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[email protected] Jan 8, 2021

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Ravi Art Feb 25, 2021

🌺ॐ🌺 श्री गुरूवे नमः सादर चरन बंदन 🙇🙇🙇 गुरु जी के चरणों मे समर्पित #माता_काली_का_मांत्रिक_तत्व_निरूपण ॐ जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु‍ते। जयंती, मंगला, काली, भद्रकाली, कपालिनी, दुर्गा, क्षमा, शिवा धात्री और स्वधा- इन नामों से प्रसिद्ध जगदंबे। आपको मेरा नमस्कार है। 1. जयंती सर्वोत्कर्षेण वर्तते इति ‘जयंती’-सबसे उत्कृष्ट एवं विजयशालिनी देवी जयंती हैं। 2. मंगंल जननमरणादिरूपं सर्पणं भक्तानां लाति गृहणाति या सा मंगला मोक्षप्रदा-जो अपने भक्तों को जन्म-मरण आदि संसार-बंधन से दूर करती है, उन मोक्षदायिनी मंगलदेवी का नाम मंगला है। 3. कलयति भक्षयति प्रलयकाले सर्वभ् इति काली- जो प्रलयकाल में संपूर्ण सृष्टि को अपना ग्रास बना लेती है, वह काली है। 4. भद्रं मंगलं सुखं वा कलयति स्वीकरोति भक्तेभ्योदातुम् इति भद्रकाली सुखप्रदा-जो अपने भक्तों को देने के लिए ही भद्र सुख या मंगल स्वीकार करती है, वह भद्रकाली है। 5. जिन्होंने हाथ में कपाल तथा गले में मुण्डों की माला धारण कर रखी है, वह कपालिनी है। 6. दु:खेन अष्टड्गयोगकर्मोपासनारूपेण क्लेशेन गम्यते प्राप्तते या- सा दुर्गा- जो अष्टांगयोग, कर्म एवं उपासना रूप दु:साध्य से प्राप्त है, वे जगदंबा ‘दुर्गा’ है। 7. क्षमते सहते भक्तानाम् अन्येषां वा सर्वानपराघशान् जननीत्वेनातिशय-करुणामयस्वभावदिति क्षमा- संपूर्ण जगत् की जननी होने से अत्यंत करुणामय स्वभाव होने के कारण (क्योंकि माँ करुणामय होती है।) जो भक्तों को एवं दूसरों के भी अपराध क्षमा करती हैं, ऐसी देवी का नाम ही क्षमा है। 8. जिस प्रकार नाम वैसे ही भगवती का कार्य है। सबका कल्याण (शिव) करने वाली जगदम्बा को शिवा कहते हैं। 9. संपूर्ण प्रंपञ्च धारण करने वाली भगवती का नाम धात्री है। 10. स्वाहा रूप में (भक्तों से) यज्ञ भाग ग्रहण करके देवताओं का पोषण करने वाली देवी स्वाहा है। 11. श्राद्ध और तर्पण को स्वीकार करके पितरों का पोषण करने वाली भगवती स्वधा है। इस प्रकार अनेक रूपों में भगवती भक्तों की मनोकामना को पूर्ण करती हैं। मनुष्य ने उनकी आराधना अनेक प्रकार से करना चाहिए। भगवती को बारम्बार नमस्कार करना चाहिए। नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नम:। नम: प्रकृत्यै भद्रायै नियता: प्रणता: स्मताम्।। देवी को नमस्कार है, महादेवी को नमस्कार है। महादेवी शिवा को सर्वदा नमस्कार है। प्रकृति एवं भद्रा को मेरा प्रणाम है। हम लोग नियमपूर्वक जगदम्बा को नमस्कार करते हैं। भगवती देवी को कई रूपों में नमस्कार करना चाहिए। देवी सूक्तम् के अनुसार- भगवती विष्णु माया, श्रद्धा, चेतना बुद्धि, निद्रा, क्षुदा, छाया, शक्ति, तृष्णा, क्षमा