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vinodkumar mahajan Apr 18, 2021

*कोरोना आपदा विशेष* *ईश्वर और वायरस* (निवेदन है, कि आलेख को पूरा पढें।) डॉ. सुभाष जैन. 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏 आज यह *यक्ष प्रश्न* प्रत्येक जिज्ञासु के मस्तिष्क में कौंध रहा होगा ...... कि *सृष्टि रचियता* जिसे आस्तिक समुदाय ईश्वर, भगवान...आदि मानता है, एवं नास्तिक प्रकृति या कुदरत समझता है; *उसने ऐसे जानलेवा वायरस क्यों बनाए?* *??क्या ईश्वर निर्दयी-क्रूर है ??* वायरस ग्रीक भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है *विष के सूक्ष्मासूक्ष्म अणु* ये विषाणु सृष्टि की उत्पत्ति के दौरान से ही महासागरों के गहरे अंधेरे जल में, गंगा-यमुना, ब्रम्हपुत्र, नील,अमेज़न, टेम्स आदि नदियों के पानी में बह रहे हैं। पूरी पृथ्वी पर इनकी एक महीन चादर बिछी हुई है। प्रकृति में प्रति सेकंड अरबों खरबों वायरस उत्पन्न होते हैं एवम नष्ट होते रहते हैं। समुद्र के 1 लीटर पानी में ही 5000 टाइप के वायरस पाए जाते हैं। अभी तक केवल 1% वायरस के विषय में ही अध्ययन किया सका है। वायरस ईश्वर निर्मित रचना है। क्योंकि इनकी उत्पत्ति भी पृथ्वी पर जीवन के साथ ही हुई थी। वायरस के अंदर भी वही जीवन का रसायन है, जो हम मनुष्य तथा अन्य प्राणियों की कोशिकाओं में भरा होता है। जिसे आप विज्ञान की भाषा में कोई भी नाम दे सकते हैं यथा आरएनए या डीएनए| भारतीय संस्कृति का यह मूल आधार है कि ईश्वर बिना प्रयोजन कोई भी रचना नहीं रचता। प्रत्येक रचना के पीछे उसका सार्थक उद्देश्य होता है। *इस ईश्वरीय अभिप्राय* को समझने के लिए बैक्टीरिया या जीवाणु पर चर्चा करना आवश्यक है। बैक्टीरिया वायरस की तरह निर्जीव नहीं है। वह एक कोशिकीय जीव है, जो अपने आप प्रजनन करते हैं, भोजन बनाते हैं एवं नष्ट हो जाते हैं। बैक्टीरिया वायरस से स्थूल (आकर में बड़े) होते हैं। सूक्ष्म रोगाणुओं से होने वाली बीमारियों में 90 प्रतिशत के लिए यही बेक्टेरिया ही जिम्मेदार होते है। यह अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के होते हैं| *इन्हीं बैक्टीरिया के नियंत्रण, इन की विविधता, तथा इनकी संख्या को नियंत्रित करने के लिए ही विधाता ने वायरस या विषाणु बनाये हैं।* इस पृथ्वी पर, इसके प्रादुर्भाव से ही जीवाणु (बैक्टीरिया) तथा विषाणु (वायरस) का संघर्ष चल रहा है। यदि वायरस ना हो तो ये बैक्टीरिया महासागरों के जल में जहरीली गैसों तथा कार्बन का स्तर इतना अधिक कर देंगे कि वहां जीवन ही विलुप्त हो जाएगा। फलतः सम्पूर्ण ऋतु चक्र असंतुलित होने से पृथ्वी से हरियाली विलुप्त हो जाएगी। *वनस्पति जगत* का शरीर गल कर सड़ जाएगा बैक्टीरिया को शिकार बनाने वाले वायरस को बैक्टीरिया फेज कहा जाता है। इनकी संख्या बैक्टीरिया से कम है। यही इस पृथ्वी के सफाई कर्मचारी हैं। ये नदी ग्लेशियर समुद्र के जल को साफ कर रहे हैं। जल में जीवन को संतुलित करते हैं।