।। उत्सव व्यंजन द्वादशी की मंगल बधाई ।। म्हारा बाल गोविंदा जी ठाकुर छेल छबीला जी, की म्हारे घर रमवा आजो जी॥ लाडु मंगई दूँ पेड़ा मंगई दूँ, साथ मे माखन मिश्री जी। म्हारा मन मे ऐसी आवै, की छप्पन भोग जिमई दूँ जी। ठाकुर छेल छबीला जी, की म्हारे घर रमवा आजो जी॥ हाथ धुलई दूँ पाँव धुलई दूँ, और धूलई दूँ थारौ मुंडों जी। म्हारा मन मे ऐसी आवै, की अपने हाथ निहलई दूँ जी। ठाकुर छेल छबीला जी, की म्हारे घर रमवा आजो जी॥ चरमरीया झूल सिलई दूँ, रंग राधा की टोपी जी। म्हारा मन मे ऐसी आवै, अपने हाथ पिरई दूँ जी। ठाकुर छेल छबीला जी, की म्हारे घर रमवा आजो जी॥ राधा बुलई दूँ, रुकमणी बुलई दूँ, और बुलऊ सत्यभामा जी। म्हारा मन मे ऐसी आवै, संग मे रास रचई दूँ जी। ठाकुर छेल छबीला जी, की म्हारे घर रमवा आजो जी॥

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. एक घड़ी आधी घड़ी, आधी में पुनि आध। तुलसी संगत साधु की, हरे कोटि अपराध॥ किसी गाँव में एक चोर रहता था। एक बार उसे कई दिनों तक चोरी करने का अवसर ही नहीं मिला, जिससे उसके घर में खाने के लाले पड़ गये। अब मरता क्या न करता, वह रात्रि के लगभग बारह बजे गाँव के बाहर बनी एक साधु की कुटिया में घुस गया। वह जानता था कि साधु बड़े त्यागी हैं, अपने पास कुछ नहीं रखते फिर भी सोचा, 'खाने पीने को ही कुछ मिल जायेगा। तो एक दो दिन का गुजारा चल जायेगा।' जब चोर कुटिया में प्रवेश कर रहे थे, संयोगवश उसी समय साधु बाबा ध्यान से उठकर लघुशंका के निमित्त बाहर निकले। चोर से उनका सामना हो गया। साधु उसे देखकर पहचान गये क्योंकि पहले कई बार देखा था, पर साधु यह नहीं जानते थे कि वह चोर है। उन्हें आश्चर्य हुआ कि यह आधी रात को यहाँ क्यों आया ! साधु ने बड़े प्रेम से पूछाः "कहो बालक ! आधी रात को कैसे कष्ट किया ? कुछ काम है क्या ?" चोर बोलाः "महाराज ! मैं दिन भर का भूखा हूँ। साधुः "ठीक है, आओ बैठो। मैंने शाम को धूनी में कुछ शकरकंद डाले थे, वे भुन गये होंगे, निकाल देता हूँ। तुम्हारा पेट भर जायेगा। शाम को आ गये होते तो जो था हम दोनों मिलकर खा लेते। पेट का क्या है बेटा ! अगर मन में संतोष हो तो जितना मिले उसमें ही मनुष्य खुश रह सकता है। 'यथा लाभ संतोष' यही तो है। साधु ने दीपक जलाया। चोर को बैठने के लिए आसन दिया, पानी दिया और एक पत्ते पर भुने हुए शकरकंद रख दिये। फिर पास में बैठकर उसे इस तरह खिलाया, जैसे कोई माँ अपने बच्चे को खिलाती है। साधु बाबा के सदव्यवहार से चोर निहाल हो गया, सोचने लगा, 'एक मैं हूँ और एक ये बाबा हैं। मैं चोरी करने आया और ये इतने प्यार से खिला रहे हैं ! मनुष्य ये भी हैं और मैं भी हूँ। यह भी सच कहा हैः आदमी-आदमी में अंतर, कोई हीरा कोई कंकर। मैं तो इनके सामने कंकर से भी बदतर हूँ। मनुष्य में बुरी के साथ भली वृत्तियाँ भी रहती हैं, जो समय पाकर जाग उठती हैं। जैसे