आत्मा परमात्मा के मिलन का मधुमास है... यही महारास है....यही महारास है आज शरद पूर्णिमा है। यह रात कई मायने में महत्वपूर्ण है। जहां इसे शरद ऋतु की शुरुआत माना जाता है, वहीं माना जाता है कि इस रात को चंद्रमा संपूर्ण 16 कलाओं से परिपूर्ण होता है और अपनी चांदनी में अमृत बरसाता है। इसी वजह से लोग इस पूरी रात्रि को खीर बनाकर चांदनी में रख देते हैं, ताकि उसे प्रसाद के रूप में सुबह स्नान करके खाने के बाद निरोग हो पाएं। इस दिन चन्द्रमा से अमृत की वर्षा होती है जो धन, प्रेम और सेहत तीनों देती है। प्रेम और कलाओं से परिपूर्ण होने के कारण कृष्ण ने इसी दिन महारास रचाया था। द्वापर युग में वृंदावन की सभी गोपियां श्रीकृष्ण को पति रूप में पाना चाहती थीं। जब गोपियों ने ये इच्छा श्रीकृष्ण को बताई तो भगवान ने ये कामना पूरी करने का वचन दिया। शरद पूर्णिमा की रात चंद्र अपनी 16 कलाओं के साथ दिखाई देता है, इस रात चंद्र बहुत सुंदर दिखाई देता है। इसीलिए श्रीकृष्ण ने शरद पूर्णिमा की रात यमुना तट के पास निधिवन में गोपियों को मिलने के लिए कहा। मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात सभी गोपियां निधिवन पहुंच गईं। उस समय निधिवन में जितनी गोपियां थीं, श्रीकृष्ण ने उतने ही रूप धारण किए और सभी गोपियों के साथ रास रचाया। निधिवन में हैं तुलसी के पेड़ निधिवन में तुलसी के पेड़ हैं। ये सामान्य तुलसी के पौधों से एकदम अलग हैं। तुलसी के इन पेड़ों की शाखाएं जमीन की ओर आती हैं। यहां तुलसी के पेड़ जोड़ों में हैं। मान्यता है कि आज भी जब श्रीकृष्ण निधिवन में गोपियों संग रास रचाते हैं तो ये सभी पेड़ गोपियां बन जाती हैं। जैसे ही सुबह होती है तो फिर तुलसी के पेड़ में बदल जाती हैं। सूर्यास्त के बाद इस वन को खाली करा दिया जाता है। किसी भी इंसान को इस वन में रुकने की इजाजत नहीं है। इस संबंध में माना जाता है कि अगर व्यक्ति रात में इस वन में रुकता है तो उसका मानसिक संतुलन बिगड़ सकता है। आज के दिन ही मीराबाई जी की जयंती भी मनाई जाती हैं मान्यता है कि मीरा पूर्व-जन्म में वृंदावन की एक गोपी थीं और उन दिनों वह राधा की सहेली थीं। वे मन ही मन भगवान श्रीकृष्ण से प्रेम करती थीं। गोप से विवाह होने के बाद भी उनका लगाव श्रीकृष्ण के प्रति कम न हुआ और कृष्ण से मिलने की तड़प में ही उन्होंने प्राण त्याग दिए। बाद में उसी गोपी ने मीरा के रूप में जन्म लिया ब्राह्मणों को खीर का भोजन कराना चाहिए और उन्हें दान दक्षिणा प्रदान करनी चाहिए। रात को चन्द्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही भोजन करना चाहिए। मंदिर में खीर आदि दान करने का विधि-विधान है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन चांद की चांदनी से अमृत बरसता है। शरद पूर्णिमा में है ईश्वरीय शांति... भगवान कृष्ण धीरे-धीरे नाच रहे हैं, सब गोपियों के साथ। संगीत के अद्भुत जादू में बांसुरी की मोहक धुन है। मदहोश गोपियों को कुछ पता ही नहीं है। योगेश्वर श्रीकृष्ण सभी के साथ अलग-अलग, लेकिन एक ही रूप में हैं। भगवान कृष्ण सचमुच प्रकट हो गए हैं। शरद पूर्णिमा में तो ईश्वरीय शांति है। शरद पूर्णिमा: आज सारा जगत होगा कृष्णमयी होगा आप सभी कॊ शरदपूर्णिमा की बधाई हॊ प्रिया प्रीतम की कृपा आप सब पर हमेशा बनी रहे जय श्रीराधे जी

