अध्यात्म ज्ञान धारण करने का तत्व है हम जितना अध्यात्म को धारण करते जाएंगे उतना ज्यादा ईश्वर का और सत्य का अनुभव करते जाएंगे बिना धारण किए हुए यह ज्ञान हमारे किसी काम का नहीं है ? जैसे ठंड का महीना चल रहा है हमें ठंडी भी खूब लग रही है और हम कंबल का खूब बखान करें कंबल इतना होता है मोटा होता है बहुत गर्म करता है कंबल उड़ने वाले को ठंड नहीं लगता है कंबल में हाथ पैर साहब सीमेट लेते हैं कंबल का कितना भी बखान कर ले जब तक हम उस कंबल को अपने शरीर पर धारण नहीं करेंगे तब तक उस कंबल का कितना भी बखान कर ले वह हमारे किसी काम का होता नहीं है ठीक उसी प्रकार से ज्ञान जब तक धारण न किया जाए हमारे किसी काम का नहीं है, कंबल को शरीर पर धारण किया जाता है , और ज्ञान को हमारे अंतःकरण पर ज्ञान रूपी प्रकाश धीरे-धीरे अंतः करण को नया प्रकाश देकर अंधकार रूपी अज्ञान को नष्ट कर देता है जिससे जीवन की सत्यता और सार्थकता का अनुभव होता है ? इसलिए महापुरुषों ने कहा है बाहर से कितना भी ज्ञान ले लो वह ज्ञान जब तक हमारे अंतःकरण में प्रकट नहीं होगा तब तक बाहरी ज्ञान से काम चलेगा नहीं मनुष्य जीवन के कल्याण के लिए ज्ञान को अंतःकरण में धारण करना ही पड़ेगा

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एक बार वृन्दावन में एक संत हुए कदम्खंडी जी महाराज। उनकी बड़ी बड़ी जटाएं थी। वो वृन्दावन के सघन वन में जाके भजन करते थे। एक दिन जा रहे थे तो रास्ते में उनकी बड़ी बड़ी जटाए झाडियो में उलझ गई। उन्होंने खूब प्रयत्न किया किन्तु सफल नहीं हो पाए। और थक के वही बैठ गए और बैठे बैठे गुनगुनाने लगे। "हे मुरलीधर छलिया मोहन हम भी तुमको दिल दे बैठे, गम पहले से ही कम तो ना थे, एक और मुसीबत ले बैठे " बहोत से ब्रजवासी जन आये और बोले बाबा हम सुलझा देवे तेरी जटाए तो बाबा ने सबको डांट के भगा दिया और कहा की जिसने उलझाई वोही आएगा अब तो सुलझाने। बहोत समय हो गया बाबा को बैठे बैठे...... "तुम आते नहीं मनमोहन क्यों इतना हमको तडपाते हो क्यों । प्राण पखेरू लगे उड़ने, तुम हाय अभी शर्माते हो क्यों।" तभी सामने से 15-16 वर्ष का सुन्दर किशोर हाथ में लकुटी लिए आता हुआ दिखा। जिसकी मतवाली चाल देखकर करोडो काम लजा जाएँ। मुखमंडल करोडो सूर्यो के जितना चमक रहा था। और चेहरे पे प्रेमिओ के हिर्दय को चीर देने वाली मुस्कान थी। आते ही बाबा से बोले बाबा हमहूँ सुलझा दें तेरी जटा। बाबा बोले आप कोन हैं श्रीमान जी? तो ठाकुर जी बोले हम है आपके कुञ्ज बिहारी। तो बाबा बोले हम तो किसी कुञ्ज बिहारी को नहीं जानते। तो भगवान् फिर आये थोड़ी देर में और बोले बाबा अब सुलझा दें। तो बाबा बोले अब कोन है श्रीमान जी । तो ठाकुर बोले हम हैं निकुंज बिहारी। तो बाबा बोले हम तो किसी निकुंज बिहारी को नहीं जानते। तो ठाकुर जी बोले तो बाबा किसको जानते हो बताओ? तो बाबा बोले हम तो निभृत निकुंज