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चैत्र नवरात्र में प्रथम दिन से नवमी तक मां दुर्गा को इन चीजों का लगाए भोग चैत्र नवरात्रि 6 अप्रैल से प्रारंभ हो रही है। प्रथम दिन से लेकर नवमी तक मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा अर्चना की जाती है। इन नौ दिनों आप अगर मां दुर्गा की विशेष कृपा अपने परिवार पर चाहते हैं तो आपको प्रत्येक दिन माता को अलग—अलग भोग लगाना चाहिए। ज्योतिषाचार्य पं. राजीव शर्मा बता रहे हैं कि नवरात्रि में मां दुर्गा को किस दिन किस मिठाई, पकवान या वस्तु का भोग लगाने से हमें क्या फल मिलता है। 1. नवरात्रि के प्रथम दिन मां दुर्गा के चरणों में गाय का शुद्ध घी अर्पित करना चाहिए, इससे आरोग्य की प्राप्ति तथा शरीर निरोगी रहता है। 2. दूसरे दिन मां को शक्कर का भोग लगाएं और घर के सभी सदस्यों को दें। इससे आयु में वृद्धि होती है। 3. तीसरे दिन दूध से बनी मिठाई का भोग मां को लगाकर ब्राह्यणों को दान दें, इससे दुःखों से मुक्ति के साथ-साथ परम आनन्द की प्राप्ति होती है। 4. चौथे दिन मां को मालपुए का भोग लगाकर मन्दिर में ब्राह्यणों को दान देने से बुद्धि का विकास होता है एवं निर्णय शक्ति बढ़ती है। 5. पांचवे दिन माता रानी को केले का नैवेद्य चढ़ाने से शरीर स्वस्थ रहता है। 6. छठे दिन दुर्गा मां को शहद का भोग लगाने से आकर्षण शक्ति में वृद्धि होती है। 7. सातवें दिन माता को गुड़ का नैवेद्य चढ़ाने के बाद ब्राह्यणों को दान देने से आकस्मिक संकटो से रक्षा होती है। 8. आठवें दिन दुर्गा मां को नारियल का भोग लगाने से सन्तान संबंधी परेशानियों से छूटकारा मिलता है। 9. नवमी के दिन माता रानी को तिल का भोग लगाने से अनहोनी की आशंका खत्म होती है।

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कामेंट्स

🌲राजकुमार राठोड🌲 Apr 6, 2019
.. 🙏जय माता दी 🙏 प्रसन्नता का साज लेकर,आये नववर्ष! आपके जीवन में लाये सुख, समाधान, समृद्धी और हर्ष!!

ALKA GUPTA LUCKNOW Apr 6, 2019
Very nice Jai mata di🙏🙏🚩 Hindu Navvarsh ki aur mata ke Navratro ki Aapko hardik Shubh Kamnaye🙏🙏🚩🚩

कन्हैयासोनी गुप्ता Apr 6, 2019
@sunilyadav138 जय माता की आप व आपके पूरे परिवार को हिन्दू नववर्ष की व नवरात्री की हार्दिक शुभकामनाएं शुभ रात्रि भाईजी

कन्हैयासोनी गुप्ता Apr 6, 2019
@rrathod जय माता की आप व आपके पूरे परिवार को हिन्दू नववर्ष की व नवरात्री की हार्दिक शुभकामनाएं भाई शुभ रात्रि

sumitra Apr 7, 2019
jAi Mata Di bhaiji Mata Rani Aapki HR mnokamna Puri kre bhaiji Aapka din shubh v mnglmay ho bhaiji

कन्हैयासोनी गुप्ता Apr 7, 2019
@sumitrasoni2 जय माता की दीदी आप की भी माता रानी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करें,आप व आपके पूरे परिवार का दिन शुभ व मंगलमय हो बहनजी

Kalpana bist Apr 15, 2019
गुड मॉर्निंग भाई जय श्री राधे कृष्णा 🙏 आपका दिन शुभ और मंगलमय हो भोलेनाथ की कृपा आप और आपके परिवारजनों पर हमेशा बनी रहे 🌹 हरहर महादेव🙏

