जीवन है चलने का नाम।

जीवन है चलने का नाम।

जीवन है चलने का नाम।

एक साधू जंगल में ध्यान करते थे और एक लकड़हारा रोज लकडियां काटता था साधू को उस की गरीबी पर दया आ गई वह लकड़हारा बहुत बूढ़ा था उसका शरीर तो बलिष्ठ था पर उसकी बाल सफेद और कमर झुक गई थी रोज सुबह से शाम तक जंगल में लकड़ी काटते-काटते उसकी उम्र गुजर गई और बचे बुढ़ापे के दिनों में अब कोई आस भी नहीं था।

क्योकि अब तो वह इतना काम भी नही कर सकता था तब साधु ने उसे बुलाया और कहा सारी उम्र हो गई पागले तेरे को यहा लकड़ी काटते तू जरा ओर आगे भी तो जा कर कभी देख तो उस लकड़हारे ने कहा आगे जाने से क्या होगा सारी उम्र तो कट गई अब दूर जाने का साहस भी नही है मेरे पास और आगे भी तो ऐसा ही जंगल होगा।

यहा पूरी उम्र गवाई एक बार मेरी बात मान कर आगे और आगे भी देख काफी ना नुच करके वह मरे मन से आगे गया आगे अभी मील भर आगे भी नहीं गया था कि लकड़हारा क्या देखता है वहा तो तांबे कि एक बहुत बड़ी खान है तब वह जितना तांबा ला सकता था उतना ला-ला कर रोज बेचने लगा।

एक बार लाता और सात दिन के लिए काफी हो जाता वह तो मस्त हो गया।छ: दिन आराम करे और एक दिन तांबा ला कर बेचे तब एक दिन उसके दिमाग में बात आई कि सारी उम्र में लकड़ी काटता रहा। तब कही बमुश्किल से साधू के कहने से आगे गया पर फकीर ने आगे और आगे क्यो कहा।

उस दिन वह जल्दी उठा और चल दिया तांबे की खान की ओर वह तांबे की खदान को पार कर चलता रहा।मील दो मील चलने के बाद क्या देखता है। वहां पर तो चाँदी ही चाँदी है। जहां देखो। और उसने अपना सर घुन लिया।मैं भी कितना मुर्ख था जो लकड़ी काटते-काटते पूरी उम्र गँवा दी अब वह चाँदी की खदान से जितनी चाँदी ला सकता था ले आता और बेच देता।

छ: महीने तक मौज से खाता। अब तो उसने अपना घर भी ठीक ठाक बनवा लिया। एक दिन काम करता और तीन महीने बैठ कर खाता।विश्राम ही विश्राम था।खूब सुख सुविधा मिल रही थी।

भगवान ने अच्छा साधू भेजा बुढ़ापा मौज से कट रहा था।साल भर बाद फिर उसके मन में उत्सुकता जागी की आगे और आगे क्यों न और आगे जा कर देख लूं और नही तो सेर सपाटा ही हो जायेगा।जो मुझे मिल गया है वह तो मुझसे छीना जाना है नही तब वह एक दिन चाँदी की खादन को पार कर आगे चलता रहा दोपहर हो गई जंगल और घना हो गया पेड़ आसमान को छूने लगे थे।

उसे लगता यहां के पेड़ काटने में कितना मजा आता एक ही चंदन का पेड़ काट लेता तो महीना भर खाता पर अब क्या पेड़ काटने से चाँदी का काम अच्छा है। मेरे इतने पास इतना सब और मुझे पता तक नही पूरा जंगल मेरा ही तो था यहा सदा में आया बस पास से ही लकडिया काट कर लोट जाता था मैं भी कितना बुद्धू था।

कभी मैने सोचा भी नहीं की जंगल में और संपदा ये भी हो सकती है और आगे बढता गया तो आगे उसे सोने की खदान मिली फिर तो साल में एक आध बार घूमने की मस्ती में जाता और सोना उठा लाता। अब उसे काम कुछ भी नहीं था। तब एक दिन साधू उसे बैठा ध्यान करता दिखाई दिया। वह बैठ गया। जब साधू ने आंखे खोली तो उनके पैर छूकर कहां आप पहले क्यों नहीं मिल गये।

मेरी पूरी उम्र यूं हीखत्म हो गई। तब साधू ने कहां अब भी तो यू ही गवा रहा है। कहा तकपहुंचा। तब उसने गर्व से कहा मैने सोने की खाने खोज ली है।साधू हंसा पाँच साल में भी तेरी समझ में कुछ नहीं आया।

