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SunitaSharma May 7, 2021

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R b dubey May 6, 2021

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Omprakash Upadhyay May 6, 2021

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Lucky Sharma May 7, 2021

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. वैशाखमास-माहात्म्य पोस्ट - 10 वैशाख मास के माहात्म्य-श्रवण से सर्प क उद्धार और एक वैशाख धर्म के पालन तथा रामनाम-जप से व्याध का वाल्मीकि होना - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - देव कहते हैं- तदनन्तर व्याध सहित शंख मुनि ने विस्मित होकर पूछा- ' तुम कौन हो? और तुम्हें यह दशा कैसे प्राप्त हुई थी? सर्प ने कहा- पूर्वजन्म में मैं प्रयाग का ब्राह्मण था। मेरे पिता का नाम कुशीद मुनि और मेरा नाम रोचन था मैं धनाढ्य, अनेक पुत्रों का पिता और सदैव अभिमान से दूषित था। बैठे-बैठे बहुत बकवाद किया करता था। बैठना, सोना, नींद लेना मैथुन करना, जुआ खेलना, लोगों की बातें करना और सूद लेना यही मेरे व्यापार थे। मैं लोकनिन्दा से डरकर नाम मात्र के शुभ कर्म करता था; सो भी दम्भ के साथ उन कर्मों में मेरी श्रद्धा नहीं थी। इस प्रकार मुझ दुष्ट और दुर्बुद्धि के कितने ही वर्ष बीत गये। तदनन्तर इसी वैशाख मास में जयन्त नामक ब्राह्मण प्रयाग क्षेत्र में निवास करने वाले पुण्यात्मा द्विजों को वैशाख मास के धर्म सुनाने लगे स्त्री, पुरुष, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र- सहस्रों श्रोता प्रात:काल स्नान करके अविनाशी भगवान् विष्णु की पूजा के पश्चात् प्रतिदिन जयन्त की कही हुई कथा सुनते थे। वे सभी पवित्र एवं मौन होकर उस भगवत् कथा में अनुरक्त रहते थे एक दिन मैं भी कौतूहलवश देखने की इच्छा से श्रोताओं की उस मण्डली में जा बैठा। मेरे मस्तक पर पगड़ी बँधी थी। इसलिये मैंने नमस्कार तक नहीं किया और संसारी वार्तालाप में अनुरक्त हो कथा में विघ्न डालने लगा। कभी मैं कपड़े फैलाता, कभी किसी की निन्दा करता और कभी जोर से हँस पड़ता था। जब तक कथा समाप्त हुई, तब तक मैंने इसी प्रकार समय बिताया। तत्पश्चात् दूसरे दिन सन्निपात रोग से मेरी मृत्यु हो गयी। मैं तपाये हुए शीशे के जल से भरे हुए हलाहल नरक में डाल दिया गया और चौदह मन्वन्तरों तक वहाँ यातना भोगता रहा। उसके बाद चौरासी लाख योनियों में क्रमश: जन्म लेता और मरता हुआ में इस समय क्रूर तमोगुणी सर्प होकर इस वृक्ष के खोंखले में निवास करता था। मुने ! सौभाग्यवश आपके मुखारविन्द से निकली हुई अमृतमयी कथा को मैंने अपने दोनों नेत्रों से सुना, जिससे तत्काल मेरे सारे पाप नष्ट हो गये मुनिश्रेष्ठ ! मैं नहीं जानता कि आप किस जन्म के मेरे बन्धु हैं; क्योंकि मैंने कभी किसी का उपकार नहीं किया है तो भी मुझ पर आपकी कृपा हुई। जिनका चित्त समान है, जो सब प्राणियों पर दया करने वाले साधु पुरुष हैं, उनमें परोपकार की स्वाभाविक प्रवृति होती है। उनकी कभी किसी के प्रति विपरीत बुद्धि नहीं होती। आज आप मुझ पर कृपा कीजिये, जिससे मेरी बुद्धि धर्म में लगे। देवाधिदेव भगवान् विष्णु की मुझे कभी विस्मृति न हो और साधु चरित्र वाले महापुरुषों का सदा ही संग प्राप्त हो। जो लोग मद से अंधे हो रहे हों, उनके लिये एकमात्र दरिद्रता ही उत्तम अंजन है। इस प्रकार नाना भाँति से स्तुति करके रोचन ने बार-बार शंख को प्रणाम किया और हाथ जोड़कर चुपचाप उनके आगे खड़ा हो गया। तब शंख ने कहा- ब्रह्मन्! तुमने वैशाख मास और भगवान् विष्णु का माहात्म्य सुना है, इससे उसी क्षण तुम्हारा सारा बन्धन नष्ट हो गया। द्विजश्रेष्ठ! परिहास भय, क्रोध, द्वेष, कामना अथवा स्नेह से भी एक बार भगवान् विष्णु के पापहारी नाम का उच्चारण करके बड़े भारी पापी भी रोग-शोक रहित वैकुण्ठधा में चले जाते हैं। फिर जो श्रद्धा से युक्त हो क्रोध और इन्द्रियों को जीतकर सबके प्रति दया भाव रखते हुए भगवान् की कथा सुनते हैं, वे उनके लोकमें जाते हैं, इस विषय में तो कहना ही क्या है। कितने ही मनुष्य केवल भक्ति के बल से एकमात्र भगवान् की कथा-वार्ता में तत्पर हो अन्य सब धर्मों का त्याग कर देने पर भी भगवान् विष्णु के परम पद को पा लेते हैं। भक्ति से अथवा द्वेष आदि से भी जो कोई भगवान् की भक्ति करते हैं, वे भी प्राण हारिणी पूतना की भाँति परमपद को प्राप्त होते हैं। सदा महात्मा पुरुषों का संग और उन्हीं के विषय में वार्तालाप करना