*अनसुनी कथाएँ* (((((( जब माता सीता बन गई चण्डी )))))) 〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰 एक समय की बात है कि भगवान् श्री राम राज सभा में विराज रहे थे उसी समय विभीषण वहाँ पहुंचे। वे बहुत भयभीत और हडबड़ी में लग रहे थे। सभा में प्रवेश करते ही वे कहने लगे – हे राम ! मुझे बचाइये, कुम्भकर्ण का बेटा मूलकासुर आफत ढा रहा है। अब लगता है न लंका बचेगी और न मेरा राज पाठ। भगवान श्री राम द्वारा ढांढस बंधाये जाने और पूरी बात बताये जाने पर विभीषण ने बताया कि कुम्भकर्ण का एक बेटा मूल नक्षत्र में पैदा हुआ था। इसलिये उस का नाम मूलकासुर रखा गया है। इसे अशुभ जानकर कुंभकर्ण ने जंगल में फिंकवा दिया था। जंगल में मधुमक्खियों ने मूलकासुर को पाल लिया। मूलकासुर बड़ा हुआ तो उसने कठोर तपस्या कर के ब्रह्माजी को प्रसन्न कर लिया, अब उनके दिये वर और बल के घमंड में भयानक उत्पात मचा रखा है। जब जंगल में उसे पता चला कि आपने उसके खानदान का सफाया कर लंका जीत ली और राज पाट मुझे सौंप दिया है वह तब से भन्नाया हुआ है। भगवन आपने जिस दिन मुझे राज पाठ सौंपा उसके कुछ दिन बाद ही वह पाताल वासियों के साथ लंका पहुँच कर मुझ पर धावा बोल दिया। मैंने छः महिने तक मुकाबला किया पर ब्र्ह्मा जी के वरदान ने उसे इतना ताकत वर बना दिया है कि मुझे भागना पड़ा। अपने बेटे, मन्त्रियों तथा स्त्री के साथ किसी प्रकार सुरंग के जरिये भाग कर यहाँ पहुँचा हूँ। उसने कहा कि ‘पहले धोखेबाज भेदिया विभीषण को मारुंगा फिर पिता की हत्या करने वाले राम को भी मार डालूँगा। वह आपके पास भी आता ही होगा। समय कम है, लंका और अयोध्या दोनों खतरे में हैं। जो उचित समझते हों तुरन्त कीजिये। भक्त की पुकार सुन श्रीराम जी हनुमान तथा लक्ष्मण सहित सेना को तैयार कर पुष्पक यान पर चढ़ झट लंका की ओर चल पड़े। मूलकासुर को श्री राम चंद्र के आने की बात मालूम हुई, वह भी सेना लेकर लड़ने के लिये लंका के बाहर आ डटा।भयानक युद्ध छिड़ गया और सात दिनों तक घोर युद्ध होता रहा। मूलकासुर भगवान श्री राम की सेना पर अकेले ही भारी पड़ रहा था। अयोध्या से सुमन्त्र आदि सभी मन्त्री भी आ पहुँचे। हनुमान् जी भी संजीवनी लाकर वानरों, भालुओं तथा मानुषी सेना को जिलाते जा रहे थे। सब कुछ होते हुये भी पर युद्ध का नतीजा उनके पक्ष में जाता नहीं दीख रहा था अतः भगवान् चिन्ता में थे। विभीषण ने बताया कि रोजाना मूलकासुर तंत्र साधना करने गुप्त गुफा में जाता है। उसी समय ब्रह्मा जी वहाँ आये और भगवान से कहने लगे – ‘रघुनन्दन ! इसे तो मैंने स्त्री के हाथों मरने का वरदान दिया है। आपका प्रयास बेकार ही जायेगा। श्री राम, इससे संबंधित एक बात और है, उसे भी जान लेना फायदे मंद हो सकता है। जब इसके भाई-बंधु लंका युद्ध में मारे जा चुके तो एक दिन इसने मुनियों के बीच दुखी हो कर कहा, ‘चण्डी सीता के कारण मेरा समूचा कुल नष्ट हुआ’। इस पर एक मुनि ने नाराज होकर उसे शाप दे दिया – ‘दुष्ट ! तुने जिसे चण्डी कहा है, वही सीता तेरी जान लेगी।' मुनि का इतना कहना था कि वह उन्हें खा गया। यह देखकर बाकी मुनि उस के डर से चुप चाप खिसक गये। तो हे राम, अब कोई दूसरा उपाय नहीं है।अब तो केवल सीता ही इसका वध कर सकती हैं। आप उन्हें यहाँ बुला कर इसका वध करवाइये, इतना कह कर ब्रह्मा जी चले गये।