"प्रभु महावीर जन्म से पहले माँ त्रिशला के सपनो की कथा"

"प्रभु महावीर जन्म से पहले माँ  त्रिशला के सपनो की कथा"

त्रिशला माँ के 14 स्वप्न कौनसे
यह हम जानते है...
काफी सदस्योंको इन स्वप्न
के अर्थ भी मालुम् होंगे....
पर इन स्वप्न के पूर्व कथा शायद सबको पता नही होंगी...

*प्रभु महावीर जन्म से पहले माँ त्रिशला के सपनों की कथा*

*देवताओं द्वारा गर्भ परिवर्तन*
इंद्र की आज्ञानुसार हरि-णेगमेषी देव आधी रात को ब्राह्मण कुंड नगर पहुंचे। यहां सो रही देवानंदा की कोख से देवी शक्ति से गर्भ ले लिया और पास ही स्थित क्षत्रिय कुंड नगर में ज्ञातृ कुल के राजा सिद्धार्थ की रानी त्रिशला के पास पहुंचे। उसकी कोख से पुत्री रूपी गर्भ को बाहर निकाल भगवान गर्भ को स्थापित किया। पुत्री रूप गर्भ को ले जाकर देवानंदा के गर्भ में स्थापित कर दिया। इसे गर्भ की घटना कही गई है। इसके बाद रानी त्रिशला को 14 सपनों के दर्शन हुए।

*देवानंदा द्वारा स्वप्न कथन*
तीर्थंकर आत्मा अंतिम भव में उच्च क्षत्रिय आदि जाति कुलों में ही जन्म लेती हैं। महावीर ब्राह्मणी के गर्भ से अवतरित होने वाले हैं। देव लोक के इंद्र इस बात से चौंके और ब्राह्मण कुंड में जन्म को रोका। देवानंदा की कोख से भगवान को क्षत्रिय कुंड नगर के राजा सिद्धार्थ की रानी त्रिशला के गर्भ में और त्रिशला के गर्भ को देवानंदा की कोख में रखने की बात कही। महावीर की पहली मां देवानंदा ने भी 14 सपने देखे। गर्भ परावर्तन के लिए देवानंदा अपने पति ऋषभ दत्त को सपनों की जानकारी देते हुए, च्यवन कल्याणक गर्भावतार तीर्थंकर ईश्वर,अरिहंत अंतिम भव से पहले जन्म में पशु पक्षी,मनुष्य और देव में से किसी एक गति में होते हैं। उस भव के खत्म होने पर,मनुष्य रूप में भारत की धरती पर जन्म लेते हैं। भगवान महावीर इस जन्म में आकाश में ऊंचाई पर विमान में देव रूप में थे। 50वें स्वर्ग लोक में 26 वां भव समाप्त करने के बाद वे पूर्वी भारत के वैशाली नगर के ब्राह्मण कुंड उपनगर के निवासी ऋषभ दत्त ब्राह्मण की पत्नी देवानंदा की कोख में गर्भ रूप में अवतरित होने वाले हैं।
रानी त्रिशला को 14 सपनों के दर्शन
आधी रात को कोख में भगवान का गर्भ स्थापित होने के बाद माता त्रिशला ने 14 सपने देखे थे।
उन्होंने सिंह, हाथी, वृषभ, लक्ष्मीदेवी,पुष्पमाला जोड़ी, चंद्रमा, सूर्य, ध्वजा,मंगल कलश, पद्म सरोवर, क्षीर सागर,देव विमान, रत्न राशि, निर्धूम अग्नि(भीषण आग)के सपने देखे।

*विशेष बात यह है की प्रभु महावीर की माता ने प्रथम स्वप्न में सिंह देखा। प्रभु आदिनाथ की माता ने प्रथम स्वप्न में ऋषभ देखा और शेष 22 तीर्थंकरों की माता ने प्रथम स्वप्न में गज राज (हाथी) देखा।*

उन्होंने पति सिद्धार्थ को 14 सपनों की जानकारी देकर उनका विस्तार से अर्थ जाना। राजा सिद्धार्थ और स्वप्न लक्षण ज्ञाताओं ने सपनों का अर्थ बताया,जिसमें त्रिशला की कोख से देव पुत्र जन्म की बात आई।

