आज का भगवद चिंतन।{837}भगवद गीता के बारहवे अध्याय के श्लोक 4 में भगवान श्री कृष्ण ने कहा जो लोग अपने मन को मेरे साकार रूप में एकाग्र करते हैं और अत्यन्त श्रद्धा पूर्वक मेरी पूजा अर्चना करने में सदैव लगे रहते हैं वे मेरे द्वारा परम् सिद्ध माने जाते हैं।अनेक जन्मों के बाद जब मनुष्य मेरी शरण मे आता है तो वह मुझे ही प्राप्त होता है।आत्मा के भीतर परमात्मा यानी भगवान श्री कृष्ण का दर्शन करने के लिए मनुष्य को देखना,सुनना, स्वाद लेना,कोई कार्य करना आदि इंद्रियों को सम रखकर मुझ में ही लीन होना होता है।तभी मनुष्य जान पाता है कि परमात्मा प्रत्येक वस्तु के कण कण में विराजित है।ऐसी अनुभूति होने पर मनुष्य किसी अन्य जीव से ईर्ष्या नही करता।उसे प्रत्येक जीव,प्रत्येक मनुष्य और परमात्मा में कोई अंतर नही दिखता।क्योंकि वह केवल आत्मा का दर्शन करता है, बाह्य आवरण का नही।मनुष्य की यह अवस्था निसन्देह भगवान श्री कृष्ण की किरपा से प्राप्त होती है।लेकिन सामान्य व्यक्ति के लिए निराकार अनुभूति बड़ी कठिन होती।हमे अपने मन से हर सम्भव प्रयास करके श्री कृष्ण या उनसे संबंधित कार्यो में अधिक से अधिक लीन रहना होगा।तभी हम भगवान श्री कृष्ण के भक्तिमार्ग पर हम एक कदम आगे बढ़ सकेंगे।

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🙏🏼बलदेव एक गांव में बहुत बड़ा जमींदार था ।वह चार भाई थे ।चारों भाईयों के पास अपने अपने खेत थे । गांव में उनकी काफी धाक थी। बलदेव के बाकी भाइयों की शादी हो चुकी थी। केवल बलदेव की शादी होनी बाकी थी ।1 दिन बलदेव मंदिर गया तो वहां के पुजारी की बेटी उसको पसंद आ गई ।लेकिन पुजारी बहुत गरीब था उसकी बेटी बहुत ही संस्कारी और सुंदर थी बलदेव ने पुजारी जी से उसका हाथ मांगा तो पुजारी जी ने जमीदार होने के कारण और एक अच्छा लड़का होने के कारण झट से हां कर दी ।अब पुजारी की बेटी की शादी बलदेव से हो चुकी थी। बलदेव अपनी पत्नि के साथ बहुत खुश था। उसके सारे भाई खेतों में काम करते और बलदेव खेतों में से उगे हुए अनाज को ट्रक में भरकर दूसरे शहरों में जो व्यापारी लगे हुए थे उनको बेचने जाता। बलदेव जब भी ट्रक लेकर जाता तो रास्ते में एक ढाबे पर रोटी खाता। वहां पर एक दिन उसको एक बूढ़ी औरत नजर आई जो कि काफी भूख से लाचार नजर आ रही थी। वह इधर-उधर देख रही थी कि शायद उसको भी कोई खाना खिला दे। लेकिन लोग आते खाना खाकर चले जाते ।कोई उसकी तरफ ध्यान ना देता। लेकिन बलदेव यह सब कुछ देख रहा था उसने दया वश जाकर उस बूढ़ी औरत को पूछा माताजी क्या आपको भूख लगी है तो उस बूढ़ी औरत ने हां में गर्दन हिला दी तो बलदेव को उस पर दया आई और उसने उसको अपने पास बिठाकर खाना खिलाया ।तो वह बूढ़ी औरत खाना खाकर तृप्त हो गई और बलदेव को आशीर्वाद देने लगी तो बलदेव ने कहा कि माताजी मेरी नई नई शादी हुई है मुझे बेटे का बहुत शौक है आप मुझे सिर्फ यह आशीर्वाद दो कि मेरे घर एक बहुत ही सुंदर और स्वस्थ बेटा पैदा हो ।