🙏 चौरासी लाख योनियों 🙏 एक बार की बात है कि यशोदा मैया प्रभु श्री कृष्ण के उलाहनों से तंग आ गयीं और छड़ी लेकर श्री कृष्ण की ओर दौड़ी । जब प्रभु ने अपनी मैया को क्रोध में देखा तो वह अपना बचाव करने के लिबए भागने लगे । भागते भागते श्री कृष्ण एक कुम्हार के पास पहुँचे । कुम्हार तो अपने मिट्टी के घड़े बनाने में व्यस्त था । लेकिन जैसे ही कुम्हार ने श्री कृष्ण को देखा तो वह बहुत प्रसन्न हुआ । कुम्हार जानता था कि श्री कृष्ण साक्षात् परमेश्वर हैं । तब प्रभु ने कुम्हार से कहा कि 'कुम्हार जी, आज मेरी मैया मुझ पर बहुत क्रोधित है । मैया छड़ी लेकर मेरे पीछे आ रही है । भैया, मुझे कहीं छुपा लो ।' तब कुम्हार ने श्री कृष्ण को एक बडे से मटके के नीचे छिपा दिया । कुछ ही क्षणों में मैया यशोदा भी वहाँ आ गयीं और कुम्हार से पूछने लगी - 'क्यूँ रे, कुम्हार ! तूने मेरे कन्हैया को कहीं देखा है, क्या ?' कुम्हार ने कह दिया - 'नहीं, मैया ! मैंने कन्हैया को नहीं देखा ।' श्री कृष्ण ये सब बातें बडे से घड़े के नीचे छुपकर सुन रहे थे । मैया तो वहाँ से चली गयीं । अब प्रभु श्री कृष्ण कुम्हार से कहते हैं - 'कुम्हार जी, यदि मैया चली गयी हो तो मुझे इस घड़े से बाहर निकालो ।' कुम्हार बोला - 'ऐसे नहीं, प्रभु जी ! पहले मुझे चौरासी लाख यानियों के बन्धन से मुक्त करने का वचन दो ।' भगवान मुस्कुराये और कहा - 'ठीक है, मैं तुम्हें चौरासी लाख योनियों से मुक्त करने का वचन देता हूँ । अब तो मुझे बाहर निकाल दो ।' कुम्हार कहने लगा - 'मुझे अकेले नहीं, प्रभु जी ! मेरे परिवार के सभी लोगों को भी चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त करने का वचन दोगे तो मैं आपको इस घड़े से बाहर निकालूँगा ।' प्रभु जी कहते हैं - 'चलो ठीक है, उनको भी चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त होने का मैं वचन देता हूँ । अब तो मुझे घड़े से बाहर निकाल दो ।' अब कुम्हार कहता है - 'बस, प्रभु जी ! एक विनती और है । उसे भी पूरा करने का वचन दे दो तो मैं आपको घड़े से बाहर निकाल दूँगा ।' भगवान बोले - 'वो भी बता दे, क्या कहना चाहते हो ?' कुम्भार कहने लगा - 'प्रभु जी ! जिस घड़े के नीचे आप छुपे हो, उसकी मिट्टी मेरे बैलों के ऊपर लाद के लायी गयी है । मेरे इन बैलों को भी चौरासी के बन्धन से मुक्त करने का वचन दो ।' भगवान ने कुम्हार के प्रेम पर प्रसन्न होकर उन बैलों को भी चौरासी के बन्धन से मुक्त होने का वचन दिया ।' प्रभु बोले - 'अब तो तुम्हारी सब इच्छा पूरी हो गयी, अब तो मुझे घड़े से बाहर निकाल दो ।' तब कुम्हार कहता है - 'अभी नहीं, भगवन ! बस, एक अन्तिम इच्छा और है । उसे भी पूरा कर दीजिये और वो ये है - जो भी प्राणी हम दोनों के बीच के इस संवाद को सुनेगा, उसे भी आप चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त करोगे । बस, यह