. श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली पोस्ट - 150 छोटे हरिदास को स्त्री-दर्शन का दण्ड निष्किंचनस्य भगवद्भजनोन्मुखस्य पारं परं जिगमिषोर्भवसागरस्य। संदर्शनं विषयिणामथ योषितांच हा हन्त ! हन्त ! विषभक्षणतोऽप्यसाधु॥ सचमुच संसार के आदि से सभी महापुरुष एक स्वर से निष्किंचन, भगवद्भक्त अथवा ज्ञाननिष्ठ वैरागी के लिये कामिनी और कांचन- इन दोनों वस्तुओं को विष बताते आये हैं। उन महापुरुषों ने संसार के सभी प्रिय लगने वाले पदार्थों का वर्गीकरण करके समस्त विषय-सुखों का समावेश इन दो ही शब्दों में कर दिया है। जो इन दोनों से बच गया वह इस अगाध समुद्र के परले पार पहुँच गया और जो इनमें फंस गया वह मंझधार में डुबकियां खाता बिलबिलाता रहा। कबीर दास ने क्या सुन्दर कहा है- चलन चलन सब कोइ कहे, बिरला पहुँचे कोय। एक 'कनक' अरु 'कामिनी' घाटी दुरलभ दोय॥ यथार्थ में इन दो घाटियों का पार करना अत्यन्त ही कठिन हैं, इसीलिये महापुरुष स्वयं इनसे पृथक रहकर अपने अनुयायियों को कहकर, लिखकर, प्रसन्न होकर, नाराज होकर तथा भाँति-भाँति से घुमा-फिराकर इन्हीं दो वस्तुओं से पृथक रहने का उपदेश देते हैं। त्याग और वैराग्य के साकार स्वरूप चैतन्य महाप्रभुदेव जी भी अपने विरक्त भक्तों को सदा इनसे बचे रहने का उपदेश करते और स्वयं भी उन पर कड़ी दृष्टि रखते। तभी तो आज त्यागिशिरोमणि श्रीगौर का यश सौरभ दिशा-विदिशाओं में व्याप्त हो रहा है। व्रजभूमि में असंख्यों स्थान महाप्रभु के अनुयायिकों के त्याग-वैराग्य का अभी तक स्मरण दिला रहे हैं। पाठक महात्मा हरिदास जी के नाम से तो परिचित ही होंगे। हरिदास जी वयोवृद्ध थे और सदा नाम-जप ही किया करते थे। इनके अतिरिक्त एक-दूसरे कीर्तनिया हरिदास और थे। वे हरिदास जी से अवस्था में बहुत छोटे थे, गृहत्यागी थे और महाप्रभु को सदा अपने सुमधुर स्वर से संकीर्तन सुनाया करते थे। भक्तों में वे 'छोटे हरिदास' के नाम से प्रसिद्ध थे। वे पुरी में ही प्रभु के पास रहकर भजन-संकीर्तन किया करते थे। प्रभु के समीप बहुत-से विरक्त भक्त पृथक-पृथक स्थानों में रहते थे। वे सभी भक्ति के कारण कभी-कभी प्रभु को अपने स्थान पर बुलाकर भिक्षा कराया करते थे। भक्तवत्सल गौर उनकी प्रसन्नता के निमित्त उनके यहाँ चले आते थे और उनके भोजन की प्रशंसा करते हुए भिक्षा भी पा लेते थे। वहीं पर भगवानाचार्य नाम के एक विरक्त पण्डित निवास करते थे, उनके पिता सतानन्द खां घोर संसारी पुरुष थे, उनके छोटे भाई का नाम थो गोपाल भट्टाचार्य। गोपाल श्री काशी जी से वेदान्त पढ़कर आया था, उसकी बहुत इच्छा थी कि मैं प्रभु को अपना पढ़ा हुआ शारीरकभाष्य सुनाऊं, किन्तु वहाँ तो सब श्री कृष्ण कथा के श्रोता थे। जिसे जगत प्रपंच समझना हो और जीव-ब्रह्म की एकता का निर्णय करना हो, वह वेदान्तभाष्य सुन अथवा पढ़े। जहाँ श्री कृष्ण प्रेम को ही जीवन का एकमात्र ध्येय मानने वाले पुरुष हैं, जहाँ भेदाभेद को अचिन्त्य बताकर उससे उदासीन रहकर श्रीकृष्ण कथा की ही प्रधानता दी जाती है, वहाँ पदार्थों की सिद्धि के प्रसंग को सुनना कोई क्यों पसंद करेगा। अत: स्वरूप गोस्वामी के कहने से वे भट्टाचार्य महाशय अपने वेदान्त ज्ञान को ज्यों-का-त्यों ही लेकर अपने निवास स्थान को लौट गये। आचार्य भगवान जी वहीं पुरी में रह गये। उनकी स्वरूप दामोदर जी से बड़ी घनिष्ठता थी। वे बीच-बीच में कभी-कभी प्रभु का निमन्त्रण करके उन्हें भिक्षा कराया करते थे। जगन्नाथ जी में बने-बनाये पदार्थों का भोग लगता है और भगवान के महाप्रसाद को दुकानदार बेचते भी हैं। किन्तु जो चावल बिना सिद्ध किये कच्चे ही भगवान को अर्पण किये जाते हैं, उन्हें 'प्रसादी' या 'अमानी' अन्न कहते हैं, उस का घर पर ही लोग भात बना लेते हैं। भगवान जी ने घर पर ही प्रभु के लिये भात बनाने का निश्चय किया। पाठकों को सम्भवत: शिखि माहिती का स्मरण होगा, वे श्री जगन्नाथ जी के मन्दिर में हिसाब-किताब लिखने का काम करते थे, उनके मुरारी नाम का एक छोटा भाई और माधवी नाम की एक बहिन थी। दक्षिण की यात्रा से लौटने पर सार्वभौम भट्टाचार्य ने इन तीनों भाई-बहिनों का प्रभु से परिचय कराया था। ये तीनों ही श्रीकृष्ण भक्त थे और परस्पर बड़ा ही स्नेह रखते थे। माधवी दासी परम तपस्विनी और सदाचारिणी थी। इन तीनों का ही महाप्रभु के चरणों में दृढ़ अनुराग था। महाप्रभु माधवी दासी का गणना राधा जी के गणों में करते थे। उन दिनों राधा जी के गणों में साढ़े तीन पात्रों की गणना थी- (1) स्वरूप दामोदर, (2) राय रामानन्द, (3) शिखि माहिती और आधे पात्र में माधवी देवी की गणना थी। इन तीनों का महाप्रभु के प्रति अत्यन्त ही मधुर श्रीमती जी का-सा सरस भाव था। भगवानाचार्य जी ने प्रभु के निमन्त्रण के लिये बहुत बढ़िया महीन शुक्ल चावल लाने के लिये छोटे हरिदास से कहा। छोटे हरिदास जी माधवी दासी के घर में भीतर चले गये और भीतर जाकर उनसे चावल मांगकर ले आये। आचार्य ने विधिपूर्वक चावल बनाये। कई प्रकार के शाक, दाल, पना तथा और भी कई प्रकार की चीजें उन्होंने प्रभु के निमित्त बनायीं। नियत समय पर प्रभु स्वयं आ गये। आचार्य ने इनके पैर धोये और सुन्दर स्वच्छ आसन पर बैठाकर उनके सामने भिक्षा परोसी। सुगन्धि युक्त बढ़िया चावलों को देखकर प्रभु ने पूछा- 'भगवन ! ये ऐसे सुन्दर चावल कहाँ से मंगाये?' सरलता के साथ भगवान जी ने कहा- 'प्रभो ! माधवी देवी के यहाँ से मंगाये हैं। 'सुनते ही महाप्रभु के भाव में एक प्रकार का विचित्र परिवर्तन-सा हो गया। उन्होंने गम्भीरता के साथ पूछा- 'माधवी के यहाँ से लेने कौन गया था? 'उसी प्रकार उन्होंने उत्तर दिया- 'प्रभो ! छोटे हरिदास गये थे।' यह सुनकर महाप्रभु चुप हो गये और मन-ही-मन कुछ सोचने लगे। पता नहीं वे हरिदास जी की किस बात से पहले से ही असन्तुष्ट थे। उनका नाम सुनते ही वे भिक्षा से उदासीन-से हो गये। फिर कुछ सोचकर उन्होंने भगवान के प्रसाद को प्रणाम किया और अनिच्छापूर्वक कुछ थोड़ा-बहुत प्रसाद पा लिया। आज वे प्रसाद पाते समय सदा की भाँति प्रसन्न नहीं दीखते थे, उनके हृदय में किसी गहन विषय पर द्वन्द्व-युद्ध हो रहा था। भिक्षा पाकर वे सीधे अपने स्थान पर आ गये। आते ही उन्होंने अपने निजी सेवक गोविन्द को बुलाया। हाथ जोड़े हुए गोविन्द प्रभु के सम्मुख उपस्थित हुआ। उसे देखते ही प्रभु रोष के स्वर में कुछ दृढ़ता के साथ बोले- 'देखना, आज से छोटा हरिदास हमारे यहाँ कभी न आने पावेगा। यदि उसने भूल में हमारे दरवाजे में प्रवेश किया तो फिर हम बहुत अधिक असन्तुष्ट होंगे। मेरी इस बात का ध्यान रखना और दृढ़ता के साथ इसका पालन करना।' गोविन्द सुनते ही सन्न रह गया। वह प्रभु की इस आज्ञा का कुछ भी अर्थ न समझ सका। धीरे-धीरे वह प्रभु के पास से उठकर स्वरूपगोस्वामी के पास चला गया। उसने सभी वृतान्त उनसे कह सुनाया। सभी प्रभु की इस भीषण आज्ञा को सुनकर चकित हो गये। प्रभु तो ऐसी आज्ञा कभी नहीं देते थे। वे तो पतितों से भी प्रेम करते थे, आज यह बात क्या हुई। वे लोग दौड़े-दौड़े हरिदास के पास गये और उसे सब सुनाकर पूछने लगे- 'तुमने ऐसा कोई अपराध तो नहीं कर डाला जिससे प्रभु इतने क्रुद्ध हो गये? 'इस बात के सुनते ही छोटे हरिदास का मुख सफेद पड़ गया। उसके होश-हवास उड़ गये। अत्यन्त ही दु:ख और पश्चात्ताप के स्वर में उसने कहा- 'और तो मैंने कोई अपराध किया नहीं, हाँ, भगवानाचार्य के कहने से माधवी दासी के घर से मैं थोड़े-से चावलों की भिक्षा अवश्य माँग लाया था।' सभी भक्त समझ गये कि इस बात के अंदर अवश्य ही कोई गुप्त रहस्य है। प्रभु इसी के द्वारा भक्तों को त्याग-वैराग्य की कठोरता समझाना चाहते हैं। सभी मिलकर प्रभु के पास गये और प्रभु के पैर पकड़कर प्रार्थना करने लगे- 'प्रभो ! हरिदास अपने अपराध के लिये हृदय से अत्यन्त ही दु:खी हैं। उन्हें क्षमा मिलनी चाहिये। भविष्य में उनसे ऐसी भूल कभी न होगी। उन्हें दर्शनों से वंचित न रखिये।' प्रभु ने उसी प्रकार कठोरता के स्वर में कहा- 'तुम लोग अब इस सम्बन्ध में मुझसे कुछ भी न कहो। मैं ऐसे आदमी का मुख देखना नहीं चाहता जो वैरागी वेष बनाकर स्त्रियों से सम्भाषण करता है।' अत्यन्त ही दीनता के साथ स्वरूपगोस्वामी ने कहा- 'प्रभो ! उनसे भूल हो गयी, फिर माधवी देवी तो परम साध्वी भगवदभक्ति परायणा देवी हैं, उनके दर्शनों के अपराध के ऊपर इतना कठोर दण्ड न देना चाहिये।' प्रभु ने दृढ़ता के साथ कहा- 'चाहे कोई भी क्यों न हो ! स्त्रियों से बात करने की आदत पड़ना ही विरक्त साधु के लिये ठीक नहीं। शास्त्रों में तो यहाँ तक कहा है कि अपनी सगी माता, बहिन और युवती लड़की से भी एकान्त में बातें न करनी चाहिये। ये इन्द्रियाँ इतनी प्रबल होती हैं कि अच्छे-अच्छे विद्वानों का मन भी अपनी ओर आकर्षित कर लेती हैं।' प्रभु का ऐसा दृढ़ निश्चय देखकर और उनके स्वर में दृढ़ता देखकर फिर किसी को कुछ कहने का साहस नहीं हुआ। हरिदास जी ने जब सुना कि प्रभु किसी भी तरह क्षमा करने के लिये राजी नहीं हैं, तब तो उन्होंने अन्न-जल बिलकुल छोड़ दिया। उन्हें तीन दिन बिना अन्न-जल के हो गये, किन्तु प्रभु अपने निश्चय से तिलभर भी न डिगे। तब तो स्वरूपगोस्वामी जी को बड़ी चिन्ता हुई। प्रभु के पास रहने वाले सभी विरक्त भक्त डरने लगे। उन्होंने नेत्रों से तो क्या मन से भी स्त्रियों का चिन्तन करना त्याग दिया। कुछ विरक्त स्त्रियों से भिक्षा ले आते थे, उन्होंने उनसे भिक्षा लाना ही बन्द कर दिया। स्वरूप गोस्वामी डरते-डरते एकान्त में प्रभु के पास गये। उस समय प्रभु स्वस्थ होकर कुछ सोच रहे थे। स्वरूप जी प्रणाम करके बैठ गये। प्रभु प्रसन्नता पूर्वक उनसे बातें करने लगे। प्रभु को प्रसन्न देखकर धीरे-धीरे स्वरूपगोस्वामी कहने लगे- 'प्रभो ! छोटे हरिदास ने तीन दिन से कुछ नहीं खाया है। उसके ऊपर इतनी अप्रसन्नता क्यों? उसे अपने किये का बहुत दण्ड मिल गया, अब तो उसे क्षमा मिलनी चाहिये।' प्रभु ने अत्यन्त ही स्नेह के साथ विवशता के स्वर में कहा- 'स्वरूप जी ! मैं क्या करूं? मैं स्वयं अपने को समझाने में असमर्थ हूँ। जो पुरुष साधु होकर प्रकृति संसर्ग रखता है और उनसे सम्भाषण करता है, मैं उससे बातें नहीं करना चाहता। देखो, मैं तुम्हें एक अत्यन्त ही रहस्यपूर्ण बात बताता हूँ इसे ध्यानपूर्वक सुनो और सुनकर हृदय में धारण करो, वह यह है - श्रृणु हृदयरहस्यं यत्प्रशस्तं मुनीनां न खलु न खलु योषित्सन्निधि: संनिधेय:। हरति हि हरिणाक्षी क्षिप्रमक्षिक्षुरप्रै: पिहितशमतनुत्रं चित्तमप्युत्तमानाम्॥ मैं तुमसे हृदय के रहस्य को बतलाता हूँ जिसकी ऋषि-मुनियों ने भूरि-भूरि प्रशंसा की है, उसे सुनो; (विरक्त पुरुषों को) स्त्रियों की सन्निधि में नहीं रहना चाहिये, नहीं रहना चाहिये, क्योंकि हरिणी के समान सुन्दर नेत्रों वाली कामिनी अपने तीक्ष्ण कटाक्ष-बाणों से बड़े-बड़े महापुरुषों के चित्त को भी, जो शान्ति के कवच से ढँका हुआ है, शीघ्र ही अपनी ओर खींच लेती है। इसलिये भैया ! मेरे जाने, वह भूखों मर ही क्यों न जाय अब मैं जो निश्चय कर चुका उससे हटूँगा नहीं। 'स्वरूप जी उदास मन से लौट गये। उन्होंने सोचा- 'प्रभु परमानन्दपुरी महाराज का बहुत आदर करते हैं, यदि पुरी उनसे आग्रह करें तो सम्भवतया वे मान भी जाये। 'यह सोचकर वे पुरी महाराज के पास गये। सभी भक्तों के आग्रह करने पर पुरी महाराज प्रभु से जाकर कहने के लिये राजी हो गये। वे अपनी कुटिया में से निकलकर प्रभु के शयन स्थान में गये। पुरी को अपने यहाँ आते देखकर प्रभु उठकर खड़े हो गये और उनकी यथा विधि अभ्यर्चना करके उन्हें बैठने के लिये आसन दिया। बातों-ही-बातों में पुरी जी ने हरिदास का प्रसंग छेड़ दिया और कहने लगे- 'प्रभो ! इन अल्प शक्ति वाले जीवों के साथ ऐसी कड़ाई ठीक नहीं है। बस, बहुत हो गया, अब सबको पता चल गया, अब कोई भूल से भी ऐसा व्यवहार न करेगा। अब आप उसे क्षमा कर दीजिये और अपने पास बुलाकर उसे अन्न-जल ग्रहण करने की आज्ञा दे दीजिये।' पता नहीं प्रभु ने उसका और भी पहले कोई ऐसा निन्द्य आचरण देखा था या उसके बहाने सभी भक्तों को घोर वैराग्य की शिक्षा देना चाहते थे। हमारी समझ में आ ही क्या सकता है ! महाप्रभु पुरी के कहने पर भी राजी नहीं हुए। उन्होंने उसी प्रकार दृढ़ता के स्वर में कहा- 'भगवान ! आप मेरे पूज्य हैं, आपकी उचित-अनुचित सभी प्रकार की आज्ञाओं का पालन करना मैं अपना कर्तव्य समझता हूँ, किन्तु न जाने क्यों, इस बात को मेरा हृदय स्वीकार नहीं करता। आप इस सम्बन्ध में मुझसे कुछ भी न कहें।' पुरी महाराज ने अपने वृद्धपने के सरल भाव से अपना अधिकार-सा दिखाते हुए कहा- 'प्रभो ! ऐसा हठ ठीक नहीं होता, जो हो गया सो हो गया उसके लिये इतनी ग्लानि का क्या काम? सभी अपने स्वभाव से मजबूर हैं।' प्रभु ने कुछ उत्तेजना के साथ निश्चयात्मक स्वर में कहा- 'श्रीपाद ! इसे मैं भी जानता हूँ कि सभी अपने स्वभाव से मजबूर हैं। फिर मैं ही ही इससे कैसे बच सकता हूँ। मैं भी तो ऐसा करने के लिये मजबूर ही हूँ। इसका एक ही उपाय है, आप यहाँ सभी भक्तों को साथ लेकर रहें, मैं अकेला अलालनाथ में जाकर रहूँगा। बस, ऊपर के कामों के निमित्त गोविन्द मेरे साथ वहाँ रहेगा। 'यह कहकर प्रभु ने गोविन्द को जोरों से आवाज दी और आप अपनी चद्दर को उठाकर अलालनाथ की ओर चलने लगे। जल्दी से उठकर पुरी महाराज ने प्रभु को पकड़ा और कहने लगे- 'आप स्वतन्त्र ईश्वर हैं, आपकी माया जानी नहीं जाती। पता नहीं क्या कराना चाहते हैं। अच्छी बात है, जो आपको अच्छा लगे वही कीजिये। मेरा ही यहाँ क्या रखा है? केवल आपके ही कारण मैं यहाँ ठहरा हुआ हूँ। आपके बिना मैं यहाँ रहने ही क्यों लगा? यदि आपने ऐसा निश्चय कर लिया है तो ठीक है। अब मैं इस सम्बन्ध में कभी कुछ न कहूँगा।' यह कहकर पुरी महाराज अपनी कुटिया में चले गये, प्रभु फिर वहीं लेट गये। जब स्वरूपगोस्वामी ने समझ लिया कि प्रभु अब किसी की भी न सुनेंगे तो वे जगदानन्द, भगवानाचार्य, गदाधर गोस्वामी आदि दस-पांच भक्तों के साथ छोटे हरिदास के पास गये और उसे समझाने लगे- 'उपवास करके प्राण गँवाने से क्या लाभ? जीओगे तो भगवन्नाम-जाप करोगे, स्थान पर जाकर न सही, जब प्रभु जगन्नाथ जी के दर्शनों को जाया करें तब दूरसे दर्शन कर लिया करो। उनके होकर उनके दरबार में पड़े रहोगे तो कभी-न-कभी वे प्रसन्न हो ही जायँगे।' कीर्तनिया हरिदास जी की समझ में यह बात आ गयी, उसने भक्तों के आग्रह से अन्न-जल ग्रहण कर लिया। वह नित्यप्रति दर्शनों को मन्दिर जाते समय दूर से दर्शन कर लेता और अपने को अभागा समझता हुआ कैदी की तरह जीवन बिताने लगा। उसे खाना-पीना कुछ भी अच्छा नहीं लगता था, किसी से मिलने की इच्छा नहीं होती थी, गाना-बजाना उसने एकदम छोड़ दिया। सदा वह अपने असद व्यवहार के विषय में ही सोचता रहता। होते-होते उसे संसार से एकदम वैराग्य हो गया। ऐसा प्रभुकृपाशून्य जीवन बीताना उसे भार-सा प्रतीत होने लगा। अब उसे भक्तों के सामने मुख दिखाने में भी लज्जा होने लगी। इसलिये उसने इस जीवन का अन्त करने का दृढ़ निश्चय कर लिया। श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव! ----------:::×:::---------- - प्रभुदत्त ब्रह्मचारी श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली (123) गीताप्रेस (गोरखपुर) "जय जय श्री राधे" "कुमार रौनक कश्यप " *******************************************

