(((( भगवान् की शरण )))) . बहुत-सी भेड़-बकरियाँ जंगल में चरने गयीं। उनमें से एक बकरी चरते-चरते एक लता में उलझ गयी। . उसको उस लता में से निकलने में बहुत देर लगी, तब तक अन्य सब भेड़-बकरियाँ अपने घर पहुँच गयीं। . अँधेरा भी हो रहा था। वह बकरी घूमते-घूमते एक सरोवर के किनारे पहुँची। . वहाँ किनारे की गीली जमीन पर सिंह का एक चरण-चिह्न मँढा हुआ था। वह उस चरण-चिह्न के शरण होकर उसके पास बैठ गयी। . रात में जंगली सियार, भेड़िया, बाघ आदि प्राणी बकरी को खाने के लिये पास में जाते हैं तो वह बकरी बता देती है... . ‘पहले देख लेना कि मैं किसकी शरण में हूँ; तब मुझे खाना !’ . वे चिह्न को देखकर कहते हैं.. ‘अरे, यह तो सिंह के चरण-चिह्न के शरण है, जल्दी भागो यहाँ से ! सिंह आ जायगा तो हमको मार डालेगा।’ . इस प्रकार सभी प्राणी भयभीत होकर भाग जातें हैं। . अन्त में जिसका चरण-चिह्न था, वह सिंह स्वयं आया और बकरी से बोला... . तू जंगल में अकेली कैसे बैठी है ? . बकरी ने कहा.. यह चरण-चिह्न देख लेना, फिर बात करना। जिसका यह चरण-चिह्न है, उसी के मैं शरण हुई बैठी हूँ। . सिंह ने देखा, ओह ! यह तो मेरा ही चरण-चिह्न है, यह बकरी तो मेरे ही शरण हुई ! . सिंह ने बकरी को आश्वासन दिया कि अब तुम डरो मत, निर्भय होकर रहो। रात में जब जल पीने के लिये हाथी आया तो सिंह ने हाथी से कहा.. . तू इस बकरी को अपनी पीठ पर चढ़ा ले। इसको जंगल में चराकर लाया कर और हरदम अपनी पीठ पर ही रखा कर, . नहीं तो तू जानता नहीं, मैं कौन हूँ ? मार डालूँगा ! . सिंह की बात सुनकर हाथी थर-थर काँपने लगा। उसने अपनी सूँड़ से झट बकरी को पीठ पर चढ़ा लिया। . अब वह बकरी निर्भय होकर हाथी की पीठ पर बैठे-बैठे ही वृक्षों की ऊपर की कोंपलें खाया करती और मस्त रहती। . खोज पकड़ सैंठे रहो, धणी मिलेंगे आय। अजया गज मस्तक चढ़े, निर्भय कोंपल खाय॥ . ऐसे ही जब मनुष्य भगवान्‌ के शरण हो जाता है, उनके चरणों का सहारा ले लेता है तो वह सम्पूर्ण प्राणियों से, विघ्न-बाधाओं से निर्भय हो जाता है। . उसको कोई भी भयभीत नहीं कर सकता, कोई भी कुछ बिगाड़ नहीं सकता। . जो जाको शरणो गहै, वाकहँ ताकी लाज। उलटे जल मछली चले, बह्यो जात गजराज॥ . भगवान्‌ के साथ काम, भय, द्वेष, क्रोध, स्‍नेह आदि से भी सम्बन्ध क्यों न जोड़ा जाय, वह भी जीव का कल्याण करनेवाला ही होता है। . तात्पर्य यह हुआ कि काम, क्रोध, द्वेष आदि किसी तरह से भी जिनका भगवान्‌ के साथ सम्बन्ध जुड़ गया, उनका तो उद्धार हो ही गया, . पर जिन्होंने किसी तरह से भी भगवान्‌ के साथ सम्बन्ध नहीं जोड़ा, उदासीन ही रहे, वे भगवत्प्राप्ति से वंचित रह गये। ~~~~~~~~~~~~~~~~~ ((((((( जय जय श्री राधे ))))))) ~~~~~~~~~~~~~~~~~

(((( भगवान् की शरण ))))
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बहुत-सी भेड़-बकरियाँ जंगल में चरने गयीं। उनमें से एक बकरी चरते-चरते एक लता में उलझ गयी। 
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उसको उस लता में से निकलने में बहुत देर लगी, तब तक अन्य सब भेड़-बकरियाँ अपने घर पहुँच गयीं। 
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अँधेरा भी हो रहा था। वह बकरी घूमते-घूमते एक सरोवर के किनारे पहुँची। 
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वहाँ किनारे की गीली जमीन पर सिंह का एक चरण-चिह्न मँढा हुआ था। वह उस चरण-चिह्न के शरण होकर उसके पास बैठ गयी। 
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रात में जंगली सियार, भेड़िया, बाघ आदि प्राणी बकरी को खाने के लिये पास में जाते हैं तो वह बकरी बता देती है...
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‘पहले देख लेना कि मैं किसकी शरण में हूँ; तब मुझे खाना !’ 
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वे चिह्न को देखकर कहते हैं.. ‘अरे, यह तो सिंह के चरण-चिह्न के शरण है, जल्दी भागो यहाँ से ! सिंह आ जायगा तो हमको मार डालेगा।’ 
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इस प्रकार सभी प्राणी भयभीत होकर भाग जातें हैं। 
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अन्त में जिसका चरण-चिह्न था, वह सिंह स्वयं आया और बकरी से बोला...
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तू जंगल में अकेली कैसे बैठी है ? 
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बकरी ने कहा.. यह चरण-चिह्न देख लेना, फिर बात करना। जिसका यह चरण-चिह्न है, उसी के मैं शरण हुई बैठी हूँ। 
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सिंह ने देखा, ओह ! यह तो मेरा ही चरण-चिह्न है, यह बकरी तो मेरे ही शरण हुई ! 
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सिंह ने बकरी को आश्वासन दिया कि अब तुम डरो मत, निर्भय होकर रहो।