वचन दे दो तो मैं आपको इस घड़े से बाहर निकाल दूँगा ।' कुम्हार की प्रेम भरी बातों को सुन कर प्रभु श्री कृष्ण बहुत खुश हुए और कुम्हार की इस इच्छा को भी पूरा करने का वचन दिया । फिर कुम्हार ने बाल श्री कृष्ण को घड़े से बाहर निकाल दिया । उनके चरणों में साष्टांग प्रणाम किया । प्रभु जी के चरण धोये और चरणामृत पीया । अपनी पूरी झोंपड़ी में चरणामृत का छिड़काव किया और प्रभु जी के गले लगकर इतना रोये क़ि प्रभु में ही विलीन हो गये । जरा सोच करके देखिये, जो बाल श्री कृष्ण सात कोस लम्बे-चौड़े गोवर्धन पर्वत को अपनी इक्क्नी अंगुली पर उठा सकते हैं, तो क्या वो एक घड़ा नहीं उठा सकते थे । लेकिन बिना प्रेम रीझे नहीं नटवर नन्द किशोर । कोई कितने भी यज्ञ करे, अनुष्ठान करे, कितना भी दान करे, चाहे कितनी भी भक्ति करे, लेकिन जब तक आपके दिल मे प्राणी के लिए दुख दर्द नही है तो प्रभु श्री कन्हा जी की भक्ति व उनका दर्शन नही हो सकता । बोलो गोविन्द जय जय गोपाल जय जय!!

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जब मृत्यु का भय सताये तब इस कथा को पढ़ें एवं भविष्य में सदैव स्मरण रखें÷ ("मृत्यु से भय कैसा ??").... ।।सुन्दर दृष्टान्त ।। राजा परीक्षित को श्रीमद्भागवत पुराण सुनातें हुए जब शुकदेव जी महाराज को छह दिन बीत गये, और तक्षक (सर्प) के काटने से राजा परीक्षित की मृत्यु होने का एक दिन शेष रह गया, तब भी राजा परीछित का शोक और मृत्यु का भय दूर नही हुआ, अपने मरने की घड़ी निकट आती देखकर राजा का मन क्षुब्ध हो रहा था। तब शुकदेव जी महाराज ने परीक्षित को एक कथा सुनानी आरंभ की, राजन! बहुत समय पहले की बात है, एक राजा किसी जंगल में शिकार खेलने गया, संयोगवश वह रास्ता भूलकर बड़े घने जंगल में जा पहुँचा, उसे रास्ता ढूंढते-ढूंढते रात्रि हो गयी और भारी वर्षा पड़ने लगी। जंगल में सिंह व्याघ्र आदि बोलने लगे, वह राजा बहुत डर गया, और किसी प्रकार उस भयानक जंगल में रात्रि बिताने के लिये विश्राम का स्थान ढूंढने लगा, रात के समय में अंधेरा होने की वजह से उसे एक दीपक दिखाई दिया, वहाँ पहुँचकर उसने एक गंदे बहेलिये की झोंपड़ी देखी, वह बहेलिया ज्यादा चल-फिर नहीं सकता था, इसलिए झोंपड़ी में ही एक ओर उसने मल-मूत्र त्यागने का स्थान बना रखा था। अपने खाने के लिए जानवरों का मांस उसने झोंपड़ी की छत पर लटका रखा था, बड़ी गंदी, छोटी, अंधेरी और दुर्गंधयुक्त वह झोंपड़ी थी, उस झोंपड़ी को देखकर पहले तो राजा ठिठका, लेकिन पीछे उसने सिर छिपाने का कोई और आश्रय न देखकर उस बहेलिये से अपनी झोंपड़ी में रात भर ठहर जाने देने के लिए प्रार्थना की। बहेलिये ने कहा कि आश्रय के लोभी राहगीर कभी-कभी यहाँ आ भटकते हैं, मैं उन्हें ठहरा तो लेता हूँ, लेकिन दूसरे दिन जाते समय वे बहुत झंझट करते हैं, इस झोंपड़ी की गंध उन्हें ऐसी भा जाती है कि फिर वे उसे