तो बहूँ ने कहा सासुजी स्वर्ग से विमान आया हैं तब सासुजी ने कहा बहूँ तेरे ससुरजी को व् मेरे को भी ले चल, तेरे माता पिता को ले चल सारे कुटुंब परिवार को ले चल, अड़ोसी पड़ोसी को ले चल बहूँ ने सबको बिठा लिया पर विमान खाली था | 🏵🏵 थोड़ी देर में उसकी नन्द आई और देखते ही देखते विमान भर गया तब बहूँ ने कहा माँ सीता नन्द बाईसा को भी बिठा लो पर माँ सीता ने कहा इसने कभी कोई धर्म पुण्य नहीं किया | तब बहूँ ने कहा बाईसा आप पहले कार्तिक मास में राम लक्ष्मण की कथा सुनना उसके बाद आप के लिए वैकुण्ठ से विमान आएगा | 🏵🏵 सात दिन पुरे हुए विमान आया तो बहूँ ने कहा सासुजी स्वर्ग से विमान आया हैं तब सासुजी ने कहा बहूँ तेरे ससुरजी को व् मेरे को भी ले चल, तेरे माता पिता को ले चल सारे कुटुंब परिवार को ले चल, अड़ोसी पड़ोसी को ले चल बहूँ ने सबको बिठा लिया पर विमान खाली था | 🏵🏵 थोड़ी देर में उसकी नन्द आई और देखते ही देखते विमान भर गया तब बहूँ ने कहा माँ सीता नन्द बाईसा को भी बिठा लो पर माँ सीता ने कहा इसने कभी कोई धर्म पुण्य नहीं किया | तब बहूँ ने कहा बाईसा आप पहले कार्तिक मास में राम लक्ष्मण की कथा सुनना उसके बाद आप के लिए वैकुण्ठ से विमान आएगा | 🏵🏵 गाँव के सरे लोग एकत्र हो गये और पूछने लगे बाई तूने ऐसा कौनसा धर्म पूण्य किया गीता भगवद्गीता के पाठ किये हमें भी बताओं तब बाई ने कहामैंने तो माता सीता से प्रतिदिन राम कथा सुनी और नियम से उद्यापन किया | तब समस्त ग्रामीण राम कथा सुनने की जिद्द करने लगे | तब बाई राम कथा कहने लगी और सब नर नारी सुनने लगे, राम कथा सम्पूर्ण होते ही समस्त नगरी सोने की हो गई | बाई ने कहा जो कोई राम कथा सुनेगा उसको मेरे समान ही फल मिलेगा | 🏵🏵 सब राम लक्ष्मण जी की जय जय कार करने लगे और विमान स्वर्ग में चला गया |सात स्वर्ग के दरवाजे खुल गये | पहले द्वार पर नाग देवता, समस्त देवी देवता पुष्प वर्षा करने लगे देवताओं ने पूछा की तूने क्या पुण्य किया तब उसने कहा मैंने तो राम लक्ष्मण जानकी की कहानी सुनी तू समस्त देवताओं ने कहा वर मांग तब उसने कहा मेरे तो सब सिद्धिया हैं | मुझे यह वर दो की जो भी श्रद्धा व् भक्ति से राम कथा, राम लक्ष्मण जानकी की कहानी सुनेगा उसको मेरे समान ही फल मिले सभी देवताओं ने पुष्प वर्षा करते हुए ततास्तु कहा | चारों और राम राम की जय जयकार होने लगी | 🌻जय सियाराम🌻राधा सखी👸 🎪🎨🎪🎨🎪🎨🎪

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हमारे दुःख का कारण क्या हैं? दोस्तों, वैसे तो जीवन मै हमारे पास अनेको कारण दुःख के होते हैं । हमे ये नही मिल पाया ,हमारे बच्चों को ये नही मिल पाया, हमे बढ़ा घर का सुख नही मिला, हमे बढ़ी गाडी का सुख नही मिला । हमारी लालच हमेशा बढ़ती ही जाती हैं । दोस्तों, जो मिलता हैं हम उसमे ख़ुशी की तलाश नही करते पर जो नही