"ठाड़े दोउ एकै खुहिया माही" पावस ऋतु के आते ही श्रीप्रिया प्रीतम परम प्रसन्न हो जाते हैं। दोपहर बाद उत्थापन-भोग आरोगने के उपरांत श्रीराधा कृष्ण सखियों के साथ विपिनराज की शोभा निरखने के लिए मोहनमहल से श्रीवन में पधारते हैं। नित्य नवीन सरस कुंज-निकुंजों में विचरण करते हुए श्रीयुगल रसपूरित श्री यमुना जी के कमनीय कूल पर पहुँचते हैं। वहां पर आप मंद मंद पवन से तरंगायीत श्री यमुना जी के जल-प्रवाह में अपने हिलते हुए प्रतिबिंब को एकटक निहार रहे हैं। प्रिया- लाल परस्पर मुखचन्द्र को चकोरवत् निरखते हुए रूपसिन्धु में निमग्न हो गये।सभी सखियाँ युगलचन्द्र की निमग्नता को निरख प्रमुदित हो रहीं हैं । उसी समय श्रीयुगल को वर्षा का सुख देने हेतु चारों ओर कारी कारी घटा घिर आईं और मंद मंद झीनी जल की बूंदे बरसने लगी। दोउ सुकुमारों को बरसा में भीगते देख श्री हितु सखी ने तुरंत एक अनुपम कारी कामरी की खोई बना कर दोनों को उड़ा दिया।श्री युगल एक खुहिया में आवेष्ठित होकर सुख-पूर्वक विराज रहे हैं। इस शोभा की उपमा देते हुए श्री हितु सखी कहती है कि जिस प्रकार श्याम पर्वत पर जल बरसता है और भीतर कंचन झलकता है,उसी प्रकार स्वर्ण-प्रभा श्री प्रिया जू का रूप खुहिया के अंदर झलक रहा है ~ ठाड़े दोउ एकै खुहिया माँहीं। बंशीबट तट जमुना जल में, निरखत चंचल झाँहीं।। कारी कमरिया अंतर दंपति,श्यामा श्याम लपटाहीं। 'श्रीभट' कृष्णकूट में कंचन,जल वरषत झलकाहीं।। (श्री युगलशतक ९०) "संतों ! सेव्य हमारे पियप्यारे,वृंदाविपिन विलासी।"

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*क्या ज़रूरी है किशोरी जु को भजना ?* *मनुष्य जन्म बड़ी मुश्किल से मिला है... ये जो गलियों में आवारा जानवर घूम रहे हैं... इन्हें भी कभी मनुष्य जन्म मिला 24 घंटे मे कम से कम एक घंटे राधा नाम का जप, कीर्तन, भजन अवश्य करें । भगवान का नाम ही बुरे कर्मो के फल को नष्ट करता ,,,, हैं...श्री राधा नाम भी हरी नाम है हरी नाम मै ही आता है वो मूर्ख ही है जो हरी नाम मै भी भेद भाव करते है कहते है राधा नाम लेने के हम लायक नही लायक कौन है ये किशोरी जु तै करेंगे क्यों की किशोरी जु का नाम अनंत है हमारे शास्त्र भी कहते है हरी अनंत हरी नाम अनंत हरी अनंत हरी कथा अनंत हरी का कोई भी नाम मानव को तार सकता है हमारी किशोरी जी का नाम अनमोल है कलयुग केवल नाम आधारा जपत जपत नर उतरे पारा अन्य कोई उपाय नही है* *पर कर्म बहुत ज्यादा हैं समय कम...* *विचार कर चिंतन करें* *और किशोरी जु का भजन, जप, कीर्तन आज से ही जरूर शुरू करें........* *अन्यथा .............* *एक बार गली मे गौर से देखो ....*

