ब्रज के भक्त - भक्त चरित्र - ४ ('ब्रज के भक्त' पुस्तक से साभार) श्रीकृष्णदास बाबा जी (गोवर्द्धन) वह दक्षिणदेशीय दिग्विजयी तैलंग पंडित जैसे खम्ब ठोककर सबको ललकार रहा है; पर शास्त्रार्थ करने की बात तो दूर, उसके सम्मुख होने का भी कोई साहस नहीं बटोर पा रहा है। ब्रज के लिए कैसी लज्जा की बात है यह! जो ब्रज सैकड़ों वर्षों भारत का सांस्कृतिक केन्द्र रहा है, वह आज एक तैलंगी पण्डित के आगे नतमस्तक हो रहा है! किस प्रकार ब्रज की नाक रखी जाय इस विषय को लेकर वृन्दावन के पंडित चिन्ताग्रस्त हैं। एक ही उपाय है दिग्विजयी को नीचा दिखाने का। उसे गोवर्धन के सिद्ध श्रीकृष्णदास बाबा के पास भेज दिया जाय। पर वे यदि भजन आवेश के कारण उससे शास्त्रालाप न करें, या अपने स्वाभाविक दैन्य के कारण उससे अपनी अयोग्यता ही प्रकट कर दें, तब तो रही-सही बात भी बिगड़ जायगी। ऐसी कोई युक्ति करनी चाहिये, जिससे दिग्विजयी उनके पीछे पड़ जाय और उन्हें उससे पीछा छुड़ाने के लिए उससे टक्कर लेनी ही पड़े। आखिर पण्डितों ने एक युक्ति सोच ली। वे दिग्विजयी के पास गये। यथोचित आदर-सत्कार, प्रशंसा और स्तुति के पश्चात् बोले- 'महामना, हम सब आपकी प्रतिभा से प्रभावित हैं। हममें ऐसा कोई नहीं जो आपसे आलाप भी कर सके। हमारा निवेदन है कि आप गोवर्धन के श्रीकृष्णदास बाबा के पास जाने का कष्ट करें। ब्रज के पण्डितों के मुकुट-मणि हैं वे। यदि उन्हें आपने परास्त कर दिया तो समझ लीजिये कि विश्व में आपकी विजय का डंका पिट गया। पर वे आसानी से हाथ आने वाले व्यक्ति नहीं । उन्हें शास्त्रालाप को तैयार करने के लिए आग्रह करना होगा, अपने पाण्डित्य का कुछ प्रदर्शन भी करना होगा। वे हर किसी से शास्त्रालाप नहीं करते। उसी से करते हैं, जिसे यत्किंचित् आलाप के योग्य समझते हैं।' दिग्विजयी के अभिमान को उकसा देने के लिए इतना पर्याप्त था। वह दूसरे ही दिन वृन्दावन से गोवर्धन गया। श्रीकृष्णदास बाबा के पास जाकर बोला- 'सुना है आप ब्रज के पण्डितों के मुकुटमणि हैं। मैं आपसे शास्त्रालाप कर विजय-पत्र लिखवाने आया हूँ।' बाबा ने सोचा यह कहाँ की मुसीबत आ गयी। उन्होंने बहुत चेष्टा की दैन्य और छल-वाक्यों का प्रयोगकर उसे टाल देने की, पर वह किसी प्रकार उन्हें छोड़ने को राजी न हुआ। उसे अपनी विजय का डंका जो पिटवाना था। उसने कुछ क्रुद्ध हो दु:ख प्रदर्शित करते हुए कहा- 'मैं ब्रज में यह जानकर आया था कि यहाँ बहुत-से बड़े-बड़े पण्डित रहते हैं। उनसे शास्त्रालाप कर आनन्द का उपभोग करूँगा। पर देखता हूँ कि यहाँ एक भी पण्डित नहीं, जो श्रुतिका शुद्ध रूप से उच्चारण भी कर सके।' सिद्ध बाबा नेयकहा- 'हाँ आपके समान वेद-परायण पण्डित यहाँ कोई विरला ही होगा। आप यदि सामवेद का कोई मन्त्र पढ़कर सुनायें तो बड़ी कृपा होगी।' पण्डित तो ऐसा सहयोग ढूँढ ही रहा था। उसने सुललित स्वर में एक श्रुति-मन्त्र का पाठ किया। सिद्ध बाबा ने सुनकर कहा- 'स्वर में तीन दोष हैं।' दिग्विजयी बोला- 'इससे शुद्ध स्वर में मन्त्र उच्चारण कर सके ऐसा कोई पण्डित भारतवर्ष में मझे नहीं दिखता। आप ही और शुद्ध रूप में उच्चारण करें, देखूँ।' तब सिद्ध बाबा ने स्वयं शुद्ध स्वर में मन्त्र का पाठ किया। दिग्विजयी उसे सुनकर स्तब्ध और चकित रह गया। उसने बाबा को साष्टांग दण्डवत् कर कहा- 'आपकी विद्या जागतिक नहीं है!' ऐसा कोई व्यक्ति इस जगत् में नहीं, जो आपकी बराबरी कर सके!" बात बिल्कुल ठीक थी बाबा की विद्या जागतिक नहीं थी। उनका कुछ भी तो जागतिक नहीं था। प्रारम्भ से ही उनका जीवन किसी दिव्य शक्ति द्वारा परिचालित और परिपूरित था। संसार का त्यागकर पारमार्थिक जीवन यापन करने के लिए लोगों को कितना संघर्ष करना पड़ता है अपने आपसे और सगे-सम्बन्धियों से। पर बाबा को ऐसा कुछ नहीं करना पड़ा था । उनका जीवन-पथ पहले से ही निर्दिष्ट था। उनका जन्म नरोत्तम ठाकुर महाशय की वंशपरम्परा के अन्तर्गत उड़ीसा के एक समृद्ध परिवार में हुआ था। पिता, श्रीसनातन कानूनगो का स्वर्गवास होने पर उनकी माता सती हो गयीं थीं। दाह के समय उन्होंने अपने तीनों पुत्रों को कुछ आदेश दिया था। सबसे छोटे बालकृष्ण को वृन्दावन में रहकर भजन करने का आदेश दिया था। बालकृष्ण ही सिद्ध श्रीकृष्णदास बाबा के नाम से विख्यात हुए। १६ वर्ष की अवस्था में वे माँ के द्वारा निर्दिष्ट पथ के पथिक बनकर वृन्दावन चले आये थे। दो वर्ष वृन्दावन में पाठाभ्यास करने के पश्चात् जयपुर गये श्री गोविंद जी की सेवा के उद्देश्य से। वहाँ राजा से गोविन्दजी की सेवा का अधिकार प्राप्तकर आठ-दस वर्ष तक उनकी सेवा की। बराबर गोविन्दजी के राजभोग का प्रसाद ग्रहण करते रहे। गोविन्द जी का प्रसाद ग्रहण करते हुए भी वे प्रबल कामवेग से पीड़ित होने लगे। यह देख उन्हें चिन्ता हुई। शंका जागी कि गोविन्द जी की सेवा में संलग्न रहते हुए और उनके चिन्मय प्रसाद का सेवन करते हुए भी काम विकार क्यों? जयपुर में ऐसा कोई न था जो उनकी शंका का समाधान कर सकता। इसलिए काम्यवन के सिद्ध श्री जयकृष्ण दास बाबा के पास जाकर उन्होंने इस शंका का समाधान करने की प्रार्थना की। बाबा ने उत्तर दिया- "देख बेटा, एक हरे वृक्ष को काटकर पानी में डुबाओ। कुछ दिन बाद उसे निकालकर बिना सुखाये अग्नि में डाल दो,तो वह जलेगा क्या? जीव अनादिकाल से संसार-सागर में निपतित है, पानी में डूबे काष्ठ की तरह विषय-रस में डूबा हुआ है। उसे हठात् भक्ति रूपी अग्नि में डाल दो तो परिणाम वही होगा जो गीले काष्ठ को अग्नि में डालने से होता है। यदि चाहो कि भक्ति-अग्नि उसे पकड़े तो विषय-रस को सुखाकर भक्ति का मंजन करना होगा। यदि कहो कि महाप्रसाद का विषय-रस से क्या सम्बन्ध? महाप्रसाद तो चिन्मय है,साधारण विषयों से सर्वथा भिन्न, तो क्या तुम भूल गये महाप्रभु के वे वाक्य, जो उन्होंने रघुनाथदास से कहे थे ? रघुनाथदास गोस्वामी जगन्नाथपुरी में जगन्नाथ जी का महाप्रसाद खरीदकर महाप्रभु की सेवा करते थे। इस पर उन्होंने आपत्ति की थी और कहा था 'विषयीर अन्ने हय राजस निमंत्रण', अर्थात् विषयी का अन्न खाना रजोगुण को निमन्त्रण देना है, चाहे वह प्रसाद के रूप में ही क्यों न हो। इसके विपरीत जब उन्हें यह पता चला था कि रघुनाथ स्वयं जगन्नाथजी के उस प्रसाद को धोकर उसका सेवन करते हैं, जो बासी और सड़ा-बुसा होने के कारण मार्ग में फेंक दिया जाता है और जिसे जानवर भी सूँधकर छोड़ जाते हैं, तब उन्हें भी उस प्रसाद का लोभ हो आया था उन्होंने रघुनाथ के पास जाकर उसका एक ग्रास छीनकर खा लिया था और कहा था- नित नित नाना प्रसाद खाई। ऐछे स्वाद आर, कोन प्रसादे ना पाई।। अच्छा सुनो, तुम्हें इस सम्बन्ध में एक घटना सुनाता हूँ- घटना उस समय की है जब रूप, सनातन आदि वृन्दावन के गोस्वामी अप्रकट हो चुके थे। बंग देश में एक वैष्णव-मण्डली नगर-कीर्तन में प्रेमोन्मत्त हो नृत्य-कीर्तन कर रही थी। एक प्रसिद्ध वेश्या, जो अपनी अट्टालिका से इस दृश्य को देख रही थी, हठात् नीचे उतरकर कीर्तनकारी वैष्णवों की पद-धूलि में लोट-पोट होने लगी। उनकी चरणरज के प्रभाव से तत्काल उसके मन में वैराग्य उत्पन्न हुआ। वह कीर्तन-मण्डली के महन्त के चरणों में लोटने और क्रन्दन करने लगी। महन्त ने पूछा- 'तुम चाहती क्या हो।' उसने उत्तर दिया- 'मैं चाहती हूँ कि मेरे पास जो लाखों रुपये के आभूषण हैं, वह आप ठाकुरजी के लिए ले लें। मेरी जितनी धन-सम्पत्ति है, उसे वैष्णव-सेवा में लगा दें और मुझे शिष्या स्वीकार कर लें।' महन्तजी ने कहा- 'मैंने तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार की। तुम अब मेरी शिष्या हो। मेरी एक आज्ञा का पालन करो। तुम्हारी जितनी भी धन-सम्पत्ति है और जितने अलंकार आदि हैं, उन्हें वृन्दावन जाकर श्रीगोविन्दजी को समर्पण कर दो।' वेश्या ने ऐसा ही करना चाहा। पर जब वृन्दावन जाकर गोविन्ददेव जी के पुजारी से अपनी इच्छा प्रकट की, तो उन्होंने कहा- 'मैं तुम्हारा कुछ भी ग्रहण नहीं कर सकता। वेश्या हताश होकर तीन दिन तक यमुना-तट पर बिना अन्न जल के पड़ी रही। तब गोविन्दजी ने पुजारी को आदेश दिया- 'तुम यमुना-तट पर जाकर उस वेश्या को ले आओ। उसका सब धन लेकर मेरा भोग लगाओ और अपने हाथ से उसे मेरा शृंगार करने दो | ' पुजारी ने ऐसा ही किया। वेश्या ने स्नानकर अपने हाथ से श्रीगोविन्ददेवजी का शृंगार किया। उसके धन से गोविन्द देव जी को विविध प्रकार का भोग लगाया गया। वैष्णवों को आमन्त्रित कर उन्हें भोजन कराया गया | उसी रात प्रसाद-भोजनकारी वैष्णवों को स्वप्नदोष हुआ। प्रात:काल परस्पर कथोपकथन के पश्चात् उन्होंने पुजारी से उस दिन के प्रसाद के सम्बन्ध में पूछा तो उसने आद्योपान्त सब वृतान्त कह सुनाया। वैष्णव गण यह जानकर बहुत दुखी हुए कि उन्होंने वेश्या का अन्न खाया। वे अपनी-अपनी कुटी पर जाकर तीन दिन तक बिना अन्न-जल ग्रहण किये पड़े रहे। तीसरे दिन की शेष रात्रि में गोविन्दजी ने स्वप्न में उनसे कहा- 'तुम क्यों मेरे प्रति क्रोधकर आत्महत्या करना चाह रहे हो?' 'आत्महत्या न करें तो क्या करें? तुमने हमारा घर द्वार छुड़वाकर इतने दिन अपने चरणों की शरण में रखा, क्या इसीलिए कि वेश्या का अन्न खिलाकर हमारा धर्म नाश करो?' पण्डितों ने एक साथ उत्तर दिया। गोविन्ददेव बोले- 'मैंने कब कहा था तुमसे वेश्या का अन्न खाने को? मैं तो सभी कुछ खा सकता हूँ। पर तुमसे सब कुछ खाने को कहूँ तब न।' "तो हम क्या करें। महाप्रसाद सामने आये तो उसकी उपेक्षाकर अपराध के भागी बने?' पण्डितों ने पूछा। गोविन्द देव ने उन्हें ऐसी स्थिति में प्रसाद का केवल एक कण लेकर उसका सम्मान करने का आदेश दिया। जयकृष्ण दास बाबा के वचनों से श्रीकृष्णदास की शंका का समाधान हुआ। उन्होंने निश्चय किया गोविन्ददेव के राजभोग-प्रसाद का सेवन न करने का। वे जयपुर छोड़ नन्दग्राम के पास दोमन बन में पूर्ण वैराग्य से रहकर भजन करने लगे। नन्दग्राम से आटे की भिक्षा कर लाते। उसमें नीम के पत्ते मिला, कभी पानी में सानकर कच्चा, और कभी बाटी की तरह सेंककर खा लेते। धीरे-धीरे उनका शरीर दुर्बल होता गया दृष्टि- शक्ति जाती रही। भिक्षा के लिए जाना भी बन्द हो गया। कई दिन तक कुण्ड का जल पीकर रहे। अन्त में कुण्ड तक जाने की शक्ति भी नहीं रही। दो-तीन दिन बिना जल के बीत गये। तब करुणामयी राधारानी का हृदय विगलित हुआ। उन्होंने ललिता सखी से कहा- 'तू क्या अब भी श्रीकृष्णदास पर कृपा न करेगी? क्या मेरे नाम पर कलंक लगायेगी? ले, यह प्रसाद की थाली, ले जा और उसे भोजन करा।' ललिताजी प्रसाद की थाली लेकर ब्रजबाला के रूप में दोमन बन में श्रीकृष्णदास बाबा के पास जा उपस्थित हुई और बोलीं- 'बाबा प्रसाद पायले। मेरी मइयाने तेरो दुख देखकै मोकुँ भेजो है प्रसाद लैकें।' इस वाणी-सुधा के श्रवण-पुट में पड़ते ही और प्रसाद की दिव्य गन्ध के नासिका-रंध्र में जाते ही श्रीकृष्णदास में दिव्य शक्ति का संचार हुआ। उन्होंने प्रेमसे प्रसाद का सेवन किया। प्रसाद सेवन कर थाल को रज से माँज दिया। ब्रजबाला रूपी ललिताजी ने पूछा- 'बाबा, तू माँगबे कूँ क्यों नाय जाय?' 'लाली आँखनते तो दीखे नाँय, माँगबे जाऊँ कैसे?' बाबा ने उत्तर दिया। 'अच्छा, आँखन ते दीखेगो तो जायो करैगो?' 'क्यों नहीं जाऊँगो।' 'देख मेरी मइया ने एक आँजन दियो है। जाय तेरी आँख में लगाय दऊँ, तोको दीखन लगैगो।' इतना कह ललिताजी ने बाबा की दाहिनी आँख में कुछ लगाकर जैसे ही बाई आँख को स्पर्श किया, उनकी आँखों में रोशनी आ गयी। पर उन्हें न तो वह बालिका दीखी और न वह थाल, जिसे माँजकर उन्होंने अभी रखा था। ऐसा लगा कि एक अप्राकृत सुगन्ध से वातावरण परिपूर्ण हो रहा है। बालिका कौन थी? कहाँ से आयी थी और कहाँ चली गयी? अपने स्पर्श मात्र से कैसे दृष्टि दे गयी? यह सब बाबा के लिए एक स्वप्न की सी घटना बनकर रह गया ! इसका यथार्थ मर्म जानने के लिए वे तीन दिन तक वैसे ही पड़े रहे। तीसरे दिन रात्रि में तन्द्रावस्था में उन्होंने देखा कि कोटि विद्युत् छटा को तुच्छ करने वाली दिव्य कान्ति सम्पन्ना एक देवी उनसे कह रही हैं- 'तुम क्यों दुखी हो रहे हो? अब तुम्हें भय किस बात का? मैं तुम्हारी हूँ और तुम मेरे। मेरी अभिन्न सखी ललिता के ललित कर देने से दृष्टि शक्ति प्राप्त करने के साथ-साथ तुम सर्वशक्ति प्राप्त कर चुके हो। अब निश्चिन्त होकर गोवर्धन चले जाओ। वहाँ मुझे प्राप्त करने का सहज सोपान निर्दिष्टकर मेरे चरणों में निष्ठावान् वैष्णवों को कृतार्थ करो।' इतना कह देवी अन्तर्धान हो गयीं। बहुत देर तक बाबा अश्रु-कम्पादि सात्विक विचारों से अवसन्न रहे। उसके पश्चात् अपने को सर्वशक्ति-सम्पन्न और सफल-मनोरथ जान प्रेम-सिन्धु की तरंगों में शुष्क काष्ठ की तरह तैरते हुए गोवर्धन-तट पर आ लगे। श्रीकृष्णदास बाबा गोवर्धन में चकलेश्वर नामक स्थान पर रहने लगे। उस समय राधाकुण्ड और गोवर्धन में बहुत से पंडित, महात्मा, रूपसनातनादि गोस्वामियों के संस्कृत ग्रन्थों का सहारा लेकर भजन करते थे। कृष्णदास बाबा को संस्कृत भाषा का यथेष्ट ज्ञान न था। इसलिए वे किसी वृद्ध वैष्णव के निकट हरिनामामृत व्याकरण का अध्ययन करने लगे। उस समय उन्हें एक विकट समस्या का सामना करना पड़ा। उनका अध्ययन भजन में बाधक होने लगा और भजन अध्ययन में। दोनों को अन्तराय जान एक दिन अत्यन्त दुःखित हो उन्होंने मानसी गंगा में प्राण त्याग देने का संकल्प कर लिया। रात अनिद्रा और चिन्ता में व्यतीत हुई। शेष रात्रि में उन्होंने सुना कि उनकी कुटी के बाहर से कोई आवाज दे रहा है- 'कृष्णदास, कृष्णदास।' बाहर आये तो प्रत्यक्ष रूप से सामने खड़े देखा अपने अन्तश्चिन्तित, कंथा-करंगधारी श्रीसनातन प्रभुपाद और श्रीललितादेवी को। आत्मविस्मृत और किंकर्तव्यविमूढ़ अवस्था में वे दण्डवत् कर उनके चरणों जा बैठे। सनातन गोस्वामी ने स्नेह से उनके मस्तक पर हाथ फेरते हुए कहा-'कृष्णदास! कुशलपूर्वक तो हो? मधुकरी भर पेट मिल जाती है न?' 'हाँ, प्रभो' कृष्णदास ने हाथ जोड़कर उत्तर दिया। तब सनातन प्रभु ने कहा- 'देख बेटा, शास्त्र अनन्त हैं। जिसका जहाँ तक अधिकार है वहीं तक उनका अनुशीलन करना यथेष्ट है। शास्त्र अध्ययन के कारण तुझें मरने की आवश्यकता नहीं? ऐसी कुबुद्धि फिर न करना। तेरे द्वारा हमारा बहुत-सा कार्य होना है। आज से मेरे आशीर्वाद से सभी शास्त्रों की तुझे स्वत: स्फूर्ति होगी।' ललितादेवी ने आशीर्वाद दिया-'तू जब भी हमारा स्मरण करेगा, तभी तेरे हृदय में हमारी स्फूर्ति होगी। तेरे द्वारा व्रजवासी वैष्णवों के लिए भजन मुद्रा का प्रकाश होगा।' इतना कह दोनों श्रीकृष्णदास बाबा के मस्तक पर चरण रख अन्तर्धान हो गये। इस घटना के पश्चात् श्रीकृष्णदास बाबा समुद्रवत् गम्भीर हो गये। उन्होंने छात्रों को हरिनामामृत व्याकरण पढ़ाना और साधकों को भजन सम्बन्धी उपदेश देना प्रारम्भ कर दिया। हरिनामामृत व्याकरण पढ़ाते समय वे प्रति सूत्र में नित्य-लीला स्थापन कर भजन मुद्रा के द्वार का उद्घाटन करते, जिससे छात्रों को अध्ययन के साथ-साथ भजन-शिक्षा का अवसर भी प्राप्त होता। उन्होंने 'श्रीगोविन्दलीलामृत', 'संकल्प-कल्पद्रुम', 'पद कल्पतरु', 'क्षणदागीति