बिहारी को जानते हैं। तो भगवान् ने तुरंत निभृत निकुंज बिहारी का स्वरुप बना लिया। ले बाबा अब सुलझा दूँ। तब बाबा बोले च्यों रे लाला हमहूँ पागल बनावे लग्यो! निभृत निकुंज बिहारी तो बिना श्री राधा जू के एक पल भी ना रह पावे और एक तू है अकेलो सोटा सो खड्यो है। तभी पीछे से मधुर रसीली आवाज आई बाबा हम यही हैं। ये थी हमारी श्री जी। और श्री जी बोली अब सुलझा देवे बाबा आपकी जटा। तो बाबा मस्ती में आके बोले लाडली जू आपका दर्शन पा लिया अब ये जीवन ही सुलझ गया जटा की क्या बात है। ।। लाडली जी की जय हो ।।

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जय श्री राधे... #मित्र_सप्तमी... #कथा_एवं_महात्म्य... #नेत्र_एवं_चर्म_रोग_से_मुक्ति... #3_दिसम्बर... मित्र सप्तमी का त्यौहार मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की सप्तमी के दिन मनाया जाता है। सूर्य देव की पूजा का पर्व सूर्य सप्तमी एक प्रमुख हिन्दू पर्व है। सूर्य भगवान ने अनेक नाम हैं जिनमें से उन्हें मित्र नाम से भी संबोधित किया जाता है, अत: इस दिन सप्तमी को मित्र सप्तमी के नाम से जाना जाता है. इस दिन भास्कर भगवान की पूजा-उपासना की जाती है। भगवान सूर्य की आराधना करते हुए लोग गंगा-यमुना या किसी भी पवित्र नदी या पोखर के किनारे सूर्य देव को जल देते हैं। #मित्र_सप्तमी_पौराणिक_महत्व सूर्य देव को महर्षि कश्यप और अदिति का पुत्र कहा गया है। इनके जन्म के विषय में कहा जाता है कि एक समय दैत्यों का प्रभुत्व खूब बढ़ने के कारण स्वर्ग पर दैत्यों का अधिपत्य स्थापित हो जाता है। देवों के दुर्दशा देखकर देव-माता अदिति भगवान सूर्य की उपासना करती हैं। आदिति की तपस्या से प्रसन्न हो भगवान सूर्य उन्हें वरदान देते हैं कि वह उनके पुत्र रूप में जन्म लेंगे तथा उनके देवों की रक्षा करेंगे। इस प्रकार भगवान के कथन अनुसार कुछ देवी अदिति के गर्भ से भगवान सूर्य का जन्म होता है। वह देवताओं के नायक बनते हैं और असुरों को परास्त कर देवों का प्रभुत्व कायम करते हैं। नारद जी के कथन अनुसार जो व्यक्ति मित्र सप्तमी का व्रत करता है तथा अपने पापों की क्षमा मांगता है सूर्य भगवान उससे प्रसन्न हो उसे पुन: नेत्र ज्योति प्रदान करते हैं। इस प्रकार यह मित्र सप्तमी पर्व सभी सुखों को प्रदान करने वाला व्रत है। #नेत्र_चर्म_रोग_से_मुक्ति_दिलाता_है_यह_व्रत #पूजन_विधि... सूर्य भगवान का षोडशोपचार पजन करते हैं। पूजा में फल, विभिन्न प्रकार के पकवान एवं मिष्ठान को शामिल किया जाता है। सप्तमी को फलाहार करके अष्टमी को मिष्ठान ग्रहण करते हुए व्रत पारण करें। इस व्रत को करने से आरोग्य व आयु की प्राप्ति होती है। इस दिन सूर्य की किरणों को अवश्य ग्रहण करना चाहिए। पूजन और अर्घ्य देने के समय सूर्य की किरणें अवश्य देखनी चाहिए। #श्रीसूर्य_नारायण_भगवान_की_जय...☺️ जय श्री राधे... जय श्री हरिदास...