चाहिये। रचना शिथिल होने पर भी जिसके प्रत्येक श्लोक में भगवान् के सुयश सूचक नाम हैं, वही वाणी जनसमुदाय की पापराशि का नाश करने वाली होती है; क्योंकि साधु पुरुष उसी को सुनते, गाते और कहते हैं। जो भगवान् किसी से कष्ट साध्य सेवा नहीं चाहते, आसन आदि विशेष उपकरणों की इच्छा नहीं रखते तथा सुन्दर रूप और जवानी नहीं चाहते, अपितु एक बार भी स्मरण कर लेने पर अपना परम प्रकाशमय वैकुण्ठ धाम दे डालते हैं, उन दयालु भगवान् को छोड़कर मनुष्य किसकी शरण में जाय। उन्हीं रोग-शोक से रहित, चित्त द्वारा चिन्तन करने योग्य, अव्यक्त, दयानिधान, भक्तवत्सल भगवान् नारायण की शरण में जाओ। महामते ! वैशाख मास में कहे हुए इन सब धर्मों का पालन करो, उससे प्रसन्न होकर भगवान् जगन्नाथ तुम्हारा कल्याण करेंगे। ऐसा कहकर शंख मुनि व्याध की ओर देखकर चुप हो रहे। तब उस दिव्य पुरुष ने पुन: इस प्रकार कहा- 'मुने ! मैं धन्य हूँ, आप-जैसे दयालु महात्मा ने मुझपर अनुग्रह किया है। मेरी कुत्सित योनि दूर हो गयी और अब मैं परमगति को प्राप्त हो रहा हूँ, यह मेरे लिये सौभाग्य की बात है।' यो कहकर दिव्य पुरुष ने शंख मुनि की परिक्रमा की तथा उनकी आज्ञा लेकर वह दिव्य लोक को चला गया। तदनन्तर सन्ध्या हो गयी। व्याध ने शंख को अपनी सेवा से सन्तुष्ट किया और उन्होंने सांयकाल की सन्ध्योपासना करके शेष रात्रि व्यतीत की। भगवान् के लीलावतारों की कथावार्ता द्वारा रात व्यतीत करके शंख मुनि ब्राह्ममुहूर्त में उठे और दोनों पैर धोकर मौनभाव से तारक ब्रह्म का ध्यान करने लगे। तत्पश्चात् शौचादि क्रिया से निवृत्त होकर वैशाख मास में सूर्योदय से पहले स्नान किया और सन्ध्या-तर्पण आदि सब कर्म समाप्त करके उन्होंने हर्षयुक्त हृदय से व्याध को बुलाया। बुलाकर उसे 'राम' इस दो अक्षर वाले नाम का उपदेश दिया, जो वेद से भी अधिक शुभकारक है। उपदेश देकर इस प्रकार कहा-'भगवान् विष्णु का एक-एक नाम भी सम्पूर्ण वेदों से अधिक महत्त्वशाली माना गया है। ऐसे अनन्त नामों से अधिक है भगवान् विष्णुका सहस्रनाम। उस सहस्रनाम के समान राम-नाम माना गया है। इसलिये व्याध! तुम निरन्तर रामनाम का जप करो और मृत्युपर्यन्त मेरे बताये हुए धर्मो का पालन करते रहो। इस धर्म के प्रभाव से तुम्हारा वल्मिक ऋषि के घर जन्म होगा और तुम इस पृथ्वी पर वाल्मीकि नाम से प्रसिद्ध होओगे।' व्याध को ऐसा आदेश देकर मुनिवर शंख ने दक्षिण दिशा को प्रस्थान किया व्याध ने भी शंख मुनि की परिक्रमा करके बार-बार उनके चरणों में प्रणाम किया और जब तक वे दिखायी दिये, तब तक उन्हीं की ओर देखता रहा। फिर उसने अति योग्य वैशाखोक्त धर्मो का पालन किया। जंगली कैथ, कटहल, जामुन और आम आदि के फलों से राह चलने वाले थके-माँदे पथिकों को वह भोजन कराता था। जूता, चन्दन, छाता, पंखा आदि के द्वारा तथा बालू के बिछावन और छाया आदि की व्यवस्था से पथिकों के परिश्रम और पसीने का निवारण करता था। प्रात:काल स्नान करके दिन-रात राम-नामका जप करता था। इस प्रकार धर्मानुष्ठान करके वह दूसरे जन्म में बल्मिक का पुत्र हुआ। उस समय वह महायशस्वी बाल्मीकि के नामसे विख्यात हुआ। उन्हीं बाल्मीकिजी ने अपने मनोहर प्रबन्ध रचना द्वारा संसार में दिव्य राम-कथा को प्रकाशित किया, जो समस्त कर्म-बन्धनों का उच्छेद करने वाली है। मिथिलापते ! देखो, वैशाख का माहात्म्य कैसा ऐश्वर्य प्रदान करने वाला है, जिससे एक व्याध भी परम दुर्लभ ऋषिभाव को प्राप्त हो गया यह सेमांचकारी उपाख्यान सब पापों का नाश करने वाला हैं। जो इसे सुनता और सुनाता है, वह पुनः माता के स्तनका दूध पीने वाला नहीं होता। ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" "कुमार रौनक कश्यप " ******************************************

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. वैशाखमास-माहात्म्य पोस्ट - 09 भगवान् विष्णु के स्वरूप का विवेचन, प्राण की श्रेष्ठता, जीवों के विभिन्न स्वभावों और कर्मों का कारण तथा भागवत धर्म - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - व्याध ने पूछा- ब्रह्मन्! आपने पहले कहा था कि भगवान् विष्णु की प्रीति के लिये कल्याणकारी भागवतधर्मो का और उनमें भी वैशाख मास में कर्तव्यरूप से बताये हुए नियमों का विशेष रूप से पालन करना चाहिये। वे भगवान् विष्णु कैसे हैं? उनका क्या लक्षण है? उनकी सत्ता में क्या प्रमाण है तथा वे सर्वव्यापी भगवान् किनके द्वारा जानने योग्य हैं? वैष्णव धर्म कैसे हैं ? और किससे भगवान् श्रीहरि प्रसन्न होते हैं? महामते ! मैं