.                      श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली
                               पोस्ट - 150

              छोटे हरिदास को स्त्री-दर्शन का दण्ड

          निष्किंचनस्य  भगवद्भजनोन्मुखस्य
          पारं    परं    जिगमिषोर्भवसागरस्य।
          संदर्शनं  विषयिणामथ योषितांच हा 
          हन्त ! हन्त ! विषभक्षणतोऽप्यसाधु॥

          सचमुच संसार के आदि से सभी महापुरुष एक स्वर से निष्किंचन, भगवद्भक्त अथवा ज्ञाननिष्ठ वैरागी के लिये कामिनी और कांचन- इन दोनों वस्तुओं को विष बताते आये हैं। उन महापुरुषों ने संसार के सभी प्रिय लगने वाले पदार्थों का वर्गीकरण करके समस्त विषय-सुखों का समावेश इन दो ही शब्दों में कर दिया है। जो इन दोनों से बच गया वह इस अगाध समुद्र के परले पार पहुँच गया और जो इनमें फंस गया वह मंझधार में डुबकियां खाता बिलबिलाता रहा। कबीर दास ने क्या सुन्दर कहा है-

          चलन चलन सब कोइ कहे, बिरला पहुँचे कोय।
          एक 'कनक' अरु  'कामिनी' घाटी दुरलभ दोय॥