तो बूढ़ी माई उसको बोली की जो लाडली जू की इच्छा। बलदेव ने कहा यह कौन है तो बूढ़ी माई बोली यह हमारी राधा रानी है ।तो बलदेव वहां से अब ट्रक लेकर शहर में अनाज बेचने चला गया बलदेव को बेटे का बहुत शौक था वह अपनी पत्नी को कहता कि जब भी हमारे घर पहला बच्चा हो तो वह बेटा ही हो तो उसकी पत्नी आगे से बड़ी विनम्रता से कहती यह तो भगवान जी के हाथ में है तो बलदेव को बहुत गुस्सा आता और उसको डांट कर कहता कि नहीं मुझे तो बेटा ही चाहिए और उसकी मां को भी बेटे का बहुत शौक था वह भी चाहती थी कि बलदेव के घर पहला लड़का हो। एक दिन ऐसे ही उसने फिर अपनी पत्नि को बोला कि हमारे घर बेटा ही होना चाहिए तो उसकी पत्नी रज्जो ने कहा यह तो हमारे हाथ में नहीं है तो बलदेव ने गुस्से में आकर उसको कहा अगर हमारे लड़की पैदा हुई तो तुम जाकर फिर अपने पिताजी के पास मंदिर में ही बैठ जाना हमारे घर में तेरे लिए कोई जगह नहीं है ।तो रज्जो एकदम से सहम गई और ठाकुर जी प्रार्थना करने लगी। अगले दिन बलदेव फिर ट्रक मे अनाज भरकर शहर की तरफ गया ।रास्ते में फिर उसने देखा कि ढाबे पर फिर वही बूढ़ी माई बैठी हुई है तो उसने बिना पूछे ही बूढ़ी माई के लिए भी खाना मंगवा दिया ।तो बूढी माई खुशी खुशी खाना खाकर उसको आशीर्वाद देने लगी ।और उसको कहने लगी बेटा क्या तुम मेरा एक काम करोगे ।मुझे तुम भले मानस लगते हो। तो बलदेव ने कहा हां माताजी बताओ क्या करना है ।तो बूढ़ी मां ने कहा कि आज हमारी लाडली सरकार किशोरी जू का जन्म उत्सव है क्या तुम मुझे बरसाना धाम अपने ट्रक में छोड़ दोगे। तो बलदेव जो कि आगरा तक जा ही रहा था तो उसने कहा कि बरसाना धाम कहां है वहां कौन सी किशोरी जी रहती है ।तो बूढ़ी माई ने कहा कि वह आगरा से थोड़ी ही दूर है तो मुझे छोड़ देना बाकी मैं खुद चली जाऊंगी ।तो बलदेव ने कहा कि बूढ़ी माई कह रही है तो मैं छोड़ दूंगा ।तो वह बूढ़ी माई को ट्रक में बिठाकर बरसाना धाम ले गया। तो जब वह बरसाना धाम पहुंचा तो बूढ़ी मां ने कहा बेटा अब बहुत रात हो चुकी है तुम कल सुबह चले जाना ।आज रात यहीं रूक जाओ। बरसाना रंग बिरंगी लाइटों से सजा हुआ था पूरे शहर में बहुत रौनक थी।पूरा शहर में ढोलक बज रहे थे जगह-जगह सखियां नाच रही थी ना जाने यहां कौन सा उत्सव चल रहा है बलदेव यही मन में सोच रहा था। तभी रात के 12:00 बज गए और वहां पर बूढ़ी माई जो कि सीढ़ियों में बैठी हुई थी ।बलदेव को बोली बेटा इतनी दूर से आए हो तो चलो आओ मैं तुम्हें किशोरी जी के दर्शन कराती हूं। बलदेव आना कानी करने लगा । लेकिन बूढ़ी माई उसका हाथ पकड़ कर ऊपर मंदिर में ले गई ।बलदेव जब मंदिर में पहुंचा तो वहां पर मंदिर में बहुत ही चहल-पहल थी। वहां पर हर आने जाने वाला राधे-राधे का ही जाप कर रहा था जोर जोर से राधे-राधे की धुन से पूरा मंदिर झुम रहा था। 