उचित खाद-पानी पाकर बीज पनप जाता है, वैसे ही संत का संग पाकर मनुष्य की सदवृत्तियाँ लहलहा उठती हैं। चोर के मन के सारे कुसंस्कार हवा हो गये। उसे संत के दर्शन, सान्निध्य और अमृतवर्षा दृष्टि का लाभ मिला। उन ब्रह्मनिष्ठ साधुपुरुष के आधे घंटे के समागम से चोर के कितने ही मलिन संस्कार नष्ट हो गये। साधु के सामने अपना अपराध कबूल करने को उसका मन उतावला हो उठा। फिर उसे लगा कि 'साधु बाबा को पता चलेगा कि मैं चोरी की नियत से आया था तो उनकी नजर में मेरी क्या इज्जत रह जायेगी ! क्या सोचेंगे बाबा कि कैसा पतित प्राणी है, जो मुझ संत के यहाँ चोरी करने आया !' लेकिन फिर सोचा, 'साधु मन में चाहे जो समझें, मैं तो इनके सामने अपना अपराध स्वीकार करके प्रायश्चित करूँगा। इतने दयालू महापुरुष हैं, ये मेरा अपराध अवश्य क्षमा कर देंगे।' संत के सामने प्रायश्चित करने से सारे पाप जलकर राख हो जाते हैं। भोजन पूरा होने के बाद साधु ने कहाः "बेटा ! अब इतनी रात में तुम कहाँ जाओगे, मेरे पास एक चटाई है, इसे ले लो और आराम से यहाँ सो जाओ। सुबह चले जाना।" नेकी की मार से चोर दबा जा रहा था। वह साधु के पैरों पर गिर पड़ा और फूट-फूट कर रोने लगा। साधु समझ न सके कि यह क्या हुआ ! साधु ने उसे प्रेमपूर्वक उठाया, प्रेम से सिर पर हाथ फेरते हुए पूछाः "बेटा ! क्या हुआ ?" रोते-रोते चोर का गला रूँध गया। उसने बड़ी कठिनाई से अपने को सँभालकर कहाः "महाराज ! मैं बड़ा अपराधी हूँ।" साधु बोलेः "बेटा ! भगवान तो सबके अपराध क्षमा करने वाले हैं। उनकी शरण में जाने से वे बड़े-से-बड़े अपराध क्षमा कर देते हैं। तू उन्हीं की शरण में जा। चोरः "महाराज ! मेरे जैसे पापी का उद्धार नहीं हो सकता।" साधुः "अरे पगले ! भगवान ने कहा हैः यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्य भाव से मेरा भक्त होकर मुझको भजता है तो वह साधु ही मानने योग्य है।" "नहीं महाराज ! मैंने बड़ी चोरियाँ की हैं। आज भी मैं भूख से व्याकुल होकर आपके यहाँ चोरी करने आया था लेकिन आपके सदव्यवहार ने तो मेरा जीवन ही पलट दिया। आज मैं आपके सामने कसम खाता हूँ कि आगे कभी चोरी नहीं करूँगा, किसी जीव को नहीं सताऊँगा। आप मुझे अपनी शरण में लेकर अपना शिष्य बना लीजिये। साधु के प्यार के जादू ने चोर को साधु बना दिया। उसने अपना पूरा जीवन उन साधु के चरणों में सदा के समर्पित करके अमूल्य मानव जीवन को अमूल्य-से-अमूल्य परमात्मा को पाने के रास्ते लगा दिया। महापुरुषों की सीख है कि "आप सबसे आत्मवत् व्यवहार करें क्योंकि सुखी जीवन के लिए विशुद्ध निःस्वार्थ प्रेम ही असली खुराक है। संसार इसी की भूख से मर रहा है, अतः प्रेम का वितरण करो। अपने हृदय के आत्मिक प्रेम को हृदय में ही मत छिपा रखो। उदारता के साथ उसे बाँटो, जगत का बहुत-सा दुःख दूर हो जायेगा। ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" ********************************************

