Rani Kasturi
Rani Kasturi Feb 23, 2021

Jai Shree Ram Jee 🙏💖 Good Evening Happy Tuesday

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Good Evening
Happy Tuesday

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Rani Kasturi Feb 23, 2021
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Dinesh Varshney Apr 16, 2021

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Chandrashekhar Karwa Apr 16, 2021

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Ramesh Agrawal Apr 16, 2021

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RamniwasSoni Apr 16, 2021

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kamal.pawa Apr 16, 2021

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sn.vyas Apr 16, 2021

...........!! *श्रीराम: शरणं मम* !!......... ।।श्रीरामकिंकर वचनामृत।। °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°° *अगर कोई अहंकार का भार लेकर* *कथा की नाव में बैठेगा तो नाव के* *डूबने की संभावना अधिक रहेगी।* °" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "° रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में गोस्वामी जी मानस-रोगों का वर्णन में वहाँ पर वे अत्यन्त सांकेतिक रूप में वर्णन करते हैं कि *जैसे रोग दूर करने के दवा, वैद्य, तथा पथ्य ये तीन साधन हैं। और हमें यह स्पष्ट दिखाई देता है कि रोग की ठीक-ठीक पहचान करने वाला वैद्य अथवा डाक्टर यदि न मिले, तो भी आप ठीक नहीं होंगे। बहुत अच्छी दवा बताने वाला वैद्य भी मिल जाय, पर अगर दवा ही बाजार में नकली मिले, तो नुस्खा किस काम आवेगा ? और असली दवा भी मिल गई, उसे लेकर खाने भी लगे, पर जितनी दवा नहीं खा रहे हों उससे अधिक यदि कुपथ्य कर रहे हों तो फिर दवा फायदा नहीं करेगी।* आगे चलकर कागभुशुण्डि जी मन के रोगों का वर्णन करते हुए कहते हैं कि पहले वैद्य खोजिए। और वह वैद्य है सद्गुरु -- *सदगुरु वैद्य वचन विस्वासा।* रामायण में तो सबसे बड़े सदगुरु भगवान शंकर हैं। और वे शंकर जी सदगुरु के रूप में रावण को प्राप्त हैं । वे ही शंकर जी सती के पति भी हैं, और *'पतिदेव गुरु स्त्रीणाम्'* के रूप में सती जी के भी गुरु हैं। यद्यपि शंकर जी तो त्रिभुवन-गुरु हैं। पर कितनी बड़ी बिडम्बना है ? इसीलिए भगवान राम से शंकर जी ने यही कहा कि प्रभु ! आपने जनकनन्दिनी के वियोग में जो रुदन की लीला की, उसमें तो मुझे बड़ा विचित्र-सा अनुभव हुआ। क्योंकि मैं तो समझे बैठा था कि मैं त्रिभुवन-गुरु हूँ, लेकिन महाराज ! आपके स्वरुप के विषय में भ्रम भी हुआ तो मेरे परिवार में हुआ। या तो सती जी को भ्रम हुआ या रावण को। और एक बात यह बड़ी अनोखी है कि भगवान की भक्ति को सर्वोत्तम औषधि के रुप में स्वीकार करते हुए लिखा गया है कि -- *'रघुपति भगति सजीवनि मूरी।