          यथार्थ में इन दो घाटियों का पार करना अत्यन्त ही कठिन हैं, इसीलिये महापुरुष स्वयं इनसे पृथक रहकर अपने अनुयायियों को कहकर, लिखकर, प्रसन्न होकर, नाराज होकर तथा भाँति-भाँति से घुमा-फिराकर इन्हीं दो वस्तुओं से पृथक रहने का उपदेश देते हैं। त्याग और वैराग्य के साकार स्वरूप चैतन्य महाप्रभुदेव जी भी अपने विरक्त भक्तों को सदा इनसे बचे रहने का उपदेश करते और स्वयं भी उन पर कड़ी दृष्टि रखते। तभी तो आज त्यागिशिरोमणि श्रीगौर का यश सौरभ दिशा-विदिशाओं में व्याप्त हो रहा है। व्रजभूमि में असंख्यों स्थान महाप्रभु के अनुयायिकों के त्याग-वैराग्य का अभी तक स्मरण दिला रहे हैं। 
          पाठक महात्मा हरिदास जी के नाम से तो परिचित ही होंगे। हरिदास जी वयोवृद्ध थे और सदा नाम-जप ही किया करते थे। इनके अतिरिक्त एक-दूसरे कीर्तनिया हरिदास और थे। वे हरिदास जी से अवस्था में बहुत छोटे थे, गृहत्यागी थे और महाप्रभु को सदा अपने सुमधुर स्वर से संकीर्तन सुनाया करते थे। भक्तों में वे 'छोटे हरिदास' के नाम से प्रसिद्ध थे। वे पुरी में ही प्रभु के पास रहकर भजन-संकीर्तन किया करते थे।
          प्रभु के समीप बहुत-से विरक्त भक्त पृथक-पृथक स्थानों में रहते थे। वे सभी भक्ति के कारण कभी-कभी प्रभु को अपने स्थान पर बुलाकर भिक्षा कराया करते थे। भक्तवत्सल गौर उनकी प्रसन्नता के निमित्त उनके यहाँ चले आते थे और उनके भोजन की प्रशंसा करते हुए भिक्षा भी पा लेते थे। वहीं पर भगवानाचार्य नाम के एक विरक्त पण्डित निवास करते थे, उनके पिता सतानन्द खां घोर संसारी पुरुष थे, उनके छोटे भाई का नाम थो गोपाल भट्टाचार्य। गोपाल श्री काशी जी से वेदान्त पढ़कर आया था, उसकी बहुत इच्छा थी कि मैं प्रभु को अपना पढ़ा हुआ शारीरकभाष्य सुनाऊं, किन्तु वहाँ तो सब श्री कृष्ण कथा के श्रोता थे। जिसे जगत प्रपंच समझना हो और जीव-ब्रह्म की एकता का निर्णय करना हो, वह वेदान्तभाष्य सुन अथवा पढ़े। जहाँ श्री कृष्ण प्रेम को ही जीवन का एकमात्र ध्येय मानने वाले पुरुष हैं, जहाँ भेदाभेद को अचिन्त्य बताकर उससे उदासीन रहकर श्रीकृष्ण कथा की ही प्रधानता दी जाती है, वहाँ पदार्थों की सिद्धि के प्रसंग को सुनना कोई क्यों पसंद करेगा। अत: स्वरूप गोस्वामी के कहने से वे भट्टाचार्य महाशय अपने वेदान्त ज्ञान को ज्यों-का-त्यों ही लेकर अपने निवास स्थान को लौट गये। आचार्य भगवान जी वहीं पुरी में रह गये। उनकी स्वरूप दामोदर जी से बड़ी घनिष्ठता थी। वे बीच-बीच में कभी-कभी प्रभु का निमन्त्रण करके उन्हें भिक्षा कराया करते थे।   जगन्नाथ जी में बने-बनाये पदार्थों का भोग लगता है और भगवान के महाप्रसाद को दुकानदार बेचते भी हैं। किन्तु जो चावल बिना सिद्ध किये कच्चे ही भगवान को अर्पण किये जाते हैं, उन्हें 'प्रसादी' या 'अमानी' अन्न कहते हैं, उस का घर पर ही लोग भात बना लेते हैं। भगवान जी ने घर पर ही प्रभु के लिये भात बनाने का निश्चय किया। 
          पाठकों को सम्भवत: शिखि माहिती का स्मरण होगा, वे श्री जगन्नाथ जी के मन्दिर में हिसाब-किताब लिखने का काम करते थे, उनके मुरारी नाम का एक छोटा भाई और माधवी नाम की एक बहिन थी। दक्षिण की यात्रा से लौटने पर सार्वभौम भट्टाचार्य ने इन तीनों भाई-बहिनों का प्रभु से परिचय कराया था। ये तीनों ही श्रीकृष्ण भक्त थे और परस्पर बड़ा ही स्नेह रखते थे। माधवी दासी परम तपस्विनी और सदाचारिणी थी। इन तीनों का ही महाप्रभु के चरणों में दृढ़ अनुराग था। महाप्रभु माधवी दासी का गणना राधा जी के गणों में करते थे। उन दिनों राधा जी के गणों में साढ़े तीन पात्रों की गणना थी- (1) स्वरूप दामोदर, (2) राय रामानन्द, (3) शिखि माहिती और आधे पात्र में माधवी देवी की गणना थी। इन तीनों का महाप्रभु के प्रति अत्यन्त ही मधुर श्रीमती जी का-सा सरस भाव था। 
          भगवानाचार्य जी ने प्रभु के निमन्त्रण के लिये बहुत बढ़िया महीन शुक्ल चावल लाने के लिये छोटे हरिदास से कहा। छोटे हरिदास जी माधवी दासी के घर में भीतर चले गये और भीतर जाकर उनसे चावल मांगकर ले आये। आचार्य ने विधिपूर्वक चावल बनाये। कई प्रकार के शाक, दाल, पना तथा और भी कई प्रकार की चीजें उन्होंने प्रभु के निमित्त बनायीं। नियत समय पर प्रभु स्वयं आ गये। आचार्य ने इनके पैर धोये और सुन्दर स्वच्छ आसन पर बैठाकर उनके सामने भिक्षा परोसी। सुगन्धि युक्त बढ़िया चावलों को देखकर प्रभु ने पूछा- 'भगवन ! ये ऐसे सुन्दर चावल कहाँ से मंगाये?'
          सरलता के साथ भगवान जी ने कहा- 'प्रभो ! माधवी देवी के यहाँ से मंगाये हैं। 
          'सुनते ही महाप्रभु के भाव में एक प्रकार का विचित्र परिवर्तन-सा हो गया। उन्होंने गम्भीरता के साथ पूछा- 'माधवी के यहाँ से लेने कौन गया था? 
          'उसी प्रकार उन्होंने उत्तर दिया- 'प्रभो ! छोटे हरिदास गये थे।'
           यह सुनकर महाप्रभु चुप हो गये और मन-ही-मन कुछ सोचने लगे। पता नहीं वे हरिदास जी की किस बात से पहले से ही असन्तुष्ट थे। उनका नाम सुनते ही वे भिक्षा से उदासीन-से हो गये। फिर कुछ सोचकर उन्होंने भगवान के प्रसाद को प्रणाम किया और अनिच्छापूर्वक कुछ थोड़ा-बहुत प्रसाद पा लिया। आज वे प्रसाद पाते समय सदा की भाँति प्रसन्न नहीं दीखते थे, उनके हृदय में किसी गहन विषय पर द्वन्द्व-युद्ध हो रहा था। भिक्षा पाकर वे सीधे अपने स्थान पर आ गये। आते ही उन्होंने अपने निजी सेवक गोविन्द को बुलाया। हाथ जोड़े हुए गोविन्द प्रभु के सम्मुख उपस्थित हुआ। 
          उसे देखते ही प्रभु रोष के स्वर में कुछ दृढ़ता के साथ बोले- 'देखना, आज से छोटा हरिदास हमारे यहाँ कभी न आने पावेगा। यदि उसने भूल में हमारे दरवाजे में प्रवेश किया तो फिर हम बहुत अधिक असन्तुष्ट होंगे। मेरी इस बात का ध्यान रखना और दृढ़ता के साथ इसका पालन करना।' 
          गोविन्द सुनते ही सन्न रह गया। वह प्रभु की इस आज्ञा का कुछ भी अर्थ न समझ सका। धीरे-धीरे वह प्रभु के पास से उठकर स्वरूपगोस्वामी के पास चला गया। उसने सभी वृतान्त उनसे कह सुनाया। सभी प्रभु की इस भीषण आज्ञा को सुनकर चकित हो गये। प्रभु तो ऐसी आज्ञा कभी नहीं देते थे। वे तो पतितों से भी प्रेम करते थे, आज यह बात क्या हुई। 
          वे लोग दौड़े-दौड़े हरिदास के पास गये और उसे सब सुनाकर पूछने लगे- 'तुमने ऐसा कोई अपराध तो नहीं कर डाला जिससे प्रभु इतने क्रुद्ध हो गये? 'इस बात के सुनते ही छोटे हरिदास का मुख सफेद पड़ गया। उसके होश-हवास उड़ गये। 
          अत्यन्त ही दु:ख और पश्चात्ताप के स्वर में उसने कहा- 'और तो मैंने कोई अपराध किया नहीं, हाँ, भगवानाचार्य के कहने से माधवी दासी के घर से मैं थोड़े-से चावलों की भिक्षा अवश्य माँग लाया था।'
          सभी भक्त समझ गये कि इस बात के अंदर अवश्य ही कोई गुप्त रहस्य है। प्रभु इसी के द्वारा भक्तों को त्याग-वैराग्य की कठोरता समझाना चाहते हैं। सभी मिलकर प्रभु के पास गये और प्रभु के पैर पकड़कर प्रार्थना करने लगे- 'प्रभो ! हरिदास अपने अपराध के लिये हृदय से अत्यन्त ही दु:खी हैं। उन्हें क्षमा मिलनी चाहिये। भविष्य में उनसे ऐसी भूल कभी न होगी। उन्हें दर्शनों से वंचित न रखिये।'
          प्रभु ने उसी प्रकार कठोरता के स्वर में कहा- 'तुम लोग अब इस सम्बन्ध में मुझसे कुछ भी न कहो। मैं ऐसे आदमी का मुख देखना नहीं चाहता जो वैरागी वेष बनाकर स्त्रियों से सम्भाषण करता है।'   अत्यन्त ही दीनता के साथ स्वरूपगोस्वामी ने कहा- 'प्रभो ! उनसे भूल हो गयी, फिर माधवी देवी तो परम साध्वी भगवदभक्ति परायणा देवी हैं, उनके दर्शनों के अपराध के ऊपर इतना कठोर दण्ड न देना चाहिये।'
          प्रभु ने दृढ़ता के साथ कहा- 'चाहे कोई भी क्यों न हो ! स्त्रियों से बात करने की आदत पड़ना ही विरक्त साधु के लिये ठीक नहीं। शास्त्रों में तो यहाँ तक कहा है कि अपनी सगी माता, बहिन और युवती लड़की से भी एकान्त में बातें न करनी चाहिये। ये इन्द्रियाँ इतनी प्रबल होती हैं कि अच्छे-अच्छे विद्वानों का मन भी अपनी ओर आकर्षित कर लेती हैं।' प्रभु का ऐसा दृढ़ निश्चय देखकर और उनके स्वर में दृढ़ता देखकर फिर किसी को कुछ कहने का साहस नहीं हुआ।
          हरिदास जी ने जब सुना कि प्रभु किसी भी तरह क्षमा करने के लिये राजी नहीं हैं, तब तो उन्होंने अन्न-जल बिलकुल छोड़ दिया। उन्हें तीन दिन बिना अन्न-जल के हो गये, किन्तु प्रभु अपने निश्चय से तिलभर भी न डिगे। तब तो स्वरूपगोस्वामी जी को बड़ी चिन्ता हुई। प्रभु के पास रहने वाले सभी विरक्त भक्त डरने लगे। उन्होंने नेत्रों से तो क्या मन से भी स्त्रियों का चिन्तन करना त्याग दिया। कुछ विरक्त स्त्रियों से भिक्षा ले आते थे, उन्होंने उनसे भिक्षा लाना ही बन्द कर दिया। स्वरूप गोस्वामी डरते-डरते एकान्त में प्रभु के पास गये। उस समय प्रभु स्वस्थ होकर कुछ सोच रहे थे। स्वरूप जी प्रणाम करके बैठ गये। प्रभु प्रसन्नता पूर्वक उनसे बातें करने लगे। प्रभु को प्रसन्न देखकर धीरे-धीरे स्वरूपगोस्वामी कहने लगे- 'प्रभो ! छोटे हरिदास ने तीन दिन से कुछ नहीं खाया है। उसके ऊपर इतनी अप्रसन्नता क्यों? उसे अपने किये का बहुत दण्ड मिल गया, अब तो उसे क्षमा मिलनी चाहिये।'
          प्रभु ने अत्यन्त ही स्नेह के साथ विवशता के स्वर में कहा- 'स्वरूप जी ! मैं क्या करूं? मैं स्वयं अपने को समझाने में असमर्थ हूँ। जो पुरुष साधु होकर प्रकृति संसर्ग रखता है और उनसे सम्भाषण करता है, मैं उससे बातें नहीं करना चाहता। देखो, मैं तुम्हें एक अत्यन्त ही रहस्यपूर्ण बात बताता हूँ इसे ध्यानपूर्वक सुनो और सुनकर हृदय में धारण करो, वह यह है -

          श्रृणु   हृदयरहस्यं    यत्प्रशस्तं   मुनीनां 
          न खलु न खलु योषित्सन्निधि: संनिधेय:।
          हरति   हि   हरिणाक्षी   क्षिप्रमक्षिक्षुरप्रै: 
          पिहितशमतनुत्रं      चित्तमप्युत्तमानाम्॥

          मैं तुमसे हृदय के रहस्य को बतलाता हूँ जिसकी ऋषि-मुनियों ने भूरि-भूरि प्रशंसा की है, उसे सुनो; (विरक्त पुरुषों को) स्त्रियों की सन्निधि में नहीं रहना चाहिये, नहीं रहना चाहिये, क्योंकि हरिणी के समान सुन्दर नेत्रों वाली कामिनी अपने तीक्ष्ण कटाक्ष-बाणों से बड़े-बड़े महापुरुषों के चित्त को भी, जो शान्ति के कवच से ढँका हुआ है, शीघ्र ही अपनी ओर खींच लेती है। इसलिये भैया ! मेरे जाने, वह भूखों मर ही क्यों न जाय अब मैं जो निश्चय कर चुका उससे हटूँगा नहीं। 'स्वरूप जी उदास मन से लौट गये। 
          उन्होंने सोचा- 'प्रभु परमानन्दपुरी महाराज का बहुत आदर करते हैं, यदि पुरी उनसे आग्रह करें तो सम्भवतया वे मान भी जाये। 'यह सोचकर वे पुरी महाराज के पास गये। सभी भक्तों के आग्रह करने पर पुरी महाराज प्रभु से जाकर कहने के लिये राजी हो गये। वे अपनी कुटिया में से निकलकर प्रभु के शयन स्थान में गये। पुरी को अपने यहाँ आते देखकर प्रभु उठकर खड़े हो गये और उनकी यथा विधि अभ्यर्चना करके उन्हें बैठने के लिये आसन दिया। बातों-ही-बातों में पुरी जी ने हरिदास का प्रसंग छेड़ दिया और कहने लगे- 'प्रभो ! इन अल्प शक्ति वाले जीवों के साथ ऐसी कड़ाई ठीक नहीं है। बस, बहुत हो गया, अब सबको पता चल गया, अब कोई भूल से भी ऐसा व्यवहार न करेगा। अब आप उसे क्षमा कर दीजिये और अपने पास बुलाकर उसे अन्न-जल ग्रहण करने की आज्ञा दे दीजिये।'
          पता नहीं प्रभु ने उसका और भी पहले कोई ऐसा निन्द्य आचरण देखा था या उसके बहाने सभी भक्तों को घोर वैराग्य की शिक्षा देना चाहते थे। हमारी समझ में आ ही क्या सकता है ! महाप्रभु पुरी के कहने पर भी राजी नहीं हुए। उन्होंने उसी प्रकार दृढ़ता के स्वर में कहा- 'भगवान ! आप मेरे पूज्य हैं, आपकी उचित-अनुचित सभी प्रकार की आज्ञाओं का पालन करना मैं अपना कर्तव्य समझता हूँ, किन्तु न जाने क्यों, इस बात को मेरा हृदय स्वीकार नहीं करता। आप इस सम्बन्ध में मुझसे कुछ भी न कहें।' 
          पुरी महाराज ने अपने वृद्धपने के सरल भाव से अपना अधिकार-सा दिखाते हुए कहा- 'प्रभो ! ऐसा हठ ठीक नहीं होता, जो हो गया सो हो गया उसके लिये इतनी ग्लानि का क्या काम? सभी अपने स्वभाव से मजबूर हैं।'
          प्रभु ने कुछ उत्तेजना के साथ निश्चयात्मक स्वर में कहा- 'श्रीपाद ! इसे मैं भी जानता हूँ कि सभी अपने स्वभाव से मजबूर हैं। फिर मैं ही ही इससे कैसे बच सकता हूँ। मैं भी तो ऐसा करने के लिये मजबूर ही हूँ। इसका एक ही उपाय है, आप यहाँ सभी भक्तों को साथ लेकर रहें, मैं अकेला अलालनाथ में जाकर रहूँगा। बस, ऊपर के कामों के निमित्त गोविन्द मेरे साथ वहाँ रहेगा। 'यह कहकर प्रभु ने गोविन्द को जोरों से आवाज दी और आप अपनी चद्दर को उठाकर अलालनाथ की ओर चलने लगे। जल्दी से उठकर पुरी महाराज ने प्रभु को पकड़ा और कहने लगे- 'आप स्वतन्त्र ईश्वर हैं, आपकी माया जानी नहीं जाती। पता नहीं क्या कराना चाहते हैं। अच्छी बात है, जो आपको अच्छा लगे वही कीजिये। मेरा ही यहाँ क्या रखा है? केवल आपके ही कारण मैं यहाँ ठहरा हुआ हूँ। आपके बिना मैं यहाँ रहने ही क्यों लगा? यदि आपने ऐसा निश्चय कर लिया है तो ठीक है। अब मैं इस सम्बन्ध में कभी कुछ न कहूँगा।' यह कहकर पुरी महाराज अपनी कुटिया में चले गये, प्रभु फिर वहीं लेट गये। 
          जब स्वरूपगोस्वामी ने समझ लिया कि प्रभु अब किसी की भी न सुनेंगे तो वे जगदानन्द, भगवानाचार्य, गदाधर गोस्वामी आदि दस-पांच भक्तों के साथ छोटे हरिदास के पास गये और उसे समझाने लगे- 'उपवास करके प्राण गँवाने से क्या लाभ? जीओगे तो भगवन्नाम-जाप करोगे, स्थान पर जाकर न सही, जब प्रभु जगन्नाथ जी के दर्शनों को जाया करें तब दूरसे दर्शन कर लिया करो। उनके होकर उनके दरबार में पड़े रहोगे तो कभी-न-कभी वे प्रसन्न हो ही जायँगे।'
          कीर्तनिया हरिदास जी की समझ में यह बात आ गयी, उसने भक्तों के आग्रह से अन्न-जल ग्रहण कर लिया। वह नित्यप्रति दर्शनों को मन्दिर जाते समय दूर से दर्शन कर लेता और अपने को अभागा समझता हुआ कैदी की तरह जीवन बिताने लगा। उसे खाना-पीना कुछ भी अच्छा नहीं लगता था, किसी से मिलने की इच्छा नहीं होती थी, गाना-बजाना उसने एकदम छोड़ दिया। सदा वह अपने असद व्यवहार के विषय में ही सोचता रहता। होते-होते उसे संसार से एकदम वैराग्य हो गया। ऐसा प्रभुकृपाशून्य जीवन बीताना उसे भार-सा प्रतीत होने लगा। अब उसे भक्तों के सामने मुख दिखाने में भी लज्जा होने लगी। इसलिये उसने इस जीवन का अन्त करने का दृढ़ निश्चय कर लिया।
    श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव!
                      ----------:::×:::---------- 
                                                - प्रभुदत्त ब्रह्मचारी
                              श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली (123)
                                             गीताप्रेस (गोरखपुर)

