🚩🌿🌹ॐ शनिदेवाय नमः🌹🌿🚩 🎎पुराणों में शनि की महिमा🎎 🌸शनि ग्रह के बारे में रोचक जानकरी🌸 🚩पुराणों में शनि 🚩 इतिहास-पुराणों में शनि की महिमा बिखरी पड़ी है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में कहा गया है कि गणेशजी का जन्म होने पर सभी ग्रह उनका दर्शन करने के लिए कैलाश पर्वत पर पहुँचे। जैसे ही शनि ने आख़िर में भगवान गणेश के चेहरे पर नज़र डाली, उनका मस्तक कट कर धरती पर गिर गया। बाद में हाथी का सिर उनके धड़ पर लगाकर बालक गणेश को जीवित किया गया। शास्त्रों की यही बातें ज्योतिष में भी प्रतिबिम्बित होती हैं। ज्योतिष में शनि को ठण्डा ग्रह माना गया है, जो बीमारी, शोक और आलस्य का कारक है। लेकिन यदि शनि शुभ हो तो वह कर्म की दशा को लाभ की ओर मोड़ने वाला और ध्यान व मोक्ष प्रदान करने वाला है। साथ ही वह कैरियर को ऊँचाईयों पर ले जाता है। लोगों में शनि को लेकर कई तरह की भ्रांतियाँ हैं। बहुत-से लोगों का मानना है कि शनि देव का काम सिर्फ़ परेशानियाँ देना और लोगों के कामों में विघ्न पैदा करना ही है। लेकिन शास्त्रों के अनुसार शनि देव परीक्षा लेने के लिए एक तरफ़ जहाँ बाधाएँ खड़ी करते हैं, वहीं दूसरी ओर प्रसन्न होने पर वे सबसे बड़े हितैशी भी साबित होते हैं। वास्तुशास्त्री सूर्य पुत्र शनि देव का नाम सुनकर लोग सहम से जाते है लेकिन ऐसा कुछ नहीं है ,बेसक शनि देव की गिनती अशुभ ग्रहों में होती है लेकिन शनि देव इन्शान के कर्मो के अनुसार ही फल देते है , शनि बुरे कर्मो का दंड भी देते है। शनि उच्च राशी तुला में प्रवेश कर रहे है , जिनकी कुंडली में शनि तुला राशी गत है जिस भाव में बैठा है उस भाव सम्बन्धी कार्यों में वृद्धि करेगा जब शनि तुला राशी में सूर्य के साथ युति होने के कारण राजनितिक लोंगे के लिए अशुभ फल देगा , वाद-विवाद में बढ़ोत्तरी होगी , धातु की बढ़ोत्तरी होगी , भारतीय राजनीती में बहुत ज्यादा उतर चढाव देखने को मिलेगा , जिनका शनि अच्चा होगा भिखारी से राजा बन जायेगा और जिनका अशुभ होगा राजा से भिखारी बनते देर नहीं लगेगी , जिनकी कुंडली में शनि तुला राशी गत है जिस भाव में बैठा है उस भाव सम्बन्धी कार्यों में वृद्धि करेगा , यदि शनि लग्न , केंद्र या त्रिकोण में है या अपनी उच्च राशी में स्वग्रही या मित्र राशी में है तो अपनी दशा अन्तर्दशा में शुभ फल प्रदान करेगा , मानसगरी ग्रन्थ के अनुसार शनि देव के शुक्र बुध मित्र. बृहस्पति सम. शेष शत्रु हैं ! नीलांजनं समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्। छायामार्तण्ड संभूतं तं नमामि शनैश्चरम्॥ ऊँ शत्रोदेवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये।शंयोभिरत्रवन्तु नः। ऊँ शं शनैश्चराय नमः। ऊँ नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्।, छायामार्तण्डसम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम्। 🎡शनि की उत्पत्ति का पौराणिक वृत्तांत 🎡 🌋महर्षि कश्यप का विवाह🌋 प्रजापति दक्ष की कन्या अदिति से हुआ जिसके गर्भ से विवस्वान (सूर्य ) का जन्म हुआ | सूर्य का विवाह त्वष्टा की पुत्री संज्ञा से हुआ | सूर्य व संज्ञा के संयोग से वैवस्वत मनु व यम दो पुत्र तथा यमुना नाम की कन्या का जन्म हुआ | संज्ञा अपने पति के अमित तेज से संतप्त रहती थी |सूर्य के तेज को अधिक समय तक सहन न कर पाने पर उसने अपनी छाया को अपने ही समान बना कर सूर्य के पास छोड़ दिया और स्वयम पिता के घर आ गयी | पिता त्वष्टा को यह व्यवहार उचित नहीं लगा और