🌸🌷🌸🌷🌸🌷🌸 🌷संग का फल🌷 एक पेड पर एक कौआ और एक तोता बड़े मज़े से रहते थे| दोनों में बड़ी मैत्री थी| एक बार उन्हें वहां से विचरण करने वाले पक्षियों से यह सुचना मिली की सागर तक पर गरुड़ भगवान पधार रहें हैं| सभी पक्षी भगवान के दर्शन करने सागर किनारे जाने लगे| दोनों ने विचार किया, क्यों ना हम सबसे पहले सागर किनारे जाकर गरुड़ भगवान के दर्शन कर लें| बस फिर क्या था, दोनों ने साथ में सागर किनारे जाने की योजना बना ली| तडके सवेरे दोनों ने सागर किनारे जाने के लिए उडान भरी| कौआ और तोता दोनों जल्दी ही सभी पक्षियों से आगे निकल गए| 🌷🌷 अचानक उड़ते-उड़ते कौए की नज़र एक व्यक्ति पर पड़ी, जो सर पर एक दही का मटका लिए बाज़ार में बेचने के लिए जा रहा था| कौए ने सोचा क्यों ना में उड़ते-उड़ते जाकर मटके पर बेठ जाऊ और थोडा दही खा लूँ| बस फिर क्या था बस सोचने भर की देर थी, कौआ उड़ते- उड़ते गया और उस व्यक्ति के मटके पर बेठ गया और अपनी चोंच में दही भर कर उड़ गया| अब कौए के मुह में दही का स्वाद लग चूका था हर बार वह उड़कर मटके के ऊपर बेठ जाता और अपनी चोंच में दही भरकर उड जाता| साथ जा रहे तोते को जब इस बात का पता चला तो उसने कौए को एसा करने से रोका लेकिन कौए तो कौआ ठहरा, उसने फिर उड़न भरी और अपनी चोंच में ढेर सारा दही भर कर खाने लगा| थोड़ी ही देर में किसान को कौए की चोरी का पता चल गया| किसान ने कोए को पकड़ने की काफी कोचिश की लेकिन वह असफल रहा| थोड़ी देर में किसान जब कौए से परेशान हो गया तो उसने कौए को सबक सिखाने का मन बनाया| 🌷🌷 किसान ने मटके को रास्ते में रख दिया और एक पेड के पीछे चुप कर देखने लगा| कौए को जब मटके के आस पास कोई नहीं दिखा तो वह फिर आया और चोंच में दही भर कर पेड की डाल पर बेथ कर खाने लगा| किसान ने कौए को सबक सिखाने के लिए हाथ में पत्थर लेकर कौए की तरफ फैका| लेकिन कौआ होंशियार था| जैसे ही उसे पता चला की किसान ने उसे मरने के लिए पत्थर फैका तो वह उड़ गया| जैसे ही कौआ उडा, पत्थर जाकर सीधा तोते को लगा और तोता मुर्चित होकर ज़मीन पर आ गिरा और कुछ देर में ही तोता वीरगति को प्राप्त हो गया| 🌷🌷 तो प्रभु भक्तो कहानी का तर्क यही है, कि हम चाहे कितने ही अच्छे हो लेकिन अगर हमारा संग ख़राब है तो कभी भी हम एक बड़ी मुसीबत में फस सकते हैं| 🌸जय श्री कृष्णा🌸राधा सखी👸 🌸🌷🌸🌷🌸🌷🌸

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भगवती पार्वती जी ने भगवान शंकर जी से पूछा...भगवान श्री कृष्ण के मनोहारी रूप की प्राप्ति कैसे हो सकती है:- भगवान शंकर श्री कृष्ण के अंगो का वर्णन करते है तथा उनके नख-शिख-शोभा श्रृंगार का वर्णन करते हुए उनके महत्व का विवेचन करते हुए कहते है ! जिस समय वे टेढ़ी गर्दन करके खड़े होते हैं उस समय अंनत कोटि कामदेवों से भी अधिक सुंदर दीखते है ! वे अपनी तिरछी चितवन तथा मुधर, मंद मुस्कान द्वारा करोड़ों कामदेवों के समान सुंदरता धारण कर अपने सिकोड़े हुए अधरों पर वंशी रखकर बजा रहे है; और उसी मुरली की मुधर स्वर लहरी से त्रिभुवन को मोहित करते