Bhavani das rathod Jul 17, 2019

#श्री_देवी_मद्भागवत #तीसरा_स्कन्ध राजा परीक्षित ने श्री व्यास जी से ब्रह्मण्ड की रचना के विषय में पूछा। श्री व्यास जी ने कहा कि राजन मैंने यही प्रश्न ऋषिवर नारद जी से पूछा था, वह वर्णन आपसे बताता हूँ। मैंने (श्री व्यास जी ने) श्री नारद जी से पूछा एक ब्रह्मण्ड के रचियता कौन हैं? कोई तो श्री शंकर भगवान को इसका रचियता मानते हैं। कुछ श्री विष्णु जी को तथा कुछ श्री ब्रह्मा जी को तथा बहुत से आचार्य भवानी को सर्व मनोरथ पूर्ण करने वाली बतलाते हैं। वे आदि माया महाशक्ति हैं तथा परमपुरुष के साथ रहकर कार्य सम्पादन करने वाली प्रकृति हैं। ब्रह्म के साथ उनका अभेद सम्बन्ध है।(पृष्ठ 114) नारद जी ने कहा - व्यास जी ! प्राचीन समय की बात है - यही संदेह मेरे हृदय में भी उत्पन्न हो गया था। तब मैं अपने पिता अमित तेजस्वी ब्रह्मा जी के स्थानपर गया और उनसे इस समय जिस विषय में तुम मुझसे पूछ रहे हो, उसी विषय में मैंने पूछा। मैंने कहा - पिताजी ! यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड कहां से उत्पन्न हुआ ? इसकी रचना आपने की है या श्री विष्णु जी ने या श्री शंकर जी ने - कृपया सत-सत बताना। ब्रह्मा जी ने कहा - (पृष्ठ 115 से 120 तथा 123, 125, 128, 129) बेटा ! मैं इस प्रश्न का क्या उत्तर दूँ ? यह प्रश्न बड़ा ही जटिल है। पूर्वकाल में सर्वत्र जल-ही-जल था। तब कमल से मेरी उत्पत्ति हुई। मैं कमल की कर्णिकापर बैठकर विचार करने लगा - ‘इस अगाध जल में मैं कैसे उत्पन्न हो गया ? कौन मेरा रक्षक है? कमलका डंठल पकड़कर जल में उतरा। वहाँ मुझे शेषशायी भगवान् विष्णु का मुझे दर्शन हुआ। वे योगनिद्रा के वशीभूत होकर गाढ़ी नींद में सोये हुए थे। इतने में भगवती योगनिद्रा याद आ गयीं। मैंने उनका स्तवन किया। तब वे कल्याणमयी भगवती श्रीविष्णु के विग्रहसे निकलकर अचिन्त्य रूप धारण करके आकाश में विराजमान हो गयीं। दिव्य आभूषण उनकी छवि बढ़ा रहे थे। जब योगनिद्रा भगवान् विष्णुके शरीर से अलग होकर आकाश में विराजने लगी, तब तुरंत ही श्रीहरि उठ बैठे। अब वहाँ मैं और भगवान् विष्णु - दो थे। वहीं रूद्र भी प्रकट हो गये। हम तीनों को देवी ने कहा - ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर ! तुम भलीभांति सावधान होकर अपने-अपने कार्यमें संलग्न हो जाओ। सृष्टी, स्थिति और संहार - ये तुम्हारे कार्य हैं। इतनेमें एक सुन्दर विमान आकाश से उतर आया। तब उन देवी नें हमें आज्ञा दी - ‘देवताओं ! निर्भीक होकर इच्छापूर्वक इस विमान में प्रवेश कर जाओ। ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र ! आज मैं तुम्हें एक अद्भुत दृश्य दिखलाती हूँ।‘ हम तीनों देवताओं को उस पर बैठे देखकर देवी ने अपने सामर्थ्य से विमान को आकाश में उड़ा दिया। इतने में हमारा विमान तेजी से चल पड़ा और वह दिव्यधाम- ब्रह्मलोक में जा पहुंचा। वहाँ एक दूसरे ब्रह्मा विराजमान थे। उन्हें देखकर भगवान् शंकर और विष्णु को बड़ा आश्चर्य हुआ। भगवान् शंकर और विष्णुने मुझसे पूछा-‘चतुरानन ! ये अविनाशी ब्रह्मा कौन हैं ?‘ मैंने उत्तर दिया-‘मुझे कुछ पता नहीं, सृष्टीके अधिष्ठाता ये कौन हैं। भगवन् ! मैं कौन हूँ और हमारा उद्देश्य क्या है - इस उलझन में मेरा मन चक्कर काट रहा है।