Ashwini Srinivas
Ashwini Srinivas Aug 20, 2017

सबसे बड़ा पुण्य, रोचक ज्ञानवर्धक कथा।

सबसे बड़ा पुण्य, रोचक ज्ञानवर्धक कथा।

एक राजा बहुत बड़ा प्रजापालक था, हमेशा प्रजा के हित में प्रयत्नशील रहता था. वह इतना कर्मठ था कि अपना सुख, ऐशो-आराम सब छोड़कर सारा समय जन-कल्याण में ही लगा देता था . यहाँ तक कि जो मोक्ष का साधन है अर्थात भगवत-भजन, उसके लिए भी वह समय नहीं निकाल पाता था.

एक सुबह राजा वन की तरफ भ्रमण करने के लिए जा रहा था कि उसे एक देव के दर्शन हुए. राजा ने देव को प्रणाम करते हुए उनका अभिनन्दन किया और देव के हाथों में एक लम्बी-चौड़ी पुस्तक देखकर उनसे पूछा- ” महाराज, आपके हाथ में यह क्या है?”

देव बोले- “राजन! यह हमारा बहीखाता है, जिसमे सभी भजन करने वालों के नाम हैं.”

राजा ने निराशायुक्त भाव से कहा- “कृपया देखिये तो इस किताब में कहीं मेरा नाम भी है या नहीं?”

देव महाराज किताब का एक-एक पृष्ठ उलटने लगे, परन्तु राजा का नाम कहीं भी नजर नहीं आया.

राजा ने देव को चिंतित देखकर कहा- “महाराज ! आप चिंतित ना हों , आपके ढूंढने में कोई भी कमी नहीं है. वास्तव में ये मेरा दुर्भाग्य है कि मैं भजन-कीर्तन के लिए समय नहीं निकाल पाता, और इसीलिए मेरा नाम यहाँ नहीं है.”

उस दिन राजा के मन में आत्म-ग्लानि-सी उत्पन्न हुई लेकिन इसके बावजूद उन्होंने इसे नजर-अंदाज कर दिया और पुनः परोपकार की भावना लिए दूसरों की सेवा करने में लग गए.

कुछ दिन बाद राजा फिर सुबह वन की तरफ टहलने के लिए निकले तो उन्हें वही देव महाराज के दर्शन हुए, इस बार भी उनके हाथ में एक पुस्तक थी. इस पुस्तक के रंग और आकार में बहुत भेद था, और यह पहली वाली से काफी छोटी भी थी.

राजा ने फिर उन्हें प्रणाम करते हुए पूछा- “महाराज ! आज कौन सा बहीखाता आपने हाथों में लिया हुआ है?”

देव ने कहा- “राजन! आज के बहीखाते में उन लोगों का नाम लिखा है जो ईश्वर को सबसे अधिक प्रिय हैं !”

राजा ने कहा- “कितने भाग्यशाली होंगे वे लोग ? निश्चित ही वे दिन रात भगवत-भजन में लीन रहते होंगे !! क्या इस पुस्तक में कोई मेरे राज्य का भी नागरिक है ? ”

देव महाराज ने बहीखाता खोला , और ये क्या , पहले पन्ने पर पहला नाम राजा का ही था।

राजा ने आश्चर्यचकित होकर पूछा- “महाराज, मेरा नाम इसमें कैसे लिखा हुआ है, मैं तो मंदिर भी कभी-कभार ही जाता हूँ ?

देव ने कहा- “राजन! इसमें आश्चर्य की क्या बात है? जो लोग निष्काम होकर संसार की सेवा करते हैं, जो लोग संसार के उपकार में अपना जीवन अर्पण करते हैं. जो लोग मुक्ति का लोभ भी त्यागकर प्रभु के निर्बल संतानो की सेवा-सहायता में अपना योगदान देते हैं उन त्यागी महापुरुषों का भजन स्वयं ईश्वर करता है. ऐ राजन! तू मत पछता कि तू पूजा-पाठ नहीं करता, लोगों की सेवा कर तू असल में भगवान की ही पूजा करता है. परोपकार और निःस्वार्थ लोकसेवा किसी भी उपासना से बढ़कर हैं.