चिंतामणि', 'पदामृत समुद्र' आदि बहुत से ग्रन्थों का अध्ययन कर श्रीमन्महाप्रभु की अष्टकालीय लीला-स्मरण के साथ श्री राधा गोविन्द की अष्टयाम लीला स्मरण की एक पद्धति का प्रणयन किया। अनुगत वैष्णवों को वे उसके अनुसार भजन-शिक्षा देने लगे। यही भजन-पद्धति परवर्ती काल में 'गुटिका' के नाम से प्रसिद्ध हुई। बाबा जिन्हें भजन-शिक्षा देते, वे सब नित्य रात्रि में उनके पास जाकर अपने-अपने भजन की बात करते। यदि उनके भजन में कोई भूल-भ्रांति होती तो वे उसे सुधार देते। एक दिन एक महात्मा अपने भजन के विषय में बिना कुछ कहे क्रन्दन करने लगे। बाबा ने पूछा तो बोले- 'आज मैं कुछ भी भजन न कर सका। प्रात:कालीन लीला-स्मरण में प्राणेश्वरी के दाहिने हाथ में अलंकार पहनाते समय श्रीहस्त की शोभा में मन इतना अटक गया कि बहुत हटाने की चेष्टा करने पर भी न हटा। बाबा ने उसे उत्साहित करते हुए कहा- 'तुम्हारा ही तो यथार्थ भजन हुआ है आज।' सिद्ध बाबा ने जिसे-जिसे भजन का उपदेश किया, वे सभी सिद्ध हो गये। साधारण सिद्ध पुरुषों के लक्षणों से व्रज के सिद्ध पुरुषों के लक्षण सर्वथा पृथक् हैं। व्रजजनानुगत वैष्णवों के अन्तश्चिन्तित भावदेह की वृत्ति जब बाह्यदेह में स्फुट रूप से प्रकट हो दूसरों को दृष्टिगोचर होती है, तब उसे भजन - सिद्धि कहते है। सिद्ध श्रीकृष्णदास बाबा के आनुगत्य में भजन कर जो लोग सिद्ध हो गये हैं, उनमें मुख्य हैं गोवर्धन के द्वितीय श्रीकृष्णदास, मदनमोहन ठौर के श्री नित्यानंद दास, झाड़ू मण्डल के श्रीबलरामदास और लाला बाबू (तृतीय श्रीकृष्णदास)। सिद्ध श्रीकृष्णदास बाबा के भजन-सिद्धि से संबंधित बहुत-सी घटनाओं के लोगों ने प्रत्यक्ष दर्शन किये हैं। एक बार वे होली-लीला का स्मरण करते हुए अन्तश्चिन्तित देह से राधा रानी का आनुगत्य कर रहे थे। लीला में उनका अंग अबीर, गुलाल, कुंकुम, कस्तूरी आदि से लिस गया। अर्धबाह्यावस्था में जब वे भजन-कुटी से बाहर गये तो वैष्णव-गण उन्हें रंग में रंगे देखकर और अप्राकृत कस्तूरी आदि की दिव्य गन्ध का अनुभव कर कृतार्थ हुए। एक बार राधा-कृष्ण मानसीगङ्गा में जल-केलि करके चुके थे। तटपर ललिता-विशाखादि उनकी वेश-भूषा करने में लगी थीं। रूप-मञ्जरी आदि प्रसाधन-सामग्री एकत्र कर रही थीं। सिद्ध बाबा मंजरी रूप में इत्र की शीशी लिये अपेक्षा कर रहे थे। दोनों का हास-परिहास सुन उनके देह में स्तम्भ हुआ और इत्र की शीशी हाथ से गिर पड़ी। उसका सौरभ चारों ओर वातावरण में व्याप्त हो गया। मानसीगङ्गा पर स्नान के लिये आये हुए वैष्णवों ने उस दिव्य गन्ध का अनुभव किया। सिद्ध बाबा ने उसका कारण पूछा, तो वे अपराधी की तरह बोले- क्या करूँ भाई! मैं अपराधी जीव हूँ, सेवा की योग्यता मुझ में है नहीं। प्रिया-प्रियतम की सेवा के समय इत्र की शीशी हाथ से गिरा दी उसी की गन्ध तुम लोग ले रहे हो'। एक दिन बाबा हाथ में करुआ ले मानसीगङ्गा में स्नान के लिए गये। वहाँ जुगल किशोर की जल-केलि देख वे भावाविष्ट हो अगाध जल में कूद पड़े। उस समय वहाँ और कोई न था। बहुत देर तक जब कुटिया पर न पहुँचे, तब सेवक चिंतित हो उन्हें देखने निकले। चारों ओर खोजने पर भी उनका कहीं पता न चला। समस्त ब्रज मंडल में हाहाकार मच गया। लोग तरह-तरह की अटकलें लगाने लगे। सात दिन बाद बाबा करुआ हाथ में लिये मानसीगङ्गा से बाहर निकले। लोगों ने विस्मय से पूछा- 'बाबा, सात दिन कहाँ थे आप?' वे भी विस्मित हो बोले- 'यहीं तो, मैं स्नान करके निकल रहा हूँ। इतनी-सी देर में सात दिन कैसे बीत गये? तुम लोगों को यह कैसा भ्रम हो गया है।?' भरतपुर के राजा जसवंत सिंह सिद्ध बाबा के दर्शन करने गये और बोले-'बाबा, मेरी कुछ सेवा अङ्गीकार कर मुझे धन्य करें ।" बाबा ने कहा- 'हम लोग व्रजवासियों के घर माधुरी भिक्षा करते हैं। उनकी सेवा करो। उसी से हमारी सेवा हो जाएगी।' आज्ञा पा राजा ने बहुत-सी भू-सम्पत्ति व्रजवासियों को दान में दी, जिसके लिए आज भी व्रजवासी उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापन करते हैं। इसके पश्चात् वे फिर बाबा के पास गये और बोले- 'आप स्वयं भी यदि कुछ अङ्गीकार करें, तो मैं धन्य होऊँ। बाबा ने कहा- 'अच्छा, यदि तुम्हारी ऐसी ही इच्छा है, तो सुनो! तुम्हारी बहुत-सी रानियाँ हैं। उनमें से जो सबसे अधिक प्रिय हो, उसे मेरे पास भेज दो।' राजा ने ऐसा ही किया। चारों ओर से परदे में घिरी हुई सजी-धजी रानी लक्ष्मिनी बाबा के निकट आयीं। बाबा उस समय निर्जन में भजनावेश में बैठे थे। कंकण, किंकिणी और नूपुर की मधुर ध्वनि सुनते ही आत्मविस्मृत हो विस्फारित नेत्रों से रानी की ओर देखते रह गये। रानी भी दस-पन्द्रह हाथ दूर स्तम्भित हो स्थिर खड़ी रह गयीं। इस प्रकार एक प्रहर बीत गया। रानी की दासियों ने धीरे-धीरे परदा उठाकर देखा कि रानी सचेत अवस्था में अचेत हुई-सी निश्चल खड़ी हैं और बाबा एकटक उनकी ओर देख रहे हैं। तब वे राजा को वहाँ ले गयीं। उन्होंने अपनी आँखों से यह सब देखा। बाबा की अवस्था दिन-रात समान भाव से वैसी ही रही। दूसरे दिन अर्धबाह्य दशा हुई और तीसरे दिन बाह्य दशा। तीन दिन तक राजा भी उसी स्थान पर रहे। भाव-राज्य का कुछ भी ज्ञान न होने के कारण उन्हें भयंकर सन्देह हो गया। तब सिद्ध बाबा ने उन्हें अपने पास बुलाया और मस्तक पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया। उसी क्षण उन्हें स्फूर्ति हुई और वे समझ गये कि सामान्य कंकण-किंकिणी की ध्वनि सुन बाबा को आत्मेश्वरी राधारानी के कंकण-किंकिणी की ध्वनि का उद्दीपन हो गया था और उन्हीं का दर्शन करते हुए वे दो-दिन तक आनन्द-सागर में निमज्जित थे। रानी लक्ष्मिनी भी बाबा के दर्शन कर कृतार्थ हो गयीं। उनकी भक्ति की कथाएँ आज भी ब्रज में कही जाती हैं। उन्होंने एक बार राधाकुण्ड जाकर बहुत-सा धन वैष्णवों की सेवा में खर्च करने की चेष्टा की। वैष्णवों ने कहा - 'हम लोग राजान्न ग्रहण नहीं कर सकते।' रानी रो पड़ी और अति कातर-भाव से बोली- 'आपके चरणों में मेरी प्रार्थना है कि आप ऐसा आशीर्वाद करें, जिससे मरने के पश्चात् फिर राजकुलमें मेरा जन्म न हो। जन्म वहाँ हो, जहाँ जन्मने से आप लोगों की सेवा की योग्यता और अधिकार प्राप्त हो।' उनका ऐसा भाव देख वैष्णवों ने कहा- 'तुम एक काम कर सकती हो। यदि अपने हाथ से गोबर के कंडे पाथो और उन्हें बेचकर प्राप्त किये हुए धन को हमारे पास भेजो, तो हम उसे स्वीकार कर लेंगे।' रानी ने वैसा ही किया। आज तक रानी के दिये हुए उस धन में से राधाकुण्ड के वैष्णवों की सेवा की जाती है। कहते हैं कि सिद्धबाबा कई-कई दिन तक मानसी गंगा में डूबे रहकर जल-स्पर्श-शून्य श्रीविश्वनाथ चक्रवर्ती पाद के स्वहस्तलिखित ग्रन्थ लेकर बाहर निकलते । यह भी प्रसिद्ध है कि श्रीविश्वनाथ चक्रवर्ती पाद जब आवरण शून्य स्थान में बैठकर ग्रन्थ लिखते, तो चारों ओर घनघोर वृष्टि होने पर भी, उनके ग्रन्थ या शरीर को जल का एक बिन्दु भी स्पर्श न करता। सिद्ध बाबा भजन के अनुकूल प्राय: सभी ग्रन्थ संग्रह कर योग्य व्यक्तियों की सहायता से उनका आस्वादन करते। निश्चल होकर जब वे ग्रन्थ श्रवण करते, तब उन्हें असाधारण प्रेमावेश होता। नेत्रों से अश्रु, नासिका से श्लेष्मा और मुख से लार का ऐसा अजस्र प्रवाह होता कि दोनों ओर बैठे दो वैष्णव लगातार पोंछते रहते, तो भी न पोंछ पाते। श्री ब्रज मंडल के सारे वैष्णव सिद्ध बाबा के पास जाकर भजन-विषयक जिज्ञासा करते। बाबा निरंतर भजनावेश में रहते हुए भी उनके अनुकूल उपदेशक उन्हें भजन में उत्साहित करते। 🙏जै जै श्री राधे🙏