जाति, शांति, श्रद्धा कांति लक्ष्मी, वृत्ति, स्मृति, दया, तुष्टि माता ऐसे अनेक रूपों में जो प्राणियों में स्थित है, उस देवी को बार-बार नमस्कार है। या देवी सर्वभुतेषु मातृरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै।। नमस्तस्यै।। नमस्तस्यै नमो नम:।। माता काली सारे जगत की माता, माता रूप मे सर्वत्र विराजमान है वही सबका भरण पोषण और मुक्ति प्रदान करती है मै उस काली को नमस्कार नमस्कार नमस्कार करता हूँ 🌺भवानी संकर कल्याण करे🌺 🙏🙏 🌺ॐ🌺 श्री गुरूवे नमः सादर चरन बंदन 🙇🙇🙇

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savita Feb 26, 2021

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श्री कालिका महापुराण में आज श्री कालिका महापुराण नौवां दिन *शिव, शांता, महामाया, योगनिद्रा, जगन्मयी* दक्ष प्रजापति ने कहा था-शिवा, शान्ता, महामाया, योगनिद्रा, जगन्मयी जो विष्णुमाया कही जाती हैं उस सनातनी देवी के लिए मैं नमस्कार करता हूँ। जिसके द्वारा धाता (ब्रह्मा) इस जगत् की सृष्टि की स्थिति का सृजन करने के कार्य में नियुक्त किया था और पहले इस सृष्टि की रचना उसने की थी और भगवान् विष्णु ने उस सृष्टि की स्थिति अर्थात् हरिपालन किया था । जिसके वियोग से जगत् के पति शम्भु ने अन्त अर्थात् सृष्टि का संहार किया था । उसी देवी आपको, मैं प्रणाम करता हूँ । आप विकारों से रहित हैं, शुद्ध हैं, अप्रमेया अर्थात् प्रमाण करने के योग्य हैं, प्रभा वाली हैं, आप प्रमाण मानमेय नाम वाली और सुख स्वरूपिणी हैं ऐसी आपको मैं करता हूँ। जो पुरुष, देवी आपका चिन्तन करें जो कि आप विद्या-अविद्या के स्वरूप वाली परा हैं उस पुरुष के सुखों का भोग्य और मुक्ति सदा ही करतल में स्थित रहा करती है । जो पुरुष आप देवी की प्रत्यक्ष रूप से परमपावनी का एक बार भी दर्शन प्राप्त कर लेता है उस पुरुष की अवश्य ही मुक्ति हो जाया करती है जो कि विद्या, अविद्या की प्रकाशिका है । हे योगनिद्रे! हे महामाये! हे जगन्मयी! हे विष्णुमाये! जो प्रमाणार्थं सम्पन्न चेतना है वह तेरे ही स्वरूप वाली है । हे जगन्मात! जो पुरुष आपका अम्बिका कहकर स्तवन किया करता है, जो जगन्मयी और मया इन नामों का उच्चारण करके आपकी स्तुति किया करते हैं उनका सभी कुछ अभीष्ट सम्पन्न हो जाया करता है । मार्कण्डेय मुनि ने कहा-महान् आत्मा वाले दक्ष के द्वारा इस रीति से स्तुति की गयी। जगन्माता उस अवसर पर उसी भाँति दक्ष प्रजापति से बोली जैसे माता सुनती ही नहीं हो । वहाँ पर स्थित सबको सम्मोहित करके जिस तरह से दक्ष वह सुनता है उस प्रकार अन्य माया से नहीं श्रवण करता है उस समय में अम्बिका ने कहा । हे मुनिसत्तम! जिसके लिए पूर्व भी मेरी आराधना की थी वह आपका अभिष्ट कार्य सिद्ध हो गया है। