राजा दिलीप की कथा 〰️〰️🔸〰️🔸〰️〰️ रघुवंश का आरम्भ राजा दिलीप से होता है । जिसका बड़ा ही सुन्दर और विशद वर्णन महाकवि कालिदास ने अपने महाकाव्य रघुवंशम में किया है । कालिदास ने राजा दिलीप, रघु, अज, दशरथ, राम, लव, कुश, अतिथि और बाद के बीस रघुवंशी राजाओं की कथाओं का समायोजन अपने काव्य में किया है। राजा दिलीप की कथा भी उन्हीं में से एक है। राजा दिलीप बड़े ही धर्मपरायण, गुणवान, बुद्धिमान और धनवान थे । यदि कोई कमी थी तो वह यह थी कि उनके कोई संतान नहीं थी । सभी उपाय करने के बाद भी जब कोई सफलता नहीं मिली तो राजा दिलीप अपनी पत्नी सुदक्षिणा को लेकर महर्षि वशिष्ठ के आश्रम संतान प्राप्ति का आशीर्वाद प्राप्त करने पहुंचे । महर्षि वशिष्ठ ने राजा का आथित्य सत्कार किया और आने का प्रयोजन पूछा तो राजा ने अपने निसंतान होने की बात बताई । तब महर्षि वशिष्ठ बोले – “ हे राजन ! तुमसे एक अपराध हुआ है, इसलिए तुम्हारी अभी तक कोई संतान नहीं हुई है ।” तब राजा दिलीप ने आश्चर्य से पूछा – “ गुरुदेव ! मुझसे ऐसा कोनसा अपराध हुआ है कि मैं अब तक निसंतान हूँ। कृपा करके मुझे बताइए ?” महर्षि वशिष्ठ बोले – “ राजन ! एक बार की बात है, जब तुम देवताओं की एक युद्ध में सहायता करके लौट रहे थे । तब रास्ते में एक विशाल वटवृक्ष के नीचे देवताओं को भोग और मोक्ष देने वाली कामधेनु विश्राम कर रही थी और उनकी सहचरी गौ मातायें निकट ही चर रही थी। तुम्हारा अपराध यह है कि तुमने शीघ्रतावश अपना विमान रोककर उन्हें प्रणाम नहीं किया । जबकि राजन ! यदि रास्ते में कहीं भी गौवंश दिखे तो दायीं ओर होकर राह देते हुयें उन्हें प्रणाम करना चाहिए । यह बात तुम्हे गुरुजनों द्वारा पूर्वकाल में ही बताई जा चुकी थी । लेकिन फिर भी तुमने गौवंश का अपमान और गुरु आज्ञा का उलंघन किया है । इसीलिए राजन ! तुम्हारे घर में अभी तक कोई संतान नहीं हुई ।” महर्षि वशिष्ठ की बात सुनकर राजा दिलीप बड़े दुखी हुए। आँखों में अश्रु लेकर और विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर राजा दिलीप गुरु वशिष्ठ से प्रार्थना करने लगे – “ गुरुदेव ! मैं मानता हूँ कि मुझसे अपराध हुआ है किन्तु अब इसका कोई तो उपाय होगा ?” तब महर्षि वशिष्ठ बोले – “ एक उपाय है राजन ! ये है मेरी गाय नंदिनी है जो कामधेनु की ही पुत्री है। इसे ले जाओ और इसके संतुष्ट होने तक दोनों पति – पत्नी इसकी सेवा करो और इसी के दुग्ध का सेवन करो । जब यह संतुष्ट होगी तो तुम्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी ।” ऐसा आशीर्वाद देकर महर्षि वशिष्ठ ने राजा दिलीप को विदा किया। अब राजा दिलीप प्राण – प्रण से नंदिनी की सेवा में लग गये । जब नंदिनी चलती तो वह भी उसी के साथ – साथ चलते, जब वह रुक जाती तो वह भी रुक जाते । दिनभर उसे चराकर संध्या को उसके दुग्ध का सेवन करके उसी पर निर्वाह करते थे। एक दिन संयोग से एक सिंह ने नंदिनी पर आक्रमण कर दिया और उसे दबोच लिया । उस समय राजा दिलीप कोई अस्त्र – शस्त्र चलाने में भी असमर्थ हो गया । कोई उपाय न देख राजा दिलीप सिंह से प्रार्थना करने लगे – “ हे वनराज ! कृपा करके नंदिनी को छोड़ दीजिये, यह मेरे गुरु वशिष्ठ की सबसे प्रिय गाय है । मैं आपके भोजन की अन्य व्यवस्था कर दूंगा ।” तो सिंह बोला – “नहीं राजन ! यह गाय मेरा भोजन है अतः मैं उसे नहीं छोडूंगा । इसके बदले तुम अपने गुरु को सहस्त्रो गायें दे सकते हो ।” बिलकुल निर्बल होते हुए राजा दिलीप बोले – “ हे वनराज ! आप इसके बदले मुझे खा लो, लेकिन मेरे गुरु की गाय नंदिनी को छोड़ दो ।” तब सिंह बोला – “यदि तुम्हें प्राणों का मोह नहीं है तो इसके बदले स्वयं को प्रस्तुत करो । मैं इसे अभी छोड़ दूंगा ।” कोई उपाय न देख राजा दिलीप ने सिंह का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और स्वयं सिंह का आहार बनने के लिए तैयार हो गया । सिंह ने नंदिनी गाय को छोड़ दिया और राजा को खाने के लिए उसकी ओर झपटा । लेकिन तत्क्षण हवा में गायब हो गया। तब नंदिनी गाय बोली – “ उठो राजन ! यह मायाजाल, मैंने ही आपकी परीक्षा लेने के लिए रचा था । जाओ राजन ! तुम दोनों दम्पति ने मेरे दुग्ध पर निर्वाह किया है अतः तुम्हें एक गुणवान, बलवान और बुद्धिमान पुत्र की प्राप्ति होगी ।” इतना कहकर नंदिनी अंतर्ध्यान हो गई। उसके कुछ दिन बाद नंदिनी के आशीर्वाद से महारानी सुदक्षिणा ने एक पुत्र को जन्म दिया जो रघु के नाम से विख्यात हुआ और उसके पराक्रम के कारण ही इस वंश को रघुवंश के नाम से जाना जाता है । महाकवि कालिदास ने भी इसी रघु के नाम पर अपने महाकाव्य का नाम “रघुवंशम” रखा । 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

राजा दिलीप की कथा
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रघुवंश का आरम्भ राजा दिलीप से होता है । जिसका बड़ा ही सुन्दर और विशद वर्णन महाकवि कालिदास ने अपने महाकाव्य रघुवंशम में किया है । कालिदास ने राजा दिलीप, रघु, अज, दशरथ, राम, लव, कुश, अतिथि और बाद के बीस रघुवंशी राजाओं की कथाओं का समायोजन अपने काव्य में किया है। राजा दिलीप की कथा भी उन्हीं में से एक है।

राजा दिलीप बड़े ही धर्मपरायण, गुणवान, बुद्धिमान और धनवान थे । यदि कोई कमी थी तो वह यह थी कि उनके कोई संतान नहीं थी । सभी उपाय करने के बाद भी जब कोई सफलता नहीं मिली तो राजा दिलीप अपनी पत्नी सुदक्षिणा को लेकर महर्षि वशिष्ठ के आश्रम संतान प्राप्ति का आशीर्वाद प्राप्त करने पहुंचे ।

महर्षि वशिष्ठ ने राजा का आथित्य सत्कार किया और आने का प्रयोजन पूछा तो राजा ने अपने निसंतान होने की बात बताई । तब महर्षि वशिष्ठ बोले – “ हे राजन ! तुमसे एक अपराध हुआ है, इसलिए तुम्हारी अभी तक कोई संतान नहीं हुई है ।”

तब राजा दिलीप ने आश्चर्य से पूछा – “ गुरुदेव ! मुझसे ऐसा कोनसा अपराध हुआ है कि मैं अब तक निसंतान हूँ। कृपा करके मुझे बताइए ?”