कुंजी तो में तुझे दे ही गया था। जब एक ताला खुला तो और खोलने की जिज्ञासा क्यों न आई। तू आज भी मूर्ख है। इतना जान कर भी आगे क्यों नहीं जाता तब उस लकड़हारे ने आश्चर्य से कहां,अब और क्या हो सकता है। सोना तो आखिरी है। इसके आगे क्या हो सकता है। मेरी तो समझ में नहीं आता साधू ने कहा कोई भी चीज कभी आखरी नहीं होती, हर पगडंडी एक नया द्वार खोलती है।

जरा और भी आगे जाकर देख इस संसार में रूकने के लिए कोई स्थान नहीं है।चलना ही मंजिल है वह और आगे गया वहां पर हीरे की खादन थी।वह उन में से इतना उठा लाया कि जन्म भर कुछ करने की जरूरत नहीं रही। फिर एक दिन खुद साधू उसके घर पर पहुंच गया। वह ठाठ से रह रहा था। तू तो रूक गया और आगे तुझे कुछ दिखाई नहीं दिया।

उस लकड़हारे ने कहां और आगे क्या? अपने लिए तो इतना ही काफी है, मेरी सात पीढ़ी भी बैठ कर खा सकती है। अब तो आराम करने दो।

और थोड़ा भगवान का भजन करने दो।तो उस साधू ने कहा एक बार और भी जा कर देख घर पर भी तो तुझे कुछ काम नही है।अब तो तेरा स्वस्थ भी अच्छा हो गया है।खूब पौष्टिक भोजन करता है चेहरा लाल हो गया बुढ़ापा भी कम झलक रहा है तेरे चेहरे पर कमर जो झुक गई थी सीधी हो गई है आराम के कारण उसने मरे मन से कहा और क्या हो सकता है हीरो से आगे?

अब हीरो के आगे जाने का उसका मन नहीं था पर फकीर के सामने मना भी नहीं कर सका चल दिया दो दिन चार दिन चलने के बाद जब हीरो की खदान भी पार गया तो क्या देखता है वही साधू तो बैठा हुआ है—परम शांत अपूर्व उसकी शांति थी।

भूल गया लकड़हारा जो साधू उसके पास आया था वह ये तो नहीं था। आज उसकी आभा देखने जैसी थी या शायद उसकी उलझी आंखे उसे देख नही पाई थी और यहा न जाने क्या हो रहा है चारो ओर का सौन्दर्य देखते ही बनता है वह झुक गया साधू कि चरणो मे और उसने आंखे बंद कर ली घड़ी बीती दो घड़ी बीती वह नही उठा साधू के चरणों मे अभूत पूर्व आनंद बरस रहा था उन चरणों मे पूरे जीवन की जो जलन पीड़ा झेली थी वह न जाने कहा पल मे गायब हो गई। ऐसी शांति ऐसा आनंद उसने कभी नहीं जाना था।

एक शांति की जल धार बह रही थी साधू ने आंखे खोली ओर चिल्लाया पागल फिर भूल गया मैने जो कहा था आगे और आगे तू तो यही रूक गया इन चरणों मे भी नही रूकना ये भी मंजिल नही है और थोड़ा आगे उसने कहा अब और नही इतनी शांति इतना आनंद तो हीरे जवाहरातों में भी नहीं था जो आपके चरणों मे है बस और नही मुझे यही रहने दो इससे मधुर और इससे सुंदर और आगे क्या हो सकता है ।नही और आगे जा तूने देखा है न जिसे तू अंत समझता था वह भी अंत नहीं है।

आगे पूर्ण है जा और पूर्ण हो जा जब तक आदमी पूर्ण नहीं हो जाता तब तक अतृप्ति बनी ही रहती है गुरु के चरणों में सुख है आनंद है शांति है संसार के सामने अगर तौलो तो अपूर्व है लेकिन परमात्मा के सामने तौलो तो कुछ भी नही गुरु तो तराजू है जो तुम्हे अनुभव देगा मार्ग बतलायेगा तुम सुख, दुःख गुरु के तराजू पर तोल सकते हो पर वहा कोई रूकना थोड़े ही है। आगे जाना है परमात्मा से पहले कोई पूर्णता तुम्हें रोके तो रूकना नही।

