*🔥प्रभु कथा🔥* *प्रभु कथाएं क्यों सुननी-पढ़नी चाहिए?भागवत श्रवण से भक्ति रूपी पुरुषार्थ का उदय होता है। माया का पर्दा जब-तब व्यक्ति को अपनी मंजिल से विमुख करता रहता है। इस स्थिति में गीता, भागवत, रामायण जैसे ग्रंथ प्रकाश स्तंभ की भूमिका निभाते हैं। इस दुनिया में मात्र प्रभु कथा में वो सामर्थ्य है जो हमारे जीवन को भवसागर से पार कराने का सामर्थ्य रखती है। प्रभु कथा के अभाव में हमारा जीवन व्यथा से ज्यादा कुछ भी नही। भवरोग मिटाने की केवल और केवल एक ही औषधि है और वह है, प्रभु कथा।* *जीवन अगर नाव है तो प्रभु कथा उसे डूबने से बचाने वाली पतवार। जीवन अगर पतंग है तो प्रभु कथा उसे भटकने से बचाने वाली डोर और जीवन अगर एक वृक्ष है तो प्रभु कथा इसे सूखने से बचाने वाला खाद-पानी। अतः प्रभु कथा का आश्रय लो यह आप को भव सागर से बचा लेगी व भाव सागर में प्रवेश करा देगी। *जय श्री कृष्णा जी*🌺🙏🌺

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. "प्रेमी भक्तों के प्रकार" तीन प्रकार के प्रेमी भक्त होते हैं, "नित्यसिद्ध", "कृपासिद्ध" और "साधनसिद्ध" नित्यसिद्ध वे है - जो श्री कृष्ण के नित्य परिकर हैं और श्रीकृष्ण स्वयं लीला के लिए जहाँ विराजते हैं वही वे उनके साथ रहते हैं। कृपासिद्ध वे है - जो श्रीकृष्ण की अहेतु की कृपा से प्रेमियों का संग प्राप्त करके अंत में उन्हें पा लेते हैं। साधनसिद्ध वे हैं - जो भगवान की कृपा प्राप्त करने के लिए, भगवान की रूचि के अनुसार भगवत प्रीतयर्थ प्रेम साधना करते हैं। ऐसे साधको में जो प्रेम के उच्च स्तर पर होते हैं किसी सखी या मंजरी को गुरुरूप में वरण करके, उनके अनुगत रहते हैं, ऐसे पुरुष समय-समय पर प्राकृत देह से निकलकर सिद्धदेह के द्वारा लीला राज्य में पहुँचते हैं, और वहाँ श्रीराधा गोविंद की सेवा करके कृतार्थ होते हैं। ऐसे भक्त आज भी हो सकते हैं। ऐसी ही एक कथा "श्री राधामाधव चिंतन" में आती है सिद्ध सखीदेह धारी बाबा श्रीनिवास आचार्य जी की। महात्मा श्री निवास आचार्य इस स्थिति पर पहुँचे हुए भक्त थे, वे सिद्ध सखीदेह के द्वारा श्रीराधा-गोविंद की नित्य लीला के दर्शन के लिए अपनी सखी गुरु के पीछे-पीछे श्री व्रजधाम में जाया करते थे। एक बार वे ऐसे ही गए हुए थे, स्थूल देह समाधि स्थित की भांति निर्जीव पड़ा था, तीन दिन बीत गए। आचार्य पत्नी ने पहले तो इसे समाधि समझा, क्योकि ऐसी समाधि उनको प्राय:हुआ करती थी। परन्तु जब तीन दिन बीत गए, शरीर बिलकुल प्राणहीन प्रतीत हुआ, तब उन्होंने डरकर शिष्य भक्त रामचंद्र हो बुलाया। रामचंद्र भी उच्च स्तर पर आरूढ़ थे उन्होंने पता लगाया और गुरु पत्नी को धीरज देकर गुरु की खोज के लिए सिद्धदेह में गमन किया। उनका भी स्थूलदेह वहाँ पड़ा रहा। सिद्धदेह में जाकर रामचन्द्र ने देखा - श्री यमुना जी में क्रीडा करते-करते श्री राधिका जी का एक कर्णकुंडल कही जल में