​ ✔ *वचन कर्म ओर मन * ✔ श्री राधा रस सुधा निधि के रचनाकार श्री प्रबोधानंद सरस्वती रचित श्रीवृन्दाबन महिमामृत की रसमय कथा कहें बरज रज की अद्भुत महिमा बखान करें ये हो गया वचन ब्रज रज को सदा मस्तक पर पोते रहें ब्रज को छोड़कर कहीं न जाएँ ब्रज रज में कभी चप्पल न पहने ये हो गया कर्म हृदय सदा ब्रज की रज रानी की कृपा से पूरित रहे । आखें डबडबाई रहें सदा ये हो गया मन । जिसका मन वचन कर्म एक सा वही साधू वही सन्त । अन्यथा तो खूब चटपटी वृन्दाबन की कथा कहने वाले न तो वृन्दाबन में रहें न रज मस्तक पर लगाएं और मर्सीडीज़ में चलें केवल बातें ही बातें । कोरी बातें । न मन में भाव । न आचरण । ऐसे लोगों से श्रवण का उतना असर नही होता जितना मन वचन कर्म वाले साधू के मुख से श्रवण से । चिंतन कीजिये 🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚 🐚 ॥ जय निताई ॥ 🐚 🖊 लेखक दासाभास डाॅ गिरिराज नांगिया LBW - Lives Born Works at vrindabn ब्लॉग पर : http://shriharinam.blogspot.in/2016/09/vachan-man-or-karm.html

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नहीं चाहिए । नहीं चाहिए जीव उस सत चित आनंद का अंश है । जीव में भी शक्ति है सामर्थ्य है । वह यदि चाहे तो बहुत कुछ कर सकता है । चांद पर भी पहुंच गया । समुद्र के अंदर भी होटल बना लिए । बात केवल यहीं तक है की उसको समझ आना चाहिए । और सबसे बड़ी बात दासाभास को समझने की यह है की जीव श्रीकृष्ण का दास है । प्रिया लाल की चरण सेवा ही उस का मुख्य उद्देश्य है । उसी में ही उसको परम शांति सुख आनंद प्राप्त होगा । जब यह बात उसके समझ में आ जाए तभी वह कृष्ण को परम धन मान कर उनके चरण सेवा प्राप्ति हेतु भजन में लगेगा । अन्यथा तो भजन एक दैनिक प्रक्रिया है । 10 20 मिनट्स आधा घंटा किया और राधे-राधे जिसे यह समझ आ जाएगी कि श्री कृष्ण भजन ही हमारा मुख्य कार्य है । इसी के लिए हम आये हैं , तब वह दासाभास भजन को ही चाहेगा और भजन के अतिरिक्त किसी वस्तु को नहीं चाहेगा । जैसे किसी के पास परम धन हो या कोई श्रेष्ठ चीज हो तो वह सामान्य वस्तु के लिए नहीं नहीं करता रहता है । जैसाकि महाप्रभु ने शिक्षा अष्टक में कहा है ना धनं न जनम् न सुंदरी न कविताम् वा जगदीश कामये जबकि दासाभास और हम सभी इन्हीं की प्राप्ति में लगे रहते हैं । जिसे इन से भी श्रेष्ठ वस्तु की प्राप्ति का ज्ञान हो गया है । वही इनको मना करेगा । नहीं चाहिए । नहीं चाहिए । नहीं चाहिए । वही कहेगा जिसके पास या तो पर्याप्त रूप में है या जो ऑफर किया जा रहा है उससे बहुत श्रेष्ठ उसके पास है । जैसे जो महिला 2,000 से ऊपर की साड़ी पहनती है उसको 300, 400, 800 वाली यदि साड़ियां दिखाई जाएं तो वह यही कहती है । अरे भाई । नहीं चाहिए, नहीं चाहिए, नहीं चाहिए । हटाओ इनको । बस बात दासाभास और सबके मन में बैठने की है कि हमारा सर्वश्रेष्ठ धन भजन है और भजन द्वारा श्री श्री प्रिया लाल जी का सुख है । तब यह सांसारिक वस्तु यह सांसारिक सुख, धन जन सबके लिए हम कहेंगे नहीं चाहिए । नहीं चाहिए । नहीं चाहिए । देखना यह है के यह बात दासाभास को समझ में कब आती है समस्त वैष्णव जन को दासाभास का सादर प्रणाम जय श्रीराधे।। जय निताई 🖋लेखक दासाभास डॉ गिरिराज नागिंया LBW- Lives Born Works at Vrindabn