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इस प्रकार से कहकर उस समय में देवी ने अपनी माया से दक्ष को समझाया था और फिर वह शैशव भाव में समास्थित होकर जननी के समीप रोदन करने लगी थी। इसके अनन्तर वीरणी ने बड़े ही यत्न से यथोचित रूप से सुसंस्कार करके शिशु के पालन की विधि से उनको स्तन दिया था अर्थात् शगुन का दुग्ध पिलाया था। इसके अनन्तर वीरणी के द्वारा पालित की गयी थी तथा महात्मा दक्ष के द्वारा शुक्ल पक्ष का चन्द्रमा जिस तरह से प्रतिदिन वृद्धि वाला हुआ करता है उसी भाँति वह बड़ी हो गयी थी। हे द्विज श्रेष्ठों! उस देवी में सब सद्गुणों ने प्रवेश कर लिया था जिस तरह से चन्द्रमा में शैशव में भी समस्त मनोहर कलायें प्रवेश किया करती हैं। वह निज भाव से जिस समय में सखियों के मध्य गमन करके रमण करती थी। वह जिस समय में गीतों का गान करती है जो कि बचपन के लिए समुचित थे उस समय से स्मरमानसा वह उग्रस्थाणु, हर और रुद्र इन नामों का स्मरण किया करती थी । हे द्विज सत्तमों! दक्ष प्रजापति ने उस बालिका स्वरूप में स्थित देवी का 'सती' यह नाम रखा था। जो कि समस्त गुणों के द्वारा सत्व से भी और तप से भी परम प्रशस्ता थी । दक्ष और वीरणी दोनों की प्रतिदिन अनुपम करुणा बढ़ रही थी। उन दोनों दक्ष और वीरणी की करुणा की वृद्धि का कारण यही था कि वह सती बचपन में ही परमभक्ता थी अतएव उन दोनों की बारम्बार नित्य करुणा की वृद्धि हो रही थी। हे नरोत्तमों! वह समस्त परमसुन्दर गुणों से समाक्रान्त थी और सदा ही नवशालिनी थी अतएव उसने ( सती ने) अपने माता-पिता को परमाधिक सन्तोष दिया था अर्थात् वे अतीव सन्तुष्ट थे । इसके अनन्तर एक बार ऐसी घटना घटित हुई थी कि उस सती को अपने पिता दक्ष के पार्श्व में समय स्थित हुई को ब्रह्मा, नारद इन दोनों ने देखा था जो कि इस भूमण्डल में परम शुभा और रत्न भूता थी। वह सती भी उन दोनों का दर्शन प्राप्त करके समुत्पन्न हुई थी और उस समय विनम्रता से अवनत हो गयी थी। इसके अनन्तर उस सती ने देव ब्रह्माजी और देवर्षि ने उसी सती को प्रणाम किया था। प्रणाम करने के अन्त में ब्रह्माजी ने उस सती को विनय से अवनत स्वरूप का दर्शन किया था। तब नारदजी ने उस सती को यह आशीर्वाद कहा था कि जो तुम्हारी प्राप्ति की कामना करता है और जिसको तुम अपना पति बनाने की कामना किया करती हो उन सर्वज्ञ जगदीश्वर देव को अपने पति के स्वरूप में प्राप्त करो । जो अन्य किसी भी नारी को ग्रहण करने वाले नहीं हुए थे और न ग्रहण करते हैं तथा अन्य जाया को ग्रहण करेंगे भी नहीं । हे शुभे ! वही आपके पति होवें, जो अनन्य सदृश हैं अर्थात् जिनके सरीखा अन्य कोई भी नहीं है । इतना कहकर वे दोनों ( ब्रह्मा और नारद ) फिर दक्ष प्रजापति के आश्रय में स्थित होकर हे द्विजसत्तमो! उस दक्ष के द्वारा पूजित किए गए थे और वे दोनों अपने स्थान पर चले गए थे । *🙏🌹जय भगवती जय महामाया🌹🙏*