                       "जय जय श्री राधे"
                   "कुमार रौनक कश्यप "
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sukhadev awari May 16, 2021

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क्या यह आधुनिक तकनीकों वाला युग नींव खोदे बिना एक गगनचुंबी इमारत के निर्माण की कल्पना कर सकता है ? यह तमिलनाडु का बृहदेश्वर मंदिर है, यह बिना नींव का मंदिर है । इसे इंटरलॉकिंग विधि का उपयोग करके बनाया गया है इसके निर्माण में पत्थरों के बीच कोई सीमेंट, प्लास्टर या किसी भी तरह के चिपकने वाले पदार्थों का प्रयोग नहीं किया गया है इसके बावजूद पिछले 1000 वर्षों में 6 बड़े भूकंपो को झेलकर भी आज अपने मूल स्वरूप में है । 216 फीट ऊंचा यह मंदिर उस समय दुनिया का सबसे ऊंचा मंदिर था। इसके निर्माण के कई वर्षों बाद बनी पीसा की मीनार खराब इंजीनियरिंग की वजह से समय के साथ झुक रही है लेकिन बृहदेश्वर मंदिर पीसा की मीनार से भी प्राचीन होने के बाद भी अपने अक्ष पर एक भी अंश का झुकाव नहीं रखता । इस मंदिर के निर्माण के लिए 1.3 लाख टन ग्रेनाइट का उपयोग किया गया था जिसे 60 किलोमीटर दूर से 3000 हाथियों द्वारा ले जाया गया था। इस मंदिर का निर्माण पृथ्वी को खोदे बिना किया गया था यानी यह मंदिर बिना नींव का मंदिर है । मंदिर टॉवर के शीर्ष पर स्थित शिखर का वजन 81 टन है आज के समय में इतनी ऊंचाई पर 81 टन वजनी पत्थर को उठाने के लिए आधुनिक मशीनें फेल हो जाएंगी । बृहदीश्वर मंदिर के निर्माण के लिए प्रयोग किए गए इंजीनियरिंग के स्तर को दुनिया के सात आश्चर्यों में से किसी भी आश्चर्य के निर्माण की तकनीक मुकाबला नहीं कर सकती और आज की तकनीकों को देखकर भविष्य में भी कई सदियों तक ऐसा निर्माण सम्भव नहीं दिखता है ।

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Tanu May 16, 2021

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Tanu May 16, 2021

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. "मीरा चरित" (पोस्ट-019) माँ ने मीरा से जब पूछा कि बेटी मायके से कुछ और चाहिए तो बता - तो मीरा ने कहा, "बस माँ मेरे ठाकुर जी दे दो। मुझे और किसी भी वस्तु की इच्छा नहीं है।" "ठाकुर जी को भले ही ले जा बेटा, पर उनके पीछे पगली होकर अपना कर्तव्य न भूल जाना। देख, इतने गुणवान और भद्र पति मिले हैं। सदा उनकी आज्ञा में रहकर ससुराल में सबकी सेवा करना" माँ ने कहा। बहनों ने मिल कर मीरा को पालकी में बिठाया। मंगला ने सिंहासन सहित गिरधरलाल को उसके हाथ में दे दिया। दहेज की बेशुमार सामग्री के साथ ठाकुर जी की भी पोशाकें और श्रृंगार सब सेवा का ताम-झाम भी साथ चला। वस्त्राभूषण से लदी एक सौ एक दासियाँ साथ गई। बड़ी धूमधाम से बारात चित्तौड़ पहुँची। राजपथ की शोभा देखते ही बनती थी। वाद्यों की मंगल ध्वनि में मीरा ने महल में प्रवेश किया। सब रीति-रिवाज सुन्दर ढंग से सहर्ष सम्पन्न हुये। देर सन्धया गये मीरा को उसके महल में पहुँचाया गया। मिथुला, चम्पा की सहायता से उसने गिरधरलाल को एक कक्ष में पधराया। भोग, आरती करके शयन से पूर्व वह ठाकुर के लिए गाने लगी.......... होता जाजो राज म्हाँरे महलाँ, होता जाजो राज। मैं औगुणी मेरा साहिब सौ गुणा, संत सँवारे काज। मीरा के प्रभु मन्दिर पधारो, करके केसरिया साज। मीरा के मधुर कण्ठ की मिठास सम्पूर्ण कक्ष में घुल गई। भोजराज ने शयन कक्ष में साफा उतारकर रखा ही था कि मधुर रागिनी ने कानों को स्पर्श किया। वे अभिमन्त्रित नाग से उस ओर चल दिये। वहाँ पहुँचकर उनकी आँखें मीरा के मुख-कंज की भ्रमर हो अटकी। भजन पूरा हुआ तो उन्हें चेत आया। प्रभु को दूर से प्रणाम कर वह लौट आये। अगले दिन मीरा की मुँह दिखाई और कई रस्में हुईं। पर मीरा सुबह से ही अपने ठाकुर जी की रागसेवा में लग जाती। अवश्य ही अब इसमें भोजराज की परिचर्या एवं समय पर सासुओं की चरण-वन्दना भी समाहित हो गई। नई दुल्हन के गाने की चर्चा महलों से निकल कर महाराणा के पास पहुँची। उनकी छोटी सास कर्मावती ने महाराणा से कहा, "यों तो बीणनी से गाने को कहे तो कहती है मुझे नहीं आता और उस पीतल की मूर्ति के समक्ष बाबाओं की तरह गाती है।" "महाराणा ने कहा, "वह हमें नहीं तीनों लोकों के स्वामी को रिझाने के लिए नाचती-गाती है। मैंने सुना है कि जब वह गाती है, तब आँखों से सहज ही आँसू बहने लगते हैं। जी चाहता है, ऐसी प्रेममूर्ति के दर्शन मैं भी कर पाता।" "हम बहुत भाग्यशाली हैं जो हमें ऐसी बहू प्राप्त हुई। पर अगर ऐसी भक्ति ही करनी थी तो फिर विवाह क्यों किया ? बहू भक्ति करेगी तो महाराज कुमार का क्या ?" "युवराज चाहें तो एक क्या दस विवाह कर सकते हैं। उन्हें क्या पत्नियों की कमी है ? पर इस सुख में क्या धरा है ? यदि कुमार में थोड़ी सी भी बुद्धि होगी तो वह बीनणी से शिक्षा ले अपना जीवन सुधार लेंगे। - पुस्तक- "मीरा चरित" लेखिका:- आदरणीय सौभाग्य कुँवरी राणावत ~~~०~~~ "जय जय श्री राधे" "कुमार रौनक कश्यप " *************************************************

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. "मीरा चरित" (पोस्ट-020) मीरा को चित्तौड़ में आये कुछ मास बीत गये। गिरधर की रागसेवा नियमित चल रही है। मीरा अपने कक्ष में बैठे गिरधरलाल की पोशाक पर मोती टाँक रही थी। कुछ ही दूरी पर मसनद के सहारे भोजराज बैठे थे। "सुना है आपने योग की शिक्षा ली है। ज्ञान और भक्ति दोनों ही आपके लिए सहज है। यदि थोड़ी-बहुत शिक्षा सेवक भी प्राप्त हो तो यह जीवन सफल हो जाये।" भोजराज ने मीरा से कहा। ऐसा सुनकर मुस्कुरा कर भोजराज की तरफ देखती हुई मीरा बोली, "यह क्या फरमाते हैं आप ? चाकर तो मैं हूँ। प्रभु ने कृपा की कि आप मिले। कोई दूसरा होता तो अब तक मीरा की चिता की राख भी नहीं रहती। चाकर आप और मैं, दोनों ही गिरधरलाल के हैं।" "भक्ति और योग में से कौन श्रेष्ठ है ?" भोजराज ने पूछा। "देखिये, दोनों ही अध्यात्म के स्वतन्त्र मार्ग हैं। पर मुझे योग में ध्यान लगा कर परमानन्द प्राप्त करने से अधिक रूचिकर अपने प्राण-सखा की सेवा लगी।" "तो क्या भक्ति में, सेवा में योग से अधिक आनन्द है ?" "यह तो अपनी रूचि की बात है, अन्यथा सभी भक्त ही होते संसार में। योगी ढूँढे भी न मिलते कहीं।" "मुझे एक बात अर्ज करनी थी आपसे" मीरा ने कहा। "एक क्यों, दस कहिये। भोजराज बोले। "आप जगत-व्यवहार और वंश चलाने के लिए दूसरा विवाह कर लीजिए।" "बात तो सच है आपकी, किन्तु सभी लोग सब काम नहीं कर सकते। उस दिन श्याम कुन्ज में ही मेरी इच्छा आपके चरणों की चेरी बन गई थी। आप छोड़िए इन बातों में क्या रखा है ? यदि इनमें थोड़ा भी दम होता तो ............ "। बात अधूरी छोड़ कर वे मीरा की ओर देख मुस्कुराये। "रूप और यौवन का यह कल्पवृक्ष चित्तौड़ के राजकुवंर को छोड़कर इस मूर्ति पर न्यौछावर नहीं होता और भोज शक्ति और इच्छा का दमन कर इन चरणों का चाकर बनने में अपना गौरव नहीं मानता। जाने दीजिये - आप तो मेरे कल्याण का सोचिए। लोग कहते हैं - ईश्वर निर्गुण निराकार है। इन स्थूल आँखों से नहीं देखा जा सकता, मात्र अनुभव किया जा सकता है। सच क्या है, समझ नहीं पाया।" "वह निर्गुण निराकार भी है और सगुण साकार भी।" मीरा ने गम्भीर स्वर में कहा -"निर्गुण रूप में वह आकाश, प्रकाश की भांति है जो चेतन रूप से सृष्टि में व्याप्त है। वह सदा एकरस है। उसे अनुभव तो कर सकते हैं, पर देख नहीं सकते। और ईश्वर सगुण साकार भी है। यह मात्र प्रेम से बस में होता है, रूष्ट और तुष्ट भी होता है। ह्रदय की पुकार भी सुनता है और दर्शन भी देता है।" मीरा को एकाएक कहते-कहते रोमांच हुआ। यह देख भोजराज थोड़े चकित हुए। उन्होने कहा, "भगवान के बहुत नाम - रूप सुने जाते हैं। नाम - रूपों के इस विवरण में मनुष्य भटक नहीं जाता ?" "भटकने वालों को बहानों की कमी नहीं रहती। भटकाव से बचना हो तो सीधा उपाय है कि जो नाम - रूप स्वयं को अच्छा लगे, उसे पकड़ ले और छोड़े नहीं। दूसरे नाम-रूप को भी सम्मान दें। क्योंकि सभी ग्रंथ, सभी सम्प्रदाय उस एक ईश्वर तक ही पहुँचने का पथ सुझाते हैं। मन में अगर दृढ़ विश्वास हो तो उपासना फल देती है।" - पुस्तक- "मीरा चरित" लेखिका:- आदरणीय सौभाग्य कुँवरी राणावत ~~~०~~~ "जय जय श्री राधे" "कुमार रौनक कश्यप " *************************************************