ब्रज के भक्त - भक्त चरित्र - ४
('ब्रज के भक्त' पुस्तक से साभार) 

श्रीकृष्णदास बाबा जी
(गोवर्द्धन)

वह दक्षिणदेशीय दिग्विजयी तैलंग पंडित जैसे खम्ब ठोककर सबको ललकार रहा है; पर शास्त्रार्थ करने की बात तो दूर, उसके सम्मुख होने का भी कोई साहस नहीं बटोर पा रहा है। ब्रज के लिए कैसी लज्जा की बात है यह! जो ब्रज सैकड़ों वर्षों भारत का सांस्कृतिक केन्द्र रहा है, वह आज एक तैलंगी पण्डित के आगे नतमस्तक हो रहा है! किस प्रकार ब्रज की नाक रखी जाय इस विषय को लेकर वृन्दावन के पंडित चिन्ताग्रस्त हैं। एक ही उपाय है दिग्विजयी को नीचा दिखाने का। उसे गोवर्धन के सिद्ध श्रीकृष्णदास बाबा के पास भेज दिया जाय। पर वे यदि भजन आवेश के कारण उससे शास्त्रालाप न करें, या अपने स्वाभाविक दैन्य के कारण उससे अपनी अयोग्यता ही प्रकट कर दें, तब तो रही-सही बात भी बिगड़ जायगी। ऐसी कोई युक्ति करनी चाहिये, जिससे दिग्विजयी उनके पीछे पड़ जाय और उन्हें उससे पीछा छुड़ाने के लिए उससे टक्कर लेनी ही पड़े।

