राधा रानी की अष्ट सखियों का दर्शन श्री राधा रानी की अष्ट सखियो के बारे मे़... 1. ललिता सखी - ये सखी सबसे चतुर और पिय सखी है। राधा रानी को तरह-तरह के खेल खिलाती है। कभी-कभी नौका-विहार, वन-विहार कराती है। ये सखी ठाकुर जी को हर समय बीडा(पान) देती रहती है। ये ऊँचे गाव मे रहती है। इनकी उम 14 साल 8 महीने 27 दिन है। 2. विशाखा सखी - ये गौरांगी रंग की है। ठाकुर जी को सुदंर-सुदंर चुटकुले सुनाकर हँसाती है। ये सखी सुगन्धित दव्यो से बने चन्दन का लेप करती है। इनकी उम 14 साल 2 महीने 15 दिन है। 3.चम्पकलता सखी - ये सखी ठाकुर जी को अत्यन्त पेम करती है। ये करहला गाव मे रहती है।इनका अंग वण पुष्प-छटा की तरह है।ये ठाकुर जी की रसोई सेवा करती है। इनकी उम 14 साल 2 महीने 13 दिन है। 4. चिता सखी - ये सखी राधा रानी की अति मन भावँती सखी है। ये बरसाने मे चिकसौली गाव मे रहती है। जब ठाकुर जी 4 बजे सोकर उठते है तब यह सखी फल, शबत, मेवा लेकर खड़ी रहती है। इनकी उम 14 साल 7 महीने 14 दिन है। 5. तुगंविधा सखी - ये सखी चदंन की लकड़ी के साथ कपूर हो ऐसे महकती है।ये युगलवर के दरबार मे नृत्य ,गायन करती है।ये वीणा बजाने मे चतुर है ये गौरा माँ पार्वती का अवतार है। इनकी उम 14 साल 2 महीने 22 दिन है। 6. इन्दुलेखा सखी - ये सखी अत्यन्त सुझबुझ वाली है। ये सुनहरा गाव मे रहती है।ये किसी कि भी हस्तरेखा को देखकर बता सकती है कि उसका क्या भविष्य है। ये पेम कहानियाँ सुनाती है। इनकी उम 14 साल 2 महीने 10 दिन है। 7. रगंदेवी सखी - ये बड़ी कोमल व सुदंर है। ये राधा रानी के नैनो मे काजल लगाती है और शिंगार करती है।इनकी उम 14 साल 2 महीने 4 दिन की है। 8.सुदेवी सखी - ये सबसे छोटी सखी है। बड़ी चतुर और पिय सखी है। ये सुनहरा गाव मे रहती है। ये ठाकुर जी को पानी पिलाने की सेवा करती है।इनकी उम 14 साल 2 महीने 4 दिन की है। जय श्री राधे राधे 🙏🙏🙏

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🌷 *काकभुशुंडी जी एवं कालियानाग के पूर्व जन्म की कथा* 🌷 🌅काकभुशुंडीएक बार विदेह नरेश बहुलाश्व की राजसभा में देवर्षि नारद पहुंचे | बहुत दिनों से उनके मन में उत्कंठा थी सो उसे उन्होंने नारद जी से पूछ लिया | उन्होंने पूछा कि “देवर्षि ! भगवान के चरण रज की महिमा अपार है | भगवान के राम आदि अवतारों में उनके संस्पर्श से अहिल्यादी का तत्काल ही उद्धार हुआ | योगी जन भी उनके सानिध्य के लिए तरसते हैं, तो फिर मुझे यह बताइये कि कालिया नाग का ऐसा क्या पुण्य था जो भगवान घंटों उनके सिरों पर नृत्य करते रहे | कालिया नाग के मस्तक पर दिव्य मणियाँ सुशोभित थीं जिनके स्पर्श से भगवान के कमल सदृश्य चरणों के तलवे (रक्त से) और भी लाल हो गए होंगे, वे संपूर्ण कलाओं के आदि प्रवर्तक भगवान उनके मस्तक पर नृत्य करने लगे, ऐसा सौभाग्य उन्हें कैसे मिला” | नारद जी ने कहा “बहुत प्राचीन बात है, पहले स्वायंभुव मनु के मन्वंतर