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. "दण्डी स्वामी श्रीकेवलाश्रमजी महाराज" दण्डी स्वामी श्रीकेवलाश्रमजी का जन्म एक अति निर्धन ब्राह्मण-परिवार में कुरुक्षेत्र भूमि के अन्तर्गत जिला जीन्द में रामहृद (रामराय) में हुआ था। वे बाल ब्रह्मचारी और बहुत कम पढ़े-लिखे थे, परंतु संतों के मुख से सुने शास्त्रों पर विश्वास करते थे। ब्रह्मचारी जीवन उन्होंने अपने जन्म-स्थान रामराय में ही माता कृष्णा देवी के आश्रम में बिताया। माताजी के देह त्याग देने के बाद उनको कृष्णाधाम आश्रम रामराय जिला जीन्द हरियाणा की गद्दी पर बिठा दिया गया, परंतु मात्र एक माह के बाद ही वे रात को आश्रम को छोड़ ऋषिकेश में आकर संन्यास लेकर मौन धारण करके रहने लगे। आश्रम के लोग ढूँढ़ते रहे। हरिद्वार में भी उनका कृष्णाधाम आश्रम 'खड़खड़ी' के नाम से प्रसिद्ध है। वहाँ पर उन्होंने देवीस्वरूप शास्त्रीजी को प्रबन्धक बनाया था। शास्त्रीजी ने उनको ढूँढ़ लिया तथा उनसे आग्रह किया, जैसे आप ऋषिकेश में रह रहे हैं, वैसे ही आप अपने आश्रम में रहिये। इसपर वे हरिद्वार आ गये। दुर्भाग्य से देवीस्वरूप शास्त्रीजी का निधन हो गया। शास्त्रीजी के निधन के बाद आश्रम को स्वामी केवलाश्रमजी महाराज को सँभालना पड़ा। वे नित्य-प्रति गंगा-स्नान करते थे। आश्रम के अधिष्ठाता होते हुए भी भिक्षा करके भोजन करते थे। उत्तरी हरिद्वार में उस समय पशु-अस्पताल नहीं था। जिस किसी आश्रम की गाय बीमार हो जाती, वे लोग स्वामीजी को बुलाकर ले जाते। वे गाय के स्वस्थ होने की दवाई एवं टोटके जानते थे। कोई भी व्यक्ति बीमार गाय के उपचार के लिये उन्हें बुलाने आता तो वे भजन छोड़कर तुरन्त उसके साथ चले जाते। एक दिन मैंने कहा, भजन करने के बाद चले जाना। उन्होंने कहा गोसेवा भी भजन ही है। वे आश्रम की गाय स्वयं चराने जाते थे। एक दिन उनको साँप ने काट लिया। आकर कहने लगे साँप ने मुँह लगा दिया। साँप का दोष नहीं था। मेरा ध्यान गाय की तरफ था। मेरा पैर साँप पर पड़ गया। हमने कहा, अस्पताल चलो। जहाँ सर्प ने काटा था, वहाँ नीला एवं बहुत बड़ा निशान पड़ गया था। कहा-ठीक हो जायगा। चिन्ता ना करो, बहुत आग्रह करने पर भी अस्पताल नहीं गये। कहने लगे, 'अभी मेरी मृत्यु नहीं है। तुम चिन्ता न करो'। कभी भी हमने उनको क्रोध आदि करते हुए नहीं देखा। गंगा-स्नान, गो-सेवा, भजन उनके नित्य के कार्य थे। आश्रम में अनेक दण्डी स्वामी महात्मा रहते थे। उनमें बहुत-से अतिवृद्ध महात्मा भी थे। वे उनकी नित्य-प्रति स्वयं सेवा करते थे। बीमार होने पर सभी महात्माओं की स्वयं सेवा करते थे। वर्ष १९८७ में श्रीस्वामीजी हरियाणा गये थे। वहाँ एक पागल कुत्ते ने काट लिया। उनको अस्पताल लेकर में गये, वहाँ पर संयोग से कुत्ते के काटने के उपचार सम्बन्धी इंजेक्शन नहीं मिले। दुबारा बहुत प्रयास किया गया, पर वे अस्पताल नहीं गये। कहा-यदि प्रभु चाहते तो मैं अस्पताल गया था। इंजेक्शन मिल जाता, उनकी अब यही इच्छा है। वे जीवन में बीमार पड़ते तो कभी दवाई नहीं लेते। अपने-आप ही काढ़ा आदि बनाकर पी लेते थे। दवाई कभी नहीं ली। महीनों के बाद मैं हरियाणा से आया था। जैसे मेरी आवाज सुनी, कमरे से बाहर आकर कहने लगे-भाई, आज जितनी दवाई देनी है, दे दे। जिस डॉक्टर को दिखाना हो दिखा ले। नहीं तो कहेगा कि स्वामीजी को दवाई दिला देते तो बच जाते। अब तू अपने मन की कर ले। उस समय आश्रम में गाड़ी नहीं थी। हम टैम्पो करके उनको जी०डी० अस्पताल में ले गये। डॉक्टर ने देखते ही कह दिया पागल कुत्ते के काटने से होने वाली बीमारी हो गयी है। अब ये बच नहीं सकते। हम वापस आश्रम में ले आये और सबसे पीछे के कमरे में लिटा दिया। सभी आश्रम वाले पता लगते ही आ गये। उनके प्रति सभी लोग श्रद्धा रखते थे। तीन-चार आश्रमवालों ने अपने स्तर से तीन-चार डॉक्टर, जो उस समय बहुत प्रसिद्ध थे, बुला लिये। सभी डॉक्टरों ने एक मत से कहा ये ७२ घण्टे तड़पेगे, दीवारों पर सिर पारेंगे, काटने दौड़ेंगे, जिसको भी इनके नाखून लार या दाँत लगा जायगा, वे भी ऐसे ही मरेंगे। अतः तुरन्त इनको जी०डी० अस्पतालय दाखिल कराओ। जब डॉक्टर लोग इस प्रकार की बात कर रहे थे, तो श्रीस्वामी जी ने एक छात्र को भेजकर मुझे बुलवाया तथा कहा- भाई, इन डॉक्टरों की बातों में नहीं आना, मेरे कारण आश्रय में कोई हानि नहीं होगी। मुझे सायं ०५ बजे तक जीना है। अगर तेरा दिल मानता है तो मुझको आश्रय में ही मरने दें, नहीं तो मेरे को गंगाजी के किनारे डाल दो। अस्पताल नहीं भेजना। वे मात्र 'ओम् ओम् ' बोल रहे थे। जब उनको बहुत अधिक कष्ट होता था तो 'ओम् ओम्' करके दीवार की तरफ मुख कर लेते, फिर दर्द कम होते ही 'ओम-ओम' करके मुँह इधर कर लेते। डॉक्टरों ने कहा था कि पानी देखते ही बेहोश हो जायेंगे, परंतु उन्होंने एक कमण्डलु गंगाजल पीया उसी दिन परम पूज्य शंकराचार्य दण्डी स्वामी माधवाश्रमजी महाराज हरिद्वार में भागवत की कथा कर रहे थे। वे भी इनके अन्तिम दर्शनों के लिये आये और उन्होंने कथा में कह दिया ओ समाज के लोगों! अगर तुम्हें भजन का प्रभाव देखना है तो कृष्णाधाम आश्रम खड़खड़ी हरिद्वार में चले जाओ। अगर ये बीमारी तुम किसी को भी होती तो तड़पते, रोते, बिलखते, परंतु एक सन्त इस बीमारी से संघर्ष कर रहे हैं। सिवाय 'ओम्' के एक शब्द नहीं बोल रहे। शंकराचार्यजी के इतना कहने के बाद कृष्णाधाम में मेला लग गया। हजारों लोग आते उनके दर्शन करके चले जाते, उनका कमरा अन्तिम समय तक खुला रहा। दो महात्मा उनकी सेवा के लिये उनके पास रहे, जो लोग आ रहे थे। उनके पैर छूकर जाते, उनसे किसी को भय नहीं लगा और ना ही वे 'ओम् ओम् के सिवाय कुछ बोले और उन्होंने आने-जाने वालो का ध्यान भी नहीं किया। उस समय मेरठ से पं० फूलचन्दजी आये हुए थे। उनको बुलाकर कहने लगे पण्डितजी मुहूर्त देखो। पण्डितजी ने कहा-किसी विषय का मुहूर्त देखूँ ? कहने लगे, मेरा मुहूर्त तो ५ बजे का है। इससे पहले मरने का मुहूर्त बनता हो तो मैं पहले चला जाऊँ। जागेराम शास्त्री बहुत दुखी हो रहा है। पण्डितजी कुछ नहीं बोले, रोने लग गये, ठीक ५ बजे एक सन्त आये। वे आकर रोने लगे। स्वामी जी कहने लगे, सन्तजी! क्यों रोते हो, मुझे कहने लगे तेरे आश्रम में सन्तजी आये हैं। इसको दूध पिला। यह कहकर फिर 'ओम ओम' कहने लगे। इतने में सन्त को गेट तक छोड़कर आया। उस समय उनके पास दण्डी स्वामी श्रीमुरारी आश्रम तथा दण्डी स्वामी श्रीरामानन्द आश्रम सेवा में थे। स्वामी जी के कहने पर उन्होंने उन्हें नीचे आसन बिछाकर बैठाया। पद्मासन उन्होंने स्वयं लगा लिया। जब कमण्डलु से उनको गंगाजल पिला रहे थे तब मैंने कहा-नीचे क्यों बैठाया ? अभी मैं पूरा बोल भी नहीं पाया कि उन्होंने 'ओम ओम्' का उच्चारण किया और गंगाजल मुख में लेते ही उन्होंने प्राण छोड़ दिये। स्वामी मुरारी आश्रमजी कहने लगे-ये तो सदा के लिये ही बैठ गये। उस समय तक तीनों डॉक्टर आश्रम में ही थे। डॉक्टरों ने स्वयं कहा कि ये हमारे मेडिकल साइंस के एकदम विपरीत अद्भुत घटना घटी है। एक डॉक्टर बंगाली सिपाहा नाम से थे। कहने लगे-मैंने जीवन में ऐसी घटना कभी नहीं देखी। तीनों डॉक्टरों ने स्वामीजी के शरीर को प्रणाम किया। उस घटना से यह सिद्ध होता है। कर्म के भोग तो हर हालत में सभी महापुरुषों को भोगने पड़ते हैं। कुत्ते का काटना तथा वह बीमारी होना तो कर्म के भोग निश्चित थे। परंतु गौसेवा, श्रीगंगासेवा, सन्त सेवा, भगवद्धजन डॉक्टरों के अनुसार मेडिकल साइंस को मात दे सकते हैं। आज श्रीदण्डी स्वामी केवलाश्रमजी महाराज के मात्र आशीर्वाद से कृष्णाधाम अन्नक्षेत्र में सैकड़ों महात्मा और जरूरतमन्द निशुल्क भोजन करते हैं। दान देने वाले भी स्वतः आते हैं और खाने वाले भी स्वत: आते हैं। यह भगवान् के भजन, गोसेवा, गंगासेवा, सन्तसेवा का अनुपम प्रभाव है। ----------:::×:::---------- पत्रिका: कल्याण (९३।८) गीताप्रेस (गोरखपुर) "जय जय श्री राधे" "कुमार रौनक कश्यप " *******************************************

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. “परीक्षण" साधन का उपदेश होता है अधिकारी को। जिस प्रकार डाक्टर मरीज की परीक्षा करके निदान करता है कि उसे क्या रोग है ? तब दवा सोचता है। उसी प्रकार गुरु शिष्य की परीक्षा करता है तब उसे यथाधिकार उपदेश देता है। एक सज्जन गये गुरु के पास और बोले--मुझे उपदेश दीजिये। गुरु ने कहा तुम्हें क्रोध बहुत आता है। तुम एक वर्ष तक क्रोध पर विजय प्राप्त करो फिर आओ। और हाँ, नहा कर आना। एक वर्ष बाद वे आये। गुरुजी ने मेहतरानी से कह दिया कि देखो, एक काम करना। यह सज्जन जब स्नान करके आयें तो इनके बगल से झाडू देना जिससे थोड़ी गर्द उड़े। इन्हें छूना नहीं। जब वे स्नान करके तैयार होकर गुरुजी के पास उपदेश प्राप्त करने के लिये आने लगे तब मेहतरानी ने गर्द उड़ा दी। इनको थोड़ी गर्द लगी तो ये गुस्सा हो गये। उसे मारने दौड़े तो वो भाग गयी। फिर गुरुजी के पास आये तो गुरुजी ने कहा--तुम्हें अभी क्रोध आता है। तुम मारने के लिये दौड़ते हो। अभी एक वर्ष और अभ्यास करो। अपने को अधिकारी बनाओ। पुनः एक वर्ष बाद वे फिर वहाँ आये। इस बार गुरुजी ने मेहतरानी से कह रखा था कि वे जब आयें तो जरा-सा झाडू स्पर्श करा देना। मेहतरानी बोली--वह मारेगा। गुरुजी बोले-- मारेगा नहीं। तुम ऐसा करना। जब वे स्नान करके तैयार होकर आये तो मेहतरानी वहाँ खड़ी थी। उसने झाडू छुआ दिया। वे उसे मारने को उद्यत तो नहीं हुए पर दुर्वचन बोले। उन्होंने कहा--तुमने मेरी दो साल की मेहनत बेकार कर दी। फिर गुरुजी के पास आये और बोले--महाराज ! बोध प्राप्त कराइये। गुरुजी बोले--अभी बोध प्राप्त करोगे ? अभी तो तुम गाली बकते हो। एक वर्ष और अभ्यास करो, तैयारी करो। क्रोध नाश होने पर उपदेश मिलेगा। वह व्यक्ति सच्चा था, अन्यथा कहता--छोड़ो ऐसे गुरु को, आते हैं उपदेश प्राप्त करने को और साल-साल भर तक नाक रगड़ाता है। हमें तो अभी ब्रह्मज्ञान चाहिये। ऐसे लोगों को ब्रह्मज्ञान मिल भी जाता है और वे मान भी लेते हैं परन्तु वह होता है-- भ्रमज्ञान। ब्रह्म के बदले भ्रम होता है। तीसरे साल जब वे सज्जन आये तो गुरुजी ने मेहतरानी से कहा कि जब वे मेरे पास आने लगें तो इनके ऊपर कूड़े की टोकरी उड़ेल देना। वह बोली--मारेगा। गुरुजी बोले--आज तो बिल्कुल नहीं मारेगा। इसकी तीन वर्ष की साधना हो गयी है। वे बेचारे जब गंगा स्नान करके आने लगे तो मेहतरानी भी तैयार खड़ी थी। गुरुजी ने उससे कह रखा था कि डरना नहीं, आज कुछ नहीं करेगा। उसने उनके ऊपर कूड़े की टोकरी उड़ेल दी। उसके टोकरी उड़ेलते ही वे दण्डवत गिर पड़े और बोले--मैया ! तुम ही मेरी गुरु हो। तीन वर्ष तक तुम्हीं ने परीक्षा करके मुझको इस योग्य बनाया। मैं तुम्हारा कृतज्ञ हूँ। माँ ! मैं तेरा ऋणी हूँ। वह गदगद हो उठी। ये सज्जन फिर स्नान करने गये और तैयार होकर गुरुजी के पास आये और निवेदन किया। गुरुजी ने कहा--अब तुम योग्य हो गये। आज तुम अधिकारी हुए। आज तुम्हें ज्ञान देंगे। ----------:::×:::---------- - श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार (श्रीभाईजी) 'सरस प्रसंग' "जय जय श्री राधे" "कुमार रौनक कश्यप " ******************************************

