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R.K.Soni
R.K.Soni Jul 12, 2019

Good morning ji💓💓💓💓💓💓💓jai hanuman g🙏❤🙏❤🙏❤🙏❤jai shani dav g🙏❤🙏❤🙏❤🙏❤🙏❤🙏❤🙏❤🙏❤🙏

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कामेंट्स

Chandra Shekhar Jul 12, 2019
जय शनि देव जय हनुमान सुप्रभात

Rakesh Kumar Chandel Jul 12, 2019
जय हनुमान जी की जय शनिदेव जी की

🌲राजकुमार राठोड🌲 Jul 12, 2019
♠️♠️ जय श्री शनिदेव ♠️♠️ ♣️♣️जय श्री हनुमान ♣️♣️ शुभ प्रातः वंदन भाई 🙏🙏 आपका हर क्षण खुशियों से भरा हो.. 🙏जय श्री राधे कृष्णा 🙏🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

Dheeraj Shukla Jul 13, 2019
जय श्री राम जी जय शनिदेव जी शुभ प्रभात वंदन भाई जी

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🚩🌿🌹ॐ विष्णुदेवाय नमः🌹🌿🚩 🌋🌲🏵शुभ गुरुवार🏵🌲🌋 🍑🐚🌻सुप्रभात🌻🐚🍑 🎨दिनांक :-18-7-2019 🎍🎍🎍🎍🎍🎍🎍🎍🎍🎍🎍🎍🎍🎍🎍 🎎जानिए क्या है भगवान विष्णु के चार हाथ होने का रहस्य : - 🎭ये तो हम सभी जानते हैं कि विष्णु भगवान अलग अलग उद्देश्य से अलग-अलग समय पर इस धरती पर अवतरित हुए है । हम हर देवी देवताओ की पूजा करते है जिनकी अपनी विशेषताएं भी है और हर देवी देवता अपने शारीरिक आकर के लिए भी जाना जाता है । भगवान विष्णु पूरे ब्रह्मांड के देवता है। 🌹भगवन विष्णु के 4 हाथ 🌹 🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷 🏵भगवन विष्णु के 4 हाथ माने जाते हैं। आपने जब भी भगवन विष्णु के चित्र को देखा होगा तो उनके 4 हाथ देखें होंगे, क्या आप जानते है इन 4 हाथों के पीछे एक सन्देश छुपा हुआ है । आज जानते है आखिर भगवान विष्णु के पास 4 हाथ होने के पीछे का क्या रहस्य है। पौराणिक कथा के अनुसार एक समय की बात है 💐प्राचीनकाल में जब भगवान शंकर के मन में सृस्टि रचने का उपाए आया तो सबसे पहले उन्होनें अपनी आंतरदृस्टि से भगवान विष्णु को पैदा किया और उनको चार हाथ दिए जो उनकी शक्तिशाली और सब व्यापक प्रकृति का संकेत देते है जिनमें कई प्रकार की शक्तिया प्रदत्त की ।अब जानते है क्या कहते है । 🌹विष्णु जी अपनी नागों की शय्या पर लेटे हुए उनके सामने के दो हाथ भौतिक अस्तित्व का प्रतिनिधित्व करते है, दोनों हाथ भौतिक फल देने वाले हैं और पीछे के दोनों हाथ मनुष्य को आध्यात्मिक दुनिया में अपनी उपस्थिति का प्रतिनिधित्व करते हैं,आध्यात्मिक रास्ता दिखाते हैं। 🎎साथ ही एक और सन्देश देते है , विष्णु के चार हाथ अंतरिक्ष की चारों दिशाओं पर प्रभुत्व व्यक्त करते हैं और मानव जीवन के चार चरणों और चार आश्रमों के रूप का प्रतीक है : 1. ज्ञान के लिए खोज (ब्रह्मचर्य ) 2. पारिवारिक जीवन (गृहस्थ) 3. वन में वापसी (वानप्रस्थ-) 4. संन्यास । जैसे भगवान विष्णु सृस्टि के निर्माता माने जाते है वैसे ही उनके हाथ हमें जीवन का सन्देश देते है जीवन के विभिन्न पड़ाव के बारे में बताते हैं । 🚩🌿🌹ॐ विष्णुदेवाय नमः🌹🌿🚩 🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉 🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋

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गाय - पशु की अंतिम योनि गाय चेतना के लिए सीढी है, पशु से उपर उठकर मनुष्य बनने के लिये - सद्गुरु कहते हैं, कि चेतना अपनी अंतर्यात्रा में पेड़ -पौधे, कीट - पतंग और पशु - पक्षी की योनियों से गुजरती हुई, अंत में गाय की योनि में प्रवेश करती है। और गाय का जीवन जीती है। गाय की योनि में आकर चेतना की समझ इतनी विकसित हो चुकी होती है कि वह आसानी से मनुष्य योनि में छलांग लगा जाती है। गाय पशु और मनुष्य के बीच की एक कड़ी है। गाय चेतना के लिए एक सीढी है, पशु से उपर उठकर मनुष्य बनने के लिये। गाय में आकर चेतना उस तल पर आ खड़ी होती है, जहां से अगले जन्म में मनुष्य योनि में प्रवेश करना सहज ही घट जाता है। इसलिए हमारे हिंदू धर्म में गाय को इतना महत्व दिया जाता है। उसकी पूजा करके उसे धन्यवाद दिया जाता है, कि धन्य है तू, जो यहां तक आ पहुंची है। उसे संबल दिया जाता है, कि हम भी एक समय वहीं थे जहां आज तू खड़ी है। अब तेरा अगला जन्म मनुष्य का है, हम तेरी पूरी मदद करेंगे, ताकि तू मनुष्य में आकर स्वयं को मुक्त कर सके! गाय को रोटी देकर, रोटी के स्वाद से उसे अभी से ही परिचित करवाना शुरू कर दिया जाता है, ताकि रोटी का यह स्वाद उसे मनुष्य योनि में आने के लिए आकर्षित कर सके। रोटी का स्वाद, रोटी की खुश्बू उस चेतना को घर में खींचेगी और वह कोरी और पवित्र आत्मा हमारे घर मनुष्य रूप में जन्म ले सकेगी। इसीलिए हमारे धर्म में गाय को रोजाना रोटी देने का नियम है। वह चेतना विचारों से मुक्त होगी, क्योंकि विचार उसके लिए इस जन्म में ही संभव होगा। अभी तक उसने शरीर और भाव का तल ही जिया है, अब वह पहली बार मनुष्य योनि में विचार के तल पर आयेगी, क्योंकि पशु और पक्षी भाव में जीते हैं और हम भाव के साथ ही विचार के तल पर भी जीते हैं। विचार का तल सक्रिय न होने और भाव में जीने के कारण पशु पक्षियों को कोई तनाव नहीं होता है। जबकि हम विचारों में जीते हैं और विचार तनाव पैदा करते हैं जिससे हम तनावग्रस्त रहते हैं। पक्षी भाव में जीते हैं और मस्त रहते हैं, यही कारण है कि हमारे मन में भी अक्सर यह खयाल आता रहा है कि काश हम पक्षी होते औ खुले आसमान में स्वतंत्रता से उड़ान भरते? यहां मनुष्य योनि में गाय के लिए विचार करना नया होगा, इसलिए संभव है कि वह यहां आकर विचारों के प्रति होश से भर जाए और मुक्त हो जाए? लेकिन यह तभी संभव होगा, जब उसे अपना पूरा जीवन जीने दिया जाए, वह अपनी स्वाभाविक मृत्यु को प्राप्त हो, न कि उसकी हत्या हो! गाय तक आते - आते चेतना का जो विकास हुआ है, उसे गति देने के लिए गाय को हमें उसका पूरा जीवन जीने में उसकी मदद करनी होगी। उसकी उम्र पूरी हो, वह अधूरा जीवन नहीं जिये। उसकी हत्या करने से उसकी यात्रा बाधित होगी। वह फिर से पशु योनि में लौट जायेगी, और हो सकता है वह दूसरे हिंसक पशु में लौट जाये? इसलिए गाय की हत्या नहीं होनी चाहिए! गाय का वध करके हम एक चेतना का पशु से मनुष्य योनि में प्रवेश का मार्ग अवरूद्ध कर रहे होते हैं। दूसरे, गाय की हत्या करके