में वेदशिरा नाम के एक मुनि विंध्याचल के एक भाग में तपस्या कर रहे थे | कुछ दिनों बाद उन्हीं के बगल में तप करने की इच्छा से अश्वशिरा मुनि भी आ गए | इस पर वेदशिरा मुनि को अच्छा नहीं लगा, उन्होंने क्रोध में सांप जैसे फुंफकारते हुए अश्वशिरा मुनि से कहा “ब्राह्मण देव ! क्या सारे विश्व में आपको तपस्या के लिए कहीं और स्थान ही नहीं मिल रहा है जो आप यहाँ आ गए | आप यहां तप करें यह ठीक नहीं होगा क्योंकि इससे मेरा एकांत भंग होगा” | इस पर अश्वशिरा भी बिगड़ गए और कहने लगे “मुनिश्रेष्ठ ! यह सारी भूमि महा विष्णु भगवान नारायण माधव की है और इसीलिए इसका नाम भी माधवी है | यह कोई आपके या मेरे पूर्वजों की भूमि नहीं है | इससे पूर्व के समय में, पता नहीं कितने ऋषियों ने यहां तप किया होगा | यह सब जानते हुए भी आप व्यर्थ ही सर्प की तरह फुफकार रहे हैं यहाँ | आपको तो सांप ही होकर रहना चाहिए | जाइए आप सर्प हो जाइए और भगवान विष्णु के वाहन गरुण से आपका हमेशा भय होगा” | क्रोधावेश में वेदशिरा मुनि कांपने लगे | इसी क्रोधावेश में उन्होंने अश्वशिरा मुनि से कहा कि “तुम तो मानो इसी दुरभिप्राय से ही घुमते हुए यहाँ आए थे | छोटी-छोटी बातों पर इतना क्रोध तथा तपोनाश का यह उद्यम, तुम्हारा यह व्यवहार तो कौवे जैसा है | इसलिए इस धरा पर तुम शब्द कोलाहल करने में कौवे जैसे हो, अतः जाओ अब तुम कौवे जैसे ही हो जाओ” | उच्च चेतनात्मक स्तर की आत्माएं होकर, क्रोधावेश में अपना-अपना ही नाश करने में तत्पर उन दोनों मुनियों की बुरी स्थिति देखकर दयालु भगवान वहाँ तुरंत प्रकट हो गए | अपने सामने परमेश्वर को देखकर वे दोनों मुनि उनके चरणों में गिर गए | उन्हें अपनी भूलों का भयंकर पछतावा हो रहा था | आँखों में ग्लानि के अश्रु थे | परमेश्वर ने उन्हें समझाया और सांत्वना दी | उन्होंने वेदशिरा मुनि को अगले जन्म में कालिया नाग होकर स्वचरण लाभ का तथा अश्वशिरा मुनि को काकभुशुंडी होने का आश्वासन दिया | इसके बाद अश्वशिरा मुनि नील पर्वत पर साक्षात् योगीराज काकभुशंडि के रूप में जन्मे, जिन्होंने महात्मा गरुड़ को रामायण की कथा सुनाई थी | और वेदशिरा मुनि का उद्धार उन्होंने भगवान कृष्ण के अवतार रूप में किया था | *🌷🙏||卐|| जय श्री कृष्णा ||卐||🙏🌷* ༺꧁ Զเधॆ Զเधॆ꧂༻

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💞☘️🌿🍃सेवाकुंज💞🍃🌿☘️ श्री कृष्ण का सबसे बड़ा ‘रहस्य’ .. बहुत रहस्यमयी है ये महल, यहां रोज आते हैं कृष्ण छोड़ जाते हैं निशानियां यह स्थान वृंदावन के राधाबल्लभ मंदिर से महज कुछ मीटर की दूरी पर यमुना तट पर बसा सेवाकुंज है। माना जाता है कि यह वही वन है जहां भगवान श्री कृष्ण ने गोपियों के साथ रासलीला का आयोजन किया था। इस वन में मौजूद वृक्षों को देखकर ऐसा लगता है जैसे मनुष्य नृत्य की मुद्रा में हो। मान्यता है कि यह वृक्ष गोपियां हैं जो रात के समय मनुष्य रूप लेकर श्री कृष्ण के साथ रास का