Pawan Bansal
Pawan Bansal Dec 26, 2016

Ranakpur jain temple in rajasthan

Ranakpur jain temple in rajasthan

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Manoj manu Aug 5, 2020

🚩🙏🔔जय श्री राम जी राधे राधे जी 🚩🌺🙏 🌹अपि स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते 🌹 🌿जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ॥🌿🌹 🌹आइये जानते हैं कयूँ लिया प्रभु श्री राम जी ने अवतार मानस ज्ञान से :-आप सभी को प्रभु श्री रामचंद्र जी महाराज के जन्मभूमि मंदिर निर्माण भूमि पूजन की अनेकानेक हार्दिक शुभकामनाएँ एवं मंगलमय बधाईयाँ, 🌿श्री रामचरित मानस ज्ञान से :- 🌺बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार। 🌿निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार॥ भावार्थ:-ब्राह्मण, गो, देवता और संतों के लिए भगवान ने मनुष्य का अवतार लिया। वे (अज्ञानमयी, मलिना) माया और उसके गुण (सत्‌, रज, तम) और (बाहरी तथा भीतरी) इन्द्रियों से परे हैं। उनका (दिव्य) शरीर अपनी इच्छा से ही बना है (किसी कर्म बंधन से परवश होकर त्रिगुणात्मक भौतिक पदार्थों के द्वारा नहीं)॥ "वेदोक्त अभ्यास से विमुख (बिप्र), अनाचार से युक्त दैवीय गुण वाले (सुर), भेद बुद्धि उपासना में फंसे (संत) पुरुषों, और अत्याचार, पाप से दबी पृथ्वी (धेनु) के उत्थान के लिए निर्गुण निराकार परब्रह्म परमात्मा ने मानवी अवतार लिया है। अपनी ही इच्छा शक्ति से, विराट प्रकृति के समष्टि प्रारब्ध और संस्कार को स्वीकार कर,अपना दिव्य सगुण साकार रूप बनाया है। माया के तीनों गुणों सत, रज, तम से निर्लेप रहते हुये है।" 🌹विश्लेषण :- "बिप्र" :- जो केवल वेदोक्त अचार का पालन करने वाला वेद का अभ्यासी है। उसे विप्र की संज्ञा दी गयी है। यही विप्र आगे सदाचार की सिद्ध अवस्था प्राप्त होने पर ब्राह्मण कहलाता है। ब्राह्मण अर्थात जो ब्रह्म (अंतिम सत्य, ईश्वर या परम ज्ञान) को जानता है। अतः ब्राह्मण का अर्थ है - "ईश्वर का ज्ञाता" भी होता है। "धेनु" :- जिस प्रकार गौ अपने बछड़े का पालन करती है। ठीक उसी प्रकार पृथ्वी मनुष्यों सहित 84 लाख योनियों के जरायुज, अण्डज, स्वदेज, उदि्भज जीवों को माता के समान पालन-पोषण करती है। रहने को स्थान और खाने को अन्न देती है। यहाँ पृथ्वी माता को धेनु शब्द से कहा गया है। "सुर" :- तेज, क्षमा, धैर्य, पवित्रता आदि दैविय गुणों से युक्त को सुर की संज्ञा दी गयी है। "संत" :- ईश्वर के भक्त, साधु, संन्यासी, विरक्त, महात्मा को संत की संज्ञा दी गयी है। यही संत सिद्ध अवस्था प्राप्त होने पर आत्मज्ञानी / ब्रह्मज्ञानी कहलाते है। "हित" :- बिप्र, धेनु, सुर, संत इन चारों शब्दो में पूरा चराचर जगत (समष्टि जगत) समा जाता है। हित अर्थात जब चराचर जगत का पतन होने लगता है। तब उनके उत्थान के लिए धर्म की स्थापना करना। "लीन्ह मनुज अवतार" :- निर्गुण निराकार परब्रह्म परमात्मा या जीवनमुक्त सत्ता का अपनी उच्च स्थिति में स्थित रहते हुवे भी नीचे की सगुण साकार मानवी रूप में अभिव्यक्त होना। "निज" :- प्रकृति के किसी भी बंधन में न होते हुवे भी अपनी स्वयं की मर्जी से। "इच्छा" :- 'परब्रह्म की इच्छा शक्ति' या 'परमात्म ज्ञान (ब्रह्मज्ञान) में स्थित पुरुष का दृढ़ निश्चय' सरल शब्दो में 'इच्छा शक्ति' दो शब्दों से मिल कर बनी है। दृढ़ निश्चय + ब्रह्मचर्य। "दृढ़ निश्चय" अर्थात ऐसा निश्चय जो किसी भी परिस्थिति में न बदले। और "ब्रह्मचर्य" अर्थात "ब्रह्म के समान आचरण" अर्थात निर्लेप / उदासीन / साक्षी / तटस्थ / निष्काम भाव से रहना ही ब्रह्मचर्य कहलाता है। (साधक, जिज्ञासु, भक्त इसी ब्रह्म आचरण की सिद्धि के लिए बाहर के ब्रह्मचर्य अर्थात विवाह न करना, त्याग, संयम, संतोष, तप आदि साधन करते है। और उनमें से कुछ तो अपने साधन को ही ब्रह्मचर्य समझ लेते है। जबकि शास्त्र, भीतर के ब्रह्म आचरण (ज्ञान में स्थिति) को ही ब्रह्मचर्य कहता है। फिर विवाह करे, चाहे शास्त्रोचित भोग भोगे, बाहर से सब कुछ करता हुआ भी भीतर से निर्लेप ही रहता है।) "निर्मित तनु" :- प्रत्येक मनुष्य का अपना-अपना संस्कार (प्रकृति) और प्रारब्ध होता है। जिसको व्यष्टि कहते है। यही व्यष्टि सामूहिक रूप से समष्टि कहलाती है। परब्रह्म परमात्मा अवतार के समय, यही विराट समष्टि प्रारब्ध और संस्कार को स्वीकार कर अपना सगुन साकार मानवी रूप बनाते है। "माया गुन गो पार" :- माया के तीनों गुण सत, रज और तम से परे (निर्लेप / उदासीन / तटस्थ) होते हुवे भी माया के बीच रहना। 🙏🌹🌺प्रभु श्री रामचंद्र जी सीता मैया श्री हनुमान जी सभी का सदा कल्याण करें सदा मंगल करें ,जय श्री राम जी जय श्री सीताराम जी जय सियाराम जी 🌺🌹🙏

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Sanjay Singh Aug 5, 2020

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