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*A Useful Post for Human Being's Health.... *जय श्री राधेकृष्णा 🙏🌷 *शुभ प्रभात् नमन*🙏🏻🌷 *बाई करवट लेटने के लाभ* 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ *शरीर के लिए सोना बेहद जरूरी होता है। अच्छी सेहत के लिए शरीर को आराम देना कई तरह की बीमारियों से बचाता है। सोते समय हम कई बार करवट बदलकर सोते हैं जिसका हमारे शरीर पर गहरा प्रभाव पड़ता है। किसी भी इंसान के लिए एक तरफ करवट लेकर सोए रहना नामुमकिन है। लेकिन क्या आपको पता है बांए ओर करवट लेने से आपको कई तरह के फायदे मिल सकते हैं। *बांए ओर करवट लेकर सोने के फायदे..... *आयुर्वेद में शरीर को बीमारियों से बचाने के लिए बाएं ओर करवट लेकर सोने के बारे में बताया गया है। जिसे आज के वैज्ञानिकों ने शोध के आधार पर इसे माना है। शोध के अनुसार बाएं ओर करवट बदलकर सोने से पेट फूलने की समस्या, दिल के रोग, पेट की खराबी और थकान जैसी समस्याएं दूर होती हैं। यदि आप बाएं की जगह दाएं तरफ करवट लेकर सोते हैं तो इससे शरीर से टाक्सिन सही तरह से निकल नहीं पाते हैं और दिल पर जोर ज्यादा पड़ता है साथ ही पेट की बीमारी भी लगने लगती हैं। कई बार तो हार्ट रेट भी बढ़ सकता है। *सीधे लेटे रहने से भी इंसान को ठीक तरह से सांस लेने में परेशानी होती है। ज्यादातर वे लोग जिन्हें दमा या अस्थमा और स्लीप एपनिा की दिक्कत हो। उनको रात में सीधा नहीं लेटना चाहिए। इसलिए बांए ओर करवट लेकर सोने की आदत डालनी चाहिए। *किडनियां और लीवर के लिए..... *बाएं ओर करवट बदलकर सोने से लीवर और किडनियां ठीक तरह से काम करती हैं। शरीर से गंदगी को साफ करने में लीवर और किड़नी बेहद अहम भूमिका निभाती हैं इसलिए इन पर ज्यादा दबाव नहीं डालना चाहिए। *पाचन में सुधार...... *शरीर तभी ठीक रहता है जब आपका पाचन तंत्र ठीक हो। एैसे में बाएं तरफ करवट लेने से आपके पाचन तंत्र को फायदा मिलता है। और खाया हुआ खाना भी आसानी से पेट तक पहुंचता है जो ठीक से हजम भी हो जाता है। इसके अलावा एक ओर फायादा यह है कि बदहजमी की दिक्कत भी दूर हो जाती है। *खतरनाक बीमारियों से बचाव....... *बाएं ओर करवट लेने से शरीर पर जमा हुआ टाक्सिन धीरे-धीरे निकलने लगता है और इस वजह से शरीर को लगने वाली खतरनाक बीमारियां नहीं होती हैं। *एसिडिटी में फायदा...... *सीने में जलन और एसिडिटी की समस्या को दूर करता है बायीं ओर करवट लेकर सोना। क्योंकि इस तरीके से पेट में मौजूद एसिड उपर की जगह से नीचे आने लगता है जिस वजह से सीने की जलन और एसिडिटी की परेशानी में फायदा मिलता है। *पेट को आराम...... *बांए ओर सोने से पेट को आराम मिलता है। क्योंकि इस पोजिशन में सोने से भोजन छोटी आंत से बड़ी आंत तक आसानी से पहुंच जाता है जिस वजह से सुबह आपका पेट खुलकर साफ होता है। *दिल की परेशानी में..... *बाएं ओर करवट बदलकर सोने से दिल से संबंधित परेशानियां दूर होती हैं क्योंकि इस अवस्था में सोने से दिल तक खून की पूर्ती बेहद अच्छे तरह से होती है जिसकी वजह से आक्सीजन और खून की सप्लाई आराम से दिमाग और शरीर तक पहुंचती है जो इंसान को दिल की बीमारी यानि कि हार्ट अटैक जैसे गंभीर रोग से बचा सकती है। *गलत तरीकों से सोना कई बीमारियों जैसे सिर दर्द, पीठदर्द, माइग्रेन, थकान व दर्द को न्योता देता है । अच्छी स्लीपिंग पोजीशन इंसान को स्मार्ट और सेहतमन्द बनाती है इसलिए अपने सोने के तरीके को बदलें और हमेशा स्वस्थ रहें। [*वर्षा ऋतु के समय बच्चों को गले और पेट में होने वाली समस्या से बचाने के लिए स्वादिष्ट औषधि* 1-सोंठ 1/2चम्मच 2-अजवाइन पाउडर 1/3 3-काला नमक 2 चुटकी 4- 20ग्राम गुड़ लगभग *ये एक बार की मात्रा है* इसे गुड़ में मिलाकर छोटी छोटी गोलियां बना लें* दिन में 2 अथवा 3 गोली चूसने के लिए दें* *गले मे दर्द के लिये आसान उपाय* गले के दर्द में 2चम्मच प्याज रस गर्मजल से कभी भी ले *शरीर या हाथ पैरों में सूनापन* जिन लोगो को ये परेशानी है वो लोग पीपल के पत्ते को पानी मे उबालकर उस पानी से कुछ दिन स्नान करे तो ये समस्या बिल्कुल ठिक हो जाएगी। वंदेमातरम।।। पवन गौड़।। [: *आँखों पर गुहेरी हो जाना* *जिस साइड की आंख पर हो उसके विपरीत वाले पैर के अँगूठे के नाखून पर आक का दूध लगाए।* वन्देमातरम। राजीव दीक्षित जी अमर रहे।।। [ *रक्त प्रदर के लिए घरेलू उपचार* लौकी/दुधीके बीजों को छीलकर उनका हलवा बनाकर सुबह ख़ाली पेट खाने से रक्त प्रदर दूर होता है। वंदेमातरम।।। : *🌹वात्त्, पित्त, कफ...??🌹* *अर्ध रोग हरि निद्रा,पूर्ण रोग हरि क्षुधा* अच्छी नींद आये तो, आधे रोग हर लिए जाते है।। *पित्त संबंधी रोग* रात्रि जागरण से पित्त की तकलीफ होती है। पित्त ज्यादा होने से रात्रि 12 बजे निन्द खुल जाती है।। 🌷 *उपाय* 🌷 🍁पित्त के रोगी को दूध पर रहना चाहिए।। 🍁सेव फल का सेवन करना चाहिए। 🍁त्रिफला सेवन करना चाहिए। *कफ संबंधी रोग* रोगी को प्रभात में खांसी उठती है और नींद टूट जाती है।| 🌷 *उपाय* 🌷 🍁कफ नाशक चीज़ों का सेवन करे जैसे चने,ममरे आदि।। 🍁बेसन से बनी चीजों का सेवन करने से लाभ होता है।। 🍁1 लीटर गुनगुने पानी में 10 ग्राम नामक डालकर खारा पानी पीये और फिर वमन (उल्टी) करने से कफ संबंधी दमा ,कफ आदि कीटाणु का नाश होता है।। *वायु सम्बंधी रोग* 🌒रोगी की नींद रात्रि 2 से 2:30 के समय खुल जाती हैं।। *उपाय* 🍁गोझरण के सेवन से 50 प्रकार के वायु सम्बंधी रोग नष्ट होते है।। 🍁गोझरण ३०मीली,१कटोरी पानी, इससे वायू एवं कफ संबधी रोग ठीक होते हैं| 🍁42 वर्ष की आयु के बाद त्रिफला या रसायन चूर्ण का नियमित रूप से सेवन करना चाहिये जिससे किडनी,लिवर,पेशाब सम्बन्धी तकलीफे न हो।। सिर पर और 👣 पर गाय के घी से रात्रि को मालिश करे।। *प्रगाढ़ नींद से आधे रोग नही होते है और उपवास से पूर्ण रोग खीच कर जठरा में स्वाहा हो जाते है*।। *उपवास में कमजोरी महसूस होने पर शहद के पानी,अंगूर के रस या अंगूर का सेवन करना चाहिए*।। *तुलसी के पत्ते रविवार को छोड़कर रोज सेवन करना चाहिये*।। *दोपहर के बाद फूल -पत्ते या तुलसी को तोड़ने से पाप लगता है ऐसा हमारे पुराणों में वर्णित है*।। 🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️ ************************* 🍃 *Arogya* 🍃 *सावन व भादों मास में खाने पीने का परहेज़* *-----------------------------------* 1. दूध ,दही लस्सी न लें । 2. हरे पत्ते वाली सब्ज़ी न खाएँ । 3. रसदार फल न लें । आम न खाएँ । 4. बैंगन ,लौकी न खाएँ । 5. गाजर मूली चुकंदर ककड़ी खीरा न खाएँ । 6. बाजार से फ़ास्ट फ़ूड न खाएँ। 7. मिठाईयां न खाएँ । 8. किसी प्रकार का माँस व मदिरा न लें । 9. तेज़ खट्टा न खाएँ । 10. ठंडी व बासी चीज़ न खाएँ । 11. आइसक्रीम एवं कोल्ड ड्रिंक का सेवन ना करेंl#आयुर्वेदा *फिर क्या खाएँ ।* -------------------- 1. पनीर , मटर की सब्ज़ी ,दालें सभी खा सकते हैं । 2. गाजर टमाटर का सूप , 3. अदरक,प्याज़ ,लस्सन, 4. सेब ,अनानास,बेल फल ,नारियल । 5. बेकरी व भुजिया products., 6. जलेबी , थोड़ा गर्म गुलाब जामुन व हलवाl 7. बेसन का ज़्यादा प्रयोग करें । 8. पानी उबाल कर , ताज़ा कर के पीएँ । 9. हल्दी वाला गर्म दूध ले सकते हैं । 10. देसी चाय ले सकते है । ब्राह्मी चाय या इम्यून चाय का सेवन इस मौसम में बहुत ही चमत्कारिक लाभ दिखाता हैl 11. विटामिन सी से युक्त आंवले से भरपूर रसायनप्राश का सेवन भी ऐसे मौसम में बहुत लाभ देता है *ध्यान रखें* इन दो महीनों व वर्षा ऋतु में ज्ठराग्नि ( पाचन शक्ति ) कमज़ोर व मंद होती है । इसलिए वात पित् व कफ रोग बड़ जाता है ।इस ऋतु में वर्षा के कारण जलवायु में कई प्रकार के विषाक्त कीटाणुओं का सब्ज़ियों व फलों पर व ठंडे पेय पदार्थों पर हमला हो जाता है जो कि मनुष्य ,पशु ,जानवरों ,पंछियों व पानी में रहने वाले जीवों को भी नुक्सान करता है इसलिए पानी भी उबाल कर पीएँ । तलाब व खड़े पानी व नदी दरिया के पानी में न नहाएँ ।अगर नहाना पड़ जाए तो बाद में नीम् युक्त साबुन से नहाएँ नहीं तो पित रोग का ख़तरा है । *जय श्री राधेकृष्णा*🙏🌷 *कहानी* *सभी बहनों को समर्पित* क्या बहन बेटियाँ मायके सिर्फ लेने के लिए आती हैं खिडकी के पास खड़ी सिमरन सोचती हैं राखी आने वाली है पर इस बार न तो माँ ने फोन करके भैया के आने की बात कही और न ही मुझे आने को बोला ऐसा कैसे हो सकता है।हे भगवान बस ठीक हो सबकुछ।अपनी सास से बोली माँजी मुझे बहुत डर लग रहा है।पता नहीं क्या हो गया।मुझे कैसे भूल गए इस बार।आगे से सास बोली कोई बात नही बेटा तुम एक बार खुद जाकर देख आओ।सास की आज्ञा मिलनेभर की देर थी सिमरन अपने पति साथ मायके आती हैं परंतु इस बार घर के अंदर कदम रखते ही उसे सबकुछ बदला सा महसूस होता है।पहले जहाँ उसे देखते ही माँ-पिताजी के चेहरे खुशी से खिल उठते थे इसबार उनपर परेशानी की झलक साफ दिखाई दे रही थी, आगे भाभी उसे देखते ही दौडी चली आती और प्यार से गले लगा लेती थी पर इसबार दूर से ही एक हल्की सी मुस्कान दे डाली।भैया भी ज्यादा खुश नही थे।सिमरन ने जैसे-तैसे एक रात बिताई परन्तु अगले दिन जैसे ही उसके पति उसे मायके छोड़ वापिस गये तो उसने अपनी माँ से बात की तो उन्होंने बताया इसबार कोरोना के चलते भैया का काम बिल्कुल बंद हो गया।ऊपर से और भी बहुत कुछ।बस इसी वजह से तेरे भैया को तेरे घर भी न भेज सकी।सिमरन बोली कोई बात नहीं माँ ये मुश्किल दिन भी जल्दी निकल जाएँगे आप चिंता न करो।शाम को भैया भाभी आपस में बात कर रहे थे जो सिमरन ने सुन ली।भैया बोले पहले ही घर चलाना इतना मुश्किल हो रहा था ऊपर से बेटे की कॉलेज की फीस,परसो राखी है सिमरन को भी कुछ देना पड़ेगा।आगे से भाभी बोली कोई बात नहीं आप चिंता न करो।ये मेरी चूड़ियां बहुत पुरानी हो गई हैं।इन्हें बेचकर जो पैसे आएंगे उससे सिमरन दीदी को त्योहार भी दे देंगे और कॉलेज की फीस भी भर देंगे।सिमरन को यह सब सुनकर बहुत बुरा लगा।वह बोली भैया-भाभी ये आप दोनों क्या कह रहे हो।क्या मैं आपको यहां तंग करके कुछ लेने के लिए ही आती हुँ।वह अपने कमरे में आ जाती हैं।तभी उसे याद आता है अपनी शादी से कुछ समय पहले जब वह नौकरी करती थी तो बड़े शौक से अपनी पहली तनख्वाह लाकर पापा को दी तो पापा ने कहा अपने पास ही रख ले बेटा मुश्किल वक़्त में ये पैसे काम आएंगे।इसके बाद वह हर महीने अपनी सारी तनख्वाह बैंक में जमा करवा देती।शादी के बाद जब भी मायके आती तो माँ उसे पैसे निकलवाने को कहती पर सिमरन हर बार कहती अभी मुझे जरूरत नही,पर आज उन पैसों की उसके परिवार को जरुरत है।वह अगले दिन ही सुबह भतीजे को साथ लेकर बैंक जाती है और सारे पैसे निकलवा पहले भतीजे की कॉलेज की फीस जमा करवाती है और फिर घर का जरूरी सामान खरीद घर वापस आती है।अगले दिन जब भैया के राखी बांधती है तो भैया भरी आँखी से उसके हाथ सौ का नोट रखते है।सिमरन मना करने लगती है तो भैया बोले ये तो शगुन है पगली मना मत करना।सिमरन बोली भैया बेटियां मायके शगुन के नाम पर कुछ लेने नही बल्कि अपने माँबाप कीअच्छी सेहत की कामना करने,भैया भाभी को माँबाप की सेवा करते देख ढेरों दुआएं देने, बडे होते भतीजे भतीजियो की नजर उतारने आती हैं।जितनी बार मायके की दहलीज पार करती हैं ईश्वर से उस दहलीज की सलामती की दुआएं माँगती हैं।जब मुझे देख माँ-पापा के चेहरे पर रौनक आ जाती हैं, भाभी दौड़ कर गले लगाती है, आप लाड़ लड़ाते हो,मुझे मेरा शगुन मिल जाता हैं।अगले दिन सिमरन मायके से विदा लेकर ससुराल जाने के लिए जैसे ही दहलीज पार करती हैं तो भैया का फोन बजता है।उन्हें अपने व्यापार के लिए बहुत बड़ा आर्डर मिलता है और वे सोचते है सचमुच बहनें कुछ लेने नही बल्कि बहुत कुछ देने आती हैं मायके और उनकी आंखों से खुशी के आंसू बहने लगते है। सचमुच बहन बेटियाँ मायके कुछ लेने नही बल्कि अपनी बेशकीमती दुआएं देने आती हैं।जब वे घर की दहलीज पार कर अंदर आती हैं तो बरक़त भी अपनेआप चली आती हैं।हर बहन बेटी के दिल की तमन्ना होती हैं कि उनका मायका हमेशा खुशहाल रहे और तरक्की करे।मायके की खुशहाली देख उनके अंदर एक अलग ही ताकत भर जाती हैं जिससे ससुराल में आने वाली मुश्किलो का डटकर सामना कर पाती है।मेरा यह लेख सभी बहन बेटियों को समर्पित है और साथ ही एक अहसास दिलाने की कोशिश है कि वे मायके का एक अटूट हिस्सा है।जब मन करे आ सकती हैं।उनके लिए घर और दिल के दरवाजे़ हमेशा खुले रहेंगें। ************************************************ 🍁*आज का सुविचार*🍁 🏯🌺✨👏🕉️👏✨🌺🏯 🚩✊जय हिंदुत्व✊🚩 सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है, जो देश की एकता एवं अखंडता के लिए बहुत जरूरी है। प्राणी मात्र की सेवा करना ही विराट ब्रह्म की आराधना है। प्राणी मात्र की सेवा करना मनुष्य का परम कर्त्तव्य है। इसे ही विराट ब्रह्म की आराधना कहते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है - "ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्व भूत हिते रता: ..."। अर्थात्, जो सब जीवों का हित-चिंतन करते हैं, वे मुझे प्राप्त होते हैं। अत: साधक के लिए तो यह और भी आवश्यक हो जाता है कि वह लोक-आराधक बनें, सेवाभावी बनें। विभिन्न दुर्गुणों का त्याग करने पर ही सेवाव्रत का पालन किया जा सकता है। स्वार्थ को छोड़े बिना सेवा का कार्य नहीं हो सकता। जिन्हें अपने इन्द्रिय सुखों की चिंता रहती है, वे व्यक्ति सेवा-कार्य में कभी भी सफल नहीं हो सकते। सेवाव्रती का हृदय करुणा और दया से ओत-प्रोत होता है। वह विषयों के प्रति आसक्त नहीं रहता। वह सब भोगों से निवृत्त रहता है। त्याग के कारण उसमें गुण-ग्राहयता बढ़ती जाती है। दीन-दु:खियों की सेवा, निर्बलों की रक्षा और रोगियों की सहायता ही सेवा का मुख्य लक्ष्य है। सेवाव्रती साधक किसी की हानि नहीं करता, किसी का निरादर नहीं करता। वह निरभिमानी, विनयी और त्यागी होता है। उसका अंत:करण पवित्र होने से मन की चंचलता भी नष्ट हो जाती है। मन शुद्ध हो तो अपने-पराये में भेद नहीं रहता। जब वस्तुओं का लोभ नष्ट हो जाता है, तब 'सत्' को अपनाना और 'शुद्ध संकल्पों' में लीन रहना साधक के अभ्यास में आ जाता है। उसमें कर्त्तव्य परायणता का उदय होता है और विषमता मिट जाती है। भेदभाव दूर होकर परम तत्व के अस्तित्व का बोध होता है। अहम् का शोधन होने पर मान-अपमान की चिंता नहीं रहती, असत्य से मोह मिट जाता है। अनित्य वस्तुओं के प्रति विरक्ति उत्पन्न हो जाती है और राग-द्वेष, तेरा-मेरा का झंझट समाप्त हो जाता है। जीवन में निर्विकल्पता का आविर्भाव हो जाता है। सेवा द्वारा सुखों के उपभोग की आसक्ति समाप्त हो जाती है। अत: सब प्राणियों में परमात्मा को स्थित मानते हुए निष्काम सेवा करना ही परमात्मा की सच्ची उपासना है। सच्ची सेवा वह है जो संसार के आसक्ति पूर्ण संबंधों को समाप्त कर देती है। इसलिए केवल किसी को अपना मानकर सेवा न करें, बल्कि सेवा को कर्त्तव्य मानकर सभी की सेवा करें; क्योंकि परमात्मा के अंशभूत होने के कारण सभी प्राणियों को अपना समझना ही सद्बुद्धि है ...। 🚩✊जय हिंदुत्व✊🚩☀!! श्री हरि: शरणम् !! ☀ 🍃🎋🍃🎋🕉️🎋🍃🎋🍃 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏 🕉👣🕉👣🕉👣🕉👣🕉👣 *👣🙏🏻🌼*जय राधे कृष्णा*🌼🙏🏻🕉* 🕉👣🕉👣🕉👣🕉👣🕉👣

