Swami Lokeshanand
Swami Lokeshanand Aug 9, 2020

आज का प्रसंग जीव और संत के मिलन का है। यह प्रसंग हम सब के लिए आश्वासन रूप है। आएँ, विभीषण की अवस्था का विचार करें। क्योंकि जो विभीषण की अवस्था है, न्यूनाधिक हमारी अवस्था भी वैसी ही है। जीव रूपी विभीषण, देह रूपी लंका में रहता है। पर वह क्रोध रूपी कुंभकर्ण, काम रूपी मेघनाद और वासना रूपी सूर्पनखा से घिरा, मोह रूपी रावण के आधीन है। जीव इस देह का असली मालिक होते हुए भी, मोह आदि वृत्तियों का गुलाम है। ये वृत्तियाँ दिन रात उसे जैसा चाहें वैसा नचाती हैं। किम्कर्तव्यविमूढ़ बना जीव, अपने को दीन हीन मानकर, न चाहते हुए भी, पापाचार का मौन समर्थक बना, जन्मजन्मान्तर से, जन्म मरण के बंधन में पड़ा है। उसके कोटि जन्मों में किए सत्कर्मों के फल स्वरूप, भगवान उसके बैठे बिठाए ही, किसी संत को उसके दरवाजे तक पहुँचा देते हैं। पर दुर्भाग्यवश कितने ही विभीषण, संत को संत न जान कर, अपने लाखों जन्मों के बाद मिले, ऐसे अमृत तुल्य लाभ से वंचित ही रह जाते हैं। देखो संत को किसी से धन नहीं चाहिए, जिसे धन चाहिए वो कैसा संत? सच्चा संत तो श्रद्धा चाहता है। संत तो झाड़ू मारने वाले हैं, उनका उपदेश ही झाड़ू है। वे तो बदले में कुछ भी चाहे बिना, आपके हृदय नगर में झाड़ू मार कर, उसमें रहने वाले काम क्रोध मोह आदि को निकाल बाहर कर, आपके हृदय को भगवान के रहने योग्य बना देते हैं। जो मनुष्य श्रद्धा रूपी कीमत चुकाने को तैयार हो, जो क-पट रहित होने को तैयार हो, माने अपने हृदय के दरवाजे संत के लिए खोलने को तैयार हो, उसके भगवान से मिलने में, न कोई संशय कभी था, न है, न होने की संभावना है। एक बार कोई मनुष्य किन्हीं संत को अपना बना ले, प्रसन्न कर ले, तो- "भाविहु मेटि सकहिं त्रिपुरारि" फिर बंधन रहता ही नहीं। देखें विभीषण ने उन्हें कैसे प्रसन्न किया? हनुमानजी ने "राम" लिखा मंदिर देखा तो विचार करने लगे कि यहाँ तो सब मोह के आधीन हैं, यहाँ सज्जन कहाँ से आ गया? इधर संत दरवाजे पर पहुँचा, कि उधर मोह रूपी रात्रि में सोए जीव के जागने का समय आया। विभीषण जागा, उसने कुछ ऐसा किया कि- "हृदय हरष कपि सज्जन चीन्हा" हनुमानजी हृदय में हर्षित हो गए, प्रसन्न हो गए, और उन्होंने विभीषण को सज्जन पहचान लिया। जो विभीषण ने किया, हम भी वही करते चलें। न मालूम कब, हम पर भी भगवान की कृपा बरस जाए- "राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा" जीवन के सब कार्य करते हुए, हम भी राम नाम जपते चलें। अब विडियो- हनुमान जी की प्रसन्नता https://youtu.be/us6gLhSAxQA हनुमानजी को प्रसन्न कैसे करें? https://youtu.be/ImEy3gIr05g