भगवान् श्री राम ने हनुमान जी और गरुड़ को तुरन्त पुष्पक विमान से सीता जी को लाने भेजा। सीता देवी-देवताओं की मन्नत मनातीं, तुलसी, शिव-प्रतिमा, पीपल आदि के फेरे लगातीं, ब्राह्मणों से ‘पाठ, रुद्रीय’ का जप करातीं, दुर्गा जी की पूजा करती कि विजयी श्री राम शीघ्र लौटें। तभी गरुड़ और हनुमान् जी उनके पास पहुँचे और राम जी का संदेश सुनाया। पति के संदेश को सुन कर सीता तुरन्त चल दीं। भगवान श्री राम ने उन्हें मूलकासुर के बारे में सारा कुछ बताया। फिर तो भगवती सीता को गुस्सा आ गया । उनके शरीर से एक दूसरी तामसी शक्ति निकल पड़ी, उसका स्वर बड़ा भयानक था। यह छाया सीता चण्डी के वेश में लंका की ओर बढ चलीं। इधर श्री राम ने वानर सेना को इशारा किया कि मूलकासुर जो तांत्रिक क्रियाएं कर रहा है उसको उसकी गुप्त गुफा में जा कर तहस नहस करें। वानर गुफा के भीतर पहुंच कर उत्पात मचाने लगे तो मूलकासुर दांत किट किटाता हुआ सब छोड़ छाड़ कर वानर सेना के पीछे दौड़ा। हड़बड़ी में उसका मुकुट गिर पड़ा। फिर भी भागता हुआ वह युद्ध के मैदान में आ गया। युद्ध के मैदान में छाया सीता को देखकर मूलकासुर गरजा, तू कौन ? अभी भाग जा, मैं औरतों पर मर्दानगी नही दिखाता। छाया सीता ने भी भीषण आवाज करते हुये कहा, ‘मैं तुम्हारी मौत-चण्डी हूँ, तूने मेरा पक्ष लेने वाले मुनियों और ब्राह्मणों को खा डाला था, अब मैं तुम्हें मार कर उसका बदला चुकाउंगी। इतना कह कर छाया सीता ने मूलकासुर पर पाँच बाण चलाये। मूलकासुर ने भी जवाब में बाण चलाये। कुछ देर तक घोर युद्द हुआ पर अन्त में ‘चण्डिकास्त्र’ चला कर छाया सीता ने मूलकासुर का सिर उड़ा दिया। वह लंका के दरवाजे पर जा गिरा। राक्षस हाहाकार करते हुए इधर उधर भाग खड़े हुए। छाया सीता लौट कर सीता के शरीर में प्रवेश कर गयी। मूलका सुर से दुखी लंका की जनता ने मां सीता की जय जयकार की और विभीषन ने उन्हें धन्यवाद दिया। कुछ दिनों तक लंका में रहकर श्री राम सीता सहित पुष्पक विमान से अयोध्या लौट आये। 〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰

*अनसुनी कथाएँ*

(((((( जब माता सीता बन गई चण्डी ))))))
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एक समय की बात है कि भगवान् श्री राम राज सभा में विराज रहे थे उसी समय विभीषण वहाँ पहुंचे। वे बहुत भयभीत और हडबड़ी में लग रहे थे। सभा में प्रवेश करते ही वे कहने लगे – हे राम ! मुझे बचाइये, कुम्भकर्ण का बेटा मूलकासुर आफत ढा रहा है। अब लगता है न लंका बचेगी और न मेरा राज पाठ।
भगवान श्री राम द्वारा ढांढस बंधाये जाने और पूरी बात बताये जाने पर विभीषण ने बताया कि कुम्भकर्ण का एक बेटा मूल नक्षत्र में पैदा हुआ था। इसलिये उस का नाम मूलकासुर रखा गया है। इसे अशुभ जानकर कुंभकर्ण ने जंगल में फिंकवा दिया था।
जंगल में मधुमक्खियों ने मूलकासुर को पाल लिया। मूलकासुर बड़ा हुआ तो उसने कठोर तपस्या कर के ब्रह्माजी को प्रसन्न कर लिया, अब उनके दिये वर और बल के घमंड में भयानक उत्पात मचा रखा है। जब जंगल में उसे पता चला कि आपने उसके खानदान का सफाया कर लंका जीत ली और राज पाट मुझे सौंप दिया है वह तब से भन्नाया हुआ है।