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अध्यात्म ज्ञान धारण करने का तत्व है हम जितना अध्यात्म को धारण करते जाएंगे उतना ज्यादा ईश्वर का और सत्य का अनुभव करते जाएंगे बिना धारण किए हुए यह ज्ञान हमारे किसी काम का नहीं है ? जैसे ठंड का महीना चल रहा है हमें ठंडी भी खूब लग रही है और हम कंबल का खूब बखान करें कंबल इतना होता है मोटा होता है बहुत गर्म करता है कंबल उड़ने वाले को ठंड नहीं लगता है कंबल में हाथ पैर साहब सीमेट लेते हैं कंबल का कितना भी बखान कर ले जब तक हम उस कंबल को अपने शरीर पर धारण नहीं करेंगे तब तक उस कंबल का कितना भी बखान कर ले वह हमारे किसी काम का होता नहीं है ठीक उसी प्रकार से ज्ञान जब तक धारण न किया जाए हमारे किसी काम का नहीं है, कंबल को शरीर पर धारण किया जाता है , और ज्ञान को हमारे अंतःकरण पर ज्ञान रूपी प्रकाश धीरे-धीरे अंतः करण को नया प्रकाश देकर अंधकार रूपी अज्ञान को नष्ट कर देता है जिससे जीवन की सत्यता और सार्थकता का अनुभव होता है ? इसलिए महापुरुषों ने कहा है बाहर से कितना भी ज्ञान ले लो वह ज्ञान जब तक हमारे अंतःकरण में प्रकट नहीं होगा तब तक बाहरी ज्ञान से काम चलेगा नहीं मनुष्य जीवन के कल्याण के लिए ज्ञान को अंतःकरण में धारण करना ही पड़ेगा

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एक बार वृन्दावन में एक संत हुए कदम्खंडी जी महाराज। उनकी बड़ी बड़ी जटाएं थी। वो वृन्दावन के सघन वन में जाके भजन करते थे। एक दिन जा रहे थे तो रास्ते में उनकी बड़ी बड़ी जटाए झाडियो में उलझ गई। उन्होंने खूब प्रयत्न किया किन्तु सफल नहीं हो पाए। और थक के वही बैठ गए और बैठे बैठे गुनगुनाने लगे। "हे मुरलीधर छलिया मोहन हम भी तुमको दिल दे बैठे, गम पहले से ही कम तो ना थे, एक और मुसीबत ले बैठे " बहोत से ब्रजवासी जन आये और बोले बाबा हम सुलझा देवे तेरी जटाए तो बाबा ने सबको डांट के भगा दिया और कहा की जिसने उलझाई वोही आएगा अब तो सुलझाने। बहोत समय हो गया बाबा को बैठे बैठे...... "तुम आते नहीं मनमोहन क्यों इतना हमको तडपाते हो क्यों । प्राण पखेरू लगे उड़ने, तुम हाय अभी शर्माते हो क्यों।" तभी सामने से 15-16 वर्ष का सुन्दर किशोर हाथ में लकुटी लिए आता हुआ दिखा। जिसकी मतवाली चाल देखकर करोडो काम लजा जाएँ। मुखमंडल करोडो सूर्यो के जितना चमक रहा था। और चेहरे पे प्रेमिओ के हिर्दय को चीर देने वाली मुस्कान थी। आते ही बाबा से बोले बाबा हमहूँ सुलझा दें तेरी जटा। बाबा बोले आप कोन हैं श्रीमान जी? तो ठाकुर जी बोले हम है आपके कुञ्ज बिहारी। तो बाबा बोले हम तो किसी कुञ्ज बिहारी को नहीं जानते। तो भगवान् फिर आये थोड़ी देर में और बोले बाबा अब सुलझा दें। तो बाबा बोले अब कोन है श्रीमान जी । तो ठाकुर बोले हम हैं निकुंज बिहारी। तो बाबा बोले हम तो किसी निकुंज बिहारी को नहीं जानते। तो ठाकुर जी बोले तो बाबा किसको जानते हो बताओ? तो बाबा बोले हम तो निभृत निकुंज बिहारी को जानते हैं। तो भगवान् ने तुरंत निभृत निकुंज बिहारी का स्वरुप बना लिया। ले बाबा अब सुलझा दूँ। तब बाबा बोले च्यों रे लाला हमहूँ पागल बनावे लग्यो! निभृत निकुंज बिहारी तो बिना श्री राधा जू के एक पल भी ना रह पावे और एक तू है अकेलो सोटा सो खड्यो है। तभी पीछे से मधुर रसीली आवाज आई बाबा हम यही हैं। ये थी हमारी श्री जी। और श्री जी बोली अब सुलझा देवे बाबा आपकी जटा। तो बाबा मस्ती में आके बोले लाडली जू आपका दर्शन पा लिया अब ये जीवन ही सुलझ गया जटा की क्या बात है। ।। लाडली जी की जय हो ।।