आनंद लेती हैं। इस वन की विशेषता है कि शाम ढ़लते ही सभी पशु-पक्षी वन से निकलकर भाग जाते हैं। इस वन के बीचों-बीच एक मंदिर बना हुआ है। मंदिर में हर दिन भगवान की सेज सजाई जाती है और श्रृंगार साम्रगी रख दी जाती है। मान्यता है कि श्री राधा रानी श्रृंगार सामग्री से अपना श्रृंगार करती हैं और भगवान श्री कृष्ण श्री राधा के साथ सेज पर विश्राम करते हैं। अगले दिन भक्तगण इस श्रृंगार सामग्री और सिंदूर को प्रसाद स्वरूप पाकर अपने आपको धन्य मानते हैं। वृंदावन और मथुरा का नाम आते ही दिल और दिमाग में सबसे पहले कृष्ण जी श्री राधा की सुंदर छवि आती है। मथुरा को कृष्ण की जन्म स्थली और नंदगांव को उनका लीला स्थल, बरसाने को राधा जी की नगरी कहा जाता है। वहीं वृंदावन को श्रीकृष्ण और राधा की रास स्थली कहा जाता है। वृंदावन में वैसे तो अनेक मंदिर हैं, लेकिन सबसे ज्यादा आकर्षण का केंद्र यहां ‘सेवाकुंज’ को माना जाता है। रास रचाने आते हैं रात में राधा कृष्ण ? धार्मिक नगरी वृंदावन में ‘सेवाकुंज’ एक बहुत ही रहस्यमयी स्थान है। मान्यता है कि ‘सेवाकुंज’ में भगवान श्रीकृष्ण और श्रीराधा आज भी अद्र्धरात्रि के बाद रास रचाते हैं। रास के बाद ‘सेवाकुंज’ परिसर में स्थापित निज मंदिर में शयन करते हैं। धार्मिक नगरी वृन्दावन में ‘सेवाकुंज’ एक अत्यन्त पवित्र, रहस्यमयी धार्मिक स्थान है। निज मंदिर में आज भी प्रसाद (माखन मिश्री) प्रतिदिन रखा जाता है। शयन के लिए सेज सजाया जाता है… सुबह सेज के देखने से प्रतीत होता है कि यहां निश्चित ही कोई रात्रि विश्राम करने आया तथा प्रसाद भी ग्रहण किया है। लगभग दो ढ़ाई एकड़ क्षेत्रफल में फैले सेवाकुंज के वृक्षों की खासियत यह है कि इनमें से किसी भी वृक्ष के तने सीधे नहीं मिलेंगे तथा इन वृक्षों की डालियां नीचे की ओर झुकी तथा आपस में गुंथी हुई प्रतीत हाते हैं। सेवाकुंज परिसर में ही महाप्रभु श्री हित हरिवंश जी की जीवित समाधि, निज मंदिर, राधाबल्लभ जी का प्राकट्य स्थल, राधारानी बंशी अवतार आदि दर्शनीय स्थान है। ‘सेवाकुंज’ दर्शन के दौरान वृन्दावन के पंडे-पुजारी, गाईड द्वारा ‘सेवाकुंज’ के बारे में जो जानकारी दी जाती है, उसके अनुसार ‘सेवाकुंज’ में प्रतिदिन रात्रि में होने वाली श्रीकृष्ण की रासलीला को देखने वाला अंधा, गूंगा, बहरा, पागल और उन्मादी हो जाता है ताकि वह इस रासलीला के बारे में किसी को बता ना सके। सुबह मिलती है गीली दातून इसी कारण रात्रि 8 बजे के बाद पशु-पक्षी, परिसर में दिनभर दिखाई देने वाले बन्दर, भक्त, गोस्वामी, पुजारी इत्यादि सभी यहां से चले जाते हैं और परिसर के मुख्यद्वार पर ताला लगा दिया जाता है। उनके अनुसार यहां जो भी रात को रुक जाते है वह सांसारिक बन्धन से मुक्त हो जाते हैं और जो मुक्त हो गए हैं, उनकी समाधियां परिसर में ही बनी हुई है। इसी के साथ गाईड यह भी बताते हैं कि ‘सेवाकुंज’ में जो 16108 आपस में गुंथे हुए