भगवन आपने जिस दिन मुझे राज पाठ सौंपा उसके कुछ दिन बाद ही वह पाताल वासियों के साथ लंका पहुँच कर मुझ पर धावा बोल दिया। मैंने छः महिने तक मुकाबला किया पर ब्र्ह्मा जी के वरदान ने उसे इतना ताकत वर बना दिया है कि मुझे भागना पड़ा।
अपने बेटे, मन्त्रियों तथा स्त्री के साथ किसी प्रकार सुरंग के जरिये भाग कर यहाँ पहुँचा हूँ। उसने कहा कि ‘पहले धोखेबाज भेदिया विभीषण को मारुंगा फिर पिता की हत्या करने वाले राम को भी मार डालूँगा। वह आपके पास भी आता ही होगा। समय कम है, लंका और अयोध्या दोनों खतरे में हैं। जो उचित समझते हों तुरन्त कीजिये। भक्त की पुकार सुन श्रीराम जी हनुमान तथा लक्ष्मण सहित सेना को तैयार कर पुष्पक यान पर चढ़ झट लंका की ओर चल पड़े।
मूलकासुर को श्री राम चंद्र के आने की बात मालूम हुई, वह भी सेना लेकर लड़ने के लिये लंका के बाहर आ डटा।भयानक युद्ध छिड़ गया और सात दिनों तक घोर युद्ध होता रहा। मूलकासुर भगवान श्री राम की सेना पर अकेले ही भारी पड़ रहा था। अयोध्या से सुमन्त्र आदि सभी मन्त्री भी आ पहुँचे। हनुमान् जी भी संजीवनी लाकर वानरों, भालुओं तथा मानुषी सेना को जिलाते जा रहे थे। सब कुछ होते हुये भी पर युद्ध का नतीजा उनके पक्ष में जाता नहीं दीख रहा था अतः भगवान् चिन्ता में थे।
विभीषण ने बताया कि रोजाना मूलकासुर तंत्र साधना करने गुप्त गुफा में जाता है। उसी समय ब्रह्मा जी वहाँ आये और भगवान से कहने लगे – ‘रघुनन्दन ! इसे तो मैंने स्त्री के हाथों मरने का वरदान दिया है। आपका प्रयास बेकार ही जायेगा। श्री राम, इससे संबंधित एक बात और है, उसे भी जान लेना फायदे मंद हो सकता है। जब इसके भाई-बंधु लंका युद्ध में मारे जा चुके तो एक दिन इसने मुनियों के बीच दुखी हो कर कहा, ‘चण्डी सीता के कारण मेरा समूचा कुल नष्ट हुआ’। इस पर एक मुनि ने नाराज होकर उसे शाप दे दिया – ‘दुष्ट ! तुने जिसे चण्डी कहा है, वही सीता तेरी जान लेगी।' मुनि का इतना कहना था कि वह उन्हें खा गया। यह देखकर बाकी मुनि उस के डर से चुप चाप खिसक गये। तो हे राम, अब कोई दूसरा उपाय नहीं है।अब तो केवल सीता ही इसका वध कर सकती हैं। आप उन्हें यहाँ बुला कर इसका वध करवाइये, इतना कह कर ब्रह्मा जी चले गये।भगवान् श्री राम ने हनुमान जी और गरुड़ को तुरन्त पुष्पक विमान से सीता जी को लाने भेजा।
सीता देवी-देवताओं की मन्नत मनातीं, तुलसी, शिव-प्रतिमा, पीपल आदि के फेरे लगातीं, ब्राह्मणों से ‘पाठ, रुद्रीय’ का जप करातीं, दुर्गा जी की पूजा करती कि विजयी श्री राम शीघ्र लौटें। तभी गरुड़ और हनुमान् जी उनके पास पहुँचे और राम जी का संदेश सुनाया। पति के संदेश को सुन कर सीता तुरन्त चल दीं। भगवान श्री राम ने उन्हें मूलकासुर के बारे में सारा कुछ बताया। फिर तो भगवती सीता को गुस्सा आ गया । उनके शरीर से एक दूसरी तामसी शक्ति निकल पड़ी, उसका स्वर बड़ा भयानक था। यह छाया सीता चण्डी के वेश में लंका की ओर बढ चलीं। 
इधर श्री राम ने वानर सेना को इशारा किया कि मूलकासुर जो तांत्रिक क्रियाएं कर रहा है उसको उसकी गुप्त गुफा में जा कर तहस नहस करें। वानर गुफा के भीतर पहुंच कर उत्पात मचाने लगे तो मूलकासुर दांत किट किटाता हुआ सब छोड़ छाड़ कर वानर सेना के पीछे दौड़ा। हड़बड़ी में उसका मुकुट गिर पड़ा। फिर भी भागता हुआ वह युद्ध के मैदान में आ गया।