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C P Swarnakar Oct 24, 2017
जीवन का मंत्र केवल हरि चरण तक अंतिम छोर है,जो आगे बढ़ते रहने पर ही मिलता है। विश्राम नहीं।

Mahesh Bhargava Jan 26, 2020

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Neha Sharma, Haryana Jan 27, 2020

*जय श्री राधेकृष्णा*🥀🥀🙏 *शुभ प्रभात् वंदन*🥀🥀🙏 *स्नान कब और कैसे करें घर की समृद्धि बढ़ाना हमारे हाथ में है। सुबह के स्नान को धर्म शास्त्र में चार उपनाम दिए हैं। *1* *मुनि स्नान।* जो सुबह 4 से 5 के बीच किया जाता है। . *2* *देव स्नान।* जो सुबह 5 से 6 के बीच किया जाता है। . *3* *मानव स्नान।* जो सुबह 6 से 8 के बीच किया जाता है। . *4* *राक्षसी स्नान।* जो सुबह 8 के बाद किया जाता है। ▶मुनि स्नान सर्वोत्तम है। ▶देव स्नान उत्तम है। ▶मानव स्नान सामान्य है। ▶राक्षसी स्नान धर्म में निषेध है। . किसी भी मानव को 8 बजे के बाद स्नान नहीं करना चाहिए। . *मुनि स्नान .......* 👉घर में सुख ,शांति ,समृद्धि, विद्या , बल , आरोग्य , चेतना , प्रदान करता है। . *देव स्नान ......* 👉 आप के जीवन में यश , कीर्ती , धन, वैभव, सुख ,शान्ति, संतोष , प्रदान करता है। . *मानव स्नान.....* 👉काम में सफलता ,भाग्य, अच्छे कर्मों की सूझ, परिवार में एकता, मंगलमय , प्रदान करता है। . *राक्षसी स्नान.....* 👉 दरिद्रता , हानि , क्लेश ,धन हानि, परेशानी, प्रदान करता है । . किसी भी मनुष्य को 8 के बाद स्नान नहीं करना चाहिए। . पुराने जमाने में इसी लिए सभी सूरज निकलने से पहले स्नान करते थे। *खास कर जो घर की स्त्री होती थी।* चाहे वो स्त्री माँ के रूप में हो, पत्नी के रूप में हो, बहन के रूप में हो। . घर के बड़े बुजुर्ग यही समझाते सूरज के निकलने से पहले ही स्नान हो जाना चाहिए। . *ऐसा करने से धन, वैभव लक्ष्मी, आप के घर में सदैव वास करती है।* . उस समय...... एक मात्र व्यक्ति की कमाई से पूरा हरा भरा परिवार पल जाता था, और आज मात्र पारिवार में चार सदस्य भी कमाते हैं तो भी पूरा नहीं होता। . उस की वजह हम खुद ही हैं। पुराने नियमों को तोड़ कर अपनी सुख सुविधा के लिए हमने नए नियम बनाए हैं। . प्रकृति ......का नियम है, जो भी उस के नियमों का पालन नहीं करता, उस का दुष्परिणाम सब को मिलता है। . इसलिए अपने जीवन में कुछ नियमों को अपनायें और उन का पालन भी करें । . आप का भला हो, आपके अपनों का भला हो। . मनुष्य अवतार बार बार नहीं मिलता। . अपने जीवन को सुखमय बनायें। जीवन जीने के कुछ जरूरी नियम बनायें। ☝ *याद रखियेगा !* 👇 *संस्कार दिये बिना सुविधायें देना, पतन का कारण है।