जल से ही पृथ्वी पर जीवन बहता है| सन 1896 ईसवी में Ernest Handbury जो कि एक Microbiology के वैज्ञानिक थे, उन्होंने अनुभव किया कि गंगा के जल में हैजे का बैक्टीरिया स्वत ही नष्ट हो जाता है। तब तक वैज्ञानिक वायरस के बारे में जानना तो दूर उसकी कल्पना से भी बहुत दूर थे। सन 1915 में Fadric Twort ब्रिटिश बैक्टीरियोलॉजिस्ट ने इस पहेली को सुलझाया उन्होंने कहा गंगा के जल में एक विषाणु (वाइरस) होता है जो खतरनाक हैजा के जीवाणु (बेक्टेरिया) को कुदरती तौर पर नष्ट कर देता है | ईश्वर ने विषाणुओं (वायरस) को; इंसानों,अन्य जंतुओं, पेड़ पौधों को संक्रमित करने वाले "जीवाणुओं (बेक्टेरिया)" को नष्ट करने निहितार्थ बनाया है। समस्या तब शुरू होती है, जब बैक्टीरिया बनाम वायरस के संघर्ष में इंसान बीच में आ जाता है और "इंसान खुद संक्रमित" हो जाता है। एक उदारहण से स्पष्ट करना चाहूँगा.......... हम अपने घर में अनाज को सुरेरी या छोटे कीड़ों से बचाने के लिए सल्फास जैसे जहर या कीटनाशक का इस्तेमाल करते हैं, और यदि हम उस अनाज को सल्फास कीटनाशक के साथ ही सेवन करें तो हमारे लिए खतरा पैदा हो जाएगा...| मनुष्य से भिन्न अन्य जीव-जंतुओं यथा चमगादड़, दीमक, खोर बर्ड्स आदि कई कीट-पतंगों के शरीर में वायरस सुसुप्त (लेटेंट) अवस्था में छुपे रहते हैं। वायरस की फ्री अवस्था अर्थात किसी जीवधारी के शरीर से बाहर यह उसकी जीवन की दूसरी अवस्था होती है। *जब आप उन्हीं जीव धारियों को ही खा जायेगें तो आपको कौन बचाएगा..!!!* सन 1950 से लेकर 2020 तक जितने भी वायरस पर अध्ययन हुए हैं, उनमे किसी भी शोध में यह निकलकर नहीं आया कि वायरस फल-फूल, सब्जी, अनाज, मेवे, दूध, मिष्ठान आदि शाकाहारी खाद्य सामग्री श्रंखला से शरीर में आता है| ईश्वर ने मनुष्य को बनाया और अपेक्षा की उसकी सर्वश्रेष्ठ रचना *मनुष्य* शाकाहारी, सदाचारी, एवं संयमी रहेगा। वह इन विश्व के अणुओं (विषाणुओ या वायरस) से बचा रहेगा। और ये अणु (विषाणु) ईश्वर-निर्धारित प्रयोजनानुसार जीवाणुओं (बेक्टेरिया) को नियंत्रित करते रहेंगे। अब मनुष्य उड़ने-तैरने वाले सभी कीट-पतंगों-जंतुओं को खा रहा है, तथा अन्य जंतुओं से अप्राकृतिक संबंध भी बना रहा है। हरपीज, एचआईवी, का वायरस ऐसे ही फैला था, जो बंदरों से इंसान में आया था। ईश्वर को ना कोसें.......। ईश्वर सर्वशक्तिमान है.......। वह किसी वायरस बैक्टीरिया या प्राकृतिक आपदा के माध्यम से जीव धारियों को दंड नहीं देता....। ईश्वर यदि ऐसा करे, तो निर्दोष मनुष्य भी मारे जाएंगे; क्योंकि संक्रामक बीमारियां सभी को शिकार बनाती है--- गरीब को, अमीर को, छोटे को, बड़े को...। उसकी कर्मफल दंड व्यवस्था जीव के गर्भ में आने से पहले ही शुरू हो जाती है। इन महामारियों को ऐसे समझे कि मनुष्य अपनी अज्ञानता से स्वयं अपने दुख में वृद्धि कर रहा है। खुद तो मर रहा है, जिनका कोई दोष नहीं है - उन्हें भी मरवा रहा है। ईश्वर का इस कृत्य से कोई सरोकार संबंध नहीं है। कितनी महामारी इस दुनिया में आई, कितनी गई, कितनी और आएंगी.....!!! जीवन जब तक के लिए पृथ्वी पर बना है, जब तक वह फले-फूलेगा! *सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय का चक्र ईश्वर द्वारा संचालित है। उसकी व्यवस्था और रचनाओं को समझो उनका यथा योग्य सम्मान करते हुए उपयोग-उपभोग करो। यज्ञ, योग, साधना, सेवा, संयम में जीवन को लगाओ।* ........और अन्त में........ *मानव कहलाना है, तो मानवता को आत्मसात करो* संकलन : - विनोदकुमार महाजन ✍✍✍

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