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Shakti Aug 9, 2020

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Swami Lokeshanand Aug 9, 2020

आज का प्रसंग जीव और संत के मिलन का है। यह प्रसंग हम सब के लिए आश्वासन रूप है। आएँ, विभीषण की अवस्था का विचार करें। क्योंकि जो विभीषण की अवस्था है, न्यूनाधिक हमारी अवस्था भी वैसी ही है। जीव रूपी विभीषण, देह रूपी लंका में रहता है। पर वह क्रोध रूपी कुंभकर्ण, काम रूपी मेघनाद और वासना रूपी सूर्पनखा से घिरा, मोह रूपी रावण के आधीन है। जीव इस देह का असली मालिक होते हुए भी, मोह आदि वृत्तियों का गुलाम है। ये वृत्तियाँ दिन रात उसे जैसा चाहें वैसा नचाती हैं। किम्कर्तव्यविमूढ़ बना जीव, अपने को दीन हीन मानकर, न चाहते हुए भी, पापाचार का मौन समर्थक बना, जन्मजन्मान्तर से, जन्म मरण के बंधन में पड़ा है। उसके कोटि जन्मों में किए सत्कर्मों के फल स्वरूप, भगवान उसके बैठे बिठाए ही, किसी संत को उसके दरवाजे तक पहुँचा देते हैं। पर दुर्भाग्यवश कितने ही विभीषण, संत को संत न जान कर, अपने लाखों जन्मों के बाद मिले, ऐसे अमृत तुल्य लाभ से वंचित ही रह जाते हैं। देखो संत को किसी से धन नहीं चाहिए, जिसे धन चाहिए वो कैसा संत? सच्चा संत तो श्रद्धा चाहता है। संत तो झाड़ू मारने वाले हैं, उनका उपदेश ही झाड़ू है। वे तो बदले में कुछ भी चाहे बिना, आपके हृदय नगर में झाड़ू मार कर, उसमें रहने वाले काम क्रोध मोह आदि को निकाल बाहर कर, आपके हृदय को भगवान के रहने योग्य बना देते हैं। जो मनुष्य श्रद्धा रूपी कीमत चुकाने को तैयार हो, जो क-पट रहित होने को तैयार हो, माने अपने हृदय के दरवाजे संत के लिए खोलने को तैयार हो, उसके भगवान से मिलने में, न कोई संशय कभी था, न है, न होने की संभावना है। एक बार कोई मनुष्य किन्हीं संत को अपना बना ले, प्रसन्न कर ले, तो- "भाविहु मेटि सकहिं त्रिपुरारि" फिर बंधन रहता ही नहीं। देखें विभीषण ने उन्हें कैसे प्रसन्न किया? हनुमानजी ने "राम" लिखा मंदिर देखा तो विचार करने लगे कि यहाँ तो सब मोह के आधीन हैं, यहाँ सज्जन कहाँ से आ गया? इधर संत दरवाजे पर पहुँचा, कि उधर मोह रूपी रात्रि में सोए जीव के जागने का समय आया। विभीषण जागा, उसने कुछ ऐसा किया कि- "हृदय हरष कपि सज्जन चीन्हा" हनुमानजी हृदय में हर्षित हो गए, प्रसन्न हो गए, और उन्होंने विभीषण को सज्जन पहचान लिया। जो विभीषण ने किया, हम भी वही करते चलें। न मालूम कब, हम पर भी भगवान की कृपा बरस जाए- "राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा" जीवन के सब कार्य करते हुए, हम भी राम नाम जपते चलें। अब विडियो- हनुमान जी की प्रसन्नता https://youtu.be/us6gLhSAxQA हनुमानजी को प्रसन्न कैसे करें? https://youtu.be/ImEy3gIr05g