आखिर पण्डितों ने एक युक्ति सोच ली। वे दिग्विजयी के पास गये। यथोचित आदर-सत्कार, प्रशंसा और स्तुति के पश्चात् बोले- 'महामना, हम सब आपकी प्रतिभा से प्रभावित हैं। हममें ऐसा कोई नहीं जो आपसे आलाप भी कर सके। हमारा निवेदन है कि आप गोवर्धन के श्रीकृष्णदास बाबा के पास जाने का कष्ट करें। ब्रज के पण्डितों के मुकुट-मणि हैं वे। यदि उन्हें आपने परास्त कर दिया तो समझ लीजिये कि विश्व में आपकी विजय का डंका पिट गया। पर वे आसानी से हाथ आने वाले व्यक्ति नहीं । उन्हें शास्त्रालाप को तैयार करने के लिए आग्रह करना होगा, अपने पाण्डित्य का कुछ प्रदर्शन भी करना होगा। वे हर किसी से शास्त्रालाप नहीं करते। उसी से करते हैं, जिसे यत्किंचित् आलाप के योग्य समझते हैं।'

दिग्विजयी के अभिमान को उकसा देने के लिए इतना पर्याप्त था। वह दूसरे ही दिन वृन्दावन से गोवर्धन गया। श्रीकृष्णदास बाबा के पास जाकर बोला- 'सुना है आप ब्रज के पण्डितों के मुकुटमणि हैं। मैं आपसे शास्त्रालाप कर विजय-पत्र लिखवाने आया हूँ।' बाबा ने सोचा यह कहाँ की मुसीबत आ गयी। उन्होंने बहुत चेष्टा की दैन्य और छल-वाक्यों का प्रयोगकर उसे टाल देने की, पर वह किसी प्रकार उन्हें छोड़ने को राजी न हुआ। उसे अपनी विजय का डंका जो पिटवाना था। उसने कुछ क्रुद्ध हो दु:ख प्रदर्शित करते हुए कहा- 'मैं ब्रज में यह जानकर आया था कि यहाँ बहुत-से बड़े-बड़े पण्डित रहते हैं। उनसे शास्त्रालाप कर आनन्द का उपभोग करूँगा। पर देखता हूँ कि यहाँ एक भी पण्डित नहीं, जो श्रुतिका शुद्ध रूप से उच्चारण भी कर सके।' सिद्ध बाबा नेयकहा- 'हाँ आपके समान वेद-परायण पण्डित यहाँ कोई विरला ही होगा। आप यदि सामवेद का कोई मन्त्र पढ़कर सुनायें तो बड़ी कृपा होगी।' पण्डित तो ऐसा सहयोग ढूँढ ही रहा था। उसने सुललित स्वर में एक श्रुति-मन्त्र का पाठ किया। सिद्ध बाबा ने सुनकर कहा- 'स्वर में तीन दोष हैं।' दिग्विजयी बोला- 'इससे शुद्ध स्वर में मन्त्र उच्चारण कर सके ऐसा कोई पण्डित भारतवर्ष में मझे नहीं दिखता। आप ही और शुद्ध रूप में उच्चारण करें, देखूँ।' तब सिद्ध बाबा ने स्वयं शुद्ध स्वर में मन्त्र का पाठ किया। दिग्विजयी उसे सुनकर स्तब्ध और चकित रह गया। उसने बाबा को साष्टांग दण्डवत् कर कहा- 'आपकी विद्या जागतिक नहीं है!' ऐसा कोई व्यक्ति इस जगत् में नहीं, जो आपकी बराबरी कर सके!"

बात बिल्कुल ठीक थी बाबा की विद्या जागतिक नहीं थी। उनका कुछ भी तो जागतिक नहीं था। प्रारम्भ से ही उनका जीवन किसी दिव्य शक्ति द्वारा परिचालित और परिपूरित था।

संसार का त्यागकर पारमार्थिक जीवन यापन करने के लिए लोगों को कितना संघर्ष करना पड़ता है अपने आपसे और सगे-सम्बन्धियों से। पर बाबा को ऐसा कुछ नहीं करना पड़ा था । उनका जीवन-पथ पहले से ही निर्दिष्ट था। उनका जन्म नरोत्तम ठाकुर महाशय की वंशपरम्परा के अन्तर्गत उड़ीसा के एक समृद्ध परिवार में हुआ था। पिता, श्रीसनातन कानूनगो का स्वर्गवास होने पर उनकी माता सती हो गयीं थीं। दाह के समय उन्होंने अपने तीनों पुत्रों को कुछ आदेश दिया था। सबसे छोटे बालकृष्ण को वृन्दावन में रहकर भजन करने का आदेश दिया था। बालकृष्ण ही सिद्ध श्रीकृष्णदास बाबा के नाम से विख्यात
हुए। १६ वर्ष की अवस्था में वे माँ के द्वारा निर्दिष्ट पथ के पथिक बनकर वृन्दावन चले आये थे। दो वर्ष वृन्दावन में पाठाभ्यास करने के पश्चात् जयपुर गये श्री गोविंद जी की सेवा के उद्देश्य से। वहाँ राजा से गोविन्दजी की सेवा का अधिकार प्राप्तकर आठ-दस वर्ष तक उनकी सेवा की। बराबर गोविन्दजी के राजभोग का प्रसाद ग्रहण करते रहे। गोविन्द जी का प्रसाद ग्रहण करते हुए भी वे प्रबल कामवेग से पीड़ित होने लगे। यह देख उन्हें चिन्ता हुई। शंका जागी कि गोविन्द जी की सेवा में संलग्न रहते हुए और उनके चिन्मय प्रसाद का सेवन
करते हुए भी काम विकार क्यों?

