Gopal Jalan
Gopal Jalan Sep 16, 2021

शुभ रात्रि जी

शुभ रात्रि जी

+5 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 4 शेयर

कामेंट्स

Daksha Vaishya Sep 16, 2021
मस्त पोसटर पर लखाण सुविचार खुब पसंद आया परसों बड़ा कमेंट लिखा था कि सेरचेट में 10 से 17 तारीख तक कमेंट नहीं कर सकते बेन किया हे फिरभि बहुत टाईम कमेंट किया पर हटा देते हे और बार बार पोस्टर आता हे आप का कमेंट बेन किया नहिं कर सकते दो दिन तो सेरचेट मेरा एकाउंट भि बंद किया फिर वापस सेरचेट खोला अब कल तक कमेंट बेन किया रहेगा परसों आपको बड़ा कमेंट में सब बताया पूरा डिटेल लिखा था माय मंदिर मेरा कमेंट फोक्स कूला हे पर कोई यूजर या भक्त को लिखे क्या अछा नही लगता बार बार कितनी बार नाम और नंबर मांगते लिखति पर नंबर हटा दिया ऐकमेंट फोक्स वाले कूछ हि बेड वर्ड लिख सकते दुसरे लोग का अभि कूछ गाली हो तो में कमेंट करति ऐसा नहिं लिखना दूसरे किसीको देखते ही नहीं ऐ क्या हो रहा हे क्यूं सिर्फ मुझे हेरान करते हे सेरचेट पोस्टर का जवाब भि नहीं दे सकते सेर चेट प्रोफाइल भि बंद किया था गेलेरी से फोटो हि गायब होते हे मेरी किसिसे कोई दुशमनि नहीं फिर भी मुझे क्यूं हे रानी में कंमपेंलन करूं तो गायब गुड नाईट