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R.G.P.Bhardwaj Aug 9, 2020

. ""हल चंदन षष्ठी 9 अगस्त रविवार विशेष"" 🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸 "व्रत महात्म्य विधि और कथा" 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी बलराम जन्मोत्सव के रूप में देशभर में मनायी जाती है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार मान्यता है कि इस दिन भगवान शेषनाग ने द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण के बड़े भाई के रुप में अवतरित हुए थे। इस पर्व को हलषष्ठी एवं हरछठ के नाम से भी जाना जाता है। जैसा कि मान्यता है कि बलराम जी का मुख्य शस्त्र हल और मूसल हैं जिस कारण इन्हें हलधर कहा जाता है इन्हीं के नाम पर इस पर्व को हलषष्ठी के भी कहा जाता है। इस दिन बिना हल चले धरती से पैदा होने वाले अन्न, शाक भाजी आदि खाने का विशेष महत्व माना जाता है। गाय के दूध व दही के सेवन को भी इस दिन वर्जित माना जाता है। साथ ही संतान प्राप्ति के लिये विवाहिताएं व्रत भी रखती हैं। हिन्दू धर्म के अनुसार इस व्रत को करने वाले सभी लोगों की मनोकामनाएं पूरी होती है. मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण और राम भगवान विष्णु जी का स्वरूप है, और बलराम और लक्ष्मण शेषनाग का स्वरूप है. पौराणिक कथाओं के संदर्भ अनुसार एक बार भगवान विष्णु से शेष नाग नाराज हो गए और कहा की भगवान में आपके चरणों में रहता हूं, मुझे थोड़ा सा भी विश्राम नहीं मिलता. आप कुछ ऐसा करो के मुझे भी विश्राम मिले. तब भगवान विष्णु ने शेषनाग को वरदान दिया की आप द्वापर में मेरे बड़े भाई के रूप में जन्म लोगे, तब मैं आपसे छोटा रहूंगा। हिन्दू धर्म के अनुसार मान्यता है कि त्रेता युग में भगवान राम के छोटे भाई लक्ष्मण शेषनाग का अवतार थे, इसी प्रकार द्वापर में जब भगवान विष्णु पृथ्वी पर श्री कृष्ण अवतार में आए तो शेषनाग भी यहां उनके बड़े भाई के रूप में अवतरित हुए. शेषनाग कभी भी भगवान विष्णु के बिना नहीं रहते हैं, इसलिए वह प्रभु के हर अवतार के साथ स्वयं भी आते हैं. बलराम जयंती के दिन सौभाग्यवती स्त्रियां बलशाली पुत्र की कामना से व्रत रखती हैं, साथ ही भगवान बलराम से यह प्रार्थना की जाती है कि वो उन्हें अपने जैसा तेजस्वी पुत्र प्राप्त करें। शक्ति के प्रतीक बलराम भगवान श्री कृष्ण के बड़े भाई थे, इन्हें आज्ञाकारी पुत्र, आदर्श भाई और एक आदर्श पति भी माना जाता है। श्री कृष्ण की लीलाएं इतनी महान हैं कि बलराम की ओर ध्यान बहुत कम जाता है। लेकिन श्री कृष्ण भी इन्हें बहुत मानते थे। इनका जन्म की कथा भी काफी रोमांचक है। मान्यता है कि ये मां देवकी के सातवें गर्भ थे, चूंकि देवकी की हर संतान पर कंस की कड़ी नजर थी इसलिये इनका बचना बहुत ही मुश्किल था ऐसें में देवकी के सातवें गर्भ गिरने की खबर फैल गई लेकिन असल में देवकी और वासुदेव के तप से देवकी का यह सत्व गर्भ वासुदेव की पहली पत्नी के गर्भ में प्रत्यापित हो चुका था। लेकिन उनके लिये संकट यह था कि पति तो कैद में हैं फिर ये गर्भवती कैसे हुई लोग तो सवाल पूछेंगें लोक निंदा से बचने के लिये जन्म के तुरंत बाद ही बलराम को नंद बाबा के यहां पालने के लिये भेज दिया गया था। बलराम जी का विवाह 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ यह मान्यता है कि भगवान विष्णु ने जब-जब अवतार लिया उनके साथ शेषनाग ने भी अवतार लेकर उनकी सेवा की। इस तरह बलराम को भी शेषनाग का अवतार माना जाता है। लेकिन बलराम के विवाह का शेषनाग से क्या नाता है यह भी आपको बताते हैं। दरअसल गर्ग संहिता के अनुसार एक इनकी पत्नी रेवती की एक कहानी मिलती है जिसके अनुसार पूर्व जन्म में रेवती पृथ्वी के राजा मनु की पुत्री थी जिनका नाम था ज्योतिष्मती। एक दिन मनु ने अपनी बेटी से वर के बारे में पूछा कि उसे कैसा वर चाहिये इस पर ज्योतिष्मती बोली जो पूरी पृथ्वी पर सबसे शक्तिशाली हो। अब मनु ने बेटी की इच्छा इंद्र के सामने प्रकट करते हुए पूछा कि सबसे शक्तिशाली कौन है तो इंद्र का जवाब था कि वायु ही सबसे ताकतवर हो सकते हैं लेकिन वायु ने अपने को कमजोर बताते हुए पर्वत को खुद से बलशाली बताया फिर वे पर्वत के पास पंहुचे तो पर्वत ने पृथ्वी का नाम लिया और धरती से फिर बात शेषनाग तक पंहुची। फिर शेषनाग को पति के रुप में पाने के लिये ज्योतिष्मती ब्रह्मा जी के तप में लीन हो गईं। तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने द्वापर में बलराम से शादी होने का वर दिया। द्वापर में ज्योतिष्मती ने राजा कुशस्थली के राजा (जिनका राज पाताल लोक में चलता था) कुडुम्बी के यहां जन्म लिया। बेटी के बड़ा होने पर कुडुम्बी ने ब्रह्मा जी से वर के लिये पूछा तो ब्रह्मा जी ने पूर्व जन्म का स्मरण कराया तब बलराम और रेवती का विवाह तय हुआ। लेकिन एक दिक्कत अब भी थी वह यह कि पाताल लोक की होने के कारण रेवती कद-काठी में बहुत लंबी-चौड़ी दिखती थी पृथ्वी लोक के सामान्य मनुष्यों के सामने तो वह दानव नजर आती। लेकिन हलधर ने अपने हल से रेवती के आकार को सामान्य कर दिया। जिसके बाद उन्होंनें सुख-पूर्वक जीवन व्यतीत किया। बलराम और रेवती के दो पुत्र हुए जिनके नाम निश्त्थ और उल्मुक थे। एक पुत्री ने भी इनके यहां जन्म लिया जिसका नाम वत्सला रखा गया। माना जाता है कि श्राप के कारण दोनों भाई आपस में लड़कर ही मर गये। वत्सला का विवाह दुर्योधन के पुत्र लक्ष्मण के साथ तय हुआ था, लेकिन वत्सला अभिमन्यु से विवाह करना चाहती थी। तब घटोत्कच ने अपनी माया से वत्सला का विवाह अभिमन्यु से करवाया था। बलराम जी के हल की कथा 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ बलराम के हल के प्रयोग के संबंध में किवदंती के आधार पर दो कथाएं मिलती है। कहते हैं कि एक बार कौरव और बलराम के बीच किसी प्रकार का कोई खेल हुआ। इस खेल में बलरामजी जीत गए थे लेकिन कौरव यह मानने को ही नहीं तैयार थे। ऐसे में क्रोधित होकर बलरामजी ने अपने हल से हस्तिनापुर की संपूर्ण भूमि को खींचकर गंगा में डुबोने का प्रयास किया। तभी आकाशवाणी हुई की बलराम ही विजेता है। सभी ने सुना और इसे माना। इससे संतुष्ट होकर बलरामजी ने अपना हल रख दिया। तभी से वे हलधर के रूप में प्रसिद्ध हुए। एक दूसरी कथा के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण की पत्नी जाम्बवती का पुत्र साम्ब का दिल दुर्योधन और भानुमती की पुत्री लक्ष्मणा पर आ गया था और वे दोनों प्रेम करने लगे थे। दुर्योधन के पुत्र का नाम लक्ष्मण था और पुत्री का नाम लक्ष्मणा था। दुर्योधन अपनी पुत्री का विवाह श्रीकृष्ण के पुत्र से नहीं करना चाहता था। इसलिए एक दिन साम्ब ने लक्ष्मणा से गंधर्व विवाह कर लिया और लक्ष्मणा को अपने रथ में बैठाकर द्वारिका ले जाने लगा। जब यह बात कौरवों को पता चली तो कौरव अपनी पूरी सेना लेकर साम्ब से युद्ध करने आ पहुंचे। कौरवों ने साम्ब को बंदी बना लिया। इसके बाद जब श्रीकृष्ण और बलराम को पता चला, तब बलराम हस्तिनापुर पहुंच गए। बलराम ने कौरवों से निवेदनपूर्वक कहा कि साम्ब को मुक्तकर उसे लक्ष्मणा के साथ विदा कर दें, लेकिन कौरवों ने बलराम की बात नहीं मानी। ऐसे में बलराम का क्रोध जाग्रत हो गया। तब बलराम ने अपना रौद्र रूप प्रकट कर दिया। वे अपने हल से ही हस्तिनापुर की संपूर्ण धरती को खींचकर गंगा में डुबोने चल पड़े। यह देखकर कौरव भयभीत हो गए। संपूर्ण हस्तिनापुर में हाहाकार मच गया। सभी ने बलराम से माफी मांगी और तब साम्ब को लक्ष्मणा के साथ विदा कर दिया। बाद में द्वारिका में साम्ब और लक्ष्मणा का वैदिक रीति से विवाह संपन्न हुआ। बलदेव (हल चंदन छठ) पूजा विधि 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ कथा करने से पूर्व प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त हो जाएं। पश्चात स्वच्छ वस्त्र धारण कर गोबर लाएं। इस तालाब में झरबेरी, ताश तथा पलाश की एक-एक शाखा बांधकर बनाई गई 'हरछठ' को गाड़ दें। तपश्चात इसकी पूजा करें। पूजा में सतनाजा (चना, जौ, गेहूं, धान, अरहर, मक्का तथा मूंग) चढ़ाने के बाद धूल, हरी कजरियां, होली की राख, होली पर भूने हुए चने के होरहा तथा जौ की बालें चढ़ाएं। हरछठ के समीप ही कोई आभूषण तथा हल्दी से रंगा कपड़ा भी रखें। बलदेव जी को नीला तथा कृष्ण जी को पीला वस्त्र पहनाये। पूजन करने के बाद भैंस के दूध से बने मक्खन द्वारा हवन करें। पश्चात कथा कहें अथवा सुनें। ध्यान रखें कि इस दिन व्रती हल से जुते हुए अनाज और सब्जियों को न खाएं और गाय के दूध का सेवन भी न करें, इस दिन तिन्नी का चावल खाकर व्रत रखें पूजा हो जाने के बाद गरीब बच्चों में पीली मिठाई बांटे. हलषष्ठी की व्रतकथा निम्नानुसार है 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ प्राचीन काल में एक ग्वालिन थी। उसका प्रसवकाल अत्यंत निकट था। एक ओर वह प्रसव से व्याकुल थी तो दूसरी ओर उसका मन गौ-रस (दूध-दही) बेचने में लगा हुआ था। उसने सोचा कि यदि प्रसव हो गया तो गौ-रस यूं ही पड़ा रह जाएगा। यह सोचकर उसने दूध-दही के घड़े सिर पर रखे और बेचने के लिए चल दी किन्तु कुछ दूर पहुंचने पर उसे असहनीय प्रसव पीड़ा हुई। वह एक झरबेरी की ओट में चली गई और वहां एक बच्चे को जन्म दिया। वह बच्चे को वहीं छोड़कर पास के गांवों में दूध-दही बेचने चली गई। संयोग से उस दिन हल षष्ठी थी। गाय-भैंस के मिश्रित दूध को केवल भैंस का दूध बताकर उसने सीधे-सादे गांव वालों में बेच दिया। उधर जिस झरबेरी के नीचे उसने बच्चे को छोड़ा था, उसके समीप ही खेत में एक