युद्ध के मैदान में छाया सीता को देखकर मूलकासुर गरजा, तू कौन ? अभी भाग जा, मैं औरतों पर मर्दानगी नही दिखाता। छाया सीता ने भी भीषण आवाज करते हुये कहा, ‘मैं तुम्हारी मौत-चण्डी हूँ, तूने मेरा पक्ष लेने वाले मुनियों और ब्राह्मणों को खा डाला था, अब मैं तुम्हें मार कर उसका बदला चुकाउंगी। इतना कह कर छाया सीता ने मूलकासुर पर पाँच बाण चलाये। मूलकासुर ने भी जवाब में बाण चलाये। कुछ देर तक घोर युद्द हुआ पर अन्त में ‘चण्डिकास्त्र’ चला कर छाया सीता ने मूलकासुर का सिर उड़ा दिया। वह लंका के दरवाजे पर जा गिरा।
राक्षस हाहाकार करते हुए इधर उधर भाग खड़े हुए। छाया सीता लौट कर सीता के शरीर में प्रवेश कर गयी। मूलका सुर से दुखी लंका की जनता ने मां सीता की जय जयकार की और विभीषन ने उन्हें धन्यवाद दिया। कुछ दिनों तक लंका में रहकर श्री राम सीता सहित पुष्पक विमान से अयोध्या लौट आये।
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Acharya Rajesh May 16, 2021

☀️ *लेख:-देवताओं के कोषाध्यक्ष-कुबेर देवता* कुबेर एक हिन्दू पौराणिक देवता हैं, जो धन के स्वामी व देवताओं के कोषाध्यक्ष यानि देवताओं के खजांची माने जाते हैं। कुबेर यक्षों के राजा भी हैं। कुबेर घोर तपस्या करके उत्तर दिशा के दिक्पाल नियुक्त हुए । यही संसार के रक्षक अर्थात लोकपाल भी हैं। भगवान ब्रह्मा ने इन्हें समस्त सम्पत्तियों का स्वामी बनाया था । *कुबेर जी का जन्म:-* ब्रह्माजी के पुत्र हुए महर्षि पुलस्त्य, तथा महर्षि पुलस्त्य के पुत्र महामुनि विश्वश्रवा ( विश्र्वा ) ही कुबेर जी के पिता थे । विश्वश्रवा जी की दो पत्नियां थीं। ऋषि भारद्वाज जी की पुत्री इलविला (मतांतर से इनका नाम पुण्योतकटा तथा देववर्णिनी भी कहा गया ) से विश्वश्रवा जी का विवाह हुआ, और इन्ही से कुबेर जी की उत्पत्ति हुई । इनकी सौतेली माता का नाम कैकसी था, जिनके गर्भ से रावण, कुंभकर्ण और विभीषण इत्यादि ने जन्म लिया । *कुबेर जी के भाई-बहन:-* माता-पिता की संतान-पुत्रों में कुबेर सबसे बड़े थे। शेष भाईयो मे इनके पिता की दूसरी पत्नी कैकसी से रावण, कुंभकर्ण और विभीषण अहिरावण, खर और दूषण पैदा हुए तथा उनकी बहन शूर्पणखा और कुम्भिनी हुई । ये सभी कुबेर जी के सौतेले भाई-बहन थे। *कुबेर जी का रूप-स्वरूप:-* कुबेर जी का श्वेत वर्ण है, ये तुंदियल शरीर लिए हुए यानि थोड़े थुलथुल हैं। परंतु उनकी तोंद सांकेतिक रूप से उनकी समृद्धि की प्रतीक है । उनकी ठुड्डी दोहरी है । ये आठ दांतो वाले तथा तीन चरणों वाले है । कुबेर जी गदा धारण किए रहते है । *कुबेर जी का निवास स्थान:-* कुबेर यक्षों के राजा हैं । भोलेनाथ के निवास स्थान कैलाश पर्वत के समीप इनकी नगरी अलकापुरी है । जो कि एक जगमगाती नगरी है ।  जहां पर गदाधारी कुबेर जी अपनी सत्तर योजन विस्तार वाली सभा मे विराजते है । जहां पर यक्ष इनके अनुचर यानि सेवक है, जोकि निरंतर इनकी सेवा करते हैं । कुबेर का निवास वटवृक्ष पर भी बताया गया है । ऐसे वृक्ष जो घर-आंगन में नहीं होते, गांव के बीच में भी नहीं होते हैं। ये ऐसे वृक्ष पर वास करते है, जोकि गांव-शहर के बाहर या बियाबान में होते हैं। यहां पर उन्हें धन का घड़ा लिए हुए कल्पित किया गया है ।  *सोने की लंका:-* वास्तव मे सोने की लंका विश्वकर्मा जी ने राक्षसों के लिए बनाई थी, परंतु भगवान विष्णु जी से डरकर राक्षसों ने लंका को त्याग दिया । तब विश्र्वा जी ने लंका को कुबेर को दे दिया । अब इस पर कुबेर जी का अधिपत्य हो गया । कालांतर मे कुबेर के सौतेले भाई राक्षसराज रावण ने अपनी मां से प्रेरणा पाकर कुबेर को युद्ध में परास्त कर, कुबेर से पुष्पक विमान तथा लंका पुरी के साथ अन्य समस्त संपत्तियो को भी छीन लिया । अब सबकुछ हारकर कुबेर अपने पितामह के पास गये। उनकी प्रेरणा से कुबेर ने शिवाराधना की। फलस्वरूप उन्हें 'धनपाल' की पदवी प्राप्त हुई और साथ ही इन्हे पत्नी और पुत्र का भी लाभ हुआ। जिस स्थान पर उन्होंने यह कठोर तपस्या की, वह स्थल गौतमी नदी का तट धनदतीर्थ नाम से विख्यात हुआ । *कुबेर जी का वाहन :-* जैसे विष्णु जी का वाहन गरुड़ और शिव के वाहन नंदी हैं, इसी प्रकार कुबेर का वाहन मनुष्य है- धन का गुलाम मनुष्य ।  *कुबेर जी का पालतू जानवर:-* कुबेर का पालतू नेवला, यह जब भी मुंह खोलता है, जवाहरात उगलता है।  *कुबेर जी की पत्नी तथा पुत्र:-* देवी भद्रा कुबेर जी की पत्नी थी । इनके पुत्र नलकूबर और मणिग्रीव है । जिन्हें महर्षि नारद का श्राप था, भगवान श्री कृष्णजी की कृपा द्वारा श्राप से मुक्त होकर, यह दोनो सदैव अपने पिता कुबेर जी के समीप ही स्थित रहते हैं । *कुबेर मंत्र:-* 1. *ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये धनधान्यसमृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा॥* *भावार्थ:-*इस मंत्र में देवता कुबेर के अलग-अलग नामों एवं उनकी विशेषताओं का जिक्र करते हुए उनसे धन-धान्य एवं समृद्धि देने की प्रार्थना की गई है। धन धान्य और समृद्धि के स्वामी श्री कुबेर जी का यह पैतिस आक्षरी मंत्र है। इस मंत्र के विश्रवा ऋषि हैं तथा छंद बृहती है भगवान शिव के मित्र कुबेर इस मंत्र के देवता हैं। इस मंत्र को उनका अमोघ मंत्र कहा जाता है। *फल:-* लगातार तीन महीने तक इस मंत्र का कम से कम एक माला का जाप करने से घर में किसी भी प्रकार धन धान्य की कमी नहीं होती। यह मंत्र सब प्रकार की सिद्धियां देने पाने के लिये कारगर है। ऐसा माना जाता है कि यदि बेल के वृक्ष के नीचे बैठ कर इस मन्त्र का एक लाख बार जप किया जाये तो जन्म-२ की दरिद्रता तथा कर्जो से मुक्ति पाकर साधक अपने समस्त कुल को धनवान तथा अगले जन्मों मे भी अटल धन-धान्य तथा समृद्धि को प्राप्त करता है। *2. कुबेर धन प्राप्ति मंत्र:-* *ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं क्लीं वित्तेश्वराय नमः॥* धन प्राप्ति की कामना करने वाले साधकों को कुबेर जी का यह मंत्र जपना चाहिये। इसके नियमित जप से साधक को अचानक धन की प्राप्ति होती है। *3. कुबेर अष्टलक्ष्मी मंत्र:-* *ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं श्रीं कुबेराय अष्ट-लक्ष्मी मम गृहे धनं पुरय पुरय नमः॥