‘ इतने में मनके समान तीव्रगामी वह विमान तुरंत वहाँ से चल पड़ा और कैलास के सुरम्य शिखरपर जा पहुंचा। वहाँ विमान के पहुंचते ही एक भव्य भवन से त्रिनेत्राधारी भगवान् शंकर निकले। वे नन्दी वृषभपर बैठे थे। क्षणभर के बाद ही वह विमान उस शिखर से भी पवन के समान तेज चाल से उड़ा और वैकुण्ठ लोकमें पहुंच गया, जहां भगवती लक्ष्मीका विलास-भवन था। बेटा नारद ! वहाँ मैंने जो सम्पति देखी, उसका वर्णन करना मेरे लिए असम्भव है। उस उत्तम पुरी को देखकर विष्णु का मन आश्चर्य के समुद्र में गोता खाने लगा। वहाँ कमललोचन श्रीहरि विराजमान थे। चार भुजाएं थीं। इतने में ही पवनसे बातें करता हुआ वह विमान तुरंत उड़ गया। आगे अमृत के समान मीठे जल वाला समुद्र मिला। वहीं एक मनोहर द्वीप था। उसी द्वीपमें एक मंगलमय मनोहर पलंग बिछा था। उस उत्तम पलंगपर एक दिव्य रमणी बैठी थीं। हम आपसमें कहने लगे - ‘यह सुन्दरी कौन है और इसका क्या नाम है, हम इसके विषय में बिलकुल अनभिज्ञ हैं। नारद ! यों संदेहग्रस्त होकर हमलोग वहाँ रूके रहे। तब भगवान् विष्णु ने उन चारुसाहिनी भगवती को देखकर विवेकपूर्वक निश्चय कर लिया कि वे भगवती जगदम्बिका हैं। तब उन्होंने कहा कि ये भगवती हम सभीकी आदि कारण हैं। महाविद्या और महामाया इनके नाम हैं। ये पूर्ण प्रकृति हैं। ये ‘विश्वेश्वरी‘, ‘वेदगर्भा‘ एवं ‘शिवा‘ कहलाती हैं। ये वे ही दिव्यांगना हैं, जिनके प्रलयार्णवमें मुझे दर्शन हुए थे। उस समय मैं बालकरूपमें था। मुझे पालनेपर ये झुला रही थीं। वटवृक्षके पत्रापर एक सुदृढ़ शैय्या बिछी थी। उसपर लेटकर मैं पैरके अंगूठेको अपने कमल-जैसे मुख में लेकर चूस रहा था तथा खेल रहा था। ये देवी गा-गाकर मुझे झुलाती थीं। वे ही ये देवी हैं। इसमें कोई संदेहकी बात नहीं रही। इन्हें देखकर मुझे पहले की बात याद आ गयी। ये हम सबकी जननी हैं। श्रीविष्णु ने समयानुसार उन भगवती भुवनेश्वरी की स्तुति आरम्भ कर दी। भगवान विष्णु बोले - प्रकृति देवीको नमस्कार है। भगवती विधात्राीको निरन्तर नमस्कार है। तुम शुद्धस्वरूपा हो, यह सारा संसार तुम्हींसे उद्भासित हो रहा है। मैं, ब्रह्मा और शंकर - हम सभी तुम्हारी कृपा से ही विद्यमान हैं। हमारा आविर्भाव और तिरोभाव हुआ करता है। केवल तुम्हीं नित्य हो, जगतजननी हो, प्रकृति और सनातनी देवी हो। भगवान शंकर बोले - ‘देवी ! यदि महाभाग विष्णु तुम्हीं से प्रकट हुए हैं तो उनके बाद उत्पन्न होने वाले ब्रह्मा भी तुम्हारे बालक हुए। फिर मैं तमोगुणी लीला करने वाला शंकर क्या तुम्हारी संतान नहीं हुआ - अर्थात् मुझे भी उत्पन्न करने वाली तुम्हीं हो। इस संसार की सृष्टी, स्थिति और संहार में तुम्हारे गुण सदा समर्थ हैं। उन्हीं तीनों गुणों से उत्पन्न हम ब्रह्मा, विष्णु एवं शंकर नियमानुसार कार्य में तत्पर रहते हैं। मैं, ब्रह्मा और शिव विमान पर चढ़कर जा रहे थे। हमें रास्तेमें नये-नये जगत् दिखायी पड़े। भवानी ! भला, कहिये तो उन्हें किसने बनाया है ? इसलिए यही प्रमाण देखें श्री मद्देवीभागवत महापुराण सभाषटिकम् समहात्यम्, खेमराज श्री कृष्ण दास प्रकाश मुम्बई, इसमें संस्कृत सहित हिन्दी अनुवाद किया है। तीसरा स्कंद अध्याय 4 पृष्ठ 10, श्लोक 42:- ब्रह्मा - अहम् इश्वरः फिल ते प्रभावात्सर्वे वयं जनि युता न यदा तू नित्याः, के अन्यसुराः शतमख प्रमुखाः च नित्या नित्या त्वमेव जननी प्रकृतिः पुराणा। (42) हिन्दी अनुवाद:- हे मात! ब्रह्मा, मैं तथा शिव तुम्हारे ही प्रभाव से जन्मवान हैं, नित्य नही हैं अर्थात् हम अविनाशी नहीं हैं, फिर अन्य इन्द्रादि दूसरे देवता किस प्रकार नित्य हो सकते हैं। तुम ही अविनाशी हो, प्रकृति तथा सनातनी देवी हो। (42) पृष्ठ 11-12, अध्याय 5, श्लोक 8:- यदि दयार्द्रमना न सदांऽबिके कथमहं विहितः च तमोगुणः कमलजश्च रजोगुणसंभवः सुविहितः किमु सत्वगुणों हरिः।