हम उससे कहीं ज्यादा नुकसान अपनी चेतना का कर लेते हैं। वह चेतना तो दूसरा शरीर खोज लेगी, गाय का शरीर उसे आसानी से उपलब्ध हो सकेगा, लेकिन हिंसा करके हम अपना अगला जीवन हिंसक पशु में परिवर्तित कर लेते हैं। सद्गुरु कहते हैं, कि रात सोते समय जो हमारा अंतिम विचार होता है, वही सुबह हमारा पहला विचार बन जाता है। ठीक उसी तरह, जिस तरह परिक्षा के दिनों में रात सोते समय, सुबह चार बजे उठने का विचार होता है और ठीक चार बजे वह विचार घट जाता है और हमारी नींद टूट जाती है। वैसे ही इस जन्म में जो हमारा अंतिम विचार होगा, अगला जन्म उसी पर आधारित होगा। वे कहते हैं, यदि हिंसा में हमारा रस है, और हमारा स्वभाव हिंसक हो गया है, तो अंतिम समय में प्रकृति हिंसक पशु योनि में हमारा प्रवेश करवा देती है, बिल्ली जैसे मांसाहारी पशु योनि में प्रवेश करवा देती है जहां हमें खुलकर हिंसा करने की सुविधा रहती है। यदि हम मोह- माया से ज्यादा ग्रसित हो जाते हैं, और अंतिम समय तक यही विचार प्रगाढ़ हो गया है, कि "क्या होगा घर - परिवार का? क्या होगा जमीन - जायदाद का? क्या होगा कारोबार का?" तो जीने की आकांक्षा के कारण मृत्यु के समय हम शरीर को छोड़ना नहीं चाहेंगे। और यदि हम मोहवश शरीर को जकड़ कर रखेंगे तो प्रकृति हमारे प्राण को खींचेगी, क्योंकि अब शरीर क्षीण हो गया है, शरीर इस योग्य नहीं रहा कि प्राण उसमें टिक सके, इसी उहापोह में हमारे प्राण मल-मूत्र के रास्ते से निकलेंगे और प्रकृति हमारी अंतिम इच्छा के अनुसार हमें कुत्ते जैसे पशु के गर्भ में प्रवेश करवा देगी, ताकि हम फिर से घर - परिवार, जमीन - जायदाद और अपने कारोबार की रखवाली कर सकें। सद्गुरु कहते हैं कि जिस व्यक्ति ने अपनी संपत्ति जमीन में गाड़ दी है। वह किसी को बता नहीं पाया है और अंतिम समय में उसका ध्यान उस गड़ी हुई संपत्ति में ही अटका है तो प्रकृति उसे सांप के गर्भ में प्रवेश करवा देती है ताकि वह अपने गड़े हुए धन पर फन काढ़कर बैठा रहे और अपने धन की रक्षा कर सके। यही कारण है कि वे माया-मोह और वासना छोड़ने को कहते हैं। यह पतन हो गया चेतना का! यह है असली पतन.. पीछे की योनि में वापिस लौटना! चरित्र का पतन इतना नुकसान नहीं करता है, जितना नुकसान चेतना का पतन करता है। इसलिए हमारे हिंदू धर्म में पीछे लौट गई चेतना का भी ख्याल रखा जाता है। गाय के साथ ही कुत्ते को भी रोटी के स्वाद की अनुभूति करवाई जाती है। ताकि रोटी का वह स्वाद, रोटी की वह खुश्बू, मनुष्य जीवन की याद दिला सके। और वह आसानी से मनुष्य के गर्भ में प्रवेश कर सके। अपने बचे हुए भोजन को गाय और कुत्ते को खिलाना इसी नियम का एक हिस्सा है। यह हमारे उपर निर्भर करता है, कि ध्यान करके स्वयं को मुक्त करना है या वापिस पिछली योनियों में लौट जाना है! 'वहां' पर लौट जाना है, जहां पर से 'यहां' आये थे? कुछ न कर सकें तो हम ध्यान अवश्य करें जिससे कि हमारा 'पतन' न हो! हम पिछली योनियों में नहीं जा सकें, यानी फिर से मनुष्य योनि में प्रवेश कर सकें, ताकि ध्यान करके मुक्त होने का ख्याल आ सके! स्वामी ध्यान उत्सव