देव ने वेदों का उदाहरण देते हुए कहा- “कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छनं समाः एवान्त्वाप नान्यतोअस्ति व कर्म लिप्यते नरे..”
अर्थात ‘कर्म करते हुए सौ वर्ष जीने की ईच्छा करो तो कर्मबंधन में लिप्त हो जाओगे.’ राजन! भगवान दीनदयालु हैं. उन्हें खुशामद नहीं भाती बल्कि आचरण भाता है.. सच्ची भक्ति तो यही है कि परोपकार करो. दीन-दुखियों का हित-साधन करो. अनाथ, विधवा, किसान व निर्धन आज अत्याचारियों से सताए जाते हैं इनकी यथाशक्ति सहायता और सेवा करो और यही परम भक्ति है..”

राजा को आज देव के माध्यम से बहुत बड़ा ज्ञान मिल चुका था और अब राजा भी समझ गया कि परोपकार से बड़ा कुछ भी नहीं और जो परोपकार करते हैं वही भगवान के सबसे प्रिय होते हैं।

मित्रों, जो व्यक्ति निःस्वार्थ भाव से लोगों की सेवा करने के लिए आगे आते हैं, परमात्मा हर समय उनके कल्याण के लिए यत्न करता है. हमारे पूर्वजों ने कहा भी है- “परोपकाराय पुण्याय भवति” अर्थात दूसरों के लिए जीना, दूसरों की सेवा को ही पूजा समझकर कर्म करना, परोपकार के लिए अपने जीवन को सार्थक बनाना ही सबसे बड़ा पुण्य है. और जब आप भी ऐसा करेंगे तो स्वतः ही आप वह ईश्वर के प्रिय भक्तों में शामिल हो जाएंगे .

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कामेंट्स

Gajrajg May 14, 2018
🙏जय श्री कृष्ण🙏 मुस्‍कान हृदय की मधुरता की तरफ इशारा करती है, और शांति बुद्धि की परिपक्‍वता की तरु इशारा करती है और दोनों का ही होना एक मनुष्‍य की संपूर्णता होने का इशारा करते हैं… 🌷मुस्कुराते रहो🌷

Gajrajg May 21, 2018
🙏जय श्री कृष्ण🙏 *"आशाएं ऐसी हो जो-* *मंज़िल तक ले जाएँ,* *"मंज़िल ऐसी हो जो-* *जीवन जीना सीखा दे..!* *जीवन ऐसा हो जो-* *संबंधों की कदर करे,* *"और संबंध ऐसे हो जो-* *याद करने को मजबूर कर दे"* 🌷शुभ रात्रि🌷

Gajrajg May 21, 2018
🙏जय श्री कृष्ण🙏 *"आशाएं ऐसी हो जो-* *मंज़िल तक ले जाएँ,* *"मंज़िल ऐसी हो जो-* *जीवन जीना सीखा दे..!* *जीवन ऐसा हो जो-* *संबंधों की कदर करे,* *"और संबंध ऐसे हो जो-* *याद करने को मजबूर कर दे"* 🌷शुभ रात्रि🌷

Gajrajg Jun 14, 2018
🙏जय श्री कृष्ण🙏 खुद से नहीं हारें* *तो अवश्य जीतेंगे 🌷शुभ दिन🌷

Gajrajg Jun 24, 2018
🙏जय श्री कृष्ण🙏 सफर का मजा लेना हो तो साथ में सामान कम रखिए, और जिंदगी का मजा लेना हो तो दिल में अरमान कम रखिए , 🌷शुभ दिन🌷

Mukesh Baganiya Aug 21, 2018
बहुत बढ़िया पोस्ट हे जी आपकी ..आपके विचार बहुत अच्छे हे आपको दिल से नमस्कार जी

Gajrajg Aug 23, 2018
🙏जय श्री कृष्ण🙏 हर किसी के लिए दुआ* *किया करो* *क्या पता* *किसी की किस्मत* *तुम्हारी दुआ का इंतजार* *कर रही हो 🙏 *सुप्रभात* 🙏

Gajrajg Dec 2, 2018
🙏जय श्री कृष्ण🙏 🌷सुविचार🌷 *सम्बन्ध और जल* *एक समान होते है* *न कोई रंग, न कोई रूप* *पर फिर भी जीवन के* *अस्तित्व के लिए* *सबसे महत्वपूर्ण.......* 🌻 आज का दिन शुभ हो 🌻