मिल पाता उसका हम जिंदगी भर गम पालते हैं । हमारी हालत वैसे ही हैं यदि एक दांत टूट जाए तो हमारी जुबान उसी खाली दांत की तरफ ही जायगी । हम जो 31 दांत बचे उसका आनन्द नही उठाते । जिंदगी मै लालच हमे अन्धकार की और ले जाता हैं । यही हमारे घमण्ड का कारक भी बनता हैं । लालच हमे ऊंचाई से नीचे भी गिरा देता हैं । दोस्तों, किसी वस्तु को पाने की मेहनत करना सफलता हो सकती हैं।पर किसी वस्तु की लालच कर उसको गलत तरीके से पाना हमे अपने आपको भटका सकता हैं ।ज्यादा लालच हमारे दुःख का कारण भी बनता हैं । हम कल के लिये और और इकट्ठा करने के लालच मै आज की जिंदगी भी नही जी पाते । आइये एक छोटी सी कहानी से आपको समझाता हूँ । एक पंडित जी कई वर्षो से काशी में शास्त्रों और वेदों का अध्ययन कर रहे थे। उन्हें सभी वेदों का ज्ञान हो गया था। पंडित जी को लगा कि अब वह अपने गाँव के सबसे ज्ञानी व्यक्ति कहलायेगे। उनके अन्दर घमण्ड आ गया था। अगले दिन पंडित जी अपने गाँव जाने लगे। गाँव में आते ही एक किसान ने उनसे पूछा, क्या आप हमें बता सकते है, कि हमारे समाज में लोग दुखी क्यों है? पंडित जी ने कहा, लोगो के पास जीने के लिए पर्याप्त साधन नहीं है। अपनी जरुरत पूरी करने के लिए धन नहीं है, इसलिए लोग दुखी है। किसान ने कहा, परन्तु पंडित जी जिन लोगो के पास धन दौलत है, वह लोग भी दुखी है। मेरे पास धन सम्पती है फिर भी मै दुखी हूँ क्यों ? पंडित जी को कुछ समझ नहीं आया कि वह किसान को क्या उत्तर दे। किसान ने कहा कि, वह आपको अपनी सारी संपत्ति दान कर देगा अगर आप उस के दुःख का कारण पता करके उसे बता दे तो। पंडित जी ने उसकी संपत्ति के लालच में कहा,ठीक है मैं कुछ दिनों में ही आपके दुःख का कारण ढूंढ लाऊंगा। यह कहकर पंडित जी पुनः काशी चले गए। उन्होंने शास्त्रों और वेदों का फिर से अध्ययन किया, परन्तु उन्हें किसान के सवाल का जवाव नहीं मिला। पंडित जी बहुत परेशान थे। वह सोच रहे थे कि अगर मैं किसान के सवाल का उत्तर नहीं दे पाया तो, लाखो की संपत्ति हाथ से चली जाएगी। अचानक उनकी मुलाकात एक औरत से हुई, जो रोड पर भीख माँग कर अपना गुजारा करती थी। उसने पंडित जी से उनके दुःख का कारण पूछा। पंडित जी ने उसे सबकुछ बता दिया। उस औरत ने कहा कि, वह उनको उनके सवाल का उत्तर देगी, परन्तु उसके लिए उन्हें उसके साथ कुछ दिन रहना पड़ेगा। पंडित जी कुछ देर चुप रहे वह सोच रहे थे कि, वह एक ब्राह्मण है, इसके साथ कैसे रह सकते है। अगर वह इसके साथ रहे तो उनको धर्म नष्ट हो जायेगा। पंडित जी ने फिर सोचा कुछ दिनों की बात है, उन्हें किसान के सवाल का उत्तर जब मिल जायेगा वह चले जायेगे, और किसान की संपत्ति के मालिक बन जायेगे। पंडित जी उसके साथ रहने के लिए तैयार हो गए। कुछ दिन तक वह उसके साथ रहे पर सवाल का उत्तर उस औरत ने नहीं दिया। पंडित जी ने उससे कहा, मेरे