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माल्यहारिणी कुण्ड........ एक समय कार्तिक माह में गिरिराज गोवर्द्धन में दीपावली महोत्सव के अवसर पर ब्रजवासी अपनी–अपनी गायों आदि को विविध प्रकार की वेषभूषाओं से सुसज्जित करने में संलग्न थे. गोपियाँ भी अपने–अपने घर से विविध प्रकार की वेषभूषा लाकर गौओं को भूषित कर रही थीं. श्रीराधिका जी भी सहेलियों के साथ माल्यहारिणी कुण्ड के निकट माधवी चबूतरे पर बैठकर सुन्दर–सुन्दर मुक्ताओं से नाना प्रकार के भूषण प्रस्तुत करने लगीं. इसी बीच विचक्षण नामक शुक पक्षी के मुख से श्रीराधिकाजी द्वारा मुक्ता द्वारा विविध प्रकार के श्रृग्ङारों के बनाये जाने की बात सुनकर श्रीकृष्ण श्रीराधिका जी के पास उपस्थित हुए ! और उनसे कुछ मुक्ता माँगे किन्तु श्रीराधिका जी तथा उनकी सहेली गोपियों ने गर्व पूर्वक दो-चार बातें सुनाकर मुक्ता देने के लिए निषेध कर दिया. फिर भी श्रीकृष्ण ने कहा– 'सखियों!' यदि तुम अधिक संख्या में मुक्ता नहीं दे सकती हो, तो थोड़े से ही मुक्ता दे दो, जिससे मैं अपनी प्यारी हंसिनी और हरिणी नामक गौओं का श्रंगार कर सकूँ. परन्तु हठीली गोपियों ने श्रीकृष्ण की इस प्रार्थना को भी अस्वीकार कर दिया. ललिताजी तो कुछ उत्तम -उत्तम मुक्ताओं को हाथों में लेकर श्रीकृष्ण को दिखलाती हुई कहने लगी– कृष्ण! ये मुक्ताएँ साधारण नहीं हैं, जिनसे तुम अपनी गायों का श्रृंगार कर सको, ये बड़ी मूल्यवान मुक्ताएँ हैं, समझे? श्रीकृष्ण निराश होकर घर लौट आये. उन्होंने मैया यशोदा से हठपूर्वक कुछ मुक्ता लेकर यमुना के पनघट के समीप ही ज़मीन को खोद खोदकर उसमें उन मुक्ताओं को रोप दिया. उस स्थान को चारों ओर से इस प्रकार घेर दिया, जिससे पौधे निकलने पर उसे पशु-पक्षी नष्ट नहीं कर सकें, श्रीकृष्ण प्रतिदिन प्रचुर गो दुग्ध से उस खेत की सिंचाई भी करने लगे. इसके लिए उन्होंने गोपियों से दूध भी माँगा, परंतु उन्होंने उसके लिए भी अस्वीकार कर दिया. बड़े आश्चर्य की बात हुई– दो-चार दिनों में ही उन सारी मुक्ताओं में अंकुर लग गये तथा देखते-देखते कुछ ही दिनों में पौधे बड़े हो गये तथा उनमें प्रचुर मुक्ताओं के फल लग गये. उनसे अत्यन्त सुन्दर-सुन्दर प्रचुर मात्रायें मुक्ताएँ भी निकलने लगी. यमुना जल भरने के लिए पनघट पर आती-जाती हुई गोपियों ने इस आश्चर्चजनक मुक्ता के खेत को मुक्ताओं से भरे हुए देखा. वे आपस में काना-फूँसी भी करने लगीं. इधर श्रीकृष्ण ने बहुत-सी मुक्ताओं को लाकर बड़ी प्रसन्नतापूर्वक घर लाकर मैया के आँचल में रख दिया. मैया ने आश्चर्यपूर्वक पूछा– कन्हैया! तुम्हें इतनी उत्तम मुक्ताएँ कहाँ से मिलीं. श्रीकृष्ण ने उन्हें सारी बातें बतलायीं. अब श्रीकृष्ण