छोड़ना ही नहीं चाहते और इसी में ही रहने की कोशिश करते हैं, एवं अपना कब्जा जमाते हैं, ऐसे झंझट में मैं कई बार पड़ चुका हूँ।। इसलिये मैं अब किसी को भी यहां नहीं ठहरने देता, मैं आपको भी इसमें नहीं ठहरने दूंगा, राजा ने प्रतिज्ञा की कि वह सुबह होते ही इस झोंपड़ी को अवश्य खाली कर देगा, उसका काम तो बहुत बड़ा है, यहाँ तो वह संयोगवश भटकते हुए आया है, सिर्फ एक रात्रि ही काटनी है, बहेलिये ने राजा को ठहरने की अनुमति दे दी, पर सुबह होते ही बिना कोई झंझट किए झोंपड़ी खाली कर देने की शर्त को फिर दोहरा दिया। राजा रात भर एक कोने में पड़ा सोता रहा, सोने में झोंपड़ी की दुर्गंध उसके मस्तिष्क में ऐसी बस गई कि सुबह उठा तो वही सब परमप्रिय लगने लगा, अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य को भूलकर वहीं निवास करने की बात सोचने लगा, वह बहेलिये से और ठहरने की प्रार्थना करने लगा, इस पर बहेलिया भड़क गया और राजा को भला-बुरा कहने लगा। राजा को अब वह जगह छोड़ना झंझट लगने लगा, और दोनों के बीच उस स्थान को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया, कथा सुनाकर शुकदेव जी महाराज ने परीक्षित से पूछा- परीक्षित! बताओ, उस राजा का उस स्थान पर सदा के लिए रहने के लिए झंझट करना उचित था? परीक्षित ने उत्तर दिया- भगवन्! वह कौन राजा था, उसका नाम तो बताइये ? वह तो बड़ा भारी मूर्ख जान पड़ता है, जो ऐसी गंदी झोंपड़ी में, अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर एवं अपना वास्तविक उद्देश्य भूलकर, नियत अवधि से भी अधिक रहना चाहता है, उसकी मूर्खता पर तो मुझे आश्चर्य होता है, श्री शुकदेवजी ने कहा- हे राजन् वह बड़े भारी मूर्ख तो स्वयं आप ही हैं, इस मल-मूल की गठरी देह (शरीर) में जितने समय आपकी आत्मा को रहना आवश्यक था, वह अवधि तो कल समाप्त हो रही है, अब आपको उस लोक जाना है, जहाँ से आप आएं हैं। फिर भी आप झंझट फैला रहे हैं और मरना नहीं चाहते, क्या यह आपकी मूर्खता नहीं है? राजा परीक्षित का ज्ञान जाग पड़ा और वे बंधन मुक्ति के लिए सहर्ष तैयार हो गये, मेरे प्यारे सज्जनों! वास्तव में यही सत्य है, जब एक जीव अपनी माँ की कोख से जन्म लेता है, तो अपनी माँ की कोख के अन्दर भगवान से प्रार्थना करता है कि हे भगवन्! मुझे यहाँ (इस कोख) से मुक्त कीजिये, मैं आपका भजन-सुमिरन करूँगा। और जब वह जन्म लेकर इस संसार में आता है तो (उस राजा की तरह हैरान होकर) सोचने लगता है कि मैं ये कहाँ आ गया और पैदा होते ही रोने लगता है, फिर उस गंध से भरी झोंपड़ी की तरह उसे यहाँ की खुशबू ऐसी भा जाती है कि वह अपना वास्तविक उद्देश्य भूलकर यहाँ से जाना ही नहीं चाहता है, यही मेरी भी कथा है और आपकी भी। सर्वे भवंतु सुखिन: सर्वे संतु निरामया:। सर्वे भद्राणि पस्यंतु, माँ कस्चिद्‌ दुख: भागभवेत्‌।। आचार्य डॉ0 विजय शंकर मिश्र