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. "सांकरी खोर लीला" बरसाने की ओर से श्रीराधा अपनी सखियों के साथ आपस में बतियाती-इठलाती सिर पर दधि-माखन की चिकनी-चुपड़ी मटुकियों को रखकर दानघाटी की ओर चली आ रहीं हैं। काले-कजरारे नुकीले नयनों में कटीला कजरा डाले, माथे पर लाल-लाल बड़ी-सी बिन्दी, गोरे-गोरे सुडौल शरीर पर घुमेरदार रंगरगीला लहंगा और उस पर लहराती-फहराती टेसू के फूलों के रंग में रंगी चुनरी, घूंघट में से झांकती तिरछी चितवन। ऐसा लग रहा था मानो रंग-बिरंगी घटाएं आकाश से उतरकर व्रज की हरियाली धरती पर उमड़ती-घुमड़ती चली आ रहीं हैं। सोने और चांदी के आभूषणों से लरकती-मटकती ये गोपियाँ जब कान्हा और उसकी टोली के भय से जल्दी-जल्दी कदम बढ़ातीं तो इनके कंगनों, कमर की कौंधनियों और पैरों में पहनी झांझर-बिछुओं की रुनझुन कदम्बवृक्ष पर बैठे कन्हैया के कानों में एक अपूर्व माधुर्यरस उडेल देती और वे अपने सखाओं को पुकार उठते–’अरे ओ सुबल ! अरे सुदामा ! ओ मधुमंगल ! धाऔ धाऔ (दौड़ो दौड़ो), कहीं ये ग्वालिन निकसि न जायँ (दूर न चली जाएं)। इनकी राह में अपनी-अपनी लकुटियां कूं टेक देओ (अपनी-अपनी लकड़ी से इनका रास्ता रोक दो)। श्रीकृष्ण के इतना कहते ही सभी सखाओं की टोली यहाँ-वहाँ से लदर-पदर आ निकली। उस समय की नयनाभिराम झांकी का वर्णन बड़ा ही रसमय और मन को गुदगुदाने वाला है– एक तरफ तो सकुचाता-लजाता, गोरस की मटकियों को सिर पर रखे कुछ ठगा-सा, कुछ भयभीत पर कान्हा की रूपराशि पर मोहित व्रजवनिताओं का झुण्ड और दूसरी ओर चंदन और गेरु से मुख पर तरह-तरह की पत्रावलियां बनाए, कानों में रंग-बिरंगे पुष्पों के गुच्छे लटकाए, गले में गुंजा की माला पहने, हरे-गुलाबी अगरखा (छोटा कुर्ता) पर कमर में रंग-बिरंगे सितारों से झिलमिलाते फेंटा कसे, मोरपंखों से सजी लकुटिया (बेंत) लिये ग्वालबालों सहित श्रीकृष्ण का टोल (दल)। श्रीकृष्ण ने ग्वालबालों के साथ गोपवधुओं को चारों ओर से घेर लिया और उनके आगे पैर रखकर खड़े हो गए। तभी एक ग्वालिन चित्रासखी ने हिम्मत करते हुए कान्हा से कहा– ’क्यों जी! क्या बात है हमारी गैल (रास्ता) क्यों रोकौ हौ? दूध दही नाय तेरे बाप की और यह गली नाय तेरे बाप की, छाछ हमारी वो पीवै जो टहल करै सब दिना की।’ तुरन्त हाजिरजबाव कान्हा ने कहा– ’या दानघाटी पर हमारौ दान होय है। चतुराई त्यागौ और दान दै जाओ।’ ब्रजेन्द्रनन्दन का इतना कहना था कि तपाक से एक चतुर ग्वालिन चन्द्रावली ने उत्तर दिया–’अजी दान काहे बात कौ? यहाँ के राजा तो श्रीवृषभानुजी हैं। हटौ हमारी रस्ता छोड़ौ, नहीं तो मथुरा में जाय कै कंस से कहि दीनी जाएगी। सबरी खबर परि जाएगी लाला कूं। दान देओ जाय दान (दान दो इसको दान)।’ तभी दूसरी गोपी बोली– ’हे मनमोहन! मैं बरसाने की ग्वालिन हूँ, मुझसे बेकार में झगड़ा मत कर। तूने केवल पांच टके का कम्बल ओढ़ रखा है, उस पर इतना घमण्ड! तुम नन्दबाबा की गाय चराते हो और मुझसे दान मांगते हो ! देखो लाला ! हाथापाई करोगे तो तुम जानो। हीरों से जड़ी ये मेरी ईडुरी (सिर पर मटकी रखने के लिए गोल पहिया जैसा) है जिसमें करोड़ों के हीरे लगे हैं, यदि इसमें से एक भी निकल कर कहीं गिर गया तो देख लेना। तुम्हारी सब गायों की कीमत भी इतनी नहीं होगी।’ कन्हैया ने कहा–’तू बाबरी क्या जाने, मैं तो त्रिलोकी का राजा हूँ। जड़, जीव, जल-थल सबमें मैं समाया हुआ हूँ। ब्रह्मा, शंकर, सनकादि ऋषि भी मेरा पार नहीं पाते। तू गंवार ग्वालिन मुझे क्या समझाती है। मैं अपने भक्तों की रक्षा और दुष्टों का संहार करता हूँ। कंस के तो केश पकड़ कर मैं पृथ्वी का भार उतार दूंगा। ब्रह्मारूप में सृजन, शिवरूप में संहार और विष्णुरूप में जगत की रक्षा–मैं नन्दकुमार ही करता हूँ।’ एक गोपी कंस के नाम पर कन्हैया को धमकाती है। इस पर एक सखा बोला–’कन्हैया! बात बनाना तो इस गोपी को बहुत आता है। कन्हैया! तू सुन रहा है ये गोपी क्या कह रही है?’ कन्हैया ने अपने साथी की बात सुनकर गोपी से कहा–’अच्छा तो तू धोंस दे रही है और वो भी उस कंस की।’ कंस की धोंस भला कन्हैया को कैसे सहन होती। कन्हैया ने कहा–‘मैं गौओं की शपथ खाकर कहता हूँ, उस कंस को मैं उसके बंधु-बांधवों सहित मार डालूंगा।’ बस होने लगी दोनों में परस्पर मधुर ऐंचातानी (खींचतान) और छैल-छबीले कन्हैया ने एक हाथ से ग्वालिन का कंगन और दूसरे से आंचल पकड़ लिया और बोले कि बहुत दिनों तक तुम सब ग्वालिन दान देने से बच गयीं पर आज मैं पूरा हिसाब करुंगा। गोपी ने कन्हैया को ताना मारते हुए कहा– ’नंदबाबा भी गोरे हैं और जसुमति मैया भी गोरी हैं, तुम इन्हीं लक्षणों (करतूतों) के कारण सांवरे हो।’ कान्हा से पीछा छूटता न दिखने पर एक चतुर गोपी बोली–’मेरे कन्हैया ! हम तुम पर बलिहारी जाती हैं। कल हम बहुत सारा गौरस लेकर आयेंगी तब तुम्हें चखायेंगी। हमारे जीवनधन! आज हमें जाने दो।’ पर कन्हैया जब पकड़ता है तब क्या कोई सरलता से छूट सकता है ? कन्हैया ने गोपी से कहा– 'हमें तुम पर विश्वास नहीं है। तुम्हारे गौरस को चखने के लिए मेरा मन बहुत ललचा रहा है। हाथ में आये अमृत को छोड़कर कल की आशा करना व्यर्थ है। पूर्ण चन्द्र को पाकर चकोर धैर्यवान बना रहे, यह तो असम्भव है।' हुआ भी वही–नयनों से नयनों का मिलन हुआ। यह "सांकरी खोर" श्रीप्रिया-प्रियतम के प्रेमरस की लूट की अनोखी दान स्थली बन गयी, जहाँ श्यामसुन्दर अपनी प्यारीजू और उनकी सखियों को दान के लिए रोका करते थे। गोपियाँ आपस में कहने लगीं–’यह नन्द का लाला तो बड़ा ढीट और निडर है। गांव में तो निर्बल बना रहता है और वन में आकर निरंकुश बन जाता है। हम आज ही चलकर यशोदाजी से इसकी करतूत कहती हैं।’ पर मन-ही-मन अपने प्यारे कन्हैया के प्रेम में मग्न होकर उनके आगे समर्पण करती हैं। नन्दनन्दन ने ग्वालबालों के साथ सबके दहीपात्र भूमि पर पटक दिए। फिर श्रीकृष्ण और सखाओं ने कदम्ब व पलाश के पत्तों के दोने बनाकर टूटे पात्रों से दही लेकर खाया। तब से वहाँ के वृक्षों के पत्ते दोने के आकार के होने लग गए और यह जगह ‘द्रोण’ के नाम से प्रसिद्ध हो गयी। आज भी यहाँ दही दान करके स्वयं भी पत्ते में रखकर दही खाना बहुत पुण्यमय माना जाता है। भगवान श्रीकृष्ण की दानलीला भक्तों को परमसुख देने वाली है। हिंदी साहित्य के तमाम कृष्णभक्त कवियों ने इस लीला को और भी सजीव बना दिया है। इस लीला को पढ़ने में जितना आनंद प्राप्त होता है, उससे कहीं अधिक देखने और सुनने से मिलता है। सांकरी खोर नामक स्थान पर इस लीला का आयोजन किया जाता है। बरसाना के लोग राधाजी का, चिकसौली के लोग चित्रासखी का और नंदगांव के लोग श्रीकृष्ण और ग्वालों का प्रतिनिधित्व करते हुए सांकरी खोर पर पहुंचते हैं। लीला का आयोजन किया जाता है। चित्रासखी के गांव से आई मटकी पर नंदगांव के ग्वाल टूट पड़ते हैं। छीनाझपटी में मटकी टूट जाती है। श्रद्धालुओं में मटकी प्रसाद की होड़ लग जाती है। ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे"

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. "सखी सम्प्रदाय" अक्सर हम वृंदावन में स्त्रियों की तरह सोलह-श्रृंगार किये हुये पुरुषों को देखते हैं, जो कि बहुत मस्त भाव से श्रीकृष्ण को रिझाते हुये उनके आगे नृत्य करते हैं। जो लोग उनके इस भाव को नहीं जानते हैं उनके मन में उन्हें देख कई तरह के विचार आते हैं। ये कौन हैं, क्या रूप बना रखा है, स्त्रीवेश में क्यों घुमते हैं, इत्यादि। ये लोग सखी सम्प्रदाय के होते हैं, जिसे सखीभाव सम्प्रदाय भी कहा जाता है। सखी सम्प्रदाय, निम्बार्क मत की एक शाखा है जिसकी स्थापना स्वामी हरिदास (जन्म सं० १४४१ वि०) ने की थी। इसे हरिदासी सम्प्रदाय भी कहते हैं। इसमें भक्त अपने आपको श्रीकृष्ण की सखी मानकर उसकी उपासना तथा सेवा करते हैं और प्रायः स्त्रियों के भेष में रहकर उन्हीं के आचारों, व्यवहारों आदि का पालन करते हैं। सखी सम्प्रदाय के ये साधु अधिकतर ब्रजभूमि में ही निवास करते हैं। स्वामी हरिदास जी के द्वारा निकुंजोपासना के रूप में श्यामा-कुंजबिहारी की उपासना-सेवा की पद्धति विकसित हुई, यह बड़ी विलक्षण है। निकुंजोपासना में जो सखी-भाव है, वह गोपी-भाव नहीं है। निकुंज-उपासक प्रभु से अपने लिए कुछ भी नहीं चाहता, बल्कि उसके समस्त कार्य अपने आराध्य को सुख प्रदान करने हेतु होते हैं। श्री निकुंजविहारी की प्रसन्नता और संतुष्टि उसके लिए सर्वोपरि होती है। यह सम्प्रदाय "जिन भेषा मोरे ठाकुर रीझे सो ही भेष धरूंगी" के आधार पर अपना समस्त जीवन "राधा-कृष्ण सरकार" को न्यौछावर कर देती है। सखी सम्प्रदाय के साधु