आज का प्रसंग जीव और संत के मिलन का है। यह प्रसंग हम सब के लिए आश्वासन रूप है। आएँ, विभीषण की अवस्था का विचार करें। क्योंकि जो विभीषण की अवस्था है, न्यूनाधिक हमारी अवस्था भी वैसी ही है।
जीव रूपी विभीषण, देह रूपी लंका में रहता है। पर वह क्रोध रूपी कुंभकर्ण, काम रूपी मेघनाद और वासना रूपी सूर्पनखा से घिरा, मोह रूपी रावण के आधीन है। जीव इस देह का असली मालिक होते हुए भी, मोह आदि वृत्तियों का गुलाम है। ये वृत्तियाँ दिन रात उसे जैसा चाहें वैसा नचाती हैं। किम्कर्तव्यविमूढ़ बना जीव, अपने को दीन हीन मानकर, न चाहते हुए भी, पापाचार का मौन समर्थक बना, जन्मजन्मान्तर से, जन्म मरण के बंधन में पड़ा है।
उसके कोटि जन्मों में किए सत्कर्मों के फल स्वरूप, भगवान उसके बैठे बिठाए ही, किसी संत को उसके दरवाजे तक पहुँचा देते हैं।
पर दुर्भाग्यवश कितने ही विभीषण, संत को संत न जान कर, अपने लाखों जन्मों के बाद मिले, ऐसे अमृत तुल्य लाभ से वंचित ही रह जाते हैं।
देखो संत को किसी से धन नहीं चाहिए, जिसे धन चाहिए वो कैसा संत? सच्चा संत तो श्रद्धा चाहता है। संत तो झाड़ू मारने वाले हैं, उनका उपदेश ही झाड़ू है। वे तो बदले में कुछ भी चाहे बिना, आपके हृदय नगर में झाड़ू मार कर, उसमें रहने वाले काम क्रोध मोह आदि को निकाल बाहर कर, आपके हृदय को भगवान के रहने योग्य बना देते हैं।
जो मनुष्य श्रद्धा रूपी कीमत चुकाने को तैयार हो, जो क-पट रहित होने को तैयार हो, माने अपने हृदय के दरवाजे संत के लिए खोलने को तैयार हो, उसके भगवान से मिलने में, न कोई संशय कभी था, न है, न होने की संभावना है।
एक बार कोई मनुष्य किन्हीं संत को अपना बना ले, प्रसन्न कर ले, तो-
"भाविहु मेटि सकहिं त्रिपुरारि"
फिर बंधन रहता ही नहीं। देखें विभीषण ने उन्हें कैसे प्रसन्न किया?
हनुमानजी ने "राम" लिखा मंदिर देखा तो विचार करने लगे कि यहाँ तो सब मोह के आधीन हैं, यहाँ सज्जन कहाँ से आ गया? इधर संत दरवाजे पर पहुँचा, कि उधर मोह रूपी रात्रि में सोए जीव के जागने का समय आया। विभीषण जागा, उसने कुछ ऐसा किया कि-
"हृदय हरष कपि सज्जन चीन्हा"
हनुमानजी हृदय में हर्षित हो गए, प्रसन्न हो गए, और उन्होंने विभीषण को सज्जन पहचान लिया। जो विभीषण ने किया, हम भी वही करते चलें। न मालूम कब, हम पर भी भगवान की कृपा बरस जाए-
"राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा"
जीवन के सब कार्य करते हुए, हम भी राम नाम जपते चलें।
अब विडियो- हनुमान जी की प्रसन्नता 
https://youtu.be/us6gLhSAxQA
हनुमानजी को प्रसन्न कैसे करें?
https://youtu.be/ImEy3gIr05g

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कामेंट्स

R.K.SONI(Ganesh Mandir) Aug 9, 2020
शुभ संध्या जी🌹🌹 राधे राधे जी🙏🙏🙏 आप हमेशा खुश रहो जी

Anilkumar Tailor Sep 23, 2020

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Shakti Sep 24, 2020

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Sarvagya Shukla Sep 23, 2020

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Raj Rani Bansal Sep 26, 2020

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