🌷 *जीवन की डोर -आशा* 🌷 🌅एक बार एक आदमी रेगिस्तान में कहीं भटक गया। उसके पास खाने-पीने की जो थोड़ी-बहुत चीजें थीं वो जल्द ही ख़त्म हो गयीं और पिछले दो दिनों से वो पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस रहा था। वह मन ही मन जान चुका था कि अगले कुछ घंटों में अगर उसे कहीं से पानी नहीं मिला तो उसकी मौत पक्की है पर कहीं न कहें उसे ईश्वर पर यकीन था कि कुछ चमत्कार होगा और उसे पानी मिल जाएगा तभी उसे एक झोपड़ी दिखाई दी! उसे अपनी आँखों यकीन नहीं हुआ पहले भी वह मृगतृष्णा और भ्रम के कारण धोखा खा चुका था पर बेचारे के पास यकीन करने के आलावा को चारा भी तो न था आखिर ये उसकी आखिरी उम्मीद जो थी। वह अपनी बची-खुची ताकत से झोपडी की तरफ रेंगने लगा जैसे-जैसे करीब पहुँचता उसकी उम्मीद बढती जाती और इस बार भाग्य भी उसके साथ था, सचमुच वहां एक झोपड़ी थी! पर ये क्या? झोपडी तो वीरान पड़ी थी! मानो सालों से कोई वहां भटका न हो। फिर भी पानी की उम्मीद में आदमी झोपड़ी के अन्दर घुसा अन्दर का नजारा देख उसे अपनी आँखों पे यकीन नहीं हुआ… वहां एक हैण्ड पंप लगा था, आदमी एक नयी उर्जा से भर गया पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसता वह तेजी से हैण्ड पंप चलाने लगा। लेकिंग हैण्ड पंप तो कब का सूख चुका था आदमी निराश हो गया उसे लगा कि अब उसे मरने से कोई नहीं बचा सकता…वह निढाल हो कर गिर पड़ा! तभी उसे झोपड़ी के छत से बंधी पानी से भरी एक बोतल दिखी! वह किसी तरह उसकी तरफ लपका! वह उसे खोल कर पीने ही वाला था कि तभी उसे बोतल से चिपका एक कागज़ दिखा उस पर लिखा था- इस पानी का प्रयोग हैण्ड पंप चलाने के लिए करो और वापस बोतल भर कर रखना नहीं भूलना। ये एक अजीब सी स्थिति थी, आदमी को समझ नहीं आ रहा था कि वो पानी पिए या उसे हैण्ड पंप में डालकर उसे चालू करे! उसके मन में तमाम सवाल उठने लगे अगर पानी डालने पे भी पंप नहीं चला अगर यहाँ लिखी बात झूठी हुई और क्या पता जमीन के नीचे का पानी भी सूख चुका हो लेकिन क्या पता पंप चल ही पड़े क्या पता यहाँ लिखी बात सच हो वह समझ नहीं पा रहा था कि क्या करे! फिर कुछ सोचने के बाद उसने बोतल खोली और कांपते हाथों से पानी पंप में डालने लगा। पानी डालकर उसने भगवान् से प्रार्थना की और पंप चलाने लगा एक-दो-तीन और हैण्ड पंप से ठंडा-ठंडा पानी निकलने लगा! वो पानी किसी अमृत से कम नहीं था… आदमी ने जी भर के पानी पिया, उसकी जान में जान आ गयी, दिमाग काम करने लगा। उसने बोतल में फिर से पानी भर दिया और उसे छत से बांध दिया। जब वो ऐसा कर रहा था तभी उसे अपने सामने एक और शीशे की बोतल दिखी। खोला तो उसमे एक पेंसिल और एक नक्शा पड़ा हुआ था जिसमे रेगिस्तान से निकलने का रास्ता था। आदमी ने रास्ता याद कर लिया और नक़्शे वाली बोतल को