Garima Gahlot Rajput
Garima Gahlot Rajput Jan 23, 2021

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Garima Gahlot Rajput Feb 27, 2021

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*गाली देकर कर्म काट रही है* 🔸🔸🔹🔸🔹🔸🔹🔸🔸 एक राजा बड़ा धर्मात्मा, न्यायकारी और परमेश्वर का भक्त था। उसने ठाकुरजी का मंदिर बनवाया और एक ब्राह्मण को उसका पुजारी नियुक्त किया। वह ब्राह्मण बड़ा सदाचारी, धर्मात्मा और संतोषी था। वह राजा से कभी कोई याचना नहीं करता था, राजा भी उसके स्वभाव पर बहुत प्रसन्न था। उसे राजा के मंदिर में पूजा करते हुए बीस वर्ष गुजर गये। उसने कभी भी राजा से किसी प्रकार का कोई प्रश्न नहीं किया। राजा के यहाँ एक लड़का पैदा हुआ। राजा ने उसे पढ़ा लिखाकर विद्वान बनाया और बड़ा होने पर उसकी शादी एक सुंदर राजकन्या के साथ करा दी। शादी करके जिस दिन राजकन्या को अपने राजमहल में लाये उस रात्रि में राजकुमारी को नींद न आयी। वह इधर-उधर घूमने लगी जब अपने पति के पलंग के पास आयी तो क्या देखती है कि हीरे जवाहरात जड़ित मूठेवाली एक तलवार पड़ी है। जब उस राजकन्या ने देखने के लिए वह तलवार म्यान में से बाहर निकाली, तब तीक्ष्ण धारवाली और बिजली के समान प्रकाशवाली तलवार देखकर वह डर गयी व डर के मारे उसके हाथ से तलवार गिर पड़ी और राजकुमार की गर्दन पर जा लगी। राजकुमार का सिर कट गया और वह मर गया। राजकन्या पति के मरने का बहुत शोक करने लगी। उसने परमेश्वर से प्रार्थना की कि 'हे प्रभु ! मुझसे अचानक यह पाप कैसे हो गया? पति की मृत्यु मेरे ही हाथों हो गयी। आप तो जानते ही हैं, परंतु सभा में मैं सत्य न कहूँगी क्योंकि इससे मेरे माता-पिता और सास-ससुर को कलंक लगेगा तथा इस बात पर कोई विश्वास भी न करेगा।' प्रातःकाल में जब पुजारी कुएँ पर स्नान करने आया तो राजकन्या ने उसको देखकर विलाप करना शुरु किया और इस प्रकार कहने लगीः "मेरे पति को कोई मार गया।" लोग इकट्ठे हो गये और राजा साहब आकर पूछने लगेः "किसने मारा है?" वह कहने लगीः "मैं जानती तो नहीं कि कौन था। परंतु उसे ठाकुरजी के मंदिर में जाते देखा था" राजा समेत सब लोग ठाकुरजी के मंदिर में आये तो ब्राह्मण को पूजा करते हुए देखा। उन्होंने उसको पकड़ लिया और पूछाः "तूने राजकुमार को क्यों मारा?" ब्राह्मण ने कहाः "मैंने राजकुमार को नहीं मारा। मैंने तो उनका राजमहल भी नहीं देखा है। इसमें ईश्वर साक्षी हैं। बिना देखे किसी पर अपराध का दोष लगाना ठीक नहीं।" ब्राह्मण की तो कोई बात ही नहीं सुनता था। कोई कुछ कहता था तो कोई कुछ.... राजा के दिल में बार-बार विचार आता था कि यह ब्राह्मण निर्दोष है परंतु बहुतों के कहने पर राजा ने ब्राह्मण से कहाः "मैं तुम्हें प्राणदण्ड तो नहीं देता लेकिन जिस हाथ से तुमने मेरे पुत्र को तलवार से मारा है, तेरा वह हाथ काटने का आदेश देता हूँ।" ऐसा कहकर राजा ने उसका हाथ कटवा दिया। इस पर ब्राह्मण बड़ा दुःखी हुआ और राजा को अधर्मी जान उस देश