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*नाम रुपी रस* बाबूलाल गांव का एक बहुत ही बड़ा जमीदार था। बड़े बड़े खेत खलिहान बड़े-बड़े फलों के बाग बगीचे उसके पास थे ।लेकिन बाबूलाल इतना बड़ा जमींदार होने के बावजूद भी बहुत ही साधारण जीवन व्यतीत करता था। उसकी पत्नी का नाम सावित्री था जैसा उसका नाम था वैसे ही सावित्री की तरह वह अपने पति की खूब सेवा करती थी ।बाबूलाल के घर दो बेटे और एक बेटी थी। बच्चों में भी उसने खूब अच्छे संस्कार दिए थे ।रूपवान होने के साथ-साथ तीनों बच्चे बहुत ही गुणवान थे ।बाबूलाल को बचपन से ही उसकी मां ने गले में कंठी माला और हाथ में झोली माला देकर उसकी महत्ता को समझा दिया था ।बाबूलाल बचपन से ही झोली माला से महामंत्र का निरंतर जाप करता रहता था। मां के गुजर जाने के बाद उसका साथ उसकी पत्नी ने खूब निभाया। पत्नी भी खूब संस्कारी थी। घर में इतना धन होने के बावजूद भी बाबूलाल और उसकी पत्नी बहुत ही साधारण जीवन व्यतीत करते थे। बाबूलाल की पत्नी अपने हाथों से अपने पति के वस्त्रों को धोती ठाकुर जी और अपने पति बच्चों के लिए खुद भोजन तैयार करती। घर में नौकर चाकरों की कोई कमी ना थी। लेकिन फिर भी बाबूलाल की पत्नी अपने बच्चों और पति का काम खुद ही करती थी ।बाबूलाल ने कभी भी अपने हाथ से झोली माला को नहीं छोड़ा था निरंतर उसके हाथ से झोली माला में महामंत्र का जाप चलता ही रहता था ।चाहे बुखार की जकड़न हो या सर्दी की अकड़न हो उसकी हाथ से माला कभी ना छूटती। रात को सोते वक्त वो ठाकुर जी के चरणों में झोली माला को रख देता ।लेकिन उसके मन रूपी मनके से महामंत्र का जाप निरंतर चलता ही रहता। कुल मिलाकर वह 24 घंटे महामंत्र का जाप करता ही रहता था। लगातार महामंत्र का जाप करने से उस माला के मनको पर स्वयं राधा कृष्ण के नाम का आवरण चढ चुका था। एकादशी व्रत करना बाबू लाल और सावित्री के नियम में शामिल था और द्वादशी के दिन वह दूर दूर से ब्राह्मणों को बुलाकर उनको भोजन करवाता और खूब दान दक्षिणा देता। इतना दान देने के बावजूद भी वह खुद एक साधारण सी धोती कुर्ता पहनता था और उसकी पत्नी भी सूती साड़ी ही पहनती ।कुल मिलाकर वह बहुत ही साधारण जीवन व्यतीत करते थे! ठाकुर जी का खूब नाम लेते थे ।देखते ही देखते कब बच्चे बड़े हो गए बाबूलाल को पता ही नहीं चला। अब उसकी बेटी जवान हो चुकी थी और एक बहुत अच्छे घर से उसका रिश्ता तय हो गया। शादी का दिन भी तय हो गया। ठाकुर जी की कृपा से शादी बहुत अच्छी तरह से संपन्न हो कर उसकी बेटी घर से विदा हो गई। बाबूलाल कभी भी अपनी झोली माला को इधर उधर ना रखकर ठाकुर जी के चरणों में हमेशा रखता था। लेकिन बेटी की शादी में वह इतना उलझ गया कि उसको याद ही नहीं रहा कि रात को सोते समय उसकी झोली माला उसके कुर्ते की जेब में रह गई है। सुबह 5:00 बजे उठकर उसकी पत्नी जो कि रोज नदी में स्नान करने जाती थी और साथ में ही अपनने और अपने पति के कपड़ों को भी धो कर आती थी । कुर्ता और धोती लेकर सावित्री नदी किनारे धोने के लिए चली गई। कुर्ते को उसने एक पत्थर पर रख कर जैसे ही धोना शुरू किया धोते-धोते उसको महामंत्र के जाप की आवाज आने लगी ।