Gajrajg Mar 3, 2019
🙏जय श्री कृष्ण🙏 !! शुभ विचार!! “एक पल के लिए ही सही, किसी और के चेहरे की मुस्कान बनो ।” 🌷शुभ दिन🌷

pradeep Apr 5, 2019
🙏Jay Jay Shri Radhey🙏🌹🌹

sunita Sharma Jan 23, 2020

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*आज से* *14 अध्याय की सुरुवात हो रही है* आज का श्लोक: श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप अध्याय 14 : प्रकृति के तीन गुण श्लोक--01 ❁ *श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप* ❁ *सभी के लिए सनातन शिक्षाएं* *आज* *का* *श्लोक* -- 14.01 *अध्याय 14 : प्रकृति के तीन गुण* श्रीभगवानुवाच | परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् | यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः || १ || श्री-भगवान् उवाच - भगवान् ने कहा; परम् - दिव्य; भूयः - फिर; प्रवक्ष्यामि - कहूँगा; ज्ञानानाम् - समस्त ज्ञान का; ज्ञानम् - ज्ञान; उत्तमम् - सर्वश्रेष्ठ; यत् - जिसे; ज्ञात्वा - जानकर;मुनयः - मुनि लोग; सर्वे - समस्त; पराम् - दिव्य; सिद्धिम् - सिद्धि को; इतः - इस संसार से; गताः - प्राप्त किया | भगवान् ने कहा - अब मैं तुमसे समस्त ज्ञानोंमें सर्वश्रेष्ठ इस परम ज्ञान को पुनः कहूँगा, जिसे जान लेने पर समस्त मुनियों ने परम सिद्धि प्राप्त की है | . तात्पर्य: सातवें अध्याय से लेकर बारहवें अध्याय तक श्रीकृष्ण परम सत्य भगवान् के विषय में विस्तार से बताते हैं | अब भगवान् स्वयं अर्जुन को और आगे ज्ञान दे रहे हैं | यदि कोई इस अध्याय को दार्शनिक चिन्तन द्वारा भलीभाँति समझ ले तो उसे भक्ति का ज्ञान हो जाएगा | तेरहवें अध्याय में यह स्पष्ट बताया जा चुका है कि विनयपूर्वक ज्ञान का विकास करते हुए भवबन्धन से छूटा जा सकता है | यह भी बताया जा चुका है कि प्रकृति के गुणों की संगति के फलस्वरूप ही जीव इस भौतिक जगत् में बद्ध है | अब इस अध्याय में भगवान् स्वयं बताते हैं कि वे प्रकृति के गुण कौन-कौन से हैं, वे किस प्रकार क्रिया करते हैं, किस तरह बाँधते हैं और किस प्रकार मोक्ष प्रदान करते हैं | इस अध्याय में जिस ज्ञान का प्रकाश किया गया है उसे अन्य पूर्ववर्ती अध्यायों में दिए गये ज्ञान से श्रेष्ठ बताया गया है | इस ज्ञान को प्राप्त करके अनेक मुनियों ने सिद्धि प्राप्त की और वे वैकुण्ठलोक के भागी हुए | अब भगवान् उसी ज्ञान को और अच्छे ढंग से बताने जा रहे हैं | यह ज्ञान अभी तक बताये गये समस्त ज्ञानयोग से कहीं अधिक श्रेष्ठ है और इसे जान लेने पर अनेक लोगों को सिद्धि प्राप्त हुई है | अतः यह आशा की जाती है कि जो भी इस अध्याय को समझेगा उसे सिद्धि प्राप्त होगी | ************************************ *प्रतिदिन भगवद्गीता का एक श्लोक* प्राप्त करने हेतु, इस समूह से जुड़े । कृपया एक समूह से ही जुड़े, सभी समूहों में वही श्लोक भेजा जाएगा।🙏🏼 https://chat.whatsapp.com/FLcJD8plWQVJHbiGaQepMw

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Vinay Mishra Jan 23, 2020

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Sharmila Singh Jan 23, 2020

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Sanjay Singh Jan 23, 2020

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Gouri Jan 23, 2020

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Kshatriya Jan 23, 2020

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Queen Jan 23, 2020

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