सवाल का उत्तर कब मिलेगा। औरत बोली, आपको मेरे हाथ का खाना खाना होगा। पंडित जी मान गए। जो किसी के हाथ का पानी भी नहीं पीते थे, वह उस गन्दी औरत के हाथ का बना खाना खा रहे थे। उनके सवाल का उत्तर अब भी नहीं मिला। अब औरत ने बोला उन्हें भी उनके साथ सड़क पर खड़े होकर भीख मांगनी पड़ेगी। पंडित जी को किसान के सवाल का उत्तर पता करना था, इसलिए वह उसके साथ भीख मांगने के लिए भी तैयार हो गए। उसके साथ भीख मांगने पर भी उसे अभी तक सवाल का उत्तर नहीं मिला था। एक दिन औरत ने पंडित जी से कहा कि उन्हें आज उसका झूठा भोजन खाना है। यह सुनकर पंडित जी को गुस्सा आया, और वह उसपे चिल्लाये और बोले तुम मुझे मेरे सवाल का उत्तर दे सकती हो तो बताओ। वह औरत मुस्कुराई और बोली, पंडित जी यह तो आपके सवाल का उत्तर है। यहाँ आने से पहले आप किसी के हाथ का पानी भी नहीं पीते थे। मेरे जैसी औरतो को तो आप देखना भी पसंद नहीं करते थे, परन्तु किसान की संपत्ति के लालच में आप मेरे साथ रहने के लिए भी तैयार हो गए। पंडित जी इंसान का लालच और उसकी बढ़ती हुई इच्छाए ही उसके दुःख का कारण है। जो उसे वह सबकुछ करने पर मजबूर कर देती है, जो उसने कभी करने के लिए सोचा भी नहीं होता। तो , हमे इतनी भी लालच नही करना चाहिये की हम हमारा आत्म सम्मान खो बैठे । धन , सुख ,संपत्ति आनी जानी हैं पर आपका सम्मान आपके जाने के बाद भी तटस्थ रहेगा। धन की लालच ना करे । आपकी हमेशा की तरह प्रतिक्रिया की राह मै ।

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योगमाया का आश्रय लेकर भगवान रास की भूमिका बनाते है रास लीला के आरंभ में शुकदेव जी कहते है - भगवानपि ता रात्री: शरदोत्फुल्लामल्लिका . वीक्ष्य रन्तुं मश्रच्क्रे योगमायामुपाश्रित: .. अर्थात - शरद ऋतु थी उसके कारण बेला चमेली आदि सुगन्धित पुष्प खिलकर महँ-महँक रहे थे भगवान ने चीर हरण के समय गोपियों को जिन रात्रियो का संकेत किया था, वे सब की सब पुंजीभूत होकर एक ही रात्रि के रूप में उल्लसित हो रही थी. भगवान ने उन्हें देखा, देखकर दिव्य बनाया, गोपियां तो चाहती ही थी अब भगवान ने भी अपनी अचिन्त्य महाशक्ति योगमाया के सहारे उन्हें निमित्त बनाकर रसमयी रास क्रीडा करने का संकल्प किया.अमना होने पर भी उन्होंने अपने प्रेमियों की इच्छा पूर्ण करने के लिए मन स्वीकार किया. वीक्ष्यरन्तुं - वीक्ष्य रन्तुं का अर्थ है रमण करने वाला . जो अपने में ही रमण करते है .श्री कृष्ण ने वृंदावन देखा, क्योकि वृंदावन में ही रास की इच्छा होती है अन्यत्र नहीं. वृंदावन के १२ वनों में अलग अलग रास नित्य चलता रहता है, वृंदावन के अतिरिक्त कही नहीं होता.एक बार जब द्वारिका में रानियों ने रास के बारे में सुना तो उनकी भी इच्छा रास करने की हुई तब श्री कृष्ण ने व्रज गोपियों को बुलाया भगवान के कहने से गोपियाँ आई तो पर उनकी केवल उपस्थिति ही हुई, रास नहीं हुआ. मश्रच्क्रे - मन रास लीला का हिस्सा है भगवान ने गोपियों के घर घर जाकर माखन नहीं चुराया है ,मन चुराया है.