रात में जब जल पीने के लिये हाथी आया तो सिंह ने हाथी से कहा..
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तू इस बकरी को अपनी पीठ पर चढ़ा ले। इसको जंगल में चराकर लाया कर और हरदम अपनी पीठ पर ही रखा कर, 
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नहीं तो तू जानता नहीं, मैं कौन हूँ ? मार डालूँगा ! 
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सिंह की बात सुनकर हाथी थर-थर काँपने लगा। उसने अपनी सूँड़ से झट बकरी को पीठ पर चढ़ा लिया। 
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अब वह बकरी निर्भय होकर हाथी की पीठ पर बैठे-बैठे ही वृक्षों की ऊपर की कोंपलें खाया करती और मस्त रहती।
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खोज पकड़ सैंठे रहो, धणी मिलेंगे आय।
अजया गज मस्तक चढ़े, निर्भय कोंपल खाय॥
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ऐसे ही जब मनुष्य भगवान्‌ के शरण हो जाता है, उनके चरणों का सहारा ले लेता है तो वह सम्पूर्ण प्राणियों से, विघ्न-बाधाओं से निर्भय हो जाता है। 
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उसको कोई भी भयभीत नहीं कर सकता, कोई भी कुछ बिगाड़ नहीं सकता।
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जो जाको शरणो गहै, वाकहँ ताकी लाज।
उलटे जल मछली चले, बह्यो जात गजराज॥
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भगवान्‌ के साथ काम, भय, द्वेष, क्रोध, स्‍नेह आदि से भी सम्बन्ध क्यों न जोड़ा जाय, वह भी जीव का कल्याण करनेवाला ही होता है। 
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तात्पर्य यह हुआ कि काम, क्रोध, द्वेष आदि किसी तरह से भी जिनका भगवान्‌ के साथ सम्बन्ध जुड़ गया, उनका तो उद्धार हो ही गया, 
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पर जिन्होंने किसी तरह से भी भगवान्‌ के साथ सम्बन्ध नहीं जोड़ा, उदासीन ही रहे, वे भगवत्प्राप्ति से वंचित रह गये।

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 ((((((( जय जय श्री राधे )))))))
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RenuSuresh Dec 29, 2018
Jai shree Radhe Krishna ji good night ji🙏🙏

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Rekha singh Apr 21, 2019

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!!! अमृत वचन !!! 🌷परमात्मा के संग में योग और संसार के संग में भोग होता है.... 🌷सुख की इच्छा,आशा और भोग यह तीनों दुखो के मूल कारण है.... 🌷शरीर को मैं और मेरा मानना ही मृत्यु है.... 🌷नाशवान की चाह छोड़ने से अविनाशी तत्व की प्राप्ति होती है.... 🌷आप भगवान् को नहीं देखते पर भगवान् आपको निरंतर देख रहा है.... 🌷“ऐसा होना चाहिए, ऐसा नहीं होना चाहिए” इसी में सब दुःख भरे है.... 🌷अपना स्वभाव शुद्ध बनाने के सामान कोई उन्नति नहीं.... 🌷अच्छाई का अभिमान बुराई की जड़ है.... 🌷शरीर को में मेरा मानने से तरह तरह के दुःख आते है.... 🌷दूसरे के दोष देखने से न हमारा भला होता हैं दूसरे का.... 🌷आराम चाहने वाला वास्तविक उन्नति नहीं कर सकता, परमात्मा दूर नहीं है केवल पाने की लगन में कमी है... 🌷भगवान् के विमुख हो कर संसार के सन्मुख होने जैसा कोई पाप नहीं... 🌷परमात्मा प्राप्ति के लिए भाव की प्रधानता है क्रिया की नहीं..... 🌷मन में किसी वस्तु की चाह रखना ही दरिद्रता है, स्वार्थ और अभिमान त्याग करने से साधुवाद आती है .... एक भी बात दिल को छू गई हो तो इस पोस्ट को शेयर जरूर करें। ।।सर्वे भवन्तु सुखिनः।।

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Suchi Singhal Apr 21, 2019

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Rachna Jerath Apr 21, 2019

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prakash Apr 21, 2019

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Rekha singh Apr 21, 2019

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Kavita Saini Apr 21, 2019

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Mamta Chauhan Apr 21, 2019

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