* *सुविधाएं अगर आप ने बच्चों को नहीं दिए तो हो सकता है वह थोड़ी देर के लिए रोएं।* *पर संस्कार नहीं दिए तो वे जिंदगी भर रोएंगे।* मृत्यु उपरांत एक सवाल ये भी पूछा जायेगा कि अपनी अँगुलियों के नाम बताओ । जवाब:- अपने हाथ की छोटी उँगली से शुरू करें :- (1)जल (2) पथ्वी (3)आकाश (4)वायु (5) अग्नि ये वो बातें हैं जो बहुत कम लोगों को मालूम होंगी । 5 जगह हँसना करोड़ों पाप के बराबर है 1. श्मशान में 2. अर्थी के पीछे 3. शोक में 4. मन्दिर में 5. कथा में सिर्फ 1 बार ये message भेजो बहुत लोग इन पापों से बचेंगे ।। अकेले हो? परमात्मा को याद करो । परेशान हो? ग्रँथ पढ़ो । उदास हो? कथाएं पढ़ो। टेन्शन में हो? भगवत् गीता पढ़ो । फ्री हो? अच्छी चीजें करो हे परमात्मा हम पर और समस्त प्राणियों पर कृपा करो...... *सूचना* क्या आप जानते हैं ? हिन्दू ग्रंथ रामायण, गीता, आदि को सुनने,पढ़ने से कैन्सर नहीं होता है बल्कि कैन्सर अगर हो तो वो भी खत्म हो जाता है। व्रत,उपवास करने से तेज बढ़ता है, सरदर्द और बाल गिरने से बचाव होता है । आरती----के दौरान ताली बजाने से दिल मजबूत होता है । ये मैसेज असुर भेजने से रोकेगा मगर आप ऐसा नहीं होने दें और मैसेज सब नम्बरों को भेजें । श्रीमद् भगवद्गीता, भागवत्पुराण और रामायण का नित्य पाठ करें। . ''कैन्सर" एक खतरनाक बीमारी है... बहुत से लोग इसको खुद दावत देते हैं ... बहुत मामूली इलाज करके इस बीमारी से काफी हद तक बचा जा सकता है ... अक्सर लोग खाना खाने के बाद "पानी" पी लेते हैं ... खाना खाने के बाद "पानी" ख़ून में मौजूद "कैन्सर "का अणु बनाने वाले '''सैल्स'''को '''आक्सीजन''' पैदा करता है... ''हिन्दु ग्रंथों में बताया गया है कि... खाने से पहले 'पानी' पीना अमृत" है... खाने के बीच मे 'पानी' पीना शरीर की 'पूजा' है ... खाना खत्म होने से पहले 'पानी' पीना "औषधि'' है... खाने के बाद 'पानी' पीना बीमारियों का घर है... बेहतर है खाना खत्म होने के कुछ देर बाद 'पानी' पीयें ... ये बात उनको भी बतायें जो आपको 'जान' से भी ज्यादा प्यारे हैं ... हरि हरि जय जय श्री हरि !!! रोज एक सेब नो डाक्टर । रोज पांच बादाम, नो कैन्सर । रोज एक निंबू, नो पेट बढ़ना । रोज एक गिलास दूध, नो बौना (कद का छोटा)। रोज 12 गिलास पानी, नो चेहरे की समस्या । रोज चार काजू, नो भूख । रोज मन्दिर जाओ, नो टेन्शन । रोज कथा सुनो मन को शान्ति मिलेगी । "चेहरे के लिए ताजा पानी"। "मन के लिए गीता की बातें"। "सेहत के लिए योग"। और खुश रहने के लिए परमात्मा को याद किया करो । अच्छी बातें फैलाना पुण्य का कार्य है....किस्मत में करोड़ों खुशियाँ लिख दी जाती हैं । जीवन के अंतिम दिनों में इन्सान एक एक पुण्य के लिए तरसेगा ।

