Jayshree Shah
Jayshree Shah Aug 13, 2017

जय जिनेन्द्र जय महावीर

जय जिनेन्द्र जय महावीर

#जयजिनेंद्र
श्री नांदिया तीर्थ, जिला सिरोही, राजस्थान, भारत
मूलनायक : श्री जीवित स्वामी महावीर भगवान ।

भगवान् महावीर के बड़े भाई नन्दिवर्धन के द्वारा बसाये जाने के कारण पुराने समय में इस तीर्थ को नंदीग्राम, नंदिवर्धनपुर आदि नाम से भी जाना जाता था। एक अन्य कथा के अनुसार वर्तमान प्रतिमा भी भगवान् के जीवन काल में ही प्रतिष्ठित हुई, इसलिए इन्हें जीवंत महावीर स्वामी के नाम से भी जाना जाता है। मंदिर को नन्दीश्वर चैत्य के नाम से भी जाना जाता है। नाणा, दियाणा, नांदिया, जीवित स्वामी वांदिया ऐसी कहावत है।

इस प्राचीन तीर्थ में जीवित महावीर स्वामी की पद्मासन मुद्रा में 210 cm ऊँचाई की प्रतिमा है। मूर्ति बहुत ही चमकदार और कलात्मक है। देखने वालों को सहज ही ऐसा लगता है जैसे साक्षात प्रभु ही विराजमान हो। भगवान् महावीर के समय की यह दुर्लभ प्रतिमा है। इतनी सुंदर और आकर्षक प्रतिमा अन्यत्र देखने को नहीं मिलती।

मंदिर के पास ही पहाड़ी पर एक छोटा सा मंदिर है, जहाँ भगवान् महावीर के चरण और एक सांप की छवि है। भक्तों की मान्यता के अनुसार यहाँ पर ही भगवान् ने चंडकौशिक सर्प को प्रतिबोध दिया था।

मंदिर के स्तंभों पर पत्थर के शिलालेख विक्रम संवत 1130 से विक्रम संवत 1210 के बीच की अवधि के हैं, और मंदिर में विक्रम संवत 1210 और बाद में भी मरम्मत और नवीनीकरण किया गया है, समय समय पर इसे पुनर्निर्मित भी किया गया है।
विश्वविख्यात राणकपुर के निर्माता धरणाशाह और बंधु रत्नाशाह इसी नगरी के निवासी थी। ऐसा लगता है किसी समय ये बहुत ही समृद्ध नगर रहा होगा।

मार्गदर्शन : बामणवाडाजी तीर्थ से यह स्थान 6 किलोमीटर तथा सिरोही रोड रेलवे स्टेशन से 10 किलोमीटर दूरी पर है।यहां से लोटाणाजी दियाणाजी अजारी सिवेरा काछोली मालणु बामणवाडजी मीरपुर आदि अति प्राचीन जैन तीर्थो के दर्शन कर पायेंगे।