वापस वहीँ रख दया। इसके बाद वो अपनी बोतलों में पानी भर कर वहां से जाने लगा कुछ आगे बढ़ कर उसने एक बार पीछे मुड़ कर देखा फिर कुछ सोच कर वापस उस झोपडी में गया और पानी से भरी बोतल पे चिपके कागज़ को उतार कर उस पर कुछ लिखने लगा। उसने लिखा- मेरा यकीन करिए ये काम करता है! ये कहानी संपूर्ण जीवन के बारे में है। ये हमे सिखाती है कि बुरी से बुरी स्थिति में भी अपनी उम्मीद नहीं छोडनी चाहिए और इस कहानी से ये भी शिक्षा मिलती है कि कुछ बहुत बड़ा पाने से पहले हमें अपनी ओर से भी कुछ देना होता है। जैसे उस आदमी ने नल चलाने के लिए मौजूद पूरा पानी उसमे डाल दिया। देखा जाए तो इस कहानी में पानी जीवन में मौजूद अच्छी चीजों को दर्शाता है, कुछ ऐसी चीजें जिसकी हमारी नजर में मूल्य है। किसी के लिए ये ज्ञान हो सकता है तो किसी के लिए प्रेम तो किसी और के लिए पैसा! ये जो कुछ भी है उसे पाने के लिए पहले हमें अपनी तरफ से उसे कर्म रुपी हैण्ड पंप में डालना होता है और फिर बदले में आप अपने योगदान से कहीं अधिक मात्रा में उसे वापस पाते हैं। 💖¸.•*""*•.¸ *जय श्री राधे ¸.•*""*•.¸ 💖 *श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव* 🌸💐👏🏼♥💚💖*

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आप जानते हो कि शरीर नहीं रहेगा....नहीं रहेगा......नहीं रहेगा। अपना है ही नहीं तो कैसे रहेगा । आप परलोक में जाएंगे तो अकेले जाएंगे। चौरासी लाख योनियों में जाएंगे तो अकेले जाएंगे। कुटुंब आपके साथ चलेगा नहीं । हम देखते भी हैं कि बड़े-बड़े कुटुंब वाले चले गए पर कोई साथ नहीं किया। सेठ जी के साथ कोई नहीं गया। भाई जी के साथ कोई नहीं गया। हमारे खास परिचित चले गए पर कोई साथ नहीं गया । सब अकेले गए। आपको भी अकेले ही जाना पड़ेगा । शरीर भी साथ नहीं जाएगा। अगर पहले ही अकेले हो जाओ तो बड़ा आनंद होगा। नहीं तो बड़ी दुर्दशा होगी । साथ में कोई रहेगा नहीं और रोना पड़ेगा। इसलिए पहले ही अपनापन छोड़ दो। कोई बाधा नहीं होगी लाभ ही होगा। व्यवहार भी अच्छा होगा। दूसरों के साथ बर्ताव भी अच्छा होगा। अगर सत्संगी ही ममता नहीं छोड़ेंगे तो कौन छोड़ेगा। सत्संग में लोग राजी होते हैं कि अच्छी बातें मिलती हैं। अच्छी बातें मिलने पर भी आप काम में नहीं लाओगे तो और कौन लाएगा। औरों को तो यह बातें सुनने को भी नहीं मिलती। अपने को तो रात और दिन यही बातें सुनने को मिल रही हैं !! इन बातों को आप ही काम में नहीं लाएंगे तो कौन लाएगा। शर्म आनी चाहिए । आप चाहो अथवा मत चाहो शरीर तो एक दिन छूटेगा ही। किसी में ताकत है कि शरीर को रख ले। रख सकते ही नहीं। जो छूटने वाला है उसकी ममता अभी छोड़ दो तो मौज हो जाएगी। -- श्री रामसुखदास जी महाराज #जयश्रीसीताराम