* कुबेर और मां लक्ष्मी का यह संयुक्त मंत्र जीवन की सभी श्रेष्ठता को देने वाला है, तथा ऐश्वर्य, श्री, दिव्यता, पद प्राप्ति, सुख-सौभाग्य, व्यवसाय वृद्धि, अष्ट सिद्धि, नव निधि, आर्थिक विकास, सन्तान सुख उत्तम स्वास्थ्य, आयु वृद्धि, और समस्त भौतिक और परासुख देने में समर्थ है। शुक्ल पक्ष के किसी भी शुक्रवार को रात्रि में इस मंत्र की साधना शुरू करनी चाहिये। इन तीनों में से किसी भी एक मंत्र का जप दस हजार होने पर दशांश हवन करें या एक हजार मंत्र अधिक जपें। कुबेर जी के नौ अन्य भिन्न-भिन्न रूपों मे की गई साधना इनके भक्तो के भिन्न-भिन्न मनोरथो को पूर्ण करती हैं, जोकि इस प्रकार से है । *कुबेर के नौ अन्य रूप:-* *1. उग्र कुबेर :-* यह कुबेर धन तो देते ही है साथ में आपके सभी प्रकार के शत्रुओ का भी हनन कर देते है । *2. पुष्प कुबेर :-* यह धन प्रेम विवाह , प्रेम में सफलता, मनोवांछित वर प्राप्ति, सम्मोहन विद्या प्राप्ति, तथा सभी प्रकार के दुख से निवृति के लिए की जाती है । *3. चंद्र कुबेर :-* कुबेर के इस रूप की साधना धन एवं पुत्र प्राप्ति के लिए की जाती है, योग्य संतान के लिए चंदर कुबेर की साधना करना अत्यंत फलदायी है । *4. पीत कुबेर :-* धन, वाहन तथा सुख-संपति आदि की प्राप्ति के लिए पीत कुबेर की साधना की जाती है । इस साधना से मनोवांछित वाहन और संपति की प्राप्ति होती है । *5. हंस कुबेर :-* अज्ञात तथा भविष्य मे आने वाले दुखो और मुकदमो में विजय की प्राप्ति के लिए हंस कुबेर की साधना की जाती है । *6. राग कुबेर :-* भौतिक और अध्यात्मिक हर प्रकार की विधा, संगीत, ललितकला और राग नृत्य आदि में निपुणता और सभी प्रकार की परीक्षा में सफलता के लिए राग कुबेर की साधना फलदायी सिद्ध होती है । *7. अमृत कुबेर :-* हर प्रकार के रोग से मुक्ति प्राप्त कर अयोग्यता प्राप्ति, धन प्राप्ति तथा जीवन में सभी प्रकार के भय और दुखो के छुटकारे के लिए अमृत कुबेर की साधना दिव्य और फलदायी है । *8. प्राण कुबेर :-* व्यर्थ मे धन का व्यय, बरकत न पडना तथा कर्जो के बोझ से मुक्ति के लिए प्राण कुबेर की साधना हर प्रकार के संकट से मुक्ति दिलाने में सक्षम है । इन की साधना साधक को सभी प्रकार के परेशानियों से मुक्ति देती है । *9. धन कुबेर :-* ऐसा माना जाता है कि धन कुबेर की साधना अन्य साधनाओ में सर्वश्रेष्ठ है । मनुष्य द्वारा जीवन में किये गये कर्म, उन कर्मो के फलो की प्राप्ति, धन आदि की प्राप्ति के हेतु, सभी मनोकामना की पूर्ति हेतु यदि भाग्य साथ न दे रहा हो तो इसके समाधान के रूप मे धन कुबेर की साधना को सर्वश्रेष्ठ कहा गया है । *(समाप्त)* _________________________ *आगामी लेख:-* *1. शीघ्र ही "पंचक" विषय पर लेख ।* *2. शीघ्र ही "मोहिनी एकादशी" विषय पर लेख ।* *3. शीघ्र ही "वैशाख मास के अंतिम तीन दिन" विषय पर लेख ।* *4. शीघ्र ही "वैशाख पूर्णिमा" विषय पर लेख ।* _________________________ ☀️ *जय श्री राम* *आज का पंचांग 🌹🌹🌹* *सोमवार,17.5.2021* *श्री संवत 2078* *शक संवत् 1943* *सूर्य अयन- उत्तरायण, गोल-उत्तर गोल* *ऋतुः- ग्रीष्म ऋतुः ।* *मास- वैशाख मास।* *पक्ष- शुक्ल पक्ष ।* *तिथि- पंचमी तिथि 11:36 am तक* *चंद्रराशि- चंद्र मिथुन राशि मे 6:52 am तक तदोपरान्त कर्क राशि ।* *नक्षत्र- पुनर्वसु 1:22 pm तक* *योग- गंड योग अगले दिन 2:47 am तक (अशुभ है)* *करण- बालव करण 11:36 am तक* *सूर्योदय 5:29 am, सूर्यास्त 7:05 pm* *अभिजित् नक्षत्र- 11:50 am से 12:44 pm* *राहुकाल - 7:11 am से 8:53 am* (अशुभ कार्य वर्जित,दिल्ली )* *दिशाशूल- पूर्व दिशा ।