Jagdish Kumar
Jagdish Kumar Aug 3, 2017

Jagdish Prasad ने यह पोस्ट की।

#वाहेगुरु

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बहुत ही सुंदर गुरबाणी शब्द किरपा करहु दीन के दाते मेरा गुणु अवगणु न बीचारहु कोई ॥ माटी का किआ धोपै सुआमी माणस की गति एही ॥१॥ पद्अर्थ: दीन = गरीब, कंगाल। दाते = हे दातें देने वाले! किआ धोपै = क्या धुल सकता है? (मिट्टी की मैल) कभी नहीं धुल सकती (मिट्टी को धोते जाईए और मिट्टी सामने आती जाएगी)। सुआमी = हे मालिक! गति = हालत, दशा।1। अर्थ: हे गरीबों पर बख्शिश करने वाले प्रभु! (मेरे पर) मेहर कर, मेरा कोई गुण ना विचारना, मेरा कोई अवगुण ना बिचारना (मेरे अंदर तो अवगुण ही अवगुण हैं)। (जैसे पानी से धोने पर) मिट्टी को धोया नहीं जा सकता, हे मालिक प्रभु! हम जीवों की भी यही हालत है।1। मेरे मन सतिगुरु सेवि सुखु होई ॥ जो इछहु सोई फलु पावहु फिरि दूखु न विआपै कोई ॥१॥ रहाउ॥ पद्अर्थ: मन = हे मन! सेवि = शरण पड़ा रह। इछहु = माँगेगा। न विआपे = जोर नहीं डाल सकता।1। रहाउ। अर्थ: हे मेरे मन! गुरु की शरण पड़ा रह (गुरु के दर पर रहने से ही) आनंद मिलता है। (गुरु के दर पर रह के) जो कामना (तू) करेगा, वही फल हासिल कर लेगा। (इस तरह) कोई भी दुख अपना प्रभाव नहीं डाल सकता।1। रहाउ। काचे भाडे साजि निवाजे अंतरि जोति समाई ॥ जैसा लिखतु लिखिआ धुरि करतै हम तैसी किरति कमाई ॥२॥ पद्अर्थ: काचे भांडे = नाशवान शरीर। साजि = बना के। निवाजे = बड़ाई महिमा दी है, बड़प्पन दिया हुआ है। समाई = टिकी हुई है। लिखतु = लेख। धुरि = धुर दरगाह से। करतै = कर्तार ने। किरति = कार।2। अर्थ: हे भाई! (हमारे यह) नाशवान शरीर बना के (परमात्मा ने ही इनको) बड़प्पन दिया हुआ है (क्योंकि इन नाशवान शरीरों के) अंदर उसकी ज्योति टिकी हुई है। हे भाई! (हमारे किए हुए कर्मों के अनुसार) कर्तार ने धुर-दरगाह से जैसे (संस्कारों के) लेख (हमारे अंदर) लिख दिए हैं, हम जीव (अब भी) वैसे ही कर्मों की कमाई किए जाते हैं।2। मनु तनु थापि कीआ सभु अपना एहो आवण जाणा ॥ जिनि दीआ सो चिति न आवै मोहि अंधु लपटाणा ॥३॥ पद्अर्थ: थापि कीआ = समझ लिया, मिथ लिया। एहो = यह मिथ ही, ये अपनत्व ही। जिनि = जिस (परमात्मा) ने। चिति = चिक्त में। मोह = (इस जीवात्मा और शरीर के) मोह में। मनु = जिंद, जीवात्मा। अंधु = अंधा मनुष्य।3। अर्थ: हे भाई! मनुष्य इस जीवात्मा को, इस शरीर को सदा अपना माने रहता है, यह अपनत्व ही (मनुष्य के लिए) जनम-मरण (के चक्कर का कारण बनी रहती) है। जिस परमात्मा ने ये प्राण (जीवात्मा) दिए हैं ये शरीर दिया है वह उसके चिक्त में (कभी) नहीं बसता, अंधा मनुष्य (जिंद और शरीर के) मोह में फसा रहता है।3। जिनि कीआ सोई प्रभु जाणै हरि का महलु अपारा ॥ भगति करी हरि के गुण गावा नानक दासु तुमारा ॥४॥१॥ पद्अर्थ: जिनि = जिस (प्रभु) ने। सेई = वह (प्रभु) ही। महलु = ठिकाना, ऊँचा आसन। अपारा = बेअंत, जिसका परला किनारा नहीं पाया जा सकता। करी = मैं करूँ। गावा = मैं गाता रहूँ।4। अर्थ: हे भाई! जिस परमात्मा ने (यह खेल) बनाया है वह (इसको चलाना) जानता है, उस परमात्मा का ठिकाना अगम्य (पहुँच से परे) है (जीव उस परमात्मा की रजा को मर्जी को समझ नहीं सकता)। हे नानक! (कह: हे प्रभु!) मैं तेरा दास हूँ (मेहर कर) मैं तेरी भक्ति करता रहूँ, मैं तेरे गुण गाता रहूँ।4।1।

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Parveen Sharma Nov 25, 2020

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Sharma Nov 25, 2020

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Sharma Nov 25, 2020

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Parveen Sharma Nov 25, 2020

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anoop 8655017727 Nov 26, 2020

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SATISH Nov 24, 2020

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kuldip dadwal Nov 24, 2020

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kuldip dadwal Nov 24, 2020

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