पड़ गया है, श्रीकृष्ण, सखियों के साथ उसे खोज रहे है परन्तु वह मिल नहीं रहा है। रामचंद्र ने देखा सिद्ध देहधारी गुरुदेव श्रीनिवास जी भी सखियों के यूथ में सम्मिलित है, तब रामचंद्र भी गुरु की सेवा में लग गए। खोजते-खोजते रामचद्र को श्रीजी का कुंडल एक कमलपत्र के नीचे पंक में पड़ा मिला। उन्होंने लाकर गुरुदेव को दिया उन्होंने अपनी गुरुरूपा सखी को दिया, सखी ने युथेश्वरी को अर्पण किया, और युथेश्वर ने जाकर श्रीजी की आज्ञा से उनके कान में पहना दिया, सबको बड़ा आनन्द हुआ। श्री जी ने खोजने वाली सखी का पता लगाकर परम प्रसन्नता से उसे चर्वित ताम्बुल दिया, बस इधर श्रीनिवास जी और रामचंद्र की समाधि टूटी रामचदं के हाथ में श्रीजी का चबाया हुआ पान देखकर दोनों को बड़ी प्रसन्नता हुई। धन्य हैं ऐसे साधन सिद्ध सखी देह धारी महात्मा। ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" ********************************************

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💐🏵️ भक्त का मान 🏵️🙏 . नरसी मेहता जी के जीवन की एक घटना आप सभी अवश्य पढ़ें . एक बार नरसी जी का बड़ा भाई वंशीधर नरसी जी के घर आया। पिता जी का वार्षिक श्राद्ध करना था। . वंशीधर ने नरसी जी से कहा :- 'कल पिताजी का वार्षिक श्राद्ध करना है। कहीं अड्डेबाजी मत करना बहु को लेकर मेरे यहाँ आ जाना। काम-काज में हाथ बटाओगे तो तुम्हारी भाभी को आराम मिलेगा।' . नरसी जी ने कहा :- 'पूजा पाठ करके ही आ सकूँगा।' . इतना सुनना था कि वंशीधर उखड गए और बोले :- 'जिन्दगी भर यही सब करते रहना। जिसकी गृहस्थी भिक्षा से चलती है, उसकी सहायता की मुझे जरूरत नहीं है। तुम पिताजी का श्राद्ध अपने घर पर अपने हिसाब से कर लेना।' . नरसी जी ने कहा :-``नाराज क्यों होते हो भैया ? मेरे पास जो कुछ भी है, मैं उसी से श्राद्ध कर लूँगा।' . दोनों भाईयों के बीच श्राद्ध को लेकर झगडा हो गया है, नागर-मंडली को मालूम हो गया। . नरसी अलग से श्राद्ध करेगा, ये सुनकर नागर मंडली ने बदला लेने की सोची। . पुरोहित प्रसन्न राय ने सात सौ ब्राह्मणों को नरसी के यहाँ आयोजित श्राद्ध में आने के लिए आमंत्रित कर दिया। . प्रसन्न राय ये जानते थे कि नरसी का परिवार मांगकर भोजन करता है। वह क्या सात सौ ब्राह्मणों को भोजन कराएगा ? आमंत्रित ब्राह्मण नाराज होकर जायेंगे और तब उसे ज्यातिच्युत कर दिया जाएगा। . अब कहीं से इस षड्यंत्र का पता नरसी मेहता जी की पत्नी मानिकबाई जी को लग गया वह चिंतित हो उठी। . अब दुसरे दिन नरसी जी स्नान के बाद श्राद्ध के लिए घी लेने बाज़ार गए। नरसी जी घी उधार में चाहते थे पर किसी ने उनको घी नहीं दिया। . अंत में एक दुकानदार राजी हो गया पर ये शर्त रख दी कि नरसी को भजन सुनाना पड़ेगा। . बस फिर क्या था, मन पसंद काम और उसके बदले घी मिलेगा, ये तो आनंद हो गया। . अब हुआ ये कि नरसी जी भगवान का