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Mamta Chauhan Jan 26, 2020

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*👣।।संत महिमा।।👣* एक जंगल में एक संत अपनी कुटिया में रहते थे। एक किरात (शिकारी), जब भी वहाँ से निकलता संत को प्रणाम ज़रूर करता था। एक दिन किरात संत से बोला की बाबा मैं तो मृग का शिकार करता हूँ, आप किसका शिकार करने जंगल में बैठे हैं.? संत बोले - श्री कृष्ण का, और फूट फूट कर रोने लगे। किरात बोला अरे, बाबा रोते क्यों हो ? मुझे बताओ वो दिखता कैसा है ? मैं पकड़ के लाऊंगा उसको। संत ने भगवान का वह मनोहारी स्वरुप वर्णन कर दिया.... कि वो सांवला सलोना है, मोर पंख लगाता है, बांसुरी बजाता है। किरात बोला: बाबा जब तक आपका शिकार पकड़ नहीं लाता, पानी भी नही पियूँगा। फिर वो एक जगह जाल बिछा कर बैठ गया... 3 दिन बीत गए प्रतीक्षा करते करते, दयालू ठाकुर को दया आ गयी, वो भला दूर कहाँ है, बांसुरी बजाते आ गए और खुद ही जाल में फंस गए। किरात तो उनकी भुवन मोहिनी छवि के जाल में खुद फंस गया और एक टक शयाम सुंदर को निहारते हुए अश्रु बहाने लगा, जब कुछ चेतना हुयी तो बाबा का स्मरण आया और जोर जोर से चिल्लाने लगा शिकार मिल गया, शिकार मिल गया, शिकार मिल गया, और ठाकुरजी की ओर देख कर बोला, अच्छा बच्चू .. 3 दिन भूखा प्यासा रखा, अब मिले हो, और मुझ पर जादू कर रहे हो। शयाम सुंदर उसके भोले पन पर रीझे जा रहे थे एवं मंद मंद मुस्कान लिए उसे देखे जा रहे थे। किरात, कृष्ण को शिकार की भांति अपने कंधे पे डाल कर और संत के पास ले आया। बाबा, आपका शिकार लाया हूँ.... बाबा ने जब ये दृश्य देखा तो क्या देखते हैं किरात के कंधे पे श्री कृष्ण हैं और जाल में से मुस्कुरा रहे हैं। संत के तो होश उड़ गए, किरात के चरणों में गिर पड़े, फिर ठाकुर जी से कातर वाणी में बोले - हे नाथ मैंने बचपन से अब तक इतने प्रयत्न किये, आप को अपना बनाने के लिए घर बार छोडा, इतना भजन किया आप नही मिले और इसे 3 दिन में ही मिल गए...!! भगवान बोले - इसका तुम्हारे प्रति निश्छल प्रेम व कहे हुए वचनों पर दृढ़ विश्वास से मैं रीझ गया और मुझ से इसके समीप आये बिना रहा नहीं गया। भगवान तो भक्तों के संतों के आधीन ही होतें हैं। जिस पर संतों की कृपा दृष्टि हो जाय उसे तत्काल अपनी सुखद शरण प्रदान करतें हैं। किरात तो जानता भी नहीं था की भगवान कौन हैं। पर संत को रोज़ प्रणाम करता था। संत प्रणाम और दर्शन का फल ये है कि 3 दिन में ही ठाकुर मिल गए । यह होता है संत की संगति का परिणाम!! *"संत मिलन को जाईये तजि ममता अभिमान, ज्यो ज्यो पग आगे बढे कोटिन्ह यज्ञ समान"*

