Ritesh. B. Tiwari
Ritesh. B. Tiwari Jun 3, 2018

जय जय सियाराम

जय जय सियाराम

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कामेंट्स

kamlesh Verma Jun 3, 2018
jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai siyaram jai pawan sut hanuman

अवंतिका Jun 3, 2018
शुभ दोपहर राधे कृष्ण आपका दिन शुभ हो

Shivani Jan 25, 2020

🎪🚩"जय श्री राम 🚩🎪सुप्रभात 🙏 आपका दिन मंगलमय हो 🙏 ✍️👉हे ,,मन तू क्यों उदास होता है।इस संसार का हर सुख-दु:ख मात्र छणिक है।हर एक श्वांस के साथ यह जीवन आगे बढ रहा है और ये सुख-दु:ख के छण भी इसी के साथ बदलते जाते है। "हे ,,मन तू किनके लिये आसूं बहाता है और किनके लिये द्वेश भाव रखता है, तू किसे अपना और किसे पराया समझ बैठा है। "हे मन ये सब छणिक संबंध है।जिनको समय के साथ छूट जाना है।तू उनके लिये रो रहा है जो तेरे कभी थे ही नही और तू उनसे द्वेश करता है जो एक दिन स्वत: समाप्त हो जायेगें। ""हे,, मन तू इस संसार में आने से पहले किन रिस्तो को जानता था और तेरे इस संसार से जाने के बाद तेरे साथ कौन से रिश्ते जायेगें। "हे,, मूढ मन तू ना ही ब्राह्मण है,ना ही क्षत्रिय,तू ना ही वैश्य है और ना ही शूद्र।तू ना ही गरीब है और ना ही अमीर।तो तू क्यों इन वर्णो के झमेले में पड गया।ये सारे गुण है।जो इसी शरीर के साथ समाप्त हो जायेगें।फिर तू क्यों किसी से प्रेम और किसी से ईर्ष्या भाव रखता है। "हे ,,मूढ मन तेरा तो यह शरीर भी तेरा नही है,तेरी श्वांसे भी तेरी नही है।फिर तूने इस शरीर से बने संबंधो और इस शरीर के लिये बनी सुविधा व असुविधाओ में क्यों उलझ गया। "हे ,,मन तू तो नित्य स्वतंत्र है।तो तू पराधीन कैसे हो गया।तूने क्या ऐसा कर दिया जिसके लिये तू अभिमान कर रहा है।ये सब कुछ तो छूटने वाले जड पदार्थ है जिनको तूने मूर्खता वस अपना समझ लिया है। "हे ,,मन तू किसकी आशा में मगन हो रहा है और किसके वियोग में रो रहा है।जब की ये सब ही नाशवान है।इस लिये हे मन तू अपने वास्तविक स्वरूप का ध्यान कर।तू एक स्वतंत्र चैतन्य है।तू कभी ना समाप्त होने वाला और सदा ही स्वतंत्र भाव से प्रकृति के साथ रमण करने वाला परम प्रसन्न रहने वाला,परम शांत चैतन्य आत्मा है।इस लिये तू अपने वास्तविक स्वरूप का ध्यान कर और शांति में डूब जा। "हे ,,मन तू इस प्राकृतिक शरीर और इससे रहने वाले हर संबंध से परे है।इस लिये तू अपने उस वास्तविक आत्म स्वरूप का ध्यान कर और परम शांति में डूब जा।क्योंकि तू शांति के लिये है अशांत होना तेरा स्वभाव नही है।इस लिये तू अपने निज स्वरूप का ध्यान कर और अपनी परम शांति में डूब जा।....

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Narendra Singh Rao Jan 25, 2020

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jatan kurveti Jan 24, 2020

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Rajkumar Malakar Jan 25, 2020

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maghar.s.p. Jan 25, 2020

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ShubhAm SaiNi Jan 24, 2020

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