माखन में से "ख" को निकाल दो तो मन बन जायेगा, पर बात ये है कि मन ही क्यों चुराया ? क्योकि ठाकुर जी के पास सबकुछ है मन ही नहीं है इसलिए रास लीला के आरंभ में वंशी बजाकर गोपियो के मन के चुराकर इकठ्ठा करके जब वह मन का चक्र बन गया तब उसे अपने अन्दर रखा. और ठाकुर जी मन की ही चोरी करते है. मन बस इनको दे दो,क्योकि यदि मन इनको दिया तो ये मोर पंख बनाकर शीश पर धारण कर लेगे. और यदि संसार को दिया तो संसार तो इसे मसल कर फेक देगा इसलिए तन संसार को दे देना धन संसार को दे देना सब कुछ संसार को दे देना चलेगा परन्तु मन तो केवल ठाकुर जी को ही देना. योगमायामुपाश्रित: - माया तीन प्रकार की होती है - एक "विमुख-जन मोहिनी माया" दूसरी "वैष्णव-जन मोहिनी", तीसरी "स्वजन मोहिनी माया" 1."विमुख-जन मोहिनी माया" - दुर्योधन, कंस, हिरण्यकश्यप, आदि पर विमुख-जन मोहिनी माया थी.इस माया के फेर से व्यकित संसार की चीजो में ही फसे रहते है. परमात्मा के समक्ष आने पर भी प्रभु को पहचाना नहीं. 2."वैष्णव-जन मोहिनी"- कभी-कभी भगवान अपने भक्तो पर भी माया फेकते है भक्ति में भोग बाधक है इसलिए परमात्मा भक्तो को भोग देते है यह वैष्णव-जन मोहिनी माया है. जैसे मृतिका भक्षण के समय यशोदा माता ने जब लाला के मुख में चराचर ब्रह्माण्ड देखा तो वे सोचने लगी ये तो ईश्वर है, भगवान ने सोचा यदि मईया मुझे ईश्वर मान बैठी तो लीला कैसे होगी? और तब भगवान की इस वैष्णव जन मोहिनी माया ने अपना काम किया और माता डर गई और सोचने लगी- ये इतना बखेडा मेरे लाला के मुख में कहाँ ते आय गयों? कोई भूत प्रेत तो नाय घुस गयों? ममता में फस गई. इसी तरह गोपियों में सात्विक अहंकार आ गया था, श्रीदामा पर भी कालिया दमन के समय भगवान ने इसी माया का प्रयोग किया और वह अड गया कि मेरी गेंद अभी लाकर मुझे दो. 3. स्वजन मोहिनी माया - इस को देखकर परमात्मा स्वयं मोहित हो जाते है यह अति सुंदर है यह कौन है? कोटिन्ह रूप धारे मन मोहन तोउ ना पावे पार यह राधारानी है राधा को देखकर प्रभु मोहित हो जाते है. भगवान गीता में कहते है - हे अर्जुन ! मेरी माया को पार करना कठिन है. इस सारे जगत का सञ्चालन माया करती है. इसलिए भगवान ने रास में आरंभ में योगमाया का आश्रय लिया है.किस गोपी को रास में कहाँ खड़ा रखना है, जितनी गोपियाँ है, उतने श्रीकृष्ण के रूप कर दिए, कहाँ श्रुतिरूपा गोपियों को खड़ा करना है, कहाँ साधन-सिद्धा गोपियों को खड़ा करना है, कहाँ नित्य-सिद्धा गोपियों को खड़ा करना है, किस गोपी को कैसे कृष्ण पसंद है,ऐसे कृष्ण को उस गोपी के पास खड़ा करना योगमाया का काम है.

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