aman
aman Nov 12, 2017

mujhko v darsh dedo paras prabhu deva

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Lalan Singh Sep 28, 2020

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Aryan Phulwani Sep 28, 2020

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hari mohan Sep 28, 2020

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लीलाधर की लीला न्यारी — लीलाधर की लीला न्यारी, मानव रूप धरे कंसारी । ( कंस के शत्रु) जन्म लिया माँ देवकी कोख से, खुल गये जेल के सारे ताले। सो गये प्रहरी सारे योग से, पहुँच गये गोकुल बन ग्वाले ।। माँ यशोदा को धन्य-धन्य कर, गौओं के बन गये रखवारे । गोपी, ग्वाल-बाल संग मिलकर, सबहि नचावें नचावनहारे ।। मामा कंस की महिमा न्यारी, प्रतिदिन भेजें मारनहार । मार सके उसको क्या कोई, वही है सबका तारनहार ।। बाल-रूप धर, कृष्ण वर्ण ले, आ गये जग में साँवरिया । नंद-यशोदा भागे पीछे , पागल बनके बावरिया ।। मेरे हृदय में भी बस जाओ, हे! मथुरा के प्रतिपालक। अवगुण सारे गुण बन जायें, हे मधुसूदन ! जनतारक ।। हाथ जोड़कर विनती करूँ मैं, सबका जीवन बने मधुवन। तुम रक्षक बन जाओ सबके, हे करुनामय ! नंदनंदन। ।। 🍃🌺⚜️जय श्री कृष्ण 🌺🍃 🍃🌺⚜️ राधे राधे 🌺🍃

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ओम शांति आत्मा एक चेतन वस्तु है।आत्मा को चेतन इसी कारण कहा जाता है कि वह सोच-विचार कर सकती है, दुख- सुख का अनुभव कर सकती है, अच्छा- बुरा करने का पुरूषार्थ (कर्म) कर सकती है। बल्कि मन स्वयं आत्मा के ही संकल्पों का या दुख-सुख के अनुभव का या इच्छा का नाम है।बुद्धि स्वयं आत्मा के ही निर्णय, विचार, विवेक- शक्ति का नाम है। और संस्कार भी स्वयं आत्मा द्वारा किये हुए अच्छे या बुरे कर्मों के आत्मा पर पडे प्रभाव का नाम है। या इसे ऐसे भी कह सकते हैं, अच्छे या बुरे कर्म करने के बाद आत्मा की जो वृत्ति (व्यवहार) बनती है, उसका नाम संस्कार या स्वभाव है। अतः आत्मा को मन, बुद्धि एवं संस्कारों से अलग मानना तो गोया आत्मा को चेतन न मानना अर्थात उसे जड मानना होगा।चेतन आत्मा में और जड प्रकृति में तो यही अन्तर है कि प्रकृति इच्छा, विचार, प्रयत्न, और अनुभव आदि लक्षण नहीं हैं, पर आत्मा में यह सभी लक्षण है।जब प्रकृति भले-बुरे, सुख- शान्ति आदि का अनुभव नहीं कर सकती, तो उससे निर्मित यह सूक्ष्म शरीर भला कैसे हो सकता है।

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