को छोड़कर विदेश में चला गया। वहाँ वह खोज करने लगा कि कोई विद्वान ज्योतिषी मिले तो बिना किसी अपराध हाथ कटने का कारण उससे पूछूँ। किसी ने उसे बताया कि काशी में एक विद्वान ज्योतिषी रहते हैं। तब वह उनके घर पर पहुँचा। ज्योतिषी कहीं बाहर गये थे, उसने उनकी धर्मपत्नी से पूछाः "माताजी ! आपके पति ज्योतिषी जी महाराज कहाँ गये हैं?" तब उस स्त्री ने अपने मुख से अयोग्य, असह्य दुर्वचन कहे, जिनको सुनकर वह ब्राह्मण हैरान हुआ और मन ही मन कहने लगा कि "मैं तो अपना हाथ कटने का कारण पूछने आया था, परंतु अब इनका ही हाल पहले पूछूँगा।" इतने में ज्योतिषी आ गये। घर में प्रवेश करते ही ब्राह्मणी ने अनेक दुर्वचन कहकर उनका तिरस्कार किया। परंतु ज्योतिषी जी चुप रहे और अपनी स्त्री को कुछ भी नहीं कहा। तदनंतर वे अपनी गद्दी पर आ बैठे। ब्राह्मण को देखकर ज्योतिषी ने उनसे कहाः "कहिये, ब्राह्मण देवता ! कैसे आना हुआ?" "आया तो था अपने बारे में पूछने के लिए परंतु पहले आप अपना हाल बताइये कि आपकी पत्नी अपनी जुबान से आपका इतना तिरस्कार क्यों करती है? जो किसी से भी नहीं सहा जाता और आप सहन कर लेते हैं, इसका कारण है?" "यह मेरी स्त्री नहीं, मेरा कर्म है। दुनिया में जिसको भी देखते हो अर्थात् भाई, पुत्र, शिष्य, पिता, गुरु, सम्बंधी - जो कुछ भी है, सब अपना कर्म ही है। यह स्त्री नहीं, मेरा किया हुआ कर्म ही है और यह भोगे बिना कटेगा नहीं। अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्। नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतेरपि॥ 'अपना किया हुआ जो भी कुछ शुभ-अशुभ कर्म है, वह अवश्य ही भोगना पड़ता है। बिना भोगे तो सैंकड़ों-करोड़ों कल्पों के गुजरने पर भी कर्म नहीं टल सकता।' इसलिए मैं अपने कर्म खुशी से भोग रहा हूँ और अपनी स्त्री की ताड़ना भी नहीं करता, ताकि आगे इस कर्म का फल न भोगना पड़े।" "महाराज ! आपने क्या कर्म किया था?" "सुनिये, पूर्वजन्म में मैं कौआ था और मेरी स्त्री गधी थी। इसकी पीठ पर फोड़ा था, फोड़े की पीड़ा से यह बड़ी दुःखी थी और कमजोर भी हो गयी थी। मेरा स्वभाव बड़ा दुष्ट था, इसलिए मैं इसके फोड़े में चोंच मारकर इसे ज्यादा दुःखी करता था। जब दर्द के कारण यह कूदती थी तो इसकी फजीहत देखकर मैं खुश होता था। मेरे डर के कारण यह सहसा बाहर नहीं निकलती थी किंतु मैं इसको ढूँढता फिरता था। यह जहाँ मिले वहीं इसे दुःखी करता था। आखिर मेरे द्वारा बहुत सताये जाने पर त्रस्त होकर यह गाँव से दस-बारह मील दूर जंगल में चली गयी। वहाँ गंगा जी के किनारे सघन वन में हरा-हरा घास खाकर और मेरी चोटों से बचकर सुखपूर्वक रहने लगी। लेकिन मैं इसके बिना नहीं रह सकता था। इसको ढूँढते-ढूँढते मैं उसी वन में जा पहुँचा और वहाँ इसे देखते ही मैं इसकी पीठ पर जोर-से चोंच मारी तो मेरी चोंच इसकी हड्डी में चुभ गयी। इस पर इसने अनेक प्रयास किये, फिर भी चोंच न छूटी। मैंने भी चोंच निकालने का बड़ा प्रयत्न किया मगर न निकली। 