सखाओं के साथ अपनी सारी गौओं का श्रृंगार करने के लिए अगणित मुक्ता मालाएँ बनाने लगे. उनकी गौएँ भी उन मुक्तामालाओं से विभूषित होकर इधर–उधर डोलने लगीं. परंतु गोपियों को यह बात बड़ी असहृय हुई उन्होंने भी अपने-अपने घरों से छिपा-छिपाकर बहुत-सी मुक्ताओं को लेकर श्रीकृष्ण जैसी मुक्ता की खेती की. उसे गौओं के दूध से प्रचुर सिंचन भी किया. उन मुक्ताओं से पौधे भी निकले, किन्तु आश्चर्य की बात यह हुई कि उनसे लता उगने लगीं ऐसा देखकर गोपियाँ बड़ी चिन्तित हुई. उन्होंने सारी घटना सुनाकर श्रीकृष्ण से कुछ मुक्ता के लिए प्रार्थना की. रसिक शिरोमणि श्रीकृष्ण ने अवहेलना पूर्वक मुक्ता देना अस्वीकार कर दिया, परन्तु अन्त में उन मुक्ताओं के बदले उनसे कुछ दान आदि माँगकर उन्हें दिव्य मुक्ता दे दिए इस प्रकार यह रहस्यपूर्ण लीला इस कुण्ड पर सम्पन्न होने के कारण इस कुण्ड का नाम माल्यहारिणी कुण्ड हुआ.

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प्राचीन काळात जालंधर नावाचा राक्षस चारीकडे खूप उत्पात करत होता. राक्षस वीर आणि पराक्रमी होता. त्याच्या साहस असल्यामागे कारण होते त्याच्या पत्नी वृंदा हिचे पतिव्रता धर्म. तिच्या प्रभावामुळे तो सर्वव्यापी होता. परंतू जालंधराच्या या उपद्रवामुळे त्रस्त देवगण प्रभू विष्णूंकडे आले आणि संरक्षणासाठी याचना करू लागले. त्यांची प्रार्थना ऐकून विष्णूने वृंदा हिचे पतिव्रता धर्म भंग करण्याचा निश्चय केला. इकडे वृंदाचे सतीत्व नष्ट झाल्यामुळे देवतांशी युद्ध करत असताना जालंधरचा मृत्यू झाला. वृंदाला ही गोष्ट लक्षात आल्याक्षणी तिने क्रोधित होऊन प्रभू विष्णूंना श्राप दिला की ज्या प्रकारे छळ करून तुम्ही मला पती वियोग दिला आहे त्याचप्रमाणे तुमच्याही पत्नीचा छळपूर्वक हरण होऊन स्त्री वियोग सहन करण्यासाठी तुम्हाला मृत्यू लोकात जन्म घ्यावा लागेल. असे म्हणत वृंदा पतीसोबत सती गेली. ज्या जागी ती सती गेली त्या जागी तुळशीचे झाडं उत्पन्न झाले. एका इतर प्रसंगाप्रमाणे वृंदाने रागात विष्णूंना श्राप दिला की माझे सतीत्व भंग केल्यामुळे तुम्ही दगड व्हाल. त्या दगडाला शालिग्राम म्हणतात. तेव्हा विष्णू म्हणाले की हे वृंदा तुझ्या सतीत्वाचे फल म्हणून तू तुळस बनून माझ्यासोबत राहशील. माझ्यासोबत तुझा विवाह लवणाऱ्यांना पुण्य लाभेल. तेव्हापासून तुळसविना शालिग्राम किंवा विष्णूंची पूजा अपुरी मानली जाते. शालिग्राम आणि तुळशीचा विवाह प्रभू विष्णू आणि महालक्ष्मीच्या विवाहाचे प्रतिकात्मक विवाह आहे. जय श्री कृष्ण जय श्री राधे राधे जय श्री वृंदा जय श्री तुळशी माता की 👣 👏 नमस्कार 🙏 शुभ रात्री वंदन 🚩 🌃⛺🏡🌷🌹👏🚩🙋नमस्कार 🙏 🚩

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