उन्हों ने संज्ञा को पुनः सूर्य के पास जाने का आदेश दिया | संज्ञा ने पिता के आदेश की अवहेलना की और घोड़ी का रूप बना कर कुरु प्रदेश के वनों में जा कर रहने लगी | इधर सूर्य संज्ञा की छाया को ही संज्ञा समझते रहे | कालान्तर में संज्ञा के गर्भ से भी सावर्णि मनु और शनि दो पुत्रों का जन्म हुआ | छाया शनि से बहुत स्नेह करती थी और संज्ञा पुत्र वैवस्वत मनु व यम से कम | एक बार बालक यम ने खेल खेल में छाया को अपना चरण दिखाया तो उसे क्रोध आ गया और उसने यम को चरण हीन होने का शाप दे दिया | बालक यम ने डर कर पिता को इस विषय में बताया तो उन्हों ने शाप का परिहार बता दिया और छाया संज्ञा से बालकों के बीच भेद भाव पूर्ण व्यवहार करने का कारण पूछा | सूर्य के भय से छाया संज्ञा ने सम्पूर्ण सत्य प्रगट कर दिया | संज्ञा के इस व्यवहार से क्रोधित हो कर सूर्य अपनी ससुराल में गए | ससुर त्वष्टा ने समझा बुझा कर अपने दामाद को शांत किया और कहा –“ आदित्य ! आपका तेज सहन न कर सकने के कारण ही संज्ञा ने यह अपराध किया है और घोड़ी के रूप में वन में भ्रमण कर रही है | आप उसके इस अपराध को क्षमा करें और मुझे अनुमति दें की मैं आपके तेज को काट छांट कर सहनीय व मनोहर बना दूँ |अनुमति मिलने पर त्वष्टा ने सूर्य के तेज को काट छांट दिया और विश्वकर्मा ने उस छीलन से भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र का निर्माण किया |मनोहर रूप हो जाने पर सूर्य संज्ञा को ले कर अपने स्थान पर आ गए | बाद में संज्ञा ने नासत्य और दस्र नामक अश्वनी कुमारों को जन्म दिया | यम की घोर तपस्या से प्रसन्न हो कर महादेव ने उन्हें पितरों का आधिपत्य दिया और धर्म अधर्म के निर्णय करने का अधिकारी बनाया |यमुना व ताप्ती नदी के रूप में प्रवाहित हुई | शनि को नव ग्रह मंडल में स्थान दिया गया | शनिदेव को ग्रहत्व कि प्राप्ति स्कन्द पुराण में काशी खण्ड में वृतांत है कि छाया सुत शनिदेव ने अपने पिता भगवान सूर्य से प्रार्थना की कि मै ऐसा पद प्राप्त करना चाहता हूँ जिसे आज तक किसी ने प्राप्त न किया हो, आपके मंडल से मेरा मंडल सात गुना बडा हो और मेरे वेग का कोई सामना नही कर पाये चाहे वह देव,असुर,दानव, ही क्यों न हो | शनिदेव की यह बात सुन कर भगवान सूर्य प्रसन्न हुए और उत्तर दिया कि इसके लिये उसे काशी जा कर भगवान शंकर कि आराधना करनी चाहिए | शनि देव ने पिता की आज्ञानुसार वैसा ही किया और शिव ने प्रसन्न हो कर शनि को ग्रहत्व प्रदान कर नव ग्रह मंडल में स्थान दिया | शनि की क्रूर दृष्टि का रहस्य ब्रह्म पुराण के अनुसार शनि देव बाल्य अवस्था से ही भगवान विष्णु के परम भक्त थे |हर समय उन के ही ध्यान में मग्न रहते थे | विवाह योग्य आयु होने पर इनका विवाह चित्ररथ की कन्या से संपन्न हुआ |इनकी पत्नी भी साध्वी एवम तेजस्विनी थी | एक बार वह पुत्र प्राप्ति की कामना से शनिदेव के निकट आई | उस समय शनि ध्यान मग्न थे अतः उन्हों ने अपनी पत्नी की ओर दृष्टिपात तक नहीं किया |लंबी प्रतीक्षा के बाद भी जब शनि का ध्यान भंग नहीं हुआ तो वह ऋतुकाल निष्फल हो जाने के कारण से क्रोधित हो गयी और शनि को शाप दे दिया कि – अब से तुम जिस पर भी दृष्टिपात करोगे वह नष्ट हो जाएगा |तभी से शनि कि दृष्टि को क्रूर व अशुभ समझा जाता है | शनि भी सदैव अपनी दृष्टि नीचे ही रखते हैं ताकि उनके द्वारा किसी का अनिष्ट न हो |फलित ज्योतिष में भी शनि कि दृष्टि को अमंगलकारी कहा गया है | ब्रह्मवैवर्त पुराण में भी शनि कि क्रूर