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. "झूलन लीला" श्रावण का प्रिय मास है। आकाश में काली घटाएँ छायी हुयी हैं। बिजली कड़क रही है। बादल भी जोर-जोर से गर्जना कर रहे हैं। रिमझिम फुहारों की शीतलता शरीर को आनन्दित कर रही हैं। चम्पा, चमेली, मोगरा, मालती आदि पुष्पों की सुगन्ध हवा में फैली हुयी है। कोयल कुहू कुहू की मीठी तान छेड़ रही हैं। सरोवरों में हंस अठखेलियाँ कर रहे है। दादुर, मोर, पपीहे की आवाजों से सारा ब्रज क्षेत्र आनन्दित हो रहा है। ऐसे सुखद वातावरण में ललिता सखी ने अपनी अन्य सखियों–विशाखा, चित्रा, इन्दुलेखा, सुदेवी, चम्पकलता, रंगदेवी और तुंगविद्या आदि को बुला लिया। आज के सुहावने मौसम को और भी अधिक मधुर बनाने के लिये ये सखियाँ अपने वाद्य-यन्त्र भी साथ लायी हैं। वन में जाकर जब सखियों ने देखा कि कृष्ण अकेले ही कदम्ब वृक्ष के नीचे वंशी वादन कर रहे हैं तो वे तुरन्त ही बृषभानु भवन जा पहुँची और श्रीराधाजी को वन में ले जाने के लिये कहने लगीं। सखियों ने श्रीराधाजी को कुसुंभी रंग की साड़ी पहनायी और नख से सिर तक उनका फूलों से श्रृंगार किया और चल पड़ी अपने प्रियतम स्याम सुंदर से मिलने। जैसे कोई नदी सागर में मिलने को आतुर होती है उसी प्रकार श्रीराधा अपने प्रियतम स्याम सुंदर के अंक में समा जाने को आतर हो रही थीं। रिमझिम बरसती फुहारों के बीच इन सखियों ने यमुना तट के पास के कुँज में एक दिव्य झूले का निर्माण किया। सखियों के आमन्त्रण पर श्रीराधा कृष्ण उस झूले पर विराजमान हो गये। ढोल, मृदंग आदि की थाप पर सखियाँ श्रीराधा कृष्ण को झूला झुलाने लगीं। श्रीराधा माधव की इस माधुरी लीला से सारा वन क्षेत्र जीवन्त हो उठा। कोयल कूकने लगीं, मयूर नृत्य करने लगे, हिरन कुलाँचे मारने लगे। जिसने भी इस दिव्य आनन्द का दर्शन किया उसका जीवन धन्य हो गया। हिंडोरे झूलत स्यामा-स्याम। नव नट-नागर, नवल नागरी, सुंदर सुषमा-धाम॥ सावन मास घटा घन छाई, रिमझिम बरसत मेह। दामिनी दमकत, चमकत गोरी बढ़त नित्य नव नेह॥ हँसत-हँसावत रस बरसावत सखी-सहचरी-बृंद। उमग्यौ आनँद-सिंन्धु, मगन भए दोऊ आनँद-कंद॥ "जय जय श्री राधे" *******************************************

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कृपया🙏 "श्रीमद्भगवद्गीता प्रतिदिन"🙏 पेज को 👍 फौलो👍 करें और रोज सुबह ⛅🕖 और दोपहर 🌅🕒को भगवत गीता का एक श्लोक पढ़ें । अपना दिन मंगलमय बनायें । हरि बोल। 🕉🕉🕉🕉 प्रश्नोत्तर : श्लोक संख्या १५.१३ . प्रश्न १ : भगवान् किस प्रकार अपनी शक्ति से सभी लोकों को थामे हुए हैं ? इसे किस उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया गया है ? . उत्तर १ : "भगवान् प्रत्येक अणु, प्रत्येक लोक तथा प्रत्येक जीव में प्रवेश करते हैं । इसकी विवेचना ब्रह्मसंहिता में की गई है । उसमें कहा गया है - परमेश्र्वर का एक अंश, परमात्मा, लोकों में, ब्रह्माण्ड में, जीव में, तथा अणु तक में प्रवेश करता है । अतएव उनके प्रवेश करने से प्रत्येक वस्तु ठीक से दिखती है । जब आत्मा होता है तो जीवित मनुष्य पानी मैं तैर सकता है । लेकिन जब जीवित स्पूलिंग इस देह से निकल जाता है और शरीर मृत हो जाता है तो शरीर डूब जाता है । निस्सन्देह सड़ने के बाद यह शरीर तिनके तथा अन्य वस्तुओं के समान तैरता है । लेकिन मरने के तुरन्त बाद शरीर पानी में डूब जाता है । इसी प्रकार ये सारे लोक शून्य में तैर रहे हैं और यह सब उनमें भगवान् की परम शक्ति के प्रवेश के कारण है । उनकी शक्ति प्रत्येक लोक को उसी तरह थामे रहती है, जिस प्रकार धूल को मुट्ठी । मुट्ठी में बन्द रहने पर धूल के गिरने का भय नहीं रहता, लेकिन ज्योंही धूल को वायु में फैंक दिया जाता है, वह नीचे गिर पड़ती है । इसी प्रकार ये सारे लोक, जो वायु में तैर रहे हैं, वास्तव में भगवान् के विराट रूप की मुट्ठी में बँधे हैं । उनके बल तथा शक्ति से सारी चर तथा अचर वस्तुएँ अपने-अपने स्थानों पर टिकी हैं ।" . संदर्भ : श्रीमद्भगवद्गीता १५.१३, तात्पर्य, श्रील प्रभुपाद

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