बाबूलाल की पत्नी एकदम से घबरा गई है कि सुबह-सुबह महामंत्र का जाप नदी किनारे कौन कर रहा है जैसे जैसे वह कुरते को पत्थर पर पटकती वैसे वैसे आवाज और तेज होती गई ।उसकी पत्नी हक्की बक्की हो गई कि महामंत्र की आवाज कहां से आ रही है ।जब उसने ध्यान लगाकर सुना तो उसने देखा कि कुर्ते की जेब के अंदर से आवाज आ रही है। उसने जब कुरते को देखा तो उसमें झोली माला को देखकर वो एकदम से सकपका सी गई और उसने झट से नदी के पानी से हाथ होकर उस माला को कुर्ते की जेब से निकालकर मस्तक पर लगाया ।और ठाकुर जी से क्षमा मांगने लगी कि भूलवश मैने पत्थर पर झोली माला को पटक दिया । हजार बार वह ठाकुर जी से क्षमा मांग चुकी थी ।जब वह वापस आई तो उसने देखा कि बाबूलाल घर के आंगन में बहुत घबराया हुआ सा इधर-उधर चक्कर लगा रहा है। सावित्री ने पूछा कि आप इतने चिंतित क्यों हैं तो बाबूलाल ने बोला कि मेरी झोली माला नहीं मिल रही तो उसकी पत्नी ने हाथ जोड़कर क्षमा मांगते हुए अपने पति से कहा कि यह भूलवश आपके कुर्ते में रह गई थी और मैंने उसको ऐसे ही धो दिया ।अपनी माला को पाकर बाबूलाल के जैसे शरीर से निकले हुए प्राण वापस आ गए हो। उसने माला को पकड़ा और अपने सीने से लगाया और सीने से माला को लगाकर उसको ऐसा लगा कि जैसे उसने ठाकुर जी और किशोरी जी को सीने से लगा लिया हो और आनंद से उसकी आंखो से झरझर आंसु बहने लगे और उसकी आंखों में निकलने वाले ठंडे ठंडे आंसु उसके शरीर को भिगोने लगे।क्योंकि आनंद और प्रेम में निकलने वाले आंसू हमेशा ठंडे होते हैं और शोक में निकलने वाले आंसू हमेशा गर्म होते हैं ।अभी सुबह के 6:00 बजे थे जैसे-जैसे सूरज चढ़ने लगा वैसे वैसे गांव में शोर मचने लगा कि नदी किनारे एक पत्थर ऐसा है जो कि सोने जैसा चमक रहा है और अपने आप ही हिल रहा है और उसमें से अजीब सी ध्वनि निकल रही है। सब लोग उस पत्थर को देखने के लिए जा रहे थे ।बाबूलाल और उसकी पत्नी के कानो में भी उस पत्थर के बारे में बातें पढ़ी तो वह भी देखने के लिए चल पड़े ।बाबूलाल की पत्नी यह देखकर हैरान हो गई यह तो वही पत्थर है जिस पर उसने अपने पति के कुरत्ते को धोया था ।और जिसमें झोली माला थी वह सब कुछ समझ गई जब उसने पास जाकर उस ध्वनि को सुना वह ध्वनि ओर कुछ नहीं बल्कि महामंत्र की ध्वनी थी क्योंकि झोली माला के ऊपर चढ़ा हुआ राधा कृष्ण नाम का रस निचुड कर उस पत्थर पर पड़ गया था जिसके कारण वह सोने जैसा चमक रहा था और महामंत्र के आनंद मे अपने आप ही झूम रहा था। बाबूलाल उसकी पत्नी एक दूसरे के साथ बातें करने लगे और कहने लगे कि अगर महामंत्र की झोली माला से निकले महामंत्र के रस से एक पत्थर सोने जैसा चमक रहा है और उसके आनंद से झूम रहा है और अगर हम अपने हृदय रूपी मानस पटल पर राधाकृष्ण के नाम रुपी रस और महामंत्र के रस को निचोड़ ले तो उस मंत्र के मद में चूर श्री राधाकृष्ण नाम की नैया हमेशा हमारे हृदय में हिचकोले खाती फिरेगी !! 