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"व्रज के भक्त-44" भक्तिमती श्रीललिताबाईजी (वृन्दावन) भक्तिमती ललिताबाई का जन्म सन् १८७४ के लगभग क्षत्रिय जाति के एक भक्त परिवार में हुआ। १० वर्ष की अवस्था में उनका विवाह कर दिया गया। १२ वर्ष की अवस्था में वे विधवा हो गयीं। भरतपुर के महात्मा चतुर्भजदासजी, जो सीताराम के उपासक थे, उनके घर आया करते थे। उनसे उन्होंने दीक्षा देने को कहा। पर उन्होंने उनमें राधाकृष्ण की भक्ति के संस्कार देख जयपुर के शुक सम्प्रदाय के श्रीस्वामी सरसमाधुरी शरणजी से उन्हें दीक्षित करवा दिया। भक्ति के संस्कार तो उनमें पहले से थे ही, वैधव्य के पश्चात् उनका मन संसारसे एकदम हटकर प्रभु के भवतापहारी, अनन्तकोटि चन्द्रमाओं के समान सुशीतल चरणारविन्द से जा लगा, वे हर समय एकान्त में उन्हीं का चिन्तन करतीं, उन्हीं का प्रेमाश्रुओं से प्रच्छालन करतीं और उन्हीं का भाव-पुष्पों से पूजन करतीं। घर के लोगों का संग भी उतना ही करतीं, जितना नितान्त आवश्यक होता। माता-पिता को लगा कि उनकी लाड़ली वैधव्यके दु:ख के कारण ऐसी हो गयी है। उन्होंने उसे उसकी बुआ के पास वृन्दावन ले जाने का विचार किया, जिससे उसका मन कुछ बदल जाय। बुआजी बहुत दिनों से वृन्दावन-वास कर रही थीं और रंगजी के मन्दिर के पीछे अपने गुरु-स्थान हरदेवजी के मन्दिर में रह रही थीं। ललिताबाई से उसकी माँ ने कहा-'तुझे तीज पर बरसाने ले चलेंगे। वहाँ श्रीजी के झूले का दर्शन करेंगे। फिर कुछ दिन बुआजी के पास वृन्दावन में रहेंगे।' ललिता यह सुनकर बहुत प्रसन्न हुई। पर तीज को अभी पूरा महीना बाकी था। वह एक-एक दिन गिनने लगी। ज्यों-ज्यों दिन बीतते गये उसकी श्रीजी के झूले के दर्शन की लालसा बढ़ती गयी। दुर्भाग्य से तीज के कुछ ही दिन पूर्व उसके छोटे भाई को म्यादी बुखार हो गया। उसकी हालत तेजी से बिगड़ने लगी। माता-पिता को बरसाने की यात्रा का विचार छोड़ देना पड़ा। तीज का दिन आ गया। उस दिन भाई की अवस्था बहुत चिन्ता-जनक थी। घर के लोग भाग-दौड़ में लगे थे। डॉक्टर और वैद्य बार-बार आ-जा रहे थे। ललिता ऊपर एक कमरे में अकेली पड़ी रो रही थी। श्रीजी के दर्शन का उसका स्वप्न बिखर जाने के कारण उसका दुःख असह्य हो रहा था। वह मना रही थी कि झूलन के समय के पूर्व ही शरीर के पिजड़़े में आबद्ध उसके प्राण-पखेरू उड़कर किसी प्रकार बरसाने पहुँच जायें। धीरे-श्रीरे सन्ध्या आ गयी। बरसाने में श्रीजी के झूले पर विराजने की घड़ी भी आ गयी। ललिता के प्राण-पखेरू पिंजड़े से निकल भागने को बुरी तरह छटपटाने लगे। छटपटाते-छटपटाते बेसुध हो गये। उसी समय उसके विषाद की कालिमा को चीरता हुआ उसके सामने कौंध गया बिजली का-सा एक दिव्य प्रकाश। उसने देखा अपने आपको बरसाने में श्रीजी के झूलन के दर्शन करते हुए। श्रीजी ने अपनी मधुर मुस्कान से उसके