प्राचीन काळात जालंधर नावाचा राक्षस चारीकडे खूप उत्पात करत होता. राक्षस वीर आणि पराक्रमी होता. त्याच्या साहस असल्यामागे कारण होते त्याच्या पत्नी वृंदा हिचे पतिव्रता धर्म. तिच्या प्रभावामुळे तो सर्वव्यापी होता. परंतू जालंधराच्या या उपद्रवामुळे त्रस्त देवगण प्रभू विष्णूंकडे आले आणि संरक्षणासाठी याचना करू लागले. त्यांची प्रार्थना ऐकून विष्णूने वृंदा हिचे पतिव्रता धर्म भंग करण्याचा निश्चय केला. इकडे वृंदाचे सतीत्व नष्ट झाल्यामुळे देवतांशी युद्ध करत असताना जालंधरचा मृत्यू झाला. वृंदाला ही गोष्ट लक्षात आल्याक्षणी तिने क्रोधित होऊन प्रभू विष्णूंना श्राप दिला की ज्या प्रकारे छळ करून तुम्ही मला पती वियोग दिला आहे त्याचप्रमाणे तुमच्याही पत्नीचा छळपूर्वक हरण होऊन स्त्री वियोग सहन करण्यासाठी तुम्हाला मृत्यू लोकात जन्म घ्यावा लागेल. असे म्हणत वृंदा पतीसोबत सती गेली. ज्या जागी ती सती गेली त्या जागी तुळशीचे झाडं उत्पन्न झाले. एका इतर प्रसंगाप्रमाणे वृंदाने रागात विष्णूंना श्राप दिला की माझे सतीत्व भंग केल्यामुळे तुम्ही दगड व्हाल. त्या दगडाला शालिग्राम म्हणतात. तेव्हा विष्णू म्हणाले की हे वृंदा तुझ्या सतीत्वाचे फल म्हणून तू तुळस बनून माझ्यासोबत राहशील. माझ्यासोबत तुझा विवाह लवणाऱ्यांना पुण्य लाभेल. तेव्हापासून तुळसविना शालिग्राम किंवा विष्णूंची पूजा अपुरी मानली जाते. शालिग्राम आणि तुळशीचा विवाह प्रभू विष्णू आणि महालक्ष्मीच्या विवाहाचे प्रतिकात्मक विवाह आहे. जय श्री कृष्ण जय श्री राधे राधे जय श्री वृंदा जय श्री तुळशी माता की 👣 👏 नमस्कार 🙏 शुभ रात्री वंदन 🚩 🌃⛺🏡🌷🌹👏🚩🙋नमस्कार 🙏 🚩

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🌷 *एक भक्त का मान* 🌷 🌅एक पंडितजी थे वो श्रीबांके बिहारी लाल को बहुत मानते थे सुबह-शाम बस ठाकुरजी ठाकुरजी करके व्यतीत होता ... पारिवारिक समस्या के कारण उन्हें धन की आवश्यकता हुई ...तो पंडित जी सेठ जी के पास धन मांगने गये ...सेठ जी धन दे तो दिया पर उस धन को लौटाने की बारह किस्त बांध दी ...पंडितजी को कोई एतराज ना हुआ ...उन्होंने स्वीकृति प्रदान कर दी .... अब धीरे-धीरे पंडितजी ने ११ किस्त भर दीं एक किस्त ना भर सके ...इस पर सेठ जी १२ वीं किस्त के समय निकल जाने पर पूरे धन का मुकद्दमा पंडितजी पर लगा दिया कोर्ट-कचहरी हो गयी ...जज साहब बोले पंडितजी तुम्हारी तरफ से कौन गवाही देगा ....इस पर पंडितजी बोले की मेरे ठाकुर बांकेबिहारी लाल जी गवाही देंगे ...पूरा कोर्ट ठहाकों से भर गया ...अब गवाही की तारीख तय हो गयी ... पंडितजी ने अपनी अर्जी ठाकुरजी के श्रीचरणों में लिखकर रख दी अब गवाही का दिन आया कोर्ट सजा हुआ था वकील, जज अपनी दलीलें पेश कर रहे थे पंडित को ठाकुर पर भरोसा था ... .जज ने कहा पंडित अपने गवाह को बुलाओ पंडित ने ठाकुर जी के चरणों का ध्यान लगाया तभी वहाँ एक वृद्व आया जिसके चेहरे पर मनोरम तेज था उसने आते ही गवाही पंडितजी के पक्ष में दे दी ...वृद्व की दलीलें सेठ के वहीखाते से मेल खाती थीं की फलां- फलां तारीख को किश्तें चुकाई गयीं अब पंडित को ससम्मान रिहा कर दिया गया ...