((((((((( शबरी के पैरों की धूल )))))))))

((((((((( शबरी के पैरों की धूल )))))))))

शबरी एक आदिवासी भील की पुत्री थी। देखने में बहुत साधारण, पर दिल से बहुत कोमल थी।
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इनके पिता ने इनका विवाह निश्चित किया, लेकिन आदिवासियों की एक प्रथा थी की किसी भी अच्छे कार्य से पहले निर्दोष जानवरों की बलि दी जाती थी।
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इसी प्रथा को पूरा करने के लिये इनके पिता शबरी के विवाह के एक दिन पूर्व सौ भेड़ बकरियाँ लेकर आये।
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तब शबरी ने पिता से पूछा – पिताजी इतनी सारी भेड़ बकरियाँ क्यूँ लाये ?
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पिता ने कहा – शबरी यह एक प्रथा है जिसके अनुसार कल प्रातः तुम्हारी विवाह की विधि शुरू करने से पूर्व इन सभी भेड़ बकरियों की बलि दी जायेगी। यह कहकर उसके पिता वहाँ से चले जाते हैं।
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प्रथा के बारे में सुन शबरी को बहुत दुःख होता है और वो पूरी रात उन भेड़ बकरियों के पास बैठी रही और उनसे बाते करती रही। उसके मन में एक ही विचार था कि कैसे वो इन निर्दोष जानवरों को बचा पाये।
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तब ही एकाएक शबरी के मन में ख्याल आता है और वो सुबह होने से पूर्व ही अपने घर से भाग कर जंगल चली गई जिससे वो उन निर्दोष जानवरों को बचा सके।
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शबरी भली भांति जानती थी, अगर एक बार वो इस तरह से घर से जायेगी तो कभी उसे घर वापस आने का मौका नहीं मिलेगा फिर भी शबरी ने खुद से पहले उन निर्दोषों की सोची।
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घर से निकल कर शबरी एक घने जंगल में जा पहुँची। अकेली शबरी जंगल में भटक रही थी तब उसने शिक्षा प्राप्ति के उद्देश्य से कई गुरुवरों के आश्रम में दस्तक दी, लेकिन शबरी तुच्छ जाति की थी इसलिये उसे सभी ने धुत्कार के निकाल दिया।
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शबरी भटकती हुई मतंग ऋषि के आश्रम पहुंची और उसने अपनी शिक्षा प्राप्ति की इच्छा व्यक्त की। मतंग ऋषि ने शबरी को सहर्ष अपने गुरुकुल में स्थान दे दिया।
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अन्य सभी ऋषियों ने मतंग ऋषि का तिरस्कार किया लेकिन मतंग ऋषि ने शबरी को अपने आश्रम में स्थान दिया।
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शबरी ने गुरुकुल के सभी आचरणों को आसानी से अपना लिया और दिन रात अपने गुरु की सेवा में लग गई।
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शबरी जतन से शिक्षा ग्रहण करने के साथ- साथ आश्रम की सफाई, गौ शाला की देख रेख, दूध दोहने के कार्य के साथ सभी गुरुकूल के वासियों के लिये भोजन बनाने के कार्य में लग गई। कई वर्ष बीत गये, मतंग ऋषि शबरी की गुरु भक्ति से बहुत प्रसन्न थे।
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मतंग ऋषि का शरीर दुर्बल हो चूका था इसलिये उन्होंने एक दिन शबरी को अपने पास बुलाया और कहा- पुत्री मेरा शरीर अब दुर्बल हो चूका है, इसलिये मैं अपनी देह यहीं छोड़ना चाहता हूँ, लेकिन उससे पहले मैं तुम्हे आशीर्वाद देना चाहता हूँ बोलो पुत्री तुम्हे क्या चाहिये ?
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आँखों में आसूं भरकर शबरी मतंग ऋषि से कहती है – हे गुरुवर आप ही मेरे पिता है, मैं आपके कारण ही जीवित हूँ, आप मुझे अपने साथ ही ले जाये।
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तब मतंग ऋषि ने कहा- नहीं पुत्री तुम्हे मेरे बाद मेरे इस आश्रम का ध्यान रखना है। तुम जैसी गुरु परायण शिष्या को उसके कर्मो का उचित फल मिलेगा।
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एक दिन भगवान राम तुम से मिलने यहाँ आयेंगे और उस दिन तुम्हारा उद्धार होगा और तुम्हे मोक्ष की प्राप्ति होगी। इतना कहकर मतंग ऋषि अपनी देह त्याग कर समाधि ले लेते हैं।