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shilpa Jul 18, 2019

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R.K.Soni Jul 17, 2019

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Jasbir Singh nain Jul 17, 2019

गुरुवार व्रत करने से बृहस्पति देवता प्रसन्न होते हैं। यह व्रत अत्यंत फलदायी है। अग्निपुराण के अनुसार अनुराधा नक्षत्र युक्त गुरुवार से आरंभ करके 7 गुरुवार व्रत करने से बृहस्पति ग्रह की हर पीड़ा से मुक्ति मिलती है।  बृहस्पतिवार व्रत कथा: प्राचीन समय की बात है। एक नगर में एक बड़ा व्यापारी रहता था। वह जहाजों में माल लदवाकर दूसरे देशों में भेजा करता था। वह जिस प्रकार अधिक धन कमाता था उसी प्रकार जी खोलकर दान भी करता था, परंतु उसकी पत्नी अत्यंत कंजूस थी। वह किसी को एक दमड़ी भी नहीं देने देती थी।   एक बार सेठ जब दूसरे देश व्यापार करने गया तो पीछे से बृहस्पतिदेव ने साधु-वेश में उसकी पत्नी से भिक्षा मांगी। व्यापारी की पत्नी बृहस्पतिदेव से बोली हे साधु महाराज, मैं इस दान और पुण्य से तंग आ गई हूं। आप कोई ऐसा उपाय बताएं, जिससे मेरा सारा धन नष्ट हो जाए और मैं आराम से रह सकूं। मैं यह धन लुटता हुआ नहीं देख सकती।    बृहस्पतिदेव ने कहा, हे देवी, तुम बड़ी विचित्र हो, संतान और धन से कोई दुखी होता है। अगर अधिक धन है तो इसे शुभ कार्यों में लगाओ, कुंवारी कन्याओं का विवाह कराओ, विद्यालय और बाग-बगीचों का निर्माण कराओ। ऐसे पुण्य कार्य करने से तुम्हारा लोक-परलोक सार्थक हो सकता है, परन्तु साधु की इन बातों से व्यापारी की पत्नी को ख़ुशी नहीं हुई। उसने कहा- मुझे ऐसे धन की आवश्यकता नहीं है, जिसे मैं दान दूं।   तब बृहस्पतिदेव बोले "यदि तुम्हारी ऐसी इच्छा है तो तुम एक उपाय करना। सात बृहस्पतिवार घर को गोबर से लीपना, अपने केशों को पीली मिटटी से धोना, केशों को धोते समय स्नान करना, व्यापारी से हजामत बनाने को कहना, भोजन में मांस-मदिरा खाना, कपड़े अपने घर धोना। ऐसा करने से तुम्हारा सारा धन नष्ट हो जाएगा। इतना कहकर बृहस्पतिदेव अंतर्ध्यान हो गए।    व्यापारी की पत्नी ने बृहस्पति देव के कहे अनुसार सात बृहस्पतिवार वैसा ही करने का निश्चय किया। केवल तीन बृहस्पतिवार बीते थे कि उसी समस्त धन-संपत्ति नष्ट हो गई और वह परलोक सिधार गई। जब व्यापारी वापस आया तो उसने देखा कि उसका सब कुछ नष्ट हो चुका है। उस व्यापारी ने अपनी पुत्री को सांत्वना दी और दूसरे नगर में जाकर बस गया। वहां वह जंगल से लकड़ी काटकर लाता और शहर में बेचता। इस तरह वह अपना जीवन व्यतीत करने लगा।   