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राधे राधे🌟 । । #बहुत #समय #पहले #कि #बात #है बिहारी जी का एक परम प्रिय भक्त था वह नित्य प्रति बिहारी जी का भजन-कीर्तन करता था उसके ह्रदय का ऐसा भाव था कि बिहारी जी नित्य उसके भजन-कीर्तन को सुनने आते थे एक दिन स्वप्न में बिहारी जी ने उससे शिकायत करते हुए कहा- " तुम नित्य प्रति भजन-कीर्तन करते हो और मैं नित्य उसे सुनने आता भी हूं लेकिन आसन ना होने के कारण मुझे कीर्तन में खड़े रहना पड़ता है जिस कारण मेरे पांव दुख जाते है, अब तू ही मुझे मेरे योग्य कोई आसन दे जिस पर बैठ मैं तेरा भजन-कीर्तन सुन सकू " तब भक्त ने कहा-" प्रभु ! स्वर्ण सिंहासन पर मैं आपको बैठा सकूं इतना मुझमें सार्मथ्य नहीं और भूमि पर आपको बैठने के लिए कह नहीं सकता यदि कोई ऐसा आसन है जो आपके योग्य है तो वो है मेरे ह्रदय का आसन आप वहीं बैठा किजिये प्रभु " बिहारी जी ने हंसते हुए कहा-" वाह ! मान गया तेरी बुद्धिमत्ता को मैं तुझे ये वचन देता हूं जो भी प्रेम भाव से मेरा भजन-कीर्तन करेगा मैं उसके ह्रदय में विराजित हो जाऊंगा " ये सत्य भी है और बिहारी जी का कथन भी वह ना बैकुंठ में रहते है ना योगियों के योग में और ना ध्यानियों के ध्यान में वह तो प्रेम भाव से भजन-कीर्तन करने वाले के ह्रदय में रहते है ।। 🌻🌹🍁🍂 🙏 बोलिए श्री बांके बिहारी लाल की जय 🙏 🌹🍁अरे दिल से दिल की आवाज़ मिलाकर तो देखो*🌺 *मेरे साँवरे के दर पर सिर झुकाकर तो देखो* *अगर न हो जाये दीवानगी तो कहना* *एक बार मेरे बंसी वाले की धुन पर नाचकर के तो देखो* *एक बार सांवरे को अपना बनाकर के तो देखो* 🌹🌹राधै राधै🌹🌹

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प्रश्न- जब नया साधक ध्यान का अभ्यास करता है, तब उसके सामने बड़ी कठिनाई यह आती है कि अनर्गल व्यर्थ की बातें जो उसकी कल्पना में भी नहीं होती, वे ही उस समय याद आती है और वह घबरा जाता है। इसका कारण क्या है? उत्तर- इसका कारण यह है कि वह जिस वस्तु का ध्यान करता है, उसमें तो मन अभ्यस्त नहीं है और जिन विषयों में अभ्यस्त है, उनसे उसे हटा दिया गया है ; ऐसी हालतमें वह निकम्मा हो जाता है ; पर निकम्मा रहना उसे आता नहीं, इसलिये वह उन पुराने चित्रों को उधेड़ने लगता है जो उस पर संस्काररुपसे अंकित हैं। प्रश्न- इसके निराकरण का उपाय बताईये? उत्तर- यदि साधक इस स्थिति में घबराकर ध्यानके अभ्यास को नहीं छोड़ बैठेगा और लगन के साथ अभ्यास करता रहेगा तो कुछ ही समय बाद अभ्यास दृढ़ हो जाने पर मन ध्येय वस्तु के स्वरुप में रम जायगा और फिर तदाकार भी हो जायगा। -- श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार #जयश्रीसीताराम