जयपुर में ऐसा कोई न था जो उनकी शंका का समाधान कर सकता।
इसलिए काम्यवन के सिद्ध श्री जयकृष्ण दास बाबा के पास जाकर उन्होंने इस शंका का समाधान करने की प्रार्थना की। बाबा ने उत्तर दिया-
"देख बेटा, एक हरे वृक्ष को काटकर पानी में डुबाओ। कुछ दिन बाद उसे निकालकर बिना सुखाये अग्नि में डाल दो,तो वह जलेगा क्या? जीव अनादिकाल से संसार-सागर में निपतित है, पानी में डूबे काष्ठ की तरह विषय-रस में डूबा हुआ है। उसे हठात् भक्ति रूपी अग्नि में डाल दो तो परिणाम वही होगा जो गीले काष्ठ को अग्नि में डालने से होता है। यदि चाहो कि भक्ति-अग्नि उसे पकड़े तो विषय-रस को सुखाकर भक्ति का मंजन करना होगा। यदि कहो कि महाप्रसाद का विषय-रस से क्या सम्बन्ध? महाप्रसाद तो चिन्मय है,साधारण विषयों से सर्वथा भिन्न, तो क्या तुम भूल गये महाप्रभु के वे वाक्य, जो उन्होंने रघुनाथदास से कहे थे ? रघुनाथदास गोस्वामी जगन्नाथपुरी में जगन्नाथ जी का महाप्रसाद खरीदकर महाप्रभु की सेवा करते थे। इस पर उन्होंने आपत्ति की थी और कहा था 'विषयीर अन्ने हय राजस निमंत्रण', अर्थात् विषयी का अन्न खाना रजोगुण को निमन्त्रण देना है, चाहे वह प्रसाद के रूप में ही क्यों न हो। इसके विपरीत जब उन्हें यह पता चला था कि रघुनाथ स्वयं जगन्नाथजी के उस प्रसाद को धोकर उसका सेवन करते हैं, जो बासी और सड़ा-बुसा होने के कारण मार्ग में फेंक दिया जाता है और जिसे जानवर भी सूँधकर छोड़ जाते हैं, तब उन्हें भी उस प्रसाद का लोभ हो आया था उन्होंने रघुनाथ के पास जाकर उसका एक ग्रास छीनकर खा लिया था और कहा था-

नित नित नाना प्रसाद खाई।
ऐछे स्वाद आर, कोन प्रसादे ना पाई।।

अच्छा सुनो, तुम्हें इस सम्बन्ध में एक घटना सुनाता हूँ- घटना उस समय की है जब रूप, सनातन आदि वृन्दावन के गोस्वामी अप्रकट हो चुके थे। बंग देश में एक वैष्णव-मण्डली नगर-कीर्तन में प्रेमोन्मत्त हो नृत्य-कीर्तन कर रही थी। एक प्रसिद्ध वेश्या, जो अपनी अट्टालिका से इस दृश्य को देख रही थी, हठात् नीचे उतरकर कीर्तनकारी वैष्णवों की पद-धूलि में लोट-पोट होने लगी। उनकी चरणरज के प्रभाव से तत्काल उसके मन में वैराग्य उत्पन्न हुआ। वह कीर्तन-मण्डली के महन्त के चरणों में लोटने और क्रन्दन करने लगी। महन्त ने पूछा- 'तुम चाहती क्या हो।' उसने उत्तर दिया- 'मैं चाहती हूँ कि मेरे पास जो लाखों रुपये के आभूषण हैं, वह आप ठाकुरजी के लिए ले लें। मेरी जितनी धन-सम्पत्ति है, उसे वैष्णव-सेवा में लगा दें और मुझे शिष्या स्वीकार कर लें।'

महन्तजी ने कहा- 'मैंने तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार की। तुम अब मेरी शिष्या हो। मेरी एक आज्ञा का पालन करो। तुम्हारी जितनी भी धन-सम्पत्ति है और जितने अलंकार आदि हैं, उन्हें वृन्दावन जाकर श्रीगोविन्दजी को समर्पण कर दो।'

वेश्या ने ऐसा ही करना चाहा। पर जब वृन्दावन जाकर गोविन्ददेव जी के पुजारी से अपनी इच्छा प्रकट की, तो उन्होंने कहा- 'मैं तुम्हारा कुछ भी ग्रहण नहीं कर सकता।

वेश्या हताश होकर तीन दिन तक यमुना-तट पर बिना अन्न जल के पड़ी रही। तब गोविन्दजी ने पुजारी को आदेश दिया- 'तुम यमुना-तट पर जाकर उस वेश्या को ले आओ। उसका सब धन लेकर मेरा भोग लगाओ और अपने हाथ से उसे मेरा शृंगार करने दो | '

पुजारी ने ऐसा ही किया। वेश्या ने स्नानकर अपने हाथ से श्रीगोविन्ददेवजी का शृंगार किया। उसके धन से गोविन्द देव जी को विविध प्रकार का भोग लगाया गया। वैष्णवों को आमन्त्रित कर उन्हें भोजन कराया गया | उसी रात प्रसाद-भोजनकारी वैष्णवों को स्वप्नदोष हुआ। प्रात:काल परस्पर कथोपकथन के पश्चात् उन्होंने पुजारी से उस दिन के प्रसाद के सम्बन्ध में पूछा तो उसने आद्योपान्त सब वृतान्त कह सुनाया। वैष्णव गण यह जानकर बहुत दुखी हुए कि उन्होंने वेश्या का अन्न खाया। वे अपनी-अपनी कुटी पर जाकर तीन दिन तक बिना अन्न-जल ग्रहण किये पड़े रहे। तीसरे दिन की शेष रात्रि में गोविन्दजी ने
स्वप्न में उनसे कहा- 'तुम क्यों मेरे प्रति क्रोधकर आत्महत्या करना चाह रहे हो?'

'आत्महत्या न करें तो क्या करें? तुमने हमारा घर द्वार छुड़वाकर इतने दिन अपने चरणों की शरण में रखा, क्या इसीलिए कि वेश्या का अन्न खिलाकर हमारा धर्म नाश करो?' पण्डितों ने एक साथ उत्तर दिया।

गोविन्ददेव बोले- 'मैंने कब कहा था तुमसे वेश्या का अन्न खाने को? मैं
तो सभी कुछ खा सकता हूँ। पर तुमसे सब कुछ खाने को कहूँ तब न।'
"तो हम क्या करें। महाप्रसाद सामने आये तो उसकी उपेक्षाकर अपराध के भागी बने?' पण्डितों ने पूछा।

गोविन्द देव ने उन्हें ऐसी स्थिति में प्रसाद का केवल एक कण लेकर उसका सम्मान करने का आदेश दिया।

जयकृष्ण दास बाबा के वचनों से श्रीकृष्णदास की शंका का समाधान
हुआ। उन्होंने निश्चय किया गोविन्ददेव के राजभोग-प्रसाद का सेवन न करने का। वे जयपुर छोड़ नन्दग्राम के पास दोमन बन में पूर्ण वैराग्य से रहकर भजन करने लगे। नन्दग्राम से आटे की भिक्षा कर लाते। उसमें नीम के पत्ते मिला, कभी पानी में सानकर कच्चा, और कभी बाटी की तरह सेंककर खा लेते। धीरे-धीरे उनका शरीर दुर्बल होता गया दृष्टि- शक्ति जाती रही। भिक्षा के लिए जाना भी बन्द हो गया। कई दिन तक कुण्ड का जल पीकर रहे। अन्त में कुण्ड तक जाने की शक्ति भी नहीं रही। दो-तीन दिन बिना जल के बीत गये। तब करुणामयी राधारानी का हृदय विगलित हुआ। उन्होंने ललिता सखी से कहा- 'तू क्या अब भी श्रीकृष्णदास पर कृपा न करेगी? क्या मेरे नाम पर कलंक लगायेगी? ले, यह प्रसाद की थाली, ले जा और उसे भोजन करा।'

ललिताजी प्रसाद की थाली लेकर ब्रजबाला के रूप में दोमन बन में श्रीकृष्णदास बाबा के पास जा उपस्थित हुई और बोलीं- 'बाबा प्रसाद पायले। मेरी मइयाने तेरो दुख देखकै मोकुँ भेजो है प्रसाद लैकें।'

इस वाणी-सुधा के श्रवण-पुट में पड़ते ही और प्रसाद की दिव्य गन्ध के नासिका-रंध्र में जाते ही श्रीकृष्णदास में दिव्य शक्ति का संचार हुआ। उन्होंने प्रेमसे प्रसाद का सेवन किया। प्रसाद सेवन कर थाल को रज से माँज दिया।

ब्रजबाला रूपी ललिताजी ने पूछा- 'बाबा, तू माँगबे कूँ क्यों नाय जाय?'