हृदय में एक अपूर्व आलोकन उत्पन्न करते हुए उसे निकट आने का संकेत किया। फिर हस्तकमल मस्तक पर रख कहा - 'कर लिये झूले के दर्शन ?' साथ ही अगल-बगल झूले की रस्सी पकड़े खड़ी दोनों सखियों ने प्रेमार्द्र नेत्रों से उसकी ओर देखा। बस इतने में उसकी बाह्य चेतना जाग गयी और सब कुछ अद्दश्य हो गया। नीचे भाई की दशा में भी आशातीत परिवर्तन हुआ। धीरे-धीरे वह पूर्ण स्वस्थ हो गया। श्रीजी के दर्शन देकर अद्दश्य हो जाने के पश्चात् ललिता की विरह-वेदना और तीव्र हो गयी। वह बरसाने जाकर श्रीजी की सेवा में रहने का आग्रह करने लगी। पर इतनी छोटी अवस्था में माता-पिता उसके आग्रह को कैसे स्वीकार कर लेते ? उन्होंने किसी प्रकार उसे बुआजी के पास वृन्दावन में रहकर भजन करने को राजी कर लिया। ललिताबाई १२ वर्ष की अवस्था में वृन्दावन चली गयीं और बुआजी के संरक्षण में रहकर भजन करने लगीं। बुआजी के धाम पधारने के पश्चात् प्रौढ़ावस्था में वे बरसाने गयीं। ११ वर्ष तक वहाँ अखण्ड वासकर श्रीजी की फूल-श्रृङ्गार-सेवा करती रहीं। वे दूर-दूर जाकर जहाँ-तहाँ से फूल चुनकर लातीं और श्रीजी के लिए फूलों के आभूषण तैयार करतीं। एक बार फूल चुनने में देर हो गयी। आभूषण समय से तैयार न हो सके। वे मन्दिर के बाहर बैठी श्रृङ्गार बना रही थीं, उसी समय एक सखी उनके निकट आकर बोली- 'बहुत देर हो रही है। अभी तक लाड़िली का श्रृङ्गार नहीं बना, और जो श्रृङ्गार बन पाया था उसकी डलिया उठाकर ले गयी। ललितीबाई भौंचक्की-सी उसकी रूप-माधुरी और दिव्य वेश-भूषा देखती रह गयीं। वह दो-चार कदम आगे जाकर अदृश्य हो गयी। ललिताजी भरतपुर के महात्मा चतुर्भुजदासजी से बहुत प्रभावित थीं। वे उनके प्रति गुरुभाव रखतीं पर सरसमाधुरीजी द्वारा बतायी रीति के अनुसार ही सखी-भाव से चिन्तन करतीं। जयपुर में उनके द्वारा आयोजित श्रीशुकदेवजी महाराज और शुक सम्प्रदाय के आचार्य श्रीचरणदासजी महारखज आदि के उत्सवों में सम्मिलित हुआ करतीं। ललितमाधुरी के नाम से वे पद-रचना भी करती। उनका एक बधाई का पद, जो उन्होंने श्रीसरसमाधुरीजी के जन्म-दिवस पर लिखा था, इस प्रकार है- आज बघाईको दिन नीको। प्रगटी सरस माधुरी सुख-निधि सब रसिकनको टीको। स्वयं स्वरूप श्याम श्यामाको लीनो जन्म अलीको। मङ्गल साज सजे सब आलिंगन भयो भाँवतोजीको। जगके जीव उधारन कारन मेट्यो दोस कलीको। रङ्ग महलमें बजत बधाई नृत्य होत युवतीको। 'ललितमाधुरी' तन-मन बारी भयो मनोरथ हियको। श्रीसरसमाधुरीजी के माध्यम से ही मुसलमान भक्त अजमेर के श्रीसनम साहब से उनका सम्पर्क हुआ। उनके यहाँ भी राधाष्टमी के उत्सव पर वे अकसर जाया करतीं। एक बार जब उनकी आयु लगभग ७० वर्ष की थी, वे अजमेर से कुछ भक्तों के साथ श्रीनाथद्वारे गयीं। वे और उनके साथी मन्दिर पहुँचे चार बजे के लगभग, जब मन्दिर के पट बन्द थे। सब बाहर दालान में बैठकर पट खुलने की