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आज का भगवद चिंतन।कृष्ण कहते हैं तुम मुझे कहाँ कहाँ ढूंढते हो,किन्तु मैं जहाँ हूँ, वहॉं कभी नही झांकते भी नही ।मैं सभी के दिलों में स्थित हूँ।जो भी भक्त मुझ पर अटूट श्रद्धा और विश्वास रखता है, मैं सबसे पहले उन्ही को अपनी शरण मे लेता हूँ।पढिये कथा।एक सन्त कुएं पर स्वयं को लटका कर ध्यान करता था और कहता था जिस दिन यह जंजीर टूटेगी मुझे ईश्वर मिल जाएंगे। उनसे पूरा गांव प्रभावित था सभी उनकी भक्ति,उनके तप की तारीफें करते थे। एक व्यक्ति के मन में इच्छा हुई कि मैं भी ईश्वर दर्शन करूँ। वह कुए पर रस्सी से पैर को बांधकर कुएं में लटक गया और कृष्ण जी का ध्यान करने लगा जब रस्सी टूटी उसे कृष्ण अपनी गोद मे उठा लिए और दर्शन भी दिए। तब व्यक्ति ने पूछा आप इतनी जल्दी मुझे दर्शन देने क्यों चले आये जबकि वे संत महात्मा तो वर्षों से आपको बुला रहे हैं। कृष्ण बोले ! वो कुएं पर लटकते जरूर हैं किंतु पैर को लोहे की जंजीर से बांधकर । उसे मुझसे ज्यादा जंजीर पर विश्वास है। तुझे खुद से ज्यादा मुझ पर विश्वास है इसलिए मैं आ गया। आवश्यक नहीं कि दर्शन में वर्षों लगें आपकी शरणागति आपको ईश्वर के दर्शन अवश्य कराएगी और शीघ्र ही कराएगी। प्रश्न केवल इतना है आप उन पर कितना विश्वास करते हैं।... ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।* *भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारुढानि मायया ॥* हे अर्जुन ! ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय में स्थित हैं। शरीररूपी यंत्र पर आरूढ़(चढ़े) हुए सब प्राणियों को, वे अपनी माया से घुमाते रहते हैं। *श्रीकृष्ण शरणं मम । इसे सदैव याद रखें और बुद्धि में धारण करने के साथ व्यवहार में भी धारण करें।। प्रभु दर्शन अवश्य होंगे।जय जय श्री राधेकृष्ण जी।

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