(8) अनुवाद:- भगवान शंकर बोले:-हे मात! यदि हमारे ऊपर आप दयायुक्त हो तो मुझे तमोगुण क्यों बनाया, कमल से उत्पन्न ब्रह्मा को रजोगुण किस लिए बनाया तथा विष्णु को सतगुण क्यों बनाया? अर्थात् जीवों के जन्म-मृत्यु रूपी दुष्कर्म में क्यों लगाया? श्लोक 12:- रमयसे स्वपतिं पुरुषं सदा तव गतिं न हि विह विद्म शिवे (12) हिन्दी - अपने पति पुरुष अर्थात् काल भगवान के साथ सदा भोग-विलास करती रहती हो। आपकी गति कोई नहीं जानता। ब्रह्मा जी कहते हैं - मैं भी महामाया जगदम्बिकाके चरणों पर गिर पड़ा और मैंने उनसे कहा माता ! वेद कहते हैं ‘एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म‘ है तो क्या वह आत्मस्वरूपा तुम्हीं हो अथवा वह कोई और ही पुरुष है? देवी ने कहा - मैं और ब्रह्म एक ही हैं। मुझमें और इन ब्रह्ममें कभी किंचितमात्रा भी भेद नहीं है। गौरी, ब्राह्मी, रौद्री, वाराही, वैष्णवी, शिवा, वारुणी, कौबेरी, नारसिंही और वासबी - सभी मेरे रूप हैं। ब्रह्मा जी ! इस शक्तिको तुम अपनी स्त्री बनाओ। ‘महासरस्वती‘ नाम से विख्यात यह सुन्दरी अब सदा तुम्हारी स्त्री होकर रहेगी। भगवती जगदम्बा ने भगवान् विष्णु से कहा - ‘‘विष्णो ! मनको मुग्ध करनेवाली इस ‘महालक्ष्मी को लेकर अब तुम भी पधारो। यह सदा तुम्हारे वक्षःस्थल में विराजमान रहेगी। देवी ने कहा-शंकर! मन को मुग्ध करने वाली यह ‘महाकाली‘ गौरी-नाम से विख्यात है। तुम इसे पत्नीरूप से स्वीकार करो। अब मेरा कार्य सिद्ध करने के लिये विमान पर बैठकर तुमलोग शीघ्र पधारो। कोई कठिन कार्य उपस्थित होनेपर जब तुम मुझे स्मरण करोगे, तब मैं सामने आ जाऊंगी। देवताओ ! मेरा तथा सनातन परमात्मा का ध्यान तुम्हें सदा करते रहना चाहिये। हम दोनों का स्मरण करते रहोगे तो तुम्हारे कार्य सिद्ध होने में किंचितमात्रा भी संदेह नहीं रहेगा। ब्रह्मा जी कहते हैं - इस प्रकार कहकर भगवती जगदम्बिका ने हमें विदा कर दिया। उन्होंने शुद्ध आचारवाली शक्तियों में से भगवान् विष्णु के लिये महालक्ष्मी को, शंकरके लिये महाकाली को और मेरे लिये महासरस्वती को पत्नी बनने की आज्ञा दे दी। अब उस स्थान से हम चल पडे। सार विचार:- एक ब्रह्मण्ड की वास्तविक स्थिति से महर्षि व्यास जी, महर्षि नारद जी तथा श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी तथा श्री शंकर जी भी अनभिज्ञ हैं। यह भी स्पष्ट है कि श्री दुर्गा को प्रकृति भी कहते हैं तथा दुर्गा तथा ब्रह्म (ज्योति निरंजन-काल) का पति पत्नी का सम्बन्ध भी है। इसलिए लिखा है कि ब्रह्म के साथ प्रकृति का अभेद सम्बन्ध है, जैसे पत्नी को अर्धांगनी भी कहते हैं। श्री ब्रह्मा जी को स्वयं नहीं पता मैं कहां से उत्पन्न हुआ। हजार वर्ष तक जल में पृथ्वी की खोज की, परन्तु नहीं मिली। तब आकाशवाणी के आधार पर हजार वर्ष तक तप किया। कमल का डंठल पकड कर नीचे उतरा तो वहाँ शेष नाग की शैय्या पर भगवान विष्णु बेहोश पड़े थे। श्री विष्णु के शरीर में