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लोक रीति एवं वैष्णव रीति यह दोनों परस्पर विरोधी या विपरीत है। अच्छे कपड़े पहनना, अच्छा भोजन करना यह लोक रीति है । जो जितना अच्छा पहनता है और जितना अच्छा खाता है वह लौकिक रूप से उतना ही प्रतिष्ठित होता है एवं वैष्णव रीति में भालो ना खाईबो भालो न पहरबो । अर्थात जो वैष्णव जितना कम अच्छा खाता है जितना कम अच्छा पहनता है वह उतना ही श्रेष्ठ वैष्णव होता है । इससे सिद्ध होता है कि प्रेम नदिया की सदा उल्टी बहे धार । मैंने ऐसे अनेक परिवार देखे हैं जो दिल्ली अमृतसर लुधियाना चंडीगढ़ आदि को छोड़कर लोक रीति से भागकर धाम में वैष्णव रीति को अपनाने के लिए आते हैं, लेकिन वाह भाई वाह यहां आने पर भी वे वैष्णव रीति को भूल कर लोक रीति से जीवन जीने के लिए निर्णय लेते हैं यहां आकर भी वह एक अच्छा घर अच्छे वस्त्र अच्छा भोजन बच्चों की अच्छी पढ़ाई अच्छी आमदनी अच्छा दिखना शुरू कर देते हैं । अच्छा फ्लेट, अच्छे बेड, लेटेस्ट इंटीरियर में फस जाते हैं ,लोक रीति में फंस जाते हैं उनसे पूछा जाए कि यदि लोक रीति में ही रहना था तो यहां आए क्यों । हमें सावधान होकर यहां वैष्णव रीति वाले निर्णय ही लेनी चाहिए और यह सदा ध्यान रखना होगा कि वैष्णव रीति लोक रीति की उल्टी होती है क्योंकि प्रेम नदिया की सदा उल्टी बहे धार यदि हम सही निर्णय नहीं ले पाए तो ना हम लोक में सम्मान या शांति पाते हैं और ना वैष्णव जगत में वैष्णव रीति को प्राप्त कर पाते हैं और अधकचरे होकर इधर-उधर भटकते रह जाते हैं ईसलिए सावधान । निर्णय करिए हमें लोक रीति से जीना है या हमें वैष्णव रीति से जीना है । खिचड़ी मत पकाइये । जय श्री राधे जय निताई दासाभास का सादर प्रणाम

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