आपका किंकर हूँ, मुझे ये सब बातें बताइये। व्याध के इस प्रकार पूछने पर शंख ने रोगशोक से रहित सम्पूर्ण जगत् के स्वामी भगवान् नारायण को प्रणाम करके कहा- व्याध! भगवान् विष्णु का स्वरूप कैसा है, यह सुनो। भगवान् समस्त शक्तियों के आश्रय, सम्पूर्ण गुणों की निधि तथा सबके ईश्वर बताये गये हैं। वे नि्गुण, निष्कल तथा अनन्त हैं। सत्-चित् और आनन्द-यही उनका स्वरूप है। यह जो अखिल चराचर जगत् है, अपने अधीश्वर और आश्रय के साथ नियत रूप से जिसके वश में स्थित है, जिससे इसकी उत्पत्ति, पालन, संहार, पुनरावृत्ति तथा नियमन आदि होते हैं, प्रकाश, बन्धन, मोक्ष और जीविका-इन सबकी प्रवृत्ति जहाँ से होती है, वे ही ब्रह्म नाम से प्रसिद्ध भगवान् विष्णु हैं। वे ही विद्वानों के सम्मान्य सर्वव्यापी परमेश्वर हैं। ज्ञानी पुरूषों ने उन्हीं को साक्षात् परब्रह्म कहा है। वेद, शास्त्र स्मृति, पुराण, इतिहास पांचरात्र और महाभारत- सब विष्णु स्वरूप हैं-विष्णु के ही प्रतिपादक हैं। इन्हीं के द्वारा महाविष्णु जानने योग्य हैं। वेदवेद्य, सनातनदेव भगवान् नारायण को कोई इन्द्रियों से (प्रत्यक्ष प्रमाणद्वारा), अनुमान से और तर्क से भी नहीं जान सकता है। उन्हीं के दिव्य जन्म-कर्म तथा गुणों को अपनी बुद्धि के अनुसार जानकर उनके अधीन रहने वाले जीव-समूह सदा मुक्त होते हैं। यह सम्पूर्ण जगत् प्राण से उत्पन्न हुआ है, प्राणस्वरूप है, प्राणरूपी सूत्र में पिरोया हुआ है तथा प्राणसे ही चेष्टा करता है। सबका आधारभूत यह सूत्रात्मा प्राण ही विष्णु है, - ऐसा विद्वान् पुरुष कहते हैं। व्याध ने पूछा- ब्रह्मन् ! जीवों में यह सूत्रात्मा प्राण सबसे श्रेष्ठ किस प्रकार है ? शंख ने कहा- व्याध! पूर्वकाल में सनातन देव भगवान् नारायण ने ब्रह्मा आदि देवताओं की सृष्टि करके कहा- 'देवताओ! मैं तुम्हारे सम्राट् के पद पर ब्रह्माजी की स्थापना करता हूँ, यही तुम सबके स्वामी हैं। अब तुम लोगों में जो सबसे अधिक शक्तिशाली हो, उसे तुम स्वयं ही युवराज के पद पर प्रतिष्ठित करो।' भगवान् के इस प्रकार कहने पर इन्द्र आदि सब देवता आपस में विवाद करते हुए कहने लगे-'मैं युवराज होऊँगा, मैं होऊँगा।किसी ने सूर्य को श्रेष्ठ बताया और किसी ने इन्द्र को। किन्हीं की दृष्टि में कामदेव ही सबसे श्रेष्ठ थे। कुछ लोग मौन ही खड़े रहे। आपस में कोई निर्णय होता न देखकर वे भगवान् नारायण के पास पूछने के लिये गये और प्रणाम करके हाथ जोड़कर बोले- 'महाविष्णो! हम सबने अच्छी तरह विचार कर लिया, किंतु हम सबमें श्रेष्ठ कौन है, यह हम अभी तक किसी प्रकार निश्चय न कर सके। अब आप ही निर्णय कीजिये।' तब भगवान् विष्णु ने हँसते हुए कहा- 'इस विराट् ब्रह्माण्डरूपी शरीर से जिसके निकल जाने पर यह गिर जायगा और जिसके प्रवेश करने पर पुन: उठकर खड़ा हो जायगा, वही देवता सबसे श्रेष्ठ है। भगवान् के ऐसा कहने पर सब देवताओंने कहा- अच्छा ऐसा ही हो।' तब सबसे पहले देवेश्वर जयन्त विराट् शरीर के पैर से बाहर निकला। उसके निकलने से उस शरीर को लोग पंगु कहने लगे; परंतु शरीर गिर न सका। यद्यपि वह चल नहीं पाता था तो भी सुनता, पीता, बोलता, सूँघता और देखता हुआ पूर्ववत् स्थिर रहा। तत्पश्चात् गुह्यदेश से दक्ष प्रजापति निकलकर अलग हो गये। तब लोगों ने उसे नपुंसक कहा; किंतु उस समय भी वह शरीर गिर न सका। उसके बाद विराट् शरीर के हाथ से सब देवताओं के राजा इन्द्र बाहर निकले। उस समय भी शरीरपात नहीं हुआ। विराट् पुरुष को सब लोग हस्तहीन (लूला) कहने लगे। इसी प्रकार नेत्रों से सूर्य निकले। तब लोगों ने उसे अंधा और काना कहा। उस समय भी शरीर का पतन नहीं हुआ। तदनन्तर नासिका से अश्विनीकुमार निकले, किंतु शरीर नहीं गिर सका। केवल इतना ही कहा जाने लगा कि यह सूँघ नहीं सकता। कान से अधिष्ठातृ देवियाँ दिशाएँ निकलीं। उस समय लोग उसे बधिर कहने लगे; परंतु उसकी मृत्यु नहीं हुई। तत्पश्चात् जिह्वा से वरुणदेव निकले। तब लोगों ने यही कहा कि यह पुरुष रस का अनुभव नहीं कर सकता; किंतु देहपात नहीं हुआ। तदनन्तर वाक्-इन्द्रिय से उसके स्वामी अग्निदेव निकले। उस समय उसे गूँगा कहा गया; किंतु शरीर नहीं गिरा। फिर अन्तःकरण से बोधस्वरूप रुद्र देवता अलग हो गये। उस दशा में लोगों ने उसे जड कहा; किंतु शरीर पात नहीं हुआ। सबके अन्तर में उस शरीर से प्राण निकला; तब लोगों ने उसे मरा हुआ बतलाया। इससे देवताओं के में बड़ा विस्मय हुआ। वे बोले-'हम लोगों में से जो भी इस शरीर में प्रवेश करके इसे पूर्ववत् उठा देगा, जीवित कर देगा, वही युवराज होगा।' ऐसी