'पानी के भय से ही यह दुष्ट मुझे छोड़ेगा।' ऐसा सोचकर यह गंगाजी में प्रवेश कर गयी परंतु वहाँ भी मैं अपनी चोंच निकाल न पाया। आखिर में यह बड़े प्रवाह में प्रवेश कर गयी। गंगा का प्रवाह तेज होने के कारण हम दोनों बह गये और बीच में ही मर गये। तब गंगा जी के प्रभाव से यह तो ब्राह्मणी बनी और मैं बड़ा भारी ज्योतिषी बना। अब वही मेरी स्त्री हुई। जो मेरे मरणपर्यन्त अपने मुख से गाली निकालकर मुझे दुःख देगी और मैं भी अपने पूर्वकर्मों का फल समझकर सहन करता रहूँगा, इसका दोष नहीं मानूँगा क्योंकि यह किये हुए कर्मों का ही फल है। इसलिए मैं शांत रहता हूँ। अब अपना प्रश्न पूछो।" ब्राह्मण ने अपना सब समाचार सुनाया और पूछाः "अधर्मी पापी राजा ने मुझ निरपराध का हाथ क्यों कटवाया?" ज्योतिषीः "राजा ने आपका हाथ नहीं कटवाया, आपके कर्म ने ही आपका हाथ कटवाया है।" "किस प्रकार?" "पूर्वजन्म में आप एक तपस्वी थे और राजकन्या गौ थी तथा राजकुमार कसाई था। वह कसाई जब गौ को मारने लगा, तब गौ बेचारी जान बचाकर आपके सामने से जंगल में भाग गयी। पीछे से कसाई आया और आप से पूछा कि "इधर कोई गाय तो नहीं गया है?" आपने प्रण कर रखा था कि 'झूठ नहीं बोलूँगा।' अतः जिस तरफ गौ गयी थी, उस तरफ आपने हाथ से इशारा किया तो उस कसाई ने जाकर गौ को मार डाला। गंगा के किनारे वह उसकी चमड़ी निकाल रहा था, इतने में ही उस जंगल से शेर आया और गौ एवं कसाई दोनों को खाकर गंगाजी के किनारे ही उनकी हड्डियाँ उसमें बह गयीं। गंगाजी के प्रताप से कसाई को राजकुमार और गौ को राजकन्या का जन्म मिला एवं पूर्वजन्म के किये हुए उस कर्म ने एक रात्रि के लिए उन दोनों को इकट्ठा किया। क्योंकि कसाई ने गौ को हंसिये से मारा था, इसी कारण राजकन्या के हाथों अनायास ही तलवार गिरने से राजकुमार का सिर कट गया और वह मर गया। इस तरह अपना फल देकर कर्म निवृत्त हो गया। तुमने जो हाथ का इशारा रूप कर्म किया था, उस पापकर्म ने तुम्हारा हाथ कटवा दिया है। इसमें तुम्हारा ही दोष है किसी अन्य का नहीं, ऐसा निश्चय कर सुखपूर्वक रहो।" कितना सहज है ज्ञानसंयुक्त जीवन ! यदि हम इस कर्मसिद्धान्त को मान लें और जान लें तो पूर्वकृत घोर से घोर कर्म का फल भोगते हुए भी हम दुःखी नहीं होंगे बल्कि अपने चित्त की समता बनाये रखने में सफल होंगे। भगवान श्रीकृष्ण इस समत्व के अभ्यास को ही 'समत्व योग' संबोधित करते हैं, जिसमें दृढ़ स्थिति प्राप्त होने पर मनुष्य कर्मबंधन से मुक्त हो जाता है। 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸

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*यदि स्वयं सुख चाहते हो तो दूसरों को दुख मत दो. क्योंकि दूसरों को दुख दोंगे तो कई गुना लौट कर आएगा. आज नहीं तो कल. यह प्रकृति का सनातन नियम है.