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. ॥हरि ॐ तत्सत्॥ श्रीमद्भागवत-कथा श्रीमद्भागवत-महापुराण पोस्ट - 209 स्कन्ध - 10 अध्याय - 02 इस अध्याय में:- भगवान का गर्भ-प्रवेश और देवताओं द्वारा गर्भ-स्तुति श्री शुकदेव जी कहते हैं - परीक्षित! कंस एक तो स्वयं ही बड़ा बली था और दूसरे मगध नरेश जरासन्ध की उसे बहुत बड़ी सहायता प्राप्त थी। तीसरे उसके साथ थे - प्रलम्बासुर, बकासुर, चाणूर, तृणावर्त, अघासुर, मुष्टिक, अरिष्टासुर, द्विविद, पूतना, केशी, धेनुक, बाणासुर और भौमासुर आदि बहुत से दैत्य राजा उसके सहायक थे। उनको साथ लेकर वह यदुवंशियों को नष्ट करने लगा। वे लोग भयभीत होकर कुरु, पंचाल, केकय, शाल्व, विदर्भ, निषध, विदेह और कोसल आदि देशों में जा बसे। कुछ लोग ऊपर-ऊपर से उसके मन के अनुसार काम करते हुए उसकी सेवा में लगे रहे। जब कंस ने एक-एक करके देवकी के छः बालक मार डाले, तब देवकी के सातवें गर्भ में भगवान के अंशस्वरूप श्रीशेष जी, जिन्हें अनंत कहते हैं, पधारे। आनन्दस्वरूप शेष जी के गर्भ में आने के कारण देवकी को स्वाभाविक ही हर्ष हुआ। परन्तु कंस शायद इसे भी मार डाले, इस भय से उनका शोक भी बढ़ गया । विश्वात्मा भगवान ने देखा कि मुझे ही अपना स्वामी और सर्वस्व मानने वाले यदुवंशी कंस के द्वारा बहुत ही सताये जा रहे हैं। तब उन्होंने अपनी योगमाया को यह आदेश दिया - 'देवि ! कल्याणी ! तुम ब्रज में जाओ ! वह प्रदेश ग्वालों और गौओं से सुशोभित है। वहाँ नन्दबाबा के गोकुल में वसुदेव की पत्नी रोहिणी निवास करती है। उसकी और भी पत्नियाँ कंस से डरकर गुप्त स्थानों में रह रहीं हैं। इस समय मेरा वह अंश जिसे शेष कहते हैं, देवकी के उदर में गर्भ रूप से स्थित है। उसे वहाँ से निकालकर तुम रोहिणी के पेट में रख दो, कल्याणी! अब मैं अपने समस्त ज्ञान, बल आदि अंशों के साथ देवकी का पुत्र बनूँगा और तुम नन्दबाबा की पत्नी यशोदा के गर्भ से जन्म लेना। तुम लोगों को मुँह माँगे वरदान देने में समर्थ होओगी। मनुष्य तुम्हें अपनी समस्त अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाली जानकर धूप-दीप, नैवेद्य एवं अन्य प्रकार की सामग्रियों से तुम्हारी पूजा करेंगे। पृथ्वी में लोग तुम्हारे लिए बहुत से स्थान बनायेंगे और दुर्गा, भद्रकाली, विजया, वैष्णवी, कुमुदा, चण्डिका, कृष्णा, माधवी, कन्या, माया, नारायणी, ईशानी, शारदा और अम्बिका आदि बहुत से नामों से पुकारेंगे। देवकी के गर्भ से खींचे जाने के कारण शेष जी को लोग संसार में ‘संकर्षण’ कहेंगे, लोकरंजन करने के कारण ‘राम’ कहेंगे और बलवानों में श्रेष्ठ होने कारण ‘बलभद्र’ भी कहेंगे।' जब भगवान ने इस प्रकार आदेश दिया, तब योगमाया ने ‘जो आज्ञा’, ऐसा कहकर उनकी बात शिरोधार्य की और उनकी परिक्रमा करके वे पृथ्वी-लोक में चली आयीं तथा भगवान ने जैसा कहा था वैसे ही किया। जब योगमाया ने देवकी का गर्भ ले जाकर रोहिणी के उदर में रख दिया, तब पुरवासी बड़े दुःख के साथ आपस में कहने लगे - 'हाय ! बेचारी देवकी का यह गर्भ तो नष्ट ही हो गया।' भगवान भक्तों को अभय करने वाले हैं। वे सर्वत्र सब रूप में हैं, उन्हें कहीं आना-जाना नहीं है। इसलिए वे वसुदेव जी के मन में अपनी समस्त कलाओं के साथ प्रकट हो गये। उसमें विद्यमान रहने पर भी अपने को अव्यक्त से व्यक्त कर दिया। भगवान की ज्योति को धारण करने के कारण वसुदेव सूर्य के सामान तेजस्वी हो गये, उन्हें देखकर लोगों की आँखें चौंधियां जातीं। कोई भी अपने बल, वाणी प्रभाव से उन्हें दबा नहीं सकता था। भगवान के उस ज्योतिर्मय अंश को, जो जगत का परम मंगल करने वाला है, वसुदेव जी के द्वारा आधान किये जाने पर देवी देवकी ने ग्रहण किया। जैसे पूर्व दिशा चन्द्रदेव को धारण करती है, वैसे ही शुद्ध सत्त्व से संपन्न देवी देवकी ने विशुद्ध मन से सर्वात्मा एवं आत्मस्वरूप भगवान को धारण किया। भगवान सारे जगत के निवास स्थान हैं। देवकी उनका भी निवास स्थान बन गयी। परन्तु घड़े आदि के भीतर बंद किये हुए दीपक का और अपनी विद्या दूसरे को न देने वाले ज्ञानखल की श्रेष्ठ विद्या का प्रकाश जैसे चारों ओर नहीं फैलता, वैसे ही कंस के कारागार में बंद देवकी की भी उतनी शोभा नहीं हुई। देवकी के गर्भ में भगवान विराजमान हो गये थे। उसके मुख पर पवित्र मुस्कान थी और उसके शरीर की कान्ति से बंदीगृह जगमगाने लगा था। जब कंस ने उसे देखा, तब वह मन-ही-मन कहने लगा - अबकी बार मेरे प्राणों के ग्राहक विष्णु ने इसके गर्भ में अवश्य ही प्रवेश किया है; क्योंकि इससे पहले देवकी कभी ऐसी न थी। अब इस विषय में शीघ्र-से-शीघ्र मुझे क्या करना चाहिए? देवकी को मारना तो ठीक न होगा; क्योंकि वीर पुरुष स्वार्थवश अपने पराक्रम को कलंकित नहीं करते। एक तो यह स्त्री है, दूसरे बहिन और तीसरे गर्भवती है। इसको मारने से तो तत्काल ही मेरी कीर्ति, लक्ष्मी और आयु नष्ट हो जायेगी। वह मनुष्य तो जीवित रहने पर भी मरा हुआ ही है, जो अत्यंत क्रूरता का व्यवहार करता है। उसकी मृत्यु के बाद लोग उसे गाली देते हैं। इतना ही नही, वह देहाभिमानियों के योग्य घोर नरक में भी अवश्य जाता है। यद्यपि कंस देवकी को मार सकता था, किन्तु स्वयं ही वह इस अत्यन्त क्रूरता के विचार से निवृत हो गया अब भगवान के प्रति दृढ़ वैर का भाव मन में गाँठकर उनके जन्म की प्रतीक्षा करने लगा। वह उठते-बैठते, खाते-पीते, सोते-जागते और चलते-फिरते-सर्वदा ही श्रीकृष्ण के चिन्तन में लगा रहता। जहाँ उसकी आँख पड़ती, जहाँ कुछ खड़का होता, वहाँ उसे श्रीकृष्ण दीख जाते। इस प्रकार उसे सारा जगत ही श्रीकृष्णमय दीखने लगा। परीक्षित ! भगवान शंकर और ब्रह्मा जी कंस के क़ैदखाने में आये। उनके साथ नारद आदि ऋषि भी थे। वे लोग सुमधुर वचनों से सबकी अभिलाषा पूर्ण करने वाले श्रीहरि की इस प्रकार स्तुति करने लगे - 'प्रभो ! आप सत्यसंकल्प हैं। सत्य ही आपकी प्राप्ति का श्रेष्ठ साधन है। सृष्टि के पूर्व, प्रलय के पश्चात और संसार की स्थिति के समय - इन असत्य अवस्थाओं में भी आप सत्य हैं। पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश इन पाँच दृश्यमान सत्यों के आप ही कारण हैं और उनमें अन्तर्यामी रूप से विराजमान भी हैं। आप इस दृश्यमान जगत के परमार्थस्वरूप हैं। आप ही मधुर वाणी और समदर्शन के प्रवर्तक हैं। भगवन! आप बस, सत्यस्वरूप ही हैं। हम सब आपकी शरण में आये हैं। यह संसार क्या है- एक सनातन वृक्ष। इस वृक्ष का आश्रय है - प्रकृति। इसके दो फल हैं - सुख और दुःख; तीन जड़ें हैं - सत्त्व, रज और तम; चार रस हैं - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इसके जानने के पाँच प्रकार हैं- श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, रसना और नासिका। इसके छः स्वभाव हैं - पैदा होना, रहना, बढ़ना, बदलना, घटना और नष्ट हो जाना। इस वृक्ष की छाल हैं सात धातुएँ - रस, रुधिर, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र। आठ शाखाएँ हैं - पाँच महाभूत, मन, बुद्धि और अहंकार। इसमें मुख आदि नवों द्वार खोड़र हैं। प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त और धनंजय - ये दस प्राण ही इसके दस पत्ते हैं। इस संसार रूपी वृक्ष पर दो पक्षी हैं - जीव और ईश्वर। इस संसार रूप वृक्ष की उत्पत्ति के आधार एकमात्र आप ही हैं। आपमें ही इसका प्रलय होता है और आपके ही अनुग्रह से इसकी रक्षा भी होती है। जिनका चित्त आपकी माया से आवृत हो रहा है, इस सत्य को समझने की शक्ति खो बैठा है - वे ही उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करने वाले ब्रह्मादि देवताओं को अनेक देखते हैं। तत्त्वज्ञानी पुरुष तो सबके रूप में केवल आपका ही दर्शन करते हैं। आप ज्ञानस्वरूप आत्मा हैं। चराचर जगत के कल्याण के लिए ही अनेकों रूप धारण करते हैं। आपके वे रूप विशुद्ध अप्राकृत सत्त्वमय होते हैं और संत पुरुषों को बहुत सुख देते हैं। साथ ही दुष्टों को उनकी दुष्टता का दण्ड भी देते हैं। उनके लिए अमंगलमय भी होते हैं। कमल के सामान कोमल अनुग्रह भरे नेत्रों वाले प्रभो ! कुछ बिरले लोग ही आपके समस्त पदार्थों और प्राणियों के आश्रयस्वरूप रूप में पूर्ण एकाग्रता से अपना चित्त लगा पाते हैं और आपके चरणकमल रूपी जहाज का आश्रय लेकर इस संसार सागर को बछड़े के खुर के गड्ढे के समान अनायास ही पार कर जाते हैं। क्यों न हो, अब तक के संतों ने इसी जहाज से संसार-सागर को पार जो किया है। परम प्रकाशस्वरूप परमात्मन! आपके भक्तजन सारे जगत के निष्कपट प्रेमी, सच्चे हितैषी होते हैं। वे स्वयं तो इस भयंकर और कष्ट से पार करने योग्य संसार सागर को पार कर ही जाते हैं, किन्तु औरों के कल्याण के लिए भी वे यहाँ आपके चरण-कमलों की नौका स्थापित कर जाते हैं। वास्तव में सत्पुरुषों पर आपकी महान कृपा है। उनके लिये आप अनुग्रहस्वरूप ही हैं। कमलनयन! जो लोग आपके चरणकमलों की शरण नहीं लेते तथा आपके प्रति भक्तिभाव से रहित होने के कारण जिनकी बुद्धि भी शुद्ध नहीं है, वे अपने को झूठ-मूठ मुक्त मानते हैं। वास्तव में तो वे बद्ध ही हैं। वे यदि बड़ी तपस्या और साधना का कष्ट उठाकर किसी प्रकार ऊँचे-से-ऊँचे पद पर भी पहुँच जायँ, तो भी वहाँ से नीचे गिर जाते हैं। परन्तु भगवन! जो आपके अपने निज जन हैं, जिन्होंने आपके चरणों में अपनी सच्ची प्रीति जोड़ रखी है, वे कभी उन ज्ञानाभिमानियों की भाँति अपने साधन मार्ग से गिरते नहीं। प्रभो! वे बड़े-बड़े विघ्न डालने वालों की सेना के सरदारों के सर पर पैर रखकर निर्भय विचरते हैं, कोई भी विघ्न उनके मार्ग में रुकावट नहीं डाल सकते; क्योंकि उनके रक्षक आप जो हैं। आप संसार की स्थिति के लिये समस्त देहधारियों को परम कल्याण प्रदान करने वाला विशुद्ध सत्त्वमय, सच्चिदानन्दमय, परम दिव्य मंगल-विग्रह प्रकट करते हैं। उस रूप के प्रकट होने से ही आपके भक्त वेद, कर्मकाण्ड, अष्टांगयोग, तपस्या और समाधि के द्वारा आपकी आराधना करेंगे? प्रभो! आप सबके विधाता हैं। यदि आपका यह विशुद्ध सत्त्वमय निज स्वरूप न हो, तो अज्ञान और उसके द्वारा होने वाले भेदभाव को नष्ट करने वाला अपरोक्ष ज्ञान ही किसी को न हो। जगत में दिखने वाले तीनों गुण आपके हैं और आपके द्वारा ही प्रकाशित होते हैं, यह सत्य है। परन्तु इन गुणों की प्रकाशक वृत्तियों से आपके स्वरूप का केवल अनुमान ही होता है, वास्तविक स्वरूप का साक्षात्कार नहीं होता। भगवन! मन और वेद-वाणी के द्वारा केवल आपके स्वरूप का अनुमान मात्र होता है। क्योंकि आप उनके द्वारा दृश्य नहीं; उनके साक्षी हैं। इसलिए आपके गुण, जन्म और कर्म आदि के द्वारा आपके नाम और रूप का निरूपण नहीं किया जा सकता। फिर भी प्रभो! आपके भक्तजन उपासना आदि क्रियायोगों के द्वारा आपका साक्षात्कार तो करते ही हैं। जो पुरुष आपके मंगलमय नामों और रूपों का श्रवण, कीर्तन, स्मरण और ध्यान करता है और आपके चरणकमलों की सेवा में ही अपना चित्त लगाये रहता है - उसे फिर जन्म-मृत्यु-रूप संसार के चक्र में नहीं आना पड़ता है। सम्पूर्ण दुःखों को हरने वाले भगवन आप सर्वेश्वर हैं। यह पृथ्वी तो आपका चरणकमल ही है। आपके अवतार से इसका भार दूर हो गया। धन्य हैं! प्रभो! हमारे लिए यह बड़े सौभाग्य की बात है कि हम लोग आपके सुन्दर-सुन्दर चिह्नों से युक्त चरणकमलों के द्वारा विभूषित पृथ्वी को देखेंगे और स्वर्गलोक को भी आपकी कृपा से कृतार्थ देखेंगे। प्रभो! आप अजन्मा हैं। यदि आपके जन्म के कारण के सम्बन्ध में हम कोई तर्क न करें, तो यही कह सकते हैं कि यह आपका लीला-विनोद है। ऐसा कहने का कारण यह है कि आप तो द्वैत के लेश से रहित सर्वाधिष्ठानस्वरूप हैं और इस जगत की उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलय अज्ञान के द्वारा आप में आरोपित हैं। प्रभो! आपने जैसे अनेकों बार मत्स्य, हयग्रीव, कच्छप, नृसिंह, वराह, हंस, राम, परशुराम और वामन अवतार धारण करके हम लोगों की और तीनों लोकों की रक्षा की है - वैसे ही आप इस बार भी पृथ्वी का भार हरण कीजिये। यदुनन्दन! हम आपके चरणों में वन्दना करते हैं। देवकीजी को संबोधित करके - 'माताजी! यह बड़े सौभाग्य की बात है कि आपकी कोख में हम सबका कल्याण करने के लिये स्वयं भगवान पुरुषोत्तम अपने ज्ञान, बल आदि अंशों के साथ पधारे हैं। अब आप कंस से तनिक भी मत डरिये। अब तो वह कुछ ही दिनों का मेहमान है। आपका पुत्र यदुवंश की रक्षा करेगा।' श्री शुकदेव जी कहते हैं— परीक्षित! ब्रह्मादि देवताओं ने इस प्रकार भगवान की स्तुति की। उनका रूप ‘यह है’ इस प्रकार निश्चित रूप से तो कहा नहीं जा सकता, सब अपनी-अपनी मति के अनुसार उनका निरूपण करते हैं। इसके बाद ब्रह्मा जी और शंकर जी को आगे करके देवगण स्वर्ग में चले गये। ~~~०~~~ श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥ "जय जय श्री हरि" "कुमार रौनक कश्यप " ********************************************