प्रतिज्ञा करके सब क्रमशः उस शरीर में प्रवेश करने लगे। जयन्त ने पैरों में प्रवेश किया; किंतु वह शरीर नहीं उठा। प्रजापति दक्ष ने गुह्य इन्द्रियों में प्रवेश किया; फिर भी शरीर नहीं उठा। इन्द्र ने हाथ में, सूर्य ने नेत्रों में, दिशाओं ने कान में, वरुणदेव ने जिह्वा में, अश्विनीकुमार ने नासिका में, अग्नि ने वाक्-इन्द्रिय में तथा रुद्र ने अन्त:करण में प्रवेश किया; किंतु वह शरीर नहीं उठा, नहीं उठा। सबके अन्त में प्राण ने प्रवेश किया, तब वह शरीर उठकर खड़ा हो गया। तब देवताओं ने प्राण को ही सब देवताओं में श्रेष्ठ निश्चित किया। बल, ज्ञान, धैर्य, वैराग्य और जीवन शक्ति में प्राण को ही सर्वाधिक मानकर देवताओं ने उसी को युवराज पद पर अभिषिक्त किया। इस उत्कृष्ट स्थिति के कारण प्राण को उक्थ कहा गया है। अंत: समस्त चराचर जगत् प्राणात्मक है। जगदीश्वर प्राण अपने पूर्ण एवं बलशाली अंशों द्वारा सर्वत्र परिपूर्ण है। प्राण हीन जगत् का अस्तित्व नहीं है। प्राण हीन कोई भी वस्तु वृद्धि को नहीं प्राप्त होती। इस जगत् में किसी भी प्राण हीन वस्तु की स्थिति नहीं हैं; इस कारण प्राण सब जीवों में श्रेष्ठ, सबका अन्तरात्मा और सर्वाधिक बलशाली सिद्ध हुआ। इसलिये प्राणोपासक प्राण को ही सर्वश्रेष्ठ कहते हैं। प्राण सर्वदेवात्मक है, सब देवता प्राणमय हैं। वह भगवान् वासुदेव का अनुगामी तथा सदा उन्हीं में स्थित है। मनीषी पुरुष प्राण को महाविष्णु का बल बतलाते हैं। महाविष्णु के माहात्म्य और लक्षण को इस प्रकार जानकर मनुष्य पूर्वबन्धन का अनुसरण करने वाले अज्ञानमय लिंग को उसी प्रकार त्याग देता है, जैसे सर्प पुरानी केंचुल को। लिंग देह का त्याग करके वह परम पुरुष अनामय भगवान् नारायणको प्राप्त होता है। शंख मुनि की कही हुई यह बात सुनकर व्याध ने पुन: पूछा- ब्रह्मन् ! यह प्राण जब इतना महान् प्रभावशाली और इस सम्पूर्ण जगत् का गुरु एवं ईश्वर है, तब लोक में इसकी महिमा क्यों नहीं प्रसिद्ध हुई? शंख ने कहा- पहले की बात है। प्राण अश्वमेध यज्ञों द्वारा अनामय भगवान् नारायण का यजन करने के लिये गंगा के तटपर प्रसन्नता पूर्वक गया। अनेक मुनिगणों के साथ उसने फलों के द्वारा पृथ्वी का शोधन किया। उस समय वहाँ समाधि में स्थित हुए महात्मा कण्व बाँबी की मिट्टी में छिपे हुए बैठे थे। हल जोतने पर बाँबी गिर जाने से वे बाहर निकल आये और क्रोध पूर्वक देखकर सामने खड़े हुए महाप्रभु प्राण को शाप देते हुए बोले-'देवेश्वर ! आज से लेकर आपकी महिमा तीनों लोकों में-विशेषत: भूलोक में प्रसिद्ध न होगी। हाँ, आपके अवतार तीनों लोकोंमें विख्यात होंगे। व्याध! तभी से संसार में महाप्रभु प्राण की महिमा प्रसिद्ध नहीं हुई। भूलोक में तो उसकी ख्याति विशेष रूप से नहीं। व्याध ने पूछा- महामते ! भगवान् विष्णु के रचे हुए करोड़ों एवं सहस्रों सनातन जीव नाना मार्ग पर चलने और भिन्न-भिन्न कर्म करने वाले क्यों दिखायी देते हैं? इन सबका एक-सा स्वभाव क्यों नहीं है? यह सब विस्तारपूर्वक बतलाइये? शंख ने कहा- रजोगुण, तमोगुण और सत्त्वगुण के भेद से तीन प्रकार के जीवसमुदाय होते हैं। उनमें राजस स्वभाव वाले जीव राजस कर्म, तमोगुणी जीव तामस कर्म तथा सात्त्विक स्वभाव वाले जीव सात्त्विक कर्म करते हैं। कभी-कभी संसार में इनके गुणों में विषमता भी होती है, उसी से वे ऊँच और नीच कर्म करते हुए तदनुसार फल के भागी होते हैं। कभी सुख, कभी दु:ख और कभी दोनों को ही ये मनुष्य गुणों की विषमता से प्राप्त करते हैं। प्रकृति में स्थित होने पर जीव इन तीनों गुणों से बँधते हैं। गुण और कर्मो के अनुसार उनके कर्मो का भिन्न-भिन्न फल होता है। ये जीव फिर गुणों के अनुसार ही प्रकृति को प्राप्त होते हैं। प्रकृति में स्थित हुए प्राकृतिक प्राणी गुण और कर्म से व्याप्त होकर प्राकृतिक गति को प्राप्त होते हैं। तमोगुणी जीव तामसी वृत्ति से ही जीवन निर्वाह करते और सदा महान् दुःख में डूबे रहते हैं। उनमें दया नहीं होती, वे बड़े क्रूर होते हैं और लोक में सदा द्वेष से ही उनका जीवन चलता है। राक्षस और पिशाच आदि तमोगुणी जीव हैं, जो तामसी गति को प्राप्त होते हैं। राजसी लोगोंकी बुद्धि मिश्रित होती है। वे पुण्य तथा पाप दोनों करते हैं; पुण्य से स्वर्ग पाते और पाप से यातना भोगते हैं। इसी कारण ये मन्द भाग्य पुरुष बार-बार इस संसार में आते-जाते रहते हैं। जो सात्त्विक स्वभाव के मनुष्य हैं, वे धर्मशील, दयालु, श्रद्धालु, दूसरों के दोष न देखने वाले तथा सात्त्विक वृत्ति से जीवननिर्वाह करने वाले