arunkumarsingh
arunkumarsingh Sep 8, 2020

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Sonam Gupta Sep 18, 2020

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🔥🔥🔥🌻🙏🏻 🔥विश्वा विश्वकर्मा प्रभु मेरा, हों प्रसन्न हम बालक तेरा तू सदा इष्टदेव हमारा सदा वशो प्रभु मन में हमारा 🔥 💙💙💙 🙏🏻🌻🔥🔥🔥 💙 विश्वकर्मा जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं 💙 💜 ओम श्री विश्वकर्माये नमः 💙💙💙 💜💜💜 जय श्री गणेश देवा ⚜ 💜 💝💝💝 💜💜💜 💝 ‼ 🏹 ‼ जय श्री राम ‼ 🏹 ‼ 💝 💝💝💝 ओम आधार शक्तपे नम:, ओम कूमयि नम:, ओम अनन्तम नम:, पृथिव्यै नम:। ❤ आपका दिन शुभ रहें ❤ ❤❤❤❤ ❤❤❤❤ ⚘...राम के नाम का रहस्य ...⚘🔥 🔥⚘... राम या मार :  राम का उल्टा होता है म, अ, र अर्थात मार। मार बौद्ध धर्म का शब्द है। मार का अर्थ है- इंद्रियों के सुख में ही रत रहने वाला और दूसरा आंधी या तूफान। राम को छोड़कर जो व्यक्ति अन्य विषयों में मन को रमाता है, मार उसे वैसे ही गिरा देती है, जैसे सूखे वृक्षों को आंधियां। 🔥⚘... तारणहार राम का नाम :  श्रीराम-श्रीराम जपते हुए असंख्य साधु-संत मुक्ति को प्राप्त हो गए हैं। प्रभु श्रीराम नाम के उच्चारण से जीवन में सकारात्क ऊर्जा का संचार होता है। जो लोग ध्वनि विज्ञान से परिचित हैं वे जानते हैं कि ‘राम’ शब्द की महिमा अपरम्पार है। जब हम ‘राम’ कहते हैं तो हवा या रेत पर एक विशेष आकृति का निर्माण होता है। उसी तरह चित्त में भी विशेष लय आने लगती है। जब व्यक्ति लगातार ‘राम’ जप करता रहता है तो रोम-रोम में प्रभु श्रीराम बस जाते हैं। उसके आसपास सुरक्षा का एक मंडल बनना तय समझो। प्रभु श्रीराम के नाम का असर जबरदस्त होता है। आपके सारे दुःख हरने वाला सिर्फ एकमात्र नाम है- ‘हे राम।’ व्यर्थ की चिंता छोड़ो : होइहै वही जो राम रचि राखा। को करे तरफ बढ़ाए साखा॥ ‘राम’ सिर्फ एक नाम नहीं हैं और न ही सिर्फ एक मानव। राम परम शक्ति हैं। प्रभु श्रीराम के द्रोहियों को शायद ही यह मालूम है कि वे अपने आसपास नर्क का निर्माण कर रहे हैं। इसीलिए यह चिंता छोड़ दो कि कौन प्रभु श्रीराम का अपमान करता है और कौन सुनता है। 🔥⚘... नीति-कुशल व न्यायप्रिय नरेश भगवान राम विषम परिस्थितियों में भी नीति सम्मत रहे। उन्होंने वेदों और मर्यादा का पालन करते हुए सुखी राज्य की स्थापना की। स्वयं की भावना व सुखों से समझौता कर न्याय और सत्य का साथ दिया। फिर चाहे राज्य त्यागने, बाली का वध करने, रावण का संहार करने या सीता को वन भेजने की बात ही क्यों न हो। 🔥⚘... सहनशील व धैर्यवान सहनशीलता व धैर्य भगवान राम का एक और गुण है। राम का संयमी होना माता कैकेयी की उस शर्त का अनुपालन था जिसमें उन्होंने राजा दशरत से मांग की थी- तापस बेष बिसेषि उदासी। चौदह बरिस रामु बनवासी॥ सीता हरण के बाद संयम से काम लेना समुद्र पर सेतु बनाने के लिए तपस्या करना, सीता को त्यागने के बाद राजा होते हुए भी संन्यासी की भांति जीवन बिताना उनकी सहनशीलता की पराकाष्ठा है। संयमित- यानि समय-यमय पर उठने वाली मानसिक उत्तेजनाओं जैसे- कामवासना, क्रोध, लोभ, अहंकार तथा मोह आदि पर नियंत्रण रखना। राम-सीता ने अपना संपूर्ण दाम्पत्य बहुत ही संयम और प्रेम से जीया। वे कहीं भी मानसिक या शारीरिक रूप से अनियंत्रित नहीं हुए। 🔥⚘... दयालु व बेहतर स्वामी भगवान राम ने दया कर सभी को अपनी छत्रछाया में लिया। उनकी सेना में पशु, मानव व दानव सभी थे और उन्होंने सभी को आगे बढ़ने का मौका दिया। सुग्रीव को राज्य, हनुमान, जाम्बवंत व नल-नील को भी उन्होंने समय-समय पर नेतृत्व करने का अधिकार दिया। 