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"व्रज के भक्त-04" श्रीभगवानदासजी स्वामी (टटिया-स्थान, वृन्दावन) वृन्दावन में निर्जन यमुना-तट पर बाँस की टटियों से घिरा और लता- पताओं से परिवेष्ठित एक सुरम्य स्थान है, जो टटिया-स्थान के नाम से प्रसिद्ध है। इसमें स्वामी हरिदासजी की परम्परा के भजन निष्ठ सन्त रहते हैं, जो स्वामीजी की तरह सर्वांग में व्रजरज लपेटे रहते हैं और हाथ में व्रजरज का करुआ और लकुट रखते हैं। स्वामी श्रीभगवानदासजी इसी स्थान के महन्त थे। वि० सम्वत् १९२० के लगभग टीकमगढ़, मध्यप्रदेश में सनाढ्य ब्राह्मण वंशक एक सुसम्पन्न भक्त परिवार में उनका जन्म हुआ। उनके पूर्वज टीकमगढ़ राज्य में ऊँच-ऊँचे पदों पर काम करते आये थे। परिवार के लोग राधाबल्लभ सम्प्रदायमें दीक्षित थे। उनका एक मन्दिर था, जिसमें राधा-कृष्ण के मणिमय श्रीविग्रह विराजते थे। घर के सब लोग मिलकर उनकी प्रेम से सेवा करते थे। बीस वर्ष की अल्पावस्था में भगवानदासजी टटिया-स्थान के सन्त मथुरादासजी से दीक्षित होने के उपरान्त घर छोड़कर वृन्दावन चले आये। मथुरादासजी से ही विरक्त वेश लेकर वहाँ भजन करने लगे। विo सम्वत् १९४४ आश्विन शुक्ला दशमी को टटिया-स्थान के तत्कालीन महन्त श्रीराधाप्रसाददेवजी के धाम पधारने के पशचात् सब सन्तो ने उन्हें उपयुक्त जान टटिया- स्थानका महन्त बना दिया। स्वामी भगवानदासजी बड़े प्रभावशाली महात्मा थे बहुत से राजा महाराजा और हाकिम-हुक्काम उनके शिष्य थे। उस समय के बहुत-से पण्डित और महात्मा, जैसे श्रीअमोलकराम शास्त्री, श्रीदुलारेप्रसादजी, श्रीसुदर्शनाचार्यजी, श्रीग्वारिया बाबा, श्रीप्रियाशरण बाबा और श्रीहंसदास बाबा उनका संगकर अपने को धन्य मानते थे। श्रीप्रियाशरण बाबा ने भगवत रसिकजी की वाणी उन्हीं से सीखी थी। सिद्ध पण्डित रामकृष्णदास बाबा भी उनसे बहुत स्नेह करते थे। वे कुछ दिन टटिया-स्थानपर उनके साथ रहे भी थे। दोनों सन्त एक-दूसरे का सम्मान करते और एक-दूसरे की भूरि-भूरि प्रशंसा करते। भगवानदास बाबा के सम्बन्ध में पण्डित बाबा कहा करते, किसी स्थान का महन्त हो तो ऐसा हो।' पण्डित बाबा के सम्बन्ध में भगवानदास बाबा कहा करते वे व्रज के सर्वत्यागी, भजन-निष्ठ सन्तों के मुकुटमणि हैं। करुआ उन्हीं को शोभा देता है। भगवानदास बाबा के सम्बन्ध में पण्डित बाबा की प्रशंसा कोई अत्युक्ति न थी। एक आदर्श महन्त की कार्य कुशलता के साथ जो भक्तिभाव और दैन्य होना चाहिये, वह उनमें परिपूर्ण मात्रा में विद्यमान था। वे अपने को टटिया-स्थान का महन्त या स्वामी न मानकर उसका सेवक ही मानते थे | जब कभी स्थान की मरम्मत आदि होती थी, वे स्वयं मजदूरों के साथ ईंट-पत्थर ढोने में जुट जाते थे। आश्रम में कोई प्रसाद पाता तो उसके प्रसाद पा चूकने पर स्वयं उस स्थान को धो-लीप कर साफ कर देते थे। कोई इस पर चाहे जितनी आपत्ति करता, उसकी एक न सुनते थे। चरणामृत और भगवत्-प्रसाद में उनकी बड़ी श्रद्धा थी। यदि किसी के प्रसाद पाते-पाते उसका कण भूमि पर गिर जाता, तो स्वयं उसे उठाकर पा लेते। एक बार उनके स्थान पर कोई उत्सव था। वैष्णव प्रसाद पा रहे थे। उसी समय एक वैष्णव की पत्तल में एक बन्दर ने मुँह मारा। वैष्णवने कहा-'मेरी पत्तल बन्दर ने जूठी कर दी। मैं इसे ग्रहण नहीं करूँगा।' बाबा ने उसके लिए दूसरी पत्तल मँगवा दी और बन्दर की जूठी पत्तल स्वयं उठाकर पाने लगे। किसी ने कहा- 'बाबा ! यह आप क्या कर रहे हैं ? वे बोले-'कर क्या रहा हूँ ? भगवत्-प्रसाद क्या कभी जूठा होता है। भगवानदास बाबा स्वामी श्रीहरिदासजी के अनन्य भक्त थे। उनकी कृपा पर भरोसा कर वे निश्चिन्त रहते थे। सम्वत् १६८१ में वृन्दावन में बाढ़ आयी। सरकार की ओर से खतरे की घोषणा कर दी गयी। यमुनातट के निकट रहने वाले सभी लोगों को वहाँ से हट जाने को कहा गया। सभी अपनी जान लेकर जहाँ-तहाँ चले गये। पर बाबा जाते कैसे ? टटिया-स्थान की परम्परा है कि जो व्यक्ति वहाँ का महन्त होता है, वह महन्त होने के पश्चात् फिर कभी स्थान के बाहर पैर नहीं रखता। बाबा इस परम्परा को तोड़ कैसे सकते थे ? वे वहीं डँटे रहे। अधिकारियों ने अनुनय-विनयकर उन्हें हट जाने को राजी करने की बहुत चेष्टा की। पर जितनी बार अधिकारी आते वे उन्हें यह कहकर टाल देते 'मैंने स्वामोजी की आज्ञा से एक आसन पर स्थित रहकर भजन करने का संकल्प किया है। सो मैं कर रहा हूँ। आसन छोड़ने की बात आप मुझसे न कहें। मेरा शरीर स्वामीजी को अर्पित है। वे इसे रखना चाहेंगे तो रखेंगे, बहा ले जाना चाहेंगे, तो बहा ले जायेंगे। इस में मेरा क्या ? आश्चर्य की बात कि कई बार ऐसा लगने पर भी कि कुछ ही मिनट में यमुना बाबा को बहा ले जायेंगी, स्वामीजी की कृपा से यमुना आश्रम के भीतर आयीं ही नहीं। बाबा स्वयं भी बड़े कृपालु थे। उनके भक्त आज भी उनकी कृपा की गाथाएँ सुनाया करते हैं। भक्तश्रेष्ठ श्रीजगन्नाथप्रसाद भक्तमालीजी ने एक बार लेखक से अपने ऊपर बाबा की अहैतुकी कृपा की बात कही थी, जो उन्ही के शब्दों में इस प्रकार है- 'पूज्य पण्डित रामकृष्णदास बाबा की प्रेरणा से श्री १०८ भगवान-दास बाबाजी महाराज द्वारा मेरी दीक्षा हो गयी। दीक्षा के पश्चात् मैं जब कभी सम्भव होता वृन्दावन आया करता। पर मेरी तनख्वाह केवल १०) रु० प्रतिमाह थी। अर्थका अभाव बना रहता। वृन्दावन आना बहुत कम ही संभव होता। एक बार मैं वृन्दावन के लिए विशेषरूप से उत्कण्ठित हो पड़ा, क्योंकि राधाष्टमी का उत्सव निकट था। बाबा राधाष्टमी का उत्सव बड़ी धूम-धाम से मनाया करते थे। मैं वृन्दावन जाने का निश्चय कर घर से चल पड़ा। टिकट के लिए पूरे पैसे थे नहीं। कोटा स्टेशन से तीन आने का अगले स्टेशन का टिकट लेकर गाड़ी पर बैठ गया। रास्ते में टिकट-कलेक्टर टिकट चेक करने आया। मैं जिस बेंच पर बैठा था , उस पर तीन और आदमी बैठे थे। टिकट-कलेक्टर ने एक-एककर उन तीनों के टिकट चेक किये। मैं गुरु महाराज का स्मरण करता हुआ चुप-चाप बैठा रहा। न जाने क्यों वह मुझे छोड़ दूसरे मुसाफिरों का टिकट चेक करने लगा और दूसरे स्टेशन पर डिब्बे से उतर गया। जब गाड़ी मथुरा पहुँची, तो मैं गुरुदेव का नाम लेते हुए स्टेशन से बाहर आ गया। वहाँ भी मुझसे टिकट-कलेक्टर ने टिकट नहीं माँगा। आश्रम पर आकर मैंने बाबा से सारी बात कही, तो वे मुस्करा दिये।' टोपीकुञ्ज के श्रीमाधवदास बाबाजी से भगवानदास बाबा का बड़ा प्रेम था। दोनों एक-दूसरे को अपने से बड़ा मान एक दूसरे का आदर करते और एक दूसरे की कृपा का भरोसा रखते। माधवदास बाबा को एक बार टोपीकुञ्ज पर मुकदमा लग जाने के कारण आश्रम से बेदखल हो जाने की चिंता हो गयी। उन्होंने भगवानदास बाबा के एक सेवक से कहा-'बाबा से कह देना आश्रम पर मुकदमा आ गया है। उसने बाबा से जाकर कहा, तो वे बोले-'अच्छा, अच्छा और चुप हो गये। मुकदमे में माधवदास बाबा की जीत हो गयी। कानपुर के श्रीबच्चूलालजी बाबा के शिष्य थे। वे हर समय बाबा की सेवा में रहा करते। बाबा उनसे बहुत स्नेह करते। वे बिहारीजी के दर्शन करने जाया करते। एक दिन जब वे बिहारीजी के मन्दिर जाने को हुए बाबा ने उनसे कहा-'रसिकबिहारीजी के दर्शन करते आना। वे बिहारीजी के दर्शन कर रसिकबिहारी के मन्दिर गये ठाकुर के दर्शनकर मन्दिर और उसके पीछे आचार्यों की समाधियों की परिक्रमा की। जब वे परिक्रमाकर लौट रहे थे पीछे से एक गुदड़ीवाले बाबाजी ने आवाज दी और कहा- 'बच्चूलाल प्रसाद ले जा।' बच्चूलाल ने समझा कोई मँगता बुला रहा है, प्रसाद देकर कुछ माँगेगा। उन्होंने उसकी अनसुनी कर दी। जब वे लौटकर स्थान पर पहुँचे, बाबा ने उनसे कहा- अरे बच्चू, तू बड़ा अभागा है ! मैंने तुझे भेजा था रसिकबिहारीजी के मन्दिर स्वामी श्रीरसिकदेव (स्वाभी श्रीहरिदासजी की परम्परा में षष्ठ आचार्य, जिन्होंने बहुत पूर्व रसिकविहारीजी के मन्दिर की स्थापना की थी) का कृपा-प्रसाद लेने। उन्होंने तुझे आवाज भी दी। पर तूने उनकी तरफ मुख मोड़कर देखा तक