एक दिन उसकी पुत्री ने दही खाने की इच्छा प्रकट की लेकिन व्यापारी के पास दही खरीदने के पैसे नहीं थे। वह अपनी पुत्री को आश्वासन देकर जंगल में लकड़ी काटने चला गया। वहां एक वृक्ष के नीचे बैठ अपनी पूर्व दशा पर विचार कर रोने लगा। उस दिन बृहस्पतिवार था। तभी वहां बृहस्पतिदेव साधु के रूप में सेठ के पास आए और बोले "हे मनुष्य, तू इस जंगल में किस चिंता में बैठा है?"   तब व्यापारी बोला "हे महाराज, आप सब कुछ जानते हैं।" इतना कहकर व्यापारी अपनी कहानी सुनाकर रो पड़ा। बृहस्पतिदेव बोले "देखो बेटा, तुम्हारी पत्नी ने बृहस्पति देव का अपमान किया था इसी कारण तुम्हारा यह हाल हुआ है लेकिन अब तुम किसी प्रकार की चिंता मत करो। तुम गुरुवार के दिन बृहस्पतिदेव का पाठ करो। दो पैसे के चने और गुड़ को लेकर जल के लोटे में शक्कर डालकर वह अमृत और प्रसाद अपने परिवार के सदस्यों और कथा सुनने वालों में बांट दो। स्वयं भी प्रसाद और चरणामृत लो। भगवान तुम्हारा अवश्य कल्याण करेंगे।"   साधु की बात सुनकर व्यापारी बोला "महाराज। मुझे तो इतना भी नहीं बचता कि मैं अपनी पुत्री को दही लाकर दे सकूं।" इस पर साधु जी बोले "तुम लकड़ियां शहर में बेचने जाना, तुम्हें लकड़ियों के दाम पहले से चौगुने मिलेंगे, जिससे तुम्हारे सारे कार्य सिद्ध हो जाएंगे।"   उसने लकड़ियां काटीं और शहर में बेचने के लिए चल पड़ा। उसकी लकड़ियां अच्छे दाम में बिक गई जिससे उसने अपनी पुत्री के लिए दही लिया और गुरुवार की कथा हेतु चना, गुड़ लेकर कथा की और प्रसाद बांटकर स्वयं भी खाया। उसी दिन से उसकी सभी कठिनाइयां दूर होने लगीं, परंतु अगले बृहस्पतिवार को वह कथा करना भूल गया।    अगले दिन वहां के राजा ने एक बड़े यज्ञ का आयोजन कर पूरे नगर के लोगों के लिए भोज का आयोजन किया। राजा की आज्ञा अनुसार पूरा नगर राजा के महल में भोज करने गया। लेकिन व्यापारी व उसकी पुत्री तनिक विलंब से पहुंचे, अत: उन दोनों को राजा ने महल में ले जाकर भोजन कराया। जब वे दोनों लौटकर आए तब रानी ने देखा कि उसका खूंटी पर टंगा हार गायब है। रानी को व्यापारी और उसकी पुत्री पर संदेह हुआ कि उसका हार उन दोनों ने ही चुराया है। राजा की आज्ञा से उन दोनों को कारावास की कोठरी में कैद कर दिया गया। कैद में पड़कर दोनों अत्यंत दुखी हुए। वहां उन्होंने बृहस्पति देवता का स्मरण किया। बृहस्पति देव ने प्रकट होकर व्यापारी को उसकी भूल का आभास कराया और उन्हें सलाह दी कि गुरुवार के दिन कैदखाने के दरवाजे पर तुम्हें दो पैसे मिलेंगे उनसे तुम चने और मुनक्का मंगवाकर विधिपूर्वक बृहस्पति देवता का पूजन करना। तुम्हारे सब दुख दूर हो जाएंगे।   