महर्षि वशिष्ठ बोले – “ राजन ! एक बार की बात है, जब तुम देवताओं की एक युद्ध में सहायता करके लौट रहे थे । तब रास्ते में एक विशाल वटवृक्ष के नीचे देवताओं को भोग और मोक्ष देने वाली कामधेनु विश्राम कर रही थी और उनकी सहचरी गौ मातायें निकट ही चर रही थी।

 तुम्हारा अपराध यह है कि तुमने शीघ्रतावश अपना विमान रोककर उन्हें प्रणाम नहीं किया । जबकि राजन ! यदि रास्ते में कहीं भी गौवंश दिखे तो दायीं ओर होकर राह देते हुयें उन्हें प्रणाम करना चाहिए । यह बात तुम्हे गुरुजनों द्वारा पूर्वकाल में ही बताई जा चुकी थी । लेकिन फिर भी तुमने गौवंश का अपमान और गुरु आज्ञा का उलंघन किया है । इसीलिए राजन ! तुम्हारे घर में अभी तक कोई संतान नहीं हुई ।” महर्षि वशिष्ठ की बात सुनकर राजा दिलीप बड़े दुखी हुए।

आँखों में अश्रु लेकर और विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर राजा दिलीप गुरु वशिष्ठ से प्रार्थना करने लगे – “ गुरुदेव ! मैं मानता हूँ कि मुझसे अपराध हुआ है किन्तु अब इसका कोई तो उपाय होगा ?”

तब महर्षि वशिष्ठ बोले – “ एक उपाय है राजन ! ये है मेरी गाय नंदिनी है जो कामधेनु की ही पुत्री है। इसे ले जाओ और इसके संतुष्ट होने तक दोनों पति – पत्नी इसकी सेवा करो और इसी के दुग्ध का सेवन करो । जब यह संतुष्ट होगी तो तुम्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी ।” ऐसा आशीर्वाद देकर महर्षि वशिष्ठ ने राजा दिलीप को विदा किया।

अब राजा दिलीप प्राण – प्रण से नंदिनी की सेवा में लग गये । जब नंदिनी चलती तो वह भी उसी के साथ – साथ चलते, जब वह रुक जाती तो वह भी रुक जाते । दिनभर उसे चराकर संध्या को उसके दुग्ध का सेवन करके उसी पर निर्वाह करते थे।

एक दिन संयोग से एक सिंह ने नंदिनी पर आक्रमण कर दिया और उसे दबोच लिया । उस समय राजा दिलीप कोई अस्त्र – शस्त्र चलाने में भी असमर्थ हो गया । कोई उपाय न देख राजा दिलीप सिंह से प्रार्थना करने लगे – “ हे वनराज ! कृपा करके नंदिनी को छोड़ दीजिये, यह मेरे गुरु वशिष्ठ की सबसे प्रिय गाय है । मैं आपके भोजन की अन्य व्यवस्था कर दूंगा ।”

तो सिंह बोला – “नहीं राजन ! यह गाय मेरा भोजन है अतः मैं उसे नहीं छोडूंगा । इसके बदले तुम अपने गुरु को सहस्त्रो गायें दे सकते हो ।”

बिलकुल निर्बल होते हुए राजा दिलीप बोले – “ हे वनराज ! आप इसके बदले मुझे खा लो, लेकिन मेरे गुरु की गाय नंदिनी को छोड़ दो ।”

तब सिंह बोला – “यदि तुम्हें प्राणों का मोह नहीं है तो इसके बदले स्वयं को प्रस्तुत करो । मैं इसे अभी छोड़ दूंगा ।”

कोई उपाय न देख राजा दिलीप ने सिंह का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और स्वयं सिंह का आहार बनने के लिए तैयार हो गया । सिंह ने नंदिनी गाय को छोड़ दिया और राजा को खाने के लिए उसकी ओर झपटा । लेकिन तत्क्षण हवा में गायब हो गया।

तब नंदिनी गाय बोली – “ उठो राजन ! यह मायाजाल, मैंने ही आपकी परीक्षा लेने के लिए रचा था । जाओ राजन ! तुम दोनों दम्पति ने मेरे दुग्ध पर निर्वाह किया है अतः तुम्हें एक गुणवान, बलवान और बुद्धिमान पुत्र की प्राप्ति होगी ।” इतना कहकर नंदिनी अंतर्ध्यान हो गई।