12 बजते ही ढोल नगाड़े बजने लगे आतिशबाजी चलने लगी ।बलदेव हैरान था कि यह हो क्या रहा है। आज किसका जन्मदिन है यह कौन सी देवी है ।तभी बूढ़ी माई ने उसका हाथ पकड़कर कहा बेटा वह देखो सामने लाडली जू सरकार आज इनका जन्मदिन है।बलदेव ने देखा कि एक छोटी सी कन्या जोकि झूले में झूल रही है।(किसी रसिक ने अपनी छोटी सी बेटी को लाडली रूप में झूले में लिटाया हुआ था ।)तो वह हैरान हो गया। यह लोग कन्या के पैदा होने से इतनी खुशी मना रहे हैं इतने ढोल नगाड़े आतिशबाजी दीप जला रहे हैं। क्या कोई लड़की के जन्मदिवस पर भी इतनी खुशी मनाता है तो वह हक्का बक्का सा रह गया। तभी वो जब मंदिर के थोड़ा आगे गया तो पुजारी जी ने उसको अपने पास बुलाया और एक छोटी सी पोशाक दी और कहा कि बेटा जब तेरे घर कोई कन्या जन्म ले तो उसको यह पहना देना। पोशाक को हाथ में पकड़ते ही जैसे बलदेव के सारे शरीर में कंपन सी होने लगी उसके होंठ फड़फड़ाने लगे ।वह एकदम से पत्थर सा जडवत हो गया। वह कभी गोसाई जी की तरफ देखता तो कभी अपने हाथ में पकड़ी छोटी सी पोशाक को देखता। तभी उसको गुस्सा तो बहुत आया कि पुजारी जी ने यह क्यों कहा कि अगर तुम्हारे घर कन्या ने जन्म लिया तो यह डालना। उसका मन करा यह पोशाक यहीं पर रख जाए लेकिन उसको पोशाक को रखने की उसकी हिम्मत ना हुई। तो बलदेव भारी कदमों से चलता हुआ उस पोशाक को लेकर वहां से चल पड़ा ।उसकी पत्नी को भी बच्चा होने वाला था ।जब बलदेव ट्रक पर बैठकर वापस आ रहा था तो उसको ऐसा लगा जैसे उसके ट्रक के साथ साथ कोई चल रहा है ।उसको कई बार इस बात का भ्रम हुआ लेकिन देखने पर उसको कोई नजर नहीं आ रहा था। वह बार-बार पीछे मुड़कर देखता लेकिन उसको कोई नजर ना आता ।जब वह घर पहुंचा तो घर में उसकी पत्नी ना थी उसकी मां ने बताया उसकी पत्नी को अस्पताल में ले गए हैं उसके घर बच्चा पैदा होने वाला है ।वह भारी मन से अस्पताल में गया तभी वहां पर बच्चे की किलकारी की आवाज आई तो डॉक्टर ने बताया कि उसके यहां कन्या ने जन्म लिया है ।बलदेव पहले तो हैरान हो गया और उसको गुस्सा भी आया कि उसके घर कन्या ने जन्म लिया है लेकिन ना जाने अचानक से उसके मन में कैसा बदलाव आया कि वह भागा भागा अंदर गया और उसने अपनी बेटी को अपनी गोद में उठाया बच्ची को गोद में उठाते ही ना जाने उसके शरीर में कैसे कंपन पैदा हुई ।बच्ची को देखते ही उसको बरसाने धाम की लाडली याद आ गई जैसे उसके हाथ में लाडली जू ही हो ।