बृहस्पतिवार को कैदखाने के द्वार पर उन्हें दो पैसे मिले। बाहर सड़क पर एक स्त्री जा रही थी। व्यापारी ने उसे बुलाकार गुड़ और चने लाने को कहा। इसपर वह स्त्री बोली "मैं अपनी बहू के लिए गहने लेने जा रही हूं, मेरे पास समय नहीं है।" इतना कहकर वह चली गई। थोड़ी देर बाद वहां से एक और स्त्री निकली, व्यापारी ने उसे बुलाकर कहा कि हे बहन मुझे बृहस्पतिवार की कथा करनी है। तुम मुझे दो पैसे का गुड़-चना ला दो।    बृहस्पतिदेव का नाम सुनकर वह स्त्री बोली "भाई, मैं तुम्हें अभी गुड़-चना लाकर देती हूं। मेरा इकलौता पुत्र मर गया है, मैं उसके लिए कफन लेने जा रही थी लेकिन मैं पहले तुम्हारा काम करूंगी, उसके बाद अपने पुत्र के लिए कफन लाऊंगी।"   वह स्त्री बाजार से व्यापारी के लिए गुड़-चना ले आई और स्वयं भी बृहस्पतिदेव की कथा सुनी। कथा के समाप्त होने पर वह स्त्री कफन लेकर अपने घर गई। घर पर लोग उसके पुत्र की लाश को "राम नाम सत्य है" कहते हुए श्मशान ले जाने की तैयारी कर रहे थे। स्त्री बोली "मुझे अपने लड़के का मुख देख लेने दो।" अपने पुत्र का मुख देखकर उस स्त्री ने उसके मुंह में प्रसाद और चरणामृत डाला। प्रसाद और चरणामृत के प्रभाव से वह पुन: जीवित हो गया।    पहली स्त्री जिसने बृहस्पतिदेव का निरादर किया था, वह जब अपने पुत्र के विवाह हेतु पुत्रवधू के लिए गहने लेकर लौटी और जैसे ही उसका पुत्र घोड़ी पर बैठकर निकला वैसे ही घोड़ी ने ऐसी उछाल मारी कि वह घोड़ी से गिरकर मर गया। यह देख स्त्री रो-रोकर बृहस्पति देव से क्षमा याचना करने लगी।    उस स्त्री की याचना से बृहस्पतिदेव साधु वेश में वहां पहुंचकर कहने लगे "देवी। तुम्हें अधिक विलाप करने की आवश्यकता नहीं है। यह बृहस्पतिदेव का अनादार करने के कारण हुआ है। तुम वापस जाकर मेरे भक्त से क्षमा मांगकर कथा सुनो, तब ही तुम्हारी मनोकामना पूर्ण होगी।"   जेल में जाकर उस स्त्री ने व्यापारी से माफी मांगी और कथा सुनी। कथा के उपरांत वह प्रसाद और चरणामृत लेकर अपने घर वापस गई। घर आकर उसने चरणामृत अपने मृत पुत्र के मुख में डाला। चरणामृत के प्रभाव से उसका पुत्र भी जीवित हो उठा। उसी रात बृहस्पतिदेव राजा के सपने में आए और बोले "हे राजन। तूने जिस व्यापारी और उसके पुत्री को जेल में कैद कर रखा है वह बिलकुल निर्दोष हैं। तुम्हारी रानी का हार वहीं खूंटी पर टंगा है।"   दिन निकला तो राजा रानी ने हार खूंटी पर लटका हुआ देखा। राजा ने उस व्यापारी और उसकी पुत्री को रिहा कर दिया और उन्हें आधा राज्य देकर उसकी पुत्री का विवाह उच्च कुल में करवाकर दहेज़ में हीरे-जवाहरात दिए।

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