* *मई माह -शुभ दिन:-* शुभ दिन :- 17, 18, 19 (दोपहर 1 तक), 20, 21, 22, 24 (सवेरे 11 उपरांत), 26, 28, 30, 31 *मई माह-अशुभ दिन:-* 23, 25, 27, 29. *सर्वार्थ सिद्ध योग :- 17 मई 1:22 pm to 18 मई 5:29 am तक*,  ( यह एक शुभयोग है, इसमे कोई व्यापारिक या कि राजकीय अनुबन्ध (कान्ट्रेक्ट) करना, परीक्षा, नौकरी अथवा चुनाव आदि के लिए आवेदन करना, क्रय-विक्रय करना, यात्रा या मुकद्दमा करना, भूमि , सवारी, वस्त्र आभूषणादि का क्रय करने के लिए शीघ्रतावश गुरु-शुक्रास्त, अधिमास एवं वेधादि का विचार सम्भव न हो, तो ये सर्वार्थसिद्धि योग ग्रहण किए जा सकते हैं। *रवि योग :- 17 मई 1:22 pm to 18 मई 2:55 pm तक* यह एक शुभ योग है, इसमे किए गये दान-पुण्य, नौकरी  या सरकारी नौकरी को join करने जैसे कायों मे शुभ परिणाम मिलते है । यह योग, इस समय चल रहे, अन्य बुरे योगो को भी प्रभावहीन करता है। ______________________ *विशेष:- जो व्यक्ति दिल्ली से बाहर अथवा देश से बाहर रहते हो, वह ज्योतिषीय परामर्श हेतु paytm या Bank transfer द्वारा परामर्श फीस अदा करके, फोन द्वारा ज्योतिषीय परामर्श प्राप्त कर सकतें है* ________________________ *आगामी व्रत तथा त्यौहार:-* 22 मई:- मोहिनी एकादशी। 24 मई:- सोम प्रदोष व्रत। 26 मई:- बुद्ध पूर्णिमा/वैशाख पूर्णिमा। 29 मई:- संकष्टी चतुर्थी आपका दिन मंगलमय हो . 💐💐💐 *आचार्य राजेश ( रोहिणी, दिल्ली )* *9810449333, 7982803848*

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sn vyas May 16, 2021

🏵️🏵️🏵️ *नारद मोह* 🏵️🏵️🏵️ 🌻🌻🌻 *भाग 3* 🌻🌻🌻 💥💥💥💥💥💥💥💥💥💥 ------------ गतांक से आगे ----- सज्जनों -- याज्ञवल्क्य जी भरद्वाज जी से कहते है , एक बार पृथ्वी पर जालन्धर नामक राक्षस हुआ । वह इतना शक्तिशाली था कि इसने सभी देवताओ को पराजित कर दिया ।भगवान शिव भी युद्ध करने के लिये गये ,पूरे प्रयत्न के बावजूद यह मरता नही है ,यह हारता नही था क्यूँकि उसकी पत्नी वृन्दा महान पतिव्रता सती थी । *परम सती असुराधिप नारी । तेहि बल ताहि न जितहिं पुरारी ।।* उस पतिव्रता पत्नी के बल से जलन्धर अजेय बना था । युद्ध मे वृन्दा का पतिव्रत उसका कवच बना था । लाखो प्रयत्न के बाद भी जब शिवजी नही मार पाये तो सभी देवता मिलकर भगवान विष्णु के पास गये और प्रार्थना किया । भगवान ने जालन्धर का रुप लेकर वृन्दा का सतीत्व भंग किया । जालन्धर मारा गया ।. जब वृन्दा को जानकारी हुई तो उसने श्राप दिया कि जिस प्रकार तुमने मेरे साथ छल किया है उसी प्रकार मेरा पति भी तुम्हारी पत्नी के साथ छल करके हरण करेगा । *छल करि टारेउ तासु ब्रत प्रभु सुर कारज कीन्ह।* *जब तेंहि जानेउ मरम तब श्राप कोप करि दीन्ह।।* मित्रों इस प्रसंग पर बहुत लोग शंका करते है , जालंधर को मारने के लिये प्रभु ने छल से वृन्दा का सतीत्व भंग किया यह न्याय संगत नही ? जब भगवान ही ऐसा करेंगे तो दूसरे तो करेगें ही । मानस के दो प्रसंग पहला वृन्दा का सतीत्व भंग करना ,दूसरा मेघनाद का यज्ञ विध्वंस करना । इन पर बहुत चर्चा होती है । सज्जनों -गोस्वामी बाबा ने मानस के इन दोनो प्रसंगोके माध्यम से सनातन धर्म के उन्नयन का बहुत ही सुन्दर सूत्र बताया है । मानस की यह