वृक्ष आप देख रहे हैं, वही रात में श्रीकृष्ण की 16108 रानियां बनकर उनके साथ रास रचाती हैं। रास के बाद श्रीराधा और श्रीकृष्ण परिसर के ही निज महल में विश्राम करते हैं। सुबह 5:30 बजे निज महल का पट खुलने पर उनके लिए रखी दातून गीली मिलती है और सामान बिखरा हुआ मिलता है जैसे कि रात को कोई सेज पर विश्राम करके गया हो। मान्यता है कि सेवाकुंज का हर एक वृक्ष गोपी है। रात को जब यहां श्रीकृष्ण-राधा सहित रास के लिए आते हैं तो ये सारे पेड़ जीवन्त होकर गोपियां बन जाते हैं और सुबह फिर से पेड़ बन जाते हैं। इसलिए इस वन का एक भी पेड़ सीधा नहीं है। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि इस क्षेत्र में 16108 पेड़ हैं, जो कि कृष्ण की 16108 हजार रानियां हैं ☘️🌿🍃💞 *बोलो सेवाकुंज वाली की जय*💞🍃🌿☘️

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बरसाना में एक भक्त थे ब्रजदास उनके एक पुत्री थी, नाम था रतिया यही ब्रजदास का परिवार था ब्रजदास दिन मे अपना काम क़रते और शाम को श्री जी के मन्दिर मे जाते दर्शन करते और जो भी संत आये हुवे होते हैं उनके साथ सत्संग करते। यही उनका नियम था। एक बार एक संत ने ब्रजदास से कहा भइया हमें नन्दगांव जाना है, सामान ज्यादा है तो तुम हम को नन्दगाँव पहुँचा सकते हो क्या ? ब्रजदास ने हां भर ली। ब्रज दास ने अपनी बेटी से कहा मुझे एक संत को नन्दगाँव पहुचाना है। समय पर आ जाऊँगा प्रतीक्षा मत करना। ब्रजदास सुबह चार बजे राधे राधे करते नंगे पांव संत के पास गये और संत के सामान और ठाकुर जी की पेटी और बर्तन ले लिये और चलने लगे। रवाना तो समय पर हुवे लेकिन संत को स्वास् रोग था कुछ दूर चलते फिर बैठ जाते। इस प्रकार नन्दगाँव पहुँचने में ही देरी हो गई । ब्रजदास ने सामान रख कर जाने की आज्ञा मांगी। संत ने कहा जून का महीना है 11 बजे हैं जल पी लो। कुछ जलपान कर लो, फिर जाना तो ब्रजदास ने कहा बरसाने की वृषभानु नंदनी नन्दगाँव मे ब्याही हुई है अतः मै यहाँ जल नहीं पी सकता। संत की आँखो से अश्रुपात होने लगे कितने वर्ष पुरानी बात है , कितना गरीब आदमी है पर दिल कितना ऊँचा है। ब्रजदास वापिस राधे राधे करते रवाना हुवे। ऊपर से सूरज की गर्मी नीचे तपती रेत। भगवान को दया आ गयी वे भक्त ब्रजदास के पीछे पीछे चलने लगे। एक पेड़ की छाया में ब्रजदास रुके और वही मूर्छित हो कर गिर पड़े। भगवान ने मूर्छा दूर क़रने के प्रयास किये पर मूर्छा दूर नहीं हुई। भगवान ने विचार किया कि मैंने अजामिल, गीध, गजराज को तारा, द्रोपदी को संकट से बचाया पर इस भक्त के प्राण संकट मे हैं कोई उपाय नही लग रहा है। ब्रजदास राधारानी का भक्त है वे ही इस के प्राणों की रक्षा कर सकती है तो उनको ही बुलाया जाए । भगवान भरी दुपहरी में राधारानी के पास महल में गये। राधा रानी ने इस गर्मी में आने का कारण पूछा। भगवान भी पूरे मसखरे हैं। उन्होंने कहा तुम्हारे पिता जी बरसाना और