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SHANTI PATHAK Jan 26, 2020

शुभरात्रि जी 🙏🏻जय श्री कृष्ण ईश्वर पर विश्वास एक ब्राह्मण को विवाह के बहुत सालों बाद पुत्र हुआ लेकिन कुछ वर्षों बाद बालक की असमय मृत्यु हो गई। ब्राह्मण शव लेकर श्मशान पहुँचा। वह मोहवश उसे दफना नहीं पा रहा था। उसे पुत्र प्राप्ति के लिए किए जप-तप और पुत्र का जन्मोत्सव याद आ रहा था। श्मशान में एक गिद्ध और एक सियार रहते थे। दोनों शव देखकर बड़े खुश हुए। दोनों ने प्रचलित व्यवस्था बना रखी थी - दिन में सियार माँस नहीं खाएगा और रात में गिद्ध। सियार ने सोचा - यदि ब्राह्मण दिन में ही शव रखकर चला गया तो उस पर गिद्ध का अधिकार होगा। इसलिए क्यों न अंधेरा होने तक ब्राह्मण को बातों में फँसाकर रखा जाए।वहीं गिद्ध ताक में था कि शव के साथ आए कुटुंब के लोग जल्द से जल्द जाएँ और वह उसे खा सके। गिद्ध ब्राह्मण के पास गया और उससे वैराग्य की बातें शुरू की। गिद्ध ने कहा - मनुष्यों, आपके दुख का कारण यही मोहमाया ही है। संसार में आने से पहले हर प्राणी का आयु तय हो जाती है। संयोग और वियोग प्रकृति के नियम हैं। आप अपने पुत्र को वापस नहीं ला सकते। इसलिए शोक त्यागकर प्रस्थान करें। संध्या होने वाली है। संध्याकाल में श्मशान प्राणियों के लिए भयदायक होता है इसलिए शीघ्र प्रस्थान करना उचित है। गिद्ध की बातें ब्राह्मण के साथ आए रिश्तेदारों को बहुत प्रिय लगीं। वे ब्राह्मण से बोले - बालक के जीवित होने की आशा नहीं है। इसलिए यहाँ रुकने का क्या लाभ? सियार सब सुन रहा था। उसे गिद्ध की चाल सफल होती दिखी तो भागकर ब्राह्मण के पास आया। सियार कहने लगा - बड़े निर्दयी हो। जिससे प्रेम करते थे, उसके मृत-देह के साथ थोड़ा वक्त नहीं बिता सकते!! फिर कभी इसका मुख नहीं देख पाओगे। कम से कम संध्या तक रुककर जी भर के देख लो! उन्हें रोके रखने के लिए सियार ने नीति की बातें छेड़ दीं - जो रोगी हो, जिस पर अभियोग लगा हो और जो श्मशान की ओर जा रहा हो उसे बंधु-बांधवों के सहारे की ज़रूरत होती है।सियार की बातों से परिजनों को कुछ तसल्ली हुई और उन्होंने तुरंत वापस लौटने का विचार छोड़ा। अब गिद्ध को परेशानी होने लगी। उसने कहना शुरू किया - तुम ज्ञानी होने के बावजूद एक कपटी सियार की बातों में आ गए। एक दिन हर प्राणी की यही दशा होनी है। शोक त्यागकर अपने-अपने घर को जाओ। जो बना है वह नष्ट होकर रहता है। तुम्हारा शोक मृतक को दूसरे लोक में कष्ट देगा। जो मृत्यु के अधीन हो चुका क्यों रोकर उसे व्यर्थ कष्ट देते हो ? लोग चलने को हुए तो सियार फिर शुरू हो गया - यह बालक जीवित होता तो क्या तुम्हारा वंश न बढ़ाता? कुल का सूर्य अस्त हुआ है कम से कम सूर्यास्त तक तो रुको! अब गिद्ध को चिंता हुई। गिद्ध ने कहा - मेरी आयु सौ वर्ष की है। मैंने आज तक किसी को जीवित होते नहीं देखा। तुम्हें शीघ्र जाकर इसके मोक्ष का कार्य आरंभ करना चाहिए। सियार ने कहना शुरू किया - जब तक सूर्य आकाश में विराजमान हैं, दैवीय चमत्कार हो सकते हैं। रात्रि में आसुरी शक्तियाँ प्रबल होती हैं। मेरा सुझाव है थोड़ी प्रतीक्षा कर लेनी चाहिए। सियार और गिद्ध की चालाकी में फँसा ब्राह्मण परिवार तय नहीं कर पा रहा था कि क्या करना चाहिए। अंततः पिता ने बेटे का सिर में गोद में रखा और ज़ोर-ज़ोर से विलाप करने लगा। उसके विलाप से श्मशान काँपने लगा। तभी संध्या-भ्रमण पर निकले महादेव-पार्वती वहाँ पहुँचे। पार्वती जी ने बिलखते परिजनों को देखा तो दुखी हो गईं। उन्होंने महादेव से बालक को जीवित करने का अनुरोध किया। महादेव प्रकट हुए और उन्होंने बालक को सौ वर्ष की आयु दे दी। गिद्ध और सियार दोनों ठगे रह गए। गिद्ध और सियार के लिए आकाशवाणी हुई - तुमने प्राणियों को उपदेश तो दिया उसमें सांत्वना की बजाय तुम्हारा स्वार्थ निहीत था। इसलिए तुम्हें इस निकृष्ट योनि से शीघ्र मुक्ति नहीं मिलेगी। दूसरों के कष्ट पर सच्चे मन से शोक करना चाहिए। शोक का आडंबर करके प्रकट की गई संवेदना से गिद्ध और सियार की गति प्राप्त होती। एक महात्मा एक जगह बैठा था। पास से एक गाड़ी गुजरी जिससे एक गेहूं की बोरी नीचे गिर गई और फट गई और बाहर गेहूं के दाने गिर गये। महात्मा बैठकर देख ही रहा, एक कौआ आया अपने पेट के अनुसार कुछ दाने खाये और उड़ गया। कुछ समय बाद एक गाय आई उसने भी भर पेट खाया और चली गई। बाद में एक आदमी आया उसने वो बोरी ही पीठ पर उठा ली और अपने घर लेकर चला गया। सोचने वाली बात है उन पशु पक्षी को ये समझ में आ गया कि जिस मालिक ने उन्हें यहां भेजा है वो हर रोज उन्हें भर पेट देता है पर मनुष्य को यह छोटी सी बात क्यों नहीं समझ में आ रही।हम दिन रात सिर्फ माया ही कमाने के पीछे लगे पडे़ हैं पर हमारी भूख है की कभी खत्म ही नहीं होती। हमें क्यों उस मालिक पर विश्वास नहीं है. "

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Raj Jan 26, 2020

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