*श्रीसारस्वत पञ्चाङ्ग™----------®* *👉पंचाग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना जाता है इसीलिए भगवान श्रीराम भी पंचांग का श्रवण करते थे। पंचांग को नित्य पढ़ने और सुनने से देवताओं की कृपा, कुंडली के ग्रहो के शुभ फल मिलते है। इसलिए हर मनुष्य को जीवन में शुभ फल की प्राप्ति के लिए नित्य पंचांग को देखना और पढ़ना चाहिए।* *🐚🌺📜आज का पञ्चाङ्ग📜🌺🐚* 🔅 आज का दिनाँक 12 नवंबर 2019 🔅 दिन - मंगलवार 🔅 विक्रम संवत - 2076 🔅 शक संवत - 1941 🔅 अयन - दक्षिणायण 🔅 ऋतु - हेमन्त 🔅 मास - कार्तिक 🔅 पक्ष - शुक्लपक्ष 🔅 तिथि - पूर्णिमा 🔅 नक्षत्र - भरणी 🔅 योग - व्यतिपात 🔅 दिशाशूल - उत्तर दिशा मे 🔅 सूर्योदय - 07:00 मिनट 🔅 सूर्यास्त - 17:42 मिनट पर 🔅 चंद्रोदय - 17:53 मिनट +पर 🔅 चंद्रास्त - 00:00 मिनट पर 🔅 राहुकाल - 15:01 - 16:21 अशुभ 🔅 अभिजित - 11:57 -12:45 शुभ 🔅 तिथिविशेष - सर्वार्थसिद्धि योग , देव दीपावली , कार्तिक पूर्णिमा व्रत, पुष्कर स्नान , गुरुनानक जयंती , भीष्म पंचक समाप्त , कार्तिक रथ यात्रा , राष्ट्रीय पक्षी दिवस ************************************************************* *🔱⚜ भाग्योदय के लिए क्या करें⚜🔱* *👉जानिए कब और क्यों मनाई जाती है देव दीपावली::---------–---------* *🌻श्रीसारस्वत पंचांग के अनुसार कार्तिक माह की पूर्णिमा के दिन देव दिवाली मनाई जाती है। यह दीपावली के पन्द्रह दिन बाद आती है और इस वर्ष यह त्यौहार आज के दिन मंगलवार के दिन समुचे भारत में बड़े ही धूमधाम के साथ मनाई जाएगी। मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव ने कार्तिक पूर्णिमा के दिन त्रिपूर नाम के असुर का वध किया था और पूरे काशी को मुक्त कराया था। जिसके बाद से ही देवताओं ने कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान शंकर की महाआरती की और नगर दीपक जलाकर सजाया था। देव दीपावली के दिन भगवान विष्णु चतुर्मास की निद्रा से जागते हैं और भगवान शिव चतुर्दशी को। इस मौके पर सभी देवी देवता आकाश से आकर धरती पर उतरते हैं और काशी में दीप जलाते हैं। इस दिन दान का बहुत महत्व है। अन्न दान का तो बहुत ही महत्व है। इस देव दिवाली के दिन एक साथ सभी देवों को प्रसन्न करने का सुअवसर मिलता है। जो भी आपका आराध्य देवता है वह यहीं काशी के गंगा तट पर विराजमान है उनका वहीं पूजन कर सकते हैं जिससे उस देवता का आशीर्वाद आपको प्रत्यक्ष मिल जाता है।*  *You can contact us onwhatsapp* http://wa.me/919314147672/?text=Hello *# I.k. bhardwaj* *#Astrology* *# vaastu salahkar* *# sri sarswat Jyotish* *👉नोट~~~~ आज व्यतिपात योग में सभी प्रकार की सामग्री का दान करना शुभफलदायी है।* ================================================== *✍ पंचागकर्ता~~~इन्द्रकृष्ण भारद्वाज(बीकानेर)* *मोबाइल नम्बर ---- +919314147672 9214247672* *Email. --- [email protected]* ================================================== *यह पंचांगबीकानेर की अक्षांश रेखांश पर आधारित है।* 🌻🌹🌻🌹🌻🌹🌻🌹🌻🌹🌻🌹🌻🌹🌻🌹🌻🌹🌻🌹🌻🌹🌻🌹🌻🌹🌻