🙏जय हो महामंत्र की !! 🙏जय हो हम सब के प्यारे श्यामाश्याम जू की !! 💮!!हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे!!💮 💮!!हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे!!💮

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. "विश्वासघात का दण्ड" चन्द्रवंश में नन्द नाम से प्रसिद्ध एक महाराजा थे, जो समुद्रपर्यन्त पृथ्वी का धर्म पूर्वक पालन करते थे । उनके एक पुत्र हुआ, जिसका नाम धर्मगुप्त था। नन्द ने राज्य की रक्षा का भार अपने पुत्र पर रख दिया और स्वयं इन्द्रियों को वश में करके आहार पर विजय पाकर तपस्या के लिये तपोवन में चले गये। पिता के तपोवन चले जाने पर राजा धर्मगुप्त ने सारी पृथ्वी का पालन किया। वे धर्मों के ज्ञाता और नीतिपरायण थे। उन्होंने अनेक प्रकार के यज्ञों द्वारा इन्द्र आदि देवताओं का पूजन किया और ब्राह्मणों को धन एवं बहुत-से क्षेत्र प्रदान किये। उनके शासनकाल में समस्त प्रजा अपने-अपने धर्म का पालन करती थी। उनके राज्य में कभी चोर आदि से किसी को कष्ट नहीं प्राप्त हुआ। एक दिन धर्मगुप्त उत्तम घोड़े पर सवार हो वन में गये। वहीं रात हो गयी। विनयशील राजा ने वहीं सायं-सन्ध्या की उपासना करके वेदमाता गायत्री का जप किया। तत्पश्चात् सिंह, व्याघ्र आदि के भय से वे एक वृक्ष पर बैठे। उस वृक्ष के पास एक रीछ आया, जो सिंह के भय से पीड़ित था।वन में विचरने वाला एक सिंह उस रीछ का पीछा कर रहा था। रीछ वृक्ष पर चढ़ गया। वहाँ उसने महान् बल-पराक्रम से सम्पन्न राजा धर्मगुप्त को बैठे देखा। उन्हें देखकर रीछ बोला- 'बड़ा भयंकर सिंह आया हुआ है। महामते! तुम आधी रात तक निर्भय होकर नींद लो, मैं सजग होकर तुम्हारी रक्षा करता रहूँगा। उसके बाद जब मैं सो जाऊँ, तब शेष आधी रात तक तुम मेरी रक्षा करना।' रीछ की यह बात सुनकर धर्मगुप्त सो गये। उस समय सिंह ने रीछ से कहा-'यह राजा तो सो गया है, अब तुम इसे मेरे लिये नीचे गिरा दो।' तब धर्मज्ञ रीछ ने सिंह को उत्तर दिया- 'वनचारी मृगराज! तुम धर्म को नहीं जानते। अहो! विश्वासघात करने वाले प्राणियों को संसार में बड़ा कष्ट भोगना पड़ता है। मित्रद्रोहियों का पाप दस हजार यज्ञों के अनुष्ठान से भी नष्ट नहीं होता। ब्रह्महत्या आदि पापों का तो किसी प्रकार निवारण हो सकता है, परंतु विश्वासघातियों का पाप कोटिजन्मों में भी नष्ट नहीं हो सकता है। सिंह! मैं मेरुपर्वत को इस पृथ्वी का बड़ा भारी भार नहीं मानता, संसार में जो विश्वासघाती है, उसी को मैं भूतल का महान् भार