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पद्मपुराण में एक कथा है- एक बार एक शिकारी शिकार करने गया, शिकार नहीं मिला, थकान हुई और एक वृक्ष के नीचे आकर सो गया। पवन का वेग अधिक था, तो वृक्ष की छाया कभी कम-ज्यादा हो रही थी, डालियों के यहाँ-वहाँ हिलने के कारण। वहीं से एक अतिसुन्दर हंस उड़कर जा रहा था, उस हंस ने देखा की वह व्यक्ति बेचारा परेशान हो रहा हैं, धूप उसके मुँह पर आ रही हैं तो ठीक से सो नहीं पा रहा हैं, तो वह हंस पेड़ की डाली पर अपने पंख खोल कर बैठ गया ताकि उसकी छाँव में वह शिकारी आराम से सोयें। जब वह सो रहा था तभी एक कौआ आकर उसी डाली पर बैठा, इधर-उधर देखा और बिना कुछ सोचे-समझे शिकारी के ऊपर अपना मल विसर्जन कर वहाँ से उड़ गया। तभी शिकारी उठ गया और गुस्से से यहाँ-वहाँ देखने लगा और उसकी नज़र हंस पर पड़ी और उसने तुरंत धनुष बाण निकाला और उस हंस को मार दिया। हंस नीचे गिरा और मरते-मरते हंस ने कहा:- मैं तो आपकी सेवा कर रहा था, मैं तो आपको छाँव दे रहा था, आपने मुझे ही मार दिया? इसमें मेरा क्या दोष? उस समय उस पद्मपुराण के शिकारी ने कहा: यद्यपि आपका जन्म उच्च परिवार में हुआ, आपकी सोच आपके तन की तरह ही सुंदर हैं, आपके संस्कार शुद्ध हैं, यहाँ तक की आप अच्छे इरादे से मेरे लिए पेड़ की डाली पर बैठ मेरी सेवा कर रहे थे, लेकिन आपसे एक गलती हो गयी, की जब आपके पास कौआ आकर बैठा तो आपको उसी समय उड़ जाना चाहिए था। उस दुष्ट कौए के साथ एक घड़ी की संगत ने ही आपको मृत्यु के द्वार पर पहुंचाया हैं। शिक्षा: संसार में संगति का सदैव ध्यान रखना चाहिये। जो मन, कार्य और बुद्धि से परमहंस हैं उन्हें कौओं की सभा से दूरी बनायें रखना चाहिये। *🔱हर हर महादेव*🔱

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🙌🏻 आज श्रील रघुनाथ दास गोस्वामी पाद जी के दण्ड महोत्सव(पानिहाट्टी व श्रीराधाकुण्ड),चिड़ा-दही महोत्सव पर विशेष :: चिड़ा-दही महोत्सव, श्रील रघुनाथ दास गोस्वामी एवं श्री नित्यानंद प्रभु की एक लीला का वार्षिकोत्सव है। यह उत्सव पानिहाटी चिवड़ा उत्सव के नाम से भी विख्यात है। यह अद्भुत लीला बंगाल में कलकत्ता के निकट गंगा के तट पर स्थित पानिहाटी नामक स्थान पर हुई थी। चिड़ा-दही महोत्सव पर यह स्मरण किया जाता है कि कैसे श्रीमन्चैतन्य महाप्रभु ने श्रीनित्यानंद प्रभु एवं श्रील रघुनाथ दास गोस्वामी के माध्यम से अपने भक्तों के संग अादान-प्रदान किया, जिसमे सभी ने हर्षोल्लास के साथ दही, चिवड़ा एवं कई अमृतमय खाद्य सामग्री का भोज अायोजित किया था। एक बार श्रील रघुनाथ दास गोस्वामी जी को खबर मिली कि श्री नित्यानंद प्रभु उनके क्षेत्र सप्तग्राम के अंतरगत पानिहाटी आएं हैं। उनके साथ श्रीरामदास, श्रीगदाधर, श्रीपुरंदर पण्डित आदि भी पार्षद हैं। श्रीमन् महाप्रभु