* ---------------------------------------------- महाकारुणिक बुद्ध कहते हैं, 'इस जगत में सभी प्राणी सुख से जीना चाहते हैं. सभी दुखों से मुक्ति चाहते हैं. सभी को अपनी जान प्यारी है इसलिए दूसरों को मन, वाणी व शरीर से दुख मत दो. दिलों को चोट मत पहुंचाओ और न ही दुख देने के लिए किसी को प्रेरित करो. यही सबसे बड़ा धम्म है. यही सच्ची मानवता है.' तथागत बुद्ध इस बात पर जोर देते हैं कि यदि तुम स्वयं सुख शांति चाहते हो, स्वयं का भला चाहते हो तो दूसरों का बुरा मत करो, दूसरों को दुख मत दो, दूसरों को मत सताओ. इसका फल इसी जीवन में आज नहीं तो कल, जरूर मिलता है. यह सनातन नियम है, सदियों से चला आ रहा प्रकृति का नियम है. एस धम्मो सनंतनो. मनुष्य, पशु पक्षी तो क्या वृक्ष भी सुख की कामना करता है. वह भी चोट, भूख व प्यास के मारे तड़पता है, कुम्हलाता है इसलिए उसे भी पीड़ा मत पहुंचाओ, वह भी सुख की वर्षा होने पर लहलहाता है. फूलों की खुशबू से प्रकृति को सरोबार करता है. सतरंगी रंगों से उल्लास व आनंद बिखेरता है. इसलिए किसी भी प्राणी या वनस्पति को चोट मत पहुंचाओ, दुख मत दो. और यदि किसी को दुख दोगे तो दुख तुम्ही पर वापस आएगा, वह भी बढ़कर और तुम सुख की नींद नहीं सो पाओंगे. भगवान बुद्ध कहते है, सुख से रहना प्रकृति के सभी जीवों का स्वभाव है दुख तो मनुष्य पहुंचाता है इसलिए दूसरों को अपनी तरह समझो. जो तुम खुद के लिए नहीं चाहते हो, वह दूसरों के लिए मत करो. यही प्रेम है. तुम दूसरों को सुख देने की बात छोड़ो. बस, इतनी मेहरबानी कर लो कि दूसरों को दुख मत दो. दूसरों की राह में कांटे मत बिछाओ क्योंकि फूल तो अपने आप खिल जाएंगे, खिलना तो उनका स्वभाव है. सुख भी मनुष्य का स्वभाव है इसलिए तुम किसी के सुख की राह में रोड़ा मत बनो. उसको आर्थिक, सामाजिक, वैचारिक व शारीरिक दुख मत दो.किसी को भोजन भले ही मत खिलाओ लेकिन उसके मुंह से निवाला तो मत छीनो, शोषण की पीड़ा की गहरी चोट मत पहुंचाओ. किसी के आंसू नहीं पोंछ सकते हो तो कोई बात नहीं, रुलाओ तो मत. यदि तुमने किसी को दुख नहीं दिया तो उसके जीवन में आनंद की रसधारा जरूर बहेगी. पद, पैसा व प्रतिष्ठा पाने के स्वार्थ व स्वयं के सुख के लिए दूसरों की छाती पर चढ़ कर आगे मत बढ़ो, दूसरों का सुख मत छिनो. अपने अहंकार में किसी को चोट मत पहुंचाओ, शोषण मत करो, बुरा मत करो, दुख मत दो, किसी प्राणी को मत सताओ क्योंकि तुम्हारी तरह सभी सुख शांति से जीना चाहते हैं. सब्बे तसन्नति दण्डस्स सब्बेस जीवितं पियं। अत्तानं उपमं कत्वा न हनेय्य न घातये।।....धम्मपद *सबका मंगल हो..सभी प्राणी सुखी हो.* जय श्री कृष्णा जय जगन्नाथ..🙏

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०००००००००००००००००००००००००० ०००००००००००००००००००००००००० 🚩🌵श्री गणेशाय नम:🌵🚩 🍓🌵 दैनिक पंचांग 🌵🍓 ********************************* 🍓 01 - 03 - 2021 🌵 श्रीमाधोपुर-पंचांग 🍓 तिथि : द्वितीया 08:37:33 तृतीया 29:48:15 🌵 नक्षत्र : उत्तरा फाल्गुनी 07:37:30 हस्त 29:32:26 🍓 करण : गर 08:37:33 वणिज 19:13:06 🌵 पक्ष कृष्ण 🍓 योग शूल 12:54:34 🌵 वार सोमवार 🍓 सूर्य व चन्द्र से संबंधित गणनाएँ 🌵 सूर्योदय 06:52:38 🍓 चन्द्रोदय 