समझता हूँ।' रीछ के ऐसा कहने पर सिंह चुप हो गया। तत्पश्चात् धर्मगुप्त जागे और रीछ वृक्ष पर सो गया । तब सिंह ने राजा से कहा- इस रीछ को नीचे छोड़ दो।' तब राजा ने अपने अंक में सिर रखकर सोये हुए रीछ को पृथ्वी पर ढकेल दिया। राजा के गिराने पर रीछ वृक्ष की डाली पकड़ता लटक गया । वह पुण्यवश वृक्ष से नीचे नहीं गिरा। अब वह राजा के पास आकर क्रोधपूर्वक बोला-'राजन्! मैं इच्छानुसार रूप धारण करनेवाला ध्यानकाष्ट नामक मुनि हूँ। मेरा जन्म भृगुवंश में हुआ है। मैंने स्वेच्छा से रीछ का रूप धारण किया है। मैंने तुम्हारा कोई अपराध नहीं किया था। फिर सोते समय तुमने मुझे क्यों ढकेला ? जाओ, मेरे शाप से शीघ्र पागल होकर पृथ्वी पर विचरो।' इस प्रकार राजा को विश्वासघात का दण्ड मिला। 【स्कन्दपुराण】 ----------:::×:::---------- कल्याण (९३।११) गीताप्रेस (गोरखपुर) "जय जय श्री राधे" ********************************************

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जय श्री राधे... #वैकुंठ_चतुर्दशी... #11_नवम्बर... #हरिहर_मिलन...😊 कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को बैकुंठ चौदस के नाम से जाना जाता है। प्राचीन मान्यता है कि इस दिन हरिहर मिलन होता है। यानी इस दिन भगवान शिव और भगवान विष्णु का मिलन होता है। इसलिए यह दिन शिव एवं विष्णु के उपासक बहुत धूमधाम और उत्साह से मनाते हैं। खासतौर पर उज्जैन, वाराणसी में बैकुंठ चतुर्दशी को बड़े पैमाने पर मनाया जाता है। उज्जैन में भगवान महाकाल की सवारी धूमधाम से निकाली जाती और दीपावली की तरह आतिशबाजी की जाती है। #पौराणिक_मान्यता... वैकुंठ चतुर्दशी के संबंध में हिंदू धर्म में मान्यता है कि संसार के समस्त मांगलिक कार्य भगवान विष्णु के सानिध्य में होते हैं, लेकिन चार महीने विष्णु के शयनकाल में सृष्टि का कार्यभार भगवान शिव संभालते हैं। जब देव उठनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु जागते हैं तो उसके बाद चतुर्दशी के दिन भगवान शिव उन्हें पुन: कार्यभार सौंपते हैं। इसीलिए यह दिन उत्सवी माहौल में मनाया जाता है। #कथा... एक बार नारद जी भगवान श्री विष्णु से सरल भक्ति कर मुक्ति पा सकने का मार्ग पूछते है। नारद जी के कथन सुनकर श्री विष्णु जी कहते हैं कि हे नारद, कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को जो नर-नारी व्रत का पालन करते हैं और श्रद्धा - भक्ति से मेरी पूजा करते हैं उनके लिए स्वर्ग के द्वार खुल जाते हैं अत: भगवान श्री हरि कार्तिक चतुर्दशी को स्वर्ग के द्वार खुला रखने का आदेश देते हैं। भगवान विष्णु कहते हैं कि इस दिन जो भी भक्त मेरा पूजन करता है वह बैकुण्ठ धाम को प्राप्त करता है। #कैसे_मनाई_जाती_है? शैव और वैष्णव दोनों मतों को मानने वालों के लिए यह दिन महत्वपूर्ण है। इस दिन दोनों देवों की विशेष पूजा की जाती