हुए सबको प्रेम सुधा सागर में निमगन कर रहे हैं! देवी ! जिनके नखचन्द्र किरँणो की महिमा का भी अंत नहीं है, उन्हीं भगवान श्री कृष्ण की महिमा के संबंध में कुछ और बता रहा हूँ ! त्रिगुणमय अंनतकोटि ब्रहमाण्डों के जितने ब्रह्मा विष्णु महेश्वर है, सब इन श्री कृष्ण की कला के करोड़वें-करोड़वें अंश से उत्पन्न है ! सृष्टि स्थिति प्रलय की शक्ति से युक्त वे ब्रह्मादि देवता उन्हीं श्री कृष्ण के वैभव है! उन श्री कृष्ण के अंश का जो करोड़वां उसके भी करोड़ अंश करने पर एक एक अंश कला से ऐसे असंख्य कामदेवों की उत्पति होती है जो इस ब्रहमाण्ड में सिथ्त होकर जगत के जीवों को मोह में डालते है ! श्री कृष्ण की शोभा कांति के करोड़वें अंश से जो किरणें निकलती है, वे अनेकों सूर्य के रूप में प्रकट होती है, वे परमानंद रसामृत से परिपूर्ण है! वे परमानंद और चैतन्यमयी है, उन्हीं से इस विश्व के ज्योतिर्मय जीव जीवन धारण किए हुए हैं ! जो भगवान के ही कोटि कोटि अंश है ! उनके चरणयुगल के नख रूपी चंद्रकांति से निकलने वाली प्रभा को ही पूर्ण ब्रह्म बताया गया है, जो सबका कारण है और वेदों के लिए भी दुर्गम है ! विश्व को मोहित करने वाला जो नाना प्रकार के पुष्पादि का सौरभ है वह सब उनके श्री विग्रह की दिव्य सुगंध का करोड़वां हिस्सा है ! इन श्री कृष्ण की प्रिया, प्राणवल्लभा श्री राधा है ! इन्हीं श्री राधिका के करोड़वें अंश से त्रिगुण दुर्गादि देवियों की उत्पत्ति हुई है! इन श्री राधिका के पद रजस्पर्श से करोड़ों विष्णु उत्पन्न होते है ! (भक्त शिरोमणि श्री राधा बाबा जी) श्री राधा!

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जय श्री राधे... #पुत्रदा_एकादशी... युधिष्ठिर बोले: श्रीकृष्ण ! कृपा करके पौष मास के शुक्लपक्ष की एकादशी का माहात्म्य बतलाइये । उसका नाम क्या है? उसे करने की विधि क्या है ? उसमें किस देवता का पूजन किया जाता है ? भगवान श्रीकृष्ण ने कहा: राजन्! पौष मास के शुक्लपक्ष की जो एकादशी है, उसका नाम ‘पुत्रदा’ है। ‘पुत्रदा एकादशी’ को नाम-मंत्रों का उच्चारण करके फलों के द्वारा श्रीहरि का पूजन करे । नारियल के फल, सुपारी, बिजौरा नींबू, जमीरा नींबू, अनार, सुन्दर आँवला, लौंग, बेर तथा विशेषत: आम के फलों से देवदेवेश्वर श्रीहरि की पूजा करनी चाहिए । इसी प्रकार धूप दीप से भी भगवान की अर्चना करे । ‘पुत्रदा एकादशी’ को विशेष रुप से दीप दान करने का विधान है । रात को वैष्णव पुरुषों के साथ जागरण करना चाहिए । जागरण करनेवाले को जिस फल की प्राप्ति होति है, वह हजारों वर्ष तक तपस्या करने से भी नहीं मिलता । यह सब पापों को हरनेवाली उत्तम तिथि है । चराचर जगतसहित समस्त त्रिलोकी में इससे बढ़कर दूसरी कोई तिथि नहीं है । समस्त कामनाओं तथा सिद्धियों के दाता भगवान नारायण इस तिथि के अधिदेवता हैं । पूर्वकाल की बात है, भद्रावतीपुरी में राजा सुकेतुमान राज्य करते थे। उनकी रानी का नाम चम्पा था। राजा को बहुत समय तक कोई वंशधर पुत्र नहीं प्राप्त हुआ । इसलिए दोनों पति पत्नी सदा चिन्ता और