🔥⚘... मित्र केवट हो या सुग्रीव, निषादराज या विभीषण। हर जाति, हर वर्ग के मित्रों के साथ भगवान राम ने दिल से करीबी रिश्ता निभाया। दोस्तों के लिए भी उन्होंने स्वयं कई संकट झेले। बेहतर प्रबंधक भगवान राम न केवल कुशल प्रबंधक थे, बल्कि सभी को साथ लेकर चलने वाले थे। वे सभी को विकास का अवसर देते थे व उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग करते थे। उनके इसी गुण की वजह से लंका जाने के लिए उन्होंने व उनकी सेना ने पत्थरों का सेतु बना लिया था। 🔥⚘... भाई भगवान राम के तीन भाई लक्ष्मण, भरत व शत्रुघ्न सौतेली माँ के पुत्र थे, लेकिन उन्होंने सभी भाइयों के प्रति सगे भाई से बढ़कर त्याग और समर्पण का भाव रखा और स्नेह दिया। यही वजह थी कि भगवान राम के वनवास के समय लक्ष्मण उनके साथ वन गए और राम की अनुपस्थिति में राजपाट मिलने के बावजूद भरत ने भगवान राम के मूल्यों को ध्यान में रखकर सिंहासन पर रामजी की चरण पादुका रख जनता को न्याय दिलाया। 🔥⚘... संतान दाम्पत्य जीवन में संतान का भी बड़ा महत्वपूर्ण स्थान होता है। पति-पत्नी के  बीच के संबंधों को मधुर और मजबूत बनाने में बच्चों की अहम् भूमिका  रहती है। राम और सीता के बीच वनवास को खत्म करने और सीता को पवित्र साबित करने में उनके बच्चों लव और कुश ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। भरत के लिए आदर्श भाई, हनुमान के लिए स्वामी, प्रजा के लिए नीति-कुशल व न्यायप्रिय राजा, सुग्रीव व केवट के परम मित्र और सेना को साथ लेकर चलने वाले व्यक्तित्व के रूप में भगवान राम को पहचाना जाता है। उनके इन्हीं गुणों के कारण उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम राम के नाम से पूजा जाता है। सही भी है, किसी के गुण व कर्म ही उसकी पहचान बनाते हैं। 🔥⚘... नाम की महिमा:  सेतुबंध बनाया जा रहा था तब सभी को संशय था कि क्या पत्थर भी तैर सकते हैं। क्या तैरते हुए पत्थरों का बाँध बन सकता है तो इस संशय को मिटाने के लिए प्रत्येक पत्थर पर राम का नाम लिखा गया। हनुमान जी भी सोच में पड़ गए कि बिना सेतु के मैं लंका कैसे पहुँच सकता हूँ….लेकिन राम का नाम लेकर वे एक ही फलांग में पार कर गए समुद्र। भगवान राम के जन्म के पूर्व इस नाम का उपयोग ईश्वर के लिए होता था अर्थात ब्रह्म, परमेश्वर, ईश्वर आदि की जगह पहले ‘राम’ शब्द का उपयोग होता था, इसीलिए इस शब्द की महिमा और बढ़ जाती है तभी तो कहते हैं कि राम से भी बढ़कर श्रीराम का नाम है। राम’ शब्द की ध्वनि हमारे जीवन के सभी दुखों को मिटाने की ताकत रखती है। यह हम नहीं ध्वनि विज्ञान पर शोध करने वाले वैज्ञानिक बताते हैं कि राम नाम के उच्चारण से मन शांत हो जाता। कलयुग में यही सहारा: कहते हैं कि कलयुग में सब कुछ महँगा है, लेकिन राम का नाम ही सस्ता है। सस्ता ही नहीं सभी रोग और शोक की एक ही दवा है राम। वर्तमान में ध्यान, तप, साधना और अटूट भक्ति करने से भी श्रेष्ठ राम का नाम जपना है। भागमभाग जिंदगी, गलाकाट प्रतिस्पर्धा, धोखे पर धोखे, माया और मोह आदि सभी के बीच मानवता जब हताश और निराश होकर आत्महत्या करने लगती है तब सिर्फ राम नाम का सहारा ही उसे बचा सकता है। 🔥⚘... राम रहस्य:  प्रसिद्ध संत शिवानंद निरंतर राम का नाम जपते रहते थे। एक दिन वे जहाज पर यात्रा के दौरान रात में गहरी नींद में सो रहे थे। आधी रात को कुछ लोग उठने लगे और आपस में बात करने लगे कि ये राम नाम कौन जप रहा है। लोगों ने उस विराट, लेकिन शांतिमय आवाज की खोज की और खोजते-खोजते वे शिवानंद के पास पहुँच गए।सभी को यह जानकर बड़ा आश्चर्य हुआ की शिवानंद तो गहरी नींद में सो रहे है, लेकिन उनके भीतर से यह आवाज कैसे निकल रही है। उन्होंने शिवानंद को झकझोर कर उठाया तभी अचानक आवाज बंद हो गई। लोगों ने शिवानंद को कहा आपके भीतर से राम नाम की आवाज निकल रही थी इसका राज क्या है। उन्होंने कहा मैं भी उस आवाज को सुनता रहता हूँ। पहले तो जपना पड़ता था राम का नाम अब नहीं। बोलो श्रीराम। कहते हैं जो जपता है राम का नाम राम जपते हैं उसका नाम।–शतायु _ ( क्रमश ) _