* और ? भक्ति की यही दिव्य दवा सती जी को दी जा रही थी। क्योंकि शंकर जी सती को कथा सुनाने के लिए अगस्त्य जी के पास लेकर गए, और कथा का श्रवण -- *'दूसर रति मम कथा प्रसंगा'* -- के अनुसार भक्ति ही तो है। इसका अभिप्राय है कि यहाँ पर वैद्य भी बहुत बढ़िया हैं, दवा भी सर्वोत्तम है, लेकिन फिर भी बात उल्टी हो गई। क्योंकि सती का रोग बढ़ गया। सती जी भगवान शंकर के साथ कथा में गई। गोस्वामी जी कथा की महिमा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि -- *निज संदेह मोह भ्रम हरनी।* *करउँ कथा भव सरिता तरनी।।* १/३० (ख)/४ -- मैं सन्देह, मोह और भ्रम को दूर करने वाली तथा संसाररूपी नदी को पार करने वाली कथा सुना रहा हूँ । ओर आप याद रखिएगा कि *कथा नाव तो है, पर नाव डूबती हुई दिखाई देती है कि नहीं ? इसका सीधा-सा तात्पर्य है कि यद्यपि नाव तो अत्यन्त सुदृढ़ होनी ही चाहिए, पर नाव बहुत बढ़िया होने के बाद भी अगर बैठने वाले व्यक्ति असंतुलित हो जाए, यात्री यदि सम्भल कर न बैठे तो नाव अवश्य डूब जाएगी। क्योंकि बढ़िया नाव में भी जितना बोझ उठाने की सामर्थ्य होगी अगर उससे ज्यादा बोझ लाद दिया जाएगा तो भी नाव डूब जाएगी।* *कथा की नाव में यद्यपि बोझ उठाने की बड़ी सामर्थ्य है लेकिन इतना होते हुए भी कथा की नाव में अहंकार का बोझ उठाने की सामर्थ्य नहीं हैं । अगर कोई अहंकार का भार लेकर कथा की नाव में बैठेगा तो नाव के डूबने की संभावना अधिक रहेगी।* जीवन में लाभ नहीं हो रहा है तो ढूंढ़िये कि कौन-सी कमी रह गई हैं ? कहीं सद्गुरु की कमी तो नहीं रह गई, कहीं कपट-मुनि जैसा नकली गुरु जैसे प्रतापभानु को मिला, वैसे ही हमें भी तो नहीं मिल गया है। कहीं कालनेमि की तरह तो वैद्य नहीं मिल गया ? क्योंकि कालनेमि के समान वैद्य मिलने पर भी समस्या रहेगी। पर अगर भगवान शंकर के समान योग्य वैद्य मिल गया तब तो कोई समस्या ही नहीं है। परन्तु उसके साथ गोस्वामी जी ने यह वाक्य और जोड़ दिया कि -- *सदगुर बैद बचन बिश्वासा।* *संजम यह न विषय के आसा॥* *रघुपति भगति सजीवन मूरी।* *अनूपान श्रद्धामति पूरी॥* *एहि विधि भलेहि सो रोग नसाहीं।* *नाहि त जतन कोटि नहिं जाहीं॥* ७/१२१ (ख)/६-८ -- उन्होंने कहा कि *केवल सद्गुरुरूपी वैद्य के होने से ही काम नहीं चलेगा अपितु उसके वचनों पर विश्वास भी होना चाहिए। भक्ति की दवा हो किन्तु उसके साथ श्रद्धा का अनुपान अवश्य हो। और उसके पश्चात् विषय के कुपथ्य का परित्याग भी हो। जब इतनी वस्तुएँ एकत्रित होती हैं तब कहीं जाकर मन के रोगों का नाश होता है।* यदि हमारे जीवन में लाभ नहीं हो रहा तो आत्मनिरीक्षण करके देखें कि हमसे कोई त्रुटि तो नहीं हो रही है। सती जी का रोग बढ़ गया तो उसके कारण हमें प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं। यद्यपि सती जी कथा की नाव में बैठी तो, परन्तु अहंकार लेकर बैठीं कि 'मैं तो दक्ष की पुत्री हूँ।' अगस्त्य जी ने जब पूजन किया तो यह भाव आ गया कि मैं इनकी अपेक्षा श्रेष्ठ हूँ, तो मैं क्या कथा सुनूं, इसलिए कथा का लाभ नहीं हुआ। *वैद्य पर विश्वास होना चाहिए*, किन्तु भगवान् राम के रूप को देखकर जब सती के अन्तःकरण में सन्देह उत्पन्न हुआ, तब भगवान शंकर ने बहुत समझाया किन्तु उनके वचनों पर विश्वास नहीं हुआ इसीलिए सती जी को दुखः उठाना पड़ा। 🔱जय गुरुदेव जय सियाराम 🙏

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