*विचार प्रवाह...* कई वर्ष पहले सुप्रीम कोर्ट का एक निर्णय पढ़ रहा था। जो अरुणा राय बनाम भारत संघ नामक वाद में दिया गया था। निर्णय अपनी जगह परंतु जो वाद दाखिल हुआ था , उसका वाद कारण बड़ा रोचक था। याचिका कर्ता , अन्य कारण के अतिरिक्त माध्यमिक शिक्षा के केन्द्रीय बोर्ड में संस्कृत को वैकल्पिक विषय बनाया जाने से पीड़ित था। याचिकाकर्ता का तर्क था कि संस्कृत थोपी जा रही हैं। यद्यपि संस्कृत वैकल्पिक विषय के रुप में शामिल किया गया था। परंतु फिर याचिकाकर्ता इसे थोपना मानता था ! माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता के तर्को को ठुकरा दिया था और माननीय न्यायाधीशों ने ध्यान दिलाया कि संस्कृत भी संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल एक भाषा है। प्राचीन भारतीय ज्ञान इसी भाषा में है। -------------------------------------------------------- दोस्तों देश में एक ऐसा वर्ग बन गया है ..जो कि संस्कृत भाषा से तो शून्य हैं ,परंतु उनकी छद्म धारणा यह बन गयी है कि ... संस्कृत भाषा में जो कुछ भी लिखा है वे सब पूजा पाठ के मंत्र ही होंगे ! वर्ना याचिका का वाद कारण ही क्यों उत्पन्न होता ? अब क्यों हैं ऐसी छद्म धारणा ? ---------------------------------------------------------- *चतुरस्रं मण्डलं चिकीर्षन्न् अक्षयार्धं मध्यात्प्राचीमभ्यापातयेत्।* *यदतिशिष्यते तस्य सह तृतीयेन मण्डलं परिलिखेत्।* बौधायन ने उक्त श्लोक को लिखा है ! परंतु इसका क्या अर्थ है ?यद्यपि उन्हें अर्थ नहीं मालूम तो भी ये कोई पूजा पाठ का मंत्र होगा । चलिये इसका अर्थ समझें ---- यदि वर्ग की भुजा 2a हो तो वृत्त की त्रिज्या r = [a+1/3(√2a – a)] = [1+1/3(√2 – 1)] a ये क्या है ?‌ अरे ये तो कोई गणित या विज्ञान का सूत्र लगता हैं ? भारतीय कहीं ऐसा कर सकते हैं ? ---------------------------------------------------------- शायद ईसा के जन्मसे पूर्व पिंगल के छंद शास्त्र में एक श्लोक प्रकट हुआ था। हालायुध ने अपने ग्रंथ मृतसंजीवनी मे ,जो पिंगल के छन्द शास्त्र पर भाष्य है , इस श्लोक का उल्लेख किया है .. *परे पूर्णमिति। उपरिष्टादेकं चतुरस्रकोष्ठं लिखित्वा तस्याधस्तात् उभयतोर्धनिष्क्रान्तं कोष्ठद्वयं लिखेत्।* *तस्याप्यधस्तात् त्रयं तस्याप्यधस्तात् चतुष्टयं यावदभिमतं स्थानमिति मेरुप्रस्तारः।* *तस्य प्रथमे कोष्ठे एकसंख्यां व्यवस्थाप्य लक्षणमिदं प्रवर्तयेत्।* *तत्र परे कोष्ठे यत् वृत्तसंख्याजातं तत् पूर्वकोष्ठयोः पूर्णं निवेशयेत्।* शायद ही किसी आधुनिक शिक्षा में maths मे B. Sc. किया हुआ भारतीय छात्र इसका नाम भी सुना हो ? ये *मेरु प्रस्तार* है ! परंतु जब ये पाश्चात्य जगत से *पाश्कल त्रिभुज* के नाम से भारत आया तो उन कथित सेकुलर भारतीय को शर्म इस बात पर आने लगी कि..भारत में ऐसे सिद्धांत क्यों नहीं दिये जाते ? --------------------------------------------------------- *चतुराधिकं शतमष्टगुणं द्वाषष्टिस्तथा सहस्राणाम्।* *अयुतद्वयस्य विष्कम्भस्यासन्नो वृत्तपरिणाहः॥* ये भी कोई पूजा का मंत्र ही लगता हैं न ? नहीं भाई ये किसी गोले के व्यास व परिध का अनुपात है ! जब पाश्चात्य जगत से ये आया तो ..संक्षिप्त रुप लेकर आया ऐसा π जिसे 22/7 के रुप में डिकोड किया जाता हैं। हाँलाकि उक्त श्लोक को डिकोड करेंगे अंकों में तो ..कुछ यू होगा .. (१०० + ४)*८+ ६२०००/२००००=३.१४१६ ---------------------------------------------------------- ये तो कुछ नमूना हैं -- जो ये दर्शाने के लिये दिया गया है‌ कि संस्कृत ग्रंथो में केवल पूजा पाठ या आरती के मंत्र नहीं है .. श्लोक लौकिक सिद्धांतों के भी हैं ..और वो भी एक पूर्ण वैज्ञानिक भाषा व लिपि में जिसे एक बार मानव सीख गया तो बार बार वर्तनी याद करने या रटने के झंझट से मुक्त हो जाता हैं ! दुर्भाग्य से अंग्रजोे की ग़ुलामी में संस्कृत का ह्रास होने के कारण हमारे पूर्वजों के ज्ञान का विस्तार नहीं हो पाया और बहुत से ग्रंथ आक्रांताओं द्वारा नष्ट भ्रष्ट कर दिए गए।और स्वतंत्रता के बाद हमारी सरकारों ने तो ऐसे वातावरण बना दिए कि संस्कृत का कोई श्लोक पूजा का मन्त्र ही लगता है। विचार अवश्य कीजियेगा।।

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