भजन सुनाने में इतने तल्लीन हो गए कि ध्यान ही नहीं रहा कि घर में श्राद्ध है। . मित्रों ये घटना सभी के सामने हुयी है। और आज भी कई जगह ऎसी घटनाएं प्रभु करते हैं ऐसा कुछ अनुभव है। ऐसे-ऐसे लोग हुए हैं इस पावन धरा पर। . तो आईये कथा मे आगे चलते हैं... . अब नरसी मेहता जी गाते गए भजन उधर नरसी के रूप में भगवान कृष्ण श्राद्ध कराते रहे। . यानी की दुकानदार के यहाँ नरसी जी भजन गा रहे हैं और वहां श्राद्ध "कृष्ण भगवान" नरसी जी के भेस में करवा रहे हैं। . जय हो, जय हो वाह प्रभू क्या माया है..... अद्भुत, भक्त के सम्मान की रक्षा को स्वयं भेस धर लिए। . वो कहते हैं ना की :- "अपना मान भले टल जाए, भक्त का मान न टलते देखा। प्रबल प्रेम के पाले पड़ कर, प्रभु को नियम बदलते देखा, अपना मान भले टल जाये, भक्त मान नहीं टलते देखा।" . तो महाराज सात सौ ब्राह्मणों ने छककर भोजन किया। दक्षिणा में एक एक अशर्फी भी प्राप्त की। . सात सौ ब्राह्मण आये तो थे नरसी जी का अपमान करने और कहाँ बदले में सुस्वादु भोजन और अशर्फी दक्षिणा के रूप में... वाह प्रभु धन्य है आप और आपके भक्त। . दुश्त्मति ब्राह्मण सोचते रहे कि ये नरसी जरूर जादू-टोना जानता है। . इधर दिन ढले घी लेकर नरसी जी जब घर आये तो देखा कि मानिक्बाई जी भोजन कर रही है। . नरसी जी को इस बात का क्षोभ हुआ कि श्राद्ध क्रिया आरम्भ नहीं हुई और पत्नी भोजन करने बैठ गयी। . नरसी जी बोले :- 'वो आने में ज़रा देर हो गयी। क्या करता, कोई उधार का घी भी नहीं दे रहा था, मगर तुम श्राद्ध के पहले ही भोजन क्यों कर रही हो ?' . मानिक बाई जी ने कहा :- 'तुम्हारा दिमाग तो ठीक है ? स्वयं खड़े होकर तुमने श्राद्ध का सारा कार्य किया। ब्राह्मणों को भोजन करवाया, दक्षिणा दी। सब विदा हो गए, तुम भी खाना खा लो।' . ये बात सुनते ही नरसी जी समझ गए कि उनके इष्ट स्वयं उनका मान रख गए। . गरीब के मान को, भक्त की लाज को परम प्रेमी करूणामय भगवान् ने बचा ली। . मन भर कर गाते रहे :- कृष्णजी, कृष्णजी, कृष्णजी कहें तो उठो रे प्राणी। कृष्णजी ना नाम बिना जे बोलो तो मिथ्या रे वाणी।। . भक्त के मन में अगर सचमुच समर्पण का भाव हो तो भगवान स्वयं ही उपस्थित हो जाते हैं. ~~~~~~~~~~~~~~~~~ ((((((( जय जय श्री राधे ))))))) ~~~~~~~~~~~~~~~~~

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. "बछ बारस" बछ बारस को गौवत्स द्वादशी और बच्छ दुआ भी कहते हैं। बछ बारस भाद्रपद महीने की कृष्ण पक्ष की द्वादशी को मनाई जाती है। आइये जानें इसका महत्त्व। बछ यानि बछड़ा, गाय के छोटे बच्चे को कहते हैं। इस दिन को मनाने का उद्देश्य गाय व बछड़े का महत्त्व समझाना है। यह दिन गोवत्स द्वादशी के नाम से भी जाना जाता है। गोवत्स का मतलब भी गाय का बच्चा ही होता है। बछ बारस का यह दिन कृष्ण जन्माष्टमी के चार दिन बाद आता है। कृष्ण भगवान को गाय व बछड़ा बहुत