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फसे तो डसे बहुत आश्चर्य की बात है के भजन करने वालों में भी भक्ति जात अनर्थ उतपन्न हो जाते हैं इसमें पहला है निषिद्ध आचरण दूसरा है जीव हिंसा तीसरा है दुखमुक्ति की कामना चौथा है पूजा की इच्छा पांचवा है प्रतिष्ठा की इच्छा छठा है भौतिक लाभ की इच्छा सातवां है प्राप्त हुए धन का भोग और आठवां है जब कोई इन अनरथों के बारे में सावधान करें तो उससे कुतर्क करना थोड़ा बहुत भजन करने वालों में तो जाने कितने कितने अनर्थ पहले से ही होते ही है लेकिन जो भजन की शिक्षा देने वाले संत महंत आचार्य गण हैं, उनमें ये 8 बड़ी तेजी से पनपते हैं, वे इन सब को जानते हैं और इनसे सदैव सावधान रहते हैं और जो फसे वो माया द्वारा डसे । जय श्रीराधे जय निताई वैष्णवजन को राधादासी का प्रणाम🙏🏻 6 अकटूबर

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. "ध्यान की विधि" ०१. जिस कक्ष में आप बैठकर ध्यान करते हैं उस कक्ष के सामने की दीवार के बराबर या उससे भी बड़े भगवान के मुख की कल्पना करें और मुख के विभिन्न अंगों पर अपनी मानसिक नजर घड़ी की सुई की तरह धीरे-धीरे घूमाते रहें। ध्यान रहे कि भगवान के केवल मुख की जितनी बड़ी कल्पना कर सकते हैं, उतनी बड़ी करें। ०२. दोनों आँखें बन्द करके जिस मंत्र का आप जप करते हैं उसका मानसिक रूप से उच्चारण करते हुए अपने ईष्ट की सम्पूर्ण छवि की कल्पना करें। मन की आँखों से उनके चरणों को देखते हुए ऊपर मुकुट तक जायें और फिर मुकुट से नीचे चरणों तक आये। यही क्रिया बार-बार दोहराये। जप करते रहे। नजर थकने लगे तो भगवान के मुख पर नजर टिकाकर जप करें। ०३. ध्यान में भगवान की ऐसी छवि की कल्पना करें जिनके विभिन्न अंगों पर आपके द्वारा जपे जा रहे मंत्रा के विभिन्न शब्द सिलसिलेवार तरीके से लिखे हुए हैं। जैसे मंत्र का पहला शब्द भगवान के माथे पर, दूसरा गले पर, तीसरा सीने पर। इन विभिन्न शब्दों को पढ़ते हुए ऊपर से नीचे आये। फिर ऊपर से शुरूआत करते हुए नीचे आये। ध्यान रखें कि मंत्र का जप नहीं करना, भगवान के शरीर पर अंकित मंत्र के शब्दों को पढ़ना है। ०४. भगवान की किसी लीला को फिल्म की भांति मन में देखें। ----------:::×:::---------- "जय श्री राम" *******************************************

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प्याज लहसुन खाना शास्त्रोँ मेँ क्यों मना किया गया है विशेषकर नवरात्रि में ।। प्याज और लहसुन ना खाए जाने के पीछे सबसे प्रसिद्ध पौराणिक कथा यह है कि समुद्रमंथन से निकले अमृत को, मोहिनी रूप धरे विष्णु भगवान जब देवताओं में बांट रहे थे; तभी एक राक्षस भी वहीं आकर बैठ गया। भगवान ने उसे भी देवता समझकर अमृत दे दिया। लेकिन तभी उन्हेँ सूर्य व चंद्रमा ने बताया कि ये राक्षस है। भगवान विष्णु ने तुरंत उसके सिर धड़ से अलग कर दिए। लेकिन राहू के मुख में अमृत पहुंच चुका था इसलिए उसका मुख अमर हो गया। पर भगवान विष्णु द्वारा राहू के सिर काटे जाने पर उनके कटे सिर से अमृत की कुछ बूंदे ज़मीन पर गिर गईं जिनसे प्याज और लहसुन उपजे चूंकि यह दोनों सब्ज़िया अमृत की बूंदों से उपजी हैं इसलिए यह रोगों और रोगाणुओं को नष्ट करने में अमृत समान होती हैं पर क्योंकि यह राक्षसों के मुख से होकर गिरी हैं इसलिए इनमें तेज़ गंध है और ये अपवित्र हैं जिन्हें कभी भी भगवान के भोग में इस्तमाल नहीं किया जाता। कहा जाता है कि जो भी प्याज और लहसुन खाता है उनका शरीर राक्षसों के शरीर की भांति मज़बूत हो जाता है लेकिन साथ ही उनकी बुद्धि और सोच-विचार राक्षसों की तरह दूषित भी हो जाते हैं। इन दोनों सब्जियों को मांस के समान माना जाता है। जो लहसुन और प्याज खाता है उसका मन के साथ साथ पूरा शरीर तामसिक स्वभाव का हो जाता है। ध्यान भजन मेँ मन नहीँ लगता। कुल मिला कर पतन हो जाता है इसलिए प्याज लहसुन खाना शास्त्रोँ मेँ मना किया गया है I