अपनी बेटी को गोद में लेते ही उसकी आंखों में अपने आप ही आंसू बहने लगे। उसकी मां जो कि अभी अभी कमरे में आई थी यह सब देख रही थी वह देख कर हैरान हो गई उसकी पत्नी भी एकदम से हैरान हो गई वह डर भी रही थी कि कन्या के जन्म लेते ही उसकी सास और उसका पति उसे निकाल लेंगे। लेकिन आज उसके पति को क्या हो गया वह रो क्यों रहा है उसने अपनी बेटी को अपनी पत्नी को पकड़ाया और भागा भागा घर गया और उसने अलमारी से वही पोशाक निकाली जो बरसाना के गुसाई जी ने उसको दी थी। और वह फिर वापस आया और उसने अपनी बेटी को वही पोशाक पहना दी और जोर-जोर से किशोरी जू के जैकारे लगाने लगा। उसको ना जाने क्या हो गया था और वह गोल गोल घूम कर जोर जोर से राधा राधा करने लगा उसकी मां और उसकी पत्नी यह देखकर हैरान थी कि इस बलदेव को क्या हो गया है ।जिस बेटी को देख कर उसको गुस्सा करना चाहिए था आज इस बेटी को लेकर वह झूम रहा है। तो उसने अपनी पत्नी को बताया कि मेरे घर लाडो आई है मेरे घर मेरी राधा रानी आई है। उस पोशाक को धारण करके वह लड़की बिल्कुल ही लाडली जैसी प्यारी और सुंदर लग रही थी। उसकी पत्नी खुश हो गई कि बलदेव ने बेटी को स्वीकार कर लिया है ।उधर बरसाने मे उस किशोरी जी का जन्म उत्सव बड़ी धूमधाम से मना रहे थे। उस दिन बलदेव ने पूरे गांव में दीपमाला करवाई ढोल नगाड़े बजाए मिठाइयां बनवाई मेरे घर में कन्या के रूप में मेरी लाडली सरकार आई है। गांव वाले सभी हैरान थे कि बेटी के जन्म पर इतना खुश क्यों है। उसके भाई यह देखकर गुस्सा थे कि बेटी के जन्म पर बलदेव बांवरा हो गया है तो उसके भाइयों ने उस से नाता तोड़ लिया। उन्होंने कहा कि हम तुम से तब नाता रखेगे कि तुम अपनी बेटी और पत्नी को घर से निकाल दो । लेकिन बलदेव अपनी बात से टस से मस ना हुआ।भाईयों ने उससे नाता तोड़ लिया मां भी दूसरे भाइयों के साथ जाकर रहने लगी। जमीन जायदाद का बंटवारा हो गया ।बलदेव के पास एक खेत हिस्से में आया । अब लाडो धीरे-धीरे बड़ी होने लगी उसने अपनी बेटी का नाम लाडो रखा था ।और बेटी जब खेतों में जहां जहां जाती वहां पर फसलें अपने आप लहराने लगती अगर वह अपनी बेटी को दुकान पर लेकर जाता तो उसका गल्ला अपने आप पैसों से भर जाता।बलदेव यह देखकर बहुत हैरान होता लेकिन उसको पता था यह सब कुछ किशोरी जू की ही कृपा है ।और उसके भाइयों के जो खेत थे उस पर कभी भी फसलें न लहराती कभी कभी तो उसमें कीड़े पड़ जाते । उस दिन बलदेव की बेटी लाडो का जन्मदिन था और उसी दिन बरसाने में लाडली जू सरकार का भी जन्म उत्सव था। बलदेव अपनी बेटी और पत्नी को लेकर बरसाने धाम को गया और वहां जाकर उसने देखा कि वही बूढ़ी माई मंदिर में बैठी हुई है और बलदेव और बलदेव की बेटी को देखकर खुशी से भागी भागी उनके पास आई और बलदेव की बेटी को गले लगाकर बोली, अरे लाडो मैं तो कब से तुम्हारी बाट जोह रही थी अब आई हो तुम जाकर ।और उसको प्यार से सहलाने लगी। बल यह देखकर हैरान हो गया माताजी ने तो मेरी लाडली को तो पहली बार देखा है इसने लाडली को कैसे पहचाना । बलदेव ने माताजी को कहा कि आज मेरी लाडो का भी जन्मदिन है । तो उसने बहुत सुंदर सी पायल बलदेव की बेटी को पहनने के लिए उपहार के रूप में दी। थोड़ी देर बाद बलदेव ने देखा कि उस की बेटी का ध्यान न जाने कहां था जब उसने गौर से देखा तो उसकी बेटी बूढ़ी माई को देखकर मुस्कुरा रही थी ।