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श्री कालिका महापुराण में आज श्री कालिका महापुराण आठवां दिन *मदन वाक्य वर्णन* मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इसके अनन्तर ब्रह्माजी ने महामाया के स्वरूप का प्रतिपादन करके महादेव से फिर कहा था कि वह भगवान् शंकर के सम्मोहन करने में युक्ता हैं । ब्रह्माजी ने कहा-विष्णुमाया ने पहले ही यह स्वीकार कर लिया है जैसे महादेव दारा का परिग्रहण करेंगे। वह ऐसा करना अंगीकार कर चुकी हैं । हे कामदेव! उन्होंने स्वयं ही ऐसा कहा था कि वह अवश्य ही प्रजापति दक्ष की पुत्री के रूप में जन्म धारण करके महात्मा शम्भु की द्वितीया अर्थात् पत्नी रति और अपने सखा बसन्त के साथ मिलकर वैसा ही कर्म करो जिससे भगवान् शम्भु दारा को ग्रहण करने की इच्छा कर लेवें । भगवान् शंकर के द्वारा दारा के ग्रहण किए जाने पर हम कृत-कृत्य अर्थात् सफल हो जायेंगे और फिर यह सृष्टि अविच्छिन्न अर्थात् बीच में न टूटने वाली हो जायेगी। श्री मार्कण्डेय मुनि ने कहा-हे द्विजश्रेष्ठो! कामदेव ने लोकों के ईश ब्रह्माजी से उसी भाँति मधुरतापूर्वक कहा जो भी कुछ महादेवजी को मोहित करने के लिए उसने किया था । कामदेव ने कहा-हे ब्रह्माजी ! आप अब श्रवण कीजिए जो भी कुछ हमारे द्वारा महादेव जी के मोहन करने में किया जा रहा है उनके परोक्ष में अथवा प्रत्यक्ष में जो भी किया जा रहा है उसे बतलाते हुए मुझसे आप श्रवण कीजिए । इन्द्रियों को जीत लेने वाले भगवान् शम्भु ज्यों ही जिस समय समाधि का समाश्रय ग्रहण करके स्थित हुए थे उसी समय विशुद्ध वेग वाले अर्थात् सुमन्द और सुगन्धित तथा शीतल वायु के द्वारा हे लोकेश ! जो कि नित्य ही मोहन के करने वाली हैं उनसे उन शम्भु को विजित करूँगा कि अपने शरासन का ग्रहण करके अपने बाणों का मैं उनके गणों को मोहित करते हुए उनके समीप में भ्रमित करूँगा। मैं वहाँ पर सिद्धों के द्वन्द्वों को अहर्निश रमण कराता हूँ और निश्चय ही हाव और भाव सब प्रवेश किया करते हैं । हे पितामह ! यदि शम्भु के समीप में प्रविष्ट होने पर कौन सा प्राणी बारम्बार वहाँ पर भाव को नहीं किया करता है । मेरे केवल प्रवेश के होने ही से सभी जीव-जन्तु उस प्रकार का गमन करते हैं तो उसी समय में मैं वहीं पर हे ब्रह्माजी ! अपनी पत्नी रति और मित्र वसन्त के साथ चला जाऊँगा । यदि यह मेरु पर चले जाते हैं अथवा जिस समय तारकेश्वर में पहुँच जाते हैं या कैलाश गिरि पर गमन करते हैं तो उस समय मैं भी वहीं पर चला जाऊँगा। जिस अवसर पर भगवान् हर अपनी समाधि का परित्याग करके एक क्षण को भी स्थित होते हैं तो फिर मैं उनके ही आगे चक्रवाक के दम्पत्ति को योजित कर दूंगा । हे ब्रह्माजी! वह चक्रवाक का जोड़ा बार-बार हाव-भाव से संयुत अनेक प्रकार के भाव से उत्तम दाम्पत्य के क्रम को करेगा। उनके आगे फिर जाया के सहित नीलकण्ठों को भी समीप ही में हैं सम्मोहित करूंगा और समीप ही मृगों तथा अन्य पक्षियों को भी मोहयुक्त कर