ततपश्चात जज साहब पंडित से बोले की ये वृद्व जन कौन थे जो गवाही देकर चले गये ....तो पंडित बोला अरे जज साहब यही तो मेरा ठाकुर था ..... जो भक्त की दुविधा देख ना सका और भरोसे की लाज बचाने आ गया ...इतना सुनना था की जज पंडित जी के चरणों में लेट गया ..... और ठाकुर जी का पता पूछा ...पंडित बोला मेरा ठाकुर तो सर्वत्र है वो हर जगह है अब जज ने घरबार काम धंधा सब छोङ ठाकुर को ढूंढने निकल पङा ...सालों बीत गये पर ठाकुर ना मिला ... अब जज पागल सा मैला कुचैला हो गया वह भंडारों में जाता पत्तलों पर से जुठन उठाता ...उसमें से आधा जूठन ठाकुर जी मूर्ति को अर्पित करता आधा खुद खाता ...इसे देख कर लोग उसके खिलाफ हो गये उसे मारते पीटते ....पर वो ना सुधरा जूठन बटोर कर खाता और खिलाता रहा ... एक भंडारे में लोगों ने अपनी पत्तलों में कुछ ना छोङा ताकी ये पागल ठाकुरजी को जूठन ना खिला सके पर उसने फिर भी सभी पत्तलों को पोंछ-पाछकर एक निवाल इकट्ठा किया और अपने मुख में डाल लिया .... पर अरे ये क्या वो ठाकुर को खिलाना तो भूल ही गया अब क्या करे उसने वो निवाला अन्दर ना सटका की पहले मैं खा लूंगा तो ठाकुर का अपमान हो जायेगा और थूका तो अन्न का अपमान होगा .... करे तो क्या करें निवाल मुँह में लेकर ठाकुर जी के चरणों का ध्यान लगा रहा था की एक सुंदर ललाट चेहरा लिये बाल-गोपाल स्वरूप में बच्चा पागल जज के पास आया और बोला क्यों जज साहब आज मेरा भोजन कहाँ है जज साहब मन ही मन गोपाल छवि निहारते हुये अश्रू धारा के साथ बोले ठाकुर बङी गलती हुई आज जो पहले तुझे भोजन ना करा सका ... पर अब क्या करुं ...? तो मन मोहन ठाकुर जी मुस्करा के बोले अरे जज तू तो निरा पागल हो गया है रे जब से अब तक मुझे दूसरों का जूठन खिलाता रहा ... आज अपना जूठन खिलाने में इतना संकोच चल निकाल निवाले को आज तेरी जूठन सही ... जज की आंखों से अविरल धारा निकल पङी जो रुकने का नाम ना ले रही और मेरा ठाकुर मेरा ठाकुर कहता-कहता बाल गोपाल के श्रीचरणों में गिर पङा और वहीं देह का त्याग कर दिया .... और मित्रों वो पागल जज कोई और नहीं वही (पागल बाबा) थे जिनका विशाल मंदिर आज वृन्दावन में स्थित है.. भाव के भूखें हैं प्रभू और भाव ही एक सार है ... और भावना से जो भजे तो भव से बेङा पार है ... 🙏🏻 *वृन्दावन बिहारी लाल की जय* 💐 💖 *जय जय राधे रमण...* ♥ ☘ *हरि बोल......* ☘ 🌹 *हरि बोल.....* 🙏🏻🌹 🌹 *༺꧁ Զเधॆ कृष्णा जी ꧂༻*🙏🏻

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"Krishna Janmashtami 2019 : इस वजह से भगवान श्री कृष्ण ने शनिदेव को नहीं आने दिया गोकुल श्री कृष्ण जन्माष्टमी के शुभ अवसर पर जानिए भगवान श्री कृष्ण ने शनिदेव को गोकुल में आने से क्यों रोका था ? दरअसल शनिदेव भगवान श्री कृष्ण के परम भक्त थे, सभी देवों के दर्शनों के बाद शनिदेव भी भगवान श्री कृष्ण के दर्शनों के लिए पहुंचे, लेकिन भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें गोकुल के द्वार पर रोक दिया क्योंकि... Janmashtami 2019 भगवान श्री कृष्ण ने सिर्फ एक वजह से शनिदेव को गोकुल में प्रवेश नहीं करने दिया। जन्माष्टमी के इस मौके पर आज हम आपको भगवान श्री कृष्ण (Shri Krishna) और शनिदेव के बारे में बताने जा रहे हैं। जन्माष्टमी (Janmashtami) इस साल 2019 में 24 अगस्त 2019 के दिन मनाई जाएगी। भगवान श्री कृष्ण के जन्म के बाद सभी देवताओं ने भगवान श्री कृष्ण के दर्शन किए थे। लेकिन शनिदेव को ही भगवान श्री कृष्ण के दर्शन की आज्ञा नहीं मिली थी। तो आइए ऐसी क्या वजह थी जिसके कारण भगवान श्री कृष्ण ने शनिदेव को गोकुल में नहीं आने दिया था भगवान श्री कृष्ण ने शनिदेव को क्यों नहीं करने दिया गोकुल में प्रवेश जिस समय भगवान कृष्ण ने द्वापर युग में कंस के अंत के लिए जन्म लिया था। उस समय वासुदेव भगवान श्री कृष्ण को नंद के यहां छोड़े आए थे। भगवान श्री कृष्ण का स्वरूप ऐसा था कि सभी देवता उनके दर्शन करने के लिए भेष बदलकर भगवान श्री कृष्ण के दर्शनों के लिए जा रहे थे। ऐसे में शनि देव की भी प्रबल इच्छा हुई कि वह भी भगवान श्री कृष्ण के दर्शन करें। शनिदेव भी अपने आराध्य भगवान के दर्शनों के लिए उत्सुक थे। लेकिन भगवान श्री कृष्ण की व्रक दृष्टि होने के कारण उन्हें गोकुल में प्रवेश करने से मना दिया। जिसके बाद शनिदेव को अत्यंत दुख हुआ। क्योंकि वे भगवान श्री कृष्ण के भक्त थे। जब भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें दर्शन नहीं दिए तो शनि देव मन ही मन सोचने लगे कि आखिर उन्होंने ऐसा क्या गलती कि है। जिसकी वजह से उनके आराध्य देव उनसे नाराज़ हो गए। जिसके बाद शनिदेव नंदगांव के बाहर ही जंगल में जाकर तपस्या करने लगे। भगवान श्री कृष्ण भी अपने भक्त की पुकार सुनकर रह नहीं पाए। वह एक कोयल का रूप रखकर शनिदेव के पास पहुंचे और शनिदेव को दर्शन दिए भगवान श्री कृष्ण ने शनिदेव से कहा- हे शनिदेव! आप तो न्यायधीश हैं। आपके द्वारा ही पापियों, अत्याचारियों को दंड दिया जाता है ताकि धर्म की रक्षा हो सके। आप ही सज्जन, सतपुरुषों, को न्याय दिलाने वालें हैं। आप तो एक पिता की तरह से जो अपनी उददंड संतान को दंड देकर सही मार्ग दिखाता है। इसलिए हे शनिदेव! मैं चाहता हुं कि आप आप मेरे इस प्रिय गोकुल धाम की सदैव रक्षा करें और यहां के प्राणियों पर कभी भी अपनी व्रक दृष्टि न डालें। आप यहीं पर निवास करें। क्योंकि आप पापियों को दंड देने में सशक्त और सक्षम और कर्तव्य परायण हैं। इसलिए मैं चाहता हुं कि आप मेरे साथ यहीं पर निवास करें। मैं आपसे यहां कोयल के रूप में मिला हूं। इसलिए आज से यह स्थान कोकिलावन के नाम से जाना जाएगा। जहां कोयल के मधुर स्वर हमेशा गूंजेंगे। आप यहां प्रत्येक प्राणी का अपनी वक्र दृष्टि से बचाव करें क्योंकि यहां रहने वाला प्रत्येक प्राणी आपके साथ- साथ मेरी भी कृपा का पात्र है। कोकिला वन के बारे में गरूड़ पुराण और नारद पुराण में भी बताया गया है। माना जाता है। कि इस मंदिर में आकर शनिदेव और भगवान श्री कृष्ण के दर्शन करने से साढ़ेसाती और शनि की ढैय्या हमेशा के लिए समाप्त हो जाती है। जय श्री कृष्ण जय श्री राधे राधे नमस्कार 🙏 शुभ रात्री वंदन 👣 नमस्कार 🙏 जन्माष्टमी स्पेशल मै जल्द आ रहा हूँ जल्लोष की तय्यारी करो

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