प्रिय थे तथा गाय में सैकड़ो देवताओं का वास माना जाता है। गाय व बछड़े की पूजा करने से कृष्ण भगवान का, गाय में निवास करने वाले देवताओं का और गाय का आशीर्वाद मिलता है जिससे परिवार में खुशहाली बनी रहती है ऐसा माना जाता है। इस दिन महिलायें बछ बारस का व्रत रखती है। यह व्रत सुहागन महिलाएँ सुपुत्र प्राप्ति और पुत्र की मंगल कामना के लिए व परिवार की खुशहाली के लिए करती हैं। गाय और बछड़े का पूजन किया जाता है। इस दिन गाय का दूध और दूध से बने पदार्थ जैसे दही, मक्खन, घी आदि का उपयोग नहीं किया जाता। इसके अलावा गेहूँ और चावल तथा इनसे बने सामान नहीं खाये जाते। भोजन में चाकू से कटी हुई किसी भी चीज का सेवन नहीं करते है। इस दिन अंकुरित अनाज जैसे चना, मोठ, मूंग, मटर आदि का उपयोग किया जाता है। भोजन में बेसन से बने आहार जैसे कढ़ी, पकोड़ी, भजिये आदि तथा मक्के, बाजरे, ज्वार आदि की रोटी तथा बेसन से बनी मिठाई का उपयोग किया जाता है। बछ बारस के व्रत का उद्यापन करते समय इसी प्रकार का भोजन बनाना चाहिए। उजरने में यानि उद्यापन में बारह स्त्रियाँ, दो चाँद सूरज की और एक साठिया इन सबको यही भोजन कराया जाता है। शास्त्रो के अनुसार इस दिन गाय की सेवा करने से, उसे हरा चारा खिलाने से परिवार में महालक्ष्मी की कृपा बनी रहती है तथा परिवार में अकालमृत्यु की सम्भावना समाप्त होती है। बछ बारस की पूजा विधि सुबह जल्दी उठकर नहा धोकर शुद्ध कपड़े पहने। दूध देने वाली गाय और उसके बछड़े को साफ पानी से नहलाकर शुद्ध करें। गाय और बछड़े को नए वस्त्र ओढ़ाएँ। फूल माला पहनाएँ। उनके सींगों को सजाएँ। उन्हें तिलक करें। गाय और बछड़े को भीगे हुए अंकुरित चने अंकुरित मूंग, मटर, चने के बिरवे, जौ की रोटी आदि खिलाएँ। गौ माता के पैरों धूल से खुद के तिलक लगाएँ। इसके बाद बछ बारस की कहानी सुने। इस प्रकार गाय और बछड़े की पूजा करने के बाद महिलायें अपने पुत्र के तिलक लगाकर उसे नारियल देकर उसकी लंबी उम्र और सकुशलता की कामना करें। उसे आशीर्वाद दें। बड़े बुजुर्ग के पाँव छूकर उनसे आशीर्वाद लें। अपनी श्रद्धा और रिवाज के अनुसार व्रत या उपवास रखें। मोठ या बाजरा दान करें। सासुजी को बयाना देकर आशीर्वाद लें। यदि आपके घर में खुद की गाय नहीं हो तो दूसरे के यहाँ भी गाय बछड़े की पूजा की जा सकती है। ये भी संभव नहीं हो तो गीली मिट्टी से गाय और बछड़े की आकृति बना कर उनकी पूजा कर सकते है। कुछ लोग सुबह आटे से गाय और बछड़े की आकृति बनाकर पूजा करते है। शाम को गाय चारा खाकर वापस आती है तब उसका पूजन धुप, दीप, चन्दन, नैवेद्य आदि से करते है। बछ बारस की कहानी (1) एक बार एक गाँव में भीषण अकाल पड़ा। वहाँ के साहूकार ने गाँव में एक बड़ा तालाब बनवाया परन्तु उसमे पानी नहीं आया। साहूकार ने पंडितों से उपाय पूछा। पंडितों ने बताया की तुम्हारे दोनों पोतों में से एक की बलि दे दो तो