से एक देवी निकली (प्रेतनी की तरह) जो सुन्दर आभूषण पहने आकाश में विराजमान हो गई। तब श्री विष्णु जी होश में आए। इतने में शंकर जी भी वहीं आ गए। उपरोक्त विवरण से सिद्ध है कि तीनों भगवान बेहोश कर रखे थे। फिर सचेत किए। आकाश से विमान आया। देवी ने तीनों प्रभुओं को विमान में बैठने का आदेश दिया। विमान को आकाश में उड़ाया। ऊपर एक ब्रह्मा, एक शिव तथा एक विष्णु और देखा जो ब्रह्मलोक में थे। विचार करें - ब्रह्मलोक में दूसरे ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव दिखाई दिए थे, यह ज्योति निरंजन (ब्रह्म) की ही कलाबाजी है, वही अन्य तीन रूप धारण करके ब्रह्मलोक में तीन गुप्त स्थान (एक रजोगुण प्रधान क्षेत्र, एक सतोगुण प्रधान क्षेत्र, एक तमोगुण प्रधान क्षेत्र) बनाकर रहता है तथा प्रकृति (दुर्गा-अष्टंगी) को अपनी पत्नी रूप में रखता है। जब ये दोनों रजोगुण प्रधान क्षेत्र में होते हैं तब यह महाब्रह्मा तथा दुर्गा महासावित्राी कहलाते हैं। इन दोनों के संयोग से जो पुत्र इस रजोगुण प्रधान क्षेत्र में उत्पन्न होता है वह रजोगुण प्रधान होता है, उसका नाम ब्रह्मा रख देते हैं तथा जवान होने तक अचेत करके परवरिश करते रहते हैं। फिर कमल के फूल पर रखकर सचेत कर देते हैं। जब ये दोनों महाविष्णु तथा महालक्ष्मी रूप में (काल-ब्रह्म तथा दुर्गा) सतोगुण प्रधान क्षेत्र में रहते हैं तब दोनों के पति-पत्नी व्यवहार से जो पुत्र उत्पन्न होता है वह सतोगुण प्रधान होता है, उसका नाम विष्णु रख देते हैं। कुछ दिन के पश्चात् बालक को अचेत करके जवान होने तक परवरिश करते रहते हैं। फिर शेष नाग की शैय्या पर सुला देते हैं। फिर सचेत कर देते हैं। इसी प्रकार जब ये दोनों तमोगुण प्रधान क्षेत्र में रहते हैं तब शिवा अर्थात् दुर्गा तथा महाशिव अर्थात् सदाशिव के पति-पत्नी व्यवहार से जो पुत्र इस क्षेत्र में उत्पन्न होता है, वह तमोगुण प्रधान होता है। इसका नाम शिव रख देते हैं, इसे भी जवान होने तक अचेत रखते हैं, फिर जवान होने पर सचेत करते हैं। फिर तीनों को इक्ट्ठा करके विमान में बैठा कर ऊपर के लोकों का दृश्य दिखाते हैं। कहीं ये अपने आप को सर्वेस्वा न मान बैठें। गुण प्रधान क्षेत्र को समझने के लिए एक उदाहरण है - किसी मकान में तीन कमरे हैं। एक कमरे में देश भक्त शहीदों के चित्र लगे हों, जब व्यक्ति उस कमरे में जाता है तो उसके विचार भी देश भक्तों जैसे हो जाते हैं। दूसरे कमरे में साधु-संतों, ऋषियों आदि के चित्र लगे हों। उस कमरे में प्रवेश करते ही मन शान्त तथा प्रभु भक्ति की तरफ लग जाता है। तीसरे कमरे में अश्लील, अर्धनग्न स्त्री-पुरुषों के चित्र लगे हो तो मन में स्वतः बकवास घर करने लग जाती हैं। इसी प्रकार ऊपर ब्रह्मलोक में काल रूपी ब्रह्म ने तीन स्थान एक-एक गुण प्रधान बनाऐं हैं। तीनों प्रभु (रजगुण ब्रह्माजी, सतगुण विष्णुजी तथा तमगुण शिव जी) अपने गुणों का प्रभाव कैसे डालते हैं। उदाहरण - जैसे रसोईघर में मिर्चों का छोंक सब्जी में लगाया। मिर्च के गुण से सभी कमरों के व्यक्तियों को छींके आने लगी। जैसे साकार वस्तु मिर्च तो रसोई में थी, परन्तु उसकी निराकार शक्ति अर्थात् गुण ने दूर बैठे व्यक्तियों को भी प्रभावित कर दिया। ठीक इसी प्रकार तीनों प्रभु (श्री ब्रह्मा जी रजगुण, श्री विष्णु जी सतगुण तथा श्री शिव जी तमगुण) अपने-अपने लोक