'लाली आँखनते तो दीखे नाँय, माँगबे जाऊँ कैसे?' बाबा ने उत्तर दिया।
'अच्छा, आँखन ते दीखेगो तो जायो करैगो?' 
'क्यों नहीं जाऊँगो।'
'देख मेरी मइया ने एक आँजन दियो है। जाय तेरी आँख में लगाय दऊँ,
तोको दीखन लगैगो।' इतना कह ललिताजी ने बाबा की दाहिनी आँख में कुछ लगाकर जैसे ही बाई आँख को स्पर्श किया, उनकी आँखों में रोशनी आ गयी। पर उन्हें न तो वह बालिका दीखी और न वह थाल, जिसे माँजकर उन्होंने अभी रखा था। ऐसा लगा कि एक अप्राकृत सुगन्ध से वातावरण परिपूर्ण हो रहा है। बालिका कौन थी? कहाँ से आयी थी और कहाँ चली गयी? अपने स्पर्श मात्र से कैसे दृष्टि दे गयी? यह सब बाबा के लिए एक स्वप्न की सी घटना बनकर रह गया ! इसका यथार्थ मर्म जानने के लिए वे तीन दिन तक वैसे ही पड़े रहे। तीसरे दिन रात्रि में तन्द्रावस्था में उन्होंने देखा कि कोटि विद्युत् छटा को तुच्छ करने वाली दिव्य कान्ति सम्पन्ना एक देवी उनसे कह रही हैं- 'तुम क्यों दुखी हो रहे हो? अब तुम्हें भय किस बात का? मैं तुम्हारी हूँ और तुम मेरे। मेरी अभिन्न सखी ललिता के ललित कर देने से दृष्टि शक्ति प्राप्त करने के साथ-साथ तुम सर्वशक्ति प्राप्त कर चुके हो। अब निश्चिन्त होकर गोवर्धन चले जाओ। वहाँ मुझे प्राप्त करने का सहज सोपान निर्दिष्टकर मेरे चरणों में निष्ठावान् वैष्णवों को कृतार्थ करो।'

इतना कह देवी अन्तर्धान हो गयीं। बहुत देर तक बाबा अश्रु-कम्पादि सात्विक विचारों से अवसन्न रहे। उसके पश्चात् अपने को सर्वशक्ति-सम्पन्न और सफल-मनोरथ जान प्रेम-सिन्धु की तरंगों में शुष्क काष्ठ की तरह तैरते हुए गोवर्धन-तट पर आ लगे।

श्रीकृष्णदास बाबा गोवर्धन में चकलेश्वर नामक स्थान पर रहने लगे। उस समय राधाकुण्ड और गोवर्धन में बहुत से पंडित, महात्मा, रूपसनातनादि गोस्वामियों के संस्कृत ग्रन्थों का सहारा लेकर भजन करते थे। कृष्णदास बाबा को संस्कृत भाषा का यथेष्ट ज्ञान न था। इसलिए वे किसी वृद्ध वैष्णव के निकट हरिनामामृत व्याकरण का अध्ययन करने लगे। उस समय उन्हें एक विकट समस्या का सामना करना पड़ा। उनका अध्ययन भजन में बाधक होने लगा और भजन अध्ययन में। दोनों को अन्तराय जान एक दिन अत्यन्त दुःखित हो उन्होंने मानसी गंगा में प्राण त्याग देने का संकल्प कर लिया। रात अनिद्रा और चिन्ता में व्यतीत हुई। शेष रात्रि में उन्होंने सुना कि उनकी कुटी के बाहर से कोई आवाज दे रहा है- 'कृष्णदास, कृष्णदास।' 

बाहर आये तो प्रत्यक्ष रूप से सामने खड़े देखा अपने अन्तश्चिन्तित, कंथा-करंगधारी श्रीसनातन प्रभुपाद और श्रीललितादेवी को। आत्मविस्मृत और किंकर्तव्यविमूढ़ अवस्था में वे दण्डवत् कर उनके चरणों जा बैठे। सनातन गोस्वामी ने स्नेह से उनके मस्तक पर हाथ फेरते हुए कहा-'कृष्णदास! कुशलपूर्वक तो हो? मधुकरी भर पेट मिल जाती है न?'

'हाँ, प्रभो' कृष्णदास ने हाथ जोड़कर उत्तर दिया।

तब सनातन प्रभु ने कहा- 'देख बेटा, शास्त्र अनन्त हैं। जिसका जहाँ तक अधिकार है वहीं तक उनका अनुशीलन करना यथेष्ट है। शास्त्र अध्ययन के कारण तुझें मरने की आवश्यकता नहीं? ऐसी कुबुद्धि फिर न करना। तेरे द्वारा हमारा बहुत-सा कार्य होना है। आज से मेरे आशीर्वाद से सभी शास्त्रों की तुझे स्वत: स्फूर्ति होगी।' ललितादेवी ने आशीर्वाद दिया-'तू जब भी हमारा स्मरण करेगा, तभी तेरे हृदय में हमारी स्फूर्ति होगी। तेरे द्वारा व्रजवासी वैष्णवों के लिए भजन मुद्रा का प्रकाश होगा।' इतना कह दोनों श्रीकृष्णदास बाबा के मस्तक पर
चरण रख अन्तर्धान हो गये।

इस घटना के पश्चात् श्रीकृष्णदास बाबा समुद्रवत् गम्भीर हो गये। उन्होंने छात्रों को हरिनामामृत व्याकरण पढ़ाना और साधकों को भजन सम्बन्धी उपदेश देना प्रारम्भ कर दिया। हरिनामामृत व्याकरण पढ़ाते समय वे प्रति सूत्र में नित्य-लीला स्थापन कर भजन मुद्रा के द्वार का उद्घाटन करते, जिससे छात्रों को अध्ययन के साथ-साथ भजन-शिक्षा का अवसर भी प्राप्त होता। उन्होंने 'श्रीगोविन्दलीलामृत', 'संकल्प-कल्पद्रुम', 'पद कल्पतरु', 'क्षणदागीति चिंतामणि', 'पदामृत समुद्र' आदि बहुत से ग्रन्थों का अध्ययन कर श्रीमन्महाप्रभु की अष्टकालीय लीला-स्मरण के साथ श्री राधा गोविन्द की अष्टयाम लीला स्मरण की एक पद्धति का प्रणयन किया। अनुगत वैष्णवों को वे उसके अनुसार भजन-शिक्षा देने लगे। यही भजन-पद्धति परवर्ती काल में 'गुटिका' के नाम से प्रसिद्ध हुई।

बाबा जिन्हें भजन-शिक्षा देते, वे सब नित्य रात्रि में उनके पास जाकर अपने-अपने भजन की बात करते। यदि उनके भजन में कोई भूल-भ्रांति होती तो वे उसे सुधार देते। एक दिन एक महात्मा अपने भजन के विषय में बिना कुछ कहे क्रन्दन करने लगे। बाबा ने पूछा तो बोले- 'आज मैं कुछ भी भजन न कर सका। प्रात:कालीन लीला-स्मरण में प्राणेश्वरी के दाहिने हाथ में अलंकार पहनाते समय श्रीहस्त की शोभा में मन इतना अटक गया कि बहुत हटाने की चेष्टा करने पर भी न हटा।

बाबा ने उसे उत्साहित करते हुए कहा- 'तुम्हारा ही तो यथार्थ भजन हुआ है आज।'

सिद्ध बाबा ने जिसे-जिसे भजन का उपदेश किया, वे सभी सिद्ध हो गये। साधारण सिद्ध पुरुषों के लक्षणों से व्रज के सिद्ध पुरुषों के लक्षण सर्वथा पृथक् हैं। व्रजजनानुगत वैष्णवों के अन्तश्चिन्तित भावदेह की वृत्ति जब बाह्यदेह में स्फुट रूप से प्रकट हो दूसरों को दृष्टिगोचर होती है, तब उसे भजन - सिद्धि कहते है। सिद्ध श्रीकृष्णदास बाबा के आनुगत्य में भजन कर जो लोग सिद्ध हो गये हैं, उनमें मुख्य हैं गोवर्धन के द्वितीय श्रीकृष्णदास, मदनमोहन ठौर के श्री नित्यानंद दास, झाड़ू मण्डल के श्रीबलरामदास और लाला बाबू (तृतीय श्रीकृष्णदास)।

सिद्ध श्रीकृष्णदास बाबा के भजन-सिद्धि से संबंधित बहुत-सी घटनाओं के लोगों ने प्रत्यक्ष दर्शन किये हैं। एक बार वे होली-लीला का स्मरण करते हुए अन्तश्चिन्तित देह से राधा रानी का आनुगत्य कर रहे थे। लीला में उनका अंग अबीर, गुलाल, कुंकुम, कस्तूरी आदि से लिस गया। अर्धबाह्यावस्था में जब वे भजन-कुटी से बाहर गये तो वैष्णव-गण उन्हें रंग में रंगे देखकर और अप्राकृत कस्तूरी आदि की दिव्य गन्ध का अनुभव कर कृतार्थ हुए।