नन्दगाँव की डगर में पड़े हैं तुम चलकर संभालो। राधा जी ने कहा कौन पिता जी ? भगवान ने सारी बात समझाई और चलने को कहा। यह भी कहा की तुमको ब्रजदास की बेटी की रूप में भोजन ,जल लेकर चलना है। राधा जी तैयार होकर पहुँची। पिता जी.. पिता जी.. आवाज लगाई। ब्रजदास जागे। बेटी के चरणों मे गिर पड़े आज तू न आती तो प्राण चले जाते। बेटी से कहा आज तुझे बार बार देखने का मन कर रहा है। राधा जी ने कहा माँ बाप को संतान अच्छी लगती ही है। आप भोजन लीजिये। ब्रजदास भोजन लेने लगे तो राधा जी ने कहा घर पर कुछ मेहमान आये हैं मैं उनको संभालू आप आ जाना। कुछ दूरी के बाद राधारानी अदृश्य हो गयीं । ब्रजदास ने ऐसा भोजन कभी नही पाया। शाम को घर आकर ब्रजदास बेटी के चरणों मे गिर पड़े। बेटी ने कहा आप ये क्या कर रहे हैं ? ब्रजदास ने कहा आज तुमने भोजन, जल ला कर मेरे प्राण बचा लिये। बेटी ने कहा मैं तो कहीं नहीं गयी। ब्रजदास ने कहा अच्छा बता मेहमान कहाँ हैं ? बेटी ने कहा कोई मेहमान नहीं आया। अब ब्रजदास के समझ में सारी बात आई। उसने बेटी से कहा कि आज तुम्हारे ही रूप में राधा रानी के दर्शन हुवे। भाव बिभोर हो गये ब्रजदास, मेरी किशोरी ने मेरे कारण इतनी प्रचण्ड गर्मी में कष्ट उठाया मेरी बेटी के रूप में आकर मुझे भोजन कराये जल पिलाया और मैं उन्हें पहचान ना सका ..... अब तो बस एक ही आस निरन्तर लगी रहती फिर से श्री राधा रानी के दर्शन मिलें ! जय श्री राधे राधे...........ll

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मञ्जरी भाव: . . मधुर भाव की उपासना का उल्लेख पद्म पुराण पाताल खण्ड में मिलता है. श्री निम्बकाचार्य, जयदेव चण्डीदास और विद्यापति आदि ने भी इसका उल्लेख किया है. पर मञ्जरी भाव की उपासना के वैशिष्ठय का श्रीरूप गोस्वामी ने ही प्रथम बार उज्ज्वल नीलमणि में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है. राधा की सखियाँ दो प्रकार की हैं- "सम स्नेहा" और "असम स्नेहा". जिनका राधा और कृष्ण के प्रति समान स्नेह है, वे सम स्नेहा है, जैसे ललिता-विशाखा. असम स्नेहा दो प्रकार की हैं- 1)कृष्ण स्नेहाधिका, जिनका राधा की अपेक्षा कृष्ण के प्रति स्नेह अधिक है, जैसे धनिष्ठादि और 2)राधा स्नेहाधिका, जिनका कृष्ण की अपेक्षा राधा के प्रति स्नेह अधिक है. राधा स्नेहाधिका 'मञ्जरी' कहलाती हैं. यह रूप मञ्जरी आदि. मञ्जरियों का राधा स्नेहाधिक्यमय स्थायी भाव 'भावोल्लासारति' कहलाता है. कृष्ण के प्रति उनकी रति उसका संचारी भाव है. मञ्जरियों की विशेषता है उनकी विलक्षण भावशुद्धि. सखियाँ राधा के अतिशय आग्रह से कभी-कभी श्रीकृष्ण का अंग-संग स्वीकार भी कर लेती हैं. पर मञ्जरियाँ राधाकृष्ण-सेवानन्दरस-माधुर्य आस्वादन में इतना तल्लीन रहती हैं कि वे राधाकृष्ण के अनुरोध पर भी कभी स्वप्न में भी कृष्ण-अंग-संग की बाँछा नहीं रखतीं. इस विलक्षण भाव शुद्धि के कारण मञ्जरीगण को राधा-कृष्ण की