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हे गोविंद ! कब होगी ये दशा हमारी। हे कृष्ण ! कब लगेगा इस ज़िब्हा को हरि नाम का चश्का। - ............. महाप्रभु के परम प्रिय शिष्य व् श्रीधाम वृंदावन के छः गोस्वामियों में से एक , परम भगवत श्रील रूप-गोस्वामी वृंदावन धाम में वास करते हुए व् अपने जीवनकाल की अंतिम अवस्था में, वृद्धावस्था के कारण उनका शरीर अत्यंत दुर्बल व् जीर्ण-शीर्ण हो चूका था। अपना सम्पूर्ण जीवन श्री प्रभु के पादपधमो में समर्पित कर चुके थे। ध्यान निरंतर प्रभु की रूप माधुरी का पान करने व् नित्य प्रिया - प्रीतम की लीला दर्शन में लगा रहता , अपने गुरु श्री चैतन्यदेव का आशीष और श्री राधिका की ऐसी अद्भुत कृपा थी की श्री-धाम में गोविंद की हो रही व् हो चुकी नित्य लीलाओ के सतत दर्शन में मग्न रहते , इसके अतिरिक्त हरि नाम का ऐसा अद्भुत चश्का लगा था इनकि ज़िब्हा को , मूख से निरंतर स्वतः ही नाम जप होता रहता था, नाम जप में कभी कभी तो इतने मग्न हो जाते की शरीर की सुध ही न रहती। ...... एक समय ध्यान मग्न थे, खोये हुए थे लीला दर्शन में, ग्रीष्म की तपिश की वजह से शरीर तपने लगा , अब इन्हे कहा खबर, ये तो अपनी मस्ती में मस्त , उधर हमारी प्रिया जी को फिक्र होने लगी पहुंच गई इनके पास और अपनी ओढ़नी का पल्लू इनके ऊपर फैला कर खड़ी रही,बाद में चेतना आने पर स्वरुप गोस्वामी जी ने इन्हे बताया । धन्य है ऐसे बृज के रसिक जिनके लिये स्वयं प्रिया- प्रीतम द्रवीभूत हो सेवा में ततपर रहते है। बस ऐसे ही हमारे ठाकुर जी भी भेष बदल बदलकर इनका कार्य व् सेवा किया करते थे। . ........................................................... वृद्धावस्था से शरीर बहुत दुर्बल हो चूका था - एक बार प्रातः शौच के लिये गये तो साथ में जल ले जाना भूल गए। उस समय ठाकुर जी स्वयं शिष्य बनकर इनकी सेवा किया करते थे , शिष्य को जल लाने के लिये आवाज लगाई , प्रभु शिष्य भेष में जल लेके इनके पास गए। अब प्रभु क्या देखते है , रूप जी एक हाथ से अपनी जीभ को जोर से पकड़ कर शौच कर रहे है। प्रभु ने जल दिया , रूप जी शौच से निवृत्त हुए , बाद में प्रभु ने इनसे प्रश्न किया - बाबा आपने शौच के वक्त एक हाथ से ये जीभ को क्यों पकड़ रखा था ? रूप जी ने कहा - अरे काह बतउ लाला इस निगोड़ी जीभ को हरि नाम लेने की ऐसी लत लगी है की स्वतः ही नाम जप होता रहता है। अब हमारे बस में न रही ये जीभ , सो शौच के समय हाथ से पकड़ लेत ह. अब तो प्रभु को हसीं आ गई - कहने लगे बाबा, धन्य है तू , अरे जीभ से स्वतः हरि नाम निकल रहा हे तो रोके क्यों है, हरि नाम को भी क्या शुद्ध-अशुद्ध का दोष लगे है,ये तो प्रत्येक अवस्था में शुद्ध ही रहता है। इतना कहके प्रभु अंतरध्यान हो गए, रूपजी को पुनः हरि नाम की महत्वता का बोध हुआ। - - - - श्री कृष्ण ! गोविंद ! हरे ! मुरारी ! हे नाथ ! नारायण ! वासुदेवा !.. हे नाथ ! नारायण ! वासुदेवा !..