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कामेंट्स

⛺जब आंख खुली तो अम्‍मा की ⛺गोदी का एक सहारा था ⛺उसका नन्‍हा सा आंचल मुझको ⛺भूमण्‍डल से प्‍यारा था 🌹उसके चेहरे की झलक देख 🌹चेहरा फूलों सा खिलता था 🌹उसके स्‍तन की एक बूंद से 🌹मुझको जीवन मिलता था 👄हाथों से बालों को नोंचा 👄पैरों से खूब प्रहार किया 👄फिर भी उस मां ने पुचकारा 👄हमको जी भर के प्‍यार किया 🌹मैं उसका राजा बेटा था 🌹वो आंख का तारा कहती थी 🌹मैं बनूं बुढापे में उसका 🌹बस एक सहारा कहती थी 🌂उंगली को पकड. चलाया था 🌂पढने विद्यालय भेजा था 🌂मेरी नादानी को भी निज 🌂अन्‍तर में सदा सहेजा था 🌹मेरे सारे प्रश्‍नों का वो 🌹फौरन जवाब बन जाती थी 🌹मेरी राहों के कांटे चुन 🌹वो खुद गुलाब बन जाती थी 👓मैं बडा हुआ तो कॉलेज से 👓इक रोग प्‍यार का ले आया 👓जिस दिल में मां की मूरत थी 👓वो रामकली को दे आया 🌹शादी की पति से बाप बना 🌹अपने रिश्‍तों में झूल गया 🌹अब करवाचौथ मनाता हूं 🌹मां की ममता को भूल गया ☝हम भूल गये उसकी ममता ☝मेरे जीवन की थाती थी ☝हम भूल गये अपना जीवन ☝वो अमृत वाली छाती थी 🌹हम भूल गये वो खुद भूखी 🌹रह करके हमें खिलाती थी 🌹हमको सूखा बिस्‍तर देकर 🌹खुद गीले में सो जाती थी 💻हम भूल गये उसने ही 💻होठों को भाषा सिखलायी थी 💻मेरी नीदों के लिए रात भर 💻उसने लोरी गायी थी 🌹हम भूल गये हर गलती पर 🌹उसने डांटा समझाया था 🌹बच जाउं बुरी नजर से 🌹काला टीका सदा लगाया था 🏯हम बडे हुए तो ममता वाले 🏯सारे बन्‍धन तोड. आए 🏯बंगले में कुत्‍ते पाल लिए 🏯मां को वृद्धाश्रम छोड आए 🌹उसके सपनों का महल गिरा कर 🌹कंकर-कंकर बीन लिए 🌹खुदग़र्जी में उसके सुहाग के 🌹आभूषण तक छीन लिए 👑हम मां को घर के बंटवारे की 👑अभिलाषा तक ले आए 👑उसको पावन मंदिर से 👑गाली की भाषा तक ले आए 🌹मां की ममता को देख मौत भी 🌹आगे से हट जाती है 🌹गर मां अपमानित होती 🌹धरती की छाती फट जाती है 💧घर को पूरा जीवन देकर 💧बेचारी मां क्‍या पाती है 💧रूखा सूखा खा लेती है 💧पानी पीकर सो जाती है 🌹जो मां जैसी देवी घर के 🌹मंदिर में नहीं रख सकते हैं 🌹वो लाखों पुण्‍य भले कर लें 🌹इंसान नहीं बन सकते हैं ✋मां जिसको भी जल दे दे ✋वो पौधा संदल बन जाता है ✋मां के चरणों को छूकर पानी ✋गंगाजल बन जाता है 🌹मां के आंचल ने युगों-युगों से 🌹भगवानों को पाला है 🌹मां के चरणों में जन्‍नत है 🌹गिरिजाघर और शिवाला है 🌹हर घर में मां की पूजा हो 🌹ऐसा संकल्‍प उठाता हूं 🌹मैं दुनियां की हर मां के 🌹चरणों में ये शीश झुकाता हूं... 🙏🌹🌷😘🌷🌹🙏