उसने भी जब बूढ़ी माई को देखा तो वह बूढ़ी माई मंदिर के गर्भ गृह में गई और किशोरी जी की प्रतिमा में के पास जाकर आलोप हो गई तो ।बलदेव एकदम से सुन्न हो गया की बूढ़ी माई कौन थी यह किस रूप में मुझको मिलने आती थी क्या यह किशोरी जू थी। अब तो उसके अश्रु थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे कि मैं कहां पर एक तुच्छ सा जमीदार और कैसे एक पंडित की बेटी से शादी करने से मुझ पर लाडली जु की इतनी कृपा हो गई। कि मैं तो किशोरी जू के बारे में कुछ भी जानता नहीं था आज किशोरी जी की कृपा से मुझे उनका ही प्रतिरूप अपनी बेटी के रूप में प्राप्त हुआ है।वह धन्यवाद करता हुआ पत्नी और बेटी के साथ वापस अपने गांव आ गया। बरसाना धाम में जो लाडली जू के नाम की खूब धूम मची थी। जगह-जगह सखियां नाच रही थी बधाई गान हो रहा था और इधर जब वह अपने घर पहुंचा तो उसके सभी भाई और माता उसके घर में पहले से ही मौजूद थे और एक बहुत बड़ा उत्सव उन्होंने बलदेव की बेटी लाडो के लिए भी रखा हुआ था। उनको अपनी गलती का एहसास हो चुका था ।उधर बरसाने में उस लाडो की धूम मची थी और यहां पर गांव में इस लाडो की धूम मची हुई थी ।सब और बधाई गान हो रहा था ।सब लोग एक दूसरे को लाडो के जन्म की बधाई दे रहे थे। लाडली जू सरकार भी एक कन्या है जो कि तीनों लोकों की स्वामिनी है उसकी जय जय कार तो तीनों लोक करते हैं इसलिए हमें कभी भी किसी कन्या को तुच्छ नहीं समझना चाहिए ।हमेशा उसको लाडली जू राधा रानी के रूप में स्वीकार करना चाहिए। लाडली जू के जन्म उत्सव की आप सब को लाख-लाख बधाई हो । ।🥳🙌🏻🙌🏻🙌🏻🙌🏻🥳🥳🥳🙌🏻🥳🥳🥳🥳🥳🥁🥁🥁 बोलो लाडली जू सरकार की जय हो। गौर दासी सुरभि के शब्दों से 🙇🏻‍♀🙏🏼🌹🌹

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🌿💐🌹🌷🙏🏻🌷🌹💐🌿 परम श्रद्धेय निरंतर वंदनीय संतप्रवर पूज्य पं• श्री गयाप्रसाद जी महाराज के अनमोल वचन- (१) नित्य नियमित भजन करिवे की साधक के जीवन में बहुत ही आवश्यकता है। नित्य नियमित भजन होयवे सो चित्त मे अत्यन्त शांति एवम् प्रसन्नता होंय है । नियम निष्ठापूर्वक भजन होतौ रहै तौ कछु काल में भजन में रूचि स्वतः ही उत्पन्न होयवे लगै है । तथा यदि रुचिपूर्वक नियम सो दीघकाल भजन कियौ जाय तौ -भजन भगवान साधक कूँ पकर लेय है।