डालूँगा । यह सब जिस समय में एक अति अद्भुत भाव को देखकर कौन-सा प्राणी है जो उस समय में उत्सुकता से रहित बना रहे अर्थात् कोई भी चेतना ऐसा नहीं है जिसे उत्सुकता न हो और उनके ही आगे मृग अपनी प्रणयिनियों के साथ उत्सुकता वाले हो जाते हैं और उनके पार्श्व में तथा समीप में अतीव रुचिर भाव कहते हैं तो मेरा शर कदाचित् भी इसके विवर को नहीं देखता है । जिस मय में वह देह से गिराया जाता है जो कि मेरे ही द्वारा फेंका जाया करता है । आप तो सभी लोकों के धारण करने वाले हैं अर्थात् यह सभी कुछ का ज्ञान रखते हैं। प्रायः यह निश्चित ही ज्ञात होना चाहिए कि रामा के संग के बिना हर का मैं सहसाय भी निष्फल सम्मोहित करने के लिए समर्थ एवं पर्याप्त हूँ और यह सफल ही है । मेरा मित्र मधु अर्थात् बसन्त तो जो-जो भी उसके विमोहन की क्रिया करने में कर्म होंगे वह किया ही करता है । हे महाभाग ! जो नित्य ही उसके लिए उचित है उसका पुनः आप श्रवण कीजिए । जहाँ पर भी भगवान् शंकर स्थित होकर रहेंगे वहीं पर मेरा मित्र वह वसन्त चम्पकों, केशरों, आम्रों, वरुणों, पाटलों, नाग, केसर, मुन्नागों, किंशुकों, धनों, माधवी, मल्लिका, पर्णधारों, कुवरकों इन सबको वह विकसित कर दिया करता है। समस्त सरोवर ऐसे कर देता है कि उसमें कमल पूर्ण विकसित हो जाया करते हैं और वह मलय की ओर से आवाहन करने वाली परमाधिक सुगन्धित वायु में वीक्षन करते हुए यत्नपूर्वक भगवान् शंकर के आश्रम को सुगन्धित कर दे। समस्त वृक्षों का समुदाय विकसित हो जायेगा। वे लतायें परम रुचिर भाव से दाम्पत्य को प्रकट करती हुई वहाँ पदमेक्षों को विष्टित करेंगे अर्थात् वृक्षों से लिपट जायेंगे। पुष्पों वाले उन वृक्षों को उन सुगन्धित समीरणों से संयुत देखकर वहाँ पर मुनि भी कामकला के वश में हो जाया करते हैं जो अपनी इन्द्रियों का दमन किए हुए हैं । हे लोकों के स्वामिन् अनेक परम शोभन भावों के द्वारा अनेक गण, सुर और सिद्ध तथा परम तपस्वी गण भी जो-जो दमनशील हैं वे सभी वश में आ जाया करते हैं । उनके आगे हमने मोह का कोई भी कारण नहीं देखा है । भगवान् शंकर तो काम से उत्थित भाव को भी नहीं किया करते हैं । यह सभी कुछ मैंने देखकर और भगवान् शंकर की भावना का ज्ञान प्राप्त करके मैं तो शम्भु को मोहित करने की क्रिया से विमुख हो गया हूँ। यह नियत ही है कि बिना माया के यह कार्य कभी भी नहीं हो सकता है। इतना तो मैं सब कुछ कर चुका हूँ किन्तु शम्भु के मोहन के कार्य में मैं विफल ही रहा हूँ किन्तु पुनः आपके वचनादेश को श्रवण करके जो योगनिद्रा के द्वारा उदित है उस योगनिद्रा का प्रभाव सुनकर तथा गणों सहित देखकर मेरे द्वारा शंकर के विमोहन करने के लिए फिर एक बार उद्यम किया जाता है । कृपा करके हे त्रिलोकेश! योगनिद्रा को पुन: शीघ्र ही जिस प्रकार से शम्भु की जाया ( पत्नी ) हो जावें वैसा ही कीजिए । शम्भु के यम-नियम और नित्य ही होने वाले प्राणायाम तथा महेश के आसन और गोचर में प्रत्याहार ध्यान, धारणा और समाधि में विघ्नों को सम्भव होना मैं तो यह मानता हूँ कि मैं तो क्या मुझ जैसे सैकड़ों के द्वारा भी नहीं किया जा सकता है । तो भी यह कामदेव के गण भगवान् शंकर के यम नियमादि उपर्युक्त अंगों के विकाररूपी विघ्न करे। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इसके अनन्तर ब्रह्माजी ने भी पुनः कामदेव से यह वचन कहा था हे तपोधने ! ब्रह्माजी ने योगनिद्रा के वाक्य का स्मरण करके और निश्चय करके ही यह कहा था । ब्रह्माजी ने कहा-यह योगनिद्रा अवश्य ही भगवान् शम्भु की पत्नी होगी। जितनी भी आपकी शक्ति है उसी के अनुसार आप भी इन योगनिद्र की सहायता करिए। आप अब अपने गणों के साथ ही वहीं पर चले जाइए जहां पर भगवान् शंकर समवस्थित हैं । हे कामदेव ! आप भी अपने सखा वसन्त के साथ वहाँ पर शीघ्र ही गमन करिए जिस स्थान पर शम्भु विराजमान हैं और अहर्निश के चतुर्थ भाग में नित्य ही जगत् का मोहन करो और शेष तीन भाग में गणों के साथ सदा भगवान् शम्भु के समीप संस्थित रहो । मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इतना कहकर लोकों के स्वामी ब्रह्माजी वहीं पर अन्तर्धान हो गये थे और कामदेव अपने गणों के सहित उसी समय में भगवान् शम्भु के समीप चला गया था । इसी बीच में प्रजापति दक्ष चिरकाल तक तपस्या में रत होता हुआ बहुत प्रकार के नियमों से सुन्दर व्रतधारी होकर देवी की समाराधना में निरत हो गया था । हे मुनि सत्तमों! फिर नियमों से युक्त और योगनिद्रा देवी का यजन करने वाले दक्ष प्रजापति के समक्ष में चण्डिका देवी प्रत्यक्ष हुई थी। इसके अनन्तर प्रजापति दक्ष प्रत्यक्ष रूप से जगन्मयी विष्णुमाया का दर्शन प्राप्त करके अपने आपको कृतकृत्य अर्थात् पूर्णतया सफल मानने लगा था। अब भगवती के रूप का वर्णन किया जाता है कि वह देवी बालिका परम स्त्रिग्ध, कृष्ण वर्ण के संयुत, पीन ( स्थूल) और उन्नत स्तनों वाली थी। उसकी चार भुजायें थीं तथा परमाधिक सुन्दर उसका मुख था और नीलकमल को धारण करने वाली परमशुभ थी। वरदान तथा अभयदान देने वाली, हाथ में खंग धारण करती हुई सभी गुणों से समन्वित थी। उसके नयन थोड़ी क्षमता लिए हुए थे और सुन्दर और खुले हुए केशों वाली थीं एवं परम मनोहर थीं । प्रजापति दक्ष ने उनका दर्शन प्राप्त करके परम प्रीति से युक्त होकर विनम्रता से उस देवी की स्तुति की थी । दक्ष ने कहा-आनन्द के स्वरूप वाली और सम्पूर्ण जगत् को आनन्द करने वाली, सृष्टि पालन और संहार के स्वरूप से संयुत, परमशुभा भगवान् हरि की लक्ष्मी देवी का मैं स्तवन करता हूँ । हे महेश्वरि! सत्व गुण के उद्वेग के प्रकाश से जो उत्तम ज्योति का तत्व है जो स्वप्रकाश जगत् का धाम है, वह आपका ही अंश है। रजोगुण की अधिकता से जो काम का प्रकाशन है वह हे जगन्मयी! मध्य स्थित राग के स्वरूप वाला वह आपके