होते हैं। इसीलिये भिन्न-भिन्न कर्म करने वाले जीवों के एक-दूसरे से पृथक् अनेक प्रकार के भाव हैं; उनके गुण और कर्म के अनुसार महाप्रभु विष्णु अपने स्वरूप की प्राप्ति कराने के लिये उनसे कर्मो का अनुष्ठान करवाते हैं। भगवान् विष्णु पूर्ण काम हैं, उनमें विषमता और निर्दयता आदि दोष नहीं हैं। वे समभाव से ही सृष्टि, पालन और संहार करते हैं। सब जीव अपने गुण से ही कर्म फल के भागी होते हैं। जैसे माली बगीचे में लगे हुए सब वृक्षों को समानरूप से सींचता है। और एक ही कुआँ के जल से सभी वृक्ष पलते हैं तथापि वे पृथक् पृथक् स्वभाव को प्राप्त होते हैं। बगीचा लगाने वाले में किसी प्रकार विषमता और निर्दयता का दोष नहीं होता। देवाधिदेव भगवान् विष्णु का एक निमेष ब्रह्माजी के एक कल्प के समान माना गया है। ब्रह्मकल्प के अन्त में देवाधिदेव शिरोमणि भगवान् विष्णु का उन्मेष होता है अर्थात् वे आँख खोलकर देखते हैं। जब तक निमेष रहता है तब तक प्रलय है। निमेष के अन्त में भगवान् अपने उदर में स्थित सम्पूर्ण लोकों की सृष्टि करने की इच्छा करते हैं। सृष्टि की इच्छा होने पर भगवान् अपने उदर में स्थित हुए अनेक प्रकार के जीव समूहों को देखते हैं। उनकी कुक्षि में रहते हुए भी सम्पूर्ण जीव उनके ध्यान में स्थित होते हैं। अर्थात् कौन जीव कहाँ किस रूप में है, इसकी स्मृति भगवान् को सदा बनी रहती है। भगवान् विष्णु चतुरव्यहस्वरूप हैं। वे उन्मेष काल के प्रथम भाग में ही चतुर्व्यह रूप में प्रकट हो, व्यूह गामी वासुदेव स्वरूप से महात्माओं मे से किसी को सायुज्य-साधक तत्त्वज्ञान, किसी को सारूप्य, किसी को सामीप्य और किसी को सालोक्य प्रदान करते हैं। फिर अनिरुद्ध मूर्ति के वश में स्थित हुए सम्पूर्ण लोकों को वे देखते हैं, देखकर उन्हें प्रद्युम्न मूर्ति के वश में देते हैं और सृष्टि करने का संकल्प करते हैं। भगवान् श्रीहरि ने पूर्ण गुण वाले वासुदेव आदि चार व्यूहों के द्वारा क्रमश: माया, जया, कृति और शान्ति को स्वयं स्वीकार किया है। उनसे संयुक्त चतुर्व्यूहात्मक महाविष्णु ने पूर्णकाम होकर भी भिन्न-भिन्न कर्म और वासना वाले लोकों की सृष्टि की है। उन्मेष काल का अन्त होने पर भगवान् विष्णु पुनः योग माया का आश्रय लेकर व्यूहगामी संकर्षण स्वरूप से इस चराचर जगत् का संहार करते हैं। इस प्रकार महात्मा विष्णु का यह सब चिन्तन करने योग्य कार्य बतलाया गया, जो ब्रह्मा आदि योग से सम्पन्न पुरुषों के लिये भी अचिन्त्य एवं दुर्विभाव्य है। व्याध ने पूछा- मुने! भागवत धर्म कौन-कौन-से हैं और किनके द्वारा भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं? शंख ने कहा- जिससे अन्तःकरण की शुद्धि होती है, जो साधु पुरुषों का उपकार करने वाला हैं तथा जिसकी किसी ने भी निन्दा नहीं की है, उसे तुम सात्त्विक धर्म समझो। वेदों और स्मृतियों में बताये हुए धर्म का यदि निष्काम भाव से पालन किया जाय तथा वह लोक से विरुद्ध न हो, तो उसे भी सात्त्विक धर्म जानना चाहिये। वर्ण और आश्रम विभाग के अनुसार जो चार-चार प्रकार के धर्म हैं, वे सभी नित्य, नैमित्तिक और काम्य भेद से तीन प्रकार के माने गये हैं। वे सभी अपने-अपने वर्ण और आश्रम के धर्म जब भगवान् विष्णु को समर्पित कर दिये जाते हैं, तब उन्हें सात्त्विक धर्म जानना चाहिये। वे सात्त्विक धर्म ही मंगलमय भागवतधर्म हैं। अन्यान्य देवताओं की प्रीति के लिये सकाम भाव से किये जाने वाले धर्म राजस माने गये हैं। यक्ष, राक्षस, पिशाच आदि के उद्देश्य से किये जाने वाले लोकनिष्ठुर, हिंसात्मक निन्दित कर्मों को तामस धर्म कहा गया है। जो सत्त्वगुण में स्थित हो भगवान् विष्णु को प्रसन्न करने वाले शुभ कारक सात्त्विक धर्मों का सदा निष्कामभाव से अनुष्ठान करते हैं, वे भागवत (विष्णुभक्त) माने गये हैं। जिनका चित्त सदा भगवान् विष्णु में लगा रहता है, जिनकी जिह्वा पर भगवान् का नाम है। और जिनके हृदय में भगवान् के चरण विराजमान हैं, वे भागवत कहे गये हैं। जो सदाचार परायण, सबका उपकार करने वाले और सदैव ममता से रहित हैं, वे भागवत माने गये हैं। जिनका शास्त्र में गुरु में और सत्कर्मों में विश्वास है तथा जो सदा भगवान् विष्णु के भजन में लगे रहते है, उन्हें भागवत कहा गया है। उन भगवद्भक्त महात्माओं को जो धर्म नित्य मान्य हैं, जो भगवान् विष्णु को प्रिय हैं तथा वेदों और स्मृतियों में जिनका प्रतिपादन किया गया है, वे ही सनातन धर्म माने गये हैं। जिनका चित्त विषयों में आसक्त है, उनका सब देशों में घूमना, सब कर्मो को देखना