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*💐ईश्वर का न्याय*💐 एक बार दो आदमी एक मंदिर के पास बैठे गपशप कर रहे थे। वहां अंधेरा छा रहा था और बादल मंडरा रहे थे। थोड़ी देर में वहां एक आदमी आया और वो भी उन दोनों के साथ बैठकर गपशप करने लगा। कुछ देर बाद वो आदमी बोला उसे बहुत भूख लग रही है, उन दोनों को भी भूख लगने लगी थी। पहला आदमी बोला मेरे पास 3 रोटी हैं, दूसरा बोला मेरे पास 5 रोटी हैं, हम तीनों मिल बांट कर खा लेते हैं। उसके बाद सवाल आया कि 8 (3+5) रोटी तीन आदमियों में कैसे बांट पाएंगे?? पहले आदमी ने राय दी कि ऐसा करते हैं कि हर रोटी के 3 टुकडे करते हैं, अर्थात 8 रोटी के 24 टुकडे (8 X 3 = 24) हो जाएंगे और हम तीनों में 8 - 8 टुकडे बराबर बराबर बंट जाएंगे। तीनों को उसकी राय अच्छी लगी और 8 रोटी के 24 टुकडे करके प्रत्येक ने 8 - 8 रोटी के टुकड़े खाकर भूख शांत की और फिर बारिश के कारण मंदिर के प्रांगण में ही सो गए। सुबह उठने पर तीसरे आदमी ने उनके उपकार के लिए दोनों को धन्यवाद दिया और प्रेम से 8 रोटी के टुकडो़ के बदले दोनों को उपहार स्वरूप 8 सोने की गिन्नी देकर अपने घर की ओर चला गया। उसके जाने के बाद पहला आदमी ने दुसरे आदमी से कहा हम दोनों 4 - 4 गिन्नी बांट लेते हैं। दुसरा बोला नहीं मेरी 5 रोटी थी और तुम्हारी सिर्फ 3 रोटी थी अतः मै 5 गिन्नी लुंगा, तुम्हें 3 गिन्नी मिलेंगी। इस पर दोनों में बहस और झगड़ा होने लगा। इसके बाद वे दोनों सलाह और न्याय के लिए मंदिर के पुजारी के पास गए और उसे समस्या बताई तथा न्यायपूर्ण समाधान के लिए प्रार्थना की। पुजारी भी असमंजस में पड़ गया, उसने कहा तुम लोग ये 8 गिन्नियाँ मेरे पास छोड़ जाओ और मुझे सोचने का समय दो, मैं कल सबेरे जवाब दे पाऊंगा। पुजारी को दिल में वैसे तो दूसरे आदमी की 3 - 5 की बात ठीक लगी रही थी पर फिर भी वह गहराई से सोचते सोचते गहरी नींद में सो गया। कुछ देर बाद उसके सपने में भगवान प्रगट हुए तो पुजारी ने सब बातें बताई और न्यायिक मार्गदर्शन के लिए प्रार्थना की और बताया कि मेरे ख्याल से 3 - 5 बंटवारा ही उचित लगता है। भगवान मुस्कुरा कर बोले- नहीं। पहले आदमी को 1 गिन्नी मिलनी चाहिए और दुसरे आदमी को 7 गिन्नी मिलनी चाहिए। भगवान की बात सुनकर पुजारी अचंभित हो गया और अचरज से पूछा- *प्रभू ऐसा कैसे ?* भगवन फिर एकबार मुस्कुराए और बोले : इसमें कोई शंका नहीं कि पहले आदमी ने अपनी 3 रोटी के 9 टुकड़े किये परंतु उन 9 में से उसने सिर्फ 1 बांटा और 8 टुकड़े स्वयं खाया अर्थात उसका *त्याग* सिर्फ 1 रोटी के टुकड़े का था इसलिए वो सिर्फ 1 गिन्नी का ही हकदार है। दुसरे आदमी ने अपनी 5 रोटी के 15 टुकड़े किये जिसमें से 8 तुकडे उसने स्वयं खाऐ और 7 टुकड़े उसने बांट दिए। इसलिए वो न्यायानुसार 7 गिन्नी का हकदार है .. ये ही मेरा गणित है और ये ही मेरा न्याय है! ईश्वर की न्याय का सटीक विश्लेषण सुनकर पुजारी उनके चरणों में नतमस्तक हो गया। *इस कहानी का सार ये ही है कि हमारा वस्तुस्थिति को देखने का, समझने का दृष्टिकोण और ईश्वर का दृष्टिकोण एकदम भिन्न है। हम ईश्वरीय न्यायलीला को जानने समझने में सर्वथा अज्ञानी हैं।* *हम अपने त्याग का गुणगान करते है परंतु ईश्वर हमारे त्याग की तुलना हमारे सामर्थ्य एवं भोग तौर कर यथोचित निर्णय करते हैं *यह महत्वपूर्ण नहीं है कि हम कितने धन संपन्न है, महत्वपूर्ण यहीं है कि हमारे सेवाभाव कार्य में त्याग कितना है।* *सदैव प्रसन्न रहिये!!!* *जो प्राप्त है-पर्याप्त है!!!* 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

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