नहीं। वृन्दावन में सभी साधु माँगने वाले थोड़े ही होते हैं। ऐसे भी होते हैं, जो साधक को कुछ देकर निहाल कर दें। तू रसिकदेवजी के कृपादान से वंचित रहा। बच्चूलालजीको पश्चाताप हुआ। पर बाबा से उन्होंने कहा - 'मुझे रसिकदेवजी के दर्शन न करने का दुःख अवश्य है, पर उनका कृपादान न प्राप्त कर सकने का नहीं। मैं जानता हूँ कि गुरु से बड़ा दानी कोई नहीं है ऐसी कौन-सी वस्तु रसिकदेवजी मुझे देते, जो आपके पास देने को नहीं है आपकी कृपा होगी, तो सभी कुछ पा लूँगा। आप ही ने तो कृपाकर मुझे उनके पास भेजा था। आप जो दूसरे के माध्यम से देना चाहते हैं, वह क्या स्वयं नहीं दे सकते ?' बाबा हँस दिये। उन्होंने सचमुच बच्चूलालजी पर कृपा करने में कोई कसर नहीं रखी। जो लोग बच्चूलालजी को निकट से जानते थे, उनसे यह बात छिपी नहीं थी। सन्त जब किसी को अपना कृपा-भाजन बना लेते हैं, तो उसके सगे- सम्बन्धियों पर भी उनकी कृपा सहज बरसने लगती है। एक बार बच्चूलालजी के छोटे भाई ने बाबा से कहा - बाबा, मेरे लड़का कोई नहीं है।' उन्होंने कहा-तेरे तीन लड़के होंगे। उनके नाम रखना - मथुरा, वृन्दावन और गोकुल। बाबा का आशीर्वाद फलीभूत हुआ। उनके तीन लड़के हुए और उन्होंने उनके नाम रखे- मथुरा, वृन्दावन और गोकुल। अपने धाम पधारने के एक दिन पूर्व तो बाबा ने अपनी कृपा का सदाव्रत लगा देना चाहा। बोले- आज मुझसे जो कोई जो कुछ माँगेगा उसे दूँगा। पर उनकी इस उदारता का लाभ कोई न उठा सका। उनके शिष्य द्वारकादास ने सोचा कि कहीं बाबा टटिया-स्थान ही किसी के नाम न लिख दें। वे दरवाजे पर जाकर बैठ गये। यह कहकर किसी को भीतर न आने दिया कि--'बाबा अस्वस्थ हैं।मिलेंगे नहीं।' सहिष्णुता की बाबा जैसे साक्षात् मूर्ति थे। उनके महन्त होने के कुछ ही दिन बाद किसी व्यक्ति ने उन्हें ईर्ष्यावश संखिया खिला दी। उनके शिष्यों ने धी पिलाकर उसका उपचार किया। वे ठीक हो गये। पर उस व्यक्ति के विरुद्ध उन्होंने एक शब्द भी नहीं कहा। एक बार और एक व्यक्ति ने उन्हें प्रसाद लाकर दिया, जिसमें विष मिला हुआ था। बाबा को उसका पता चल गया। फिर भी प्रसाद समझ कर उन्होंने उसे पा लिया। उनकी कुछ भी क्षति न हुई। पर वह व्यक्ति, जो प्रसाद लाया था, टटिया-स्थान के बाहर जाते ही मूर्च्छित हो भूमि पर गिर पड़ा। बाबा को पता चला, तो उन्होंने कहा-'उसे जाकर राधा-नाम सुनाओ। राधा-नाम सुनाते ही उसे चेतना आ गयी और वह उठकर चला गया। उससे भी अदोषदर्शी और क्षमाशील बाबा ने कुछ नहीं कहा। पर तीसरी बार जब उन्हीं के एक शिष्य श्रीनागरीदास ने उन्हें मार डालना चाहा, तो उन्हें उसे कृपादण्ड देना पड़ा। नागरीदास उनके बाद स्थान का महन्त बनना चाहते थे। एक दिन बाबा ने कहा था- 'मेरे बाद जो स्थान का महन्त बनेगा, वह आ रहा है। उसी समय श्रीरणछोड़दासजी, जो बाबा के पश्चात् महन्त हुए, वृन्दावन आये। बाबा का सत्संग कर वे उनसे बहुत प्रभावित हुए। उनसे दीक्षा और विरक्त वेश ग्रहण कर उनकी सेवा में रहने लगे। नागरीदास ने सोचा कि बाबा उन्हें अपना उत्तराधिकारी मनोनीत करें उसके पूर्व ही उन्हें परलोक भेज दिया जाय। उन्होंने उन्हें ठण्डाई में पारा घोलकर पिला दिया। बाबा के भजन के प्रताप से पारा उनके शरीर से फूटकर बाहर निकल गया। नागरीदास को उन्होंने यह कहकर त्याग दिया कि उसने कृतध्न, गुरुद्रोही और आत्मघाती होने का अपराध किया है। वाबा बड़े नामनिष्ठ सन्त थे। नाम की शक्ति में उनका दृढ़ विश्वास था। एक दिन उनके स्थान के पीछे एक कुटिया में कोई भक्त ठहरा था। रात्रि में उसका पैर एक साँप के मुँह पर पड़ गया। साँप उसके पैर में लिपट गया। वह घबराया और चीख पड़ा। उसकी चीख सुनते ही बाबा ने अपने आसन पर बैठे-बेठे उच्चस्वर में कहा-'राधे-राधे !' राधा-नाम का उच्चारण करते ही साँप बिना उस भक्त को हानि पहुँचाये चला गया। अब कुछ दिनों से बाबा की वृत्ति प्रायः अन्तर्मुखी रहने लगी थी। वे जैसे इस जगत् में रहते हुए भी इसमें नहीं रहते। कभी-कभी उनकी अन्तदृर्ष्टि-का आभास उनके भक्तों को उनके वाह्य क्रिया-कलाप से मिल जाता। एक दिन वे अपनी भजन-कुटी के बाहर बैठे थे। सच्चूलालजी उनके निकट बैठे थे। उन्होंने देखा एक अलौकिक प्रकाश और सुना बाबा को किसी से बात करते। पर न तो उन्हें कोई व्यक्ति दीखा और न वह समझ पाये कि बाबा किसने क्या कह ग्हे हैं। उन्होने पीछे जब बाबा से इसके विषय में पूछा, तो वे केवल हँस दिये। एक बार बच्चूलालजी ने देखा कि बाबा के वस्त्र आसन पर बैठे-बैठे सहसा भीग गये। पूछने पर बाबाने बताया कि प्रियाजी यमुना-स्नान को गयी थीं। वे भी (सिद्ध चिन्मय देह से) उनके साथ गये थे। टटिया-स्थान के प्राकृतिक परिवेश को बिजली ने कभी दूषित नहीं किया। आज भी वहाँ रात्रि के समय वृक्ष-लताओं के बीच दीपक ही टिमटिमाते दीखते हैं। एक दिन सन्ध्या-समय वहाँ समाज-गान हो रहा था। कुछ-कुछ अँधेरा हो गया था। दीपक में विलम्ब देख सुखदेव नाम के एक भक्त ने कहा- 'दीपक अभी तक नहीं जला।' बाबा ने सहज भाव से कह दिया- यहाँ मणियों का प्रकाश जो है।' सुखदेवजी को यह बात कुछ अटपटी-सी लगी। वे उस समय टटिया-स्थान में ही ठहरे हुए थे। रात्रि में सोते सोते जब वे लधुशंका को बाहर निकले, तो वे बालुकामयी उस स्थान की भूमि में कुछ क्षण के लिए मणिमय प्रकाश देखकर स्तम्भित हो गये। दूसरे दिन जब उन्होंने बाबा से इसके विषय में चर्चा की, तब वे बोले-"वृन्दावन दिव्य है। इसका कण-कण चिन्मय है। इसके तरु लतादि सब चिन्मंय हैं। वह जो माधवी-लता तुम देख रहे हो, एक बार बच्वूलाल ने उसके कुछ पत्ते तोड़ लिये थे। तब उसने अपने दिव्य स्वरूप से मेरे पास आकर कहा था- देखो, बच्चूलाल ने मुझे नोंच डाला।' इसलिए मैं किसी को अपने आश्रम के वृक्षों को हाथ नहीं लगाने देता।" एक बार गोलाघाट, अयोध्या के महन्त श्रीरामसनेहीदासजी बाबा के दर्शन करने आये थे। उन्होंने बाबा से कहा- जिस दिव्य वृन्दावन का शास्त्रों में वर्णन है, वह भूमण्डल के इस वृन्दावन से निश्चय ही भिन्न होगा, क्योंकि इस वृन्दावन में और भूमण्डल के अन्य स्थानों में कोई भेद नही दीखता। बाबा ने कहा-'नहीं। यह वृन्दावन ही वह वृन्दावन है। केवल प्राकृत चक्षुओं से यह भूतल के अन्य स्थानों जैसा दीखता है। उस समय रामसनेहीजी को और उनके निकट बैठे बच्चूलालजी को वृन्दावन के दिव्य स्वरूप की एक झलक दीखी। उससे लुब्ध हो रामसनेहीजी ने पूछा 'बाबा, मुझे भी वया दिव्य वृन्दावन की प्राप्ति सम्भव है। बाबा ने कहा-नहीं। धामकी प्राप्ति होती है सम्बन्धानुगा भक्ति से। गुरु परम्परा से तुम्हारा सम्बन्ध अयोध्या से है। इसलिए तुम्हें दिव्य अयोध्याधाम (साकेत) की ही प्राप्ति हो सकती है, वृन्दावन की नहीं। श्रीभगवानदास बाबा ने टटिया-स्थान की बहुत सेवा की। अपने सम्प्रदाय के बहुत-से ग्रन्थों का प्रकाशन कर उनका निःशुल्क वितरण किया। अपने तेज और प्रभाव से बहुत-से लोगों को आर्काषित कर और उन्हें शिष्य-सेवक बनाकर स्वामी हरिदासजी के परिवार की वृद्धि की। सम्वत् १९८७, कार्तिक शुक्ला पञ्चमी को उन्हें निकुञ्ज-प्राप्ति हुई। दो महीने पहले से उन्होंने आहार त्याग दिया था। केवल स्वामी हरिवासजी के करुए का जल पीते रहे। शरीर छोड़ने के एक दिन पूर्व उन्होंने श्रीअमोलकराम शास्त्री और श्रीजगन्नाथप्रसाद भक्तमाली आदि से कहा - देखो भाई, हम कल प्रातः ४ बजे अपने घर चले जायेंगे' और दूसरे दिन प्रातः ४ बजे जब रंगजी के मन्दिर का घन्टा बजा, वे नित्य-धाम पधार गये। वे जिन बहुत-से शिष्यों को छोड़ गये, उनमें से महन्त श्रीरणछोड़-दासजी, झाँसीवाले श्रीछबीलीदासजी, श्रीभागवतदासजी और श्रीजगन्नाथप्रसाद भक्तनालीजी आदि के नाम मुख्यरूप से लिये जा सकते हैं। ----------:::×:::---------- पुस्तक: व्रज के भक्त (द्वितीय खण्ड) "जय जय श्री राधे" "कुमार रौनक कश्यप " *******************************************

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