अपने को "सोलह सिंगार" नख से लेकर चोटी तक अलंकृत करते हैं। सखी सम्प्रदाय के साधु अपने को सखी के रूप में मानते हैं, यहाँ तक कि रजस्वला के प्रतीक के रूप में स्वयं को तीन दिवस तक अशुद्ध मानते हैं। ऐसे ही कोई भी व्यक्ति सखी नहीं बन जाता, इसके लिए भी एक विशेष प्रक्रिया है जो की आसान नहीं। इस प्रक्रिया के अंतर्गत व्यक्ति पहले साधु ही बनता है, और साधु बनने के लिए गुरु ही माला-झोरी देकर तथा तिलक लगाकर मन्त्र देता है। तथा इस साधु जीवन में जिसके भी मन में सखी भाव उपजा उसे ही गुरु साड़ी और श्रृंगार देकर सखी की दीक्षा देते हैं। निर्मोही अखाड़े से जुड़े सखी सम्प्रदाय के साधु अथवा सखियाँ कान्हा जी के सामने नाच कर तथा गाकर मोहिनी सूरत बना उन्हें रिझाते हैं। ​ सामान्यतया सभी सम्प्रदायों की पहचान पहले उनके तिलक से होती है, उसके बाद उनके वस्त्रों से। गुरु रामानंदी सम्प्रदाय के साधु अपने माथे पर लाल तिलक लगाते हैं और कृष्णानन्दी सम्प्रदाय के साधु सफेद तिलक, जो की राधा नाम की बिंदिया होती है, लगाते हैं और साथ ही तुलसी की माला भी धारण करते हैं।​ सखी सम्प्रदाय से जुडी एक और बात बहुत दिलचस्प है की इस सम्प्रदाय में कोई स्त्री नहीं, केवल पुरुष साधु ही स्त्री का रूप धारण करके कान्हा को रिझाती हैं। सखी सम्प्रदाय की भक्ति कोई मनोरंजन नहीं बल्कि इसमें प्रेम की गंभीरता झलकती है, और पुरुषों का यह निर्मल प्रेम इस सम्प्रदाय को दर्शनीय बनाता है। "जय जय श्री राधे" ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" ********************************************

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. "व्रज के भक्त-44" भक्तिमती श्रीललिताबाईजी (वृन्दावन) भक्तिमती ललिताबाई का जन्म सन् १८७४ के लगभग क्षत्रिय जाति के एक भक्त परिवार में हुआ। १० वर्ष की अवस्था में उनका विवाह कर दिया गया। १२ वर्ष की अवस्था में वे विधवा हो गयीं। भरतपुर के महात्मा चतुर्भजदासजी, जो सीताराम के उपासक थे, उनके घर आया करते थे। उनसे उन्होंने दीक्षा देने को कहा। पर उन्होंने उनमें राधाकृष्ण की भक्ति के संस्कार देख जयपुर के शुक सम्प्रदाय के श्रीस्वामी सरसमाधुरी शरणजी से उन्हें दीक्षित करवा दिया। भक्ति के संस्कार तो उनमें पहले से थे ही, वैधव्य के पश्चात् उनका मन संसारसे एकदम हटकर प्रभु के भवतापहारी, अनन्तकोटि चन्द्रमाओं के समान सुशीतल चरणारविन्द से जा लगा, वे हर समय एकान्त में उन्हीं का चिन्तन करतीं, उन्हीं का प्रेमाश्रुओं से प्रच्छालन करतीं और उन्हीं का भाव-पुष्पों से पूजन करतीं। घर के लोगों का संग भी उतना ही करतीं, जितना नितान्त आवश्यक होता। माता-पिता को लगा कि उनकी लाड़ली वैधव्यके दु:ख के कारण ऐसी हो गयी है। उन्होंने उसे उसकी बुआ के पास वृन्दावन ले जाने का विचार किया, जिससे उसका मन कुछ बदल जाय। बुआजी