एक बार राधा-कृष्ण मानसीगङ्गा में जल-केलि करके चुके थे। तटपर
ललिता-विशाखादि उनकी वेश-भूषा करने में लगी थीं। रूप-मञ्जरी आदि प्रसाधन-सामग्री एकत्र कर रही थीं। सिद्ध बाबा मंजरी रूप में इत्र की शीशी लिये अपेक्षा कर रहे थे। दोनों का हास-परिहास सुन उनके देह में स्तम्भ हुआ और इत्र की शीशी हाथ से गिर पड़ी। उसका सौरभ चारों ओर वातावरण में व्याप्त हो गया। मानसीगङ्गा पर स्नान के लिये आये हुए वैष्णवों ने उस दिव्य गन्ध का अनुभव किया। सिद्ध बाबा ने उसका कारण पूछा, तो वे अपराधी की तरह बोले- क्या करूँ भाई! मैं अपराधी जीव हूँ, सेवा की योग्यता मुझ में है नहीं। प्रिया-प्रियतम की सेवा के समय इत्र की शीशी हाथ से गिरा दी उसी की गन्ध तुम लोग ले रहे हो'।

एक दिन बाबा हाथ में करुआ ले मानसीगङ्गा में स्नान के लिए गये। वहाँ जुगल किशोर की जल-केलि देख वे भावाविष्ट हो अगाध जल में कूद पड़े। उस समय वहाँ और कोई न था। बहुत देर तक जब कुटिया पर न पहुँचे, तब सेवक चिंतित हो उन्हें देखने निकले। चारों ओर खोजने पर भी उनका कहीं पता न चला। समस्त ब्रज मंडल में हाहाकार मच गया। लोग तरह-तरह की अटकलें लगाने लगे। सात दिन बाद बाबा करुआ हाथ में लिये मानसीगङ्गा से बाहर निकले। लोगों ने विस्मय से पूछा- 'बाबा, सात दिन कहाँ थे आप?' वे भी विस्मित हो बोले- 'यहीं तो, मैं स्नान करके निकल रहा हूँ। इतनी-सी देर में सात दिन कैसे बीत गये? तुम लोगों को यह कैसा भ्रम हो गया है।?' 

भरतपुर के राजा जसवंत सिंह सिद्ध बाबा के दर्शन करने गये और बोले-'बाबा, मेरी कुछ सेवा अङ्गीकार कर मुझे धन्य करें ।"

बाबा ने कहा- 'हम लोग व्रजवासियों के घर माधुरी भिक्षा करते हैं। उनकी सेवा करो। उसी से हमारी सेवा हो जाएगी।'

आज्ञा पा राजा ने बहुत-सी भू-सम्पत्ति व्रजवासियों को दान में दी, जिसके लिए आज भी व्रजवासी उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापन करते हैं। इसके पश्चात् वे फिर बाबा के पास गये और बोले- 'आप स्वयं भी यदि कुछ अङ्गीकार करें, तो मैं धन्य होऊँ।

बाबा ने कहा- 'अच्छा, यदि तुम्हारी ऐसी ही इच्छा है, तो सुनो! तुम्हारी बहुत-सी रानियाँ हैं। उनमें से जो सबसे अधिक प्रिय हो, उसे मेरे पास भेज दो।'

राजा ने ऐसा ही किया। चारों ओर से परदे में घिरी हुई सजी-धजी रानी लक्ष्मिनी बाबा के निकट आयीं। बाबा उस समय निर्जन में भजनावेश में बैठे थे। कंकण, किंकिणी और नूपुर की मधुर ध्वनि सुनते ही आत्मविस्मृत हो विस्फारित नेत्रों से रानी की ओर देखते रह गये। रानी भी दस-पन्द्रह हाथ दूर स्तम्भित हो स्थिर खड़ी रह गयीं। इस प्रकार एक प्रहर बीत गया। रानी की दासियों ने धीरे-धीरे परदा उठाकर देखा कि रानी सचेत अवस्था में अचेत हुई-सी निश्चल खड़ी हैं और बाबा एकटक उनकी ओर देख रहे हैं। तब वे राजा को वहाँ ले गयीं। उन्होंने अपनी आँखों से यह सब देखा। बाबा की अवस्था दिन-रात समान भाव से वैसी ही रही। दूसरे दिन अर्धबाह्य दशा हुई और तीसरे दिन बाह्य दशा। तीन दिन तक राजा भी उसी स्थान पर रहे। भाव-राज्य का कुछ भी ज्ञान न होने के कारण उन्हें भयंकर सन्देह हो गया। तब
सिद्ध बाबा ने उन्हें अपने पास बुलाया और मस्तक पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया। उसी क्षण उन्हें स्फूर्ति हुई और वे समझ गये कि सामान्य कंकण-किंकिणी की ध्वनि सुन बाबा को आत्मेश्वरी राधारानी के कंकण-किंकिणी की ध्वनि का उद्दीपन हो गया था और उन्हीं का दर्शन करते हुए वे दो-दिन तक आनन्द-सागर में निमज्जित थे।

रानी लक्ष्मिनी भी बाबा के दर्शन कर कृतार्थ हो गयीं। उनकी भक्ति की कथाएँ आज भी ब्रज में कही जाती हैं। उन्होंने एक बार राधाकुण्ड जाकर बहुत-सा धन वैष्णवों की सेवा में खर्च करने की चेष्टा की। वैष्णवों ने कहा - 'हम लोग राजान्न ग्रहण नहीं कर सकते।' रानी रो पड़ी और अति कातर-भाव से बोली- 'आपके चरणों में मेरी प्रार्थना है कि आप ऐसा आशीर्वाद करें, जिससे मरने के पश्चात् फिर राजकुलमें मेरा जन्म न हो। जन्म वहाँ हो, जहाँ जन्मने से आप लोगों की सेवा की योग्यता और अधिकार प्राप्त हो।'

उनका ऐसा भाव देख वैष्णवों ने कहा- 'तुम एक काम कर सकती हो। यदि अपने हाथ से गोबर के कंडे पाथो और उन्हें बेचकर प्राप्त किये हुए धन को हमारे पास भेजो, तो हम उसे स्वीकार कर लेंगे।' रानी ने वैसा ही किया। आज तक रानी के दिये हुए उस धन में से राधाकुण्ड के वैष्णवों की सेवा की जाती है।

कहते हैं कि सिद्धबाबा कई-कई दिन तक मानसी गंगा में डूबे रहकर जल-स्पर्श-शून्य श्रीविश्वनाथ चक्रवर्ती पाद के स्वहस्तलिखित ग्रन्थ लेकर बाहर निकलते । यह भी प्रसिद्ध है कि श्रीविश्वनाथ चक्रवर्ती पाद जब आवरण शून्य स्थान में बैठकर ग्रन्थ लिखते, तो चारों ओर घनघोर वृष्टि होने पर भी, उनके ग्रन्थ या शरीर को जल का एक बिन्दु भी स्पर्श न करता।

सिद्ध बाबा भजन के अनुकूल प्राय: सभी ग्रन्थ संग्रह कर योग्य व्यक्तियों की सहायता से उनका आस्वादन करते। निश्चल होकर जब वे ग्रन्थ श्रवण करते, तब उन्हें असाधारण प्रेमावेश होता। नेत्रों से अश्रु, नासिका से श्लेष्मा और मुख से लार का ऐसा अजस्र प्रवाह होता कि दोनों ओर बैठे दो वैष्णव लगातार पोंछते रहते, तो भी न पोंछ पाते।

श्री ब्रज मंडल के सारे वैष्णव सिद्ध बाबा के पास जाकर भजन-विषयक जिज्ञासा करते। बाबा निरंतर भजनावेश में रहते हुए भी उनके अनुकूल उपदेशक उन्हें भजन में उत्साहित करते। 

🙏जै जै श्री राधे🙏

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Gulshan Kumar Sep 3, 2019
jai Shri radhey radhey 🙏 Jai brij ke mahan bhakto ki

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