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उसी दिन से शबरी हर रोज प्रातः उठकर बाग़ जाती, ढेर सारे फल इकठ्ठा करती, सुंदर- सुंदर फूलों से अपना आश्रम सजाती क्यूंकि उसे भगवान राम के आने का कोई निश्चित दिन नहीं पता था, उसे केवल अपने गुरुवर की बात पर यकीन था इसलिये वो रोज श्री राम के इंतजार में समय बिता रही थी। वो रोजाना यही कार्य करती थी।
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एक दिन शबरी आश्रम के पास के तालाब में जल लेने गई, वहीँ पास में एक ऋषि तपस्या में लीन थे। जब उन्होंने शबरी को जल लेते देखा तो उसे अछूत कहकर उस पर एक पत्थर फेंक कर मारा और उसकी चोट से बहते रक्त की एक बूंद से तालाब का सारा पानी रक्त में बदल गया.
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यह देखकर संत शबरी को बुरा भला और पापी कहकर चिल्लाने लगा। शबरी रोती हुई अपने आश्रम में चली गई।
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उसके जाने के बाद  ऋषि फिर से तप करने लगा उसने बहुत से जतन किये लेकिन वो तालाब में भरे रक्त को जल नहीं बना पाया। उसमे गंगा, यमुना सभी पवित्र नदियों का जल डाला गया लेकिन रक्त जल में नहीं बदला।
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कई वर्षों बाद, जब भगवान राम सीता की खोज में वहां आये तब वहाँ के लोगो ने भगवान राम को बुलाया और आग्रह किया कि वे अपने चरणों के स्पर्श से इस तालाब के रक्त को पुनः जल में बदल दें।
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राम उनकी बात सुनकर तालाब के रक्त को चरणों से स्पर्श करते हैं लेकिन कुछ नहीं होता। ऋषि उन्हें जो- जो करने बोलते हैं, वे सभी करते हैं लेकिन रक्त जल में नही बदला।
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तब राम ऋषि से पूछते हैं – हे ऋषिवर मुझे इस तालाब का इतिहास बताये। तब ऋषि उन्हें शबरी और तालाब की पूरी कथा बताते हैं और कहते हैं - हे भगवान यह जल उसी शुद्र शबरी के कारण अपवित्र हुआ है।
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तब भगवान राम दुखी होकर कहा - हे गुरुवर, यह रक्त उस देवी शबरी का नही मेरे ह्रदय का है जिसे तुमने अपने अप शब्दों से घायल किया है.
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भगवान राम ऋषि से आग्रह करते हैं कि मुझे देवी शबरी से मिलना है। तब शबरी को बुलावा भेजा जाता है। राम का नाम सुनते ही शबरी दौड़ी चली आती हैं।
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'राम मेरे प्रभु' कहती हुई जब वो तालाब के समीप पहुँचती है तब उसके पैर की धूल तालाब में चली जाती है और तालाब का सारा रक्त जल में बदल जाता है।
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तब भगवान राम कहते हैं - देखिये गुरुवर आपके कहने पर मैंने सब किया लेकिन यह रक्त भक्त शबरी के पैरों की धूल से जल में बदल गया।
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शबरी जैसे ही भगवान राम को देखती हैं उनके चरणों को पकड़ लेती हैं और अपने साथ आश्रम लाती हैं। उस दिन भी शबरी रोज की तरह सुबह से अपना आश्रम फूलों से सजाती हैं और बाग़ से चख- चख कर सबसे मीठे बेर अपने प्रभु राम के लिये चुनती हैं।
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वो पुरे उत्साह के साथ अपने प्रभु राम का स्वागत करती हैं और बड़े प्रेम से उन्हें अपने जूठे बेर परौसती हैं। भगवान राम भी बहुत प्रेम से उसे खाने उठाते हैं,
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तब उनके साथ गये लक्ष्मण उन्हें रोककर कहते हैं – भ्राता ये बेर जूठे हैं। तब राम कहते हैं – लक्ष्मण यह बेर जूठे नहीं सबसे मीठे है क्यूंकि इनमे प्रेम है।और वो बहुत प्रेम से उन बेरो को खाते है।मतंग ऋषि का कथन सत्य होता है।और देवी शबरी को मोक्ष की प्राप्ति  होती है।और इस तरह भगवान राम शबरी के राम कहलाये।