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*एक कहानी* _*जीवन का टॉनिक*_ *मैं अपने विवाह के बाद अपनी पत्नी के साथ शहर में रह रहा था।* *बहुत साल पहले पिताजी मेरे घर आए थे। मैं उनके साथ सोफे पर बैठा बर्फ जैसा ठंडा जूस पीते हुए अपने पिताजी से विवाह के बाद की व्यस्त जिंदगी, जिम्मेदारियों और उम्मीदों के बारे में अपने ख़यालात का इज़हार कर रहा था और वे अपने गिलास में पड़े बर्फ के टुकड़ों को स्ट्रा से इधर-उधर नचाते हुए बहुत गंभीर और शालीन खामोशी से मुझे सुनते जा रहे थे।* *अचानक उन्होंने कहा- "अपने दोस्तों को कभी मत भूलना। तुम्हारे दोस्त उम्र के ढलने पर पर तुम्हारे लिए और भी महत्वपूर्ण और ज़रूरी हो जायेंगे। बेशक अपने बच्चों, बच्चों के बच्चों को भरपूर प्यार देना मगर अपने पुराने, निस्वार्थ और सदा साथ निभानेवाले दोस्तों को हरगिज़ मत भुलाना। वक्त निकाल कर उनके साथ समय ज़रूर बिताना। उनके घर खाना खाने जाना और जब मौक़ा मिले उनको अपने घर खाने पर बुलाना।* *कुछ ना हो सके तो फोन पर ही जब-तब, हालचाल पूछ लिया करना।"* *मैं नए-नए विवाहित जीवन की खुमारी में था और पिताजी मुझे यारी-दोस्ती के फलसफे समझा रहे थे।* *मैंने सोचा- "क्या जूस में भी नशा होता है जो पिताजी बिन पिए बहकी-बहकी बातें करने लगे? आखिर मैं अब बड़ा हो चुका हूँ, मेरी पत्नी और मेरा होने वाला परिवार मेरे लिए जीवन का मकसद और सब कुछ है।* *दोस्तों का क्या मैं अचार डालूँगा?"* *लेकिन फ़िर भी मैंने आगे चलकर एक सीमा तक उनकी बात माननी जारी रखी।* *मैं अपने गिने-चुने दोस्तों के संपर्क में लगातार रहा।* *समय का पहिया घूमता रहा और मुझे अहसास होने लगा कि उस दिन पिता 'जूस के नशे' में नहीं थे बल्कि उम्र के खरे तजुर्बे मुझे समझा रहे थे।* *उनको मालूम था कि उम्र के आख़िरी दौर तक ज़िन्दगी क्या और कैसे करवट बदलती है।* *हकीकत में ज़िन्दगी के बड़े-से-बड़े तूफानों में दोस्त कभी नाव बनकर, कभी पतवार बनकर तो कभी मल्लाह बनकर साथ निभाते हैं और कभी वे आपके साथ ही ज़िन्दगी की जंग में कूद पड़ते हैं।* *सच्चे दोस्तों का काम एक ही होता है- दोस्ती निभाना।* *ज़िन्दगी के पचास साल बीत जाने के बाद मुझे पता चलने लगा कि घड़ी की सुइयाँ पूरा चक्कर लगाकर वहीं पहुँच गयीं हैं जहाँ से मैंने जिंदगी शुरू की थी।* *विवाह होने से पहले मेरे पास सिर्फ दोस्त थे।* *विवाह के बाद बच्चे हुए।* *बच्चे बड़े हो हुए। उनकी जिम्मेदारियां निभाते-निभाते मैं बूढ़ा हो चला।* *बच्चों के विवाह हो गए और उनके अलग परिवार और घर बन गए।* *बेटियाँ अपनी जिम्मेदारियों में व्यस्त हो गयीं।* *उसके बाद उनकी रुचियाँ, मित्र-मंडलियाँ और जिंदगी अलग पटरी पर चलने लगीं।* *अपने घर में मैं और मेरी पत्नी ही रह गए।* *वक्त बीतता रहा।* *नौकरी का भी अंत आ गया।* *साथी-सहयोगी और प्रतिद्वंद्वी मुझे बहुत जल्दी भूल गए।* *जो मालिक कभी छुट्टी मांगने पर मेरी मौजूदगी को कम्पनी के लिए जीने-मरने का सवाल बताता था, वह मुझे यूं भूल गया जैसे मैं कभी वहाँ काम करता ही नहीं था।* *एक चीज़ कभी नहीं बदली- मेरे मुठ्ठी-भर पुराने दोस्त।* *मेरी दोस्ती न तो कभी बूढ़ी हुई न ही रिटायर।* *आज भी जब मैं अपने दोस्तों के साथ होता हूँ, लगता है अभी तो मैं जवान हूँ और मुझे अभी बहुत साल और ज़िंदा रहना चाहिए।* *सच्चे दोस्त जिन्दगी की ज़रुरत हैं, कम ही सही कुछ दोस्तों का साथ हमेशा रखिये।* *वे कितने भी अटपटे, गैरजिम्मेदार, बेहूदे और कम अक्ल क्यों ना हों, ज़िन्दगी के खराब वक्त में उनसे बड़ा योद्धा और चिकित्सक मिलना नामुमकिन है।* *अच्छा दोस्त दूर हो चाहे पास हो, आपके दिल में धड़कता है।* *सच्चे दोस्त उम्र भर साथ रखिये और हर कीमत पर दोस्ती बचाइये।* *ये बचत उम्र-भर आपके काम आयेगी,,,!!!*

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🌷6.1.90🌷 *होलीहंस की परिभाषा* *🧘‍♂️योग का प्रयोग*🧘‍♀️ होली हंस की स्वच्छता अर्थात मन वचन- कर्म -संबंध सर्व में पवित्रता 🧘‍♀️ *तन की स्वच्छता वा पवित्रता की विधि स्मृति* सदा इस तन को आत्मा का मंदिर समझ स्वच्छ रखना है। बाप ने इस देव रूपी मंदिर का ट्रस्टी बनाया है । यह ट्रस्टी पन स्वत ही नष्टमोहा, अर्थात पवित्रता को अपने में लाता है। *😇स्वमान*:: *मैं आत्मा इस देह रूपी मंदिर में हीरे की मूर्ति हूं* । *🧘‍♂️मन की पवित्रता की विधि* *😇स्मृति*:: मनमनाभव का मंत्र को सदा स्मृति में रखना । *डायरेक्शन*👉🏻 मन को मेरे में लगाओ वा विश्व सेवा में लगाओ। *❤️दिल की स्वच्छता की विधि* *🌞स्वयं के पुरुषार्थ की स्वच्छता*- अपने स्व उन्नति अर्थ जो भी पुरुषार्थ है जैसा भी पुरुषार्थ है वह सच्चाई से बाप के आगे रखना। सेवा सच्ची दिल से करना। ब्राह्मण आत्मा का निजी संस्कार ही सेवा है। स्व-धर्म,स्व कर्म है। *👨‍👩‍👧‍👦संबंध में स्वच्छता की विधि*🤝 तीन प्रकार के संबंध में संतुष्टता रूपी स्वच्छता एक ब्राह्मण परिवार दूसरा जिज्ञासु आत्माओं के तीसरा अलौकिक परिवार के तीनों ही संबंध में सारे दिन में स्वयं भी संतुष्ट (मनसे हल्का और खुश रहना) और संबंध में आने वाली दूसरी आत्माओं की संतुष्ट था (दूसरे भी खुश होंगगे) सदा इन बातों में एवररेडी रहना है नहीं तो अलबेला पन का अंश प्रकट हो जाएगा । *इसको कहते हैं होली हंस की स्वच्छता*। 🌷ओम शान्ति🌷 नित याद करो मन से शिव को 🙏