Mamta Chauhan Oct 20, 2021

+114 प्रतिक्रिया 67 कॉमेंट्स • 220 शेयर

+131 प्रतिक्रिया 45 कॉमेंट्स • 164 शेयर

. कार्तिक माहात्म्य अध्याय - 01 नैमिषारण्य तीर्थ में श्रीसूतजी ने अठ्ठासी हजार शौनकादि ऋषियों से कहा – अब मैं आपको कार्तिक मास की कथा विस्तारपूर्वक सुनाता हूँ, जिसका श्रवण करने से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और अन्त समय में वैकुण्ठ धाम की प्राप्ति होती है। सूतजी ने कहा – श्रीकृष्ण जी से अनुमति लेकर देवर्षि नारद के चले जाने के पश्चात सत्यभामा प्रसन्न होकर भगवान कृष्ण से बोली – हे प्रभु! मैं धन्य हुई, मेरा जन्म सफल हुआ, मुझ जैसी त्रौलोक्य सुन्दरी के जन्मदाता भी धन्य हैं, जो आपकी सोलह हजार स्त्रियों के बीच में आपकी परम प्यारी पत्नी बनी। मैंने आपके साथ नारद जी को वह कल्पवृक्ष आदिपुरुष विधिपूर्वक दान में दिया, परन्तु वही कल्पवृक्ष मेरे घर लहराया करता है। यह बात मृत्युलोक में किसी स्त्री को ज्ञात नहीं है। हे त्रिलोकीनाथ! मैं आपसे कुछ पूछने की इच्छुक हूँ। आप मुझे कृपया कार्तिक माहात्म्य की कथा विस्तारपूर्वक सुनाइये जिसको सुनकर मेरा हित हो और जिसके करने से कल्पपर्यन्त भी आप मुझसे विमुख न हों। सूतजी आगे बोले – सत्यभामा के ऎसे वचन सुनकर श्रीकृष्ण ने हँसते हुए सत्यभामा का हाथ पकड़ा और अपने सेवकों को वहीं रूकने के लिए कहकर विलासयुक्त अपनी पत्नी को कल्पवृक्ष के नीचे ले गये फिर हंसकर बोले – हे प्रिये! सोलह हजार रानियों में से तुम मुझे प्राणों के समान प्यारी हो। तुम्हारे लिए मैंने इन्द्र एवं देवताओं से विरोध किया था। हे कान्ते! जो बात तुमने मुझसे पूछी है, उसे सुनो। एक दिन मैंने (श्रीकृष्ण) तुम्हारी (सत्यभामा) इच्छापूर्ति के लिए गरुड़ पर सवार होकर इन्द्रलोक जाकर कल्पवृक्ष मांगा। इन्द्र द्वारा मना किये जाने पर इन्द्र एवं गरुड़ में घोर संग्राम हुआ और गौ लोक में भी गरुड़ जी गौओं से युद्ध किया। गरुड़ की चोंच की चोट से उनके कान एवं पूंछ कटकर गिरने लगे जिससे तीन वस्तुएँ उत्पन्न हुई। कान से तम्बाकू, पूँछ से गोभी और रक्त से मेहंदी बनी। इन तीनों का प्रयोग करने वाले को मोक्ष नहीं मिलता तब गौओं ने भी क्रोधित होकर गरुड़ पर वार किया जिससे उनके तीन पंख टूटकर गिर गये। इनके पहले पंख से नीलकण्ठ, दूसरे से मोर और तीसरे से चकवा-चकवी उत्पन्न हुए। हे प्रिये! इन तीनों का दर्शन करने मात्र से ही शुभ फल प्राप्त हो जाता है। यह सुनकर सत्यभामा ने कहा – हे प्रभो! कृपया मुझे मेरे पूर्व जन्मों के विषय में बताइए कि मैंने पूर्व जन्म में कौन-कौन से दान, व्रत व जप नहीं किए हैं। मेरा स्वभाव कैसा था, मेरे जन्मदाता कौन थे और मुझे मृत्युलोक में जन्म क्यों लेना पड़ा। मैंने ऎसा कौन सा पुण्य कर्म किया था जिससे मैं आपकी अर्द्धांगिनी हुई? श्रीकृष्ण ने कहा – हे प्रिये! अब मै तुम्हारे द्वारा पूर्व जन्म में किये गये पुण्य कर्मों को विस्तारपूर्वक कहता हूँ, उसे सुनो। पूर्व समय में सतयुग के अन्त में मायापुरी में अत्रिगोत्र में वेद-वेदान्त का ज्ञाता देवशर्मा नामक एक ब्राह्मण निवास करता था। वह प्रतिदिन अतिथियों की सेवा, हवन और सूर्य भगवान का पूजन किया करता था। वह सूर्य के समान तेजस्वी था। वृद्धावस्था में उसे गुणवती नामक कन्या की प्राप्ति हुई। उस पुत्रहीन ब्राह्मण ने अपनी कन्या का विवाह अपने ही चन्द्र नामक शिष्य के साथ कर दिया। वह चन्द्र को अपने पुत्र के समान मानता था और चन्द्र भी उसे अपने पिता की भाँति सम्मान देता था। एक दिन वे दोनों कुश व समिधा लेने के लिए जंगल में गये। जब वे हिमालय की तलहटी में भ्रमण कर रहे थे तब उन्हें एक राक्षस आता हुआ दिखाई दिया। उस राक्षस को देखकर भय के कारण उनके अंग शिथिल हो गये और वे वहाँ से भागने में भी असमर्थ हो गये तब उस काल के समान राक्षस ने उन दोनों को मार डाला। चूंकि वे धर्मात्मा थे इसलिए मेरे पार्षद उन्हें मेरे वैकुण्ठ धाम में मेरे पास ले आये। उन दोनों द्वारा आजीवन सूर्य भगवान की पूजा किये जाने के कारण मैं दोनों पर अति प्रसन्न हुआ। गणेश जी, शिवजी, सूर्य व देवी – इन सबकी पूजा करने वाले मनुष्य को स्वर्ग की प्राप्ति होती है। मैं एक होता हुआ भी काल और कर्मों के भेद से पांच प्रकार का होता हूँ। जैसे – एक देवदत्त, पिता, भ्राता, आदि नामों से पुकारा जाता है। जब वे दोनों विमान पर आरुढ़ होकर सूर्य के समान तेजस्वी, रूपवान, चन्दन की माला धारण किये हुए मेरे भवन में आये तो वे दिव्य भोगों को भोगने लगे। क्रमशः ----------:::×:::---------- "जय जय श्री हरि" ********************************************

+173 प्रतिक्रिया 39 कॉमेंट्स • 173 शेयर
Archana Singh Oct 20, 2021

+95 प्रतिक्रिया 24 कॉमेंट्स • 110 शेयर
Shudha Mishra Oct 20, 2021

+59 प्रतिक्रिया 23 कॉमेंट्स • 117 शेयर
Anup Kumar Oct 20, 2021

+184 प्रतिक्रिया 72 कॉमेंट्स • 109 शेयर
Runa Sinha Oct 20, 2021

+209 प्रतिक्रिया 64 कॉमेंट्स • 84 शेयर
Malti Bansal Oct 20, 2021

+9 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 58 शेयर
Satish Khare Oct 20, 2021

+11 प्रतिक्रिया 2 कॉमेंट्स • 12 शेयर

भारत का एकमात्र धार्मिक सोशल नेटवर्क

Rate mymandir on the Play Store
5000 से भी ज़्यादा 5 स्टार रेटिंग
डेली-दर्शन, भजन, धार्मिक फ़ोटो और वीडियो * अपने त्योहारों और मंदिरों की फ़ोटो शेयर करें * पसंद के पोस्ट ऑफ़्लाइन सेव करें
सिर्फ़ 4.5MB