शोक में डूबे रहते थे। राजा के पितर उनके दिये हुए जल को शोकोच्छ्वास से गरम करके पीते थे । ‘राजा के बाद और कोई ऐसा नहीं दिखायी देता, जो हम लोगों का तर्पण करेगा’ यह सोच सोचकर पितर दु:खी रहते थे। एक दिन राजा घोड़े पर सवार हो गहन वन में चले गये। पुरोहित आदि किसी को भी इस बात का पता न था। मृग और पक्षियों से सेवित उस सघन कानन में राजा भ्रमण करने लगे। मार्ग में कहीं सियार की बोली सुनायी पड़ती थी तो कहीं उल्लुओं की। जहाँ तहाँ भालू और मृग दृष्टिगोचर हो रहे थे। इस प्रकार घूम घूमकर राजा वन की शोभा देख रहे थे, इतने में दोपहर हो गयी। राजा को भूख और प्यास सताने लगी। वे जल की खोज में इधर उधर भटकने लगे। किसी पुण्य के प्रभाव से उन्हें एक उत्तम सरोवर दिखायी दिया, जिसके समीप मुनियों के बहुत से आश्रम थे। शोभाशाली नरेश ने उन आश्रमों की ओर देखा। उस समय शुभ की सूचना देनेवाले शकुन होने लगे । राजा का दाहिना नेत्र और दाहिना हाथ फड़कने लगा, जो उत्तम फल की सूचना दे रहा था । सरोवर के तट पर बहुत से मुनि वेदपाठ कर रहे थे । उन्हें देखकर राजा को बड़ा हर्ष हुआ। वे घोड़े से उतरकर मुनियों के सामने खड़े हो गये और पृथक् पृथक् उन सबकी वन्दना करने लगे । वे मुनि उत्तम व्रत का पालन करनेवाले थे । जब राजा ने हाथ जोड़कर बारंबार दण्डवत् किया, तब मुनि बोले : ‘राजन् ! हम लोग तुम पर प्रसन्न हैं।’ राजा बोले: आप लोग कौन हैं ? आपके नाम क्या हैं तथा आप लोग किसलिए यहाँ एकत्रित हुए हैं? कृपया यह सब बताइये । मुनि बोले: राजन् ! हम लोग विश्वेदेव हैं । यहाँ स्नान के लिए आये हैं । माघ मास निकट आया है । आज से पाँचवें दिन माघ का स्नान आरम्भ हो जायेगा । आज ही ‘पुत्रदा’ नाम की एकादशी है, जो व्रत करनेवाले मनुष्यों को पुत्र देती है । राजा ने कहा: विश्वेदेवगण ! यदि आप लोग प्रसन्न हैं तो मुझे पुत्र दीजिये। मुनि बोले: राजन्! आज ‘पुत्रदा’ नाम की एकादशी है। इसका व्रत बहुत विख्यात है। तुम आज इस उत्तम व्रत का पालन करो । महाराज! भगवान केशव के प्रसाद से तुम्हें पुत्र अवश्य प्राप्त होगा । भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं: युधिष्ठिर ! इस प्रकार उन मुनियों के कहने से राजा ने उक्त उत्तम व्रत का पालन किया । महर्षियों के उपदेश के अनुसार विधिपूर्वक ‘पुत्रदा एकादशी’ का अनुष्ठान किया । फिर द्वादशी को पारण करके मुनियों के चरणों में बारंबार मस्तक झुकाकर राजा अपने घर आये । तदनन्तर रानी ने गर्भधारण किया । प्रसवकाल आने पर पुण्यकर्मा राजा को तेजस्वी पुत्र प्राप्त हुआ, जिसने अपने गुणों से पिता को संतुष्ट कर दिया । वह प्रजा का पालक हुआ । इसलिए राजन्! ‘पुत्रदा’ का उत्तम व्रत अवश्य करना चाहिए । मैंने लोगों के हित के लिए तुम्हारे सामने इसका वर्णन किया है। जो मनुष्य एकाग्रचित्त होकर ‘पुत्रदा एकादशी’ का व्रत करते हैं, वे इस लोक में पुत्र पाकर मृत्यु के पश्चात् स्वर्गगामी होते हैं। इस माहात्म्य को पढ़ने और सुनने से अग्निष्टोम यज्ञ का फल मिलता है । जय श्री राधे... जय श्री हरिदास...

