देश का प्रधान सेवक मेरे बाबा की शरण में

देश का प्रधान सेवक मेरे बाबा की शरण में

देश का प्रधान सेवक मेरे बाबा की शरण में

Jyot Like +459 प्रतिक्रिया 34 कॉमेंट्स • 205 शेयर
Jai Shri Krishna.
pradip jethra
53 प्रतिक्रिया • 52 शेयर
jai Sri radhe
panditRavi pujari
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श्री मां गंगा आरती हरिद्वार
j.p.CHAURASIYA
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jai kaleshvar ji,jai Mata di ,jai dadi ji
Trilock Chand Namdev
42 प्रतिक्रिया • 9 शेयर
🌷🌷योग करो ,स्वस्थ जीओ मस्त रहो🌷🌷🌷
Kripashankar Dwivedi
22 प्रतिक्रिया • 16 शेयर
Jai Mata di
Omprakash Upadhyay
61 प्रतिक्रिया • 23 शेयर
51 शक्ति पीठ कहॉ कहॉ पर है ईस पोस्ट से आपको जानकारी मिलेगी
S .c Mishra
14 प्रतिक्रिया • 20 शेयर
Jai Kaal Bhairava. Kashi
Navneet Mathur
46 प्रतिक्रिया • 3 शेयर
🐯20062018जय श्री जीवदानीमाँ विरार महाराष्ट्र भुनेश्वरीमाँ गोंडल राजकोट खेदब्रह्मा अम्बिकामाँ गुजरात...
🐘श्री राम🦁भरोसा🦁सिंह🐘(नोडि
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20🌹06🌹2018🌹जय श्री🌹काशीविश्वनाथ 🌹महादेवजी🌹जामनगर🌹
🐯Gopi Nath🐯
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कामेंट्स

Vijay Negi May 3, 2017
Mahadev Bhakat Respected Modi ji ki Niswarth Desh Bhakati ko Baba Kedarnath ji Sada Amartav pradan karene ka Ashrivad banye rekhein

Seema Sharad Varshney. May 3, 2017
जय हो भोले नाथ की चिंता नही किसी बात की

Kavita chouhan May 4, 2017
मन्दिर मे पैरो मे चप्पल डाल रखी हैं

Jitu Dass May 4, 2017
भक्तों के बारह आभूषण हैं , जबतक हम ( भक्त ) इनको धारण करके सद उपयोग नहीं करते तब तक हम पूर्ण रूप से भक्त नहीं , यह भी सत्य है कि सबकुछ परमात्मा की असीम कृपा से ही होता है , हमतो परमात्मा के निपट नादान बच्चे हैं ।।सत साहेब।। ------------------------------------------------------------------ सतगुरू दाता है और हमें सबकुछ अथवा बहुत कुछ दिया है , जो भी दिया है उसका हमारे अन्दर ( शरीर के भीतर ) पूर्ण रूप से शक्ति के रूप में काम करता है । ये सर्व गुण हमारे भीतर से बाहर उजागर होते हैं ।सतगुरू दाता की परम सत्ता जो है .......। सतगुरू दाता हमारे परमात्मा है , परमात्मा ने हमें जो सत्य भक्ति का दान दिया है और साथ में नियम और मर्यादा में रहकर भक्ति करने को शुभ आशिरवाद दिया है । सतगुरू का आशिरवाद खूब भरपूर मात्रा में फलता - फूलता है । परमात्मा ने हमें चार वेद , गीता , पाँचवा सुक्ष्मवेद , गुरूग्रन्थसाहिब , कुरानशरीफ , बाईबल और अठारह पुराणों आदि पवित्र धर्म ग्रन्थों ( शास्त्रों ) को निचौड़कर सार तत्व अर्थात् तत्वज्ञान दिया है । भक्ति का बोध रूपी भक्ति का बीज का बिजारोपण कर नामदान ( गुरू दिक्षा ) दी है , उसका कितना और कैसा फल मिलता है वह भी यथार्थ भक्ति बोध भी दिया है । आवश्यकता है हम भक्तों को समजकर अमल करने की । इसी कड़ी में हम , भक्तों के आभूषण भी बारह प्रकार के बताए गए हैं जो निम्न है :--- 1 . शील 2. संतोष 3. श्रद्धा 4. दया 5. भक्ति भाव 6. नम्रता 7. शोर्य 8. विवेक 9. सत्य भाषण 10 . सेवा भाव 11 . क्षमा 12 . परोपकार भी प्रदान करना । ये सारे के सारे गुण हमारे में है , तभी तो हम भक्त कहलाते हैं । यह सब हम परमात्मा से रोजाना माँगते भी हैं , कृपया देखें :--- नित्य - नियम में "सर्व लक्षणा ग्रन्थ का सर्लार्थ" - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - इसके अलावा हम और भी माँगते हैं कि , "रूप" हे परमात्मा हमें सरल स्वरूप प्रदान करना , कठोर दिखाई न दूँ । "द्रव्य" अर्थात् धन भी देना प्रभु ताकि मेरा निर्वाह ठीक चले जिस करण से मैं ( दास ) कुछ दान - धर्म भी कर सकूँ और भक्ति के लिए भी निश्चिंत होकर समय निकाल सकूँ । क्यों कि निर्धन व्यक्ति पहले धन चाहता है , उसी चिंता में भक्ति नहीं कर पाता । हम परमात्मा को कहते हैं कि हे प्रभु ! महापुरूषों का मिलन कराना , जिस कारण से तत्वज्ञान तथा सत्संग प्राप्त हो सके , यह भी आप मुझे प्रदान करना । गरीबदास जी की वाणी "--- गरीब, उत्तम कुल कर्तार दे , द्वादस भूषण संग । रूप द्रव्य दे दया कर , ज्ञान भजन सत्संग ।। सील संतोष विवेक दे , क्षमा दया इकतार । भाव भक्ति वैराग दे , नाम निरालम्भ सार ।। जोग युक्ति स्वास्थ्य जगदीश दे , सुक्ष्म ध्यान दयाल । अकल अकीन अजन्म जति , अष्ठसिद्धि नौनिधि ख्याल।। सतगुरू दाता सरलार्थ करके समजाया है कि , योगयुक्त अर्थात् भक्ति की विधि शास्त्रानुकुल देना तथा स्वस्थ अर्थात् निरोग जीवन देना । हे जगदीश ! सूक्ष्म ध्यान अर्थात् अंतर में आपकी लगन बनी रहे , वैसे संसार में कार्य करता रहूँ । अकल अकीन अर्थात् अटूट विश्वास तथा कभी जन्म न हो ऐसा मन को "जति" अर्थात् द्रढ़ प्रतिज्ञा वाला बना दे ।अष्ट सिद्धि और नौ प्रकार की रिद्धि तो एक ख्याल अर्थात् स्वपन समान लगे । जैसे स्वपन में वस्तु प्राप्त होती है तो स्वपन टूट जाने पर वह पास नहीं होती । इसी प्रकार सिद्धि और रिद्धि है । सतगुरू देव की जय ।।बन्दी छोड़ की जय।। www.supremegod.org

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