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#भगवान_का_धन्यवाद समय समय पर भगवान का शुक्र अदा करना चाहिए.. किसी निर्माणाधीन भवन की सातवीं मंजिल से ठेकेदार ने नीचे काम करने वाले मजदूर को आवाज दी ! निर्माण कार्य की तेज आवाज के कारण मजदूर कुछ सुन न सका कि उसका ठेकेदार उसे आवाज दे रहा है ! ठेकेदार ने उसका ध्यान आकर्षित करने के लिए एक 1 रुपये का सिक्का नीचे फैंका, जो ठीक मजदूर के सामने जा कर गिरा ! मजदूर ने सिक्का उठाया और अपनी जेब में रख लिया, और फिर अपने काम मे लग गया ! अब उसका ध्यान खींचने के लिए सुपर वाईजर ने पुन: एक 5 रुपये का सिक्का नीचे फैंका ! फिर 10 रु. का सिक्का फेंका उस मजदूर ने फिर वही किया और सिक्के जेब मे रख कर अपने काम मे लग गया ! ये देख अब ठेकेदार ने एक छोटा सा पत्थर का टुकड़ा लिया , और मजदूर के उपर फैंका जो सीधा मजदूर के सिर पर लगा ! अब मजदूर ने ऊपर देखा और ठेकेदार से बात चालू हो गयी ! ऐसी ही घटना हमारी जिन्दगी मे भी घटती रहती है... भगवान हमसे संपर्क करना, मिलना चाहता है, लेकिन हम दुनियादारी के कामों में इतने व्यस्त रहते हैं, की हम भगवान को याद नहीं करते ! भगवान हमें छोटी छोटी खुशियों के रूप मे उपहार देता रहता है, लेकिन हम उसे याद नहीं करते, और वो खुशियां और उपहार कहाँ से आये ये ना देखते हुए, उनका उपयोग कर लेते है, और भगवान को याद ही नहीं करते! भगवान् हमें और भी खुशियों रूपी उपहार भेजता है, लेकिन उसे भी हम हमारा भाग्य समझ कर रख लेते हैं, भगवान् का धन्यवाद नहीं करते, उसे भूल जाते हैं ! तब भगवान् हम पर एक छोटा सा पत्थर फैंकते हैं, जिसे हम कठिनाई, तकलीफ या दुख कहते हैं, फिर हम तुरन्त उसके निराकरण के लिए भगवान् की ओर देखते है, याद करते हैं ! यही जिन्दगी मे हो रहा है. यदि हम हमारी छोटी से छोटी ख़ुशी भी भगवान् के साथ उसका धन्यवाद देते हुए बाँटें, तो हमें भगवान् के द्वारा फैंके हुए पत्थर का इन्तजार ही नहीं करना पड़ेगा...!!!!! *!!सांवरिया प्रेम सुधा रस!!*

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श्री भक्तमाल 4⃣8⃣ श्री निषाद वसु और उसका पुत्र दक्षिण भारत में वेंकटगिरि ( तिरुपति बालाजी ) सुप्रसिद्ध तीर्थ है । महर्षि अगस्त्य की प्रार्थना से भगवान् विष्णु ने वेङ्कटाचल को अपनी नित्य निवास – भूमि बनाकर पवित्र किया है । पर्वत के मनोरम शिखर पर स्वामि पुष्करिणी तीर्थ है, जहाँ रहकर पार्वतीनन्दन स्कन्द स्वामी प्रतिदिन श्रीहरि की उपासना करते हैं । उन्हीं के नाम पर उस तीर्थ को स्वामि पुष्करिणी कहते हैं । उसके पास ही भगवान का विशाल मन्दिर है, जहाँ वे श्रीदेवी और भूदेवी के साथ विराजमान हैं । कितने ही प्रेमी भक्त यहाँ भगवानके दिव्य विमान एवं दिव्य चतुर्भुज स्वरुप का सुदुर्लभ दर्शन पाकर कृतार्थ हो चुके हैं । पूर्वकाल में वेंकटाचल पर एक निषाद रहता था । उसका नाम था वसु । वह भगवान का बड़ा भक्त था । प्रतिदिन स्वामि पुष्करिणी में स्नान करके पूजा करता और श्यामाक ( सावाँ ) के भात में मधु मिलाकर वही श्री भूदेवियों सहित भगवान को भोग के लिये निवेदन करता था । भगवान के उस प्रसाद को ही वह पत्नी के साथ स्वयं पाता था । यही उसका नित्य का नियम था । भगवान् उसे प्रत्यक्ष