jay murliDhar

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Anshika May 17, 2021

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lndu Malhotra May 17, 2021

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Jai Mata Di May 17, 2021

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Rani May 17, 2021

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GOVIND CHOUHAN May 17, 2021

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*सद्गुरु बडा़ कृपालु है अगर साधक की ऊंगली एक बार थाम ले या साधक सद्गुरु को अपनी ऊँगली थमा दे तो सद्गुरु फिर कभी भी साधक की ऊँगली नहीं छोड़ता है।सद्गुरु के द्वारा साधक की ऊँगली थामते ही काम,क्रोध,मद,मोह, लोभ,माया रूपी जिन भयानक राक्षसों ने अपनी सेना सहित हमला कर साधक को जकड़ रखा था सारे ही सद्गुरु से डर कर भाग खड़े हुते हैं तथा सारे राक्षस इस ताक मे रहते हैं कि कब सद्गुरु साधक की ऊँगली छोड़े ओर सारे राक्षस अपनी सारी सैना के साथ जो आसपास ही कही छुपे हुए हैं पूनः हमला कर साधक को जकड़ ले।परन्तु सद्गुरु ऐक बार साधक की ऊँगली थाम लेते हैं तो साधक के जन्म मरन से मुक्त होने तक नहीं छोड़ते।* *मुझे “गुरु” का प्रयोजन इस प्रकार से है कि सोचना चाहिए कि “गुरु” के हर काम में सहायक बनू और इसी प्रकार गुरु मेरे अन्दर प्रकाशित होंगे, नहीं तो शिष्य को लघु हो कर ही रहना पड़ता है | “गुरु” शिष्य के अन्दर इसी लिए समाहित नहीं हो पाते,क्योंकि शिष्य का अहंकार ही गुरु को इस काम से रोकता है | “गुरु”कृपा नही मिल रही है, ये कहके जो शिष्य दुःख जताते है, उनको ख्याल नहीं होता कि वो खुद ही “मै और मेरा” बोध के व्यवहार से हर पल अपने मन को चंचल बना लेते है, इसी लिए “गुरु”शक्ति निष्क्रिय हो जाती है | किसी का विश्वास कभी भी नष्ट ना हो, इसी लिए भी प्रार्थना करना चाहिए | गुरु सर्वदा चाहते है, मनुष्यों को उसके बुरे स्वाभाव से उच्च भाव से प्रतिष्ठित करना | किन्तु निम्न प्रकृति के संस्पर्श में आते ही मनुष्य की प्रकृति निम्न तरफ ही भागता है |* *सदगुरु इस पृथ्वी में अवतीर्ण हो के मनुष्य को बता देते है, सत्य को किस प्रकार व्यवहार करके सत्यमय हो सकते है, ज्ञान को किस प्रकार व्यवहार करके ज्ञानवान हो सकते है, शक्ति को किस प्रकार व्यवहार करके शक्तिमय हो सकते है | एक ही शक्ति गुरु, माता, ईष्ट के रूप और नाम से प्रतिष्ठित है | आंशिक तौर से गुरु का भाव मन में लेने से ये भाव प्रतिष्ठित नहीं होता, संपूर्ण समर्पण आने से ही ये संपूर्ण होता है | मेरा “गुरु” या ईश्वर ही सबके अन्दर बैठे है, उनको ही मैं गले से लगाऊंगा और सेवा करूँगा – ये भाव मन में होने से ही गुरुप्रिती लाभ हो सकता है; “गुरु” केवल मेरी तुष्टि या प्रीत के लिए नहीं, इस जगत के हर प्रकाशित प्राण के अन्दर ही ईश्वरबोध या गुरुबोध की सेवा करना चाहिये | तब ही दुःख कष्ट दुर्भोग, सब ही अहिस्ता अहिस्ता कम होता जाएगा | जो सदगुरु है, वो कभी भी व्यर्थ नहीं होते, अति धीरे धीरे बिनीत हो कर वो अपना काम करते है |* *“सदगुरु” को मालूम है कि उनके अन्दर “divine mother” स्वयं ही बैठ कर काम कर रहे है, इसी लिए उनका स्वयं का कोई दायित्व नहीं होता, एक शारीर में अगर काम ख़तम नहीं होता, तो वो नया शारीर लेते है | सदगुरु का मतलब ही है, divine mother | सदगुरु बहु जनो के हीत में काम करते है | सदगुरु इस धरती में आते हे सभी की मुक्ति के लिए, और वो इसी काम में लगे रहते है |* जो भी इसमें अच्छा लगे वो मेरे गुरू का प्रसाद है ओर जो बुरा लगे वो मेरी न्युनता है.....

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