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भगवान् राम का वनवास सिर्फ चौदह वर्ष ही क्यों‌? माता कैकयी ने महाराज दशरथ से भरत जी को राजगद्दी और श्री राम को चौदह वर्ष का वनवास माँगा, हो सकता हैं की बहुत से विद्वानों के लिए ये साधारण सा प्रश्न हो ,लेकिन जब भी ये प्रश्न मस्तिष्क में आता हैं संतोषजनक उत्तर प्राप्त करने के लिए मन बेचैन हो जाता हैं। प्रश्न ये हैं की श्री राम को आखिर चौदहवर्ष का ही वनवास क्यों ? क्यों नहीं चौदह से कम या चौदह से ज्यादा ? भगवान् राम ने एक आदर्श पुत्र, भाई, शिष्य, पति,मित्र और गुरु बन कर ये ही दर्शाया की व्यक्ति को रिश्तो का निर्वाह किस प्रकार करना चाहिए। राम का दर्शन करने पर हम पाते है कि अयोध्या हमारा शरीर है जो की सरयू नदी यानि हमारे *मन* के पास है। अयोध्या का एक नाम अवध भी है। (अ वध) अर्थात जहाँ कोई या अपराध न हों। जब *इस शरीर का चंचल मन सरयू सा शांत हो जाता है और इससे कोई अपराध नहीं होता तो ये शरीर ही अयोध्या कहलाता है।* शरीर का तत्व (जीव), इस अयोध्या का राजा दशरथ है। *दशरथ का अर्थ हुआ वो व्यक्ति जो इस शरीर रूपी रथ में जुटे हुए दसों इन्द्रिय रूपी घोड़ों (५ कर्मेन्द्रिय ५ ज्ञानेन्द्रिय) को अपने वश में रख सके।* *तीन गुण सतगुण, रजोगुण और तमोगुण दशरथ तीन रानियाँ कौशल्या, सुमित्रा और कैकई है।* *दशरथ रूपी साधक ने अपने जीवन में चारों पुरुषार्थों धर्म, अर्थ काम और मोक्ष को राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के रूपमें प्राप्त किया था।* तत्वदर्शन करने पर हम पाते है कि धर्मस्वरूप भगवान् राम स्वयं *ब्रह्म* है।शेषनाग भगवान् लक्ष्मण *वैराग्य* है, माँ सीता शांति और *भक्ति* है और बुद्धि का *ज्ञान* हनुमान जी है। *रावण घमंड का, कुभंकर्ण अहंकार, मारीच लालच और मेंघनाद काम का प्रतीक है. मंथरा कुटिलता, शूर्पनखा काम और ताडका क्रोध है।* चूँकि काम क्रोध कुटिलता ने संसार को वश में कर रखा है इसलिए प्रभु राम ने सबसे पहले क्रोध यानि ताडका का वध ठीक वैसे ही किया जैसे भगवान् कृष्ण ने पूतना का किया था। *नाक और कान वासना के उपादान माने गए है, इसलिए प्रभु ने शुपर्नखा के नाक और कान काटे। भगवान् ने अपनी प्राप्ति का मार्ग स्पष्ट रूप से दर्शाया है। उपरोक्त भाव से अगर हम देखे तो पाएंगे कि भगवान् सबसे पहले वैराग्य (लक्ष्मण)को मिले थे।* *फिर वो भक्ति (माँ सीता) और सबसे बाद में ज्ञान (भक्त शिरोमणि हनुमानजी) के द्वारा हासिल किये गए थे। जब भक्ति (माँ सीता) ने लालच (मारीच) के छलावे में आ कर वैराग्य (लक्ष्मण) को अपने से दूर किया तो घमंड (रावण) ने आ कर भक्ति की शांति (माँ सीता की छाया) हर ली और उसे ब्रम्हा (भगवान्) से दूर कर दिया।* *भगवान् ने चौदह वर्ष के वनवास के द्वारा ये समझाया कि अगर व्यक्ति जवानी में चौदह पांच ज्ञानेन्द्रियाँ (कान, नाक, आँख, जीभ, चमड़ी), पांच कर्मेन्द्रियाँ (वाक्, पाणी, पाद, पायु, उपस्थ), तथा मन, बुद्धि,चित और अहंकार को वनवासमें रखेगा तभी प्रत्येक मनुष्य अपने अन्दर के घमंड या रावण को मार पायेगा।* रावण की अवस्था में 14 ही वर्ष शेष थे,,प्रश्न उठता है ये बात कैकयी कैसे जानती थी,,,बन्धुओं ये घटना घट तो रही है अयोध्या परन्तु योजना देवलोक की है,, अजसु पिटारी तासु सिर, गई गिरा मति फेरि। सरस्वती ने मन्थरा की मति में अपनी योजना की कैसेट फिट कर दी,,उसने कैकयी को वही सब सुनाया समझाया कहने को उकसाया जो सरस्वती को इष्ट था,, , इसके सूत्रधार हैं स्वयं श्रीराम,,वे ही निर्माता निर्देशक तथा अभिनेता हैं,,सूत्रधार उर अन्तरयामी,,,। *मेघनाद को वही मार सकता था जो 14 वर्ष की कठोर साधना सम्पन्न कर सके, जो निद्रा को जीत ले, ब्रह्मचर्य का पालन कर सके, यह कार्य लक्ष्मण द्वारा सम्पन्न हुआ, आप कहेंगे वरदान में लक्ष्मण थे ही नहीं तो इनकी चर्चा क्यों ?* परन्तु भाई राम के बिना लक्ष्मण रह ही नहींसकते,श्रीराम का यश यदि झंडा है तो लक्ष्मण उस झंडा के डंडा हैं,,बिना डंडा के झंडा ,,,,, 1. माता कैकयी यथार्थ जानती है,,जो नारी युद्ध भूमि में दशरथ के प्राण बचाने के लिये अपना हाथ रथ के धुरे में लगा सकती है,रथ संचालन की कला मे दक्ष है,,वह राजनैतिक परिस्थितियों से अनजान कैसे रह सकती है। 2. मेरे राम का पावन यश चौदहों भुवनों में फैलजाये,,और यह विना तप के रावण वध के सम्भव न था अतः... 3. मेरे राम केवल अयोध्या के ही सम्राट् न रह जाये विश्व के समस्त प्राणियों हृहयों के सम्राट बनें, उसके लिये अपनी साधित शोधित इन्द्रियों तथा अन्तःकरण को पुनश्च तप के द्वारा तदर्थ सिद्ध करें। 4. सारी योजना का केन्द्र राक्षस वध है अतः दण्डकारण्य को ही केन्द्र बनाया गया. महाराज अनरण्यक के उस शाप का समय पूर्ण होने में 14 ही वर्ष शेष हैं जो शाप उन्होंने रावण को दिया था कि मेरे वंश का राजकुमार तेरा वध करेगा,, *जय सियाराम* 🙏🏼🙏🏼