प्रतिक्षा करने लगे। उस समय ललिताजी को आठ-दस बालकों के साथ दालान में धमा-चौकड़ी मचाते नील और गौर वर्ण के दो अति सुन्दर बालकों के दर्शन हुए और वे मूर्च्छित हो गयीं। कुछ देर बाद जब चेतना आयी मन्दिर के पट खुल चुके थे। भीतर जाकर उन्होंने श्रीनाथजी के दर्शन किये। वे दर्शन कर रही थीं उसी समय एक बालक ने पीछे से आकर उनके कन्धे पर हाथ रखते हुए कहा-'देख, मैं कितना सुन्दर हूँ !' उन्होंने गर्दन मोड़ी तो देखा कि वही नील वर्ण का सुन्दर बालक, जिसे उन्होंने थोड़ी देर पहले बालकों के साथ उछल-कूद करते देखा था, उनके पीछे खड़ा मुस्करा रहा है। वह सचमुच बहुत सुन्दर था ! उसे देख जैसे ही ललिताजी ने हाथ बढ़ाया उसे पकड़ने को, वह अन्तर्धान हो गया। ललिताजी फिर मूर्च्छित हो गयीं। राधा-कृष्ण और उनके परिकरों की इस प्रकार की लुका-छिपी লलिताजी के साथ और बहुत दिनों तक होती रही। चौरासी वर्ष की अवस्था में इसका अन्त हुआ, जब वे अपना पार्थिव शरीर वृन्दावन की रज में छोड़कर नित्य-निकुञ्ज में उनकी नित्य-सेवा में चली गयीं। ----------:::×:::---------- लेखक: बी. एल कपूर पुस्तक: व्रज के भक्त (द्वितीय खण्ड) "जय जय श्री राधे" *******************************************

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गुरू की बात को गिरिधारी भी नही टाल सकते* वृंदावन मे एक संत के पास कुछ शिष्य रहते थे उनमे से एक शिष्य मंद बुद्धि का था। एक बार गुरु देव ने सभी शिष्यों को अपने करीब बुलाया और सब को एक मास के लिए ब्रज मे अलग-अलग स्थान पर रहने की आज्ञा दी और उस मंद बुद्धि को बरसाने जाकर रहने को कहा। मंद बुद्धि ने बाबा से पुछा बाबा मेरे रहने खाने की व्यवस्था वहा कौन करेगा। बाबा ने हंस कर कह दिया राधा रानी, कुछ दिनों बाद एक एक करके सब बालक लौट आए पर वो मंद बुद्धि बालक नही आया। बाबा को चिंता हुई के दो मास हो गए मंद बुद्धि बालक नही आया जाकर देखना चाहिए, बाबा अपने शिष्य की सुध लेने बरसाने आ गए। बाबा ने देखा एक सुन्दर कुटिया के बाहर एक सुन्दर बालक बहुत सुन्दर भजन कर रहा है, बाबा ने सोचा क्यों ना इन्ही से पुछा जाए। बाबा जैसे ही उनके करिब गए वो उठ कर बाबा के चरणों में गिर गया और बोला आप आ गए गुरु देव! बाबा ने पुछा ये सब कैसे तु ठीक कैसे हो गया शिष्य बोला बाबा आपके ही कहने से किशोरी जी ने मेरे रहने खाने पीने की व्यवस्था की और मुझे ठीक कर भजन करना भी सिखाया। बाबा अपने शिष्य पर बरसती किशोरी जी की कृपा को देख खुब प्रसन्न हुए और मन ही मन सोचने लगे मेरे कारण मेरी किशोरी जी को कितना कष्ट हुआ। उन्होंने मेरे शब्दो का मान रखते हुए मेरे शिष्य पर अपनी सारी कृपा उडेल दी। इसलिए कहते है गुरू की बात को गिरिधारी भी नही टाल सकते। 🌹🙏🏻 *जय श्री राम* 🙏🏻🌹

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