20:42:59 🌵 चन्द्र राशि कन्या 🍓 सूर्यास्त 18:27:58 🌵 चन्द्रास्त 08:20:00 🍓 ऋतु वसंत 🌵 हिन्दू मास एवं वर्ष 🍓 शक सम्वत 1942 शार्वरी 🌵 कलि सम्वत 5122 🍓 दिन काल 11:35:20 🌵 विक्रम सम्वत 2077 🍓 मास अमांत माघ 🌵 मास पूर्णिमांत फाल्गुन 🍓 शुभ और अशुभ समय 🌵 शुभ समय 🍓 अभिजित 12:17:07 - 13:03:29 🌵 अशुभ समय 🍓 दुष्टमुहूर्त : 13:03:29 - 13:49:50 15:22:33 - 16:08:54 🌵 कंटक 09:11:42 - 09:58:03 🍓 यमघण्ट 12:17:07 - 13:03:29 🌵 राहु काल 08:19:33 - 09:46:28 🍓 कुलिक 15:22:33 - 16:08:54 🌵 कालवेला या अर्द्धयाम 10:44:24 - 11:30:46 🍓 यमगण्ड 11:13:23 - 12:40:18 🌵 गुलिक काल 14:07:13 - 15:34:08 🍓 दिशा शूल 🌵 दिशा शूल पूर्व =÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷ 🛑🔷 चौघड़िया मुहुर्त 🔷🛑 =×=×=×=×=×=×=×=×=×=×=×=×= 🛑अमृत 06:52:38 - 08:19:33 🔷काल 08:19:33 - 09:46:28 🛑शुभ 09:46:28 - 11:13:23 🔷रोग 11:13:23 - 12:40:18 🛑उद्वेग 12:40:18 - 14:07:13 🔷चल 14:07:13 - 15:34:08 🛑लाभ 15:34:08 - 17:01:03 🔷अमृत 17:01:03 - 18:27:59 🛑चल 18:27:58 - 20:00:56 🔷रोग 20:00:56 - 21:33:53 🛑काल 21:33:53 - 23:06:51 🔷लाभ 23:06:51 - 24:39:48 🛑उद्वेग 24:39:48 - 26:12:45 🔷शुभ 26:12:45 - 27:45:43 🛑अमृत 27:45:43 - 29:18:40 🔷चल 29:18:40 - 30:51:38 •••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• 🏀🌐लग्न-तालिका🌐🏀 •••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• सूर्योदय का समय: 06:52:38 सूर्योदय के समय लग्न कुम्भ स्थिर 315°43′52″ 🏀 कुम्भ स्थिर शुरू: 06:04 AM समाप्त: 07:38 AM 🌐 मीन द्विस्वाभाव शुरू: 07:38 AM समाप्त: 09:00 AM 🏀 मेष चर शुरू: 09:00 AM समाप्त: 10:36 AM 🌐 वृषभ स्थिर शुरू: 10:36 AM समाप्त: 12:33 PM 🏀 मिथुन द्विस्वाभाव शुरू: 12:33 PM समाप्त: 02:47 PM 🌐 कर्क चर शुरू: 02:47 PM समाप्त: 05:07 PM 🏀 सिंह स्थिर शुरू: 05:07 PM समाप्त: 07:24 PM 🌐 कन्या द्विस्वाभाव शुरू: 07:24 PM समाप्त: 09:39 PM 🏀 तुला चर शुरू: 09:39 PM समाप्त: 11:58 PM 🌐 वृश्चिक स्थिर शुरू: 11:58 PM समाप्त: अगले दिन 02:16 AM 🏀 धनु द्विस्वाभाव शुरू: अगले दिन 02:16 AM समाप्त: अगले दिन 04:21 AM 🌐 मकर चर शुरू: अगले दिन 04:21 AM समाप्त: अगले दिन 06:04 AM [©][©][©][©][©][©][©][©][©][©][©] 0️⃣1️⃣🌸0️⃣3️⃣🌸2️⃣0️⃣2️⃣1️⃣ [®][®][®][®][®][®][®][®][®][®][®] 🍓🌷जयश्रीकृष्णा🌷🍓 [%][%][%][%][%][%][%][%][%][%][%][%] ज्योतिषशास्त्री-सुरेन्द्र कुमार चेजारा व्याख्याता राउमावि होल्याकाबास निवास-श्रीमाधोपुर [$][$][$][$][$][$][$][$][$][$][$][$][$] 🚧🔷🚧🔷🚧🔷🚧🔷🚧🔷

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Guria Thakur Mar 1, 2021

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Soni Mishra Mar 1, 2021

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Soni Mishra Mar 1, 2021

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