किसान हल जोत रहा था। अचानक उसके बैल भड़क उठे और हल का फल शरीर में घुसने से वह बालक मर गया। इस घटना से किसान बहुत दुखी हुआ, फिर भी उसने हिम्मत और धैर्य से काम लिया। उसने झरबेरी के कांटों से ही बच्चे के चिरे हुए पेट में टांके लगाए और उसे वहीं छोड़कर चला गया। कुछ देर बाद ग्वालिन दूध बेचकर वहां आ पहुंची। बच्चे की ऐसी दशा देखकर उसे समझते देर नहीं लगी कि यह सब उसके पाप की सजा है। वह सोचने लगी कि यदि मैंने झूठ बोलकर गाय का दूध न बेचा होता और गांव की स्त्रियों का धर्म भ्रष्ट न किया होता तो मेरे बच्चे की यह दशा न होती। अतः मुझे लौटकर सब बातें गांव वालों को बताकर प्रायश्चित करना चाहिए। ऐसा निश्चय कर वह उस गांव में पहुंची, जहां उसने दूध-दही बेचा था। वह गली-गली घूमकर अपनी करतूत और उसके फलस्वरूप मिले दंड का बखान करने लगी। तब स्त्रियों ने स्वधर्म रक्षार्थ और उस पर रहम खाकर उसे क्षमा कर दिया और आशीर्वाद दिया। बहुत-सी स्त्रियों द्वारा आशीर्वाद लेकर जब वह पुनः झरबेरी के नीचे पहुंची तो यह देखकर आश्चर्यचकित रह गई कि वहां उसका पुत्र जीवित अवस्था में पड़ा है। तभी उसने स्वार्थ के लिए झूठ बोलने को ब्रह्म हत्या के समान समझा और कभी झूठ न बोलने का प्रण कर लिया। कथा के अंत में निम्न मंत्र से प्रार्थना करें 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ गंगाद्वारे कुशावर्ते विल्वके नीलेपर्वते। स्नात्वा कनखले देवि हरं लब्धवती पतिम्‌॥ ललिते सुभगे देवि-सुखसौभाग्य दायिनि। अनन्तं देहि सौभाग्यं मह्यं, तुभ्यं नमो नमः॥ अर्थात्👉 हे देवी! आपने गंगा द्वार, कुशावर्त, विल्वक, नील पर्वत और कनखल तीर्थ में स्नान करके भगवान शंकर को पति के रूप में प्राप्त किया है। सुख और सौभाग्य देने वाली ललिता देवी आपको बारम्बार नमस्कार है, आप मुझे अचल सुहाग दीजिए। बलदाऊ की आरती 〰️〰️〰️〰️〰️〰️ कृष्ण कन्हैया को दादा भैया, अति प्रिय जाकी रोहिणी मैया श्री वसुदेव पिता सौं जीजै…… बलदाऊ नन्द को प्राण, यशोदा प्यारौ , तीन लोक सेवा में न्यारौ कृष्ण सेवा में तन मन भीजै …..बलदाऊ हलधर भैया, कृष्ण कन्हैया, दुष्टन के तुम नाश करैया रेवती, वारुनी ब्याह रचीजे ….बलदाऊ दाउदयाल बिरज के राजा, भंग पिए नित खाए खाजा नील वस्त्र नित ही धर लीजे,……बलदाऊ जो कोई बल की आरती गावे, निश्चित कृष्ण चरण राज पावे बुद्धि, भक्ति ‘गिरि’ नित-नित लीजे …..बलदाऊ आरती के बाद श्री बलभद्र स्तोत्र और कवच का पाठ अवश्य करें। बलदेव स्तोत्र 〰️〰️〰️〰️ दुर्योधन उवाच- स्‍तोत्र श्रीबलदेवस्‍य प्राडविपाक महामुने। वद मां कृपया साक्षात् सर्वसिद्धिप्रदायकम् । प्राडविपाक उवाच- स्‍तवराजं तु रामस्‍य वेदव्‍यासकृतं शुभम्। सर्वसिद्धिप्रदं राजञ्श्रृणु कैवल्‍यदं नृणाम् ।। देवादिदेव भगवन् कामपाल नमोऽस्‍तु ते। नमोऽनन्‍ताय शेषाय साक्षादरामाय ते नम: ।। धराधराय पूर्णाय स्‍वधाम्ने सीरपाणये। सहस्‍त्रशिरसे नित्‍यं नम: संकर्षणाय ते ।। रेवतीरमण त्‍वं वै बलदेवोऽच्‍युताग्रज। हलायुध प्रलम्बघ्न पाहि मां पुरुषोत्तम ।। बलाय बलभद्राय तालांकाय नमो नम:। नीलाम्‍बराय गौराय रौहिणेयाय ते नम: ।। धेनुकारिर्मुष्टिकारि: कूटारिर्बल्‍वलान्‍तक:। रुक्म्यरि: कूपकर्णारि: कुम्‍भाण्‍डारिस्‍त्‍वमेव हि ।। कालिन्‍दीभेदनोऽसि त्‍वं हस्तिनापुरकर्षक:। द्विविदारिर्यादवेन्‍द्रो व्रजमण्‍डलारिस्‍त्‍वमेव हि ।। कंसभ्रातृप्रह‍न्‍तासि तीर्थयात्राकर: प्रभु:। दुर्योधनगुरु: साक्षात् पाहि पा‍हि प्रभो त्‍वत: ।। जय जयाच्‍युत देव परातपर स्‍वयमनन्‍त दिगन्‍तगतश्रुत। सुरमुनीन्‍द्रफणीन्‍द्रवराय ते मुसलिने बलिने हलिने नम: ।। य: पठेत सततं स्‍तवनं नर: स तु हरे: परमं पदमाव्रजेत्। जगति सर्वबलं त्‍वरिमर्दनं भवति तस्‍य धनं स्‍वजनं धनम् ।। श्रीबलदाऊ कवच 〰️〰️〰️〰️〰️〰️ दुर्योधन उवाच- गोपीभ्‍य: कवचं दत्तं गर्गाचार्येण धीमता। सर्वरक्षाकरं दिव्‍यं देहि मह्यं महामुने । प्राडविपाक उवाच- स्‍त्रात्‍वा जले क्षौमधर: कुशासन: पवित्रपाणि: कृतमन्‍त्रमार्जन: । स्‍मृत्‍वाथ नत्‍वा बलमच्‍युताग्रजं संधारयेद् वर्म समाहितो भवेत् ।। गोलोकधामाधिपति: परेश्‍वर: परेषु मां पातु पवित्राकीर्तन: । भूमण्‍डलं सर्षपवद् विलक्ष्‍यते यन्‍मूर्ध्नि मां पातु स भूमिमण्‍डले ।। सेनासु मां रक्षतु सीरपाणिर्युद्धे सदा रक्षतु मां हली च । दुर्गेषु चाव्‍यान्‍मुसली सदा मां वनेषु संकर्षण आदिदेव: ।। कलिन्‍दजावेगहरो जलेषु नीलाम्‍बुरो रक्षतु मां सदाग्नौ । वायौ च रामाअवतु खे बलश्‍च महार्णवेअनन्‍तवपु: सदा माम् ।। श्रीवसुदेवोअवतु पर्वतेषु सहस्‍त्रशीर्षा च महाविवादे । रोगेषु मां रक्षतु रौहिणेयो मां कामपालोऽवतु वा विपत्‍सु ।। कामात् सदा रक्षतु धेनुकारि: क्रोधात् सदा मां द्विविदप्रहारी । लोभात् सदा रक्षतु बल्‍वलारिर्मोहात् सदा मां किल मागधारि: ।। प्रात: सदा रक्षतु वृष्णिधुर्य: प्राह्णे सदा मां मथुरापुरेन्‍द्र: । मध्‍यंदिने गोपसख: प्रपातु स्‍वराट् पराह्णेऽस्‍तु मां सदैव ।। सायं फणीन्‍द्रोऽवतु मां सदैव परात्‍परो रक्षतु मां प्रदोषे । पूर्णे निशीथे च दरन्तवीर्य: प्रत्यूषकालेऽवतु मां सदैव ।। विदिक्षु मां रक्षतु रेवतीपतिर्दिक्षु प्रलम्‍बारिरधो यदूद्वह: ।। ऊर्ध्‍वं सदा मां बलभद्र आरात् तथा समन्‍ताद् बलदेव एव हि ।। अन्‍त: सदाव्‍यात् पुरुषोत्तमो बहिर्नागेन्‍द्रलीलोऽवतु मां महाबल: । सदान्‍तरात्‍मा च वसन् हरि: स्वयं प्रपातु पूर्ण: परमेश्‍वरो महान् ।। देवासुराणां भ्‍यनाशनं च हुताशनं पापचयैन्‍धनानाम् । विनाशनं विघ्नघटस्‍य विद्धि सिद्धासनं वर्मवरं बलस्‍य ।। हलषष्ठी शुभ मुहूर्त: 〰️〰️〰️〰️〰️〰️ 9 अगस्त, रविवार – दोपहर 04:21 से शाम 06:11 तक सर्वार्थ सिद्धि योग – 9 अगस्त, रविवार शाम 07:05 से 10 अगस्त, सोमवार सुबह 05:48 बजे तक। 🔥 """"गजेन्द्र प्रताप राजभर""""🔥 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागूं पाय, बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताए,, मंत्र जाप में अशुद्ध उच्चारण का प्रभाव 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 कई बार मानव अपने जीवन में आ रहे दुःख ओर संकटो से मुक्ति पाने के लिये किसी विशेष मन्त्र का जाप करता है.. लेकिन मन्त्र का बिल्कुल शुद्ध उच्चारण करना एक आम व्यक्ति के लिये संभव नहीं है । कई लोग कहा करते है.. कि देवता भक्त का भाव देखते है . वो शुद्धि अशुद्धि पर ध्यान नही देते है.. उनका कहना भी सही है, इस संबंध में एक प्रमाण भी है... "" मूर्खो वदति विष्णाय, ज्ञानी वदति विष्णवे । द्वयोरेव संमं पुण्यं, भावग्राही जनार्दनः ।। भावार्थ:-- मूर्ख व्यक्ति "" ऊँ विष्णाय नमः"" बोलेगा... ज्ञानी व्यक्ति "" ऊँ विष्णवे नमः"" बोलेगा.. फिर भी इन दोनों का पुण्य समान है.. क्यों कि भगवान केवल भावों को ग्रहण करने वाले है... जब कोइ भक्त भगवान को निष्काम भाव से, बिना किसी स्वार्थ के याद करता है.. तब भगवान भक्त कि क्रिया ओर मन्त्र कि शुद्धि अशुद्धि के ऊपर ध्यान नही देते है.. वो केवल भक्त का भाव देखते है... लेकिन जब कोइ व्यक्ति किसी विशेष मनोरथ को पूर्ण करने के लिये किसी मन्त्र का जाप या स्तोत्र का पाठ करता है.. तब संबंधित देवता उस व्यक्ति कि छोटी से छोटी क्रिया ओर अशुद्ध उच्चारण पर ध्यान देते है... जेसा वो जाप या पाठ करता है वेसा ही उसको फल प्राप्त होता है...। एक बार एक व्यक्ति कि पत्नी बीमार थी । वो व्यक्ति पंडित जी के पास गया ओर पत्नी कि बीमारी कि समस्या बताई । पंडित जी ने उस व्यक्ति को एक मन्त्र जप करने के लिये दिया । मन्त्र:- ""भार्यां रक्षतु भैरवी"" अर्थात हे भैरवी माँ मेरी पत्नी कि रक्षा करो । वो व्यक्ति मन्त्र लेकर घर आ गया । ओर पंडित जी के बताये मुहुर्त में जाप करने बेठ गया.. जब वो जाप करने लगा तो "" रक्षतु"" कि जगह "" भक्षतु"" जाप करने लगा । वो सही मन्त्र को भूल गया । "" भार्यां भक्षतु भैरवी"" अर्थात हे भैरवी माँ मेरी पत्नी को खा जाओ । "" भक्षण"" का अर्थ खा जाना है । अभी उसे जाप करते हुये कुछ ही समय बीता था कि बच्चो ने आकर रोते हुये बताया.. पिताजी माँ मर गई है । उस व्यक्ति को दुःख हुआ.. साथ ही पण्डित जी पर क्रोध भी आया.. कि ये केसा मन्त्र दिया है... कुछ दिन बाद वो व्यक्ति पण्डित जी से जाकर मिला ओर कहा आपके दिये हुये मन्त्र को में जप ही रहा था कि थोडी देर बाद मेरी पत्नी मर गई... पण्डित जी ने कहा.. आप मन्त्र बोलकर बताओ.. केसे जाप किया आपने... वो व्यक्ति बोला:-- "" भार्यां भक्षतु भैरवी"" पण्डित जी बोले:-- तुम्हारी पत्नी मरेगी नही तो ओर क्या होगा.. एक तो पहले ही वह मरणासन्न स्थिति में थी.. ओर रही सही कसर तुमने " रक्षतु" कि जगह "" भक्षतु!" जप करके पूरी कर दी.. भक्षतु का अर्थ है !" खा जाओ... "" ओर दोष मुझे दे रहे हो... उस व्यक्ति को अपनी गलति का अहसास हुआ.. तथा उसने पण्डित जी से क्षमा माँगी । इस लेख का सार यही है कि जब भी आप किसी मन्त्र का विशेष मनोरथ पूर्ण करने के लिये जप करे तब क्रिया ओर मन्त्र शुद्धि पर अवश्य ध्यान दे.. अशुद्ध पढने पर मन्त्र का अनर्थ हो जायेगा.. ओर मन्त्र का अनर्थ होने पर आपके जीवन में भी अनर्थ होने कि संभावना बन जायेगी । अगर किसी मन्त्र का शुद्ध उच्चारण आपसे नहीं हो रहा है.. तो बेहतर यही रहेगा.. कि आप उस मन्त्र से छेडछाड नहीं करे । और यदि किसी विशेष मंत्र का क्या कर रहे हैं तो योग्य और समर्थ गुरु के मार्गदर्शन में ही करें और मंत्र के अर्थ को अच्छी तरह से समझ लेना के बाद ही उसका प्रयोग भाव विभोर होकर करें,, हर हर महादेव जय शिव शंकर ( प्रेषक अज्ञात ) 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸

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R.G.P.Bhardwaj Aug 9, 2020

. """श्री बलभद्र सहस्त्रनाम""" 🌸🌸〰️〰️🌸〰️🌸〰️〰️🌸🌸 गर्ग संहिता बलभद्र खण्‍ड‎: अध्याय 13 के अनुसार कुलदेव श्री बलभद्र के सहस्त्रनाम:- दुर्योधन ने कहा- महामुने प्राडविपाकजी ! भगवान बलभद्र के सहस्‍त्रनाम को, जो देवताओं के लिये भी गोपनीय व अज्ञात हैं, मुझ से कहिये। प्राडविपाक मुनि बोले- साधु, साधु ! महाराज ! तुम्‍हारा यश सर्वथा निर्मल है। तुमने जिसके लिये प्रश्न किया है, वह परम देवदुर्लभ सहस्‍त्रनाम गर्गजी के द्वारा कथित है। उन दिव्‍य सहस्‍त्रनामों का वर्णन मैं तुम्‍हारे सामने कर रहा हूँ। गर्गाचार्यजी ने यमुनाजी के मंगलमय तट पर यह सहस्रनाम गोपियों को प्रदान किया था। विनियोग 〰️〰️〰️ ‘ॐ अस्‍य श्री बलभद्रसहस्‍त्रनामस्‍तोत्रमन्‍त्रस्‍य गर्गाचार्यऋषि:, अनुष्‍टुप् छन्‍द:, संकर्षण: परमात्‍मा देवता, बलभद्र इति बीजम्, रेवतीरमण इति शक्ति:, अनन्‍त इति कीलकम्, बलभद्रप्रीत्‍यर्थे जपे विनियोग:। (इस बलभद्रसहस्‍त्रनामस्‍तोत्ररुपी मन्‍त्र के रचियता गर्गाचार्य ऋषि हैं, अनुष्‍टुप् छन्‍द है, परमात्‍मा संकर्षण देवता है, बलभद्र बीज है, श्री बलभद्र की प्रीति के लिये इसका विनियोग है) इसको पढ़कर सहस्‍त्र नाम पाठ के लिये विनियोग का जल छोड़ दे। तत्‍पश्चात् इस प्रकार ध्‍यान करे– ध्‍यान 〰️〰️ स्‍फुरदमलकिरींट किकिंणीक्कड़णार्हं चलदलककपोलं कुण्‍डलश्रीमुखाब्‍जम्। तुहिनगिरिमनोज्ञं नीलमेघाम्‍बराढयं हलमुसलविशांल कामपालं समीडे।। अर्थ👉 जिनका निर्मल किरीट दमक रहा है, जो करधनी तथा कंकणों से अलंकृत हैं, चंचल अलकावली से जिनके कपोल सुशोभित हैं, जिनका मुखकमल कुण्‍डलों से देदीप्‍यमान है, जो हिमाचल गिरि के समान मनोहर उज्‍ज्‍वल हैं तथा नीलाम्‍बर धारण किये हुए हैं। विशाल हल-मुसल धारण करने वाले उन भगवान कामपाल बलभद्रजी का मैं स्‍तवन करता हूँ। बलदाऊ जी के 1000 नाम 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ 1. ॐ बलभद्र 2. रामभद्र 3. राम 4. संकर्षण 5. अच्‍युत 6. रेवतीरमण 7. देव 8. कामपाल 9. हलायुध 10. नीलाम्‍बर 11. श्वेतवर्ण 12. बलदेव 13. अच्‍युताग्रज 14. प्रलम्‍बघ्न 15. महावीर 16. रौहिणेय 17. प्रतापवान 18. तालाङ्क 19. मुसली 20. हली 21. हरि 22. यदुवर 23. बली 24. सीरपाणि 25. पद्मपाणि 26. लगुडी 27. वेणुवादन 28. कालिन्‍दीभेदन 29. वीर 30. बल 31. प्रबल 32. ऊर्ध्‍वग 33. वासुदेवकला 34. अनन्‍त 35. सहस्‍त्र वदन 36. स्‍वराट 37. वसु 38. वसुमती 39. भर्ता 40. वासुदेव 41. वसूत्तम 42. यदूत्तम 43. यादवेन्‍द्र 44. माधव 45. वृष्णिवल्‍लभ 46. द्वारकेश 47. माथुरेश 48. दानी 49. मानी 50. महामना 51. पूर्ण 52. पुराण 53. पुरुष 54. परेश 55. परमेश्‍वर 56. परिपूर्णतम 57. साक्षात परम 58. पुरुषोत्तम 59. अनन्‍त 60. शाश्वत 61. शेष 62. भगवान 63. प्रकृते:पर 64. जीवात्‍मा 65. परमात्‍मा 66. अन्‍तरात्‍मा 67. ध्रुव 68. अव्‍यय 69. चतुर्व्‍यूह 70. चतुर्वेद 71. चतुर्मूति 72. चतुष्‍पद 73. प्रधान 74. प्रकृति 75. साक्षी 76. संघात 77. संघवान् 78. सखी 79. महामना 80. बुद्धि सख 81. चेत 82. अहंकार 83. आवृत 84. इन्द्रियेश 85. देवता 86. आत्‍मा 87. ज्ञान 88. कर्म 89. शर्म 90. अद्वितीय 91. द्वितीय 92. निराकार 93. निरञ्जन 94. विराट् 95. सम्राट् 96. महौघ 97. आधार 98. स्‍थास्‍त्रु, 99. चरिष्‍णुमान् 100. फणीन्‍द्र 101. फणिराज 102. सहस्‍त्र फणमण्डित 103. फणीश्वर 104. फणी 105. स्‍फुर्ति 106. फूत्‍कारी 107. चीत्‍कार 108. प्रभु 109. मणिहार 110. मणिधर 111. वितली 112. सुतली 113. तली 114. अतली 115. सुतलेश 116. पाताल 117. तलातल 118. रसातल 119. भोगितल 120. स्‍फूरद्वन्‍त 121. महातल 122. वासुकि 123. शङ्खचूडाभ 124. देवदत्त 125. धनंजय 126. कम्‍बलाश्व 127. वेगतर 128. धृतराष्‍ट 129. महाभुज 130. वारुणीमदमत्ताङ्ग 131. मदघूर्णित लोचन 132. पद्माक्ष 133. पद्ममाली 134. वनमाली 135. मधुश्रवा 136. कोटिकंदर्पलावण्‍य 137. नागकन्‍या समर्चित 138. नूपुरी 139. कटिसूत्री 140. कटकी 141. कनकाङ्गदी 142. मुकुटी 143. कुण्‍डली 144. दण्‍डी 145.शिखण्‍डी 146. खण्‍डमण्‍डली 147. कलि 148. कलिप्रिय 149. काल 150. निवातकवचेश्वर 151. सहारकृत 152. रुद्रवपु 153. कालाग्रि 154. प्रलय 155. लय 156. महाहि 157. पाणिनि 158. शास्‍त्रकार 159. भाष्‍य कार 160. पतञ्जलि 161. कात्‍यायन 162. फक्किकाभू 163. स्‍फोटायन 164. उरंगम 165. वैकुण्‍ठ 166. याज्ञिक 167. यज्ञ 168. वामन 169. हरिण 170. हरि 171. कृष्‍ण, 172. विष्‍णु 173. महा विष्‍णु 174. प्रभ विष्‍णु 175. विशेषवित् 176. हंस 177. योगेश्वर 178. कूर्म 179. वाराह 180. नारद 181. मुनि 182. सनक 183. कपिल 184. मत्‍स्‍य 185. कमठ 186. देवमंगल 187. दत्तात्रेय 188. पृथु 189. वृद्ध 190. ऋषभ 191. भार्गवोत्तम 192. धन्‍वन्तरि 193. नृसिंह 194. कल्कि 195. नारायण 196. नर कमलेश 197. रामचन्‍द्र 198. राघवेन्‍द्र 199. कोसलेन्‍द्र 200. रघूद्वह 201. काकुत्‍स्‍थ 202. करुणा सिन्‍धु 203. दाशरथि, त्राता 204. सर्वलक्षणा 205. शूर 206. दाशरथि 207. त्राता 208. कौसल्‍यानन्‍दवर्द्धन 209. सौमित्रि 210. भरत 211. धन्‍वी 212. शत्रुघ्र 213. शत्रुतापन 214. निषङ्गी 215. कवची 216. खडगी 217. शरी 218. ज्‍याहतकोष्‍ठक 219. बद्धगोधाङ्गुलित्राण 220. शम्‍भु–कोदण्‍डभज्जन 221. यज्ञत्राता 222. यज्ञ भर्ता 223. मारीचवध कारक 224. असुरारि 225. ताडकारि 226. विभीषणसहायकृत 227. पितृवाक्‍यकर 228. हर्षी 229. विराधारि 230. वनेचर 231. मुनि 232. मुनिप्रिय 233. चित्र-कूटारण्‍यनिवासकृत 234. कबन्‍धहा 235. दण्‍डकेश 236. राम 237. राजीवलोचन 238. मतङ्ग 239. वन संचारी 240. नेता 241. पच्चवटी पति 242. सुग्रीव 243. सुग्रीव सखा 244. हनुमत्‍प्रीतमानस 245. सेतुबन्‍ध 246. रावणारि 247. लङ्कादहनतत्‍पर 248. रावण्‍यरि 249. पुष्‍पकस्‍थ 250. जानकीविरहातुर 251. अयोध्‍याधिपति 252. श्रीमान् 253. लवणारि 254. सुरार्चित 255. सूर्यवंशी 256. चन्‍द्र वंशी 257. वंशीवाद्यविशारद 258. गोपति 259. गोप वृन्‍देश 260. गोप 261. गोपीशतावृत 262. गोकुलेश 263. गोप-पुत्र 264. गोपाल 265. गोगणाश्रय 266. पूतनारि 267. वकारि 268. तृणावर्त- निपातक 269. अघारि 270. धेनुकारि 271. प्रलम्‍बारि 272. व्रजेश्वर 273. अरिष्‍टहा 274. केशिशत्रु 275. व्‍योमासुरविनाशकृत 276. अग्निपान 277. दुग्‍धपान 278. वृन्‍दावनलता 279. आश्रित 280. यशोमतीसुत 281. भव्‍य 282. रोहिणीलालित 283. शिशु 284. रासमण्‍डल-मध्‍यस्‍थ 285. रासमण्‍डलमण्‍डन 286. गोपिकाशतयूथार्थी 287. शङ्खचूड-वधोद्यत 288. गोवर्धनसमुद्धर्ता 289. गोवर्धनसमुद्धर्ता 290. व्रज रक्षक 291. वृष भानुवर 292. नन्‍द 293. आनन्‍द 294. नन्‍दवर्द्धन 295. नन्‍दराजसुत 296. श्रीश 297. कंसारि 298. कालियान्‍तक 299. रजकारि 300. मुष्टिकारि 301. कंसकोदण्‍डभज्जन 302. चाणूरारि 303. कूट-हन्‍ता 304. शलारि 305. तोशलान्‍तक। 