नियमितता ही भगवान् कौ स्वरूप है । (२) नित्य रात्रि में शयन सो पूर्व यह विचार लेय कि आज भजन में कैसी रूचि रही साथ ही यह प्रतिज्ञा करै कि अगले दिन आज सो हू आधिक भजन में उत्साह रहैगौ । (३)नित्य कौ नियम नित्य ही पूरौ करले , भजन में कबहुँ आलस्य, प्रमाद तथा उपेक्षा न होन पावै । (४) पुण्यन के फलस्वरूप भजन में रूचि बढै है एवम् रस की( उत्तपति) होयवे लगै है । सबसों उत्तम पुण्य है -सब कूँ सुख पहुँचायवे की भावना तथा भजन करवै वारेन की सब प्रकार सों सहायता । (५) भजन में आनन्द मिलै या के ताई उपाय है -अधिक सो अधिक एकान्त में बैठके सब प्रपञ्च से बचके नियम सों भजन करनौ । (६) आयु के साथ -साथ अन्य कार्यन कूँ धीरे-धीरे कम करतौ जाय ,भजन बढ़ातौ जाय । वृद्धावस्था में एकमात्र भजन में ही लग जाय। (७) श्रीभगवत् सेवा के भाव सो एव भगवत् प्रियत जो भी कियौ जाय है वाही कूँ भगवद् भजन कहै हैं ।

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. "सन्त चरित्र" "दण्डी स्वामी श्रीकेवलाश्रमजी महाराज" दण्डी स्वामी श्रीकेवलाश्रमजी का जन्म एक अति निर्धन ब्राह्मण-परिवार में कुरुक्षेत्र भूमि के अन्तर्गत जिला जीन्द में रामहृद (रामराय) में हुआ था। वे बाल ब्रह्मचारी और बहुत कम पढ़े-लिखे थे, परंतु संतों के मुख से सुने शास्त्रों पर विश्वास करते थे। ब्रह्मचारी जीवन उन्होंने अपने जन्म-स्थान रामराय में ही माता कृष्णा देवी के आश्रम में बिताया। माताजी के देह त्याग देने के बाद उनको कृष्णाधाम आश्रम रामराय जिला जीन्द हरियाणा की गद्दी पर बिठा दिया गया, परंतु मात्र एक माह के बाद ही वे रात को आश्रम को छोड़ ऋषिकेश में आकर संन्यास लेकर मौन धारण करके रहने लगे। आश्रम के लोग ढूँढ़ते रहे। हरिद्वार में भी उनका कृष्णाधाम आश्रम 'खड़खड़ी' के नाम से प्रसिद्ध है। वहाँ पर उन्होंने देवीस्वरूप शास्त्रीजी को प्रबन्धक बनाया था। शास्त्रीजी ने उनको ढूँढ़ लिया तथा उनसे आग्रह किया, जैसे आप ऋषिकेश में रह रहे हैं, वैसे ही आप अपने आश्रम में रहिये। इसपर वे हरिद्वार आ गये। दुर्भाग्य से देवीस्वरूप शास्त्रीजी का निधन हो गया। शास्त्रीजी के निधन के बाद आश्रम को स्वामी केवलाश्रमजी महाराज को सँभालना पड़ा। वे नित्य-प्रति गंगा-स्नान करते थे। आश्रम के अधिष्ठाता होते हुए भी भिक्षा करके भोजन करते थे। उत्तरी हरिद्वार में उस समय पशु-अस्पताल नहीं था। जिस किसी आश्रम की गाय बीमार हो जाती, वे लोग स्वामीजी को बुलाकर ले जाते। वे गाय के स्वस्थ होने की दवाई एवं टोटके जानते थे। कोई भी व्यक्ति बीमार गाय के उपचार के लिये उन्हें बुलाने आता तो वे भजन छोड़कर तुरन्त उसके साथ चले जाते। एक दिन मैंने कहा, भजन करने के बाद चले जाना। उन्होंने कहा गोसेवा भी भजन ही है। वे आश्रम की गाय स्वयं चराने जाते थे। एक दिन उनको साँप ने काट लिया। आकर कहने लगे साँप ने मुँह लगा दिया। साँप का दोष नहीं था। मेरा ध्यान गाय की तरफ था। मेरा पैर साँप पर पड़ गया। हमने कहा, अस्पताल चलो। जहाँ सर्प ने काटा था, वहाँ नीला एवं बहुत बड़ा निशान पड़ गया था। कहा-ठीक हो जायगा। चिन्ता ना करो, बहुत आग्रह करने पर भी अस्पताल नहीं गये। कहने लगे, 'अभी मेरी मृत्यु नहीं है। तुम चिन्ता न करो'। कभी भी हमने