ने उन्हें घर-घर जाकर कृष्णप्रेम बांटने का आशीर्वाद दिया है। श्रीनित्यानंद प्रभु जिसे एक बार देख लेते हैं उनमें अश्रु , कंप ,पुलक,हुंकार आदि सात्विक गुण प्रकट होने लगते हैं। श्री रघुनाथ को लगा इस बार मुझ पर अवश्य कृपा होगी तथा वे श्री नित्यानंद प्रभु के पास पहुँच गये। श्री नित्यानंद प्रभु कीर्तन-नर्तन के पश्चात वट वृक्ष के नीचे चबूतरे पर बैठे थे। श्री रघुनाथ ने आते ही श्री नित्यानंद प्रभु को साष्टांग प्रणाम किया। श्री नित्यानंद प्रभु ने उनके शीश पर अपने चरण कमल रखकर फिर उन्हें उठाकर ह्रदय से लगा लिया। फिर प्रेम से श्रीरघुनाथ को देखते हुए बोले ,” चोर, इतने दिनों बाद आया। तुझे दंड मिलेगा। अरे ! भगवान तो भक्तों की सम्पत्ति होते हैं और तुम भक्तों को पूछे बगैर सीधा महाप्रभु जी के पास चले गये ।" श्री रघुनाथ दास जी समझ गये कि इसीलिये प्रभु ने उन्हें वापस घर क्यों भेजा । सिर झुकाकर अपनी गलती स्वीकार करी ।दंड के लिए श्री रघुनाथ दास तैयार थे। श्री नित्यानंद प्रभु ने उन्हें दंड स्वरुप सभी भक्तों के लिए दही चिवडा खिलाने का आदेश दिया। श्री रघुनाथ दास जी को दंड सुनकर ख़ुशी हुई। धन और सेवकों की उन्हें कमी नही थी। अल्प समय में सारा इंतज़ाम हो गया। इतना सारा चिवडा , केला, गुड़, दूध, दही मंगवाया गया। केला और गुड़ को मिलकर मिश्रित द्रव्य बनाया गया। फिर चिवड़े के दो हिस्से किये गये। एक हिस्से में चिवड़े और दही तथा गुड़ केले का मिश्रण डाला गया। दूसरे हिस्से में चिवडों में दूध तथा गुड़ केले का मिश्रण डाला गया। सभी भक्तों को एक-एक डोना दही चिवडा व एक डोना दूध चिवडा दिया गया। फिर श्री रघुनाथ दास जी ने वट वृक्ष के नीचे आसन बिछाकर दो-दो डोने श्री गौरांग महाप्रभु एवं श्री नित्यानंद प्रभु के लिए रख दिए। श्री निताई चाँद ने ध्यानस्त होकर श्री गौरहरि को पुकारा एवं प्रेम पुकार सुनकर गौरांग महाप्रभु वहां आये। महाप्रभु के साथ श्री नित्यानंद जी सभी लोगों के बीच गये। सभी के डोने में से एक-एक कण उठाकर श्री गौरांग महाप्रभु को खिलाने लगे। अंत में श्री नित्यानंद गौरांग महाप्रभु के साथ चबूतरे पर आकर बैठ गये। श्री गौरांग महाप्रभु वहां प्रकट हो गये थे , यह दृश्य सभी को नही दिखा। जिन्होंने प्रेम चक्षुओं से उन्हें देखा, उन्हें ही श्री महाप्रभु दिखे। श्री नित्यानंद प्रभु ने अपना एवं श्री गौरांग का अवशिष्ट प्रसाद श्री रघुनाथ दास जी को दिया। दंड महोत्सव समाप्त हुआ। आज भी जाह्नवी तट पर बसे पानिहाटी (उड़ीसा-बंगाल) में उसी वट वृक्ष के नीचे ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी अर्थात आज ही के दिन हजारों साधु संत एकत्र होकर चिड़ा-दही महोत्सव मनाते हैं। 🙌🏼 श्रीराधारमण दासी परिकर 🙌🏼

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