306. कंसभ्रातृनिहन्‍ता 307. मल्‍लयुद्ध-प्रवर्तक 308. गजहन्‍ता 309. कंसहन्‍ता 310. कालहन्‍ता 311. कलङ्गहा 312. मागधारि 313. यवनहा 314. पाण्‍डु-पुत्रसहायकृत 315. चतुर्भुज 316. श्‍यामलाङ्ग 317. सौम्‍य 318. औपगविप्रिय 319. युद्धभृत् 320. उद्धवसखा 321. मन्‍त्री 322. मन्‍त्रविशारद 323. वीरहा 324. वीरमथन 325. शङ्खधर 326. चक्रधर 327. गदाधर 328. रेवचित्ततीहर्ता 329. रेवतीहर्ष-वर्द्धन 330. रेवतीप्राणनाथ 231. रेवतीप्रिय-कारक 332. ज्‍योति 333. ज्‍योतिष्‍मीभर्ता 334. रैवताद्रिविहारकृत 335. धृतिनाथ 336. धनाध्‍यक्ष 337. दानाध्‍यक्ष 338. धनेश्वर 339. मैथिलार्चितपादापब्‍ज 340. मानद 341. भक्तवत्‍सल 342. दुर्योधन 343. गुर्वी 344. गदाशिक्षाकर 345. क्षमी 346. मुरारि 347. मदन 348. मन्‍द 349. अनिरुद्ध 350. धन्विनांवर 351. कल्‍पवृक्ष 352. कल्‍पवृक्षी 353. कल्‍पवृक्षवन-प्रभु 354. स्‍यमन्‍तकमणि 355. मान्‍य 356. गाण्‍डीवी 357. कौरवेश्वर 358. कूष्‍माण्‍ड–खण्‍डनकर 359. कूपकर्णप्रहारकृत 360. सेव्‍य 361. रेवतजामाता 362. मधुसेवित 363. माधवसेवित 364. बलिष्‍ठ 365. पुष्‍टसर्वागड़ 366. हष्‍ट 367. पुष्‍ट 368. प्रहर्षित 369. वाराणसीगत 370. क्रुद्ध 371. सर्व 372. पौण्‍ड्रकघातक 373. सुनन्‍दी 374. शिखरी 375. शिल्‍पी 376. द्विविदागड़-निषूदन 377. हस्तिनापुरसंकर्षी 378. रथी 379. कौरवपूजित 380. विश्वकर्मा 381. विश्वधर्मा 382. देवशर्मा 383. दयानिधि 384. महाराज 385. छत्रधर 386. महा-राजोपलक्षण 387. सिद्धगीत 388. सिद्धकथ 389. शुक्‍लचामरवीजित 390. ताराक्ष 391. कीरनास 392. बिम्‍बोष्‍ठ 393. सुस्मितच्‍छवि 394. करीन्‍द्र 395. करदोर्दण्‍ड 396. प्रचण्‍ड 397. मेघमण्‍डल 398. कपाटवक्षा 399. पीनांस 400. पद्मपाद 401. स्‍फुरद्द्युति 402. महाविभूति 403. भूतेश 404. बन्‍धमोक्षी 405. समीक्षण 406. चैद्यशत्रु 407. शत्रुसंध 408. दन्‍तवक्रनिषूदक 409. अजातशत्रु 410. पापघ्र 411. हरिदाससहायकृत 412. शालबाहु 413. शाल्‍वहन्‍ता 414. तीर्थयायी 415. जनेश्वर 416. नैमिषारण्‍य-यात्रार्थी 417. गोमतीतीरवासकृत 418. गण्‍डकीस्‍न्नानवान 419. स्‍त्रगवी 420. वैजयन्‍तीविराजित 421. अम्‍लान 422. पंकजधर 423. विपाशी 424. शोणसंप्‍लुत 425. प्रयागतीर्थराज 426. सरयू 427. सेतुबन्‍धन 428. गयाशिर 429. धनद 430. पौलस्‍त्‍य 431. पुलहाश्रम 432. गंगासागरसगांर्थी 433. सप्‍तगोदावरी-पति 434. वेणी 435. भीमरथी 436. गोदा 437. ताम्रपर्णी 438. वटोदका 439. कृतमाला 440. महापुण्‍या 441. कावेरी 442. पयस्विनी 443. प्रतीची 444. सुप्रभा 445. वेणी 446. त्रिवेणी 447. सरयूपमा 448. कृष्‍णा 449. पम्‍पा 450. नर्मदा 451. गंगा 452. भागीरथी 453. नदी 454. सिद्धाश्रम 455. प्रभास 456. बिन्‍दु 457. बिन्‍दुसरोवर 458. पुष्‍कर 459. सैन्‍धव 460. जम्‍बू 461. नरनारायणाश्रम 462. कुरुक्षेत्रपति 463. राम 464. जामदग्रय 465. महामुनि 466. इल्‍वलात्‍मजहन्‍ता 467. सुदामा 468. सौख्‍यदायक 469. विश्वजित 470. विश्वनाथ 471. त्रिलोकविजयी 472. जयी 473. वसन्‍तमालतीकर्षी 474. गद 475. गद्य 476. गदाग्रज 477. गुणार्णव 478. गुण-निधि 479. गुणपात्री 480. गुणाकर 481. रंगवल्‍ली 482. जलाकार 483. निर्गुण 484. सगुण 485. बृहत 486. दृष्‍ट 487. श्रुत 488. सगुण 489. बृहत् 490. भविष्‍यत 491. अल्‍पविग्रह 492. अनादि 493. आदि 494. आनन्‍द 495. प्रत्‍यग्‍धामा 496. निरन्‍तर 497. गुणातीत 498. सम 499. साम्‍य 500. समदृक 501. निर्विकल्‍पक। 502. गूढ 503. व्‍यूढ 504. गुण 505. गौण 506. गुणाभास 507. गुणावृत 508. नित्‍य 509. अक्षर 510. निर्विकार 511. क्षर 512. अजस्‍त्र सुख 513. अमृत 514. सर्वग 515. सर्ववित 516. सार्थ 517. सम बुद्धि 518. समप्रभ 519. अक्‍लेद्य 520. अच्‍छेद्य 521. आपूर्ण 522. अशोष्‍य 523. अदाह्म 524. अनिवर्तक 525. ब्रह्म 526. ब्रह्मधर 527. ब्रह्मा 528. ज्ञापक 529. व्‍यापक 530. कवि 231. अध्‍यात्‍म 532. अधिभूत 533. अधिदैव 534. स्‍वाश्रय 535. अश्रय 536. महावायु 537. महावीर 538. चेष्‍टा 539. रूपतनुस्थित 540. प्रेरक 541. बोधक 542. बोधी 543. त्रयोविंशतिकगण 544. अंशांश 545. नरावेश 546. अवतार 547. भूपरिस्थित 548. मह 549. जन 550. तप 551. सत्‍य 552. भू 553. भुव 554. स्‍व 555. नैमित्तिक 556. प्राकृतिक 557. आत्‍यन्तिकमय लय 558. सर्ग 559. विसर्ग 560. सर्गादि 561. निरोध 562. रोध 563. ऊतिमान 564. मन्‍वन्‍तरावतार 565. मनु 566. मनुसुत 567. अनघ 568. स्‍वयम्‍भू 569. शाम्‍भव 570. शंकु 571. स्‍वायम्‍भुवसहायकृत 572. सुरालय 573. देवगिरि 574. मेरु 575. हेम 576. अर्चित 577. गिरि 578. गिरीश 579. गणनाथ 580. गौरी 581. ईश 582. गिरिगहर 583. विन्‍ध्‍य 584. त्रिकूट 585. मैनाक 586. सुवेल 587. पारिभद्रक 588. पतंग 589. शिशिर 590. ककड़ 591. जारुधि 592. शैलसत्तम 593. कालञ्जर 594. बृहत्‍सानु 595. दरीभृत 596. नन्दिकेश्वर 597. संतान 598. तरुराज 599. मन्‍दार 600. पारिजातक 601. जयन्‍तकृत 602. जयन्‍ताङ्ग 603. जयन्‍ती 604. दिग् 605. जयाकुल 606. वृत्रहा 607. देवलोक 608. शशी 609. कुमुदबान्‍धव 610. नक्षत्रेश 611. सुधा 612. सिन्‍धु 613. मृग 614. पुष्‍य 615. पुनर्वसु 616. हस्‍त 617. अभिजित 618. श्रवण 619. वैधृ‍त 620. भास्‍करोदय 621. ऐन्‍द्र 622. साध्‍य 623. शुभ 624. शुक्‍ल 625. व्‍यतीपात 626. ध्रुव 627. सित 628. शिशुमार 629. देवमय 630. ब्रह्मलोक 631. विलक्षण 632. राम 633. वैकुण्‍ठनाथ 634. व्‍यापी 635. वैकुण्‍ठनायक 636. श्वेतद्वीप 637. अजितपद 638. लोकालोकचलाश्रित 639. भूमि 640. वैकुण्‍ठदेव 641. कोटिब्रह्माण्‍डकारक 642. असंख्‍यब्रह्माण्‍डपति 643. गोलोकेश 644. गवां पति 645. गोलोकधामधिषण 646. गोपिकाकण्‍ठभूषण 647. ह्रीधर 648. श्रीधर 649. लीलाधर 650. गिरिधर 651. धुरी 652. कुन्‍तधारी 653. त्रिशुली 654. बीभत्‍सी 655. घर्घरस्‍वन 656. शूलार्पितगज 657. सूच्‍यर्तितगज 658. गजचर्मधर 659. गजी 660. अन्‍त्रमाली 661. मुण्‍डमाली 662. व्‍याली 663. दण्‍डकमण्‍डलु 664. वेतालभृत् 665. भूतसंघ 666. कूष्‍माण्‍डगणसंवृत 667. प्रमथेश 668. पशुपति 669. मृडानी 670. ईश 671. मृड 672. वृष 673. कृतान्‍त-संघारि 674. कालसंघारि 675. कूट 676. कल्‍पान्‍तभैरव 677. षडानन 678. वीरभद्र 679. दक्षयज्ञ-विघातक 680. खर्पराशी 681. विषाशी 682. शक्तिहस्‍त 683. शिवा 684. अर्थद 685. पिनाकटंकारकर 686. चलज्‍झंकार-नूपुर 687. पण्डित 688. तर्क-विद्वान् 689. वेद पाठी 690. श्रुतीश्वर 691. वेदान्‍तकृत 692. सांख्‍यशास्‍त्री 693. मीमांसी 694. कणनामभाक् 695. काणादि 696. गोतम 697. वादी 698. वाद 699. नैयायिक 700. छन्‍द 701. वैशेषि‍क 702. धर्मशास्‍त्री 703. सर्व-शास्‍त्रर्थतत्त्वग 704. वैयाकरण कृत् 705. छन्‍द 706. वैयास 707. प्राकृति 708. वच 709. पाराशरीसंहितावित् 710. काव्‍यकृत् 711. नाटकप्रद 712. पौराणिक 713. स्‍मृति-कर 714. वैद्य 715. विद्याविशारद 716. अलंकार 717. लक्षणार्थ 718. व्‍यड्ग्‍यवित् 719. ध्‍वनिवित् 720. ध्‍वनि 721. वाक्‍यस्‍फोट 722. पदस्‍फोट 723. स्‍फोटवृति 724. रसार्थवित 725. श्रृगार 726. उज्‍जवल 727. स्‍वच्‍छ 728. अद्भुत 729. हास्‍य 730. भयानक 731. अश्वत्‍थ 732. यवभोजी 733. यवक्रीत 734. यवाशन 735. प्रह्लादरक्षक 336. स्निग्‍ध 737. ऐलवंशविवधर्नन 738. गताधि 739. अम्‍बरीषाङ्ग 740. विगाधि 741. गाधीनां वर 742. नानामणिसमाकीर्ण 743. नानारत्न विभूषण 744. नानापुष्‍पधर 745. पुष्‍पी 746. पुष्‍पधन्‍वा 747. प्रपुष्पित 748. नानाचन्‍दगन्‍धाढय 749. नानापुष्‍प–रसार्चित 750. नानावर्णमय 751. वर्ण 752. सदा नानावस्‍त्रधर 753. नानापद्माकर 754. कौशी 755. नानाकौशेयवेषधृक् 756. रत्नकम्‍बलधारी 757. धौतवस्‍त्रसमावृत 758. उत्तरीयधर 759. पूर्ण 760. घन-कञ्जुकवान 761. संघवान 762. पीतोष्‍णीष 763. सितोष्‍णीष 764. रक्तोष्‍णीष 765. दिगम्‍बर। 