उनको क्रोध आदि करते हुए नहीं देखा। गंगा-स्नान, गो-सेवा, भजन उनके नित्य के कार्य थे। आश्रम में अनेक दण्डी स्वामी महात्मा रहते थे। उनमें बहुत-से अतिवृद्ध महात्मा भी थे। वे उनकी नित्य-प्रति स्वयं सेवा करते थे। बीमार होने पर सभी महात्माओं की स्वयं सेवा करते थे। वर्ष १९८७ में श्रीस्वामीजी हरियाणा गये थे। वहाँ एक पागल कुत्ते ने काट लिया। उनको अस्पताल लेकर में गये, वहाँ पर संयोग से कुत्ते के काटने के उपचार सम्बन्धी इंजेक्शन नहीं मिले। दुबारा बहुत प्रयास किया गया, पर वे अस्पताल नहीं गये। कहा-यदि प्रभु चाहते तो मैं अस्पताल गया था। इंजेक्शन मिल जाता, उनकी अब यही इच्छा है। वे जीवन में बीमार पड़ते तो कभी दवाई नहीं लेते। अपने-आप ही काढ़ा आदि बनाकर पी लेते थे। दवाई कभी नहीं ली। महीनों के बाद मैं हरियाणा से आया था। जैसे मेरी आवाज सुनी, कमरे से बाहर आकर कहने लगे-भाई, आज जितनी दवाई देनी है, दे दे। जिस डॉक्टर को दिखाना हो दिखा ले। नहीं तो कहेगा कि स्वामीजी को दवाई दिला देते तो बच जाते। अब तू अपने मन की कर ले। उस समय आश्रम में गाड़ी नहीं थी। हम टैम्पो करके उनको जी०डी० अस्पताल में ले गये। डॉक्टर ने देखते ही कह दिया पागल कुत्ते के काटने से होने वाली बीमारी हो गयी है। अब ये बच नहीं सकते। हम वापस आश्रम में ले आये और सबसे पीछे के कमरे में लिटा दिया। सभी आश्रम वाले पता लगते ही आ गये। उनके प्रति सभी लोग श्रद्धा रखते थे। तीन-चार आश्रमवालों ने अपने स्तर से तीन-चार डॉक्टर, जो उस समय बहुत प्रसिद्ध थे, बुला लिये। सभी डॉक्टरों ने एक मत से कहा ये ७२ घण्टे तड़पेगे, दीवारों पर सिर पारेंगे, काटने दौड़ेंगे, जिसको भी इनके नाखून लार या दाँत लगा जायगा, वे भी ऐसे ही मरेंगे। अतः तुरन्त इनको जी०डी० अस्पतालय दाखिल कराओ। जब डॉक्टर लोग इस प्रकार की बात कर रहे थे, तो श्रीस्वामी जी ने एक छात्र को भेजकर मुझे बुलवाया तथा कहा- भाई, इन डॉक्टरों की बातों में नहीं आना, मेरे कारण आश्रय में कोई हानि नहीं होगी। मुझे सायं ०५ बजे तक जीना है। अगर तेरा दिल मानता है तो मुझको आश्रय में ही मरने दें, नहीं तो मेरे को गंगाजी के किनारे डाल दो। अस्पताल नहीं भेजना। वे मात्र 'ओम् ओम् ' बोल रहे थे। जब उनको बहुत अधिक कष्ट होता था तो 'ओम् ओम्' करके दीवार की तरफ मुख कर लेते, फिर दर्द कम होते ही 'ओम-ओम' करके मुँह इधर कर लेते। डॉक्टरों ने कहा था कि पानी देखते ही बेहोश हो जायेंगे, परंतु उन्होंने एक कमण्डलु गंगाजल पीया उसी दिन परम पूज्य शंकराचार्य दण्डी स्वामी माधवाश्रमजी महाराज हरिद्वार में भागवत की कथा कर रहे थे। वे भी इनके अन्तिम दर्शनों के लिये आये और उन्होंने कथा में कह दिया ओ समाज के लोगों! अगर तुम्हें भजन का प्रभाव देखना है तो कृष्णाधाम आश्रम खड़खड़ी हरिद्वार में चले जाओ। अगर ये बीमारी तुम किसी को भी