पानी आ सकता है। साहूकार ने सोचा किसी भी प्रकार से गाँव का भला होना चाहिए। साहूकार ने बहाने से बहु को एक पोते हंसराज के साथ पीहर भेज दिया और एक पोते को अपने पास रख लिया जिसका नाम बच्छराज था। बच्छराज की बलि दे दी गई। तालाब में पानी भी आ गया। साहूकार ने तालाब पर बड़े यज्ञ का आयोजन किया। लेकिन झिझक के कारण बहू को बुलावा नहीं भेज पाये। बहु के भाई ने कहा - ”तेरे यहाँ इतना बड़ा उत्सव है तुझे क्यों नहीं बुलाया ? मुझे बुलाया है, मैं जा रहा हूँ।" बहू बोली - ”बहुत से काम होते हैं इसलिए भूल गए होंगें, अपने घर जाने में कैसी शर्म, मैं भी चलती हूँ।" घर पहुँची तो सास ससुर डरने लगे कि बहु को क्या जवाब देंगे। फिर भी सास बोली बहु चलो बछ बारस की पूजा करने तालाब पर चलें। दोनों ने जाकर पूजा की। सास बोली - "बहु तालाब की किनार कसूम्बल से खंडित करो।" बहु बोली - "मेरे तो हंसराज और बच्छराज है, मैं खंडित क्यों करूँ ?" सास बोली - ”जैसा मैं कहूँ वैसे करो।" बहू ने सास की बात मानते हुए किनार खंडित की और कहा - ”आओ मेरे हंसराज, बच्छराज लडडू उठाओ।" सास मन ही मन भगवान से प्रार्थना करने लगी - "हे बछ बारस माता मेरी लाज रखना।" भगवान की कृपा हुई। तालाब की मिट्टी में लिपटा बच्छराज व हंसराज दोनों दौड़े आये। बहू पूछने लगी “सासूजी ये सब क्या है ?” सास ने बहु को सारी बात बताई और कहा - "भगवान ने मेरा सत रखा है। आज भगवान की कृपा से सब कुशल मंगल है। खोटी की खरी, अधूरी की पूरी। हे बछ बारस माता ! जैसे इस सास का सत रखा वैसे सबका रखना।" बछ बारस की कहानी (2) एक सास बहु थीं। सास को गाय चराने के लिए वन में जाना जाना था। उसने बहु से कहा - “आज बछ बारस है मैं वन जा रही हूँ तो तुम गेहूँ लाकर पका लेना और धान लाकर उछेड़ लेना। बहु काम में व्यस्त थी, उसने ध्यान से सुना नहीं। उसे लगा सास ने कहा गेहूंला धानुला को पका लेना। गेहूला और धानुला गाय के दो बछड़ों के नाम थे। बहु को कुछ गलत तो लग रहा था लेकिन उसने सास का कहा मानते हुए बछड़ों को काट कर पकने के लिए चढ़ा दिया । सास ने लौटने पर पर कहा - "आज बछ बारस है, बछड़ों को छोड़ो पहले गाय की पूजा कर लें।" बहु डरने लगी, भगवान से प्रार्थना करने लगी बोली - "हे भगवान ! मेरी लाज रखना।" भगवान को उसके भोलेपन पर दया आ गई। हांड़ी में से जीवित बछड़े बाहर निकल आये। सास के पूछने पर बहु ने सारी घटना सुना दी। और कहा - "भगवान ने मेरा सत रखा, बछड़ों को फिर से जीवित कर दिया। खोटी की खरी, अधूरी की पूरी। हे बछ बारस माता ! जैसे इस बहु की लाज रखी वैसे सबकी रखना।" इसीलिए बछ बारस के दिन गेंहू नहीं खाये जाते और कटी हुई चीजें नहीं खाते है। गाय बछड़े की पूजा करते है। ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" *******************************************

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