766. दिव्‍याङ्ग 767. दिव्‍यरचन 768. दिव्‍यालोकविलोकित 769. सर्वोपम 770. निरूपम 771. गोलोकांकीकृताकंन 772. कृतस्‍वोत्‍संगगोलोक 773. कुण्‍डली 774. भूत 775. आस्थित 776. माथुर 777. मथुरा 778. आदर्शी 779. चलत्‍खञ्जन-लोचन 780. दधिहर्ता 781. दुग्‍धहर 782. नवनीत-सिताशन 783. तक्रभुक 784. तक्रहारी 785. दधिचौर्यकृतश्रम 786. प्रभावतीबद्धकर 787. दामी 788. दामोदर 789. दमी 790. सिकताभूमिचारी 791. बालकेलि 792. व्रजार्भक 793. धूलिधूसरसर्वांग 794. काकपक्षधर 795. सुधी 796. मुक्तकेश 797. वत्‍सवृन्‍द 798. कालिन्‍दीकूलवीक्षण 799. जलकोलाहली 800. कूली 801. पंकजप्रागणलेपक 802. श्री वृन्‍दावनसंचारी 803. वंशीवटतटस्थित 804. महावननिवासी 805. लोहार्गलवनाधिप 806. साधु 807. प्रियतम 808. साध्‍य 809. साध्‍वीश 810. गतसाध्‍वस। 811. रंगनाथ 812. विट्ठलेश 813. मुक्तिनाथ 814. अघनाशक 815. सुकीर्ति 816. सुयशा 817. स्‍फीत 818. यशस्‍वी 819. रंगरज्जन 820. रागषट्क 821. रागपुत्र 822. रागिणी 823. रमणोत्‍सुक 824. दीपक 825. मेघमल्‍लार 826. श्री राग 827. मालकोशक 828. हिन्‍दोल 829. भैरवाख्‍य 830. स्‍वर-जातिस्‍मर 831. मृदु 832. ताल 833. मान 834. प्रमाण 835. स्‍वरगम्‍य 836. कलाक्षर 837. शमी 838. श्‍यामी 839. शतानन्‍द 840. शतयाम 841. शतक्रतु 842. जागर 843. सुप्‍त 844. आसुप्‍त 845. सुषुप्‍त 846. स्‍वप्‍न 847. उर्वर 848. ऊर्ज 859. स्‍फुर्ज 850. निर्जर 851. विज्‍वर 852. ज्‍वरवर्जित 853. ज्‍वरजित् 854. ज्‍वरकर्ता 855. ज्‍वरयुक्त 856. त्रिज्‍वर 857. ज्‍वर 858. जाम्‍बवान् 859. जम्‍बुकाशङ्गी 860. जम्‍बूद्वीप 861. द्विपारिहा 862. शाल्‍मलि 863. शाल्‍मलिद्विप 864. प्‍लक्ष 865. प्‍लक्षवनेश्वर 866. कुशधारी 867. कुश 868. कौशी 869. कौशिक 870. कुशविग्रह 871. कुशस्‍थलीपति 872. काशीनाथ 873. भैरवशासन 874. दाशार्ह 875. सात्‍वत 876. वृष्णि 877. भोज 878. अन्‍धकनिवासकृत 879. अन्‍धक 880. दुन्‍दुभि 881. द्योत 882. प्रद्योत 883. सात्‍वतां पति 884. शूरसेन 885. अनुविषय 886. भोजेश्वर 887. वृष्‍णीश्वर 888. अन्‍धकेश्वर 889. आहुक 890. सर्वनीतिज्ञ 891. उग्रसेन 892. महोग्रवाक 893. उग्रसेनप्रिय 894. प्रार्थ्‍य 895. प्रार्थ 896. यदुसभापति 897. सुधर्माधिपति 898. सत्व 899. वृष्णिचक्रावृत 900. भिषक 901. सभाशील 902. सभादीप 903. सभाग्नि 904. सभारवि 905. सभाचन्‍द्र 906. सभाभास 907. सभादेव 908. सभापति 909. प्रजार्थद 910. प्रजाभर्ता 911. प्रजा-पालनतत्‍पर 912. द्वारकादुर्गसंचारी 913. द्वारकाग्रहविग्रह 914. द्वारकादु:खसंहर्ता 915. द्वारकाजन-मंगल 916. जगन्‍माता 917. जगत्‍त्राता 918. जगद्भर्ता 919. जगत्पिता 920. जगद् बन्‍धु 921. जगद्धाता 922. जगन्मित्र 923. जगत्‍सख 924. ब्रह्मण्‍य-देव 925. ब्रह्मण्‍य 926. ब्रह्मपादरजो दधत् 927. ब्रह्मपादरज:स्‍पर्शी 928. ब्रह्मपाद-निषेवक 929. विप्राड्घ्रिजलपूताङ्ग 930. विप्रसेवापरायण 931. विप्रमुख्‍य 932. विप्रहित 933. विप्रगीतमहाकथ 934. विप्रपादजलार्द्राङ्ग 935. विप्रपादोदकप्रिय 936. विप्रभक्त 937. विप्रगुरु 938. विप्र 939. विप्रपदानुग 940. अक्षौहिणीवृत 941. योद्धा 942. प्रतिमापञ्चसंयुक्त 943. चतुर 944. अगडि़रा 945. पद्मवर्ती 946. सामन्‍तोद् धृतपादुक 947. गजकोटि-प्रयायी 948. रथकोटिजयध्‍वज 949. महारथ 950. अतिरथ 951. जैत्रस्‍यन्‍दनमास्थित 952. नारायणास्‍त्री 953. ब्रह्मास्‍त्री 954. रणश्‍लाघी 955. रणोद्भट 956. मदोत्‍कट 957. युद्धवीर 958. देवासुर-भयंकर 959.करिकर्णमरुत्‍प्रेजत्‍कुन्‍तल-व्‍याप्‍तकुण्‍डल 960. अग्रग 961. वीरसम्‍मर्द 962. मर्द्दल 963. रणदुर्मद 964. भटप्रतिभट 965. प्रोच्‍य 966. बाणवर्षी 967. इषुतोयद 968. खड्गखणिडतसर्वाङ्ग 969. षोडशाब्‍द 970. षडक्षर 971. वीरघोष 972. अक्लिष्‍टवपु 973. वज्रागड़ 974. वज्रभेदन 975. रुग्‍णवज्र 976. भग्रदन्‍त 977. शत्रु-निर्भर्त्‍सनोद्यत 978. अट्टहास 979. पट्टधर 980. पट्टराज्ञीपति 981. पटु 982. कल 983. पटहवादित्र 984. हुंकार 985. गर्जितस्‍वन 986. साधु 987. भक्तपराधीन 988. स्‍वतन्‍त्र 989. साधुभूषण 990. अस्‍वतन्‍त्र 991. साधुमय 992. मनाकसाधुग्रस्‍तमना 993. साधुप्रिय 994. साधुधन 995. साधुज्ञाति 996. सुधा-घन 997. साधुचारी 998. साधुचित्त 999. साधुवश्‍य 1000. शुभास्‍पद महात्‍म्‍य अध्‍ययन 〰️〰️〰️〰️〰️ यह सहस्‍त्र नाम मनुष्‍यों को सब प्रकार की सिद्धि और चतुर्वर्ग (अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष) फल प्रदान करने वाला है। जो इसका सौ बार पाठ करता है, वह इस लोक में विद्यावान होता है, इस सहस्‍त्र नाम का पाठ करने से मनुष्‍य लक्ष्‍मी, वैभव, सद्वंश में जन्‍म, रूप, बल तथा तेज- सब कुछ प्राप्‍त करता है। गंगाजी एवं यमुनाजी के तट पर अथवा देवालय (देव मन्दिर) में इसके एक हजार पाठ करने से जबर्दस्‍ती सिद्धि मिलती है। इसके पाठ से पुत्र की कामना वाले को पुत्र तथा धनार्थी को धन प्राप्‍त होता है। बन्‍धन में पड़ा मनुष्‍य उससे मुक्त हो जाता है और रोगी का रोग चला जाता है। जो मनुष्‍य पुरश्चरण की विधि से पद्धति, पटल, स्‍तोत्र, कवच सहित इस सहस्‍त्र नाम का दस हजार बार पाठ करता है तथा होम, तर्पण, गोदान तथा ब्राह्मण का पूजन रूप कर्म विधिवत् करता है, वह समस्‍त भूमण्‍डल का स्‍वामी चक्रवर्ती राजा होता है। वह अनेक सामन्‍त राजाओं से घिरा रहता है। मद की गन्‍ध से विहल भ्रमर मतवाले हाथियों के कानों की चपेट से आहत हो उड़ते हुए उसके द्वार पर उसकी शोभा बढ़ाते रहते हैं। राजेन्‍द्र ! यदि कोई मनुष्‍य निष्‍काम भाव से रेवती रमण भगवान बलभद्रजी की प्रसन्नता के लिये इस सहस्‍त्र नाम का पाठ करता है तो वह जीवन्‍मुक्त हो जाता है। अच्‍युताग्रज बलभद्रजी सदा-सर्वदा उसके घर में निवास करते हैं। ये महाराज ! घोर पापी मनुष्‍य भी यदि इस सहस्‍त्र नाम का पाठ करता है तो उसके मेरु के समान सारे पाप कट जाते हैं और वह इस लोक में सम्‍पूर्ण सूखों का उपभोग करके अन्‍त में परात्‍पर गोलोकधाम को सुखों का उपभोग करके अन्‍त में परात्‍पर गोलोक धाम को प्रयाण कर जाता है।[1] नारदजी कहते है- अच्‍युताग्रज श्रीबलभद्रजी इस पंचाग को सुनकर धृतिमान दुर्योधन ने सेवा-भाव तथा परम भक्ति के साथ प्राडविपाक मुनि की पूजा की। तदनन्‍तर मुनीन्‍द्र प्राडविपाक जी ने दुर्योधन को आशीर्वाद देकर उनकी अनुमति प्राप्‍त कर हस्तिनापुर से अपने आश्रम को गमन किया। परम ब्रह्म परमात्‍मा भगवान अनन्‍त श्रीबलभद्रजी की कथा को जो पुरुष सुनता अथवा सुनाता है, वह आनन्‍दमय बन जाता है। नृपेन्‍द्र ! मैं आपके सामने इन सब मनोरथों को पूर्ण करने वाले बलभद्र खण्‍ड का वर्णन कर चुका। जो मनुष्‍य इसका श्रवण करता है, वह भगवान श्रीहरि के शोक रहित अखण्‍ड आनन्‍दमय धाम को प्राप्‍त हो जाता है। इस प्रकार श्रीगर्ग संहिता में श्रीबलभद्र खण्‍ड के अन्‍तर्गत प्राडविपाक दुर्योधन संवाद में ‘श्री बलभद्र सहस्‍त्र नाम पूरा हुआ। 🔥 """"गजेन्द्र प्रताप राजभर"""" 🔥 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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Shakti Aug 8, 2020

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