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कामेंट्स

Uttam Kumar Oct 9, 2017
Jai Shri Ram,,,Niraml man so Jan mohi pawa ,mohi kapat chal chhidar na bhava

s.Kumar Oct 9, 2017
जय श्री राम!

Kanchan Bhagat Oct 9, 2017
भगत के बस में है भगवान

Ritika Oct 22, 2018

Pranam Like Dhoop +68 प्रतिक्रिया 43 कॉमेंट्स • 419 शेयर
Gopal Krishan Oct 23, 2018

🙏🌹🙏🌹🙏🌹🙏🌹🙏

*सत्संग का अर्थ है अच्छा संग। तुलसीदास जी ने पहले तो यह कहा कि ‘बिनु सत्संग विवेक न होई’ यानी अच्छे लोगों के संग के बिना ज्ञान नहीं मिलता। जब तक सत्संग नहीं होता, तब तक विवेक जाग्रत नहीं होता और जब*

*विवेक ही जाग्रत नहीं होगा,...

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Flower Bell Pranam +7 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 18 शेयर

राम जी के पूरे कभी काम नहीं होते
उनके भक्त वीर हनुमान नहीं होते जय जय राम
जय जय राम
जय सिया राम
जय सिया राम
राम जी के पूरे कभी काम नहीं होते
उनके भक्त यदि हनुमान नहीं होते
जय जय राम
सिया राम
जय जय राम
जय सिया राम
श्री गुरु चरण सरोज रज नि...

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Gopal Krishan Oct 23, 2018

राम राम जी.....

भगवान के रूप और गुण -

भक्तों ने गोस्वामीजी के माध्यम से एक बड़ी मीठी और सार्थक बात कही !

एक बात आपने सुनी होगी कि जीव त्रिगुण तीन गुणों के बन्धन में है। गुण संस्कृत में रस्सी को कहते हैं। तो गुण का दूसरा अर्थ रस्सी भी है !

आपने...

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Anuradha Tiwari Oct 21, 2018

मुनि अगस्ति कर सिष्य सुजाना। नाम सुतीछन रति भगवाना॥
मन क्रम बचन राम पद सेवक। सपनेहुँ आन भरोस न देवक॥

मुनि अगस्त्य जी के एक शिष्य का नाम सुतिक्ष्ण था वे बहुत ही ज्ञानी थे, भगवान राम के परम सेवक थे, वे कभी किसी और भगवान के बारे में कभी सोचते भी ...

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Gopal Krishan Oct 21, 2018

लंका और लंकेश पर विजय. प्राप्त करने के पश्चात् प्रभु श्री राम माता सीता भृाता लक्ष्मण सखा हनुमान एंव अन्य सहित पुष्पक विमान में सवार होकर अयोध्या वापिस लौटते हुए!

दीपावली तक प्रभु पहुँच जायेंगे
स्वागत के लिए तैयार है तो
बोलिये 👉 जय श्री राम 💟🙏...

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Devendra. angira Oct 22, 2018

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Dhanraj Maurya Oct 23, 2018

Om jai jai Om

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Lotus Tulsi Fruits +75 प्रतिक्रिया 25 कॉमेंट्स • 235 शेयर

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