ही अंश का अंश है । तमोगुण के अतिरेक जो मोह का प्रकाशन है जो कि चेतनों का आच्छादन करने वाला है वह भी आपके अंशांश को गोचर है। आप परा हैं और परास्वरूप वाली हैं, आप परमशुद्ध हैं, निर्मला हैं और लोकों को मोह करने वाली हैं । आप तीन रूपों वाली, त्रयी ( वेदत्रयी ), कीर्ति, वार्ता और इस जगत् की गति हैं। जिस निजोत्थ मूर्ति के द्वारा माधव धात्री का विभरण करते हैं वह आपकी ही मूर्ति है, जो समस्त जगतों के उपकार करने वाली है। आप महान् अनुभव वाली सूक्ष्मा और अपराजिता विश्व की शक्ति हैं जो ऊर्ध्व और अधो के विरोध के द्वारा पवनों से पर का व्यक्तिकरण किया जाता है वह ज्योति आपके मात्रार्थ के भावसम्मत सात्विक जिसका योगीजन बिना आलम्ब वाणी, निष्कल, परम निर्मल आलम्बन किया करते हैं वह तत्व आपके ही अनन्तर गोचर है। जो प्रसिद्धा, कूटस्था, अति प्रसिद्ध और निर्मला है। वह ज्ञाप्ति आपकी निष्पपञ्जना और प्रपचामी. प्रकाशिका है आप विद्या और आप अविद्या हैं आप आलम्बा हैं और बिना आश्रय वाली हैं। आप प्रपंच रूप से संयुत जगतों की आदिशक्ति हैं और आप ईश्वरी हैं । जो ब्रह्माजी के कण्ठ के आलय वाली और शुद्ध वाग्वाणी पायी जाती है वह वेदों के प्रकाशन में परायण तथा विश्व को प्रकाशित करने वाली आप ही हैं। आप अग्नि हैं तथा स्वाहा विश्व को प्रकाशित करने वाली आप ही हैं। आप अग्नि हैं तथा स्वाहा हैं । आप पितृगणों के साथ स्वधा हैं। आप नभ हैं और आप कालरूपा हैं आप दिशायें हैं और आप आकाश स्थिता हैं । आप चिन्तन करने के अयोग्या हैं, आप अव्यक्त हैं तथा आप आपका रूप अनिर्देश्य है आप ही कालरात्रि हैं और आप ही परमशान्त परा प्रकृति हैं। जिसका संसार और लोकों में परित्राण के लिए जो रूप गह्वर है वह आपको जानते हैं अन्यथा परा आपको कौन जानेंगे हे भगवती ! आप प्रसन्न होइए, हे अग्ने! हे योगरूपिणि! आप प्रसन्न होइए। हे घोररूपे! आप प्रसन्न होइए । हे जगन्मयि ! आपके लिए मेरा नमस्कार है । मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इस रीति से प्रयत आत्मा वाले दक्ष के द्वारा स्तुति की गई महामाया दक्ष से बोली, यद्यपि उस दक्ष के अभीष्ट को स्वयं जानती हुई भी थी तथापि देवी ने उससे पूछा था । भगवती ने कहा-हे दक्ष! आपके द्वारा अत्यधिक की गई इस मेरी भक्ति से मैं आपसे परम प्रसन्न हूँ। अब तुम वरदान का वरण कर लो जो भी आपका अभीप्सित हो वह मैं स्वयं ही तुझे दे दूंगी। हे प्रजापते! आपके नियम से, तपों से और आपकी स्तुतियों से मैं बहुत अधिक प्रसन्न हो गयी हूँ । आप वरदान का वरण करो मैं उसी वर को दे दूँगी। दक्ष ने कहा-हे जगन्मयि! हे महामाये! यदि आप मुझे वरदान देने वाली हैं तो आप ही स्वयं मेरी पुत्री होकर भगवान् शंकर की पत्नी बन जाइए । हे देवि! यह वर केवल मेरा ही नहीं है अपितु समस्त जगती का है । हे प्रजेश्वरि! यह वर लोकों के ईश ब्रह्माजी का है तथा भगवान् विष्णु