उसके कुछ दिन बाद नंदिनी के आशीर्वाद से महारानी सुदक्षिणा ने एक पुत्र को जन्म दिया जो रघु के नाम से विख्यात हुआ और उसके पराक्रम के कारण ही इस वंश को रघुवंश के नाम से जाना जाता है । महाकवि कालिदास ने भी इसी रघु के नाम पर अपने महाकाव्य का नाम “रघुवंशम” रखा ।
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श्रीमद्देवीभागवत (चौथा स्कन्ध) 〰️〰️🌼〰️🌼🌼〰️🌼〰️〰️ अध्याय 7 (भाग 1) ॥श्रीभगवत्यै नमः ॥ नारायण से नर की बातचीत... 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ व्यासजी कहते हैं- अप्सराओं के उपर्युक्त वचन सुनकर धर्मनन्दन प्रतापी नारायण मन ही-मन सोचने लगे- अब मुझे क्या करना चाहिये ? अहंकार से ही यह प्रसंग सामने उपस्थित हुआ है। इसमें अधिक क्या विचार किया जा सकता है। धर्म की धज्जी उड़ाने में प्रधान कारण अभिमान ही है, जिसकी सृष्टि मैं पूर्वकाल में कर चुका हूँ। अतएव महात्माओं ने कहा है - यह संसार एक वृक्ष है, इसकी जड़ अहंकार है। जिस समय अप्सराओं का समाज आया, उस समय उन्हें देखकर बिना कुछ बातचीत किये ही मुझे शान्त होकर बैठ जाना चाहिये था। किंतु मैं उनके साथ सम्भाषण करने में प्रवृत्त हो गया। परिणाम स्वरूप मैं स्वयं दुःख का भाजन बन गया। फिर मैंने धर्म का अपव्यय करके उन स्त्रियों की रचना की। मेरी ठीक वही दशा हो गयी, जैसे अपने ही बनाये हुए जाल में जकड़ी हुई मकड़ी हो । बड़े ही दृढ़ बन्धन से मैं बँध गया। अतः अब इसके बाद मुझे क्या करना चाहिये – यह विषय विचारणीय है। यदि निश्चिन्त होकर इन स्त्रियों को ठुकरा दूँ तो विफल मनोरथ होने पर ये सभी मुझे शाप देकर यहाँ से चली जायँगी! तब मैं उनसे मुक्त हो इस निर्जन वनमें पुनः उत्तम तप कर लूँगा। अतएव कुपित होकर इन सुन्दरी स्त्रियों को त्याग देना श्रेयस्कर है । व्यासजी कहते हैं- उस समय मुनिवर नारायणके मन में ऐसा निश्चय होने के पश्चात् फिर विचार उत्पन्न हुआ - अरे, सुखी बनने के लिये जो साधन है, उसमें क्रोध भी एक महान् शत्रु ही है। पहला नम्बर अहंकार का है और दूसरा इस क्रोधका। इसके प्रभाव से अत्यन्त कष्ट उठाना पड़ता है। जगत् में काम और लोभ - इन दोनों से भी बढ़कर इस क्रोध को भयंकर बतलाया गया है। क्रोध में भरकर मानव हिंसा तक कर बैठता है। प्राणी की निर्मम हत्या को ही हिंसा कहते हैं । सम्पूर्ण प्राणियों के लिये यह बड़ी दुःखद है। इसे नरक की विस्तृत नदी ही समझना चाहिये। जिस प्रकार काष्ठ का मन्थन करने से निकली आग उस काष्ठ को ही जलाकर राख कर डालती है, उसी प्रकार देह से उत्पन्न हुआ भयंकर क्रोध उस देहको ही सर्वप्रथम जलाने में तत्पर हो जाता है। व्यासजी कहते हैं- इस प्रकार नारायण के मन में चिन्ता की काली घटा घिरी थी। वे अत्यन्त घबरा उठे थे। तब धर्म के पुत्र नर ने उन अपने भाई नारायणसे सच्ची बात कहनी आरम्भ की। नारायण! आप महान् महात्मा नर बोले- भाग्यशाली पुरुष हैं। महामते! क्रोध दूर कीजिये । मन में शान्ति स्थापित करके इस प्रबल अहंकार को हटा देना परम आवश्यक है। आपको स्मरण होगा, पूर्व समय में अहंकार के दोष से ही हम दोनों व्यक्ति अपनी तपस्या खो बैठे थे। उस समय अहंकार और क्रोध-दोनों भाव जाग्रत् हो गये थे। उन्हीं के प्रभाववश दैत्यराज प्रह्लाद से हमारा महान् अद्भुत युद्ध छिड़ गया था। देवताओं के वर्ष से एक हजार वर्ष तक हम लड़ते रहे। सुरोत्तम! उस अवसर पर हमें असीम क्लेश भोगना पड़ा था। अतएव मुनीश्वर ! आप क्रोध का परित्याग करके शान्त होने की कृपा कीजिये; क्योंकि मन में शान्तभाव बनाये रखना तप का मूल कारण है- ऐसा मुनिगण कहते हैं। क्रमश... शेष अगले अंक में जय माता जी की 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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संक्षिप्त योगवशिष्ठ (निर्वाण-प्रकरण-पूर्वार्ध) (चौतीसवां दिन) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्री गणेशाय नमः ॐ श्रीपरमात्मनेनमः भुशुण्ड की वास्तविक स्थिति का निरूपण, वसिष्ठजी द्वारा भुशुण्ड की प्रशंसा, भुशुण्ड द्वारा वसिष्ठ जी का पूजन तथा आकाशमार्ग से वसिष्ठजी की स्वलोक प्राप्ति...(भाग 2) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्रीवसिष्ठजी ने कहा- - 'ऐश्वर्यपूर्ण पक्षिराज ! यह बड़े हर्ष का विषय है, जो आपने कानों के लिये भूषण स्वरूप यह अत्यन्त आश्चर्यमयी अपनी अलौकिक स्थिति मुझसे कही है । महात्मा धन्य हैं, जो ब्रह्माजी के समान स्थित अत्यन्त दीर्घजीवी आपके दर्शन करते हैं। । ये मेरे नेत्र भी धन्य हैं, जो बराबर आपके दर्शन कर रहे हैं। आपने मुझसे बुद्धि को पवित्र करने वाला अपना सम्पूर्ण जीवन-वृत्तान्त ज्यो-का-त्यों ठीक-ठीक कहा है । मैंने सब दिशाओं में भ्रमण किया और देवताओं एवं बड़े-बड़े तत्ववेत्ताओं की ज्ञान आदि विभूतियों को देखा, परंतु इस जगत् में आपके समान दूसरे किसी महान् ज्ञानी को नहीं देखा । इस संसार में भ्रमण करने पर किसी को किसी महान् पुरुष की प्राप्ति हो भी सकती है; परंतु आप-जैसे ज्ञानी महात्माओं का प्राप्त होना तो इस जगत् में कहीं भी सुलभ नहीं है अर्थात दुर्लभ है । पुण्य-देह एवं विमुक्तात्मा आपका अवलोकन करके मैंने तो आज अत्यन्त कल्याणकर एक बहुत बड़ा कार्य सम्पादन कर लिया है। पक्षिराज ! तुम्हारा कल्याण हो । तुम अपनी शुभ गुफा में प्रवेश करो; क्योंकि मध्याह्न कर्तव्य के लिये मेरा समय हो गया है; अतः मैं भी देवलोक में जा रहा हूँ ।' श्रीराम ! यह सुनकर चिरंजीवी भुशुण्ड ने वृक्ष से उठकर अर्थ्य, पाद्य और पुष्पों से त्रिनेत्रधारी महादेवजी के समान मेरी पैर से लेकर मस्तकपर्यन्त भक्तिपूर्वक पूजा की । तदनन्तर 'आप मेरे पीछे चलने के लिये अधिक श्रम न करें इस प्रकार कहता हुआ मैं आसन से उठकर आकाश मार्ग से चला गया । भुशुण्ड का स्मरण करते हुए अरुन्धती से पूजित मैंने भी सप्तर्षि मण्डल को प्राप्तकर मुनियों का दर्शन किया । श्रीराम ! सत्ययुग के प्रथम दो शतक जब व्यतीत हो चुके थे, तब मेरु पर्वत के उस कल्पवृक्ष पर भुशुण्ड के साथ मैंने पहले-पहल भेंट की थी । इस समय सत्ययुग के क्षीण हो जाने पर त्रेतायुग चल रहा है और इस त्रेतायुग के मध्य में आप प्रकट हुए हैं। आज से आठ वर्ष पहले सुमेरु पर्वत के उसी शिखर के ऊपर ज्यों-का त्यों अजररूपधारी वह भुशुण्ड मुझसे फिर मिला था । इस प्रकार का विचित्र उत्तम भुशुण्ड वृत्तान्त मैंने तुमसे कहा, इसका श्रवण और विचार करके जैसा उचित समझो, वैसा करो । श्रीवाल्मीकि जी कहते हैं-- भरद्वाज ! बुद्धिमान् भुशुण्ड की इस उत्तम कथा का जो विशुद्धबुद्धि मनुष्य भली प्रकार विवेक पूर्वक विचार करेगा, वह इसी शरीर में जन्मादि भयों से परिपूर्ण इस माया-नदी को पार कर जायगा । ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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श्रीमद्भागवत महापुराणम् 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ पञ्चम स्कन्ध: अथाअष्टादशोऽध्यायः भिन्न-भिन्न वर्षो का वर्णन...(भाग 2) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ यत्सङ्गलब्धं निजवीर्यवैभवं तीर्थं मुहुः संस्पृशतां हि मानसम् । हरत्यजोऽन्तः श्रुतिभिर्गतोऽङ्गजं को वै न सेवेत मुकुन्दविक्रमम् ॥ ११ यस्यास्ति भक्तिर्भगवत्यकिञ्चना सर्वैर्गुणैस्त समासते सुराः । हरावभक्तस्य कुतो महगुणा मनोरथेनासति धावतो बहिः ॥ १२ हरिर्हि साक्षाद्भगवान् शरीरिणा मात्मा झषाणामिव तोयमीप्सितम् । हित्वा महांस्तं यदि सज्जते गृहे तदा महत्त्वं वयसा दम्पतीनाम् ॥ १३ तस्माद्रजोरागविषादमन्यु मानस्पृहाभयदैन्याधिमूलम् हित्वा गृहं संसृतिचक्रवालं नृसिंहप भजताकुतोभयमिति ॥ १४ केतुमालेऽपि भगवान् कामदेवस्वरूपेण लक्ष्म्याः प्रियचिकीर्षया प्रजापतेर्दुहितॄणां पुत्राणां तद्वर्षपतीनां पुरुषायुषाहोरात्र परिसंख्यानानां यासां गर्भा महापुरुषमहास्त्र तेजसोद्वेजितमनसां विध्वस्ता व्यसवः संवत्सरान्ते विनिपतन्ति ।। १५ ।। अतीव सुललित गतिविलासविलसितरुचिरहासलेशावलोक लीलयाकिञ्चिदुत्तम्भितसुन्दर धूमण्डलसुभग वदनारविन्दश्रिया रमां रमयन्निन्द्रियाणि रमयते ॥ १६ ॥ तद्भगवतो मायामयं रूपं परमसमाधियोगेन रमा देवी संवत्सरस्य रात्रिषु प्रजापतेर्दुहितृभिरुपेताहः सु च तद्भर्तृभिरुपास्ते इदं चोदाहरति ।। १७ ।। ॐ ह्रां ह्रीं हूँ ॐ नमो भगवते हृषीकेशाय सर्वगुणविशेषैर्विलक्षितात्मने आकूतीनां चित्तीनां चेतसां विशेषाणां चाधिपतये षोडशकलाय च्छन्दोमयायान्नमयायामृतमयाय सर्वमयाय सहसे ओजसे बलाय कान्ताय कामाय नमस्ते उभयत्र भूयात् ॥ १८ ॥ स्त्रियो व्रतैस्त्वा हृषिकेश्वरं स्वतो ह्याराध्य लोके पतिमाशासतेऽन्यम् । तासां न ते वै परिपान्त्यपत्यं प्रियं धनायूंषि यतोऽस्वतन्त्राः ॥ १९ स वै पतिः स्यादकुतोभयः स्वयं समन्ततः पाति भयातुरं जनम् । स एक एवेतरथा मिथो भयं नैवात्मलाभादधि मन्यते परम् ॥ २० श्लोकार्थ 〰️〰️〰️ उन भगवद्भक्तों के सङ्ग से भगवान्‌ के तीर्थतुल्य पवित्र चरित्र सुनने को मिलते हैं, जो उनकी असाधारण शक्ति एवं प्रभावके सूचक होते हैं। उनका बार-बार सेवन करने वालों के कानों के रास्ते से भगवान् हृदय में प्रवेश कर जाते हैं और उनके सभी प्रकार के दैहिक और मानसिक मलों को नष्ट कर देते हैं। फिर भला, उन भगवद्भक्तों का सङ्ग कौन न करना चाहेगा ? ॥ ११ ॥ जिस पुरुष की भगवान्‌ में निष्काम भक्ति है, उसके हृदय में समस्त देवता धर्म-ज्ञानादि सम्पूर्ण सद्गुणों के सहित सदा निवास करते हैं। किन्तु जो भगवान् का भक्त नहीं है, उसमें महापुरुषों के वे गुण आ ही कहाँ से सकते हैं? वह तो तरह-तरह के सङ्कल्प करके निरन्तर तुच्छ बाहरी विषयों की ओर ही दौड़ता रहता है ॥ १२ ॥ जैसे मछलियों को जल अत्यन्त प्रिय - उनके जीवन का आधार होता है, उसी प्रकार साक्षात् श्रीहरि ही समस्त देहधारियों के प्रियतम आत्मा हैं। उन्हें त्यागकर यदि कोई महत्त्वाभिमानी पुरुष घर में आसक्त रहता है तो उस दशा में स्त्री-पुरुषों का बड़प्पन केवल आयु को लेकर ही माना जाता है; गुण की दृष्टि से नहीं ॥ १३ ॥ अतः असुरगण ! तुम तृष्णा, राग, विषाद, क्रोध, अभिमान, इच्छा, भय, दीनता और मानसिक सन्ताप के मूल तथा जन्म-मरणरूप संसारचक्र का वहन करने वाले गृह आदि को त्यागकर भगवान् नृसिंह के निर्भय चरणकमलों का आश्रय लो ॥ १४ ॥ केतुमालवर्ष में लक्ष्मीजी का तथा संवत्सर नामक प्रजापति के पुत्र और पुत्रियों का प्रिय करने के लिये भगवान् कामदेवरूप से निवास करते हैं। उन रात्रि की अभिमानी देवतारूप कन्याओं और दिवसाभिमानी देवतारूप पुत्रों की संख्या मनुष्य की सौ वर्ष की आयु के दिन और रात के बराबर अर्थात् छत्तीस-छत्तीस हजार वर्ष है और वे ही उस वर्ष के अधिपति हैं। वे कन्याएँ, परमपुरुष श्रीनारायण श्रेष्ठ अस्त्र सुदर्शनचक्र के तेज से डर जाती है; इसलिये प्रत्येक वर्ष के अन्त में उनके गर्भ नष्ट होकर गिर जाते हैं ।। १५ ।। भगवान् अपने सुललित गति-विलास से सुशोभित मधुर मधुर मन्द-मुसकान से मनोहर लीलापूर्ण चारु चितवन से कुछ उझके हुए सुन्दर धूमण्डल की छबीली छटा के द्वारा वदनारविन्द का राशि-राशि सौन्दर्य उँडेलकर सौन्दर्यदेवी श्रीलक्ष्मी को अत्यन्त । आनन्दित करते और स्वयं भी आनन्दित होते रहते हैं ॥ १६ ॥ श्रीलक्ष्मीजी परम समाधियो गके द्वारा भगवान् के उस मायामय स्वरूप की रात्रि के समय प्रजापति संवत्सर की कन्याओं सहित और दिन में उनके पतियों के सहित आराधना और वे इस मन्त्र का जप करती हुई भगवान् की स्तुति करती हैं ॥ १७ ॥ 'जो इन्द्रियों के नियन्ता और सम्पूर्ण श्रेष्ठ वस्तुओं के आकर हैं, क्रियाशक्ति, ज्ञानशक्ति और सङ्कल्प-अध्यवसाय आदि चित्त के धर्मों तथा उनके विषयों के अधीश्वर हैं, ग्यारह इन्द्रिय और पाँच विषय — इन सोलह कलाओं से युक्त हैं, वेदोक्त कर्मों से प्राप्त होते हैं तथा अन्नमय, अमृतमय और सर्वमय है— उन मानसिक, ऐन्द्रियक एवं शारीरिक बलस्वरूप परम सुन्दर भगवान् कामदेव को 'ॐ ह्रां ह्रीं हूं'इन बीजमन्त्रों के सहित सब ओर से नमस्कार है' ।। १८ ।। 'भगवन् ! आप इन्द्रियों के अधीश्वर हैं। स्त्रियाँ तरह-तरह के कठोर व्रतों से आपकी ही आराधना करके अन्य लौकिक पतियों की इच्छा किया करती हैं। किन्तु वे उनके प्रिय पुत्र, धन और आयुकी रक्षा नहीं कर सकते; क्योंकि वे स्वयं ही परतन्त्र हैं ॥ १९ ॥ सच्चा पति (रक्षा करने वाला या ईश्वर) वही है, जो स्वयं सर्वथा निर्भय हो और दूसरे भयभीत लोगों की सब प्रकार से रक्षा कर सके। ऐसे पति एकमात्र आप ही हैं; यदि एक से अधिक ईश्वर माने जायँ, तो उन्हें एक-दूसरे से भय होने की सम्भावना है। अतएव आप अपनी प्राप्ति से बढ़कर और किसी लाभ को नहीं मानते ॥ २० ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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संक्षिप्त भविष्य पुराण 〰️〰️🌸🌸🌸〰️〰️ ★उत्तरपर्व (चतुर्थ खण्ड)★ (पचहत्तरवां दिन) ॐ श्री परमात्मने नमः श्री गणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय श्रीवृक्ष नवमी व्रत कथा...(भाग 1) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा- महाराज! देवता और दैत्यों ने जब समुद्र मन्थन किया था, तब उस समय समुद्र से निकली हुई लक्ष्मी को देखकर सभी की यह इच्छा हुई कि मैं ही लक्ष्मी को प्राप्त कर लूँ। लक्ष्मी की प्राप्ति को लेकर देवता औरदैत्यों में परस्पर युद्ध होने लगा। उस समय लक्ष्मी ने कुछ देर के लिये बिल्ववृक्ष का आश्रय ग्रहण कर लिया। भगवान् विष्णु ने सभी को जीतकर लक्ष्मी का वरण किया। लक्ष्मी ने बिल्ववृक्ष का आश्रय ग्रहण किया था, इसलिये उसे श्रीवृक्ष भी कहते हैं। अतः भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को श्रीवृक्ष-नवमी-व्रत करना चाहिये। सूर्योदय के समय भक्तिपूर्वक अनेक पुष्पों, गन्ध, वस्त्र, फल, तिलपिष्ट, अन्न, गोधूम, धूप तथा माला आदि से निम्नलिखित मन्त्र से बिल्ववृक्ष की पूजा करे श्रीनिवास नमस्तेऽस्तु श्रीवृक्ष शिववल्लभ। ममाभिलषितं कृत्वा सर्वविघ्नहरो भव ॥ इस विधि से पूजा कर श्रीवृक्ष की सात प्रदक्षिणा कर उसे प्रणाम करे । अनन्तर ब्राह्मण भोजन कराकर 'श्रीदेवी प्रीयताम्' ऐसा कहकर प्रार्थना करे। तदनन्तर स्वयं भी तेल और नमक से रहित बिना अग्नि के संयोग से तैयार किया गया भोजन, दही, पुष्प, फल आदि को मिट्टी के पात्र में रखकर मौन हो ग्रहण करे। इस प्रकार भक्तिपूर्वक जो पुरुष या स्त्री श्रीवृक्ष का पूजन करते हैं, वे अवश्य ही सभी सम्पत्तियों को प्राप्त करते हैं। क्रमश... शेष अगले अंक में 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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भगवान विष्णु के तीसरे अवतार वराह अवतार की कथा। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वराह अवतार हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु के दस अवतारों में से तृतीय अवतार हैं जो भाद्रपद में शुक्ल पक्ष की तृतीया को अवतरित हुए। हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु ने जब दिति के गर्भ से जुड़वां रूप में जन्म लिया, तो पृथ्वी कांप उठी। हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु दोनों पैदा होते ही बड़े हो गए। और अपने अत्याचारों से धरती को कपांने लगते हैं। यद्यपि हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु दोनों बलवान थे, किंतु फिर भी उन्हें संतोष नहीं था। वे संसार में अजेयता और अमरता प्राप्त करना चाहते थे। हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु दोनों ने ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए बहुत बड़ा तप किया। उनके तप से ब्रह्मा जी प्रसन्न हुए ,ब्रह्मा जी से अजेयता और अमरता का वरदान पाकर हिरण्याक्ष उद्दंड और स्वेच्छाचारी बन गया। वह तीनों लोकों में अपने को सर्वश्रेष्ठ मानने लगा। हिरण्याक्ष ने गर्वित होकर तीनों लोकों को जीतने का विचार किया। वह हाथ में गदा लेकर इन्द्रलोक में जा पहुंचा। देवताओं को जब उसके पहुंचने की ख़बर मिली, तो वे भयभीत होकर इन्द्रलोक से भाग गए। देखते ही देखते समस्त इन्द्रलोक पर हिरण्याक्ष का अधिकार स्थापित हो गया। जब इन्द्रलोक में युद्ध करने के लिए कोई नहीं मिला, तो हिरण्याक्ष वरुण की राजधानी विभावरी नगरी में जा पहुंचा। वरुण ने बड़े शांत भाव से कहा - तुम महान योद्धा और शूरवीर हो। तुमसे युद्ध करने के लिए मेरे पास शौर्य कहां? तीनों लोकों में भगवान विष्णु को छोड़कर कोई भी ऐसा नहीं है, जो तुमसे युद्ध कर सके। अतः उन्हीं के पास जाओ। वे ही तुम्हारी युद्ध पिपासा शांत करेंगे। वरुण का कथन सुनकर हिरण्याक्ष भगवान विष्णु की खोज में समुद्र के नीचे रसातल में जा पजुंचा। रसातल में पहुंचकर उसने एक विस्मयजनक दृश्य देखा। उसने देखा, एक वराह अपने दांतों के ऊपर धरती को उठाए हुए चला जा रहा है। हिरण्याक्ष वराह को लक्ष्य करके बोल उठा,तुम अवश्य ही भगवान विष्णु हो। धरती को रसातल से कहां लिए जा रहे हो? यह धरती तो दैत्यों के उपभोग की वस्तु है। इसे रख दो। तुम अनेक बार देवताओं के कल्याण के लिए दैत्यों को छल चुके हो। आज तुम मुझे छल नहीं सकोगे। फिर भी भगवान विष्णु शांत ही रहे। उनके मन में रंचमात्र भी क्रोध पैदा नहीं हुआ। वे वराह के रूप में अपने दांतों पर धरती को लिए हुए आगे बढ़ते रहे। हिरण्याक्ष भगवान वराह रूपी विष्णु के पीछे लग गया। उन्होंने रसातल से बाहर निकलकर धरती को समुद्र के ऊपर स्थापित कर दिया। हिरण्याक्ष उनके पीछे लगा हुआ था। अपने वचन-बाणों से उनके हृदय को बेध रहा था। भगवान विष्णु ने धरती को स्थापित करने के पश्चात हिरण्याक्ष की ओर ध्यान दिया। उन्होंने हिरण्याक्ष की ओर देखते हुए कहा,तुम तो बड़े बलवान हो। बलवान लोग कहते नहीं हैं, करके दिखाते हैं। तुम तो केवल प्रलाप कर रहे हो। मैं तुम्हारे सामने खड़ा हूं। तुम क्यों नहीं मुझ पर आक्रमण करते? बढ़ो आगे, मुझ पर आक्रमण करो। हिरण्याक्ष की रगों में बिजली दौड़ गई। वह हाथ में गदा लेकर भगवान विष्णु पर टूट पड़ा। भगवान के हाथों में कोई अस्त्र शस्त्र नहीं था। उन्होंने दूसरे ही क्षण हिरण्याक्ष के हाथ से गदा छीनकर दूर फेंक दी। हिरण्याक्ष क्रोध से उन्मत्त हो उठा। वह हाथ में त्रिशूल लेकर भगवान विष्णु की ओर झपटा। भगवान विष्णु ने शीघ्र ही सुदर्शन का आह्वान किया, चक्र उनके हाथों में आ गया। उन्होंने अपने चक्र से हिरण्याक्ष के टुकड़े-टुकड़े कर दिये। भगवान विष्णु के हाथों मारे जाने के कारण हिरण्याक्ष बैकुंठ लोक में चला गया। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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श्रीमद्देवीभागवत (चौथा स्कन्ध) 〰️〰️🌼〰️🌼🌼〰️🌼〰️〰️ अध्याय 6 (भाग 3) ॥श्रीभगवत्यै नमः ॥ नारायण के द्वारा उर्वशी आदि की उत्पत्ति और नारायण के साथ अप्सराओं का संवाद... 