होती तो तड़पते, रोते, बिलखते, परंतु एक सन्त इस बीमारी से संघर्ष कर रहे हैं। सिवाय 'ओम्' के एक शब्द नहीं बोल रहे। शंकराचार्यजी के इतना कहने के बाद कृष्णाधाम में मेला लग गया। हजारों लोग आते उनके दर्शन करके चले जाते, उनका कमरा अन्तिम समय तक खुला रहा। दो महात्मा उनकी सेवा के लिये उनके पास रहे, जो लोग आ रहे थे। उनके पैर छूकर जाते, उनसे किसी को भय नहीं लगा और ना ही वे 'ओम् ओम् के सिवाय कुछ बोले और उन्होंने आने-जाने वालो का ध्यान भी नहीं किया। उस समय मेरठ से पं० फूलचन्दजी आये हुए थे। उनको बुलाकर कहने लगे पण्डितजी मुहूर्त देखो। पण्डितजी ने कहा-किसी विषय का मुहूर्त देखूँ ? कहने लगे, मेरा मुहूर्त तो ५ बजे का है। इससे पहले मरने का मुहूर्त बनता हो तो मैं पहले चला जाऊँ। जागेराम शास्त्री बहुत दुखी हो रहा है। पण्डितजी कुछ नहीं बोले, रोने लग गये, ठीक ५ बजे एक सन्त आये। वे आकर रोने लगे। स्वामी जी कहने लगे, सन्तजी! क्यों रोते हो, मुझे कहने लगे तेरे आश्रम में सन्तजी आये हैं। इसको दूध पिला। यह कहकर फिर 'ओम ओम' कहने लगे। इतने में सन्त को गेट तक छोड़कर आया। उस समय उनके पास दण्डी स्वामी श्रीमुरारी आश्रम तथा दण्डी स्वामी श्रीरामानन्द आश्रम सेवा में थे। स्वामी जी के कहने पर उन्होंने उन्हें नीचे आसन बिछाकर बैठाया। पद्मासन उन्होंने स्वयं लगा लिया। जब कमण्डलु से उनको गंगाजल पिला रहे थे तब मैंने कहा-नीचे क्यों बैठाया ? अभी मैं पूरा बोल भी नहीं पाया कि उन्होंने 'ओम ओम्' का उच्चारण किया और गंगाजल मुख में लेते ही उन्होंने प्राण छोड़ दिये। स्वामी मुरारी आश्रमजी कहने लगे-ये तो सदा के लिये ही बैठ गये। उस समय तक तीनों डॉक्टर आश्रम में ही थे। डॉक्टरों ने स्वयं कहा कि ये हमारे मेडिकल साइंस के एकदम विपरीत अद्भुत घटना घटी है। एक डॉक्टर बंगाली सिपाहा नाम से थे। कहने लगे-मैंने जीवन में ऐसी घटना कभी नहीं देखी। तीनों डॉक्टरों ने स्वामीजी के शरीर को प्रणाम किया। उस घटना से यह सिद्ध होता है। कर्म के भोग तो हर हालत में सभी महापुरुषों को भोगने पड़ते हैं। कुत्ते का काटना तथा वह बीमारी होना तो कर्म के भोग निश्चित थे। परंतु गौसेवा, श्रीगंगासेवा, सन्त सेवा, भगवद्धजन डॉक्टरों के अनुसार मेडिकल साइंस को मात दे सकते हैं। आज श्रीदण्डी स्वामी केवलाश्रमजी महाराज के मात्र आशीर्वाद से कृष्णाधाम अन्नक्षेत्र में सैकड़ों महात्मा और जरूरतमन्द निशुल्क भोजन करते हैं। दान देने वाले भी स्वतः आते हैं और खाने वाले भी स्वत: आते हैं। यह भगवान् के भजन, गोसेवा, गंगासेवा, सन्तसेवा का अनुपम प्रभाव है। ----------:::×:::---------- -श्रीआगेरामजी शास्त्री पत्रिका: कल्याण (९३।८) गीताप्रेस (गोरखपुर) "जय जय श्री राधे" *******************************************

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