बहुत दिनों से वृन्दावन-वास कर रही थीं और रंगजी के मन्दिर के पीछे अपने गुरु-स्थान हरदेवजी के मन्दिर में रह रही थीं। ललिताबाई से उसकी माँ ने कहा-'तुझे तीज पर बरसाने ले चलेंगे। वहाँ श्रीजी के झूले का दर्शन करेंगे। फिर कुछ दिन बुआजी के पास वृन्दावन में रहेंगे।' ललिता यह सुनकर बहुत प्रसन्न हुई। पर तीज को अभी पूरा महीना बाकी था। वह एक-एक दिन गिनने लगी। ज्यों-ज्यों दिन बीतते गये उसकी श्रीजी के झूले के दर्शन की लालसा बढ़ती गयी। दुर्भाग्य से तीज के कुछ ही दिन पूर्व उसके छोटे भाई को म्यादी बुखार हो गया। उसकी हालत तेजी से बिगड़ने लगी। माता-पिता को बरसाने की यात्रा का विचार छोड़ देना पड़ा। तीज का दिन आ गया। उस दिन भाई की अवस्था बहुत चिन्ता-जनक थी। घर के लोग भाग-दौड़ में लगे थे। डॉक्टर और वैद्य बार-बार आ-जा रहे थे। ललिता ऊपर एक कमरे में अकेली पड़ी रो रही थी। श्रीजी के दर्शन का उसका स्वप्न बिखर जाने के कारण उसका दुःख असह्य हो रहा था। वह मना रही थी कि झूलन के समय के पूर्व ही शरीर के पिजड़़े में आबद्ध उसके प्राण-पखेरू उड़कर किसी प्रकार बरसाने पहुँच जायें। धीरे-श्रीरे सन्ध्या आ गयी। बरसाने में श्रीजी के झूले पर विराजने की घड़ी भी आ गयी। ललिता के प्राण-पखेरू पिंजड़े से निकल भागने को बुरी तरह छटपटाने लगे। छटपटाते-छटपटाते बेसुध हो गये। उसी समय उसके विषाद की कालिमा को चीरता हुआ उसके सामने कौंध गया बिजली का-सा एक दिव्य प्रकाश। उसने देखा अपने आपको बरसाने में श्रीजी के झूलन के दर्शन करते हुए। श्रीजी ने अपनी मधुर मुस्कान से उसके हृदय में एक अपूर्व आलोकन उत्पन्न करते हुए उसे निकट आने का संकेत किया। फिर हस्तकमल मस्तक पर रख कहा - 'कर लिये झूले के दर्शन ?' साथ ही अगल-बगल झूले की रस्सी पकड़े खड़ी दोनों सखियों ने प्रेमार्द्र नेत्रों से उसकी ओर देखा। बस इतने में उसकी बाह्य चेतना जाग गयी और सब कुछ अद्दश्य हो गया। नीचे भाई की दशा में भी आशातीत परिवर्तन हुआ। धीरे-धीरे वह पूर्ण स्वस्थ हो गया। श्रीजी के दर्शन देकर अद्दश्य हो जाने के पश्चात् ललिता की विरह-वेदना और तीव्र हो गयी। वह बरसाने जाकर श्रीजी की सेवा में रहने का आग्रह करने लगी। पर इतनी छोटी अवस्था में माता-पिता उसके आग्रह को कैसे स्वीकार कर लेते ? उन्होंने किसी प्रकार उसे बुआजी के पास वृन्दावन में रहकर भजन करने को राजी कर लिया। ललिताबाई १२ वर्ष की अवस्था में वृन्दावन चली गयीं और बुआजी के संरक्षण में रहकर भजन करने लगीं। बुआजी के धाम पधारने के पश्चात् प्रौढ़ावस्था में वे बरसाने गयीं। ११ वर्ष तक वहाँ अखण्ड वासकर श्रीजी की फूल-श्रृङ्गार-सेवा करती रहीं। वे दूर-दूर जाकर जहाँ-तहाँ से फूल चुनकर लातीं और श्रीजी के लिए फूलों के आभूषण तैयार करतीं। एक बार फूल चुनने में देर हो गयी। आभूषण समय से तैयार न हो सके। वे मन्दिर के बाहर बैठी श्रृङ्गार