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ व्यासजी कहते हैं- इस प्रकार अप्सराएँ नम्रतापूर्वक प्रणाम करती हुई अपनी बात कह रही थीं। उनके वचन सुनकर मुनिवर नर और नारायण उत्तर देने में उद्यत हो गये। उस समय उन मुनिश्रेष्ठ के मुखपर प्रसन्नता छायी हुई। थी। काम और लोभ पर वे विजय प्राप्त कर चुके थे। अपनी तपस्या के प्रभाव से उनके सर्वांग की अनुपम शोभा हो रही थी। भगवान् नारायण ने कहा- कहो, हम प्रसन्नतापूर्वक तुम्हें अभीष्ट वर देने को तैयार हैं । तुम सब लोग सुन्दर नेत्रवाली इस उर्वशी को साथ लेकर स्वर्ग सिधारो। यह बाला तुम्हें भेंटस्वरूप समर्पित है। अतः मन को मुग्ध करने वाली यह अप्सरा अब जाने को तैयार हो जाय। जाँघ से उत्पन्न हुई उस उर्वशी को इन्द्र के प्रसन्नतार्थ हमने उनको दे दिया है। सभी देवताओं का कल्याण हो । अब सब लोग इच्छानुसार यहाँ से पधारने की कृपा करें। अप्सराएँ बोलीं-महाभाग ! आप देवाधिदेव भगवान् नारायण हैं। परमभक्ति के साथ प्रसन्नतापूर्वक हम आपके चरणकमल पर निछावर हो चुकी हैं। अब हम कहाँ जायँ? मधुसूदन! आपकी आँखें कमलपत्र के समान विशाल हैं। प्रभो! यदि आप प्रसन्न हैं और अभिलषित वर देना चाहते हैं तो हम अपना मनोरथ आपके सामने रखती हैं। उत्तम तप करने वाले देवेश! आप हमारे पति बनने की कृपा करें। बस, हमारा यही वर है, जिससे देवेश्वर! हम प्रसन्नतापूर्वक आपकी सेवा करने में संलग्न हो जायँ। और आपने सुन्दर नेत्रवाली उर्वशी आदि जिन अन्य स्त्रियों को उत्पन्न किया है, वे आपकी आज्ञा मानकर स्वर्ग सिधारें। उत्तम तप करने वाले मुनियो! हम सोलह हजार पचास अप्सराएँ यहाँ रहें। हम सब आपकी समुचित सेवा करेंगी। देवेश! आप हमारी अभिलाषा पूर्ण करके अपने सत्य व्रत का पालन कीजिये । हम भाग्यवश आपके प्रेम में पगकर स्वर्ग से यहाँ आ गयीं। देवेश! हमें त्याग देना आपको शोभा नहीं देता; जगत्प्रभो! आप सर्वसमर्थ पुरुष हैं। भगवान् नारायण ने कहा- पूरे एक हजार वर्ष तक हमने यहाँ तपस्या की है। सुन्दरियो ! हमारी इन्द्रियाँ वश में हैं। फिर हम उस तप को कैसे नष्ट कर सकते हैं? काम-सम्बन्धी सुख के लिये तो हमारी किंचिन्मात्र भी इच्छा नहीं है; क्योंकि उससे सात्त्विक सुख का सत्यानाश हो जाता है। पाशविक धर्म की तुलना करने वाले मिथुन-धर्म में बुद्धिमान् पुरुष कैसे अपने मन को रमा सकता है? शब्द आदि पाँच अप्सराएँ बोलीं- गुणों के बीच में स्पर्श आता है। इसीसे स्पर्शजनित सुखको सर्वोत्तम माना गया है। अतएव महाराज! हमें सब तरहसे स्पर्शसुख देने के लिये आप वचनबद्ध होने की कृपा करें । फिर निर्भरतापूर्वक सुख भोगकर गन्धमादन पर विचरें । क्रमश... शेष अगले अंक में जय माता जी की 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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श्रीमद्भागवत महापुराणम् 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ पञ्चम स्कन्ध: अथाअष्टादशोऽध्यायः भिन्न-भिन्न वर्षो का वर्णन...(भाग 1) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्रीशुक उवाच तथा च भद्रश्रवा नाम धर्मसुतस्तत्कुल पतयः पुरुषा भद्राश्ववर्षे साक्षाद्भगवतो वासुदेवस्य प्रियां तनुं धर्ममयीं हयशीर्षाभिधानां परमेण समाधिना संनिधाप्येदमभिगृणन्त उपधावन्ति ॥ १ ॥ भद्रश्रवस ऊचुः ॐ नमो भगवते धर्मायात्मविशोधनाय नम इति ॥ २ ॥ अहो विचित्रं भगवद्विचेष्टितं मन्तं जनोऽयं हि मिषन्न पश्यति । ध्यायन्नसद्यर्हि विकर्म सेवितुं निर्हत्य पुत्रं पितरं जिजीविषति ॥ ३ वदन्ति' विश्वं कवयः स्म नश्वरं पश्यन्ति चाध्यात्मविदो विपश्चितः । तथापि मुह्यन्ति तवाज मायया सुविस्मितं कृत्यमजं नतोऽस्मि तम् ॥ ४ विश्वोद्भवस्थाननिरोधकर्म ते ह्यकर्तुरङ्गीकृतमप्यपावृतः युक्तं न चित्रं त्वयि कार्यकारणे सर्वात्मनि व्यतिरिक्ते च वस्तुतः ॥ ५ वेदान् युगान्ते तमसा तिरस्कृतान् रसातलाद्यो नृतुरङ्गविग्रहः । प्रत्या वै कवयेऽभियाचते तस्मै नमस्तेऽवित थेहिताय इति ॥ ६ हरिवर्षे चापि भगवान्नरहरिरूपेणास्ते । तद्रूपग्रहणनिमित्तमुत्तरत्राभिधास्ये । तयितं रूपं महापुरुषगुणभा महाभागवतो दैत्यदानवकुलतीर्थीकरणशीलाचरितः प्रह्लादोऽ व्यवधानानन्यभक्तियोगेन सह तद्वर्षपुरुषैरुपास्ते इदं चोदाहरति ॥ ७ ॥ ॐ नमो भगवते नरसिंहाय नमस्तेजस्तेजसे आविराविर्भव वज्रनख वज्रदंष्ट्र कर्माशयान् रन्धय 'रन्धय तमो ग्रस ग्रस ॐ स्वाहा । अभयमभयमात्मनि भूयिष्ठा ॐ क्षौम् ॥ ८ ॥ स्वस्त्यस्तु विश्वस्य खलः प्रसीदतां ध्यायन्तु भूतानि शिवं मिथो धिया । मनश्च भद्रं भजतादधोक्षजे आवेश्यतां नो मतिरप्यहैतुकी ॥ ९ मागारदारात्मजवित्तबन्धुषु सङ्गो यदि स्याद्भगवत्प्रियेषु नः । यः प्राणवृत्त्या परितुष्ट आत्मवान् सिद्ध्यत्यदूरान्न तथेन्द्रियप्रियः ॥ १० श्लोकार्थ 〰️〰️〰️ श्रीशुकदेवजी कहते हैं - राजन् ! भद्राश्ववर्ष में धर्मपुत्र भद्रश्रवा और उनके मुख्य-मुख्य सेवक भगवान् वासुदेव की हयग्रीवसंज्ञक धर्ममयी प्रिय मूर्ति को अत्यन्त समाधिनिष्ठा के द्वारा हृदय में स्थापित कर इस मन्त्र का जप करते हुए इस प्रकार स्तुति करते हैं ॥ १ ॥ भद्रश्रवा और उनके सेवक कहते हैं— 'चित्त को विशुद्ध करने वाले ओङ्कार स्वरूप भगवान् धर्म को नमस्कार है' ॥ २ ॥ अहो ! भगवान्‌ की लीला बड़ी विचित्र है, जिसके कारण यह जीव सम्पूर्ण लोकों का संहार करने वाले काल को देखकर भी नहीं देखता और तुच्छ विषयों का सेवन करने के लिये पापमय विचारों की उधेड़-बुन में लगा हुआ अपने ही हाथों अपने पुत्र और पितादि की लाश को जलाकर भी स्वयं जीते रहने की इच्छा करता है ॥ ३ ॥ विद्वान् लोग जगत् को नश्वर बताते हैं और सूक्ष्मदर्शी आत्मज्ञानी ऐसा ही देखते भी हैं; तो भी जन्मरहित प्रभो! आपकी माया से लोग मोहित हो जाते हैं। आप अनादि हैं तथा आपके कृत्य बड़े विस्मयजनक हैं, मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥ ४ ॥ परमात्मन् ! आप अकर्ता और माया के आवरण से रहित हैं तो भी जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय- ये आपके ही कर्म माने गये हैं। सो ठीक ही है, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। क्योंकि सर्वात्मरूप से आप ही सम्पूर्ण कार्यों के कारण हैं और अपने शुद्धस्वरूप में इस कार्य कारणभाव से सर्वथा अतीत हैं ॥ ५ ॥ आपका विग्रह मनुष्य और घोड़े का संयुक्त रूप है। प्रलयकाल में जब तमः प्रधान दैत्यगण वेदों को चुरा ले गये थे, तब ब्रह्माजी के प्रार्थना करने पर आपने उन्हें रसातल से लाकर दिया। ऐसे अमोघ लीला करने वाले सत्यसङ्कल्प आपको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ६ ॥ हरिवर्षखण्ड में भगवान् नृसिंहरूप से रहते हैं। उन्होंने यह रूप जिस कारण से धारण किया था, उसका आगे (सप्तम (स्कन्ध में) वर्णन किया जायगा। भगवान्‌ के उस प्रिय रूप की महाभागवत प्रह्लाद जी उस वर्ष के अन्य पुरुषों के निष्काम एवं अनन्य भक्तिभाव से उपासना करते हैं। ये प्रह्लादजी महापुरुषोचित गुणों से सम्पन्न हैं तथा इन्होंने अपने शील और आचरण से दैत्य और दानवों के कुल को पवित्र कर दिया है। वे इस मन्त्र तथा स्तोत्र का जप-पाठ करते हैं ॥ ७ ॥ 'ओङ्कारस्वरूप भगवान् श्रीनृसिंहदेव को नमस्कार है। आप अग्नि आदि तेजों के भी तेज हैं, आपको नमस्कार है। हे वज्रनख! हे वज्रदंष्ट्र ! आप हमारे समीप प्रकट होइये, प्रकट होइये; हमारी कर्म-वासनाओं को जला डालिये, जला डालिये। हमारे अज्ञानरूप अन्धकार को नष्ट कीजिये, नष्ट कीजिये। ॐ स्वाहा। हमारे अन्तःकरण में अभयदान देते हुए प्रकाशित होइये। ॐ क्षौम्' ॥ ८ ॥ 'नाथ ! विश्व का कल्याण हो, दुष्टों की बुद्धि शुद्ध हो, सब प्राणियों में परस्पर सद्भावना हो, सभी एक-दूसरे का हितचिन्तन करें, हमारा मन शुभ मार्ग में प्रवृत्त हो और हम सबकी बुद्धि निष्कामभाव से भगवान् श्रीहरि में प्रवेश करे ॥ ९॥ प्रभो ! घर, स्त्री, पुत्र, धन और भाई-बन्धुओं में हमारी आसक्ति न हो; यदि हो तो केवल भगवान्‌ के प्रेमी भक्तों में ही । जो संयमी पुरुष केवल शरीर निर्वाह के योग्य अन्नादि से सन्तुष्ट रहता है, उसे जितना शीघ्र सिद्धि प्राप्त होती है, वैसी इन्द्रियलोलुप पुरुष को नहीं होती ।। १० ।। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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संक्षिप्त भविष्य पुराण 〰️〰️🌸🌸🌸〰️〰️ ★उत्तरपर्व (चतुर्थ खण्ड)★ (चौहत्तरवां दिन) ॐ श्री परमात्मने नमः श्री गणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय सोमाष्टमी व्रत विधान...(भाग 1) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ भगवान् श्रीकृष्ण बोले- महाराज! अब मैं एक दूसरा व्रत बतला रहा हूँ, जो सर्वसम्मत, कल्याणप्रद एवं शिवलोक-प्रापक है। शुक्ल पक्ष की अष्टमी के दिन यदि सोमवार हो तो उस दिन उमासहित भगवान् चन्द्रचूड का पूजन करे। इसके लिये एक ऐसी प्रतिमा की स्थापना करनी चाहिये, जिसका दक्षिण भाग शिवस्वरूप और वाम भाग उमास्वरूप हो। अनन्तर विधिपूर्वक उसे पञ्चामृत से स्नान कराकर उसके दक्षिणभाग में कर्पूरयुक्त चन्दन का उपलेपन करे। श्वेत तथा रक्त पुष्प चढ़ाये और घृत में पकाये गये नैवेद्य का भोग लगाये। पचीस प्रज्वलित दीपकों से उमासहित भगवान् चन्द्रचूड की आरती करे। उस दिन निराहार रहकर दूसरे दिन प्रातः इसी प्रकार पूजन सम्पन्न कर तिल तथा घी से हवन कर ब्राह्मणों को भोजन कराये। यथाशक्ति सपत्नीक ब्राह्मण की पूजा करे और पितरों का भी अर्चन करे। एक वर्ष तक इस प्रकार व्रत करके एक त्रिकोण तथा दूसरा चतुष्कोण (चौकोर) मण्डल बनाये। त्रिकोण में भगवती पार्वती तथा चौकोर मण्डल में भगवान् शंकर को स्थापित करे। तदनन्तर पूर्वोक्त विधि के अनुसार पार्वती एवं शंकर की पूजा करके श्वेत एवं पीत वस्त्र के दो वितान, पताका, घण्टा, धूपदानी, दीपमाला आदि पूजन के उपकरण ब्राह्मण को समर्पित करे और यथाशक्ति ब्राह्मण भोजन भी कराये। ब्राह्मण-दम्पति का वस्त्र, आभूषण, भोजन आदि से पूजनकर पचीस प्रज्वलित दीपकों से धीरे-धीरे नीराजन करे। इस प्रकार भक्तिपूर्वक पाँच वर्षों तक या एक वर्ष ही व्रत करने से व्रती उमासहित शिवलोक में निवास कर अनामय पद प्राप्त करता है। जो पुरुष आजीवन इस व्रत को करता है, वह तो साक्षात् विष्णुरूप ही हो जाता है। उसके समीप आपत्ति, शोक, ज्वर आदि कभी नहीं आते। इतना विधान कहकर भगवान् श्रीकृष्ण पुनः बोले – महाराज इसी प्रकार रविवारयुक्त अष्टमी का भी व्रत होता है। उस दिन एक प्रतिमा के दक्षिण भाग में शिव और वाम भाग में पार्वतीजी की पूजा करे। दिव्य पद्मराग से भगवान् शंकर को और सुवर्ण से पार्वती को अलंकृत करे यदि रत्नों की सुविधा न हो सके तो सुवर्ण ही चढ़ाये । चन्दन से भगवान् शिव को और कुंकुम से देवी पार्वती को अनुलिप्त करे। भगवती पार्वती को लाल वस्त्र और लाल माला तथा भगवान् शंकर को रुद्राक्ष निवेदित कर नैवेद्य में घृतपक्व पदार्थ निवेदित करे। शेष सारा विधान पूर्ववत् कर पारण गव्य-पदार्थों से करे । उद्यापन पूर्वरीत्या करना चाहिये। इस व्रत को एक वर्ष अथवा लगातार पाँच वर्ष करने वाला सूर्य आदि लोकों में उत्तम भोग को प्राप्तकर अन्त में परमपद को प्राप्त करता है। क्रमश... शेष अगले अंक में 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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संक्षिप्त योगवशिष्ठ (निर्वाण-प्रकरण-पूर्वार्ध) (तेतीसवां दिन) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्री गणेशाय नमः ॐ श्रीपरमात्मनेनमः भुशुण्ड की वास्तविक स्थिति का निरूपण, वसिष्ठजी द्वारा भुशुण्ड की प्रशंसा, भुशुण्ड द्वारा वसिष्ठ जी का पूजन तथा आकाशमार्ग से वसिष्ठजी की स्वलोक प्राप्ति...(भाग 1) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ भुशुण्ड ने कहा—महामुने ! मैंने प्राणसमाधि के द्वारा पूर्वोक रीति से विशुद्ध परमात्मा में यह चित्त- विश्रामरूप परम शान्ति क्रमशः स्वयं प्राप्त की है। मैं इस प्राणायाम का अबलम्बन करके दृढ़ता पूर्वक स्थित हूँ । इसलिये सुमेरु पर्वत के विचलित होने पर भी मैं चलायमान नहीं होता । चलते-बैठते, जागते या सोते अथवा स्वप्न में भी मैं अखण्ड ब्रह्माकावृत्ति रूप समाधि से विचलित नहीं होता; क्योंकि तपस्वीयों में महान् वसिष्ठजी ! प्राण और अपान के संयमरूप प्राणायाम के अभ्यास से प्राप्त परमात्मा के साक्षात् अनुभव से मैं समस्त शोकों से रहित आदि कारण परमपद को प्राप्त हो गया हूँ । ब्रह्मन् ! महाप्रलय से लेकर प्राणियों की उत्पत्ति एवं विनाश को देखता हुआ मैं ज्ञानवान् हुआ आज भी जी रहा हूँ । जो बात बीत चुकी और जो होने वाली है, उसका मैं कभी चिन्तन नहीं करता । उपर्युक्त प्राणायाविषयक दृष्टि का अपने मन से अवलम्बन करके इस कल्पवृक्ष पर स्थित हूँ । न्याय युक्त जो भी कर्तव्य प्राप्त हो जाते हैं, उनका फलाभिलाषाओं से रहित होकर केवल सुषुप्ति के समान उपरत बुद्धि से अनुष्ठान करता रहता हूँ । प्राण और अपान के संयोगरूप कुम्भक काल में प्रकाशित होने वाले परमात्मतत्त्व का निरन्तर स्मरण करता हुआ मैं अपने आप में स्वयं ही नित्य संतुष्ट रहता हूँ इसलिये मैं दोषरहित होकर चिरकाल से जी रहा हूँ । मैंने आज यह प्राप्त किया और भविष्य में दूसरा सुन्दर पदार्थ प्राप्त करूँगा, इस प्रकार की चिन्ता मुझे कभी नहीं होती। मैं अपने या दूसरे किसी के कार्यों की किसी समय कहीं पर कभी स्तुति और निन्दा नहीं करता। शुभ की प्राप्ति होने पर मेरा मन हर्षित नहीं होता और अशुभ की प्राप्ति होने पर कभी खिन्न नहीं होता; क्योंकि मेरा मन नित्य सम ही रहता है । मुने ! मेरे मन की चञ्चलता शान्त हो गयी है । मेरा मन शोक से रहित, स्वस्थ, समाहित एवं शान्त हो चुका है। इसलिये मैं विकार-रहित हुआ चिरकाल से जी रहा हूँ । लकड़ी, रमणी, पर्वत, तृण, अग्नि, हिम आकाश — इन सबको मैं समभाव से देखता हूँ । जरा और मरण आदि से में भयभीत नहीं होता एवं राज्य प्राप्ति आदि से हर्षित नहीं होता । इसलिये मैं अनामय होकर जीवित हूँ । ब्रह्मन् ! यह मेरा बन्धु है, यह मेरा शत्रु है, यह मेरा है एवं यह दूसरे का है इस प्रकार को भेद-बुद्धि से मैं रहित हूँ । ग्रहण और बिहार करने वाला, बैठने और खड़ा रहने वाला, श्वास तथा निद्रा लेने वाला यह शरीर ही है, आत्मा नहीं—यह मैं अनुभव करता हूँ । इसलिये मैं चिरजीवी हूँ। मैं जो कुछ क्रिया करता हूँ, जो कुछ खाता-पीता हूँ, वह स अहंता-ममता से रहित हुआ ही करता हूँ । मैं दूसरों पर आक्रमण करने में समर्थ हुआ भी आक्रमण नहीं करता, दूसरों के द्वारा खेद पहुँचाये जाने पर भी दुःखित नहीं होता एवं दरिद्र होने पर भी कुछ नहीं चाहता; इसलिये मैं विकार-रहित हुआ बहुत काळ से जी रहा हूँ । मैं आपत्तिकाल में भी चलायमान नहीं होता, वरं पर्वत की तरह अचल रहता हूँ। जगत्-आकाश, देश-काल, परम्परा क्रिया-- इन सबमें चिन्मयरूप से मैं ही हूँ, इस प्रकार की मेरी बुद्धि है; इसलिये मैं विकार रहित हुआ बहुत काळ से स्थित हूँ। ज्ञान के पारंगत ब्रह्मन् ! एकमात्र आपकी आज्ञा का पालन करने के लिये ही धृष्टतापूर्वक मैंने, जो और जैसा हूँ, वह सब आपसे यथार्थरूपसे बता दिया है। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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श्रीमद्देवीभागवत (चौथा स्कन्ध) 〰️〰️🌼〰️🌼🌼〰️🌼〰️〰️ अध्याय 6 (भाग 2) ॥श्रीभगवत्यै नमः ॥ नारायण के द्वारा उर्वशी आदि की उत्पत्ति और नारायण के साथ अप्सराओं का संवाद... 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ दिव्य अप्सराओं का संगीत, जिसे सुनते ही ध्यान टूट जाय, सुनायी पड़ रहा है। कहीं हमलोगों की तपस्या भंग करने के लिये इन्द्र की तो यह करतूत नहीं है? अन्यथा, ऋतुराज वसन्त अकाल में कैसे प्रीति प्रकट कर सकता था ? जान पड़ता है, डरे हुए इन्द्र ने यह विघ्न उपस्थित किया है ! सुगन्ध, शीतल एवं मन को मुग्ध करने वाला पवन शरीर का स्पर्श कर रहा है। इन्द्र के षड्यन्त्र के अतिरिक्त दूसरा कोई कारण इसमें नहीं है। भगवान् नारायण व्यापक पुरुष हैं। वे यों कह ही रहे थे, इतने में ही सारी मण्डली सामने दिखायी दी। उस समय सबमें प्रमुख कामदेव था। नर और नारायण- दोनों ने आश्चर्य से सबको देखा। कामदेव, मेनका, रम्भा, तिलोत्तमा, पुष्पगन्धा, सुकेशी, महाश्वेता, मनोरमा, प्रमद्वरा, घृताची, गीतज्ञा, चारुहासिनी, चन्द्रप्रभा, शोभा, विद्युन्माला, अम्बुजाक्षी और कांचनमालिनी तथा इनके अतिरिक्त अन्य भी बहुत-सी अप्सराएँ नर-नारायण को दृष्टिगोचर होने लगीं। उन सबकी संख्या सोलह हजार पचास थी। कामदेव की यह विशाल सेना देखकर नर और नारायण बड़े आश्चर्य में पड़ गये । तदनन्तर वे सभी अप्सराएँ उन्हें प्रणाम करके सामने खड़ी हो गयीं। वे अप्सराएँ दिव्य आभूषणों से अलंकृत थीं। दिव्य हार उनके गले की शोभा बढ़ा रहे थे। उन सभी के मुख से कपटपूर्ण ऐसे गीत निकल रहे थे, जिनका सुलभ होना धरातल पर असम्भव था। मुनिवर नारायण ने प्रसन्नता पूर्वक उन अप्सराओं से कहा 'सुमध्यमाओ! तुमलोग बड़े आनन्द से यहीं ठहरो। मैं तुम्हारा अद्भुत प्रकार से आतिथ्य सत्कार करने के लिये तैयार हूँ। तुम सभी अतिथि के रूप में स्वर्ग से यहाँ आयी हो।' व्यासजी कहते हैं- उस समय मुनिवर नारायण ने मन में अभिमानपूर्वक सोचा, इन्द्र ने हमारे तप में विघ्न उपस्थित करने के विचार से ही इन्हें यहाँ भेजा है। किंतु इन बेचारी नगण्य अप्सराओं से हमारा क्या बनना-बिगड़ना है। मैं अभी इन सबको आश्चर्य में डालने वाली नयी अप्सराओं की सृष्टि किये देता हूँ। इन अप्सराओं की अपेक्षा उन सबके रूप बड़े ही विलक्षण होंगे। इस समय तपस्या का बल दिखलाना परमावश्यक है। इस प्रकार मन में सोचकर नारायण ने अपना हाथ जंघा पर पटका और तुरंत एक सर्वांगसुन्दरी स्त्री को उत्पन्न कर दिया। नारायण के ऊरुभाग से निकली हुई | वह नारी 'उर्वशी' बड़ी सुन्दरी थी। वहाँ उपस्थित अप्सराओं ने उसे देखा तो उनके आश्चर्य की सीमा नहीं रही। उस समय मुनिवर नारायण का मन बिलकुल निश्चिन्त था । जितनी अप्सराएँ वहाँ थीं, उतनी ही अन्य अप्सराएँ सेवा करने के लिये उन्होंने तुरंत उत्पन्न कर दीं। वे सभी अप्सराएँ हाथों में तरह तरह की भेंट सामग्री लिये हँसती और गाती हुई आयीं। उन्होंने मुनिवर नर और नारायण के चरणों में मस्तक झुकाया और हाथ जोड़कर आगे खड़ी हो गयीं। तब स्वर्ग से आयी हुई अप्सराओं ने नर और नारायण से कहा-'अहो! हम मूर्ख स्त्रियाँ आपके तप की महिमा और धीरता देखकर ही आश्चर्य में डूब गयी हैं। महाभाग मुनियो! हमें आपके स्वरूप के विषय में विदित हो गया। आप परम पुरुष भगवान् श्रीहरि के अंशावतार हैं। आप शम-दम आदि सद्गुणों से सदा परिपूर्ण रहते हैं। आपकी सेवा के लिये नहीं; परंतु शतक्रतु इन्द्र का कुछ कार्य था, उसे सिद्ध करने के विचार से ही हमारा यहाँ आना हुआ था। किस भाग्य से हमें आपके दर्शन सुलभ हो गये ? हमने कौन-सा पुण्य कार्य कर रखा था, उसे जानने में हम असमर्थ हैं। किंतु यह मानना तो अनिवार्य है। कि कोई संचित प्रारब्ध अवश्य था। हम निश्चय ही अपराधिनी हैं। फिर भी, हमें अपना जन समझकर आपने मन में शान्ति रखी और हमें तापमुक्त रखा। ठीक ही है, विवेकशील महानुभाव पुरुष तुच्छ शापरूपी फलदान के व्याज से अपनी तपस्या के बल का अपव्यय नहीं करते।' क्रमश... शेष अगले अंक में जय माता जी की 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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