दृष्टि का वर्णन है | गौरी नंदन गणेश के जन्मोत्सव पर शनि बालक के दर्शन कि अभिलाषा से गए |मस्तक झुका कर बंद नेत्रों से माता पार्वती के चरणों में प्रणाम किया , शिशु गणेश माता कि गोद में ही थे | माँ पार्वती ने शनि को आशीष देते हुए प्रश्न किया ,” हे शनि देव ! आप गणेश को देख नहीं रहे हो इसका क्या कारण है |” शनि ने उत्तर दिया –“ माता ! मेरी सहधर्मिणी का शाप है कि मैं जिसे भी देखूंगा उसका अनिष्ट होगा ,इसलिए मैं अपनी दृष्टि नीचे ही रखता हूँ | “ पार्वती ने सत्य को जान कर भी दैववश शनि को बालक को देखने का आदेश दिया | धर्म को साक्षी मान कर शनि ने वाम नेत्र के कोने से बालक गणेश पर दृष्टिपात किया | शनि दृष्टि पड़ते ही गणेश का मस्तक धड से अलग हो कर गोलोक में चला गया | बाद में श्री हरि ने एक गज शिशु का मस्तक गणेश के धड से जोड़ा और उस में प्राणों का संचार किया |तभी से गणेश गजानन नाम से प्रसिद्ध हुए | 🌷शनि का शाकटभेद योग🌷 पद्म पुराण के अनुसार पूर्वकाल में जब शनि गोचर वश कृतिका नक्षत्र के अंतिम अंशों में पहुंचे तो विद्वान दैवज्ञों ने रघुकुल भूषण राजा दशरथ को सावधान किया कि शनि रोहिणी का भेदन करके आगे बढ़ने वाले हैं जिस से शाकट भेद योग बनेगा | इस योग के कारण 12 वर्ष तक संसार में भयंकर अकाल रहेगा | राजा दशरथ ने यह सुन कर अपने संहारास्त्र का संधान किया और नक्षत्र मंडल में शनि के समक्ष पहुँच गए |शनि राजा दशरथ के साहस व पौरुष से प्रसन्न हुए तथा उन्हें वर मांगने को कहा | दशरथ ने कहा कि आप लोक हित में रोहिणी में गोचर भ्रमण के समय कभी भी दीर्घ अवधि का दुर्भिक्ष न करें |शनि ने दशरथ कि प्रार्थना स्वीकार कि और कभी भी लंबी अवधि का दुर्भिक्ष न करने का वचन दिया | ज्योतिष शास्त्र में शनि का स्वरूप एवम प्रकृति प्रमुख ज्योतिष ग्रंथों के अनुसार शनि दुष्ट ,क्रोधी , आलसी ,लंगड़ा ,काले वर्ण का ,विकराल ,दीर्घ व कृशकाय शरीर का है |द्रष्टि नीचे ही रहती है , नेत्र पीले व गढ्ढे दार हैं |शरीर के अंग व रोम कठोर तथा नख व दांत मोटे हैं |शनि वात प्रकृति का तमोगुणी ग्रह है | शनि का रथ एवम गति शनि का रथ लोहे का है |वाहन गिद्ध है |सामान्यतः यह एक राशि में 30 मास तक भ्रमणशील रहता है तथा सम्पूर्ण राशि चक्र को लगभग 30 वर्ष में पूर्ण करता है | इस मंद गति के कारण ही इसका नाम शनैश्चर व मंद प्रसिद्ध है | पद्म पुराण के अनुसार शनि जातक कि जन्म राशि से पहले ,दूसरे ,बारहवें ,चौथे व आठवें स्थान पर आने पर कष्ट देता है | 🎎शनि गृह वैज्ञानिक परिचय 🎎 यह सूरज से छटे स्थान पर है और सौरमंडल में बृहस्पति के बाद सबसे बड़ा ग्रह हैं। इसके कक्षीय परिभ्रमण का पथ 14, 29, 40,000 किलोमीटर है। शनि के 60 उपग्रह हैं। जिसमें टाइटन सबसे बड़ा है| शनि ग्रह की खोज प्राचीन काल में ही हो गई थी। शनि ग्रह की रचना 75 percent हाइड्रोजन और 25 percent हीलियम से हुई है। जल, मिथेन, अमोनिया और पत्थर यहाँ बहुत कम मात्रा में पाए जाते हैं। नवग्रहों के कक्ष क्रम में शनि सूर्य से सर्वाधिक दूरी पर अट्ठासी करोड,इकसठ लाख मील दूर है.पृथ्वी से शनि की दूरी इकहत्तर करोड, इकत्तीस लाख, तियालीस हजार मील दूर है.शनि का व्यास पचत्तर हजार एक सौ मील है,यह छ: मील प्रति सेकेण्ड की गति से २१.५ वर्ष में अपनी कक्ष मे सूर्य की परिक्रमा पूरी करता है. शनि धरातल का तापमान २४० फ़ोरनहाइट है. शनि के चारो ओर सात वलय हैं| 🚩🌲🌹ॐ शनिदेवाय नमः🌹🌿🚩

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