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जय श्री राधे... #मित्र_सप्तमी... #कथा_एवं_महात्म्य... #नेत्र_एवं_चर्म_रोग_से_मुक्ति... #3_दिसम्बर... मित्र सप्तमी का त्यौहार मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की सप्तमी के दिन मनाया जाता है। सूर्य देव की पूजा का पर्व सूर्य सप्तमी एक प्रमुख हिन्दू पर्व है। सूर्य भगवान ने अनेक नाम हैं जिनमें से उन्हें मित्र नाम से भी संबोधित किया जाता है, अत: इस दिन सप्तमी को मित्र सप्तमी के नाम से जाना जाता है. इस दिन भास्कर भगवान की पूजा-उपासना की जाती है। भगवान सूर्य की आराधना करते हुए लोग गंगा-यमुना या किसी भी पवित्र नदी या पोखर के किनारे सूर्य देव को जल देते हैं। #मित्र_सप्तमी_पौराणिक_महत्व सूर्य देव को महर्षि कश्यप और अदिति का पुत्र कहा गया है। इनके जन्म के विषय में कहा जाता है कि एक समय दैत्यों का प्रभुत्व खूब बढ़ने के कारण स्वर्ग पर दैत्यों का अधिपत्य स्थापित हो जाता है। देवों के दुर्दशा देखकर देव-माता अदिति भगवान सूर्य की उपासना करती हैं। आदिति की तपस्या से प्रसन्न हो भगवान सूर्य उन्हें वरदान देते हैं कि वह उनके पुत्र रूप में जन्म लेंगे तथा उनके देवों की रक्षा करेंगे। इस प्रकार भगवान के कथन अनुसार कुछ देवी अदिति के गर्भ से भगवान सूर्य का जन्म होता है। वह देवताओं के नायक बनते हैं और असुरों को परास्त कर देवों का प्रभुत्व कायम करते हैं। नारद जी के कथन अनुसार जो व्यक्ति मित्र सप्तमी का व्रत करता है तथा अपने पापों की क्षमा मांगता है सूर्य भगवान उससे प्रसन्न हो उसे पुन: नेत्र ज्योति प्रदान करते हैं। इस प्रकार यह मित्र सप्तमी पर्व सभी सुखों को प्रदान करने वाला व्रत है। #नेत्र_चर्म_रोग_से_मुक्ति_दिलाता_है_यह_व्रत #पूजन_विधि... सूर्य भगवान का षोडशोपचार पजन करते हैं। पूजा में फल, विभिन्न प्रकार के पकवान एवं मिष्ठान को शामिल किया जाता है। सप्तमी को फलाहार करके अष्टमी को मिष्ठान ग्रहण करते हुए व्रत पारण करें। इस व्रत को करने से आरोग्य व आयु की प्राप्ति होती है। इस दिन सूर्य की किरणों को अवश्य ग्रहण करना चाहिए। पूजन और अर्घ्य देने के समय सूर्य की किरणें अवश्य देखनी चाहिए। #श्रीसूर्य_नारायण_भगवान_की_जय...☺️ जय श्री राधे... जय श्री हरिदास...

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