और सब धर्मो को सुनना कुछ भी लाभ कारक नहीं है। साधु-पुरुषों का मन साधु-महात्माओं के दर्शन से पिघल जाता है। निष्काम पुरुषों द्वारा श्रद्धा पूर्वक जिसका सेवन किया जाता है तथा जो भगवान् विष्णु को सदा ही प्रिय है, वह भागवत धर्म माना गया है। भगवान् विष्णु ने क्षीरसागर में सबके हित की कामना से भगवती लक्ष्मीजी को दही से निकाले हुए मक्खन की भाँति सब शास्त्रों के सारभूत वैशाख धर्म का उपदेश किया है। जो दम्भ रहित होकर वैशाख मास के व्रत का अनुष्ठान करता है, सब पापों से रहित हो सूर्यमण्डल को भेदकर भगवान् विष्णु के योगिदुर्लभ परम धाम में जाता है। इस प्रकार द्विजश्रेष्ठ शंख के द्वारा भगवान् विष्णु के प्रिय वैशाख मास के धर्मो का वर्णन होते समय वह पाँच शाखाओं वाला वटवृक्ष तुरंत ही भूमि पर गिर पड़ा। उसके खोंखले में एक विकराल अजगर रहता था, वह भी पापयोनिमय शरीर को त्यागकर तत्काल दिव्य स्वरूप हो मस्तक झुकाये शंख के सामने हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया। ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" " कुमार रौनक कश्यप " ******************************************

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. आगामी दिनांक 07.05.2021 दिन शुक्रवार को आनेवाली है, वैशाख कृष्ण पक्ष की:- "वरूथिनी एकादशी" वैशाख कृष्ण पक्ष की एकादशी को वरूथिनी एकदशी के नाम से जानते हैं। यह पुण्यदायिनी, सौभाग्य प्रदायिनी एकादशी है। यह व्रत सुख-सौभाग्य का प्रतीक है। यह व्रत करने से सभी प्रकार के पाप व ताप दूर होते हैं, अनन्त शक्ति मिलती है और स्वर्गादि उत्तम लोक प्राप्त होते हैं। सुपात्र ब्राह्मण को दान देने, करोड़ों वर्ष तक ध्यान मग्न तपस्या करने तथा कन्यादान के फल से बढ़कर 'वरुथिनी एकादशी' का व्रत है। हिंदू वर्ष की तीसरी एकादशी यानी वैशाख कृष्ण एकादशी को 'वरुथिनी एकादशी' के नाम से जाना जाता है। 'वरुथिनी' शब्द संस्कृत भाषा के 'वरुथिन्' से बना है, जिसका मतलब है- प्रतिरक्षक, कवच या रक्षा करने वाला। वैशाख कृष्ण एकादशी का व्रत भक्तों की हर संकट से रक्षा करता है, इसलिए इसे वरुथिनी एकदशी कहा जाता हैं। पद्म पुराण के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण इस व्रत से मिलने वाले पुण्य के बारे में युधिष्ठिर को बताते हैं, 'पृथ्वी के सभी मनुष्यों के पाप-पुण्य का लेखा-जोखा रखने वाले भगवान चित्रगुप्त भी इस व्रत के पुण्य का हिसाब-किताब रख पाने में सक्षम नहीं हैं।' विधि इस दिन भक्तिभाव से भगवान मधुसूदन की पूजा करनी चाहिए। इस व्रत को करने से भगवान मधुसूदन की प्रसन्नता प्राप्त होती हैं और सम्पूर्ण पापों का नाश होता है व सुख-सौभाग्य की वृद्धि होती है तथा भगवान का चरणामृत ग्रहण करने से आत्मशुद्धि होती है। व्रती को चाहिए कि वह दशमी को अर्थात व्रत रखने से एक दिन पूर्व हविष्यान्न का एक बार भोजन करे। इस व्रत में कुछ वस्तुओं का पूर्णतया निषेध है, अत: इनका त्याग करना ही श्रेयस्कर है। व्रत रहने वाले के लिए उस दिन पान खाना, दातून करना, परनिन्दा, क्रोध करना, असत्य बोलना वर्जित है। इस दिन जुआ और निद्रा का भी त्याग करें। इस व्रत में तेलयुक्त भोजन नहीं करना चाहिए। रात्रि में भगवान का नाम स्मरण करते हुए जागरण करें और द्वादशी को माँस, कांस्यादि का परित्याग करके व्रत का पालन करें। महत्त्व ऐसी मान्यता है कि इस एकादशी का फल सभी एकादशियों से बढ़कर है। धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है कि अन्न दान और कन्या दान का महत्त्व हर दान से ज़्यादा है और वरुथिनी एकादशी का व्रत रखने वाले को इन दोनों के योग के बराबर फल प्राप्त होता है। इस दिन जो पूर्ण उपवास रखते हैं, 10 हज़ार वर्षों की तपस्या के बराबर फल प्राप्त होता है। उसके सारे पाप धुल जाते हैं। जीवन सुख-सौभाग्य से भर जाता है। मनुष्य को भौतिक सुख तो प्राप्त होते ही हैं, मृत्यु के बाद उसे मोक्ष भी प्राप्त हो जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस व्रत को करने वाले सभी लोकों में श्रेष्ठ बैकुंठ लोक में जाते हैं। पुष्टिमार्गी वैष्णवों के लिए इस एकादशी का बहुत महत्त्व है। यह महाप्रभु वल्लभाचार्य की जयंती है। कथा प्राचीन काल में नर्मदा नदी के तट पर मान्धाता नामक राजा राज्य करता था। वह अत्यंत दानशील तथा तपस्वी था। एक दिन जब वह जंगल में तपस्या कर रहा था, तभी न जाने कहाँ से एक जंगली भालू आया और राजा का पैर चबाने लगा। राजा पूर्ववत अपनी तपस्या में लीन