है। उज्जैन महाकाल में भव्य पैमाने पर बैकुंठ चतुर्दशी मनाई जाती है। इस दिन भगवान शिव का विभिन्न् पदार्थों से अभिषेक करने का बड़ा महत्व है। उनका विशेष श्रृंगार करके भांग, धतूरा, बेलपत्र अर्पित करने से समस्त सुखों की प्राप्ति होती है। वैकुंठ चतुर्दशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा करके उनका भी श्रृंगार करना चाहिए। विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करना चाहिए। विष्णु मंदिरों में भी इस दिन दीपावली की तरह जश्न मनाया जाता है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करके दान-पुण्य करना चाहिए। इससे समस्त पापों का प्रायश्चित होता है। नदियों में दीपदान करने से विष्णु-लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है। बैकुंठ चतुर्दशी को व्रत कर तारों की छांव में तालाब, नदी के तट पर 14 दीपक जलाने चाहिए। वहीं बैठकर भगवान विष्णु को स्नान कराकर विधि विधान से पूजा अर्चना करें। उन्हें तुलसी पत्ते डालकर भोग लगाएं। इस दिन स्नानादि से निवृत्त होकर व्रत करें। शास्त्रों की मान्यता है कि जो एक हजार कमल पुष्पों से भगवान श्री हरि विष्णु का पूजन कर शिव की पूजा अर्चना करते हैं, वे बंधनों से मुक्त होकर बैकुंठ धाम पाते हैं। #विष्णु_मंत्र... पद्मनाभोरविन्दाक्ष: पद्मगर्भ: शरीरभूत्। महर्द्धिऋद्धो वृद्धात्मा महाक्षो गरुडध्वज:।। अतुल: शरभो भीम: समयज्ञो हविर्हरि:। सर्वलक्षणलक्षण्यो लक्ष्मीवान् समितिञ्जय:।। #शिव_मंत्र... वन्दे महेशं सुरसिद्धसेवितं भक्तै: सदा पूजितपादपद्ममम्। ब्रह्मेन्द्रविष्णुप्रमुखैश्च वन्दितं ध्यायेत्सदा कामदुधं प्रसन्नम्।। #वैकुंठ_चतुर्दशी_का_महत्व... कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी भगवान विष्णु तथा शिव जी के "ऎक्य" का प्रतीक है। प्राचीन मतानुसार एक बार विष्णु जी काशी में शिव भगवान को एक हजार स्वर्ण कमल के पुष्प चढा़ने का संकल्प करते हैं। जब अनुष्ठान का समय आता है, तब शिव भगवान, विष्णु जी की परीक्षा लेने के लिए एक स्वर्ण पुष्प कम कर देते हैं। पुष्प कम होने पर विष्णु जी अपने "कमल नयन" नाम और "पुण्डरी काक्ष" नाम को स्मरण करके अपना एक नेत्र चढा़ने को तैयार होते हैं। भगवान शिव उनकी यह भक्ति देखकर प्रकट होते हैं। वह भगवान शिव का हाथ पकड़ लेते हैं और कहते हैं कि तुम्हारे स्वरुप वाली कार्तिक मास की इस शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी "वैकुण्ठ चौदस" के नाम से जानी जाएगी। भगवान शिव, इसी वैकुण्ठ चतुर्दशी को करोडो़ सूर्यों की कांति के समान वाला सुदर्शन चक्र, विष्णु जी को प्रदान करते हैं। इस दिन स्वर्ग के द्वार खुले रहते हैं। #वैकुंठ_चतुर्दशी_की_अनंत_बधाई...😊 Subscribe my YouTube Channel.. जय श्री राधे... जय श्री हरिदास...

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