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"ठाकुर जी की होली लीला" ठाकुरजी की ये लीला बडी ही मनमोहक है। नंदलाल ने सुबह ही टेरकंदब पर अपने सभी मित्रों को बुलाया और बरसाना जाने का विचार बनाया इतने में बलरामजी बोले कि - "लाला! फागुन चलर हौ है तू ऐसई जाएगौ तौ गोपी तोए पकड कै बाँध दींगी और खूब गुलाल गुलचा मारंगी।" ठाकुरजी ने मन मे विचार बनाया और सभी मित्रों को बताया। विचार बडा ही सुंदर है। मित्रों का जयकारा लग गया और हर-हर कहते ही ठाकुर जी वहाँ से बरसाने की ओर चल दिए। बड़ा ही मनमोहक दृश्य है शंकर भगवान उनके रूप को देख कर मन ही मन भावुक हो रहे है। उन्हें ऐसा भावुक देख माता पार्वती पूछ रही हैं - प्रभु! आप की नेत्रों में जल कैसे? शंकर भगवान ने बडा ही सुंदर जबाब दिया कि, आज मेरा रूप मेरे जगत-पति ने लिया है तो मुझे आनन्द हो रहा है। सब देवगण उन्हें देख कर आनन्दमय हो रहे हैं। अलख निरंजन सब दुख भंजन, कहते हुए ठाकुर जी बरसाने आ गये। बाघाम्बर ओढ़े, भस्म लपेटे, त्रिपुड़ लगाये। नगर में कौतुहल हो रहा है, अलख पुरुष को देख सब गोपियाँ अपना भविष्य पूछने लगीं। उनके चेले बाबा की जय हो कहने लगे। यह बात ललिता जी के कानों मे पहुँची कि नगर में कैलाश पर्वत से एक जोगी आया है जो कि सब का भविष्य बता रहा है। राधारानी ने अलख पुरुष को महल में बुलवाया और खूब खिलाया पिलाया फिर सब गोपियाँ उन से भविष्य पूछने लगीं। राधा रानी अपना भविष्य पूछने लगीं तो ठाकुर जी हँस कर बोले तेरा पति तो काला है और गौ पालन करता है और तुम से मिलने के नए-नए भेष बनाता है। इतने में राधा-रानी की निगाह उनकी कमर पे पडी तो वे मन ही मन हँसी कमर मे उनकी वंशी है। राधा रानी ने ललिता जी के कान में कहा कि, अलख पुरुष को चेलों सहित घेर लो। ललिता जी ने सब गोपियों को बुलाया और गुलाल अतर अरगजा केसर मंगवा लिया। राधा रानी ने ठाकुरजी की वंशी को निकाल लिया। ठाकुर जी को अपने असली भेष में आया देख सखा भागने लगे। अागे भागे तो देखा की बलराम जी को गोपियों ने पकड रखा है और उनके गुलाल मार रही हैं। यह देख ठाकुर जी भी भागने लगे तो उनको विशाखा जी ने पीछे से पकड़ लिया और फिर खूब जमकर गुलाल मारा। शिव जी, नारायण भगवान और सब देवगण यह देख कर कह रहे है कि, धन्य धन्य ब्रज की गोपियाँ! "जय हो होरी के रसिया की" "जय जय श्री राधे"

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Rajesh Jain Mar 8, 2021

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Rajesh Jain Mar 8, 2021

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Rajesh Jain Mar 8, 2021

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