रहा। कुछ देर बाद पैर चबाते-चबाते भालू राजा को घसीटकर पास के जंगल में ले गया। राजा बहुत घबराया, मगर तापस धर्म अनुकूल उसने क्रोध और हिंसा न करके भगवान विष्णु से प्रार्थना की, करुण भाव से भगवान विष्णु को पुकारा। उसकी पुकार सुनकर भक्तवत्सल भगवान श्री विष्णु प्रकट हुए और उन्होंने चक्र से भालू को मार डाला। राजा का पैर भालू पहले ही खा चुका था। इससे राजा बहुत ही शोकाकुल हुआ। उसे दुखी देखकर भगवान विष्णु बोले- 'हे वत्स! शोक मत करो। तुम मथुरा जाओ और वरुथिनी एकादशी का व्रत रखकर मेरी वराह अवतार मूर्ति की पूजा करो। उसके प्रभाव से पुन: सुदृढ़ अंगों वाले हो जाओगे। इस भालू ने तुम्हें जो काटा है, यह तुम्हारे पूर्व जन्म का अपराध था।' भगवान की आज्ञा मान राजा ने मथुरा जाकर श्रद्धापूर्वक इस व्रत को किया। इसके प्रभाव से वह शीघ्र ही पुन: सुंदर और संपूर्ण अंगों वाला हो गया। ----------:::×:::---------- "जय श्रीहरि" "कुमार रौनक कश्यप " ******************************************

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. वैशाखमास-माहात्म्य पोस्ट - 08 शंख-व्याध-संवाद, व्याध के पूर्वजन्म का वृत्तान्त - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - श्रुतदेवजी कहते हैं- राजन्! पम्पा के तट पर कोई शंख नाम से प्रसिद्ध परम यशस्वी ब्राह्मण थे जो वृहस्पतिके सिंह राशि में स्थित होने पर कल्याणमयी गोदावरी नदी में स्नान करने के लिये गये। मार्ग में परम पवित्र भीमरथी को पार करने के बाद दुर्गम, जलशून्य एवं भयंकर निर्जन वन में धूप से विकल हो गये थे। वैशाख का महीना था और दोपहर का समय। वे किसी वृक्ष के नीचे जा बैठे। इसी समय कोई दुराचारी व्याध हाथ में धनुष धारण किये वहाँ आया। ब्राह्मण के दर्शन से उसकी बुद्धि पवित्र हो गयी और वह इस प्रकार बोला- ' मुने ! मैं अत्यन्त दुर्बुद्धि एवं पापी हूँ। मेरे ऊपर आपने बड़ी कृपा की है; क्योंकि साधु महात्मा स्वभाव से ही दयालु होते हैं। कहाँ मैं नीच कुल में उत्पन्न हुआ व्याध और कहाँ मेरी ऐसी पवित्र बुद्धि - मैं इसे केवल आपका ही उत्तम अनुग्रह मानता हूँ। साधुबाबा ! मैं आपका शिष्य हूँ, कृपापात्र हूँ साधु पुरुषों का समागम होने पर मनुष्य फिर कभी दु:ख को नहीं प्राप्त होता; अत: आप मुझे अपने पापनाशक वचनों द्वारा ऐसा उपदेश दीजिये, जिससे संसार बन्धन से छूटने की इच्छा रखने वाले मनुष्य अनायास ही भवसागर से पार हो जाते हैं। साधु पुरुषों का चित्त सबके प्रति समान होता है। वे सब प्राणियों के प्रति दयालु होते हैं। उनकी दृष्टि में न कोई नीच है न ऊँच; न अपना है, न पराया। मनुष्य सन्तप्त होकर जब-जब गुरुजनों से उपाय पृछता है, तब-तब वे उसे संसार बन्धन से छुड़ाने वाले ज्ञान का उपदेश करते हैं। जैसे गंगाजी मनुष्यों के पाप का नाश करने वाली हैं, उसी प्रकार मूढ़ जनों का उद्धार करना साधु पुरुषों का स्वभाव ही माना गया है।' व्याध के ये वचन सुनकर शंख ने कहा- 'व्याध! यदि तुम कल्याण चाहते हो तो वैशाख मास में भगवान् विष्णु को प्रसन्न और संसार-समुद्र से पार करने वाले जो दिव्य धर्म बताये गये हैं उनका पालन करो। मुनिश्रेष्ठ शंख प्यास से बहुत कष्ट पा रहे थे। दोपहर के समय उन्होंने सुन्दर सरोवर में स्नान किया और युगल वस्त्र धारण करके मध्याह्नकाल की उपासना पूरी की। फिर देव-पृजा करने के पश्चात् व्याध के लाये हुए श्रमहारी एवं स्वादिष्ट कैथ का फल खाया। जब वे खा-पीकर सुखपूर्वक विराजमान हुए, उस समय व्याध ने हाथ जोड़कर कहा- 'मुने! किस कर्म से मेरा तमोमय व्याध कुल में जन्म हुआ और किससे ऐसी सद्वबुद्धि तथा महात्मा की संगति प्राप्त हुई ? प्रभो ! यदि आप ठीक समझे तो मैंने जो कुछ पूछा है, वह तथा अन्य जानने योग्य बातें भी मुझसे कहिये।' शंख बोले- पूर्वजन्म में तुम वेदों के पारंगत विद्वान् ब्राह्मण थे। शाकल्य नगर में तुम्हारा जन्म हुआ था तुम्हारा गोत्र श्रीवत्स और नाम स्तम्भ था। उस समय तुम बड़े तेजस्वी समझे जाते थे; किंतु आगे चलकर किसी वेश्या में तुम्हारी आसक्ति हो गयी। उसके संग-दोष से तुमने नित्यकर्मो को त्याग दिया और शूद्र की भाँति घर आकर रहने लगे। यद्यपि तुम सदाचार शून्य, दुष्ट तथा धर्म-कर्मों के त्यागी थे, तो भी उस समय तुम्हारी ब्राह्मणी पत्नी कान्तिमती ने वेश्या सहित तुम्हारी सेवा की। वह सदा तुम्हारा प्रिय करने में लगी रहती थी। वह तुम दोनों के पैर धोती, दोनों की आज्ञा का पालन करती और दोनों से नीचे आसन पर सोती थी। इस प्रकार वेश्या सहित पति की