में रहते हुए तीन लोक (पृथ्वी लोक, पाताल लोक तथा स्वर्ग लोक) के प्राणियों को प्रभावित रखते हैं। जैसे मोबाईल फोन की रेंज से फोन कार्य करता है। इस प्रकार अदृश शक्ति रूपी गुणों से तीनों देवता अपने पिता काल की सृष्टी उसके आहार के लिए चला रहे हैं। दुर्गा का अपना अलग लोक भी है, जिसमें यह अपने वास्तविक रूप में दर्शन देती है। फिर इनका विमान दुर्गा के द्वीप में पहुंचा। तब ज्योति निरंजन अर्थात् कालरूपी ब्रह्म ने विष्णु जी को बचपन की याद प्रदान कर दी। तब श्री विष्णु जी ने बताया कि यह दुर्गा अपनी तीनों की माता है। मैं बालक रूप में पालने में लेटा था, यह मुझे लोरी देकर झुला रही थी। तब श्री विष्णु जी ने कहा कि हे दुर्गा आप हमारी माता हो। मैं (विष्णु) ब्रह्मा तथा शंकर तो जन्मवान हैं। हमारा तो आविर्भाव अर्थात् जन्म तथा तिरोभाव अर्थात् मृत्यु होती है, हम अविनाशी नहीं हैं। आप प्रकृति देवी हो। यह बात श्री शंकर जी ने भी स्वीकार की तथा कहा कि मैं तमोगुणी लीला करने वाला शंकर भी आपका ही पुत्र हूँ। श्री विष्णु जी तथा श्री ब्रह्मा जी भी आप से ही उत्पन्न हुए हैं। फिर इन तीनों देवताओं की शादी दुर्गा ने की। प्रकृति देवी (दुर्गा) ने अपनी शब्द शक्ति से अपने ही अन्य तीन रूप धारण किए। श्री ब्रह्मा जी की शादी सावित्री से, श्री विष्णु जी की शादी लक्ष्मी से तथा श्री शिव जी की शादी उमा अर्थात् काली से करके विमान में बैठाकर इन के अलग-अलग द्वीपों (लोकों) में भेज दिया। ज्योति निरंजन (काल-ब्रह्म) ने अपने स्वांसों द्वारा समुद्र में चार वेद छुपा दिए। फिर प्रथम सागर मंथन के समय ऊपर प्रकट कर दिए। ज्योति निरंजन (काल) के आदेश से दुर्गा ने चारों वेद श्री ब्रह्मा जी को दिए। ब्रह्मा ने दुर्गा (अपनी माता) से पूछा कि वेदों में जो ब्रह्म (प्रभु) कहा है वे आप ही हो या कोई अन्य पुरुष है। दुर्गा ने काल के डर से वास्तविकता छुपाने की चेष्टा करते हुए कहा कि मैं तथा ब्रह्म एक ही हैं, कोई भेद नहीं। फिर भी वास्तविकता नहीं छुपी। दुर्गा ने फिर कहा कि तुम तीनों मेरा तथा ब्रह्म का सदा स्मरण करते रहना। हम दोनों का स्मरण करते रहने से यदि कोई कठिन कार्य होगा तो मैं तुरन्त सामने आ जाऊंगी। विशेष - क्योंकि काल ने दुर्गा से कह रखा है कि मेरा भेद किसी को नहीं कहना है। इस डर से दुर्गा सर्व जगत् को वास्तविकता से अपरिचित रखती है। ये अपने पुत्रों को भी धोखे में रखते हैं। इसका कारण है कि काल को शाप लगा है एक लाख मानव शरीरधारी प्राणियों का आहार नित्य करने का। इसलिए अपने तीनों पुत्रों से अपना आहार तैयार करवाता है। श्री ब्रह्मा जी के रजगुण से प्रभावित करके सर्व प्राणियों से संतान उत्पति करवाता है। श्री विष्णु जी के सतोगुण से एक दूसरे में मोह उत्पन्न करके स्थिति अर्थात् काल जाल में रोके रखता है तथा श्री शंकर जी के तमोगुण से संहार करवा कर अपना आहार तैयार करवाता है। फिर तीनों प्रभुओं को भी मार कर खाता है तथा नए पुण्य कर्मी प्राणियों में से तीन पुत्र उत्पन्न करके अपना कार्य जारी रखता है तथा पूर्व वाले तीनों ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव चैरासी लाख योनियों तथा स्वर्ग-नरक में कर्म आधार स चक्र लगाते रहते हैं। यही प्रमाण शिव महापुराण, रूद्र संहिता, प्रथम (सृष्टी) खण्ड, अध्याय 6, 7 तथा 8, 9 में भी है।