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एक पंडित रोज रानी के पास कथा करता था। कथा के अंत में सबको कहता कि ‘राम कहे तो बंधन टूटे’। तभी पिंजरे में बंद तोता बोलता, ‘यूं मत कह रे पंडित झूठे’। पंडित को क्रोध आता कि ये सब क्या सोचेंगे, रानी क्या सोचेगी। पंडित अपने गुरु के पास गया, गुरु को सब हाल बताया। गुरु तोते के पास गया और पूछा तुम ऐसा क्यों कहते हो? तोते ने कहा- ‘मैं पहले खुले आकाश में उड़ता था। एक बार मैं एक आश्रम में जहां सब साधू-संत ‘राम-राम कहे तो बंधन छूटे’ बोल रहे थे, वहां बैठा तो मैंने भी ‘राम-राम कहे तो बंधन छूटे’ बोलना शुरू कर दिया। एक दिन मैं उसी आश्रम में एक संत ने मुझे पकड़ कर पिंजरे में बंद कर लिया। आश्रम में एक सेठ ने मुझे संत को कुछ पैसे देकर खरीद लिया। अब सेठ ने मुझे चांदी के पिंजरे में रखा, मेरा बंधन बढ़ता गया। निकलने की कोई संभावना न रही। एक दिन उस सेठ ने राजा से अपना काम निकलवाने के लिए मुझे राजा को गिफ्ट कर दिया, राजा ने खुशी-खुशी मुझे ले लिया, क्योंकि मैं राम-राम बोलता था। रानी धार्मिक प्रवृत्ति की थी तो राजा ने रानी को दे दिया। अब मैं कैसे कहूं कि ‘राम-राम कहे तो बंधन छूटे’। तोते ने गुरु से कहा आप ही कोई युक्ति बताएं, जिससे मेरा बंधन छूट जाए। गुरु बोले- आज तुम चुपचाप सो जाओ, हिलना भी नहीं। रानी समझेगी मर गया और छोड़ देगी। ऐसा ही हुआ। दूसरे दिन कथा के बाद जब तोता नहीं बोला, तब संत ने आराम की सांस ली। रानी ने सोचा तोता तो गुमसुम पढ़ा है, शायद मर गया। रानी ने पिंजरा खोल दिया, तभी तोता पिंजरे से निकलकर आकाश में उड़ते हुए बोलने लगा ‘सतगुरु मिले तो बंधन छूटे’। उपरोक्त कथा से मिली शिक्षा- शास्त्र कितना भी पढ़ लो, कितना भी जाप कर लो, लेकिन सच्चे गुरु के बिना बंधन नहीं छूटता।

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(((( भगवान् की शरण )))) . बहुत-सी भेड़-बकरियाँ जंगल में चरने गयीं। उनमें से एक बकरी चरते-चरते एक लता में उलझ गयी। . उसको उस लता में से निकलने में बहुत देर लगी, तब तक अन्य सब भेड़-बकरियाँ अपने घर पहुँच गयीं। . अँधेरा भी हो रहा था। वह बकरी घूमते-घूमते एक सरोवर के किनारे पहुँची। . वहाँ किनारे की गीली जमीन पर सिंह का एक चरण-चिह्न मँढा हुआ था। वह उस चरण-चिह्न के शरण होकर उसके पास बैठ गयी। . रात में जंगली सियार, भेड़िया, बाघ आदि प्राणी बकरी को खाने के लिये पास में जाते हैं तो वह बकरी बता देती है... . ‘पहले देख लेना कि मैं किसकी शरण में हूँ; तब मुझे खाना !’ . वे चिह्न को देखकर कहते हैं.. ‘अरे, यह तो सिंह के चरण-चिह्न के शरण है, जल्दी भागो यहाँ से ! सिंह आ जायगा तो हमको मार डालेगा।’ . इस प्रकार सभी प्राणी भयभीत होकर भाग जातें हैं। . अन्त में जिसका चरण-चिह्न था, वह सिंह स्वयं आया और बकरी से बोला... . तू जंगल में अकेली कैसे बैठी है ? . बकरी ने कहा.. यह चरण-चिह्न देख लेना, फिर बात करना। जिसका यह चरण-चिह्न है, उसी के मैं शरण हुई बैठी हूँ। . सिंह ने देखा, ओह ! यह तो मेरा ही चरण-चिह्न है, यह बकरी तो मेरे ही शरण हुई ! . सिंह ने बकरी को आश्वासन दिया कि अब तुम डरो मत, निर्भय होकर रहो। रात में जब जल पीने के लिये हाथी आया तो सिंह ने हाथी से कहा.. . तू इस बकरी को अपनी पीठ पर चढ़ा ले। इसको जंगल में चराकर लाया कर और हरदम अपनी पीठ पर ही रखा कर, . नहीं तो तू जानता नहीं, मैं कौन हूँ ? मार डालूँगा ! . सिंह की बात सुनकर हाथी थर-थर काँपने लगा। उसने अपनी सूँड़ से झट बकरी को पीठ पर चढ़ा लिया। . अब वह बकरी निर्भय होकर हाथी की पीठ पर बैठे-बैठे ही वृक्षों की ऊपर की कोंपलें खाया करती और मस्त रहती। . खोज पकड़ सैंठे रहो, धणी मिलेंगे आय। अजया गज मस्तक चढ़े, निर्भय कोंपल खाय॥ . ऐसे ही जब मनुष्य भगवान्‌ के शरण हो जाता है, उनके चरणों का सहारा ले लेता है तो वह सम्पूर्ण प्राणियों से, विघ्न-बाधाओं से निर्भय हो जाता है। . उसको कोई भी भयभीत नहीं कर सकता, कोई भी कुछ बिगाड़ नहीं सकता। . जो जाको शरणो गहै, वाकहँ ताकी लाज। उलटे जल मछली चले, बह्यो जात गजराज॥ . भगवान्‌ के साथ काम, भय, द्वेष, क्रोध, स्‍नेह आदि से भी सम्बन्ध क्यों न जोड़ा जाय, वह भी जीव का कल्याण करनेवाला ही होता है। . तात्पर्य यह हुआ कि काम, क्रोध, द्वेष आदि किसी तरह से भी जिनका भगवान्‌ के साथ सम्बन्ध जुड़ गया, उनका तो उद्धार हो ही गया, . पर जिन्होंने किसी तरह से भी भगवान्‌ के साथ सम्बन्ध नहीं जोड़ा, उदासीन ही रहे, वे भगवत्प्राप्ति से वंचित रह गये। ~~~~~~~~~~~~~~~~~ ((((((( जय जय श्री राधे ))))))) ~~~~~~~~~~~~~~~~~

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