दर्शन देते और उससे वार्तालाप करते थे। पर्वत के एक भाग में सावाँ का जंगल था । वसु उसकी सदा रखवाली किया करता था, इसलिये कि उसी का चावल उसके प्राणाधार प्रभु के भोग में काम आता था । वसु की पत्नी का नाम था चित्रवती। वह बड़ी पतिव्रता थी । दोनों भगवान की आराधना मे संलग्न रहकर उनके सान्निध्य का दिव्य सुख लूट रहे थे । कुछ काल के बाद चित्रवती के गर्भ से एक सुन्दर बालक उत्पन्न हुआ । वसु ने उसका नाम ‘वीर’ रखा। वीर यथानाम – तथागुणः था । उसके मन पर शैशवकाल से ही माता – पिता दोनों के भगवच्चिन्तन का गहरा प्रभाव पड़ने लगा । जब वह कुछ बड़ा हुआ, तब प्रत्येक कार्य में पिता का हाथ बँटाने लगा । उसके अन्त: करण में भगवान के प्रति अनन्य भक्ति का भाव भी जग चुका था । एक दिन वसु को ज्ञात हुआ कि घर में मधु नहीं हैं। भगवान के भोग के लिये भात बन चुका था । वसु ने सोचा कि मधु के बिना मेरे प्रभु अच्छी तरह भोजन नही कर सकेंगे । अतः वह वीर को सावाँ के जंगल और घर की रखवाली का काम सौंपकर पत्नी के साथ मधु की खोज में चल दिया । बहुत विलम्ब के बाद दूर के जंगल में मधु का छत्ता दिखायी दिया । वसु ने युक्ति से मधु निकाला और घर की और प्रस्थान किया । इधर निषाद – कुमार वीर ने यह सोचकर कि भगवान के भोग में विलम्ब हो रहा है ,तैयार किये हुए भात को एक पात्र में निकाला। उसमें से कुछ अग्नि में डाल दिया और शेष सब भात वृक्ष की जड़ में स्थापित करके भगवान का आवाहन किया। भगवान ने प्रत्यक्ष प्रकट होकर उसका दिया हुआ भोग स्वीकार किया । तत्पश्चात् प्रभु का प्रसाद पाकर बालक वीर माता – पिता के आने की बाट देखने लगा । वसु अपनी पत्नी के साथ जब घर पहुँचा, तब देखता है, वीर ने भात में से कुछ अंश निकालकर खा लिया है । इससे उसे बड़ा दुःख हुआ। प्रभु के लिये जो भोग तैयार किया गया था , उसे इस नादान बालक ने उच्छिष्ट कर दिया ! यह इसका अक्षम्य अपराध है । यह सोचकर वसु कुपित हो उठा । उसने तलवार खींच ली और वीर का मस्तक काटने के लिये हाथ ऊँचा किया । इतने में ही किसी ने पीछे से आकर वसु का हाथ पकड़ लिया । वसु ने पीछे की ओर घूमकर देखा तो भक्तवत्सल भगवान् स्वयं उसका हाथ पकड़े खड़े हैं। हाथों में शङ्ख, चक्र और गदा सुशोभित हैं । मस्तक पर किरीट, कानों में मकराकृत कुण्डल, अधरों पर मन्द मन्द मुसकान और गले में कौस्तुभ मणि की छटा छा रही है । चारों ओर दिव्य प्रकाश का पारावार – सा उमड़ पड़ा है । वसु तलवार फेंककर भगवान के चरणों में गिर पड़ा और बोला – देवदेवेश्वर ! आप क्यों मुझे रोक रहे हैं ? वीर ने अक्षम्य अपराध किया है । भगवान् अपनी मधुर वाणी से कानों मे अमृत उड़ेलते हुए बोले – वसु ! तुम उतावली न करो ! तुम्हारा पुत्र मेरा अनन्य भक्त है । यह मुझे तुमसे भी अधिक प्रिय है । इसीलिये मैंने इसे प्रत्यक्ष दर्शन दिया है । इसकी दृष्टि में मैं सर्वत्र हूँ, किंतु तुम्हारी दृष्टि में केवल स्वामि पुष्करणी के तट पर ही मेरा निवास हैं । भगवान का यह वचन सुनकर वसु बड़ा प्रसन्न हुआ । वीर और चित्रवती भी प्रभु के चरणो मे लोट गये । उनका दुर्लभ कृपा – प्रसाद पाकर यह निषाद – परिवार धन्य – धन्य हो गया ! 🙌🏼 श्रीराधारमण दासी परिकर 🙌🏼

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