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Pooja Kashyap Jul 17, 2019

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tarun kumar Jul 16, 2019

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Lalit Mishra Jul 16, 2019

इक्यावन शक्तिपीठों में एक अनन्त ब्रह्माण्ड अधीश्वरी का धाम : श्री विन्ध्याचल धाम!!!!! देवी भक्तों का विश्व प्रसिद्ध धाम है उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में विन्ध्य पहाड़ियों पर स्थित आदि शक्ति श्री दुर्गा जी का मन्दिर, जिसे दुनिया विन्ध्याचल मंदिर के नाम से पुकारती है ! यह आदि शक्ति माता विंध्यवासिनी का धाम अनादी काल से ही साधकों के भी लिए प्रिय सिद्धपीठ रहा है। विंध्याचल मंदिर पौराणिक नगरी काशी से लगभग 50 किलोमीटर दूर स्थित है। देश के 51 शक्तिपीठों में से एक है विंध्याचल। सबसे खास बात यह है कि यहां तीन किलोमीटर के दायरे में तीन प्रमुख देवियां विराजमान हैं। ऐसा माना जाता है कि तीनों देवियों के दर्शन किए बिना विंध्याचल की यात्रा अधूरी मानी जाती है। तीनों के केन्द्र में हैं मां विंध्यवासिनी। यहां निकट ही कालीखोह पहाड़ी पर महाकाली तथा अष्टभुजा पहाड़ी पर अष्टभुजी देवी विराजमान हैं। माता के दरबार में तंत्र-मंत्र के साधक भी आकर साधना में लीन होकर माता रानी की कृपा पाते हैं। नवरात्र में प्रतिदिन विश्व के कोने-कोने से भक्तों का तांता जगत जननी के दरबार में लगता है। त्रिकोण यंत्र पर स्थित विंध्याचल क्षेत्र का अस्तित्व सृष्टि से पूर्व का है तथा प्रलय के बाद भी समाप्त नहीं होता, क्योंकि यहां महालक्ष्मी, महाकाली व महासरस्वती स्वरूपा आद्यशक्ति मां विंध्यवासिनी स्वयं विराजमान हैं। यहां सबसे पहले गंगा स्नान किया जाता है और फिर ‘जय माता दी का उद्घोष करते हुए मां विंध्यवासिनी का दर्शन किया जाता है। इस पुण्य स्थल का वर्णन पुराणों में तपोभूमि के रूप में किया गया है। यहां सिंह पर आरूढ़ देवी का विग्रह ढाई हाथ लंबा है। इस बारे में अनेक मान्यताएं हैं। कहा जाता है कि देवी भागवत के दसवें स्कंध में सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी ने सबसे पहले श्री मनु तथा श्री शतरूपा को प्रकट किया। श्री मनु ने देवी की मूर्ति बनाकर सौ वर्षों तक कठोर तप किया, जिससे प्रसन्न हो भगवती ने उन्हें निष्कंटक राज्य, वंश-वृद्धि, परमपद का आशीर्वाद दिया। वर देकर महादेवी विंध्याचल पर्वत पर चलीं गईं, तभी से ही मां विंध्यवासिनी के रूप में आदि शक्ति की पूजा वहां होती आ रही है। शास्त्रों में मां विंध्यवासिनी के ऐतिहासिक महात्म्य का अलग-अलग वर्णन मिलता है। शिव पुराण में मां विंध्यवासिनी को माता सती का रूप माना गया है तो श्रीमद्भागवत में नंदजा देवी कहा गया है। मां के अन्य नाम कृष्णानुजा, वनदुर्गा भी शास्त्रों में वर्णित हैं। विंध्यवासिनी देवी का वर्णन कुछ इस तरह आया है – नंद गोप गृहे जाता यशोदा गर्भ संभव: तत्सवै नास्यामि विंध्याचलवासिनी – अर्थात जब कंस ने माँ यशोदा की संतान जिसे वह माँ देवकी की आखिरी संतान समझ रहा था, को मारने के लिए उसे हवा में उछाला तो वही देवी योग माया ही थी जो इस स्थान पर बाद में स्थित हो गर्इं। शास्त्र बताते हैं कि महान ऋषि कात्यायन ने मां जगदम्बा को प्रसन्न किया था। इस वजह से मां का नाम कात्यायनी भी है। नील तंत्र में इस बात का उल्लेख है कि जहां विंध्याचल पर्वत को पतित पावनी गंगा स्पर्श करती हैं वहीं मां विंध्यवासिनी का वास है। नीलतंत्र में यह भी उल्लेख है कि मां गंगा पूरे भारतवर्ष में कहीं भी पहाड़ों को छूकर नहीं गुजरतीं, बस विंध्याचल ही एक ऐसा स्थान है जहां विंध्य पर्वत श्रृंखला को छूते हुए गंगा जी का प्रवाह है। इस महाशक्तिपीठ में वैदिक तथा वाम मार्ग विधि से भी पूजन होता है। शास्त्रों के अनुसार, अन्य शक्तिपीठों में देवी के अलग अलग अंगों की प्रतीक रूप में पूजा होती है। विंध्य महात्म्य में इस बात का उल्लेख है कि मां विंध्यवासिनी पूर्णपीठ है। दो शक्ति पीठ स्थल देश से बाहर हैं। एक है नेपाल का गोहेश्वरी पीठ तथा दूसरा है पाकिस्तान का हिंगलाज पीठ। अनेक विद्वान इस पीठ को सृष्टि के उदयकाल से अवतरित बताते हैं तो कुछ द्वापर काल में इसके अवतरित होने का प्रमाण देते हैं। वैसे इस पीठ में मां के दर्शन तो साल के बारहों महीने अनवरत होते हैं, लेकिन यहां नवरात्र का विशेष महत्व है। यहां शारदीय तथा बासंतिक नवरात्र में लगातार चौबीस