का है और भगवान शिव का भी है । देवी ने कहा-हे प्रजापते! मैं आपकी पुत्री होकर आपकी जाया ( पत्नी) में जन्म धारण करने वाली होऊँगी तथा भगवान् शंकर की पत्नी हो जाऊँगी और इसमें विलम्ब नहीं होगा। जिस समय से आप फिर मेरे विषय में मन्द आदर वाले हो जाओगे तब मैं सुखिनी भी अथवा तुरन्त ही अपने देह का त्याग कर दूँगी । हे प्रजापते! यह वर प्रतिसर्ग में आपको दे दिया है कि मैं आपकी सुता होकर भगवान् हर की प्रिया होऊँगा। हे प्रजापते! मैं महादेव को उस प्रकार से सम्मोहित करूँगी कि वे प्रतिसर्ग में निराकुल मोह को समाप्त करेंगे। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इस प्रकार से प्रजापति दक्ष महामाया ने कहा और इसके उपरान्त वह देवी भली - भाँति दक्ष के देखते-देखते ही वहीं पर अन्तर्हित हो गई थीं उस महामाया के अन्तर्धान हो जाने पर प्रजापति दक्ष की अपने आश्रम को चले गए और उन्होंने परमआनन्द प्राप्त किया था कि महामाया उनकी पुत्री होकर जन्म धारण करेगी। इसके अनन्तर बिना ही स्त्री के संगम के उन्होंने प्रजा का उत्पादन किया था। संकल्प, अविर्भावों के द्वारा तथा मन से और चिन्तन के द्वारा ही प्रजोत्पादन किया था । हे द्विज श्रेष्ठों! वहाँ पर उनके बहुत से पुत्र समुत्पन्न हुए और वे सब देवर्षि नारदजी के उपदेश से इस पृथ्वी पर भ्रमण किया करते हैं । उनके बार-बार जो पुत्र उत्पन्न हुए थे वे सभी अपने भाइयों के ही मार्ग पर नारद जी के वचन से चले गये थे । हे द्विजोत्तमों! आप लोग सभी पृथ्वी मण्डल में सृष्टि के करने वाले हैं। यही देवर्षि नारद का वाक्य था जिसके द्वारा दक्ष के पुत्र प्रेरित किए गए थे । वे आज तक भी इस पृथ्वी पर भ्रमण करते हुए वहीं वापिस हुए हैं । इसके अनन्तर मैथुन से समुत्पन्न होने वाली प्रजा का सम्पादन करने के लिए प्रजापति दक्ष ने वीरण की पुत्री के साथ विवाह किया था जो कि परम सुन्दर कन्या थी। हे द्विजसत्तमो! उसका नाम वीरणी था और अस्किनी यह भी था। उसमें सब प्रजापति का प्रथम संकल्प हुआ । हे द्विजोत्तमो! उस समय में उसमें सद्योजाता महामाया हुई । उसके जन्म होते ही प्रजापति अत्यन्त प्रसन्न हुआ था। उसको तेज से उज्जवला देखकर उस समय में उसने ( दक्ष) यह वही है, ऐसा मान लिया था । जिस समय में वह समुत्पन्न हुई थी, पुष्पों की वर्षा आकाश से हुई थी और मेघों ने जल वृष्टि की थी। उस अवसर पर सभी दिशाऐं उसके जन्म धारण करने पर परम शान्त समुद्गत हो गयी थीं । आकाश में गमन करके देवगणों ने परमशुभ वाद्यों को बजाया था। हे नरोत्तमो ! उस सती के समुत्पन्न होने पर शान्त अग्नियाँ भी प्रज्ज्वलित हो गयी थीं। वीरणी के द्वारा लक्षित दक्ष प्रजापति ने उस जगदीश्वरी का दर्शन प्राप्त करके महामाया को परमार्थिक भक्ति की भावना से तोषित किया था । *🙏🌹जय भगवती जय महामाया🌹🙏*

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