सेवा करती हुई उस दुःखिनी ब्राह्मणी का इस भूतल पर बहुत समय बीत गया। एक दिन उसके पति ने मूली सहित उड़द खाया और तिलमिश्रित निष्पाव भक्षण किया। उस अपथ्य भोजन से उसका मुँह पेट चलने लगा और उसे बड़ा भयंकर भगन्दर रोग हो गया। वह उस रोग से दिन-रात जलने लगा। जब तक घर में धन रहा, तब तक वेश्या भी वहाँ टिकी रही। उसका सारा धन लेकर पीछे उसने उसका घर छोड़ दिया। वेश्या तो क्रूर और निर्दयी होती ही है। उसे छोड़कर दूसरे के पास चली गयी! तब वह ब्राह्मण रोग से व्याकुलचित्त हो रोता हुआ अपनी स्त्रीसे वोला - ' देवि! मैं वेश्या के प्रति आसक्त और अत्यन्त निष्ठुर मनुष्य हूँ, मेरी रक्षा करो। सुन्दरी ! तुम परम पवित्र हो, मैंने तुम्हारा कुछ भी उपकार नहीं किया। कल्याणि ! जो पापी, एवं निन्दित मनुष्य अपनी विनीत पत्नी का आदर नहीं करता, वह पंद्रह जन्मों तक नपुंसक होता है। महाभागे ! दिन-रात साधु पुरुष उसकी निन्दा करते हैं। तुम साध्वी और पतिव्रता हो, मैं तुम्हारा अनादर करके पाप योनि में गिरूँगा। तुम्हारा अनादर करने से जो तुम्हारे मन में क्रोध हुआ होगा, उससे मैं दग्ध हो चुका हूँ।' इस प्रकार अनुतापयुक्त वचन कहते हुए पति से वह पतिव्रता हाथ जोड़कर बोली - 'प्राणनाथ! आप मेरे प्रति किये हुए व्यवहार को लेकर दु:ख न माने, लज्जा का अनुभव न करें। मेरा आपके ऊपर तनिक भी क्रोध नहीं है, जिससे आप अपने को दग्ध हुआ बतलाते हैं। पूर्वजन्म में किये हुए पाप ही इस जन्म में दु:खरूप होकर आते हैं। जो उन दु:खों को धैर्यपूर्वक सहन करती है, वही स्त्री साध्वी मानी जाती है और वही पुरुष श्रेष्ठ समझा जाता है।' वह उत्तम वर्णवाली स्त्री अपने पिता और भाइयों से धन माँगकर लायी और उसी से पति का पालन करने लगी। उसने अपने स्वामी को साक्षात् क्षीरसागरनिवासी विष्णु ही माना। वह दिन-रात पति के मल-मूत्र साफ करती और उसके शरीर में पड़े हुए कष्टदायक कीड़ों को धीरे-धीरे नख से खींचकर निकालती थी ब्राह्मणी न रातमें सोती थी, न दिन में। अपने स्वामी के दुःख से संतप्त होकर वह दुःखिनी सदा इस प्रकार प्रार्थना किया करती थी- 'प्रसिद्ध देवता और पितर मेरे स्वामी की रक्षा करें, इन्हें रोगहीन एवं निष्पाप कर दें मैं पति के आरोग्य के लिये चण्डिका देवी को भैंस का दही और उत्तम अन्न चढ़ाऊँगी, महात्मा गणेशजी की प्रसन्नता के लिये मोदक बनवाऊँगी, दस शनिवारों को उपवास करूँगी तथा मीठा और घी नहीं खाऊँगी। मेरे पति रोगहीन होकर सौ वर्ष जीवें।' इस प्रकार वह देवी प्रतिदिन देवताओं से प्रार्थना करती थी। उन्हीं दिनों कोई देवल नामक महात्मा वहाँ आये। वैशाख मास में धूप से पीड़ित हो सायंकाल के समय उस ब्राह्मण के घर में उन्होंने पदार्पण किया ब्राह्मणी ने महात्मा के चरण धोकर उस जल को मस्तक पर चढ़ाया और धूप से कष्ट पाये हुए महात्मा को पीने के लिये शर्बत दिया। प्रात:काल सूर्योदय होने पर मुनि जैसे आये थे, वैसे चले गये तदनन्तर थोड़े ही समय में उस ब्राह्मण को सन्निपात हो गया। ब्राह्मणी सोंठ, मिर्च और पीपल लेकर जब उसके मुँह में डालने लगी, तब उसने पत्नी की अँगुली काट ली। उसके दोनों दाँत सहसा सट गये और ब्राह्मणी की अँगुली का वह कोमल खण्ड उसके मुँह में ही रह गया। अँगुली काटकर उस वेश्या का ही चिन्तन करता हुआ वह ब्राह्मण मर गया। तब उसकी पत्नी कान्तिमती ने कंगन बेचकर बहुत-सा इन्धन खरीदा और चिता बनाकर वह साध्वी पति के साथ उसमें जा बैठी उसने पति के रोगी शरीर का गाढ़ आलिंगन करके उसके साथ अपने आपको भी चिता में जला दिया। शरीर त्यागकर वह सहसा भगवान् विष्णु के धाम में चली गयी। उसने वैशाख मास में जो देवल मुनि को शर्बत पिलाया और उनके चरणोदक को शीश पर चढ़ाया था, इससे उसको योगिगम्य परम पद की प्राप्ति हुई। तुमने अन्तकाल में वेश्या का चिन्तन करते हुए शरीर त्याग किया था, इसलिये इस घोर व्याध के शरीर में आये हो और हिंसा में आसक्त हो सबको उद्वेग में डाला करते हो। तुमने वैशाख मास में मुनि को शर्बत देने के लिये ब्राह्मणी को अनुमति दी थी, उसी पुण्य से आज व्याध होने पर भी तुम्हें सब सुखों के एकमात्र साधन धर्मविषयक प्रश्न पूछने के लिये उत्तम बुद्धि प्राप्त हुई है। तुमने जो सब पापों को हरने वाले मुनि के चरणोदक को सिर पर धारण किया था, उसी का यह फल है। कि वन में तुम्हें मेरा संग मिला है ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" " कुमार रौनक कश्यप " ********************************************

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