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ASHOK PUROHIT Sep 17, 2020

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Ishrosh Sep 18, 2020

सूने सीता कथा - अत्यधिक मार्मिक औऱ सीता के मन की बात जो श्रीमद्बाल्मीकी रामायण के प्रसंगों पर ही आधारित है, सीता की कहानी (मन की बात) आम सुनने को नहीं मिलती है ! यह कथा podcast के द्वारा ही प्रस्तुत की गई है, podcast का फायदा ये रहता है की आप अपने जरूरी काम भी करते रहे औऱ सुनते भी रहें ! बस आप को नीचे दिया गया लिंक दबाना है ! अगर लिंक काम नहीं करता है आप के मोबाइल मे तो फिर आप App Spitify Install करें जोकि एक अमेरिकन App है ! इस App मे जा कर हमारे podcast channel पर जाएँ जिसका नाम है "ISHROSH", औऱ सूने सीता की कहानी के साथ साथ कुछ अन्य podcast bhi. https://open.spotify.com/show/7drKwHbPqm1qgDZvmnbhIY?si=dE-3SyKoQNGu1qUGP-1IGQ Note: Podcast एक तरह का रेडियो होता है, आप सब से मेरी विनम्र प्रार्थना है कि हमारी इस पोस्ट को शेयर भी करें, उनसे तो जरूर करें जो रामायण मे रूचि रखते है क्योंकि यह प्रसंग दुर्लभ हैँ जो आम सुनने को नहीं मिलते! जय श्री राम... राम भक्त नन्द कुमार...

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Sudhirkumar Sudhansu Sep 17, 2020

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Ganesh jangid Sep 17, 2020

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Ganesh jangid Sep 17, 2020

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