बना रही थीं, उसी समय एक सखी उनके निकट आकर बोली- 'बहुत देर हो रही है। अभी तक लाड़िली का श्रृङ्गार नहीं बना, और जो श्रृङ्गार बन पाया था उसकी डलिया उठाकर ले गयी। ललितीबाई भौंचक्की-सी उसकी रूप-माधुरी और दिव्य वेश-भूषा देखती रह गयीं। वह दो-चार कदम आगे जाकर अदृश्य हो गयी। ललिताजी भरतपुर के महात्मा चतुर्भुजदासजी से बहुत प्रभावित थीं। वे उनके प्रति गुरुभाव रखतीं पर सरसमाधुरीजी द्वारा बतायी रीति के अनुसार ही सखी-भाव से चिन्तन करतीं। जयपुर में उनके द्वारा आयोजित श्रीशुकदेवजी महाराज और शुक सम्प्रदाय के आचार्य श्रीचरणदासजी महारखज आदि के उत्सवों में सम्मिलित हुआ करतीं। ललितमाधुरी के नाम से वे पद-रचना भी करती। उनका एक बधाई का पद, जो उन्होंने श्रीसरसमाधुरीजी के जन्म-दिवस पर लिखा था, इस प्रकार है- आज बघाईको दिन नीको। प्रगटी सरस माधुरी सुख-निधि सब रसिकनको टीको। स्वयं स्वरूप श्याम श्यामाको लीनो जन्म अलीको। मङ्गल साज सजे सब आलिंगन भयो भाँवतोजीको। जगके जीव उधारन कारन मेट्यो दोस कलीको। रङ्ग महलमें बजत बधाई नृत्य होत युवतीको। 'ललितमाधुरी' तन-मन बारी भयो मनोरथ हियको। श्रीसरसमाधुरीजी के माध्यम से ही मुसलमान भक्त अजमेर के श्रीसनम साहब से उनका सम्पर्क हुआ। उनके यहाँ भी राधाष्टमी के उत्सव पर वे अकसर जाया करतीं। एक बार जब उनकी आयु लगभग ७० वर्ष की थी, वे अजमेर से कुछ भक्तों के साथ श्रीनाथद्वारे गयीं। वे और उनके साथी मन्दिर पहुँचे चार बजे के लगभग, जब मन्दिर के पट बन्द थे। सब बाहर दालान में बैठकर पट खुलने की प्रतिक्षा करने लगे। उस समय ललिताजी को आठ-दस बालकों के साथ दालान में धमा-चौकड़ी मचाते नील और गौर वर्ण के दो अति सुन्दर बालकों के दर्शन हुए और वे मूर्च्छित हो गयीं। कुछ देर बाद जब चेतना आयी मन्दिर के पट खुल चुके थे। भीतर जाकर उन्होंने श्रीनाथजी के दर्शन किये। वे दर्शन कर रही थीं उसी समय एक बालक ने पीछे से आकर उनके कन्धे पर हाथ रखते हुए कहा-'देख, मैं कितना सुन्दर हूँ !' उन्होंने गर्दन मोड़ी तो देखा कि वही नील वर्ण का सुन्दर बालक, जिसे उन्होंने थोड़ी देर पहले बालकों के साथ उछल-कूद करते देखा था, उनके पीछे खड़ा मुस्करा रहा है। वह सचमुच बहुत सुन्दर था ! उसे देख जैसे ही ललिताजी ने हाथ बढ़ाया उसे पकड़ने को, वह अन्तर्धान हो गया। ललिताजी फिर मूर्च्छित हो गयीं। राधा-कृष्ण और उनके परिकरों की इस प्रकार की लुका-छिपी লलिताजी के साथ और बहुत दिनों तक होती रही। चौरासी वर्ष की अवस्था में इसका अन्त हुआ, जब वे अपना पार्थिव शरीर वृन्दावन की रज में छोड़कर नित्य-निकुञ्ज में उनकी नित्य-सेवा में चली गयीं। ----------:::×:::---------- लेखक: बी. एल कपूर पुस्तक: व्रज के भक्त (द्वितीय खण्ड) "जय जय श्री राधे" *******************************************

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