Swami Lokeshanand
Swami Lokeshanand Apr 15, 2019

अब आप सावधान हो जाएँ !! हृदयस्थ भगवान के निर्देश में चलते चलते, जब आपका चित् त्रिकूट नहीं ही रहता, चित्रकूट हो जाता है, जब अन्त:करण भगवदाकार हो जाता है, अपना कोई संकल्प रहता ही नहीं, भगवान का संकल्प ही आपका संकल्प हो जाता है, जब त्रिगुण, त्रिदेह, त्रिवस्था का झझंट नहीं रहता, माया का बंधन नहीं रहता, तब, तब आप में तीन परिवर्तन होते हैं। १- आप ही अत्रि हो जाते हैं। अत्रि माने अ+त्रि, जहाँ तीन गुण न हों। अभी तक तो आप स्त्री थे, स्+त्रि, जहाँ तीन हों। जब तीनों गुणों का अभाव ही हो गया, स्त्री अत्रि हो गया। जीवभाव नहीं रहा, मुक्ति सिद्ध हो गई। २- आपकी बुद्धि जो अभी तक असूया थी, दूसरे का दोष दर्शन करती थी, छिद्रान्वेषण करती थी, अब निर्मल हो गई, दोष दर्शन रहित हो गयी, दूसरे के छिद्र ढंकने लगी, समस्त गुण दोषों से दृष्टि हट गई, सियाराम मय हो गई, परम पवित्र हो गई, अनुसूया हो गई। ३- जिस बुद्धि से संसार की व्यथा निकला करती थी, अब भगवान की कथा बहने लगी। मंदाकिनी बहने लगी। "रामकथा मंदाकिनी चित्रकूट चित् चारू" ऐसा जिसका चित् हो गया, उसी का चित् सुंदर चित् है। अब उसमें जगत का चित्र बनता ही नहीं, उसके चित् में अभाव का अभाव हो गया, उसका स्थान भाव ने ले लिया, दुख और राग मिट गया, आनन्द और अनुराग उतर आया। यही वो अवस्था है जिसमें पापनाशिनी रामकथा अपने से पनपने लगी, भीतर हिलोरें मारने लगी, बाहर छलकने लगी। अब बिना ही प्रयास, मुंह खुलते ही स्वाभाविक ही भगवान की कथा निकलने लगी। वह स्वयं तो शीतल हो ही गया, जिसके कान में उसकी आवाज पड़ती है, वह भी शीतल हो जाता है, उसका भी पाप नष्ट होने लगता है, उसका भी मुक्ति का मार्ग खुलने लगता है। अब विडियो देखें- चित्रकूट https://youtu.be/W3Kw9TJcThM

अब आप सावधान हो जाएँ !!
हृदयस्थ भगवान के निर्देश में चलते चलते, जब आपका चित् त्रिकूट नहीं ही रहता, चित्रकूट हो जाता है, जब अन्त:करण भगवदाकार हो जाता है, अपना कोई संकल्प रहता ही नहीं, भगवान का संकल्प ही आपका संकल्प हो जाता है, जब त्रिगुण, त्रिदेह, त्रिवस्था का झझंट नहीं रहता, माया का बंधन नहीं रहता, तब, तब आप में तीन परिवर्तन होते हैं।
१- आप ही अत्रि हो जाते हैं। अत्रि माने अ+त्रि, जहाँ तीन गुण न हों। अभी तक तो आप स्त्री थे, स्+त्रि, जहाँ तीन हों। जब तीनों गुणों का अभाव ही हो गया, स्त्री अत्रि हो गया। जीवभाव नहीं रहा, मुक्ति सिद्ध हो गई।
२- आपकी बुद्धि जो अभी तक असूया थी, दूसरे का दोष दर्शन करती थी, छिद्रान्वेषण करती थी, अब निर्मल हो गई, दोष दर्शन रहित हो गयी, दूसरे के छिद्र ढंकने लगी, समस्त गुण दोषों से दृष्टि हट गई, सियाराम मय हो गई, परम पवित्र हो गई, अनुसूया हो गई।
३- जिस बुद्धि से संसार की व्यथा निकला करती थी, अब भगवान की कथा बहने लगी। मंदाकिनी बहने लगी।
"रामकथा मंदाकिनी चित्रकूट चित् चारू"
ऐसा जिसका चित् हो गया, उसी का चित् सुंदर चित् है। अब उसमें जगत का चित्र बनता ही नहीं, उसके चित् में अभाव का अभाव हो गया, उसका स्थान भाव ने ले लिया, दुख और राग मिट गया, आनन्द और अनुराग उतर आया।
यही वो अवस्था है जिसमें पापनाशिनी रामकथा अपने से पनपने लगी, भीतर हिलोरें मारने लगी, बाहर छलकने लगी। अब बिना ही प्रयास, मुंह खुलते ही स्वाभाविक ही भगवान की कथा निकलने लगी।
वह स्वयं तो शीतल हो ही गया, जिसके कान में उसकी आवाज पड़ती है, वह भी शीतल हो जाता है, उसका भी पाप नष्ट होने लगता है, उसका भी मुक्ति का मार्ग खुलने लगता है।
अब विडियो देखें- चित्रकूट
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