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कर्ण और अर्जुन में कौन बड़ा दानी है? किसी को दान करना महादान कहलाता है और जिसका पुण्य इंसान को दुनिया को छोड़ने के बाद भी प्राप्त होता है। लेकिन भगवान श्री कृष्ण की मानें तो दान देना व्यर्थ है…. बात हम महाभारत काल की करें, तो वहां ऐसे कई पात्र हैं जिन्होंने अपने जीवन में कई सारे दान-पुण्य का काम किया है और दान-पुण्य की इस सूचि में सबसे पहले और बड़ा नाम किसी का आता है, तो वह है कर्ण। आज भी लोग सबसे बड़ा दानी कर्ण को ही मानते हैं। आज श्री भक्तमाल पेज आपको एक ऐसा किस्सा बताने जा रहा है जो दान से जिड़ा हुआ है और जिसके ज़रिए भगवान श्री कृष्ण ने यह प्रमाण दिया था कि कर्ण और अर्जुन में कौन बड़ा दानी है??? दरअसल, एक बार भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन एक गांव से गुजर रहे थे कि तभी अचानक श्री कृष्ण ने अर्जुन से दानवीर कर्ण की दिल खोलकर प्रशंसा कर डाली, जिसे सुनते ही अर्जुन ने यह सवाल किया कि आखीर कर्ण ही क्यों सबसे बड़े दानी कहलाते हैं… दान तो मैं भी करता हूं… मैं भी तो दानी हुआ… फिर भी आप मुझे क्यों बड़ा दानी नहीं कहते… अर्जुन के इस सवाल पर पहले तो भगवान श्री कृष्ण मुस्कुराए और फिर अपने सामने मौजूद दो बड़े पर्वतों को उन्होंने सोने का बना दिया और कहा कि – “पार्थ यह दोनों सोने के पर्वत हैं… आप इन्हें गांव वालों में दान कर आए, लेकिन इस बात का ध्यान रहे कि पर्वतों का एक एक हिस्सा गांव के सभी लोग को ज़रूर मिलना चाहिए और तुम खुद अपने लिए कुछ भी हिस्सा नहीं रख सकते हो… अर्जुन और कर्ण में हुआ यह कैसा अनोखा मुकाबला – फिर क्या अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण से आशीर्वाद लिया और गांव की ओर चल दिए। गांव पहुंचकर उन्होंने गांव में मौजूद सभी लोगों को एकत्रित होने की आज्ञा दी। अर्जुन ने सोना बांटना शुरू किया। सभी लोग अर्जुन की जय-जयकार करने लगे और अर्जुन यह सुन फुले नहीं समाए। पूरे दो दिनों तक यह सिलसिला यूंही चलता रहा। गांव वाले आते और फिर दोबारा लाइन में खड़े हो जाते। अर्जुन काफी तंग हो गए लेकिन गांव वालों की जय-जयकार उनका हौसला बांधे हुए थी। थक-हार कर अर्जुन कहते हैं कि – “हे केशव… मैं आपसे से क्षमा चाहता हूं लेकिन अब मैं यह काम नहीं कर पाउंगा… अब श्री कृष्ण कर्ण को बुलाते हैं और अर्जुन की ही तरह उन्हें दोनों सोने के पर्वत को गांव वालों के बीच बांटने को कहते हैं। भगवान श्री कृष्ण की आज्ञा का पालन करते हुए कर्ण ने सभी गांव वालों को बुलाया और कहा – “यह सोना आप सभी का है… आप जितना चाहे ले लें और आपस में बांट लें। बस इतना कहकर कर्ण वहां से चलते बने। अर्जुन यह सब देख रहे थे और फिर वह श्री कृष्ण से सवाल करते हैं कि उनके दिमाग में यह विचार क्यों नहीं आया… कर्ण इसलिए कहलाते हैं दानवीर – श्री कृष्ण मुस्कराते हैं और कहते हैं कि – “पार्थ सच तो यह है कि तुम्हें सोने से मोह हो गया था और तुम आकलन करने बैठ गए थे कि किसको कितना ज़रूरत है, उसके हिसाब से ही तुम सोना गांव वालों के बीच बांट रहे थे। वहीं, गांव वाले जब तुम्हारी जय-जयकार करने लगे, तो खुद को महान दाता समझने लगे, लेकिन कर्ण ने ऐसा कुछ नहीं किया। उसने चुप चाप दोनों सोने के पर्वत को गांव वालों के बीच बांट दिया, क्योंकि कर्ण चाहते ही नहीं थे कि उनकी जय-जयकार हो। कर्ण को इस बात का ज्ञान था कि वह बस एक ज़रिया हैं, जो परमात्मा द्वारा दी हुई चीज़ों को गांव वालों तक पहुंचा रहे हैं। दान कब बन जाता है व्यर्थ – याद रखें कि दान कभी कुछ पाने की इच्छा से ना करें, क्योंकि वैसा दान हमेशा व्यर्थ जाता है… जिस दान को देते समय आपको किसी चीज़ को पाने की इच्छा होती हो, तो वह दान कभी सफल दान नहीं होगा और आपको उसका पुण्य कभी प्राप्त भी नहीं होगा

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