जिस गोपनीय सेवा का अधिकार और सौभाग्य प्राप्त है, वह ललितादि सखियों को नहीं है. वे उनकी केलिभूमि में असंकुचित भाव से गमना-गमनकर उनकी गोपनीय सेवा करके धन्य होती है. ललितादि सखियों का वहाँ प्रवेश भी नहीं है. इसके अतिरिक्त कृष्ण के अंग-संग का तिरस्कार करने के कारण मञ्जरियाँ रस की दृष्टि से किसी प्रकार घाटे में नहीं रहती. अपितु राधा के साथ अपने तादात्म्य के कारण वे राधा और कृष्ण के मिलनान्द का स्वत: उपभोग करती हैं, यहाँ तक कि वे रति-चिह्न, जो कृष्ण के अंग-संग के कारण राधा में होते हैं, मञ्जरियों के अंग में भी उभर आते हैं. रूप गोस्वामी के अनुसार श्रीरूप मञ्जरी आदि प्रमुखा मंजरियों के आनुगत्य में अपने अन्तश्चिन्तित सिद्ध देह से, राधाकृष्ण की सेवा करना ही गौड़ीय-वैष्णव साधकों का मुख्य भजन है- बाहर साधक देह से श्रवण-कीर्तनादि करना और अन्तर में सिद्ध देह (मंजरी-स्वरूप) की भावना कर उसके द्वारा लीला परिकर मञ्जरी के आनुगत्य में राधा कृष्ण की अष्टकालीन सेवा करना- सेवासाधकरूपे सिद्धरूपेण चात्रहि. तद्भावलिप्सुना कार्य्या व्रजलोकानुसारत:॥ इस प्रकार भावना करते-करते साधक का नित्य-सिद्ध लीला-परिकर मंजरीगण के साथ 'साधारणीकरण' हो जाता है, जिसके फलस्वरूप वह राधारानी के विप्रलम्भ और सम्भोग-रस का आस्वादन करता है. मंजरी भाव की उपासना के उक्त विवरण से यह स्पष्ट है कि यह राधा-कृष्ण की युगल-उपासना है, पर इसमें प्रधानता राधा की है. मंजरियाँ राधा की दासी हैं. वे मुख्य रूप से उन्हीं की चरण-सेवा में अनुरक्त हैं. कृष्ण के साथ उनका सम्बन्ध है राधा की सेवा के निमित्त ही. स्वतन्त्र रूप से कृष्ण की सेवा तो दूर, वे कृष्ण के प्रति भ्रुक्षेप भी नहीं करतीं. वे अपने राधा-प्रेम के कारण और राधा की अपने प्रति कृपा के कारण गर्वमयी हैं. उन्हें कृष्ण से क्या लेना? कृष्ण उनकी अपेक्षा रखते हैं, वे कृष्ण की अपेक्षा नहीं रखतीं. कृष्ण राधा के प्रेम के वशीभूत हैं, और राधा से उनके मिलन में उनकी यह किंकरियाँ सहायक हैं. इसलिये उलटा वे ही इनके आगे हाथ जोड़े रहते हैं, इनकी चाटुकारी करते रहते हैं. रूप गोस्वामी की 'चाटु पुष्पाञ्जलि' के इस श्लोक से यह कितना स्पष्ट है- "करुणां महुरर्थयेपरं तव वृन्दावन चक्रवर्त्तिनी. अपिकेशिरिपोर्यया भवेत्स चाटु प्रार्थनभाजनं॥ हे वृन्दावन चक्रवर्तिनि! 'मैं बार-बार तुम्हारी ऐसी कृपा की प्रार्थना करता हूँ, जिससे मैं तुम्हारी प्रिय सखी बनूं. तुम जब मानिनी हो तो कृष्ण तुम से मिलने के लिए मेरी चाटुकारी करें और मैं उनका हाथ पकड़कर उन्हें तुम्हारे पास ले आऊँ.' किंकरी राधा की दासी है और कृष्ण राधा के प्राण हैं इसलिए वह कृष्ण से सम्बन्ध रखती है और राधा के साथ कृष्ण की सेवा करती है. पर यदि राधा की कृपा उसे न मिले तो अकेले कृष्ण से उसे क्या काम? वह उनकी उपेक्षा करती है ! जय जय श्री राधे!

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