विशेषता है कि जब भी कोई चिंतक ,विश्लेषक किसी विषय का विशेष मंथन करता है तो तभी उस का भाव समझ सकता है । और वह ऐसा भी नही कह सकता कि मेरा भाव ही सर्वोत्तम है । मित्रों आज की परिस्थित यह है कि हम अपने आपको भक्त तो कहते है ,धार्मिक तो कहते है परन्तु आँखो के सम्मुख हो रहे अत्याचार ,अधार्मिक कृत्य ,धर्म विरोधी आचरण देखकर आँखे बन्द कर लेते है । मेरा क्या ? और बडे दुख के साथ यह कहना पडता है कि ऐसे आवश्यक प्रसंग जो कि हमे प्रेरित कर सके उसे आजकल के महान कथाकार या तो कहेगे ही नही कहेंगे भी तो मनमाने ढंग से । जबकि ये दोनो प्रसंग स्पष्ट रुप से इसारा कर रहे है जब अधर्म ,अत्याचार अपनी पराकाष्ठा पर हो तो उस अधर्म ,अत्याचार को समाप्त करने के लिये हमे छल करना भी पडे तो कोई दोष नही है । उदाहरण से समझे जैसे कोई व्यक्ति लोहे का कवच पहनकर आपसे लडने आये तो आप क्या करोगे ? सबसे पहले हमे उसके उस कवच को तोडना पडेगा तभी हम उससे लड सकते है । जालंधर भयंकर अधर्म का स्वरुप है पर उसने धर्म रुपी कवच पहना है । अपनी पतिव्रता नारी का धार्मिक रुप कवच जालन्धर ने पहना है । उसके अन्दर वह अधर्म का आचरण करता है । भगवान ने संसार को बताया कि वृन्दा का सतीत्व यदि नही तोडा जाएगा तो संसार के किसी स्त्री का सतीत्व नही बचेगा । अगर एक व्यक्ति को त्यागने से पूरा समाज सुरक्षित हो रहा हो तो यह गलत कैसे ? जलंधर भयंकर पाप कर्म करता है ,भविष्य मे तमाम स्त्रिओ के सतीत्व को बचाने के लिये ही वृन्दा का सतीत्व भंग किया भगवान ने । मित्रों हमारे आपके शरीर मे कोई एक अंग खराब हो जाता है तो डाक्टर कहते है कि अमुक अंग को काटना पडेगा नही तो पूरे शरीर मे विष फैल जायेगा । हम लोग न चाहते हुये उस अंग को कटवा देते है । उसी प्रकार हमे देश , समाज , सनातन धर्म की रक्षा के लिये अगर कुछ अधर्म करना भी पडे तो कर देना चाहिये । यह बहुत महान कार्य होगा । परन्तु निजी स्वार्थ के लिये नही । उसी प्रकार इन्द्रजीत प्रसंग मे भी है । भगवान ने यज्ञ क्यूँ नष्ट करवाया । यदि उसका यज्ञ सफल हो जाता तो क्या वह संसार मे कोई और यज्ञ होने देता क्यूँकि वह तो पहले से ही -- *द्विज भोजन मख होम सराधा । सब कै जाइ करहु तुम बाधा ।।* अब बताइये यदि मेघनाद का यज्ञ न भंग होता तो क्या और कोई यज्ञ पूजा पाठ जप तप हो सकता था क्या ? मित्रों मेरे कहने का तात्पर्य सिर्फ इतना है कि हम नियमतः अपने धार्मिक कृत्य करे लेकिन यदि कभी देश समाज को बचाने के लिये पाप या अधर्म करना भी पडे तो पीछे मत हटना कोई पाप नही लगेगा । भगवान शिवजी ने माता पार्वती से कहते है देवी इस तरह श्री राम जी के शरीर धारण करने का दूसरा कारण है वृन्दा का श्राप । उस कल्प मे जलंधर रावण बना । देवी एक कल्प मे भगवान विष्णु को नारद जी ने श्राप दिया था ~ --------- क्रमशः ---------------- 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

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Dilip Pareek May 16, 2021

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Renu Singh May 14, 2021

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Renu Singh May 14, 2021

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