घंटे मां के दर्शन होते हैं। नवरात्र के दिनों में मां के विशेष श्रृंगार के लिए मंदिर के कपाट दिन में चार बार बंद किए जाते हैं। सामान्य दिनों में मंदिर के कपाट रात 12 बजे से भोर 4 बजे तक बंद रहते हैं। नवरात्र में महानिशा पूजन का भी अपना महत्व है। यहां अष्टमी तिथि पर वाममार्गी तथा दक्षिण मार्गी तांत्रिकों का जमावड़ा रहता है। ऐसा कहा जाता है कि मां के हर श्रृंगार के बाद उनके अलग रूप के दर्शन होते हैं। मां का सबसे सुन्दर श्रृंगार रात्रि के दर्शनों में होता है। यह भी कहा जाता है कि नवरात्र के दिनों में मां मन्दिर की पताका पर वास करती हैं ताकि किसी वजह से मंदिर के गर्भ गृह स्थित मूर्ती तक न पहुंच पाने वाले भक्तों को भी मां के सूक्ष्म रूप के दर्शन हो जाएं। नवरात्र के दिनों में इतनी भीड़ होती है कि अधिसंख्य लोग मां के पताका के दर्शन करके ही खुद को धन्य मानते हैं। हालांकि मां की चौखट तक जाए बिना कोई नहीं लौटता, लेकिन ऐसी मान्यता है कि पताका के भी दर्शन हो गए तो यात्रा पूरी हो जाती है। कहते हैं कि सच्चे दिल से यहां की गई मां की पूजा कभी बेकार नहीं जाती। हर रोज यहां हजारों लोग मत्था टेकते हैं और देवी मां का पूजन करते हैं। विंध्य पर्वत श्रृंखला के नीचे मां विंध्यवासिनी के दर्शन होंते हैं तो अष्टभुजी मंदिर के निकट सीताकुंड, तारादेवी, भैरवकुंड के दर्शन किए जा सकते हैं। त्रेतायुग में श्रीराम ने यहीं पर देवी पूजा कर रामेश्वर महादेव की स्थापना की, जबकि द्वापर में श्री वसुदेव के कुल पुरोहित श्री गर्ग ऋषि ने कंस वध एवं श्रीकृष्णावतार हेतु विंध्याचल में लक्षचंडी का अनुष्ठान किया था। मार्कण्डेय पुराण में वर्णित दुर्गासप्तशती (देवी माहात्म्य) के ग्यारहवें अध्याय के 41-42 श्लोकों में मां भगवती कहती हैं ‘वैवस्वत मन्वंतर के 28वें युग में शुंभ-निशुंभ नामक महादैत्य उत्पन्न होंगे, तब मैं नंदगोप के घर उनकी पत्नी यशोदा के गर्भ में आकर विंध्याचल जाऊंगी और महादैत्यों का संहार करूंगी। श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध में श्रीकृष्ण जन्माख्यान में वर्णित है कि श्री देवकी के आठवें गर्भ से आविर्भूत श्रीकृष्ण को वसुदेवजी ने कंस के भय से रातों रात यमुना नदी पार कर श्री नंद के घर पहुंचाया तथा वहां से श्री यशोदा नंदिनी के रूप में जन्मी देवी योग माया को मथुरा ले आए। आठवीं संतान के जन्म की सूचना मिलते ही कंस कारागार पहुंचा। उसने जैसे ही उन्हें पत्थर पर पटकना चाहा। वह उसके हाथों से छूट देवी आकाश में पहुंची और अपने दिव्य स्वरूप को दर्शाते हुए कंस वध की भविष्य वाणी कर विंध्याचल लौट गई। माता विंध्यवासिनी विंध्य पर्वत पर मधु और कैटभ नामक असुरों का नाश करने वाली भगवती यंत्र की अधिष्ठात्री हैं। यहां संकल्प मात्र से उपासकों को सिद्धि प्राप्त हो जाती है, यही कारण है कि इन्हें माँ सिद्धिदात्री भी कहा जाता हैं। देवी के ध्यान में स्वर्णकमल पर विराजती, त्रिनेत्रा, कांतिमयी, चारों हाथों में शंख, चक्र, वर और अभय मुद्रा धात्री, पूर्णचंद्र की सोलह कलाओं से परिपूर्ण, गले में वैजयंती माला, बाहों में बाजूबंद और कानों में मकराकृति कुंडल धात्री, इंद्रादि देवताओं द्वारा पूजित चंद्रमुखी परांबा विंध्यवासिनी का स्मरण होना चाहिए, जिनके सिंहासन के बगल में ही उनका वाहन स्वरूप महासिंह है। त्रिकोण यंत्र के पश्चिम कोण पर उत्तर दिशा की तरफ मुख किए हुए अष्टभुजी देवी विराजमान हैं। अपनी अष्टभुजाओं से सब कामनाओं को पूरा करती हुई वह संपूर्ण दिशाओं में स्थित भक्तों की आठ भुजाओं से रक्षा करती हैं। कहा जाता है कि वहां अष्टदल कमल आच्छादित है, जिसके ऊपर सोलह, फिर चौबीस दल हैं, बीच में एक बिंदु है, जिसके अंदर ब्रह्मरूप में महादेवी अष्टभुजी निवास करती हैं। यहां से मात्र तीन किलोमीटर दूर ‘काली खोह नामक स्थान पर महाकाली स्वरूपा चामुंडा देवी का मंदिर है, जहां देवी का विग्रह बहुत छोटा लेकिन मुख विशाल है। इनके पास भैरवजी का स्थान है। ज्येष्ठ मास के शुक्लपक्ष की षष्ठी तिथि में विंध्यवासिनी के दर्शन और पूजन का अतिशय माहात्म्य माना गया है। इस कलियुग में आदमी के जीवन का कोई भरोसा नहीं होता है इसलिए जल्द से जल्द मौका निकाल कर माँ विंध्यवासिनी के दर्शन का महा सौभाग्य जरूर अर्जित करना चाहिए !

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GURUJI - 06200508928 Jul 16, 2019

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